আল-জামি` আল-কামিল
188 - عن عبد اللَّه بن عمر، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من قال لأخيه: يا كافر، فقد باء
بها أحدُهما".
متفق عليه: رواه مالك في الكلام (1) عن عبد اللَّه بن دينار، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
ورواه البخاريّ في الأدب (6104) من طريق مالك، به، مثله.
ورواه مسلم في الإيمان (60) من طريق اسماعيل بن جعفر، عن عبد اللَّه بن دينار، به، وزاد فيه:"إن كان كما قال، وإلّا رجعتْ عليه".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার ভাইকে ‘ওহে কাফির’ বলে, তবে তাদের দুজনের একজনের উপর তা (অপবাদ বা কুফরি) বর্তায়।"
189 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قال الرّجل لأخيه: يا كافر فقد باء به أحدهما".
صحيح: رواه البخاريّ في الأدب (6102) عن محمد وأحمد بن سعيد، قالا: حدثنا عثمان بن عمر، أخبرنا عليّ بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন কোনো ব্যক্তি তার ভাইকে ‘ওহে কাফির’ বলে, তখন তাদের দুজনের মধ্যে একজন তা বহন করে।”
190 - عن ثابت بن الضّحّاك، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من حلف بملة غير الإسلام كاذبًا فهو كما قال، ومن قتل نفسه بشيء عُذّب به في نار جهنّم، ولعنُ المؤمن كقتله، ومن رمي مؤمنًا بكفر فهو كقتله".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6105)، ومسلم في الإيمان (110) كلاهما من حديث أبي قلابة، عن ثابت بن الضّحّاك، فذكر الحديث، واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم مختصرًا، ولم يذكر قوله:"ولعن المؤمن. . . الخ".
সাবেত ইবনুয যাহহাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মিথ্যা কসম হিসেবে ইসলাম ব্যতীত অন্য কোনো ধর্মের নামে শপথ করল, সে তেমনই যেমন সে বলল। আর যে ব্যক্তি কোনো বস্তু দ্বারা আত্মহত্যা করবে, জাহান্নামের আগুনে তাকে সেই বস্তু দ্বারাই শাস্তি দেয়া হবে। আর কোনো মু'মিনকে অভিসম্পাত করা তাকে হত্যা করার সমতুল্য। এবং যে ব্যক্তি কোনো মু'মিনকে কুফরীর অপবাদ দেবে, সেও তাকে হত্যা করার সমতুল্য।"
191 - عن أبي ذرّ، أنَّه سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يرمي رجلٌ رجلًا بالفسوق، ولا يرميه بالكفر إِلَّا ارتدت عليه إن لم يكن صاحبُه كذلك".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6045)، ومسلم في الإيمان (61) كلاهما من حديث عبد الوارث، عن الحسين المعلم، عن عبد اللَّه بن بريدة، حدثني يحيى بن يعمر، أنّ أبا الأسود الدّيليّ حدّثه، عن أبي ذر، فذكر الحديث.
واللّفظ للبخاريّ. ولفظ مسلم كما هو مذكور في باب بيان حال إيمان من رغب عن أبيه وهو يعلم.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "কোনো ব্যক্তি অন্য কোনো ব্যক্তিকে ফাসিক (পাপী/বিপথগামী) বলে অভিযুক্ত করে না এবং তাকে কুফরের (অবিশ্বাসের) অপবাদ দেয় না, কিন্তু সেই অপবাদ তার নিজের দিকেই ফিরে আসে, যদি তার সঙ্গী (যাকে অভিযুক্ত করা হলো) বাস্তবে সেরূপ না হয়।"
192 - عن ابن عمر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أيُّما رجل مسلم أكفر رجلًا مسلمًا، فإن كان كافرًا، وإلّا كان هو الكافر".
صحيح: رواه أبو داود (4678) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن فُضيل بن غزوان، عن نافع، عن ابن عمر، فذكر الحديث، وإسناده صحيح.
وفي الباب عن أبي سعيد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما أكفر رجلٌ رجلًا قط إلَّا باء أحدُهما بها إن كان كافرًا، وإلّا كُفِّر بتكفيره".
رواه ابن حبان في صحيحه (248) عن الحسن بن سفيان، حدثنا الحسن بن عمر بن شقيق، حدثنا سلمة بن الفضل، عن ابن إسحاق، عن عاصم بن عمر بن قتادة، عن محمود بن لبيد، عن أبي سعيد، فذكر الحديث.
وابن إسحاق مدلّس وقد عنعن، ولم أقف على تصريح منه بالتحديث.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি কোনো মুসলমান অন্য কোনো মুসলমানকে কাফির বলে, তবে যদি সে (অভিযুক্ত ব্যক্তি) কাফির হয়ে থাকে (তবে ঠিক), অন্যথায় (অভিযোগকারী) নিজেই কাফির হয়ে যাবে।”
193 - عن أبي ذر، أنه سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"ليس من رجل ادّعى لغير أبيه -وهو يعلمه- إلَّا كفر، ومن ادّعى قومًا ليس له فيهم فليتبوأ مقعده من النار".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3508)، ومسلم في الإيمان (61) كلاهما من حديث عبد الوارث، عن حسين المعلم، عن عبد اللَّه بن بريدة، قال: حدثني يحيى بن يعمر، أنّ أبا الأسود الدّيليّ حدّثه عن أبي ذر، فذكر الحديث، ولفظهما سواء، وزاد مسلم:"ومن دعا رجلًا بالكفر، أو قال: عدو اللَّه وليس كذلك، إِلَّا حار عليه".
وقوله:"حار عليه" أي باء ورجع.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি জেনে-শুনেও নিজের পিতাকে বাদ দিয়ে অন্য কারো সন্তান বলে দাবি করে, সে কুফরি করল। আর যে ব্যক্তি এমন কোনো গোষ্ঠীর সাথে নিজেকে যুক্ত করে, যাদের সাথে তার কোনো সম্পর্ক নেই, সে যেন জাহান্নামে নিজের আবাসস্থল বানিয়ে নেয়।"
"এবং যে ব্যক্তি অন্য কাউকে কাফির বলে ডাকে, অথবা আল্লাহর শত্রু বলে, অথচ সে তা নয়, তবে ওই কথা তার নিজের উপরই বর্তায়।"
194 - عن سعد بن أبي وقاص يقول: سمع أُذناي من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو يقول:"من ادّعى أبًا في الإسلام غير أبيه، يعلم أنّه غير أبيه، فالجنّة عليه حرام".
