হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1668)


1668 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: جُعِلت لي الأرض مسجدًا وطهورًا". مختصرًا.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (523) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة في حديث طويل.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার জন্য জমিনকে সালাতের স্থান (মসজিদ) এবং পবিত্রতার মাধ্যম বানানো হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1669)


1669 - عن حذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"جُعِلت لنا الأرض كلها مسجدًا، وجعلت تربتها لنا طهورًا إذا لم نَجِدَ الماءَ". مختصرًا.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (522) من حديث أبي مالك الأشجعي، عن ربعي، عن حذيفة … فذكر الحديث.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাদের জন্য গোটা পৃথিবীকেই মাসজিদ বানিয়ে দেওয়া হয়েছে এবং যখন আমরা পানি না পাই, তখন এর মাটি আমাদের জন্য পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম (তাহূর) বানিয়ে দেওয়া হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1670)


1670 - عن أبي ذرٍّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"جُعِلت لي الأرض طهورًا ومسجدًا".

صحيح: رواه أبو داود (498) عن عثمان بن أبي شيبة، حدَّثنا جرير، عن الأعمش، عن مجاهد بن جَبْر، عن عبيد الله بن عمر الليثي، عن أبي ذر، فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، وقد أخرجه الحاكم (2/ 423) مطوَّلًا من طريق الأعمش به .. وقال: على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السياقة، إنَّما أخرجا ألفاظًا من الحديث متفرِّقةً.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার জন্য জমিনকে পবিত্রতা অর্জনের উপায় এবং মসজিদ (সিজদার স্থান) বানানো হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1671)


1671 - عن عمرو بن شُعيب، عن أبيه، عن جده: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: جُعِلت لي الأرض مساجدَ وطهورًا أينما أدركتني الصلاة تمسَّحتُ وصلَّيتُ، وكان مَن قبلي يُعظِّمون ذلك، إنَّما كانوا يُصلُّون في كنائسهم وبيعهم …". مختصرًا.
حسن: رواه أحمد (7068) قال: حدَّثنا قتيبة بن سعيد، حدَّثنا بكر بن مُضَر، عن ابن الهاد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكر الحديث بطوله.

وابن الهاد هو يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد الليثي أبو عبد الله المدني.

وإسناده حسن لأجل عمرو بن شعيب فإنَّه صدوقٌ. وأورده الهيثمي في"المجمع") وقال: رواه أحمد، ورجاله ثقات.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার জন্য জমিনকে সিজদার স্থান ও পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম বানানো হয়েছে। যেখানেই সালাতের সময় আমাকে পেয়েছে, আমি (তায়াম্মুমের মাধ্যমে) পবিত্রতা অর্জন করে সালাত আদায় করেছি। আর আমার পূর্বের লোকেরা এই বিষয়টিকে কঠিন মনে করত; তারা শুধুমাত্র তাদের গির্জা ও উপাসনালয়গুলিতেই সালাত (বা প্রার্থনা) করত।









আল-জামি` আল-কামিল (1672)


1672 - عن شقيق بن سلمة قال: كنت جالسًا مع عبد الله وأبي موسى، فقال أبو موسى: يا أبا عبد الرحمن! أرأيت لو أن رجلًا أجنب فلم يجد الماء شهرًا كيف يصنع بالصلاة؟ فقال عبد الله: لا يتيمم وإن لم يجد الماء شهرًا، فقال أبو موسى: فكيف بهذه الآية في سورة المائدة: {فَلَمْ تَجِدُوا مَاءً فَتَيَمَّمُوا صَعِيدًا طَيِّبًا} [المائدة 6] فقال عبد الله: لو رُخِّص لهم في هذه الآية لأوشك إذا برد عليهم الماء أن يتيمموا بالصعيد، فقال أبو موسى لعبد الله: ألم تسمع قول عمار: بعثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حاجة فأجنبتُ، فلم أجد الماء، فتمرَّغتُ في الصعيد كما تَمرَّغُ الدابة، ثم أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت له ذلك، فقال: إنَّما كان يكفيك أن تقول بيديك هكذا"، ثم ضرب بيده الأرض ضربةً واحدةً، ثمَّ مسح الشمال على اليمين وظاهر كفيه ووجْهه؟ فقال عبد الله: أَوَ لم تَرَ عمر لم يقنع بقول عمار؟ .

متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في التيمم (347) ومسلم في الحيض (368) كلاهما من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، عن شقيق فذكر الحديث.




শقيق ইবনু সালামাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আব্দুল্লাহ [ইবনু মাসউদ] (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আবূ মূসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে বসা ছিলাম। তখন আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে আবূ আব্দুর রহমান! আপনার কী মত, যদি কোনো লোক জুনুবী (নাপাক) হয় এবং এক মাস ধরে পানি না পায়, তাহলে সে নামাযের জন্য কী করবে? তখন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে তায়াম্মুম করবে না, যদিও সে এক মাস ধরে পানি না পায়। আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে সূরা মায়েদার এই আয়াতটির (বিধান) কী হবে— {আর তোমরা পানি না পেলে পবিত্র মাটি দ্বারা তায়াম্মুম করবে।} [মায়েদাহ ৬] আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি তাদেরকে এই আয়াতে ছাড় দেওয়া হতো, তাহলে তাদের কাছে যখন পানি ঠাণ্ডা লাগবে, তখন তারা দ্রুত মাটি দ্বারা তায়াম্মুম করা শুরু করবে। আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আপনি কি আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য শোনেননি? তিনি (আম্মার) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে কোনো কাজে পাঠালেন, তখন আমি জুনুবী (নাপাক) হলাম, কিন্তু পানি পেলাম না। আমি পশুর মতো মাটিতে গড়াগড়ি দিলাম। এরপর আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে তাঁকে বিষয়টি জানালাম। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার জন্য তো এটাই যথেষ্ট ছিল যে তুমি তোমার হাত দিয়ে এভাবে করবে।" এরপর তিনি তাঁর হাত দিয়ে মাটিতে একবার মাত্র আঘাত করলেন, অতঃপর বাম হাত দিয়ে ডান হাতের উপরে এবং উভয় হাতের কব্জির উপরিভাগ ও মুখমণ্ডল মাসাহ করলেন? তখন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কি দেখেননি যে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথাতে সন্তুষ্ট হতে পারেননি?









আল-জামি` আল-কামিল (1673)


1673 - عن عبد الرحمن بن أبزى: أنَّ رجلًا أتى عمر بن الخطاب فقال: إنِّي أجنبتُ فلم أجد ماءً؟ فقال: لا تُصلِّ، فقال عمار: أما تذكر يا أمير المؤمنين! إذ أنا وأنت في سريةٍ فأجنبنا فلم نجِدِ الماءَ، فأمَّا أنت فلم تُصلّ، وأمَّا أنا فتمعّكْتُ في التراب وصلّيت، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إنَّما يكفيك أن تضرب بيديك الأرض، ثم تنفخ، ثم تمسح بهما وجهك وكفيك".

