হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (168)


168 - عن حكيم بن حزام قال: قلت: يا رسول اللَّه، أرأيت أشياء، كنتُ أتحنّثُ بها
في الجاهليّة من صدقة أو عتاقة، وصلة رحم، فهل فيها من أجْرٍ؛ فقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"أسلمتَ على ما سلف من خير".

وفي رواية: أنّ حكيم بن حزام أعتق في الجاهليّة مائة رقبة، وحمل على مائة بعير ثم أعتق في الاسلام مائة رقبة، وحمل على مائة بعير، ثم أتى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر نحو حديثه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1436)، ومسلم في الإيمان (123) كلاهما من حديث ابن شهاب الزهريّ، قال: أخبرني عروة بن الزبير، أنّ حكيم بن حزام. . . (فذكر مثله).

والرواية الثانية عند البخاريّ (2538)، ومسلم - كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عنه.

وفي رواية قال:"فواللَّه لا أدعُ شيئًا صنعتُه في الجاهليّة إِلَّا فعلتُ في الإسلام مثله".

وقوله:"التحنُّث" التعبّد.

وقوله:"أسلمتَ على ما أسلفتَ من خير" ذهب أكثر أهل العلم إلى تأويله. وقال الحربيّ:"ما تقدّم لك من الخير الذي عملته هو لك كما تقول: أسلمت على ألف درهم، أي على أن أحرزها لنفسه".

قال القرطبي:"وهذا الذي قاله الحربي هو أشبهها وأولاها".




হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি মনে করেন জাহিলিয়াতের যুগে আমি যেসব কাজ করতাম, যেমন সাদাকা, দাস মুক্তি এবং আত্মীয়তার বন্ধন বজায় রাখা—সেগুলোর জন্য কি কোনো প্রতিদান আছে? তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি পূর্বে করা সকল নেক কাজের ওপর ইসলাম গ্রহণ করেছো।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে, হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জাহিলিয়াতের যুগে একশো গোলাম আযাদ করেছিলেন এবং একশো উটের ওপর (মালামাল) বহন করিয়েছিলেন। এরপর ইসলামের যুগেও তিনি একশো গোলাম আযাদ করেন এবং একশো উটের ওপর (মালামাল) বহন করান। এরপর তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে তাঁর আগের (জিজ্ঞাসিত) হাদীসের অনুরূপ উল্লেখ করেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে, তিনি (হাকীম) বলেন: আল্লাহর কসম, জাহিলিয়াতের যুগে আমি যা কিছু করেছি, ইসলামেও আমি তার অনুরূপ কাজ করা পরিত্যাগ করব না।









আল-জামি` আল-কামিল (169)


169 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أسلم العبد فحسُن إسلامه، كتب اللَّه له كلَّ حسنة كان أزلفها، ومحيتْ عنه كلّ سيئة كان أزلفها، ثم كان بعد ذلك القصاص، الحسنة بعشر أمثالها إلى سبعمائة ضعف، والسيئة بمثلها إِلَّا أن يتجاوز اللَّه عز وجل عنها".

صحيح: رواه النسائيّ (4998) من طريق الوليد (هو ابن مسلم)، والبيهقي في"شعب الإيمان" (24) من طريق إسماعيل بن أبي أويس - كلاهما قالا: حدثنا مالك، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره، ولفظهما سواء.

إِلَّا أن البيهقي قال:"أسنده مالك وأرسله ابنُ عيينة، ثم روى الحديث من طريقه مرسلًا".

قلت: الحُكم لمن أسنده لما فيه من زيادة علم.

وذكره البخاريّ في الإيمان (41) معلقًا عن مالك، ولم يسنده في موضع آخر، إِلَّا أنه أسقط قوله:"كتب اللَّه له كل حسنة كان أزلفها" لأنَّه مشكل على القواعد؛ لأنَّ الكافر لا يثاب على العمل الصالح الصَّادر منه في كفره وشركه، لأنّ من شرط المتقرب أن يكون عارفًا لمن يتقرّب إليه، والكافر ليس كذلك ذكره المازريّ وغيره، وتابعه القاضي عياض على تقرير هذا الإشكال وردَّه النوويُّ فقال: الصواب الذي عليه المحقِّقون -بل نقل بعضُهم فيه الإجماع- أنّ الكافر إذا فعل أفعالًا جميلة كالصّدقة، وصلة الرّحم، ثم أسلم ومات على الإسلام أنّ ثواب ذلك يكتب له. . . .".
انتهى كلامه ملخصًا.

وذكر الحافظ ابن حجر في الفتح (1/ 99) احتمالات أخرى ومن أقواها قوله:"والحقّ أنه لا يلزم من كتابة الثواب للمسلم في حال إسلامه تفضلا من اللَّه وإحسانًا أن يكون ذلك لكون عمله الصادر منه في الكفر مقبولًا، والحديث إنما تضمّن كتابة الثواب ولم يتعرّض للقبول، ويحتمل أن يكون القبول يصير معلقًا على إسلامه فيقبل ويثاب إن أسلم وإلَّا فلا". انتهى.

قلت: وعليه يدل حديث حكيم بن حزام قبله.

وقوله:"وأزلفها" أي أسلف وقدّم.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো বান্দা ইসলাম গ্রহণ করে এবং তার ইসলাম উত্তম হয়, আল্লাহ তার পূর্বে কৃত সকল নেক আমল তার জন্য লিপিবদ্ধ করেন, এবং তার পূর্বে কৃত সকল পাপ (গুনাহ) তার থেকে মুছে দেন, এরপর থেকে কিসাস (প্রতিদান/হিসাব) শুরু হয়। একটি নেকি দশ গুণ থেকে সাতশ গুণ পর্যন্ত বৃদ্ধি করা হয়, এবং মন্দ (পাপ) হয় তার অনুরূপ, তবে যদি আল্লাহ তাআলা তা মাফ করে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (170)


170 - عن عائشة قالت: قلت: يا رسول اللَّه، ابن جدعان كان في الجاهليّة يصل الرحم ويطعم المسكين فهل ذاك نافعه؟ قال: لا ينفعه، إنه لم يقل يوما: رب اغفر لي خطيئتي يوم الدين.

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (214) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا حفص بن غياث، عن داود، عن الشعبي، عن مسروق، عن عائشة فذكرته.

وابن جدعان هو عبد اللَّه بن جدعان التيمي القرشي أحد أجواد العرب المشهورين في الجاهليّة وهو من أقرباء عائشة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম, 'হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), ইবনু জুদ'আন জাহিলিয়াতের (অন্ধকার যুগে) সময় আত্মীয়তার বন্ধন রক্ষা করত এবং অভাবীকে খাবার খাওয়াত। এতে কি তার কোনো উপকার হবে?' তিনি বললেন, 'তার কোনো উপকার হবে না। কারণ সে একদিনও বলেনি: হে আমার রব, বিচার দিবসে আমার পাপ ক্ষমা করে দিন।'









আল-জামি` আল-কামিল (171)


171 - عن عدي بن حاتم قال: قلت: يا رسول اللَّه، إن أبي كان يصل الرحم ويفعل كذا وكذا، قال: إن أباك أراد أمرًا فأدركه يعني الذِّكر.

حسن: رواه أحمد (18263)، والطبراني في الكبير (17/ 104)، وابن حبان (332) كلهم من طريق شعبة، عن سماك بن حرب، قال: سمعت مري بن قطري قال: سمعت عدي بن حاتم فذكره.

وإسناده حسن من أجل سماك فإنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات، ومري بن قطري وإن تفرد عنه سماك إِلَّا أن ابن معين وثقه كما في تاريخ عثمان الدارمي عنه (766).

وأما قول الحافظ فيه:"مقبول" فلعله لم يجد فيه إِلَّا ذكر ابن حبان له في"الثقات".