متفق عليه: رواه مسلم في الإيمان (63) عن عمرو الناقد، حدثنا هشيم بن بشير، أخبرنا خالد الحذّاء، عن أبي عثمان، قال: لما ادُّعِي زياد، لقيتُ أبا بكرة فقلت له: ما هذا الذي صنعتُم؟ إني سمعت سعد بن أبي وقّاص يقول (فذكره). فقال أبو بكرة: وأنا سمعتُه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
ورواه البخاريّ في الفرائض (6766) من وجه آخر عن خالد، بإسناده مختصرًا.
وأما قول أبي عثمان: لما ادُّعِي زياد لقيتُ أبا بكرة، فقلت له: ما هذا الذي صنعتم، إني سمعتُ سعد بن أبي وقاص يقول: سمع أذناي من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو يقول:"من ادّعَى أبًا في الإسلام غير أبيه فالجنة عليه حرام"، فقال أبو بكرة: أنا سمعتُه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فمعنى هذا الكلام الإنكار على أبي بكرة، وذلك أن زيادًا المذكور هو المعروف بزياد بن أبي سفيان، ويقال فيه: زياد بن أبيه، ويقال: زياد بن أمّه، وهو أخو أبي بكرة لأمّه، وكان يُعرف بزياد بن عبيد الثقفيّ، ثم ادّعاه معاوية بن أبي سفيان وألحقه بأبيه أبي سفيان، وصار من جملة أصحابه بعد أن كان من أصحاب عليّ بن أبي طالب رضي الله عنه، فلهذا قال أبو عثمان لأبي بكرة: ما هذا الذي صنعتم أي ما هذا الذي جرى من أخيك ما أقبحه وأعظم عقوبته! فإنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم حرّم على فاعله الجنة. وقوله:"ادُّعي" ضبطناه بضم الدال وكسر العين مبني لما لم يسم فاعله، أي ادّعاه معاوية، ووجد بخطّ الحافظ أبي عامر العبدريّ:
"ادَّعَى" بفتح الدال والعين، على أنّ زيادًا هو الفاعل، وهذا له وجه من حيث إنّ معاوية ادّعاه وصدّقه زياد، فصار زيادٌ مدعيًا أنه ابن أبي سفيان، واللَّه أعلم". قاله النوويّ في شرح مسلم.
সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার দুই কান রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছে: "যে ব্যক্তি ইসলামে নিজের পিতা ব্যতীত অন্য কাউকে পিতা বলে দাবি করে, অথচ সে জানে যে সে তার পিতা নয়, তবে তার জন্য জান্নাত হারাম।"
195 - عن سعد بن أبي وقاص، وأبي بكرة كلاهما يقول: سمعتُه أُذناي ورعاه قلبي، أنّ محمّدًا صلى الله عليه وسلم يقول:"من ادَّعى إلى غير أبيه وهو يعلم أنه غير أبيه، فالجنّة عليه حرام".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4326)، ومسلم في الإيمان (63) كلاهما من حديث عاصم قال: سمعتُ أبا عثمان قال: سمعتُ سعدًا وأبا بكرة كلاهما يقول (فذكر الحديث).
সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস এবং আবু বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়েই বলেন: আমার দুই কান তা শুনেছে এবং আমার অন্তর তা ধারণ করেছে, যে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার পিতাকে ব্যতীত অন্য কারও বংশের দাবি করে, আর সে জানে যে সে তার পিতা নয়, তবে তার জন্য জান্নাত হারাম।"
196 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا ترغبوا عن آبائكم، فمن رغب عن أبيه فهو كفر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الفرائض (6768)، ومسلم في الإيمان (62) كلاهما من حديث ابن وهب، أخبرني عمرو، عن جعفر بن ربيعة، عن عراك بن مالك، عن أبي هريرة. . . فذكره، ولفظهما سواء.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমরা তোমাদের পিতাদের (বংশ পরিচয়) অস্বীকার করো না। কারণ, যে ব্যক্তি তার পিতাকে অস্বীকার করলো, সে কুফরি করলো।”
197 - عن جرير، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أيّما عبد أبق برئتْ منه الذّمة".
وفي رواية:"إذا أبق العبد لم تقبلْ له صلاة".
وفي رواية:"أيّما عبد أبق من مواليه فقد كفر حتى يرجع إليهم".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (69)، الروايات الثلاثة من طرق عن الشعبي عن جرير. ولكن قال الشعبي في الرواية الثالثة: قد واللَّه رُوي عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، ولكني أكره أن يُروى عني ههنا بالبصرة.
ومعناه:"أن منصورًا روي هذا الحديث عن الشعبيّ، عن جرير موقوفًا عليه. ثم قال منصور بعد روايته إياه موقوفًا: واللَّه إنّه مرفوع إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فاعلموه أيّها الخواص الحاضرون، فإنّي أكره أن أصرِّح برفعه في لفظ روايتي، فيشيع عني في البصرة التي هي مملوءة من المعتزلة والخوارج الذين يقولون بتخليد أهل المعاصي في النار. والخوارج يزيدون على التخليد فيحكمون بكفره، ولهم شبهة التعلّق بظاهر هذا الحديث". قاله النووي في شرح مسلم.
وقال ابن الصلاح في صيانة صحيح مسلم (ص 343):"قول منصور بن عبد الرحمن الراوي الحديث جرير:"أكره أن يُروى عنّي هاهنا بالبصرة" كان سببه ما كان قد نبغ بالبصرة من المعتزلة ونحوهم كلا يحتجوا به على قولهم في أصحاب الكبائر.
وقوله في رواية أخرى:"إذا أبق العبد لم تقبل له صلاة" لا يلزم من عدم القبول عدم الصّحة، بل قد تثبتُ الصّحة مع عدم القبول أي يسقط عنه القضاء، فهو لا يعاقب عقوبة تارك الصلاة، ولكنه يحرم من الثواب الذي أعدّه اللَّه للمصلين.
منصور بن عبد الرحمن خمسة. وهذا واحد منهم وهو: الفدانيّ الأشلّ البصريّ، وثّقه أحمد بن حنبل، ويحيى بن معين، وضعَّفه أبو حاتم والآخرون هم القرشيّ، والبرجميّ، والحجبيّ، ومنصور بن عبد الرحمن الذي حدّث عن الحسن البصريّ وعنه إبراهيم بن طهمان.