فقال عمر: اتقْ الله يا عمار! قال: إن شئتَ لم أحدّث به. فقال عمر: نُولِّيك ما تولَّيتَ.

متَّفقٌ عليه: أخرجه البخاري في الوضوء (338) ومسلم في الحيض (368) كلاهما من طريق شعبة، قال: حدثني الحكم، عن ذَرّ، عن سعيد بن عبد الرحمن بن أبْزَى، عن أبيه فذكر الحديث. واللفظ لمسلمٍ.
وذَرّ هو: ابن عبد الله المُرهبي - بضم الميم وسكون الراء.

وفي رواية:"ونفخ فيهما". وفي رواية:"تفل فيهما". كلاهما عند البخاري. وفي رواية عند مسلم:"فنفض يديه فمسح وجهه وكفيه". والمقصود منه استحباب تخفيف التراب.

وقوله: فقال عمر: نُولِّيك ما تَولَّيتَ. معناه أي: لا يلزم من كوني لا أتذكره أن لا يكون حقًّا في نفس الأمر، فليس لي منعك من التحديث به.

وأمَّا ما رواه أبو داود (318 - 320) والنسائي (351) وابن ماجه (565، 566) عن عمار بن ياسر نفسه، وفيه:"فضرب المسلمون بأكفّهم الصعيد، ثم مسحوا وجوههم مسحة واحدة، ثم عادوا فضربوا بأكفهم الصعيد مرة أُخرى فمسحوا بأيديهم كلها إلى المناكب والآباط من بطون أيديهم". واللفظ لأبي داود. فهو إما موقوف؛ فإنَّ عمار بن ياسر لم يذكر فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم، أو صحيح موصول ولكن مضطرب في المتن، فلم يذكر النسائي وابن ماجه ضربتين، وإنَّما ذكرا ضربة واحدة.

وقد أشار إلى هذا الاضطراب أبو داود عَقِب إخراج الحديث، فقال: وكذلك رواه ابن إسحاق قال فيه: عن ابن عباس، وذكر ضربتين كما ذكر يونس، ورواه معمر، عن الزهري ضربتين، وقال مالك عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله، عن أبيه، عن عمار [أي ولم يذكر ضربتين، وإنَّما ذكر مالك ضربةً واحدةً كما في رواية النسائي]. وكذلك قال أبو أويس: [عن الزهري أي: عن عبيد الله بن عبد الله عن أبيه] وشكّ فيه ابن عيينة قال مرة: عن عبد الله، عن أبيه، أو عن عبيد الله، عن ابن عباس. ومرة قال: عن أبيه، ومرة قال: عن ابن عباس. واضطرب [ابن عُيينة] فيه وفي سماعه من الزهري. ولم يذكر أحد منهم في هذا الحديث الضربتين إلَّا من سميتُ. انتهى.

فظهر منه أن هذا الحديث أعلّ بعلل:

منها: الانقطاع، فقد رُوي يونس بن يزيد الأيلي عند أبي داود وابن ماجه، والليث بن سعد عند ابن ماجه، كلاهما عن ابن شهاب الزهري، ولم يذكرا"عن أبيه" أو"عن ابن عباس" بين عبيد الله بن عبد الله وعمار بن ياسر؛ لأنَّ عبيد الله بن عبد الله لم يدرك عمارا، بينما روى صالح بن كيسان عند أبي داود والنسائي، ومالك عند النسائي وحده فأدخل صالح بين عبيد الله بن عبد الله وعمار بن ياسر بن عباس، وقال مالك:"عن أبيه".

ومنها: تردّد سفيان بن عيينة بين ابن عباس وبين قوله:"عن أبيه".

ومنها: سماع ابن عيينة عن الزهري، فأدخل ابن ماجه بين سفيان والزهري (عمرو بن دينار).

ومنها: الاضطراب في المتن في عدد الضربات.

وعلى ثبوت صحته فإنه موقوف على عمار بن ياسر؛ لأنه لم يرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم.

ويرى البعض أن قوله:"إلى الإبط" منسوخ بحديث عمار بن ياسر نفسه عن النبي صلى الله عليه وسلم: الوجه
والكفين. رواه مسلم وغيره في حديث شقيق بن سلمة: إنَّما يكفيك أن تقول يديك هكذا" ثم ضرب بيديه الأرض ضربة واحدة، ثمَّ مسح الشمال على اليمين، وظاهر كفيه ووجْهَه.

قال الشافعي: وقد قال عمار: تيممنا مع النبي صلى الله عليه وسلم إلى المناكب، وروي عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم الوجه والكفين، وكان قوله:"تيممنا مع النبي صلى الله عليه وسلم إلى المناكب" لم يكن عن أمر النبي صلى الله عليه وسلم، فإنْ ثبت عن عمار عن النبي صلى الله عليه وسلم الوجه والكفين، ولم يثبت عن النبي صلى الله عليه وسلم إلى المرفقين، فما ثبت عن النبي صلى الله عليه وسلم أولى. انتهى. انظر:"السنن الكبرى" (1/ 211) وانظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 310).



فائدة مهمة:

" الأحاديث الواردة في صفة التيمم لم يصح منها سوى حديث أبي جُهيم وعمار، وما عداهما فضعيف أو مختلف في رفعه ووقفه، والراجح عدم رفعه، فأما حديث أبي جُهيم فورد بذكر اليدين مجملًا، وأمَّا حديث عمار فورد بذكر الكفين في الصحيحين، وبذكر المرفقين في السنن، وفي رواية: إلى نصف الذراع، وفي رواية: إلى الأباط. فأما رواية المرفقين، وكذا نصف الذراع ففيهما مقال، وأمَّا رواية الآباط فقال الشافعي وغيره: إن كان ذلك وقع بأمر النبي صلى الله عليه وسلم فكل تيمم صحّ للنبي صلى الله عليه وسلم بعده فهو ناسخ له، وإن كان وقع بغير أمره فالحجة فيما أمر به. ومما يقوي رواية الصحيحين في الاقتصار على الوجه والكفين كون عمار كان يفتي بعد النبي صلى الله عليه وسلم بذلك، وراوي الحديث أعرف بالمراد به من غيره، ولا سيما الصحابي المجتهد" قاله الحافظ في"فتح الباري" (1/ 444 - 445).

قلت: وسيأتي حديث أبي جُهيم.