আদি ইবন হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা তো আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখতেন এবং এমন এমন (ভালো) কাজ করতেন।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই তোমার পিতা একটি জিনিস চেয়েছিলেন এবং তিনি তা লাভ করেছেন"— অর্থাৎ সুখ্যাতি (মানুষের প্রশংসা)।









আল-জামি` আল-কামিল (172)


172 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"بدأ الإسلام غريبًا وسيعود كما بدأ غريبًا، فطوبى للغرباء".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (146) من طرق عن مروان الفزاريّ، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলাম অপরিচিতভাবে (গরীব অবস্থায়) শুরু হয়েছিল এবং তা আবার তেমনই অপরিচিতভাবে ফিরে আসবে যেমনভাবে শুরু হয়েছিল। অতএব, সেই অপরিচিতদের জন্য সুসংবাদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (173)


173 - عن ابن عمر، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا وسيعود غريبًا كما بدأ، وهو يأرز بين المسجدين كما تأرز الحيّة في جحرها".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (146) من طرق عن شبابة بن سوَّار، حدثنا عاصم (وهو ابن محمد العمريّ)، عن أبيه، عن ابن عمر، فذكره.




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় ইসলাম অপরিচিত রূপে শুরু হয়েছিল এবং তা আবার শুরু হওয়ার মতো অপরিচিত রূপে ফিরে আসবে। আর তা দুই মসজিদের (মক্কা ও মদীনার) মাঝে গুটিয়ে যাবে, যেমন সাপ তার গর্তের মধ্যে গুটিয়ে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (174)


174 - عن سعد بن أبي وقاص قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ الإيمان بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، فطوبى يومئذ للغرباء إذا فسد الناس، والذي نفس أبي القاسم بيده! ليأرز الإيمان بين هذين المسجدين كما تأرز الحيّة في جحرها".

حسن: رواه الإمام أحمد (1604)، وأبو يعلى (756)، والبزار في"البحر الزّخّار" (1119) كلهم من طرق عن عبد اللَّه بن وهب، قال: أخبرني أبو صخر، عن أبي حازم، عن ابن سعد، عن سعد -قال البزار: أحسبه عامرًا-.

قلت: وهو كما حسب، فقد جاء تصريحه في كتاب الإيمان لابن منده (424) بأنه عامر بن سعد.

وإسناده حسن، من أجل أبي صخر وهو حميد بن زياد الخرّاط وهو"صدوق" من رجال مسلم.

قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 277):"رواه أحمد والبزار وأبو يعلى، ورجال أحمد وأبي يعلى رجال الصحيح".

والمسجدان هما: مسجد مكة، والمدينة.




সা'দ ইবন আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয় ঈমান অপরিচিত অবস্থায় শুরু হয়েছিল এবং যেভাবে শুরু হয়েছিল তেমনই অপরিচিত অবস্থায় ফিরে আসবে। সুতরাং, যেদিন মানুষ নষ্ট হয়ে যাবে, সেদিন সেই অপরিচিতদের (আল-গুরবা) জন্য সুসংবাদ। সেই সত্তার কসম, যার হাতে আবুল কাসিমের প্রাণ! ঈমান অবশ্যই এই দুই মসজিদের মাঝে সংকুচিত হবে, যেভাবে সাপ তার গর্তে সংকুচিত হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (175)


175 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، فطوبى للغرباء" قيل: من هم يا رسول اللَّه؟ قال:"الذين يَصْلُحون إذا فسد النّاس".

صحيح: رواه الآجريّ في"الغرباء" (1) عن عبد اللَّه بن أبي داود، حدثنا محمد بن آدم المصيصيّ، حدثنا حفص بن غياث، عن الأعمش، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه -يعني ابن مسعود- فذكر الحديث.

وإسناده صحيح. والمصيصيّ هذا ثقة، وثَّقه النسائيّ وغيره.

ورواه أبو عمرو الدَّانيّ في"الفتن" (288) من طريق الآجريّ، به، إِلَّا أنه قال فيه:"عن أبي صالح" بدلًا من"أبي إسحاق"، والظاهر أنه وهم منه، أو خطأ من الناسخ.

وأبو إسحاق هو السبيعيّ وقد اختلط في آخر عمره، ولكن سماع الأعمش منه كان قديمًا.

ورواه الترمذيّ (2629) عن أبي كريب، وابن ماجة (3988) عن سفيان بن وكيع، والإمام أحمد وابنه (3784) عن عبد اللَّه بن محمد بن أبي شيبة، كلّهم عن حفص بن غياث، به، إِلَّا أن الترمذيّ لم يذكر السؤال وتفسيرَ الغرباء.
وأما الإمام أحمد وابن ماجة فذكرا تفسير الغرباء بلفظ آخر"قال: قيل: ومن الغرباء؟ قال: النّزاع من القبائل". وسفيان بن وكيع ضعيف لكنه توبع.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح غريب من حديث ابن مسعود، إنما نعرفه من حديث حفص ابن غياث، عن الأعمش، وأبو الأحوص اسمه عوف بن مالك بن نضلة الجشميّ، تفرَّد به حفص".

قوله:"النُّزَّاع" ضبط بضم ثم تشديد، قيل: هو جمع نزيع ونازع، وهو الغريب الذي نزع عن أهله وعشيرته، أي الذين يخرجون عن الأوطان لإقامة سنن الدين. قاله السّنديّ.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই ইসলামের সূচনা হয়েছিল অপরিচিত অবস্থায়, এবং তা শুরু হওয়ার মতোই আবার অপরিচিত অবস্থায় ফিরে আসবে। সুতরাং সুসংবাদ সেই অপরিচিতদের (আল-গুরবা) জন্য।" জিজ্ঞাসা করা হলো: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারা কারা?" তিনি বললেন: "তারা হলো সেইসব লোক, যারা মানুষের মাঝে অনাচার শুরু হলে নিজেদেরকে সংশোধন করে নেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (176)


176 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص قال: قال رسول اللَّه ذات يوم ونحن عنده:"طوبى للغرباء" وقيل: ومن الغرباء يا رسول اللَّه؟ قال:"أناسٌ صالحون في أناسِ سَوءٍ كثيرٍ، من يَعْصِيهم أكثر ممن يُطيعهم". ثم ذكر فقراء المهاجرين الذين تُتَّقى بهم المكاره. . .

حسن: رواه الإمام أحمد (6650) عن حسن بن موسى، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا الحارث بن يزيد، عن جندب بن عبد اللَّه، أنه سمع سفيان بن عوف يقول: سمعت عبد اللَّه بن عمرو، فذكر الحديث.

وفيه ابن لهيعة مختلط، ولكن رواه عبد اللَّه بن المبارك في"الزهد" (775)، والبيهقي في"الزهد" (203) من طريق أبي عبد الرحمن (وهو عبد اللَّه بن يزيد المقرئ) - كلاهما عن ابن لهيعة بإسناده، نحوه. وهما ممن سمعا منه قبل الاختلاط.

وفي الإسناد جندب بن عبد اللَّه وهو الوابلي الكوفي من رجال"التعجيل" ولم يذكر من روي عنه غير الحارث بن يزيد، ولكن قال العجليّ:"كوفيّ تابعيٌّ ثقة" ولم يذكره ابن حبان في"الثقات" وهو على شرطه.

وله أسانيد أخرى غير أنّ ما ذكرته هو أصحها.

وقد روي موقوفًا على عبد اللَّه بن عمرو، ولفظه:"طوبى للغرباء الذين يُصلحون عند فساد الناس".

رواه أبو عمرو الدَّاني في"الفتن" (291) بإسناد لا بأس به.

وفي الباب عن أنس بن مالك مرفوعًا:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا، فطوبى للغرباء".

رواه ابن ماجة (3987) عن حرملة بن يحيى، قال: حدثنا عبد اللَّه بن وهب، قال: أنبأنا عمرو ابن الحارث وابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سنان بن سعد، عن أنس، فذكره.

وسنان بن سعد ويقال: سعد بن سنان، -صوَّب البخاريُّ وابنُ يونس الأول، - تكلَّم فيه أهل العلم فقال الإمام أحمد:"تركتُ حديثه لأنه مضطرب"، وقال ابن سعد، والنسائي:"منكر الحديث"، وقال الجوزجانيّ:"أحاديثه واهية".