وأما ما رواه أبو داود (4360)، والنسائيّ (4057) من طريق أبي إسحاق، عن الشعبيّ، عن جرير مرفوعًا:"إذا أبق العبد إلى الشّرك فقد حَلَّ دمُه". فهو ضعيف لأجل أبي إسحاق فإنه مدلس وقد عنعن، كما أنه خالف أصحاب الشعبيّ في لفظ الحديث كما أنه اختلف عليه فمرة يروي عن الشعبيّ، عن جرير، وأخرى عن عامر، عن جرير. وأخرى عن جرير، بدون واسطة، فالظاهر أن أصحابه لم يضبطوا عنه.
জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো দাস পালিয়ে যায়, তার থেকে দায়িত্বভার মুক্ত হয়ে যায়।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যখন কোনো দাস (মনিব থেকে) পালিয়ে যায়, তখন তার সালাত কবুল হয় না।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যে কোনো দাস তার মনিবদের কাছ থেকে পালিয়ে যায়, সে যেন কুফরি করল, যতক্ষণ না সে তাদের কাছে ফিরে আসে।"
198 - عن عائشة قالت: سأل أناسٌ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم عن الكهان، فقال:"إنَّهم ليسوا بشيء"، فقالوا: يا رسول اللَّه فإنهم يحدثون بالشيء يكون حقًّا! قال: فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"تلك الكلمة من الحقّ يخطفها الجنيّ فيقرقرها في أذن وليه كقرقرة الدّجاجة، فيخلطون فيه أكثر من مائة كذبة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7561)، ومسلم في السلام (2228) كلاهما من حديث ابن شهاب، قال: أخبرني يحيى بن عروة بن الزبير، أنه سمع عروة بن الزبير يقول: قالت عائشة، فذكر الحديث، واللَّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, কিছু লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গণকদের (Kuhhān) ব্যাপারে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: "তাদের কোনো ভিত্তি নেই (অর্থাৎ তারা কিছুই নয়)।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তারা তো মাঝে মাঝে এমন কিছু কথা বলে যা সত্য হয়! নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওই সত্য কথাটি জিন ছিনিয়ে নেয় এবং সে (জিন) তার বন্ধুর কানে মুরগির ডাকার মতো শব্দ করে তা প্রবেশ করিয়ে দেয়। অতঃপর তারা (গণকরা) এর সাথে একশোটিরও বেশি মিথ্যা মিশিয়ে ফেলে।"
199 - عن * *
১৯৯ - * * থেকে বর্ণিত।
200 - عن أبي هريرة أنه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من مولود إِلَّا يولد على الفطرة، فأبواه يهودانه وينصرانه ويمجّسانه، كما تُنتج البهيمة بهيمةً جمعاء، هل تُحِسُّون فيها من جدعاء؟". ثم يقول أبو هريرة: واقرؤا إن شئتم: {فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ} [سورة الروم: 30].
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1359)، ومسلم في القدر (2658) كلاهما من حديث يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، أن أبا سلمة بن عبد الرحمن أخبره، أنّ أبا هريرة قال (فذكره).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রত্যেক সন্তানই ফিতরাতের (ইসলামের স্বভাবগত পবিত্রতার) উপর জন্মগ্রহণ করে। অতঃপর তার বাবা-মা তাকে ইয়াহুদী বানায়, বা খ্রিষ্টান বানায়, অথবা অগ্নিপূজক (মাজুসী) বানায়। যেমন চতুষ্পদ জন্তু একটি পূর্ণাঙ্গ জন্তু জন্ম দেয়। তোমরা কি তাতে কোনো কাটা (নাক, কান) দেখতে পাও?
এরপর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন, তোমরা যদি চাও তবে এই আয়াতটি পড়ো: (অর্থ) আল্লাহর সেই প্রকৃতি, যার ওপর তিনি মানবজাতিকে সৃষ্টি করেছেন। আল্লাহর সৃষ্টির কোনো পরিবর্তন নেই। এটাই সরল, সুপ্রতিষ্ঠিত ধর্ম। [সূরা রূম: ৩০]
201 - عن أنس بن مالك، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يقول اللَّه تعالى لأهون أهل النار عذابًا يوم القيامة: لو أنّ لك ما في الأرض من شيء أكنت تفتدي به؟ فيقول: نعم. فيقول: أردتُ منك أهون من هذا، وأنت في صُلب آدم: أن لا تُشرك بي شيئًا، فأبيتَ إِلَّا أن تشرك بي".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6557)، ومسلم في صفات المنافقين (2805) كلاهما
عن محمد بن بشّار: حدّثنا محمد بن جعفر غندر، حدثنا شعبة، عن أبي عمران، قال: سمعت أنس بن مالك، فذكره.
ورواه مسلم من وجه آخر عن معاذ بن معاذ العنبريّ، عن شعبة وفيه:"قد أردتُ منك أهون من هذا وأنت في صلب آدم، أن لا تشرك بي -أحسبه قال: ولا أُدخلك النار- فأبيتَ إِلَّا الشّرك".
وفي رواية عنده من وجه آخر:"سئلتَ ما هو أيسر من ذلك".
قوله:"قد أردت منك" أي أحببت منك، والإرادة في الشرع تطلق ويراد بها ما يعمّ الخير والشّر، والهدى والضلال، كما في قوله تعالى: {فَمَنْ يُرِدِ اللَّهُ أَنْ يَهْدِيَهُ يَشْرَحْ صَدْرَهُ لِلْإِسْلَامِ وَمَنْ يُرِدْ أَنْ يُضِلَّهُ يَجْعَلْ صَدْرَهُ ضَيِّقًا حَرَجًا كَأَنَّمَا يَصَّعَّدُ فِي السَّمَاءِ} [سورة الأنعام: 125]. وهذه الإرادة لا تتخلّف. وتطلق أحيانًا ويراد بها ما يرادف الحبّ والرّضا، كما في قوله تعالى: {شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنْزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدًى لِلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِنَ الْهُدَى وَالْفُرْقَانِ فَمَنْ شَهِدَ مِنْكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ وَمَنْ كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَى سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ يُرِيدُ اللَّهُ بِكُمُ الْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ الْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا الْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَى مَا هَدَاكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ} [سورة البقرة: 185]، وهذا المعنى هو المراد من قوله تعالى في هذا الحديث:"أردتُ منك" أي أحببتُ، والإرادة بهذا المعنى قد تخلف، لأن اللَّه تبارك وتعالى لا يجبر أحدًا على طاعته -وإن كان خلقهم من أجلها-: {فَمَنْ شَاءَ فَلْيُؤْمِنْ وَمَنْ شَاءَ فَلْيَكْفُرْ} [سورة الكهف: 29]، وعليه فقد يريد اللَّه تبارك وتعالى من عبده ما لا يحبه منه، ويحب منه ما لا يريده، وهذه الإرادة يسميها ابن القيم رحمه اللَّه تعالى بالإرادة الكونيّة أخذًا من قوله تعالى: {إِنَّمَا أَمْرُهُ إِذَا أَرَادَ شَيْئًا أَنْ يَقُولَ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ} [سورة يس: 82]، ويسمي الإرادة الأخرى المرادفة للرّضا بالإرادة الشّرعية.