আব্দুর রহমান ইবনে আবযা থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে বলল: আমি জুনুবী (নাপাক) হয়েছি কিন্তু পানি পাইনি (এখন কী করব)? তিনি (উমর) বললেন: তুমি সালাত আদায় করবে না। তখন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমীরুল মু'মিনীন! আপনার কি মনে নেই, যখন আমি আর আপনি এক অভিযানে ছিলাম এবং আমরা জুনুবী হয়েছিলাম কিন্তু পানি পাইনি? আপনি তখন সালাত আদায় করেননি, আর আমি মাটির মধ্যে গড়াগড়ি দিয়েছিলাম এবং সালাত আদায় করেছিলাম। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তোমার জন্য যথেষ্ট হলো, তুমি তোমার দু’হাত মাটির উপর মারবে, অতঃপর তাতে ফুঁ দেবে, তারপর তা দিয়ে তোমার মুখমণ্ডল ও দু’হাতের কব্জি (বা তালু) মাসাহ করবে।"

তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আম্মার, আল্লাহকে ভয় করো! আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি চাইলে আমি এই হাদিস আর বর্ণনা করব না। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি যা দায়িত্ব নিলে, আমরা তোমাকে সেই দায়িত্বে বহাল রাখলাম।

উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই উক্তি: 'তুমি যা দায়িত্ব নিলে, আমরা তোমাকে সেই দায়িত্বে বহাল রাখলাম'—এর অর্থ হলো: আমি এটি স্মরণ করতে না পারলেও এটি যে বাস্তব সত্য নয়, এমন আবশ্যক নয়। সুতরাং, এটি বর্ণনা করা থেকে তোমাকে বাধা দেওয়ার অধিকার আমার নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (1674)


1674 - عن عمران بن حصين أن رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا معتزلًا لم يصل في القوم، فقال:"يا فلان! ما منعك أن تُصلِّيَ مع القوم؟". فقال: يا رسول الله! أصابتني جنابةٌ ولا ماء، فقال:"عليك بالصعيد؛ فإنه يكفيك".

متفق عليه: رواه البخاري في التيمم (348) ومسلم في المساجد (682) كلاهما من طريق أبي رجاء العُطارديّ، عن عمران بن حصين فذكر مثله.

وهو جزء من حديث طويل انظره في دلائل النبوة.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন একজন ব্যক্তিকে দেখলেন যে একাকী বসে আছে এবং সে লোকদের সাথে সালাত আদায় করেনি। অতঃপর তিনি বললেন, "হে অমুক! কিসে তোমাকে লোকদের সাথে সালাত আদায় করা থেকে বিরত রাখল?" সে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমার উপর জানাবাত (গোসল ফরজ হওয়া) এসেছে এবং আমার কাছে পানি নেই।" তিনি বললেন, "তুমি পবিত্র মাটি ব্যবহার করো, সেটাই তোমার জন্য যথেষ্ট। "









আল-জামি` আল-কামিল (1675)


1675 - عن أبي ذرٍّ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الصعيد الطّيب وضوءُ المسلم ولو إلى عشر سنين؛ فإذا وجدت الماء فأمِسَّه جلدك؛ فإنَّ ذلك خير".

حسن: رواه أبو داود (332) والترمذي (124) بلاهما من حديث خالد الحذاء، والنسائي (322)
من حديث أيوب، كلاهما - أعني خالد وأيوب - عن أبي قِلابة، عن عمرو بن بُجدان، عن أبي ذرٍّ، فذكره مختصرًا هكذا. وتفصيله ما ذكره أبو داود: قال أبو ذرٍّ: اجتمعت غُنيمةٌ عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا أبا ذرٍّ أأبدُ فيها"، فبدوتُ إلى الربذة، فكانت تصيبني الجنابةُ، فأمكث الخميس والسبت، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"أبو ذرٍّ"، فسكتُّ، فقال: ثكلتك أمك أبا ذرٍّ! ، لأمك الويل!"، فدعا لي بجارية سوداء، فجاءت بعسٍ فيه ماء فَسَرتْني بثوب، واستترتُ بالراحلة واغتسلتُ، فكأنِّي أَلْقَيتُ عني جبلًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الصعيد الطيب … فذكر الحديث.

قال أبو داود: حديث عمرو بن عون (وهو شيخ أبي داود) أتمّ. قال الترمذي: حسن صحيح.

قلت: في الإسناد عمرو بن بُجدان، روي عن أبي ذرٍّ الغفاري وأبي زيد الأنصاري، وعنه أبو قِلابة، قال علي بن المديني: لم يرو عنه غيره. فهو مجهول الحال، إلَّا أن العجلي قال:"بصري تابعي ثقة"."تاريخ الثقات" (ص 362). ووثقه أيضًا ابن حبَّان وأخرجه في صحيحه (1311)، والحاكم في"المستدرك" (1/ 176) وقال: حديث صحيح.

وتكلم فيه ابن القطان في كتابه"الوهم والإيهام" (3/ رقم 1073) فقال:"هذا حديث ضعيف لا شك". وأطال.

وقال الذهبي في الميزان (3/ 247): حسنه الترمذي، ولم يرقه إلى الصحة للجهالة بحال عمرو. انتهى.

وقال الحافظ في التلخيص (1/ 154): وقد وثَّقه العجلي، وغفل ابن القطان، فقال: إنه مجهول. وقال في التقريب: لا يعرف حاله. فتناقض.

وقد رواه أيضًا أبو داود من حديث حماد بن (سلمة) عن أيوب، عن أبي قِلابة، عن رجل من بني عامر قال: دخلت في الإسلام، فأهمني ديني، فأتيتُ أبا ذرٍّ فقال أبو ذرٍّ: أنِّي اجتويتُ المدينة، فأمرني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بذَوْدٍ وبغنم، فقال لي:"اشرب من ألبانها - قال حماد: وأشكُّ في"أبوالها" - فقال أبو ذرٍّ: فكنت أعزُب عن الماء ومعي أهلي، فذكر الحديث.

قال أبو داود: رواه حماد بن زيد عن أيوب، لم يذكر (أبوالها).

وقال أبو داود: هذا ليس بصحيح، وليس في أبوالها إلَّا حديث أنس، تفرد به أهل البصرة. انتهى.

ومال إلى تصحيحه تقي الدين ابن دقيق العيد في الامام قائلًا: هو من العَجِب كون القطان لا يكتفي بتصحيح الترمذي في معرفة حال عمرو بن بُجدان، مع تفرده بالحديث، وهو نقل كلامه: هذا حديث حسن صحيح. وأي فرق بين أن يقول: هو ثقة، أو يصحح له حديثًا انفرد به …".