وأخرجه ابن عدي في"الكامل" (5/ 1823) في ترجمة عثمان بن عبد اللَّه بن عمرو بن عثمان
ابن عفّان، وقال:"حدّث عن مالك وحماد بن سلمة وابن لهيعة وغيرهم بالمناكير، يكنى أبا عمرو، وكان يسكن نصيبين، ودار البلاد وحدَّث في كل موضع بالمناكير عن الثقات".

وفي الباب أيضًا عن كثير بن عبد اللَّه بن عمرو بن عوف بن زيد بن مِلْحة، عن أبيه، عن جدّه، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الدّين ليأرز إلى الحجاز كما تأرز الحيّةُ إلى جحرها، وليعُقِلَنَّ الدين من الحجاز معقِلَ الأُروية من رأس الجبل، إنّ الدّين بدأ غريبًا، ويرجع غريبًا، فطوبى للغرباء الذين يُصلحون ما أفسد النّاسُ من بعدي من سنّتي".

رواه الترمذيّ (2630) عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن، أخبرنا إسماعيل بن أبي أُويس، حدثني كثير ابن عبد اللَّه بن عمرو بن عوف بن زيد بإسناده مثله.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح" وفي نسخة:"حسن" فقط. والصّواب أنّه ضعيف من أجل كثير بن عبد اللَّه لأنّ أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وهذه من المواضع التي تساهل فيها الترمذيّ، فصحّح هذا الحديث.

وعن سهل بن سعد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وليعود كما بدأ. فطوبى للغرباء" قالوا: يا رسول اللَّه، وما الغرباء؟ قال:"الذين يُصلحون عند فساد الناس".

رواه الهرويّ في ذم الكلام (1471)، وابن عدي في الكامل (2/ 462)، والطبراني في الثلاثة -كما قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 278) - كلّهم من طريق بكر بن سُليم، حدثني أبو حازم، عن سهل بن سعد، فذكر الحديث.

وقال الهيثميّ:"رجاله رجال الصحيح غير بكر بن سُليم وهو ثقة".

قلت: بكر بن سُليم -مصغرًا- الصواف أبو سَليم الطّائفي المديني.

قال ابن عدي:"يحدّث عن أبي حازم، عن سهل بن سعد وغيره، ما لا يوافقه أحدٌ عليه". ثم قال:"ولبكر بن سُليم غير ما ذكرتُ من الحديث قليل، وعامة ما يرويه غير محفوظ، ولا يتابع عليه، وهو من جملة الضّعفاء الذين يكتب حديثهم".

وقال الحافظ:"مقبول" أي إذا تُوبع، ولم أجد من تابعه فهو لين الحديث.

وعن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"بدأ الاسلام غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، فطوبى للغرباء".

رواه الطبراني في الأوسط (7279) عن محمد بن نصير، قال: حدثنا الشّاذكونيّ، قال: حدثنا سلْم بن قتيبة، قال: حدثنا محمد بن مُهزَّم، عن عطية، عن أبي سعيد، فذكر الحديث.

قال الطبرانّي:"لم يرو هذا الحديث عن محمد بن مُهزَّم إِلَّا سلْم بن قتيبة، تفرّد به الشَّاذكونيّ".

وأعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 278) بعطية وقال:"هو ضعيف".

وعطية هو ابن سعيد بن جُنادة العوفيّ ضعفه أبو داود، والنسائيّ، وأبو حاتم وغيرهم. وقال ابن
معين:"صالح".

والخلاصة: أنّه شيعي مدلس، إذا انفرد ولم يتابع فلا يقبل.

وعن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا، فطوبي للغرباء" قال: من هم يا رسول اللَّه؟ قال: الذين يُصلحون حين يُفسد الناس".

رواه الطبراني في الأوسط (4912) عن عُمارة بن وثيمة بن موسى بن الفرات المصريّ أبي رفاعة، قال: حدثنا أبو صالح عبد اللَّه بن صالح، قال: حدثني الليث بن سعد، قال: حدثني يحيى ابن سعيد، قال: كتب إليَّ خالد بن أبي عمران، قال: حدثني أبو عياش، قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه، فذكر الحديث.

ورواه الطّحاويّ في شرحه (689)، واللالكائيّ في السنة (173)، والبيهقي في الزهد (ص 198) كلهم من حديث عبد اللَّه بن صالح، بإسناده مثله.

وفيه عبد اللَّه بن صالح مختلف فيه غير أنه لا بأس به في الشّواهد.

وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 278) فقال:"عبد اللَّه بن صالح كاتب الليث، وهو ضعيف وقد وُثِّق".

إِلَّا أنه توبع: رواه الهرويّ في ذم الكلام (1472) من طريقه، ومن طريق ابن وهب - كلاهما عن الليث بن سعد، بإسناده مثله.

ورواه الطبرانيّ في الأوسط (8971) من وجه آخر عن خالد بن أبي عمران بإسناده.

ولكن مداره على أبي عياش وهو المعافريّ المصريّ، روى عنه جماعة، ولكن لم أقف على توثيق من أحد، حتى ابن حبان لم يذكره في"الثقات" على قاعدته في ذكر المجاهيل وهو على شرطه، قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أقف على من تابعه في هذا الحديث.

وعن سلمان قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا".

رواه الطبراني في الكبير (6/ 314) عن عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، ثنا إبراهيم بن الحسن العلاف، ثنا عيسى بن ميمون، عن عون بن أبي شداد، عن أبي عثمان، عن سلمان، فذكر الحديث.

ورواه أيضًا الهرويّ في ذم الكلام (1477) من وجه آخر عن إبراهيم بن الحسن العلاف، بإسناده مثله، وزاد في آخره:"فيا طوبى للغرباء".

وفيه عيسى بن ميمون وهو المدنيّ، مولى القاسم بن محمد، يعرف بالواسطيّ، قال البخاريّ:"منكر الحديث"، وقال أبو حاتم:"لا يصح حديثه".

وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 279) فقال بعد أن عزاه للطبراني:"وفيه عيسى بن ميمون وهو متروك".

وعن عبد الرحمن بن سنَّة، أنَّه سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"بدأ الإسلام غريبًا ثم يعود غريبًا كما بدأ،
فطوبى للغرباء". قيل: يا رسول اللَّه، ومن الغرباء؟ قال:"الذين يَصْلحون إذا فسد الناس، والذي نفسي بيده لينحازنَّ الإيمان إلى المدينة كما يحوز السّيل، والذي نفسي بيده ليأرزنّ الإسلامُ إلى ما بين المسجدين كما تأرزُ الحيّةُ إلى جحرها".

رواه عبد اللَّه بن أحمد في زيادته على المسند (16690) عن أبي أحمد الهيثم بن خارجة، قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي فروة، عن يوسف بن سليمان، عن جدته ميمونة، عن عبد الرحمن بن سَنَّة، فذكر الحديث.

ورواه الهرويّ في ذم الكلام (1478)، وابن عدي في الكامل (4/ 1615) كلاهما من طريق إسماعيل بن عياش، بإسناده، نحوه.

وفيه إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي فروة متروك، كذَّبه ابن معين وغيره، وبه أعلّه الحافظ الهيثميّ في"المجمع" (7/ 278).

وقال ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل في ترجمة عبد الرحمن بن سنّة: روي عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم حديثًا، ليس إسناده بالقائم؛ لأنّ راويه إسحاق بن أبي فروة".

وضعف هذا الحديث البخاريّ وغيره من أجل ابن أبي فروة.

وعن أبي موسى الأشعريّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقوم الساعة حتى ترى الأرض دمًا، يكون الإسلام غريبًا". فذكر الحديث.

أورده الهيثميّ في"المجمع" (7/ 279) هكذا مبتورًا ولم يعز إلى مخرجه، ولعله سقط من المطبوعة، وقال:"وفيه سليمان بن أحمد الواسطيّ، وهو ضعيف".