وقوله:"وأنت في صلب آدم" قال القاضي عياض:"يشير بذلك إلى قوله تعالى: {وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ} الآية [الأعراف: 172]، فهذا الميثاق الذي أُخذ عليهم في صلب آدم، فمن وفي به بعد وجوده في الدنيا فهو مؤمن، ومن لم يوف به فهو كافر، فمراد الحديث: أردتُ منك حين أخذت الميثاق، فأبيت إذ أخرجتك إلى الدنيا إِلَّا الشّرك" ذكره في الفتح". انظر: السلسلة الصحيحة (1/ 123 - 124).
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাআলা জাহান্নামের সবচেয়ে কম শাস্তিপ্ৰাপ্ত ব্যক্তিকে বলবেন: যদি পৃথিবীতে যা কিছু আছে, তা তোমার সব থাকত, তবে কি তুমি এর বিনিময়ে (আজাব থেকে) মুক্তি পেতে চাইতে? সে বলবে: হ্যাঁ। আল্লাহ বলবেন: তুমি যখন আদমের পৃষ্ঠদেশে ছিলে, তখন আমি তোমার কাছে এর চেয়েও সহজ একটি বিষয় চেয়েছিলাম— তা হলো তুমি আমার সাথে কোনো কিছুকে শরিক করবে না। কিন্তু তুমি শিরক করা ছাড়া অন্য কিছু করতে অস্বীকার করেছিলে।
202 - عن هشام بن حكيم: أنّ رجلًا أتى النّبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه، أنبتدئ الأعمال أم قُضي القضاء؟ فقال رسول صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه عز وجل أخذ ذرية آدم من ظهره، وأشهدهم على أنفسهم، ثم أفاض بهم في كفيه فقال: هؤلاء للجنة، وهؤلاء للنّار، فأهل الجنة ميسّرون لعمل أهل الجنة، وأهل النّار ميسّرون لعمل أهل النّار".
حسن: رواه الفريابي في القدر (22) وعنه الآجري في الشريعة (330)، وابن أبي عاصم في السنة (168) كلهم من حديث عمرو بن عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار الحمصيّ، حدثنا بقية بن
الوليد، حدثنا الزبيديّ، حدثني راشد بن سعد، عن عبد الرحمن بن قتادة النّصيريّ، عن هشام بن حكيم، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن عثمان فإنه"صدوق"، وبقية رجاله ثقات.
وبقية مدلّس، ولكنّه صرّح بالتحديث وقد توبع أيضًا، فرواه الفريابي (24) من وجه آخر عن راشد بن سعد بإسناده مثله، وسيأتي مزيد من التحقيق في كتاب القدر.
হিশাম ইবন হাকীম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে জিজ্ঞেস করল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কি আমল নতুনভাবে শুরু করব, নাকি তাকদীর চূড়ান্ত হয়ে গেছে?’ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘আল্লাহ তাআলা আদম (আঃ)-এর পিঠ থেকে তাঁর বংশধরদের বের করে নেন এবং তাদের নিজেদের সম্পর্কে সাক্ষ্য গ্রহণ করেন। অতঃপর তিনি তাদেরকে তাঁর উভয় হাতের মধ্যে ছড়িয়ে দেন এবং বলেন: ‘এরা জান্নাতের জন্য, আর এরা জাহান্নামের জন্য। সুতরাং জান্নাতবাসীদের জন্য জান্নাতবাসীদের আমল সহজসাধ্য করা হয়েছে, আর জাহান্নামবাসীদের জন্য জাহান্নামবাসীদের আমল সহজসাধ্য করা হয়েছে।’
203 - عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أخذ اللَّه الميثاق من ظهر آدم بنَعمان -يعني عرفة- فأخرج من صلبه كل ذريّة ذرأها، فنثرهم بين يديه كالذّر، ثم كلَّمهم قبلًا، قال: {وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى شَهِدْنَا أَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَذَا غَافِلِينَ (172) أَوْ تَقُولُوا إِنَّمَا أَشْرَكَ آبَاؤُنَا مِنْ قَبْلُ وَكُنَّا ذُرِّيَّةً مِنْ بَعْدِهِمْ أَفَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ الْمُبْطِلُونَ} [سورة الأعراف: 172 - 173]".
حسن: رواه الإمام أحمد (2455)، وابن أبي عاصم في السنة (202)، والبيهقي في الأسماء والصفات (714)، وفي كتاب القدر (1/ 267)، وابن منده في الرّد على الجهمية (29)، والحاكم (2/ 544) كلّهم من طرق عن حسين بن محمد المروزيّ، حدثنا جرير -يعني ابن حازم-، عن كلثوم بن جبر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره، واللَّفظ لأحمد.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وتابعه وهب بن جرير، عن أبيه على رفعه، ومن طريقه أخرجه الحاكم (1/ 27)، وعنه البيهقي في الأسماء والصفات (441) وقال الحاكم:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه، وقد احتجّ مسلم بكلثوم بن جبر".
قلت: وهو كما قالا، إِلَّا أن كلثوم بن جبر وإن كان من رجال مسلم، وثقه أحمد وابن معين وابن سعد وغيرهم، وتكلّم فيه النسائيّ غير أنه حسن الحديث.
إِلَّا أن الحديث اختلف في رفعه ووقفه، فرواه مرفوعًا حسين بن محمد المروذيّ، ووهب بن جرير، كلاهما عن جرير بن حازم، كما رأيت.
ورواه عبد الوارث عند الطبري في تفسيره (10/ 547)، عن كلثوم بن جبر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فوقَّفه.
وكذا رواه إسماعيل ابن عليّة، ووكيع، عند الطبري في تفسيره (10/ 548، 550) كلاهما عن ربيعة بن كلثوم بن جبر، عن أبيه، به.
وكذا رواه عطاء بن السّائب، وحبيب بن أبي ثابت، وعلي بن بذيمة، عند الطبري (10/ 548 - 551) وابن أبي حاتم في تفسيره (5/ 1613) كلهم عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس قوله.
وكذا رواه عليّ بن أبي طلحة، عند ابن أبي حاتم في تفسيره (5/ 1614) وأبو جمرة عند الطبري (10/ 550) والعوفيّ، كلهم عن ابن عباس.