والخلاصة: إنه حديث حسن، وهو أحسن شيء في هذا الباب.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: উত্তম পবিত্র মাটি হলো মুসলিমের জন্য পবিত্রতার মাধ্যম (অযু বা তায়াম্মুম), যদিও সে দশ বছর পর্যন্ত (পানি না পায়)। যখন তুমি পানি পাবে, তখন তা তোমার চামড়ায় স্পর্শ করাও/লাগাও, কারণ সেটাই উত্তম।









আল-জামি` আল-কামিল (1676)


1676 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الصعيد وُضوءُ المسلم وإن لم يجدِ الماءَ عشرَ سنين، فإذا وجدَ الماء فليتقِّ الله، وليمسّه بشره؛ فإنَّ ذلك خير".
صحيح: رواه البزار - (كشف الأستار 1/ رقم 310) قال: حدَّثنا مُقدَّم بن محمد بن علي بن مُقدَّم المقدمي، حدَّثني عمي القاسم بن يحيى بن عطاء بن مُقدَّم، ثنا هشام بن حسَّان، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

قال البزار: لا نعلمه يُروي عن أبي هريرة إلَّا من هذا الوجه، ومقدم معروف النسب. انتهى

ورواه الطبراني في"الأوسط" قال: حدَّثنا أحمد بن محمد بن صدقة، ثنا مُقدَّم بن محمد المقدَّمي به، وفيه قال أبو هريرة: كان أبو ذرٍّ في غُنَيمة بالمدينة، فلما جاء قال له النبي صلى الله عليه وسلم: يا أبا ذرٍّ! ، فسكت، فقال:"يا أبا ذرٍّ ثكلتك أمك!" قال: إنِّي جنبتُ، فدعا له الجارية بماء، فجاءت به فاستتر براحلته، ثم اغتسل، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"يجزئك الصعيد ولو لم تجد الماء عشرين سنة، فإذا وجدته فأمسّه جلدك".

وقال: لم يروه عن ابن سيرين إلَّا هشام، ولا عن هشام إلَّا القاسم؛ تفرد به مقدمي. انتهى.

وقال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 261): ورجاله رجال الصحيح.

وذكر الحافظ ابن القيم في تهذيب السنن (1/ 205) بعد أن عزاه إلى البزار:"وذكره ابن القطان في بابِ أحاديث ذَكَر أنَّ أسانيدها صحاح" انتهى.

قلت: أورده ابن القطان في"الوهم والإيهام" (5/ 264) من جهة البزار، وصحَّح إسناده، وعلق على كلام البزار قائلًا:"إن القاسم بن يحيى بن عطاء بن مُقدَّم أبا محمد الهلالي الواسطي يروي عن عبيد الله بن عمر وعبد الله بن عثمان بن خُثيم، روى عنه ابن أخيه مُقدَّم بن محمد الواسطي وأحمد بن حنبل، وأخرج له البخاري في التفسير والتوحيد وغيرهما من جامعه معتمِدًا ما يروي، فاعلم ذلك".

إلَّا أن الدارقطني صوَّب إرساله كما ذكره الحافظ في"بلوغ المرام".

تنبيه:

والذي نقله الزيلعي في نصب الراية (1/ 150) من كلام ابن القطان قائلًا:"وذكره ابن القطان في كتابه"الوهم والإيهام" من جهة البزار، وقال: إسناده صحيح، وهو غريب من حديث أبي هريرة، وله علة، والمشهور حديث أبي ذرٍّ الذي صححه الترمذي وغيره".

فقوله:"وهو غريب … إلى قوله:"صححه الترمذي وغيرها، هذا الكلام ليس لابن القطان، فلعله من الزيلعي نفسه، فالذين نقلوه من الزيلعي نسبوه إلى ابن القطان وأخطأوا فيه، مع ما فيه من التناقض؛ فإنَّ ابن القطان يُصحّح حديث أبي هريرة، ثمَّ كيف يقول: وله علة. فانتبه إلى ذلك.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "পবিত্র মাটি (সা‘ঈদ) হলো মুসলিমের জন্য পবিত্রতা লাভের মাধ্যম, যদিও সে দশ বছর পানি খুঁজে না পায়। এরপর যখন সে পানি পাবে, তখন সে যেন আল্লাহকে ভয় করে এবং তা তার শরীর স্পর্শ করায় (অর্থাৎ পবিত্রতা অর্জন করে); কারণ সেটাই উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1677)


1677 - عن عمرو بن العاص قال: احتلمتُ في ليلة باردة في غزوة ذات السلاسل،
فأشفقتُ إن اغتسلتُ أن أهلِكَ، فتيممتُ، ثم صلَّيتُ بأصحابي الصبح، فذكروا ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"يا عمرو! صليت بأصحابك وأنت جُنُب؟". فأخبرتُه بالذي منعني من الاغتسال، وقلتُ: إني سمعت الله يقول: {وَلَا تَقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا} [سورة النساء: 29] فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يقل شيئًا.

صحيح: أخرجه أبو داود (334، 335) قال: حدَّثنا ابن المثنى، أخبرنا وهب بن جرير، أخبرنا أبي، قال: سمعت يحيى بن أيوب، يحدث عن يزيد بن أبي حبيب، عن عمران بن أبي أنس، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عمرو بن العاص، فذكر الحديث.

قال أبو داود: عبد الرحمن بن جبير مصري مولي خارجة بن حذافة، وليس هو ابن جبير بن نفير.

قلت: رجاله ثقات وصحَّحه الحاكم (1/ 177) فقال: صحيح على شرط الشيخين .. ، إلَّا أنَّ في الإسناد انقطاعًا كما قال البيهقي في الخلافيات - مختصر الخلافيات (1/ 359): هذا مرسل، لم يسمعه عبد الرحمن من عمرو، والذي رُويَ عن عمرو في هذه القِصَّة متصلًا ليس فيه ذكر التيمُّم.

رُويَ عن عبد الرحمن بن جبير، عن أبي قيس مولي عمرو بن العاص، أن عمرو بن العاص كان على سريَّةً، وأنَّه أصابهم بردٌ شديدٌ، لم ير مثله، فخرج لصلاة الصبح، فقال: والله! لقد احتلمت البارحة، ولكني والله! ما رأيت بردًا مثل هذا، هل مرَّ على وجوهكم مثله؟ قالوا: لا. فغسل مغابنه، وتوضَّأ وضوءه للصلاةِ ثمَّ صلَّى بهم، فلما قدم على رسول الله صلى الله عليه وسلم، سأل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: كيف وجدتم عَمرًا وصحابته؟ فأثنوا عليه خيرًا وقالوا: يا رسول الله صلى بنا وهو جنبٌ. فأرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى عمرو، فيسأله، فأخبره بذلك وبالذي لقي من البرد، فقال: يا رسول الله! إنَّ الله تعالى يقول: {وَلَا تَقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا} [النساء: 29]، ولو اغتسلت متُّ. فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى عمرو.

ومن هذا الطريق رواه أبو داود، قال: حدَّثنا محمد بن سلمة، ثنا ابن وهب، عن ابن لهيعة، وعمرو بن الحارث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عمران بن أبي أنس، عن عبد الرحمن بن جبير .. فذكر الحديث، إلَّا أنَّ أبا داود كأنَّه يُرجح الرواية التي فيها ذكر التيمم، فقال: ورُويَ هذه القصَّة عن الأوزاعي، عن حسَّان بن عطيَّة، قال فيه: فتيمَّم. وبه بوَّب في سننه. وهو الذي ذكره البخاري معلَّقًا .. (الفتح 1/ 454).