قلت: سليمان بن أحمد الواسطيّ هذا ممن يسرق الحديث، ترجمه ابن عدي في"الكامل" (3/ 1139 - 1140) وقال:"ولسليمان أحاديث أفراد غرائب، يحدّث بها عنه علي بن عبد العزيز وغيره، وهو عندي ممن يسرق الحديث، ويُشتبه عليه".

وعن واثلة بن الأسقع، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"بدأ الإسلام غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، فطوبى للغرباء" قيل: يا رسول اللَّه، ومن الغرباء؟ قال:"الذين يَصلحون إذا فسد الناس".

رواه تمام في فوائده (1705، 1706) من طرق عن سليمان بن سلمة الخبائريّ، نا المؤمّل بن سعيد الرحبيّ، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن واثلة بن الأسقع، فذكر الحديث.

وإسناده ضعيف جدًّا؛ فإنّ الخبائريّ متروك. قال ابن أبي حاتم:"سمع منه أبي ولم يحدّث عنه، وسألته عنه، فقال: متروك الحديث، لا يشتغل به. فذكرتُ ذلك لابن الجنيد فقال: صدق، كان يكذب، ولا أحدّث عنه بعد هذا".

وشيخه المؤمّل بن سعيد منكر الحديث، كما قال أبو حاتم.

وقال ابن حبان:"منكر الحديث جدًّا، فلستُ أدري وقع المناكير في روايته منه، أو من سليمان
ابن سلمة راويه، لأنّ سليمان كان يروي الموضوعات عن الأثبات، فإن كان منه أو من المؤمّل أو منهما معا بطل الاحتجاج برواية يرويانها" انظر:"المجروحين" (1075).

وعن أبي الدرداء، وأبي أمامة الباهليّ، وأنس بن مالك، وواثلة بن الأسقع، قالوا: خرج علينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ونحن نتمارى في شيء من الدّين، فغضب غضبًا شديدًا لم يغضب مثله، ثم انتهرنا فقال:"يا أمّة محمد لا تُهيِّجوا على أنفسكم وَهَج النار". ثم ذكر حديثًا طويلًا، قال في آخره:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود كما بدأ فطوبى للغرباء" قالوا: يا رسول اللَّه، ومن الغرباء؟ قال: الذين يصلحون إذا فسد الناسُ، ولا يُمارون في دين اللَّه، ولا يُكفِّرون أحدًا من أهل التوحيد بذنب".

ضعيف جدًّا. رواه الطبراني في الكبير (8/ 178 - 179)، وابن عدي في الكامل (6/ 2089 - 2090)، وابن حبان في المجروحين (896)، والبيهقي في الزهد (199) كلهم من طريق محمد بن الصباح الجرجرائيّ.

إِلَّا البيهقي فإنه رواه من طريق سعيد بن محمد الجرميّ، كلاهما عن كثير بن مروان الفلسطينيّ، عن عبد اللَّه بن يزيد الدّمشقيّ، قال: حدثني أبو الدرداء وأبو أمامة الباهليّ وأنس بن مالك وواثلة ابن الأسقع، قالوا (فذكروا الحديث).

فذكره بطوله الطبرانيّ، وابن حبان، وأما ابن عدي فاختصره قائلًا:"فذكر حديثًا طويلًا" وقال فيه:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا". وكذلك ذكره البيهقي مختصرًا.

وأخرجه الخطيب في"تاريخ بغداد" (12/ 481) وقال عقبه:"بلغني عن إبراهيم بن عبد اللَّه بن الجنيد قال: سألت يحيى بن معين عن كثير بن مروان المقدسيّ، فقال: ليس بشيء، كذَّاب، كان ببغداد يحدّث بالمنكرات".

وقال ابن عدي: قال العباس: سمعت يحيى بن معين يقول:"كثير بن مروان ضعيف، وقد سمعت أنا منه"، وفي موضع آخر:"كثير بن مروان الشَّاميّ، وليس بشيء". وقال:"ولكثير بن مروان أحاديث ليست بالكثيرة، ومقدار ما يرويه لا يتابعه الثقات عليه" انتهى.

وقال ابن حبان:"منكر الحديث جدًّا، لا يجوز الاحتجاج به، ولا الرواية عنه إِلَّا على جهة التعجُّب".

وبه أعلّه الهيثميّ في المجمع (1/ 156) فقال:"كثير بن مروان ضعيف جدًّا".

وعن رجل قال: كنتُ في مجلس فيه عمر بن الخطَّاب بالمدينة، فقال لرجل من القوم: يا فلان، كيف سمعتَ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينعت الإسلام؟ قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ الإسلام بدأ جَذّعًا، ثم ثنيًّا، ثم ربَاعيًّا، ثم سداسيًّا، ثم بازلًا". قال: فقال عمر بن الخطّاب: فما بعد البزول إلّا النقصان.

رواه الإمام أحمد (15802) عن محمد بن جعفر، حدثنا عوف، قال: حدثني علقمة المزنيّ،
قال: حدثني رجل قال (فذكر الحديث).

وإسناده ضعيف، لإبهام الرّاوي.

ورواه أبو يعلى (192) من طريق يزيد بن زريع، ويحيى بن سعيد، عن عوف، به. وزاد: قال يزيد في حديثه في مسجد البصرة قال: حدثني رجل قد سماه، ونسي عوفٌ اسمه.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (7/ 279) وقال:"رواه أحمد وأبو يعلى، وفيه راو لم يُسم، وبقية رجاله ثقات".

وقوله:"بازلًا" هو ما طلع نابه، وكملتُ قوته، ويكون بعد ثمان سنين، ثم يقال بعد ذلك: بازلُ عامٍ، بازل عامين.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত থাকাকালে তিনি বললেন: "তোবা (সুসংবাদ) গুরাবা বা অপরিচিতদের জন্য।" জিজ্ঞাসা করা হলো: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! গুরাবা কারা?" তিনি বললেন: "তারা হলো সৎ লোক, যারা বহু সংখ্যক অসৎ লোকের মাঝে অবস্থান করে। যারা তাদের অবাধ্য হয়, তাদের সংখ্যা তাদের অনুসারীদের চেয়েও অনেক বেশি।" অতঃপর তিনি মুহাজিরদের মধ্য থেকে এমন দরিদ্রদের কথা উল্লেখ করলেন, যাদের দ্বারা বিপদাপদ থেকে রক্ষা পাওয়া যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (177)


177 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"نحن أحقُّ بالشّك من إبراهيم إذ قال: {رَبِّ أَرِنِي كَيْفَ تُحْيِ الْمَوْتَى قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِنْ قَالَ بَلَى وَلَكِنْ لِيَطْمَئِنَّ قَلْبِي} [سورة البقرة: 260]، ويرحم اللَّه لوطًا لقد كان يأوي إلى ركن شديد، ولو لبثتُ في السّجن طول ما لبث يوسفُ لأجبتُ الدَّاعي".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأنبياء (3372)، ومسلم في الفضائل (2370: 152) كلاهما من حديث ابن وهب، قال: أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، وسعيد ابن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.

قال أبو سليمان الخطّابي: ليس في قوله:"نحن أحقّ بالشّك من إبراهيم" اعتراف بالشّك على نفسه، ولا على إبراهيم، لكن فيه نفي الشّك عنهما، يقول: إذا لم أشك أنا ولم أرتَبْ في قدرة اللَّه عز وجل على إحياء الموتى، فإبراهيم أولى بأن لا يشك ولا يرتاب، وقال ذلك على سبيل التواضع، والهضم من النَّفس. وفيه الإعلام أن المسألة من قبل إبراهيم لم تعرض من جهة الشّك، لكن من قبل زيادة العلم، فإن العيان يفيد من المعرفة والطمأنينة ما لا يفيد الاستدلال، وقوله:"ليطمئن قلبي"، أي: بيقين النّظر". انتهى باختصار. انظر:" أعلام الحديث" (3/ 1545 - 1546).

وقوله:"لأجبتُ الدَّاعي" أي لأسرعتُ الإجابة في الخروج من السّجن، ولَمَا قدّمت طلب البراءة، فوصفه بشدّة الصَّبر حيث لم يبادر بالخروج، وإنما قاله صلى الله عليه وسلم تواضعًا، والتواضع لا يحط مرتبة الكبير، بل يزيده رِفعة وجَلالًا.