قال ابنُ كثير في تفسير هذه الآية:"فهذا أكثر وأثبت" انتهى قوله.
قلت: وهو كما قال رحمه اللَّه تعالى، فإن أحدًا لا يشك في ترجيح وقفه من حيث الإسناد فمن الممكن أنه كان يوقف مرة، ويرفع أخرى ولكن الرّفع زيادة.
والثانية: أن مثل هذا لا يقال بالرّأي.
والثالثة: أنه من تفسير الصحابي، وما كان كذلك فهو في حكم الرفع، ولذا يخرّج الحاكم تفاسير الصحابة في المستدرك ويجعله على شرط الكتاب. انظر: (1/ 55).
والرابعة: إنّ هذا التفسير له شواهد كثيرة من الصّحابة الآخرين كما قال الحافظ ابن عبد البر في التمهيد (6/ 3) عند شرحه لحديث عمر بن الخطّاب سئل عن قوله تعالى: {وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ} [سورة الأعراف: 172] فقال عمر: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سئل عنها فقال: (فذكر الحديث) قال: ليس إسناده بالقائم. . . ولكن معنى هذا الحديث قد صحَّ عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في وجوه كثيرة ثابتة يطول ذكرها".
قلت: حديث عمر بن الخطّاب هذا وغيره سيأتي تخريجه المفصّل في كتاب القدر - باب أحاديث القبضتين كما ذكر الحافظ ابن كثير في تفسيره، والسيوطي في الدر المنثور، والشوكاني في تفسيره فتح القدير (2/ 251 - 252) كثيرًا من الآثار الموقوفة والأحاديث المرفوعة في معناه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা নু’মান নামক স্থানে (অর্থাৎ আরাফাতে) আদম (আঃ)-এর পিঠ থেকে অঙ্গীকার গ্রহণ করেন। এরপর তিনি তাঁর (আদম আঃ-এর) মেরুদণ্ড থেকে সেই সকল সন্তান-সন্ততিকে বের করেন যাদের তিনি সৃষ্টি করেছেন। অতঃপর তিনি তাদের তাঁর সামনে ক্ষুদ্র কণার মতো ছড়িয়ে দেন। অতঃপর তিনি সরাসরি তাদের সাথে কথা বলেন এবং বলেন: {আর যখন তোমার প্রতিপালক বনী আদমের পৃষ্ঠদেশ থেকে তাদের সন্তান-সন্ততিকে বের করলেন এবং তাদের নিজেদের সম্পর্কে স্বীকারোক্তি নিলেন যে, ‘আমি কি তোমাদের প্রতিপালক নই?’ তারা বলল, ‘হ্যাঁ, আমরা সাক্ষ্য দিলাম।’ [এর কারণ এই] যাতে তোমরা কিয়ামতের দিন না বলতে পারো যে, আমরা এ বিষয়ে অজ্ঞ ছিলাম। অথবা তোমরা না বলতে পারো যে, আমাদের পূর্বপুরুষরা পূর্বে শির্ক করেছিল এবং আমরা ছিলাম তাদের পরবর্তী বংশধর। তাই যারা বাতিল কাজ করেছে, তাদের কৃতকর্মের জন্য কি আপনি আমাদের ধ্বংস করবেন?} [সূরা আল-আ'রাফ: ১৭২-১৭৩]
204 - عن أبي بن كعب رضي الله عنه في قول اللَّه تعالى: {وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى شَهِدْنَا أَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَذَا غَافِلِينَ (172) أَوْ تَقُولُوا إِنَّمَا أَشْرَكَ آبَاؤُنَا مِنْ قَبْلُ وَكُنَّا ذُرِّيَّةً مِنْ بَعْدِهِمْ أَفَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ الْمُبْطِلُونَ} [سورة الأعراف: 172، 173] قال:"جمعه له يومئذ جميعًا ما هو كائن منه إلى يوم القيامة، فجعلهم أرواحًا ثم صوَّرهم، ثم استنطقهم وتكلَّموا، وأخذ عليهم العهد والميثاق {وَأَشْهَدَهُمْ عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى شَهِدْنَا أَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَذَا غَافِلِينَ (172) أَوْ تَقُولُوا إِنَّمَا أَشْرَكَ آبَاؤُنَا مِنْ قَبْلُ وَكُنَّا ذُرِّيَّةً مِنْ بَعْدِهِمْ أَفَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ الْمُبْطِلُونَ} قال: فإني أشهد عليكم السموات السبع، والأرضين السبع، وأشهد عليكم أباكم آدم أن تقولوا يوم القيامة: لم نعلم بهذا، اعلموا أن لا إله غيري ولا ربّ غيري، ولا تشركوا بي شيئًا، وأني سأرسل لكم رسلًا ينذرونكم عهدي وميثاقي، وأنزل عليكم كتبي قالوا: نشهد أنَّك ربّنا وإلهنا لا ربّ لنا غيرك، ولا إله لنا غيرك، فأقرّوا له يومئذ بالطّاعة، ورفع أباهم آدم إليهم فرأى فيهم الغني
والفقير، وحسَنَ الصورةِ ودون ذلك، فقال: يا ربّ، لو سويت بين عبادك؟ قال: إني أحببتُ أن أشكر، وأري فيهم الأنبياء مثل السرج عليه النور، وخصوا بميثاق آخر من الرسالة والنبوة فهو الذي يقول تعالى: {وَإِذْ أَخَذْنَا مِنَ النَّبِيِّينَ مِيثَاقَهُمْ وَمِنْكَ وَمِنْ نُوحٍ وَإِبْرَاهِيمَ وَمُوسَى وَعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ وَأَخَذْنَا مِنْهُمْ مِيثَاقًا غَلِيظًا} [سورة الأحزاب: 7]، وهو الذي يقول: {فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًا فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ} [سورة الروم: 30]، وفي ذلك قال: {هَذَا نَذِيرٌ مِنَ النُّذُرِ الْأُولَى} [سورة النجم: 56]، وفي ذلك قال: {وَمَا وَجَدْنَا لِأَكْثَرِهِمْ مِنْ عَهْدٍ وَإِنْ وَجَدْنَا أَكْثَرَهُمْ لَفَاسِقِينَ} [سورة الأعراف: 102]".
حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (5/ 1615)، وابن جرير الطبريّ في تفسيره (10/ 557)، والحاكم (2/ 323)، والضّياء في المختارة (1159) كلّهم من طرق عن أبي جعفر عيسي بن عبد اللَّه ابن ماهان، عن الرّبيع بن أنس، عن أبي العالية رُفيع، عن أُبيّ بن كعب من قوله.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: الربيع بن أنس لم يبلغ درجة الثقة، ولكنه حسن الحديث.