وأخرج الإمام أحمد (17812) من طريق ابن لهيعة قال: ثنا يزيد بن أبي حبيب، عن عمران بن أبي أنس، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عمرو بن العاص، وفيه:"فتيمَّمت ثم صلَّت".

ولكن من الممكن الجمع بين رواية التيمم، ورواية الوضوء، بدلًا من ترجيح إحداهما على الأخرى، وإليه ذهب البيهقي في"السنن الكبرى" (1/ 226) فقال: يحتمل أن يكون قد فعل ما نقل في الروايتين جميعًا؛ غسل ما قدر على غسله، وتيمَّم للباقي .. وأيَّده النووي قائلًا: وهذا الذي
قاله البيهقي مُتعيّنٌ. انتهى من خلاصة الأحكام (1/ 216). والله تعالى أعلم.




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আমর ইবনুল আস) বলেন, যাতুস-সালাসিল যুদ্ধের এক ঠাণ্ডা রাতে আমার স্বপ্নদোষ হলো। আমি ভয় পেলাম যে, গোসল করলে আমি হয়ত ধ্বংস (মারা) হয়ে যাবো। তাই আমি তায়াম্মুম করলাম, এরপর আমার সঙ্গীদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলাম। তারা (সঙ্গীরা) বিষয়টি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করল। তিনি বললেন: "হে আমর! তুমি কি তোমার সঙ্গীদের নিয়ে সালাত আদায় করেছো যখন তুমি জুনুবি (নাপাক) ছিলে?" তখন আমি তাঁকে (নবীকে) জানালাম, কিসে আমাকে গোসল করা থেকে বিরত রেখেছিল, আর বললাম: আমি আল্লাহকে বলতে শুনেছি: {তোমরা নিজেদের হত্যা করো না, নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের প্রতি পরম দয়ালু} [সূরা আন-নিসা: ২৯]। এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসলেন এবং কিছুই বললেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (1678)


1678 - عن أبي جُهيم بن الحارث بن الصِّمة قال: أقبل النبي صلى الله عليه وسلم من نحو بئر جمل، فلقيه رجل فسلَّم عليه، فلم يردّ عليه النبي صلى الله عليه وسلم حتَّى أقبل على الجدار فمسح بوجهه ويديه، ثم ردّ عليه السلام.

متفق عليه: أخرجه البخاري (337) ومسلم في الحيض (369) كلاهما من الليث بن سعد، عن جعفر بن ربيعة، عن عبد الرحمن بن هرمز، قال: سمعت عُميرًا مولى ابن عباس قال: أقبلت أنا وعبد الله بن يسار مولى ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حتَّى دخلنا على أبي جُهيم فقال أبو جُهيم: فذكر الحديث. واللفظ للبخاري.

ووقع في مسلم: عبد الرحمن بن يسار، قال الحافظ:"وهو وهم، وليس له في هذا الحديث رواية، ولهذا لم يذكره المصنفون في رجال الصحيحين". انتهى

كما وقع في صحيح مسلم هذا الحديث معلَّقًا، فإنَّه قال: وروى الليث بن سعد". وإنَّه لم يلقه، ووصله البخاري: عن يحيى بن بكير، (وهو يحيى بن عبد الله بن بكير المخزومي المصري)، قال: حدَّثنا الليث بن سعد فذكر الإسنادَ. ويحيى بن بكير من شرط مسلمٍ؛ فإنَّه احتجَّ بحديثه.

ومن الفوائد: قال المازري في"المعلم" (1/ 256):"هذا الحديث ذكره مسلم مقطوعًا، وفي كتابه أحاديث يسيرة مقطوعة في أربعة عشر موضعًا منها هذا الحديث الذي ذكرناه وهو أوَّلها".

وقد ألف رشيد الدين يحيى بن علي العطَّار المتوفَّى سنة 662 هـ رسالة سماها:"غرر الفوائد المجموعة في بيان ما وقع في صحيح مسلم من الأحاديث المقطوعة حقَّقها الأستاذ مشهور حسن سلمان.




আবু জুহাইম ইবনুল হারিস ইবনুস সিম্মাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বি'র জামাল নামক কূয়ার দিক থেকে আসছিলেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করে তাঁকে সালাম দিলো। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে সালামের জবাব দিলেন না, যতক্ষণ না তিনি দেয়ালের কাছে এলেন এবং তা দিয়ে নিজের মুখমণ্ডল ও দু'হাত মাসাহ (তায়াম্মুম) করলেন। এরপর তিনি লোকটিকে সালামের জবাব দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1679)


1679 - عن عبد الله بن عمر: أن رجلًا مرّ ورسول الله صلى الله عليه وسلم يبول، فسلَّم، فلم يردّ عليه.

صحيح: رواه مسلم في الحيض (370) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حدَّثنا أبي، حدَّثنا سفيان، عن الضحاك بن عثمان، عن نافع، عن ابن عمر، فذكر الحديث.

وهذا مختصر من حديث ابن عمر بأنه صلى الله عليه وسلم تيمم ثم رد عليه. وقد أشار إلى ذلك أبو داود بعد أن أخرج الحديث المختصر (1/ 23)، وهو الذي بعده.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল যখন তিনি পেশাব করছিলেন। সে তাঁকে সালাম দিল, কিন্তু তিনি তার জবাব দিলেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (1680)


1680 - عن ابن عمر قال: أقبل رسول الله صلى الله عليه وسلم من الغائط، فلقيه رجل عند بئر جمل، فسلم عليه، فلم يردّ عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى أقبل على الحائط، فوضع يده على الحائط، ثمَّ مسح وجهه ويديه، ثم ردّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على الرجل السلامَ.

حسن: رواه أبو داود (331) عن جعفر بن مسافر، ثنا عبد الله بن يحيى البُرلُّسي، حدَّثنا حيوة بن شريح، عن ابن الهاد، أن نافعًا حدثه عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده حسن ورجاله ثقات؛ إلَّا جعفر بن مسافر قال فيه النسائي: صالح. وقال أبو حاتم: شيخ. وذكره ابن حبَّان في الثقات.

وعبد الله بن يحيى البُرلُّسي - بضم الموحدة والراء، وتشديد اللام المضمومة وبعدها مهملة: - من رجال الصحيح. قال أبو حاتم: لا بأس به. وذكره ابن حبان في الثقات.

وتابعهما عند الدارقطني (1/ 177) فقال: حدَّثنا عبد الله بن أحمد بن عتاب، نا الحسن بن عبد العزيز الجروي، نا عبد الله بن يحيى المعافري، نا حيوة بإسناده مثله. ولم يتكلم عليه الدارقطني بشيء.