وقيل: هو من جنس قوله:"لا تفضلوني على يونس" وقد قيل: إنَّه قاله قبل أن يعلم أنَّه أفضل من الجميع. انظر:"الفتح" (6/ 413).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা ইবরাহীম (আঃ)-এর চেয়েও সন্দেহের (শঙ্কা দূর করার) বেশি হকদার ছিলাম, যখন তিনি বলেছিলেন: 'হে আমার প্রতিপালক! আমাকে দেখান, কীভাবে আপনি মৃতকে জীবিত করেন। আল্লাহ বললেন: তুমি কি বিশ্বাস করো না? তিনি বললেন: অবশ্যই, কিন্তু আমার অন্তর যেন প্রশান্তি লাভ করে।' (সূরা বাকারা: ২৬০)। আর আল্লাহ লূত (আঃ)-এর প্রতি রহম করুন; তিনি এক শক্তিশালী আশ্রয়স্থলের শরণাপন্ন হতেন। আর ইউসুফ (আঃ) কারাগারে যত দীর্ঘ সময় ছিলেন, আমাকে যদি তত দীর্ঘ সময় থাকতে হতো, তবে আমি আহ্বানকারীকে (কারাগার থেকে মুক্তির আহ্বানকারীকে) তৎক্ষণাৎ সাড়া দিতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (178)


178 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقوم السّاعةُ حتى تطلع الشّمس من مغربها، فإذا طلعتْ ورآها الناسُ آمن منْ عليها، فذاك حين {لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِنْ قَبْلُ} [سورة الأنعام: 158]".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4635)، ومسلم في الإيمان (157) كلاهما من حديث عمارة بن القعقاع، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة. . . فذكره.

وفي لفظ مسلم من وجه آخر عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة:"فإذا طلعتْ من مغربها آمن الناسُ كلّهم أجمعون فيومئذ {لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِنْ قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا} [سورة الأنعام: 158]".

وبهذا اللّفظ رواه عبد الرزاق، عن همام، عن أبي هريرة. ومن طريقه رواه البخاريّ (4636)، ومسلم (157).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না সূর্য তার পশ্চিম দিক থেকে উদিত হবে। যখন তা উদিত হবে এবং লোকেরা তা দেখবে, তখন পৃথিবীর উপরস্থ সবাই ঈমান আনবে। আর এটিই সেই সময়, যখন আল্লাহ তাআলা বলেন: "এটি সেই সময় যখন কোনো ব্যক্তির ঈমান তার কোনো উপকারে আসবে না, যদি সে পূর্বে ঈমান না এনে থাকে অথবা ঈমানের মাধ্যমে ভালো কাজ না করে থাকে।" (সূরা আল-আনআম: ১৫৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (179)


179 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ثلاث إذا خرجْن لا ينفع نفسًا إيمانُها لم تكن آمنتْ من قبل أو كسبتْ في إيمانها خيرًا: طلوع الشّمس من مغربها، والدّجال، ودابة الأرض".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (158) من طرق عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তিনটি বিষয় যখন প্রকাশিত হবে, তখন এমন কোনো ব্যক্তির ঈমান আর কোনো উপকারে আসবে না যে ব্যক্তি পূর্বে ঈমান আনেনি অথবা ঈমান আনার পর কোনো কল্যাণকর কাজ করেনি। সেই তিনটি বিষয় হলো: পশ্চিম দিক থেকে সূর্যের উদয় হওয়া, দাজ্জাল এবং ভূ-গর্ভ থেকে জন্তুর (দা-বাতুল আরদ) আবির্ভাব।









আল-জামি` আল-কামিল (180)


180 - عن أبي ذرٍّ، أن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال يومًا:"أتدرون أين تذهبُ هذه الشَّمسُ؟" قالوا: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"إنّ هذه تجري حتى تنتهي إلى مستقرِّها تحت العرش. فتخرُّ ساجدةً، فلا تزال كذلك حتى يقال لها: ارْتفعي، ارْجعي من حيثُ جئتِ، فترجعُ. فتصبحُ طالعةً من مطلعها. ثم تجري حتى تنتهي إلى مستقرها تحت العرش، فتخرُّ ساجدةً، ولا تزال كذلك حتى يقال لها: ارْتفعيّ، ارْجعي من حيثُ جئتِ، فترجعُ. فتصبح طالعةً من مطلعها، ثم تجري لا يستنكرُ الناس منها شيئًا حتى تنتهي إلى مستقرِّها ذاك تحت العرش. فيقال لها: ارْتفعيّ، أصبحي طالعةً من مغربك، فتصبحُ طالعةُ من مغربها". فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أتدرون متى ذاكم؟ ذاك حين {لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِنْ قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا} [سورة الأنعام: 158]".

متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3199)، ومسلم في الإيمان (159) كلاهما من حديث إبراهيم بن يزيد التيميّ، عن أبيه، عن أبي ذرّ، فذكره، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ فيه اختصار.

وفي رواية لهما:"فذلك قوله تعالى: {وَالشَّمْسُ تَجْرِي لِمُسْتَقَرٍّ لَهَا ذَلِكَ تَقْدِيرُ الْعَزِيزِ الْعَلِيمِ}
[سورة يس: 38]".




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একদিন বললেন, "তোমরা কি জানো, এই সূর্য কোথায় যায়?" তারা বললেন, "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন।" তিনি বললেন, "নিশ্চয় এটি (সূর্য) চলমান থাকে যতক্ষণ না তা আরশের নীচে তার নির্দিষ্ট গন্তব্যে পৌঁছায়। অতঃপর তা সিজদায় লুটিয়ে পড়ে। সে সিজদারত অবস্থায় থাকে, যতক্ষণ না তাকে বলা হয়: 'ওঠো, যেখান থেকে এসেছ সেখানে ফিরে যাও।' তখন সে ফিরে যায়। ফলে তা তার উদয়স্থল থেকেই উদিত হয়। অতঃপর তা আবার চলমান হয় যতক্ষণ না আরশের নীচে তার নির্দিষ্ট গন্তব্যে পৌঁছায়। অতঃপর তা সিজদায় লুটিয়ে পড়ে। সে সিজদারত অবস্থায় থাকে, যতক্ষণ না তাকে বলা হয়: 'ওঠো, যেখান থেকে এসেছ সেখানে ফিরে যাও।' তখন সে ফিরে যায়। ফলে তা তার উদয়স্থল থেকেই উদিত হয়। এরপর তা চলতে থাকে এবং মানুষ এতে কোনো অস্বাভাবিকতা দেখতে পায় না, যতক্ষণ না তা আরশের নীচে তার সেই গন্তব্যে পৌঁছে যায়। তখন তাকে বলা হয়: 'ওঠো, তোমার অস্তাচল থেকে উদিত হও।' ফলে তা তার অস্তাচল থেকেই উদিত হয়।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "তোমরা কি জানো এটা কখন ঘটবে? এটা ঘটবে তখন, যখন [আল্লাহর বাণী]: 'যে ব্যক্তি পূর্বে বিশ্বাসী ছিল না কিংবা বিশ্বাস স্থাপনকালে কোনো সৎকর্ম করেনি, তার জন্য সে সময়ের বিশ্বাস কোনো ফল দেবে না।' (সূরা আন'আম: ১৫৮)।"









আল-জামি` আল-কামিল (181)


181 - عن المعرور قال: لقيتُ أبا ذر بالرّبذة، وعليه حُلّة، وعلى غلامه حُلّة، فسألته عن ذلك فقال: إني ساببتُ رجلًا فعيّرته بأمّه، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"يا أبا ذر، أعيّرته بأمّه؟ إنّك امرؤٌ فيك جاهلية، إخوانكم خوَلُكم، جعلهم اللَّه تحت أيديكم، فمن كان أخوه تحت يده فليطْعمه مما يأكل، ولْيلبسه مما يلبس، ولا تكلّفوهم ما يغلبهم، فإن كلّفتموهم فأعينوهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (30)، ومسلم في الأيمان والنذور (1661) كلاهما من حديث شعبة، عن واصل بن الأحدب، عن المعرور بن سويد، فذكره، واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.