وفي الباب ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"إنّ اللَّه تبارك وتعالى لما خلق آدم مسح ظهره، فخرجت منه كلّ نسمة هو خالقها إلى يوم القيامة، ونزع ضلعًا من أضلاعه فخلق منه حواء، ثم أخذ عليهم العهد {أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى شَهِدْنَا أَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَذَا غَافِلِينَ} [سورة الأعراف: 172]". فذكر الحديث بطوله، وفيه قصة منح آدم أربعين سنة من عمره لداود. فهو ضعيف.
رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (5/ 1614) عن العباس بن الوليد بن مزيد البيروتيّ قراءة، ثنا محمد بن شعيب، أخبرني عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه زيد بن أسلم، أنه حدثه عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وعبد الرحمن بن زيد بن أسلم ضعيف.
والحديث حسن بدون الإشهاد، وسيأتي في كتاب القدر.
وكذلك في الباب أيضًا ما روي عن أبي أمامة مرفوعًا:"لما خلق اللَّه الخلق، وقضى القضية، أخذ أهل اليمين بيمينه، وأهل الشّمال بشماله، فقال: يا أصحاب اليمين، فقالوا: لبيك وسعديك، قال: ألستُ بربِّكم؟ قالوا: بلى. قال: يا أصحاب الشّمال، قالوا: لبيك وسعديك. قال: ألستُ بربِّكم؟ قالوا: بلى، ثم خلط بينهم، فقال قائلٌ: يا ربّ لم خلطت بينهم؟ قال: لهم أعمال من دون ذلك هم لها عاملون، أن يقولوا يوم القيامة: إنَّا كنَّا عن هذا غافلين، ثم ردَّهم في صلب آدم".
وإسناده ضعيف، رواه ابن مردويه كما قال ابن كثير من طريق جعفر بن الزبير، عن القاسم، عن أبي
أُمامة، فذكر مثله.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا الطبراني في الكبير (8/ 287) مع اختلاف في بعض الألفاظ والسّياق.
قال ابن كثير: جعفر بن الزبير ضعيف، ولكن تابعه بشر بن نمير وهو أضعف منه، ومن طريقه رواه أبو الشيخ في العظمة (328).
والخلاصة أن حديث أبي أمامة ضعيف.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী— {যখন আপনার রব আদম-সন্তানদের পৃষ্ঠদেশ থেকে তাদের বংশধরদের বের করে নিলেন এবং তাদের নিজেদের উপর সাক্ষী করলেন—'আমি কি তোমাদের রব নই?' তারা বলল, 'হ্যাঁ, আমরা সাক্ষ্য দিলাম।...' [সূরা আরাফ: ১৭২, ১৭৩]} —এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন: সেদিন আল্লাহ তাআলা তাদের সকলকে—কেয়ামত পর্যন্ত যা কিছু তাদের থেকে হবে—একত্রিত করলেন। অতঃপর তাদের রূহ বা আত্মা বানালেন, এরপর তাদের আকৃতি দিলেন, এরপর তাদের কথা বলার ক্ষমতা দিলেন এবং তারা কথা বলল। আল্লাহ তাদের কাছ থেকে অঙ্গীকার ও চুক্তি নিলেন। আর {তাদের নিজেদের উপর সাক্ষী করলেন—'আমি কি তোমাদের রব নই?' তারা বলল, 'হ্যাঁ, আমরা সাক্ষ্য দিলাম।' যেন তোমরা কিয়ামতের দিন বলতে না পারো যে, 'আমরা তো এ বিষয়ে গাফেল ছিলাম।' অথবা তোমরা যেন বলতে না পারো যে, 'আসলে আমাদের পূর্বপুরুষরাই শিরক করেছিল এবং আমরা ছিলাম তাদের পরবর্তী বংশধর। সুতরাং বাতিলপন্থীরা যা করেছে, তার জন্য কি আপনি আমাদের ধ্বংস করবেন?'}
(আল্লাহ) বললেন: "আমি তোমাদের উপর সপ্ত আকাশ ও সপ্ত পৃথিবীকে সাক্ষী রাখছি, আর তোমাদের পিতা আদমকেও সাক্ষী রাখছি—যেন তোমরা কিয়ামতের দিন বলতে না পারো যে, আমরা এ বিষয়ে জানতাম না। তোমরা জেনে রাখো যে, আমি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি ছাড়া কোনো রব নেই। তোমরা আমার সাথে কাউকে শরীক করবে না। আর আমি তোমাদের কাছে এমন রাসূলগণ পাঠাবো, যারা আমার এই চুক্তি ও অঙ্গীকার সম্পর্কে তোমাদের সতর্ক করবে এবং আমি তোমাদের উপর আমার কিতাবসমূহ নাযিল করবো।"
তারা বলল, "আমরা সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনিই আমাদের রব এবং আমাদের ইলাহ। আপনি ছাড়া আমাদের কোনো রব নেই, এবং আপনি ছাড়া আমাদের কোনো ইলাহ নেই।" অতঃপর তারা সেদিন তাঁর আনুগত্যের স্বীকারোক্তি করল।
আর তাদের পিতা আদমকে তাদের সামনে উঁচু করে ধরা হলো। তিনি তাদের মাঝে দেখলেন ধনী ও দরিদ্র, সুশ্রী আকৃতিবিশিষ্ট এবং তার চেয়ে কম সুশ্রীদের। তিনি বললেন, "হে আমার রব, আপনি যদি আপনার বান্দাদের মধ্যে সমতা আনতেন?" আল্লাহ বললেন, "আমি পছন্দ করি যেন (আমাকে) শুকরিয়া জ্ঞাপন করা হয়।"
এবং তিনি (আদম) তাদের মধ্যে নবীদের দেখলেন, তারা প্রদীপের মতো, তাদের ওপর ছিল আলো। তাদেরকে নবুওয়াত ও রিসালাতের জন্য অন্য একটি বিশেষ অঙ্গীকার দ্বারা ভূষিত করা হয়েছিল। আর এটিই সেই (অঙ্গীকার) যার ব্যাপারে আল্লাহ তাআলা বলেন: {এবং যখন আমি নবীগণের কাছ থেকে তাদের অঙ্গীকার গ্রহণ করলাম—আপনার কাছ থেকেও, আর নূহ, ইব্রাহীম, মূসা ও মারইয়াম-পুত্র ঈসার কাছ থেকেও—এবং তাদের কাছ থেকে গ্রহণ করলাম সুদৃঢ় অঙ্গীকার} [সূরা আল-আহযাব: ৭]।
আর এটিই সেই (বিষয়) যার ব্যাপারে আল্লাহ বলেন: {তুমি একনিষ্ঠভাবে দ্বীনের উপর প্রতিষ্ঠিত হও—আল্লাহর প্রকৃতি, যার উপর তিনি মানবজাতিকে সৃষ্টি করেছেন। আল্লাহর সৃষ্টির কোনো পরিবর্তন নেই।} [সূরা আর-রূম: ৩০]। আর এই বিষয়েই তিনি বলেছেন: {এটি প্রথম সতর্ককারীগণের মধ্য থেকে একজন সতর্ককারী} [সূরা আন-নাজম: ৫৬]। আর এই বিষয়েই তিনি বলেছেন: {আর তাদের অধিকাংশের মধ্যে আমরা অঙ্গীকারের কোনো (বাস্তব রূপ) পাইনি; বরং তাদের অধিকাংশই ছিল ফাসিক (অবাধ্য)।} [সূরা আল-আ'রাফ: ১০২]।
205 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يأتي الشّيطانُ أحدَكم فيقول: من خلق كذا؟ من خلق كذا؟ حتى يقول: من خلق ربَّك؟ فإذا بلغه فليستعِذْ باللَّه ولينتهِ".