إلَّا أن بعض الحفاظ جعلوه موقوفًا على ابن عمر، ولم أجد له وجها يحمله على الوقف؛ فإنَّ الحديث يوافق ما رواه أبو جهيم بن الحارث.

فالذي يجب أن يحكم عليه بالنكارة والضعف هو الحديث الذي يرويه محمد بن ثابت العبدي، قال: أخبرنا نافع، قال: انطلقت مع ابن عمر في حاجة إلى ابن عباس، فقضى ابن عمر حاجته، فكان من حديثه يومئذ أن قال: مرّ رجل على رسول الله صلى الله عليه وسلم في سكة من السكك، وقد خرج من غائط أو بول، فسلَّم عليه، فلم يردّ عليه، حتَّى إذا كاد الرجل أن يتواراي في السكة ضرب بيديه على الحائط ومسح بهما وجهه، ثمَّ ضرب أخرى فمسح ذراعيه، ثم ردّ على الرجل السلام وقال:"إنه لم يمنعني أن أردَّ عليك السلام إلَّا أنِّي لم أكن على طهره. (سنن أبي داود: 330).

قال تقي الدين ابن دقيق في الإمام: ورُدَّت هذه الرواية بالكلام في محمد بن ثابت، فعن ابن معين: ليس بشيء. وقال أبو حاتم: ليس بالمتين. وقال البخاري: خولف في حديثه عن نافع عن ابن عمر مرفوعا في التيمم، وخالفه أيوب وعبد الله وغيرهم فهانوا: عن نافع، عن ابن عمر فعله. انتهى.

قلت: وكذلك رواه مالك في الموطأ (90، 91) عن نافع أنَّه أقبل هو وعبد الله بن عمر من الجُرُف، حتَّى إذا كان بالمربد نزل عبد الله فتيمّم صعيدًا طيبًّا، فمسح وجهه ويديه إلى المرفقين، ثم صلَّى. وفي رواية عنده: أن ابن عمر كان يتيمّم إلى المرفقين.

فالنكارة في رواية محمد بن ثابت العبدي أنَّه ذكر ضربتين والمسح إلى الذراعين. إلَّا أن البيهقي يرى أن حديث ابن عمر الأوَّل يكون شاهدًا لحديث ابن عمر الثاني، ولا منافاة بينهما، فقد قال رحمه الله:

وقد أنكر بعض الحفاظ رفع هذا الحديث على محمد بن ثابت العبدي، فقد رواه جماعة عن نافع من فعل ابن عمر، والذي رواه غيره عن نافع من فعل ابن عمر إنَّما هو التيمم فقط، فأما هذه القصة فهي عن النبي صلى الله عليه وسلم مشهورة برواية أبي الجُهيم بن الحارث بن الصِّمة وغيره، وثابت عن الضحاك بن عثمان، عن نافع، عن ابن عمر أن رجلًا مرَّ ورسول الله صلى الله عليه وسلم يبول، فسلم عليه، فلم يردّ عليه. رواه مسلم (370). إلَّا أنه قصر بروايته ورواية يزيد بن الهاد عن نافع أتمّ من ذلك.

ثمَّ روى حديث أبي داود عن جعفر بن مسافر إلى آخره، وقال: فهذه الرواية شاهدة لرواية
محمد بن ثابت العبدي، إلَّا أنه حفظ فيها الذراعين، ولم يثبتها غيره كما ساق هو وابن الهاد الحديث بذكر تيممه، ثمَّ رده جواب السلام، وإن كان الضحاك بن عثمان قصر به. وفعل ابن عمر التيمم على الوجه والذراعين إلى المرفقين شاهد لصحة رواية محمد بن ثابت غير مناف لها. انتهى."السنن الكبرى" (1/ 206).

قلت: هكذا جعل البيهقي حديث الضحاك، عن نافع، عن ابن عمر مجملًا، وحديث يزيد بن الهاد، عن نافع، عن ابن عمر تفصيلًا له، وأنا جعلتهما حديثين؛ ليأخذ كل واحد منهما رقمه الخاص.




ইবনু ওমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রকৃতির ডাকে সাড়া দেওয়ার স্থান (বা পায়খানা) থেকে আসছিলেন। তখন 'বি'রে জামাল' নামক স্থানে এক ব্যক্তি তাঁর সাথে দেখা করে এবং তাঁকে সালাম দেয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সালামের জবাব দিলেন না, যতক্ষণ না তিনি একটি দেয়ালের দিকে এগিয়ে গেলেন। অতঃপর তিনি দেয়ালের উপর তাঁর হাত রাখলেন এবং তাঁর মুখমণ্ডল ও দুই হাত মাসেহ করলেন (তায়াম্মুম করলেন)। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই লোকটির সালামের জবাব দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1681)


1681 - عن طارق بن شهاب أن رجلًا أجنب فلم يُصلّ، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له فقال:"أصبت". فأجنب رجل آخر فتيمّمَ وصلَّى، فأتاه فقال نحو ما قال للآخر، يعني"أصبت".

صحيح: رواه النسائي (324) قال: حدَّثنا محمد بن عبد الأعلى، قال: حدَّثنا خالد بن الحارث) قال: أنبأنا شعبة، أن مخارقا أخبرهم، عن طارق، فذكر الحديث.

إسناده صحيح، ورجاله ثقات. ومخارق هو ابن خليفة، من رجال البخاري، وطارق بن شهاب من صغار الصحابة، له رؤية فقط ولم يسمع منه، فحديثه مرسل صحابي، ومراسيل الصحابة حجة.

وفي رواية عند أحمد (18832) من طريق شعبة:"فلم يعِبْ عليهما".

وقوله صلى الله عليه وسلم لهما:"أصبت" لأن كلًّا منهم اجتهد، فأقر النبي صلى الله عليه وسلم اجتهادهما ولم يُخطِّئ واحدًا منهما، ولكن الذي صلّى بالتّيمم أولى، ويمكن حمل هذا أيضًا أنّ هذه القصّة مع هذا الرجل الذي لم يصل وقعت قبل نزول آية التيمم ولم يجد الماء.

وقوله:"لم يصل" أي في وقتها إلى أن يغتسل فيصليها ولو بعد خروج الوقت قضاءً.




তারিক ইবনু শিহাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, এক ব্যক্তি জুনুবী (গোসল ফরয) হলো, কিন্তু সালাত আদায় করলো না। অতঃপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁকে বিষয়টি বললো। তখন তিনি বললেন: "তুমি সঠিক করেছ।" অতঃপর অন্য এক ব্যক্তি জুনুবী হলো এবং সে তায়াম্মুম করে সালাত আদায় করলো। সে তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলো। তখন তিনি তাকেও অনুরূপ বললেন যা অপর ব্যক্তিকে বলেছিলেন, অর্থাৎ "তুমি সঠিক করেছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (1682)


1682 - عن أبي سعيد الخدري قال: خرج رجلان في سفر، فحضرت الصلاةُ وليس معهما ماء، فتيمما صعيدًا طيبًا فصلَّيا، ثم وجدا الماء في الوقت، فأعاد أحدُهما الصلاةَ والوضوءَ، ولم يُعد الآخر، ثم أتيا رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكرا ذلك له، فقال للذي لم يُعد:"أصبتَ السنة وأجزأتْ صلاتُك". وقال للذي توضأ وأعاد:"لك الأجرُ مرتين".