وقوله:"عيّرته بأمّه" أي أنّ أمّه كانت أعجميّة.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মা'রূর বলেন, আমি রাবাযা নামক স্থানে আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে সাক্ষাৎ করলাম। তখন তাঁর পরনে ছিল একটি জোড়া পোশাক এবং তাঁর গোলামের পরনেও ছিল একটি জোড়া পোশাক। আমি তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: আমি এক ব্যক্তিকে গালি দিয়েছিলাম এবং তার মাকে উল্লেখ করে তাকে লজ্জা দিয়েছিলাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবূ যার! তুমি কি তাকে তার মায়ের কারণে লজ্জা দিয়েছ? নিশ্চয়ই তুমি এমন ব্যক্তি, যার মধ্যে এখনো জাহিলিয়াতের প্রভাব রয়েছে। তোমাদের ভাইয়েরা তোমাদের অধীনস্থ। আল্লাহ তাদেরকে তোমাদের হাতে অর্পণ করেছেন। অতএব, যার ভাই তার অধীনে থাকবে, সে যেন তাকে তা-ই খেতে দেয় যা সে নিজে খায় এবং তাকে তা-ই পরতে দেয় যা সে নিজে পরে। আর তাদের ওপর এমন বোঝা চাপিয়ে দিও না যা তাদের সামর্থ্যের বাইরে। যদি তোমরা তাদের ওপর কঠিন কাজ চাপিয়ে দাও, তবে তোমরাও তাদের সাহায্য করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (182)


182 - عن أبي أمامة قال: سأل رجلٌ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: مالإثم؟ فقال:"إذا حكّ في نفسك شيءٌ فدعه". قال: فما الإيمان؟ قال:"إذا ساءتك سيِّئتُك، وسرَتك حسنتُك، فأنت مؤمن".

صحيح: رواه الإمام أحمد (22159)، والطبراني في الكبير (7539)، وصحّحه ابن حبان (176) كلهم من طرق عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلام، عن جده ممطور، قال: سمعتُ أبا أمامة (فذكر الحديث).

ورواه الحاكم (1/ 14) من طرق أخرى وقال:"هذه الأحاديث كلّها صحيحة متصلة على شرط الشيخين".




আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করল: 'পাপ (ইসম) কী?' তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন কোনো কিছু তোমার মনে খটকা সৃষ্টি করে (সন্দেহ জন্মায়), তখন তুমি তা ছেড়ে দাও।" লোকটি জিজ্ঞেস করল: 'তাহলে ঈমান কী?' তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তোমার মন্দ কাজ তোমাকে খারাপ লাগে এবং তোমার ভালো কাজ তোমাকে আনন্দ দেয়, তখনই তুমি মুমিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (183)


183 - عن ابن عمر قال: خطبنا عمر بالجابية فقال: يا أيّها النّاس إني قمت فيكم كمقام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فينا فقال:"أُوصيكم بأصحابي، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم، ثم يفشو الكذب، حتى يحلف الرّجلُ ولا يستحلف، ويشهد الشَّاهد ولا يستشهد، ألا لا يخلونّ رجلٌ بامرأة إِلَّا كان ثالثهما الشيطان، عليكم بالجماعة، وإيّاكم والفرقة، فإنّ الشيطان مع الواحد وهو من الاثنين أبعد، من أراد بحبوحة الجنة فليلزم الجماعة، من سرّته حسنته وساءته سيّئتُه فذلكم المؤمن".

صحيح: رواه الترمذيّ (65) عن أحمد بن منيع، حدثنا النَّضر بن إسماعيل أبو المغيرة، عن محمد بن سوقة، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، فذكر الحديث.
ورواه الإمام أحمد (114)، وصحّحه ابن حبان (7254)، والحاكم (1/ 113) كلهم من طريق محمد بن سوقة. قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين". وقال الترمذيّ:"حسن صحيح غريب".

وفي الباب عن أبي موسى قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من عمل حسنةً فسُرَّ بها، وعمل سيئة فساءته فهو مؤمن". وهو منقطع.

رواه الإمام أحمد (19565)، والبزار -كشف الأستار (79) -، والحاكم (1/ 13، 54) كلهم من حديث عبد العزيز بن محمد، عن عمرو (يعني ابن أبي عمرو)، عن المطلب، عن أبي موسى، فذكر الحديث.

والمطلب هو ابن عبد اللَّه بن حنطب لا يعرف له سماع من الصّحابة، كما نقل الترمذيّ في"العلل الكبير" (2/ 964) عن البخاريّ.

وقال الحاكم:"وقد احتجا برواة هذا الحديث عن آخرهم، وهو صحيح على شرطهما ولم يخرجاه، إنما خرجا في خطبة عمر بن الخطّاب:"من سرّته حسنتُه، وساءته سيّئتُه فهو مؤمن" انتهى. ووافق الذهبي على شرطهما.

والصّواب أنه ليس بصحيح، ولا على شرطهما؛ لأنّ في إسناده انقطاعًا، والحديث المنقطع ليس بصحيح فضلًا أن يكون على شرطهما.

وفي الباب أيضًا عن عامر بن ربيعة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من مات وليس عليه طاعة مات ميتةً جاهليّة، فإنْ خلعها من بعد عقدِها في عنقه، لقي اللَّه تبارك وتعالى وليست له حُجّةٌ. ألا لا يخلُوَنَّ رجلٌ بامرأة لا تحلُّ له، فإنَّ ثالثَهما الشّيطان، إِلَّا مَحْرم، فإنَّ الشَّيطان مع الواحد، وهو من الاثنين أبعد، من ساءته سيّئتُه، وسرّته حسنتُه فهو مؤمن". قال حسين:"بعد عقده إيّاها في عنقه".

إسناده ضعيف. رواه الإمام أحمد (15696)، والبزار -كشف الأستار- (1636) كلاهما من حديث شريك، عن عاصم بن عبيد اللَّه، عن عبد اللَّه بن عامر (يعني ابن ربيعة)، عن أبيه، فذكر الحديث.

وعاصم بن عبيد اللَّه هو ابن عاصم بن عمر بن الخطّاب ضعيف، وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع"




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের মাঝে জাবিয়া নামক স্থানে খুতবা দিলেন এবং বললেন: হে লোকসকল! আমি তোমাদের মাঝে ঠিক তেমনই দাঁড়িয়েছি, যেমন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে দাঁড়িয়েছিলেন। অতঃপর তিনি (উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বললেন: “আমি তোমাদেরকে আমার সাহাবীগণের ব্যাপারে উপদেশ দিচ্ছি, অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী (তাবেয়ী), অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী (তাবে তাবেয়ী)। এরপর মিথ্যার ব্যাপক প্রচলন ঘটবে, এমনকি লোক কসম করবে অথচ তাকে কসম করতে বলা হয়নি, এবং সাক্ষী (মিথ্যা) সাক্ষ্য দেবে অথচ তাকে সাক্ষী দিতে আহ্বান করা হয়নি। সাবধান! কোনো পুরুষ যেন কোনো নারীর সাথে নির্জনে একাকী না থাকে, কারণ এক্ষেত্রে শয়তান হয় তাদের তৃতীয়জন। তোমরা জামাআতকে (ঐক্যকে) দৃঢ়ভাবে আঁকড়ে ধরো এবং দলাদলি (বিচ্ছিন্নতা) থেকে দূরে থাকো। কেননা শয়তান একাকী ব্যক্তির সঙ্গী হয়, আর দুজন থেকে সে দূরে থাকে। যে ব্যক্তি জান্নাতের মধ্যবর্তী উত্তম স্থানে থাকতে চায়, সে যেন জামাআতকে আঁকড়ে ধরে। যার নেক আমল তাকে আনন্দ দেয় এবং গুনাহ তাকে পীড়া দেয়, সে-ই হলো মুমিন।”









আল-জামি` আল-কামিল (184)


184 - عن وعن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ من الشّجر شجرةً لا يسقط ورقُها، وإنَّها مثل المسلم، فحدّثوني ما هي؟". فوقع النَّاسُ في شجر البوادي. قال عبد اللَّه ابن عمر: ووقع في نفسي أنَّها النَّخلة، فاستحييتُ، ثم قالوا: حدثنا ما هي يا رسول اللَّه، قال:"هي النَّخلة".