وفي رواية:"فليقُل: آمنتُ باللَّه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3276)، ومسلم في الإيمان (134/. . .) كلاهما من حديث الليث بن سعد، قال: حدثني عُقيل بن خالد، قال: قال ابن شهاب، أخبرني عروة بن الزبير، قال: قال أبو هريرة (فذكر الحديث)، واللّفظ للبخاريّ.
وأمّا مسلمٌ فأحال على حديث ابن أخي ابن شهاب، عن عمّه، قال: أخبرني عروةُ بن الزّبير، فذكر مثله.
والرّواية الثانية عند مسلم من طريق سفيان، عن هشام، عن أبيه.
ورواه أيضًا مسلمٌ من حديث محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، وفيه:"لا يزالُ النّاسُ يسألونكم عن العلم حتى يقولوا: هذا اللَّه خلقنا، فمن خلق اللَّه؟" قال: وهو آخذ بيد رجل، فقال: صدق اللَّهُ ورسولُه، قد سألني اثنان وهذا الثالث، أو قال: سألني واحد، وهذا الثاني.
وفي رواية يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا
يزالون يسألونك يا أبا هريرة حتى يقولوا: هذا اللَّه، فمن خلق اللَّه؟" قال: فبينما أنا في المسجد إذ جاءني ناسٌ من الأعراب، فقالوا: يا أبا هريرة، هذا اللَّه فمن خلق اللَّه؟ قال: فأخذ حصي بكفّه فرماهم. قال: قوموا، قوموا، صدق خليلي".
ورواه عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:
"لا يزالون يسألون حتى يقال: هذا اللَّه خلقنا، فمن خلق اللَّه عز وجل". قال: فقال أبو هريرة: فواللَّه إنِّي لجالس يومًا إذ قال لي رجلٌ من أهل العراق: هذا اللَّه خلقنا، فمن خلق اللَّه عز وجل؟ قال أبو هريرة: فجعلتُ إصْبعَيّ في أُذُنِيّ ثم صِحْتُ، فقلتُ: صدق اللَّه ورسولُه، اللَّه الواحد الصّمد، لم يلد ولم يولد، ولم يكن له كفوًا أحد".
رواه الإمام أحمد (9027) عن عفّان، حدثنا أبو عوانة، عن عمر بن أبي سلمة، فذكره.
وإسناده حسن، للكلام في عمر بن أبي سلمة، غير أنه حسن الحديث.
ورواه عتبة بن مسلم مولى بني تميم عن أبي سلمة، عن أبي هريرة وزاد فيه:"ثم ليتفُل عن يساره، وليستعذ باللَّه من الشَّيطان".
رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (653) عن محمد بن منصور الطّوسيّ، ثنا يعقوب بن إبراهيم، ثنا أبيّ، عن ابن إسحاق، حدثني عتبة بن مسلم، فذكره غير أنه لم يذكر فيه قصة رجل من أهل العراق.
وعتبة بن مسلم هو المدني التّيميّ مولاهم، ثقة من رجال الصّحيحين.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কারো কাছে শয়তান এসে বলতে থাকে: কে এটা সৃষ্টি করেছে? কে ওটা সৃষ্টি করেছে? অবশেষে সে বলতে থাকে: তোমার রবকে কে সৃষ্টি করেছে? যখন তার মনে এই প্রশ্ন উদয় হবে, তখন সে যেন আল্লাহর কাছে আশ্রয় চায় এবং (এই চিন্তা থেকে) বিরত থাকে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "সে যেন বলে: আমি আল্লাহর প্রতি ঈমান আনলাম।"
অন্য এক বর্ণনায় (মুহাম্মদ ইবনে সিরীনের সূত্রে) আছে: "মানুষ তোমাদেরকে জ্ঞান সম্পর্কে প্রশ্ন করতে থাকবে, অবশেষে তারা বলবে: এই আল্লাহ্ই আমাদের সৃষ্টি করেছেন, তাহলে আল্লাহকে কে সৃষ্টি করেছে?" বর্ণনাকারী বলেন, রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন এক ব্যক্তির হাত ধরে ছিলেন। তিনি বললেন: আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন। দুইজন ব্যক্তি আমাকে এ প্রশ্ন করেছিল, আর এই হল তৃতীয়জন। অথবা তিনি বললেন: একজন ব্যক্তি আমাকে প্রশ্ন করেছিল, আর এই হল দ্বিতীয়জন।
অন্য বর্ণনায় (ইয়াহইয়া বিন আবি কাসীরের সূত্রে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "হে আবু হুরায়রা! তারা তোমাকে প্রশ্ন করতে থাকবে, অবশেষে তারা বলবে: এই আল্লাহ, তাহলে আল্লাহকে কে সৃষ্টি করেছে?" আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি মসজিদে ছিলাম, এমন সময় আরবের কিছু লোক এসে আমাকে বলল: হে আবু হুরায়রা! এই আল্লাহ, তাহলে আল্লাহকে কে সৃষ্টি করেছে? তিনি তখন হাতের মুঠোয় পাথর নিলেন এবং তাদের দিকে ছুঁড়ে মারলেন। তিনি বললেন: তোমরা উঠে যাও, উঠে যাও! আমার খলিল (বন্ধু) সত্য বলেছেন।
অন্য বর্ণনায় (উমার ইবনে আবি সালামার সূত্রে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষ প্রশ্ন করতে থাকবে, অবশেষে বলা হবে: এই আল্লাহ্ আমাদেরকে সৃষ্টি করেছেন, তাহলে মহান আল্লাহকে কে সৃষ্টি করেছে?" আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! আমি একদিন বসে ছিলাম, তখন ইরাকের এক লোক এসে আমাকে বলল: এই আল্লাহ্ আমাদেরকে সৃষ্টি করেছেন, তাহলে মহান আল্লাহকে কে সৃষ্টি করেছে? আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি আমার দুই কানে আঙ্গুল ঢুকিয়ে দিলাম এবং চিৎকার করে বললাম: আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূল সত্য বলেছেন। আল্লাহ্ একক, তিনি অভাবমুক্ত (নিরাশ্রয়)। তিনি কাউকে জন্ম দেননি এবং তাঁকেও জন্ম দেওয়া হয়নি। আর তাঁর সমকক্ষ কেউ নেই।
উতবা ইবনে মুসলিমের বর্ণনায় অতিরিক্ত রয়েছে: "তারপর সে যেন তার বাম দিকে থুথু ফেলে এবং শয়তান থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করে।"
206 - عن أنس بن مالك يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لن يبْرحَ النّاسُ يتساءلون حتى يقولوا: هذا اللَّهُ خالقُ كلِّ شيءٍ، فمن خلق اللَّه؟".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الاعتصام بالكتاب والسنة (7296) عن الحسن بن صبّاح، حدثنا شبابة، حدثنا ورقاءُ، عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن، سمعت أنس بن مالك، فذكر الحديث.