صحيح: رواه أبو داود (338) والنسائي (433) كلاهما من طريق عبد الله بن نافع، عن الليث بن سعد، عن بكر بن سوادة، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد، فذكر الحديث.

قال أبو داود: وغير ابن نافع يرويه عن الليث، عن عميرة بن أبي ناجية، عن بكر بن سوادة، عن عطاء بن يسار، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقال أبو داود: وذكر أبي سعيد في هذا الحديث ليس
بمحفوظ، وهو مرسل.

ثم روى هو من طريق ابن لهيعة، عن بكر بن سوادة، عن أبي عبد الله مولى إسماعيل بن عبيد، عن عطاء بن يسار أن رجلين من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. بمعناه.

قلت: عبد الله بن نافع هو الصائغ مختلف فيه، والخلاصة فيه: أنَّه إذا حدّث من حفظه أخطأ، وهو صحيح الكتاب إلَّا أنَّه لم ينفرد به، فقد رواه أبو علي بن السكن قال: حدَّثنا أبو بكر محمد بن أحمد الواسطي، ثنا عباس بن محمد، ثنا أبو الوليد الطيالسي، ثنا الليث بن سعد، عن عمرو بن الحارث وعميرة بن أبي ناجية، عن بكر بن سوادة، عن عطاء، عن أبي سعيد، فذكر الحديث. ذكره ابن القطان في"الوهم والإيهام" (2/ 434).

ورجاله ثقات، وعميرة تكلّم فيه ابن القطاّن، وهو ثّقة وثقه النسائي وغيره.

ورواه النسائي (433، 434) مسندًا ومرسلًا.

ويظهر من هذا أن عطاء بن يسار كان يرويه من وجهين

وأمَّا قول الحاكم: صحيح على شرط الشيخين، فالصواب أنَّه على شرط مسلم وحده؛ فإنَّ بكر بن سوادة وعبد الله بن نافع وإن كانا من الثقات فإنهما من رجال مسلم وحده.

ويستفاد من هذا الحديث ما يلي:

1 - إن المتيمم كالمتطهّر يصلي في أول الوقت، وبه قال مالك وغيره. وذهب جمهور أهل العلم منهم الأئمة الأربعة، وقد قال قبل ذلك الفقهاء السبعة من أهل المدينة.

فقد روى البيهقي في السنن الكبرى 1/ 232 بإسناده عن أبي الزناد أنَّه قال: كان من أدركتُ من فقهائنا الذين ينتهي إلى قولهم منهم: سعيد بن المسيب - وذكر تمام الفقهاء السبعة - يقولون: من تيمم وصلّى ثم وجد الماء وهو في الوقت أو بعده لا إعادة عليه.

2 - إنّ المتيمّم إن وجد الماء قبل خروج الوقت فالجمهور على أنَّه لا يعيد الصلاة. واستحبّ الأوزاعي إعادته ولم يوجبه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, দু'জন লোক সফরে বের হলো। অতঃপর সালাতের সময় উপস্থিত হলো, কিন্তু তাদের সাথে কোনো পানি ছিল না। তাই তারা পবিত্র মাটি দ্বারা তায়াম্মুম করে সালাত আদায় করল। এরপর তারা (সালাতের) সময়ের মধ্যেই পানি খুঁজে পেল। তখন তাদের একজন সালাত ও ওযূ পুনরায় আদায় করল, কিন্তু অন্যজন তা পুনরায় আদায় করল না। অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বিষয়টি তাঁকে জানাল। তখন যিনি সালাত পুনরায় আদায় করেননি, তাঁকে তিনি বললেন: "তুমি সুন্নাতকে গ্রহণ করেছো এবং তোমার সালাত যথেষ্ট হয়েছে।" আর যিনি ওযূ করে সালাত পুনরায় আদায় করেছেন, তাঁকে বললেন: "তোমার জন্য রয়েছে দ্বিগুণ পুরস্কার।"









আল-জামি` আল-কামিল (1683)


1683 - عن * *




১৬৮৩ - থেকে ** **









আল-জামি` আল-কামিল (1684)


1684 - عن طلحة بن عبيد الله يقول: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من أهل نجد، ثائر الرأس يُسمع دَوي صوته، ولا يُفقه ما يقول، حتَّى دنا فإذا هو يسأل عن الإسلام، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خمس صلوات في اليوم والليلة" فقال: هل عليَّ غيرها؟ قال:"لا، إلا أن تطوع" قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وصيام رمضان" قال: هل عليَّ غيره؟ قال:"لا، إلا أن تطوع" قال: وذكر رسول الله في الزكاة، قال: هل عليّ غيرُها؟ قال:"لا، إلَّا أن تطوعه، قال: فأدبر الرجل وهو يقول: والله لا أزيد على هذا ولا أنقص، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفلح إن صدق".

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (94) عن عمه أبي سُهيل بن مالك، عن أبيه، أنه سمع طلحة بن عبيد الله فذكر الحديث، ورواه البخاري عن إسماعيل، عن مالك في الإيمان (46)، ومسلم في الإيمان (8) عن قتيبة بن سعيد بن جميل بن طريف بن عبد الله الثقفي، عن مالك، ومضى هذا الحديث بكامله في كتاب الإيمان.

ومن لطائف إسناد البخاري: الرواةُ كلهم من الأقارب، إسماعيل هو ابن أبي أويس ابن أخت مالك، ومالك خاله، ووالد أبي سُهيل هو ابن أبي عامر الأصبحي حليف طلحة بن عبيد الله، فهو من رواية إسماعيل، عن خاله، عن عمه، عن أبيه، عن حليفه.