وفي رواية:"أخبروني شجرةً مَثَلُها مَثَلُ المسلم، تُؤتي أكلها كلَّ حين بإذن ربِّها،
ولا تحتّ ورقها" فوقع في نفسي: النّخلة، فكرهت أن أتكلّم وثمَّ أبو بكر وعمر، فلما لم يتكلما قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"هي النَّخلة". فلما خرجت مع أبي قلت: يا أبتاه، وقع في نفسي النّخلة. قال: ما منعك أن تقولها؟ لو كنتَ قلتَها كان أحبّ إليَّ من كذا وكذا. قال: ما منعني إلَّا أني لم أرك ولا أبا بكر تكلمتما فكرهت".

متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (61)، ومسلم في صفات المنافقين (2811) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا إسماعيل بن جعفر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.

والرواية الثانية عند البخاريّ (6144) من وجه آخر عن نافع، عن ابن عمر.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বৃক্ষসমূহের মধ্যে এমন একটি বৃক্ষ আছে, যার পাতা ঝরে না। এটি মুসলমানের মতো। তোমরা আমাকে বলো, সেটা কী?" তখন লোকেরা মরুভূমির গাছপালা নিয়ে আলোচনা শুরু করল। আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার মনে এলো যে, এটি খেজুর গাছ। কিন্তু আমি (বলতে) লজ্জা পেলাম। এরপর তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনিই আমাদের বলুন, সেটি কী? তিনি বললেন: "এটি খেজুর গাছ।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আমাকে এমন একটি গাছের কথা বলো, যা মুসলমানের মতো। যা তার রবের নির্দেশে সব সময় ফল দেয় এবং যার পাতা ঝরে না।" আমার মনে এলো: খেজুর গাছ, কিন্তু আমি কথা বলতে অপছন্দ করলাম, কারণ সেখানে আবূ বকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। যখন তাঁরা কিছু বললেন না, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি খেজুর গাছ।" যখন আমি আমার পিতার সাথে বের হলাম, তখন বললাম: আব্বা! আমার মনে খেজুর গাছের কথাই এসেছিল। তিনি বললেন: তুমি বলতে পারলে না কেন? যদি তুমি তা বলতে, তবে সেটা আমার কাছে অমুক অমুক জিনিসের চেয়েও অধিক প্রিয় হতো। তিনি (ইবনু উমর) বললেন: আমি আপনাকে এবং আবূ বকরকে কথা বলতে না দেখে (বলতে) অপছন্দ করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (185)


185 - عن عبيد اللَّه بن عدي بن الخيار أخبره، أن المقداد بن عمرو الكنديّ -وكان حليفًا لبني زهرة، وكان ممن شهد بدرًا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أخبره أنه قال لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: أرأيتَ إن لقيتُ رجلًا من الكفّار فاقتلنا، فضرب إحدى يديَّ بالسّيف فقطعها، ثم لاذ مني بشجرة فقال: أسلمتُ للَّه، أأقتلُه يا رسول اللَّه بعد أن قالها؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقتله". فقال يا رسول اللَّه، إنّه قطع إحدى يديَّ، ثم قال ذلك بعدما قطعها؟ ! فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقتله، فإنْ قتلتَه فإنه بمنزلتك قبل أن تقتله، وإنَّك بمنزلته قبل أن يقول كلمته التي قال".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4019)، ومسلم في الإيمان (95) من حديث ابن شهاب الزهريّ، عن عطاء بن يزيد، عن عبيد اللَّه بن عديّ بن الخياريّ، به، فذكره، ولفظهما سواء




মিকদাদ ইবনে আমর আল-কিন্দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি বনু যোহরার মিত্র ছিলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারীদের একজন ছিলেন—তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন: "আপনি কি মনে করেন, যদি আমি কাফেরদের মধ্য থেকে এমন এক ব্যক্তির সাথে সাক্ষাত করি এবং আমাদের মধ্যে যুদ্ধ শুরু হয়, আর সে তলোয়ার দ্বারা আমার এক হাতে আঘাত করে এবং তা কেটে ফেলে; এরপর সে আমার থেকে একটি গাছের আড়ালে আশ্রয় নিয়ে বলে: 'আমি আল্লাহর কাছে আত্মসমর্পণ করলাম (ইসলাম গ্রহণ করলাম),' তাহলে এই কথা বলার পরও কি আমি তাকে হত্যা করতে পারি, হে আল্লাহর রাসূল?"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে হত্যা করবে না।"

তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! সে তো আমার এক হাত কেটে ফেলেছে, তারপর সে আঘাত করার পরেই এই কথা বলেছে!"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে হত্যা করবে না। যদি তুমি তাকে হত্যা করো, তবে তুমি তাকে হত্যা করার আগে সে যে অবস্থানে ছিল (অর্থাৎ মুসলিম হিসেবে), সে সেই অবস্থানে চলে যাবে। আর তুমি তার বলা কালেমার পূর্বে সে যে অবস্থানে ছিল (অর্থাৎ কাফের হিসেবে), তুমি সেই অবস্থানে চলে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (186)


186 - عن أسامة بن زيد يقول: بعثنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى الحُرقة، فصبّحنا القوم فهزمناهم، ولحقتُ أنا ورجلُ من الأنصار رجلًا منهم فلما غشيناه قال: لا إله إلا اللَّه. فكفَّ عنه الأنصاريّ، فطعنْتُه برمحي حتى قتلتُه، فلما قدمنا بلغ ذلك النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"يا أسامة، أقتلْتَه بعدما قال: لا إله إِلَّا اللَّه؟ !" قلت: كان متعوِّذًا! فما زال يكرّرُها حتى تمنيتُ أني لم أكن أسلمتُ قبل ذلك اليوم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازيّ (469)، ومسلم في الإيمان (96: 159) كلاهما من طريق هشيم، أخبرنا حصين، حدثنا أبو ظبيان، قال: سمعتُ أسامة بن زيد بن حارثة يحدّث، قال (فذكره)، ولفظهما سواء.

ورواه مسلم من وجه آخر عن الأعمش، عن أبي ظبيان، عن أسامة بن زيد، قال: بعثنا رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم في سريّة، فصبّحنا الحُرُقات من جهينة، فأدركتُ رجلًا فقال: لا إله إِلّا اللَّه، فطعنتُه، فوقع
في نفسي من ذلك، فذكرتُه للنبيّ صلى الله عليه وسلم فقال رسول اللَّه:"أقال: لا إله إلّا اللَّه وقتلتَه؟ !". قال: قلت: يا رسول اللَّه، إنّما قالها خوفًا من السّلاح. قال:"أفلا شققتَ على قلبه حتى تعلم أقالها أم لا؟ !". فما زال يكرّرها عَلَيَّ حتى تمنيتُ أنِّي أسلمتُ يومئذ.

قال: فقال سعد: وأنا واللَّهِ لا أقتلُ مسلمًا حتى يقتله ذو البُطين -يعني أسامة-، قال: قال رجل: ألم يقل اللَّه: {وَقَاتِلُوهُمْ حَتَّى لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدِّينُ لِلَّهِ} [سورة الأنفال: 39]؟ فقال سعد: قد قاتلنا حتى لا تكون فتنة، وأنت وأصحابك تريدون أن تقاتلوا حتى تكون فتنة.

قوله:"الحرقات" مثل عرفات وأذرعات، موضع ببلاد جهينة.




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের হুরকাহ (নামক স্থানের) দিকে প্রেরণ করলেন। আমরা সকাল বেলা সেই গোত্রের উপর আক্রমণ করে তাদের পরাজিত করলাম। আমি এবং আনসার গোত্রের একজন লোক তাদের মধ্যে একজনকে তাড়া করলাম। যখন আমরা তাকে প্রায় ধরে ফেললাম, তখন সে বলল: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)। এটা শুনে আনসারী লোকটি বিরত হলো, কিন্তু আমি আমার বর্শা দিয়ে তাকে আঘাত করে হত্যা করলাম।

যখন আমরা ফিরে এলাম, তখন খবরটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছাল। তিনি বললেন: "হে উসামা, সে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলার পরও কি তুমি তাকে হত্যা করেছো?!" আমি বললাম: সে তো কেবল (মৃত্যু থেকে) বাঁচার জন্য আশ্রয় চেয়েছিল। তিনি এত বেশিবার এই কথাটি পুনরাবৃত্তি করতে থাকলেন যে আমি কামনা করলাম, যদি আমি আজকের আগে ইসলাম গ্রহণ না করতাম।

(মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় আছে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে কি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলার পরেও তুমি তাকে হত্যা করেছো?" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, সে তো কেবল অস্ত্রের ভয়ে কথাটি বলেছিল। তিনি বললেন: "তুমি কি তার হৃদয় বিদীর্ণ করে দেখেছিলে যে সে (আন্তরিকভাবে) তা বলেছিল নাকি না?" তিনি আমার উপর এই কথাটি বার বার পুনরাবৃত্তি করতে থাকলেন, এমনকি আমি কামনা করলাম, যদি সেদিন আমি ইসলাম গ্রহণ করতাম।

বর্ণনাকারী বলেন, এরপর সা'দ (ইবনে আবি ওয়াক্কাস) বললেন: আল্লাহর কসম, আমি কোনো মুসলিমকে হত্যা করব না, যতক্ষণ না ধুল-বুতাইন (অর্থাৎ উসামা) তাকে হত্যা করে। বর্ণনাকারী বলেন, এক লোক জিজ্ঞাসা করল: আল্লাহ কি বলেননি: "তোমরা তাদের সাথে যুদ্ধ করো যতক্ষণ না ফেতনা দূরীভূত হয় এবং দীন আল্লাহর জন্য প্রতিষ্ঠিত হয়।" (সূরা আনফাল: ৩৯)? সা'দ বললেন: আমরা তো যুদ্ধ করেছি যেন ফেতনা না থাকে, আর তুমি এবং তোমার সঙ্গীরা যুদ্ধ করতে চাও যেন ফেতনা সৃষ্টি হয়।

(হুরকাহ হলো আরাফাত ও আযরূআতের মতো একটি স্থান যা জুহায়না গোত্রের ভূমিতে অবস্থিত।)









আল-জামি` আল-কামিল (187)


187 - عن جندب بن عبد اللَّه البجلي أنّه بعث إلى عسعس بن سلامة زمن فتنة ابن الزبير، فقال: اجمع لي نفرًا من إخوانك حتى أحدّثهم فبعث رسولا إليهم. فلما اجتمعوا جاء جندب وعليه برنُس أصفر فقال: تحدَّثُوا بما كنتم تحدثون به حتّى دار الحديث. فلما دار الحديثُ إليه، حسر البرنُسَ عن رأسه فقال: إني أتيتكم ولا أريد أن أخبركم عن نبيِّكم، إنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعث بعثًا من المسلمين إلى قوم من المشركين وأنهم التقوا فكان رجل من المشركين إذا شاء أن يقصد إلى رجل من المسلمين قصد له فقتله، وإنّ رجلًا من المسلمين قصد غفلته -قال: وكنا نحدّث أنه أسامة بن زيد- فلما رفع عليه السيّف قال: لا إله إلّا اللَّه فقتله! فجاء البشير إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فسأله فأخبره حتى أخبره خبر الرجل كيف صنع، فدعاه فسأله فقال:"لِمَ قتلتَه؟". قال: يا رسول اللَّه أوجع في المسلمين، وقتل فلانًا وفلانًا وسمّى له نفرًا، وإني حملت عليه. فلمّا رأى السّيف قال: لا إله إلّا اللَّه! قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أقتلته؟" قال: نعم قال: فكيف تصنع بلا إله إلّا اللَّه إذا جاءت يوم القيامة؟" قال يا رسول اللَّه، استغفرْ لي. قال:"وكيف تصنع بلا إله إلّا اللَّه إذا جاءت يوم القيامة؟ !". قال: فجعل لا يزيده على أن يقول:"كيف تصنع بلا إله إلّا اللَّه إذا جاءت يوم القيامة؟ !".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (97) عن أحمد بن الحسن بن خراش، حدثنا عمرو بن عاصم، حدثنا معمر، قال: سمعتُ أبي يحدّث أنّ خالدًا الأثْبَجَ ابن أخي صفوان بن محرز، حدّث عن صفوان بن محرز، أنّه حدّث أن جندب بن عبد اللَّه بعث، فذكره.




জুনদুব ইবনু আবদুল্লাহ আল-বাজালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনু যুবাইরের ফিতনার সময় তিনি আসআস ইবনু সালামার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন, "তোমার ভাইদের মধ্য থেকে কিছু লোককে আমার কাছে একত্র করো, যেন আমি তাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করতে পারি।" তখন তিনি (আসআস) তাদের কাছে একজন দূত পাঠালেন।

যখন তারা একত্রিত হলেন, তখন জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন। তার পরিধানে ছিল হলুদ রঙের একটি পাগড়ি (বা টুপি/চাদর)। তিনি বললেন, "তোমরা যা নিয়ে কথা বলছিলে, তা নিয়েই আলোচনা চালিয়ে যাও, যতক্ষণ না আলোচনার মোড় আমার দিকে আসে।" যখন আলোচনার মোড় তার দিকে এলো, তখন তিনি তার মাথা থেকে সেই পাগড়িটি সরিয়ে বললেন:

"আমি তোমাদের কাছে এসেছি এবং তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পক্ষ থেকে খবর দিতে চাই— এমন নয় (বরং এটাই আমি জানাতে এসেছি)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের একটি সেনাদলকে মুশরিকদের একটি গোষ্ঠীর দিকে পাঠালেন। তারা মুখোমুখি হল। মুশরিকদের মধ্যে একজন লোক ছিল যে যখনই চাইত, একজন মুসলিমকে লক্ষ্য করে আক্রমণ করত এবং তাকে হত্যা করত। মুসলিমদের মধ্যে একজন লোক তার অসতর্কতার সুযোগ নিতে চাইল— (বর্ণনাকারী) বলেন: আমরা আলোচনা করতাম যে তিনি ছিলেন উসামাহ ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। — যখন তিনি তার উপর তরবারি উত্তোলন করলেন, তখন লোকটি 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলল। তবুও তিনি তাকে হত্যা করলেন!

অতঃপর সুসংবাদদাতা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন এবং সে তাঁকে (যুদ্ধের) খবর জানালো, এমনকি ওই লোকটি (উসামাহ) কী করেছে, সে খবরও জানালো। তখন তিনি (নবী) তাকে ডেকে পাঠালেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি তাকে কেন হত্যা করলে?"

তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! সে মুসলিমদেরকে কঠিনভাবে আঘাত করছিল, আর অমুক অমুক লোককে হত্যা করেছে" — এবং তিনি কয়েকজনের নাম বললেন। — "আমি তার ওপর আক্রমণ করলাম। সে যখন তরবারি দেখল, তখন 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলল!"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি তাকে হত্যা করে ফেলেছ?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিয়ামতের দিন যখন 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' আসবে, তখন তুমি কী করবে?"

তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল, আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিয়ামতের দিন যখন 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' আসবে, তখন তুমি কী করবে?!" বর্ণনাকারী বলেন: তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর চেয়ে আর বেশি কিছু বললেন না, শুধু এই কথাই বার বার বলতে লাগলেন: "কিয়ামতের দিন যখন 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' আসবে, তখন তুমি কী করবে?!"