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নজদবাসী এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলেন। তার মাথার চুল ছিল এলোমেলো, তার কণ্ঠস্বরের চাপা গুঞ্জন শোনা যাচ্ছিল, কিন্তু তিনি কী বলছিলেন তা বোঝা যাচ্ছিল না। অবশেষে যখন তিনি নিকটবর্তী হলেন, তখন দেখা গেল তিনি ইসলাম সম্পর্কে জিজ্ঞেস করছেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "(তা হলো) দিন ও রাতে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ)।" লোকটি জিজ্ঞেস করল: আমার উপর কি এর বাইরে আর কিছু আছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, যদি না তুমি স্বেচ্ছায় কিছু করো।" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আর রমযানের সওম (রোজা)।" লোকটি জিজ্ঞেস করল: আমার উপর কি এর বাইরে আর কিছু আছে? তিনি বললেন: "না, যদি না তুমি স্বেচ্ছায় কিছু করো।" বর্ণনাকারী বলেন: আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যাকাতের কথা উল্লেখ করলেন। লোকটি জিজ্ঞেস করল: আমার উপর কি এর বাইরে আর কিছু আছে? তিনি বললেন: "না, যদি না তুমি স্বেচ্ছায় কিছু করো।" লোকটি তখন এই বলে প্রস্থান করল যে, আল্লাহর কসম! আমি এর চেয়ে বেশিও করব না এবং কমও করব না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সে সফলকাম হবে, যদি সে সত্য বলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1685)


1685 - عن أنس قال: فرضتْ على النبي صلى الله عليه وسلم ليلة أسري به الصلوات خمسين، ثم نُقِصَت حتى جُعلتْ خمسًا، ثم نُودي: يا محمد! إنه لا يُبدّل القول لديّ، وإن لك بهذه الخمس خمسين.

متفق عليه: رواه الترمذي في الصلاة (213) بهذا اللفظ مختصرًا عن محمد بن يحيى النيسابوري، ثنا عبد الرزاق، نا معمر، عن الزهري، عن أنس.

وقال: حسن صحيح غريب.
وهو حديث طويل سيأتي في قصة الإسراء والمعراج، وهذا القدر أخرجه أيضًا البخاري في بدء الخلق (3207)، عن سعيد وهشام، قالا: حدَّثنا قتادة، ثنا أنس، ومسلم في الإيمان (163) من طريق يونس، عن ابن شهاب، عن أنس.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মি'রাজের রাতে পঞ্চাশ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ) ফরয করা হয়েছিল। অতঃপর তা হ্রাস করা হয় এবং পাঁচ ওয়াক্তে পরিণত করা হয়। এরপর ঘোষণা করা হলো: হে মুহাম্মাদ! আমার কাছে কথা রদবদল হয় না, আর এই পাঁচ ওয়াক্তের বিনিময়ে তোমার জন্য পঞ্চাশ (ওয়াক্তের) সওয়াব রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (1686)


1686 - عن أنس قال: سأل رجل نبي الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! كم فرض الله على عباده من الصلوات؟ قال:"افترض الله على عباده صلوات خمسًا" قال: يا رسول الله! هل قبلهن أو بعدهن من شيء؟ ، قال:"افترض الله على عباده صلوات خمسًا" فحلف الرجل لا يزيد عليه شيئًا، ولا ينقص منه شيئًا، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن صدق ليدخلنَّ الجنة".

صحيح: رواه النسائي (459) عن قتيبة قال: ثنا نوح بن قيس، عن خالد بن قيس، عن قتادة، عن أنس، فذكر الحديث.

وإسناده صحيح رجاله ثقات، فنوح بن قيس وثَّقه أحمد، وابن معين، وأبو داود، والعجلي، وغيرهم، وخالد بن قيس وثَّقه ابن معين، والعجلي، وقال ابن المديني:"ليس به بأس".

وهذا الحديث مختصر لما رواه مسلم في الإيمان (10) مطولًا من وجه آخر عن أنس وقال فيه: نُهينا أن نسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن شيء فكان يُعجبنا أن يجيء الرجل من أهل البادية العاقِلُ فيسأله ونحن نسمع، فجاء رجل من أهل البادية فسأل الأسئلة، منها قوله: زعم رسولك أن علينا خمس صلوات في يومنا وليلتنا. قال:

"صدق" وسأل عن بقية شرائع الإسلام ثمَّ ولَّى وقال: والذي بعثك بالحق لا أزيد عليهن ولا أنقص منهن. فقال النبي صلى الله عليه وسلم: لئن صدق ليدخُلَن الجنة".

مضى هذا الحديث بطوله في كتاب الإيمان.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল এবং বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ তাঁর বান্দাদের উপর কয় ওয়াক্ত সালাত ফরজ করেছেন?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাঁর বান্দাদের উপর পাঁচ ওয়াক্ত সালাত ফরজ করেছেন।" সে বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! এর আগে বা পরে কি আরও কিছু (সালাত) আছে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাঁর বান্দাদের উপর পাঁচ ওয়াক্ত সালাত ফরজ করেছেন।" অতঃপর লোকটি কসম করে বলল যে, সে এর উপর কিছু বাড়াবেও না এবং তা থেকে কিছু কমাবেও না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে সত্য বলে থাকে, তবে অবশ্যই সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1687)


1687 - عن عبد الله بن الصنابحي قال: زعم أبو محمد أن الوتر واجب، فقال عبادة بن الصامت: كذب أبو محمّد، أشهد أنّي سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"خمس صلوات افترضهنّ الله تعالى من أحسن وضوءهُنَّ وصلَّاهُنَّ لوقتهنّ، وأتمّ ركوعهنَّ وخشوعَهُّنّ، كان له على الله عهد أن يغفر له، ومن لم يفعل فليس له على الله عهدٌ، إن شاء غفر له، وإن شاء عذَّبه".

صحيح: رواه أبو داود (452) عن محمد بن حرب الواسطي، حدَّثنا يزيد بن هارون، حدثنا محمد بن مطرف، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد الله بن الصُّنابحي، فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه الإمام أحمد (22704) عن حسين بن محمد عن محمد بن مطرف به، وقال فيه: عبد الله
الصنابحي بدون لفظ"ابن".

ورواه البيهقي من طريق آدم بن أبي إياس، عن أبي غسّان محمد بن مطرف وقال فيه: أبو عبد الله الصنابحي، وليس فيه ذكر للوتر.

وقد صوّب الحافظ وغيره أنّه أبو عبد الله الصنابحي، واسمه: عبد الرحمن بن عُسيلة، وهو ثقة. وللحديث طريق آخر يأتي تفصيله في صلاة الوتر.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনুস সানাবিহী বলেন, আবূ মুহাম্মাদ যখন বিতর সালাতকে ওয়াজিব বলে দাবি করল, তখন উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আবূ মুহাম্মাদ মিথ্যা বলেছে। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আল্লাহ তাআলা পাঁচটি সালাত ফরয করেছেন। যে ব্যক্তি সেগুলোর জন্য উত্তমরূপে ওযু করে, সেগুলোকে সঠিক সময়ে আদায় করে, এবং সেগুলোর রুকূ ও খুশূ’ (নম্রতা) পূর্ণাঙ্গভাবে সম্পন্ন করে, তার জন্য আল্লাহর কাছে প্রতিশ্রুতি রয়েছে যে তিনি তাকে ক্ষমা করে দেবেন। আর যে ব্যক্তি তা করে না, তার জন্য আল্লাহর কাছে কোনো প্রতিশ্রুতি নেই; তিনি চাইলে তাকে ক্ষমা করবেন, অথবা চাইলে শাস্তি দেবেন।”