ورواه مسلم في الإيمان (136) من وجه آخر عن مختار بن فُلْفُل، عن أنس، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"قال اللَّه عز وجل: إنّ أمّتَك لا يزالون يقولون: ما كذا؟ ما كذا؟ حتى يقولوا: هذا اللَّهُ خلق الخلق، فمن خلق اللَّه؟".
وفي رواية لم يذكر:"قال اللَّه: إنّ أمّتك".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষ প্রশ্ন করতে থাকা বন্ধ করবে না, যতক্ষণ না তারা বলে: এই তো আল্লাহ, যিনি সবকিছুর সৃষ্টিকর্তা, তাহলে আল্লাহকে কে সৃষ্টি করেছেন?"
207 - عن عائشة، أنّ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ أحدكم يأتيه الشّيطانُ فيقول: من خلقك؟ فيقول: اللَّه، فيقول: فمن خلق اللَّهَ؟ فإذا وجد ذلك أحدُكم فليقْرأْ: آمنتُ باللَّه ورسله، فإنَّ ذلك يُذهب عنه".
صحيح: رواه الإمام أحمد (26203)، والبزَّار -كشف الأستار (50) -، وأبو يعلى (4704)
كلّهم من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة.
وصحّحه ابن حبان (150)، ورواه من هذا الوجه ولفظه:"لن يدع الشّيطان أن يأتي أحدَكم فيقول: من خلق السموات والأرض؟ فيقول: اللَّه، فيقول: فمن خلقك؟ فيقول: اللَّه، فيقول: فمن خلق اللَّه، فإذا حسَّ أحدكم بذلك" فذكر بقية الحديث.
هكذا رواه عدد منهم الضّحّاك بن عثمان الحزاميّ، وعبد اللَّه بن الأجلح، وإسماعيل بن عياش، ومروان بن معاوية، وسفيان الثوريّ، وليث بن سالم وغيرهم كما ذكره الدارقطنيّ، كلهم عن هشام ابن عروة عن أبيه، عن عائشة.
قال البزّار: وهذا رواه غير واحد عن هشام، عن أبيه، عن أبي هريرة، وغير واحد عن عائشة منهم أبو صالح" انتهى.
قلت: لعلّه قصد بذلك الرد على أبي زرعة في تخطئته لحديث عائشة، وقوله:"والصحيح حديث ابن عيينة، عن هشام، عن أبيه، عن أبي هريرة"العلل" (2/ 159)، وكذلك رجح الدارقطني في العلل (14/ 159)، أنه من حديث أبي هريرة، ولكن لا يمنع هذا أن يكون لعروة شيخان، أبو هريرة وعائشة، ولذا صححه غير واحد من أهل العلم حديث عائشة أيضًا.
وفي الباب عن خزيمة بن ثابت، رواه الإمام أحمد (21867)، والطبرانيّ (3719)، وأبو يعلى كلّهم من طريق الحسن بن موسى الأشيب، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا أبو الأسود، أنّه سمع عروة يحدِّث عن عمارة بن خزيمة، عن أبيه، فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا ابن أبي عاصم في"السنة" (650).
وفي الإسناد عبد اللَّه بن لهيعة، وفيه كلام معروف، ولم أجد من الرّواة عنه أحدًا من العبادلة الذين سمعوا منه قبل الاختلاط.
وفي الباب أيضًا من حديث عبد اللَّه بن عمرو، رواه الطبراني في"المعجم الأوسط" (1917) من طريق إسماعيل بن أبي أويس، حدثنا مالك بن أنس، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد اللَّه ابن عمرو.
قال الطبرانيّ:"لم يرو هذا الحديث عن هشام بن عروة عن أبيه عن عبد اللَّه بن عمرو إِلَّا مالك، ولا عن مالك إِلَّا ابن أبي أويس، تفرّد به أبو الطّاهر بن السرح. ورواه النّاس عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن أبي هريرة".
وذكره الهيثميّ في"المجمع" (1/ 34)، ونسبه للطبرانيّ في"الأوسط والكبير" وقال:"رجاله رجال الصحيح خلا أحمد بن محمد بن نافع الطحّان شيخ الطبرانيّ". ولم يقل فيه شيئًا، فالظّاهر أنه لم يعرفه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমাদের কারো কাছে শয়তান এসে উপস্থিত হয়, অতঃপর সে বলে: তোমাকে কে সৃষ্টি করেছে? তখন সে (ব্যক্তি) বলে: আল্লাহ। অতঃপর সে (শয়তান) বলে: তাহলে আল্লাহকে কে সৃষ্টি করেছে? যখন তোমাদের কেউ এমনটা অনুভব করে, তখন সে যেন পাঠ করে: 'আমি আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলগণের ওপর ঈমান আনলাম' (আ-মানতু বিল্লাহি ওয়া রুসুলিহ)। কারণ এই বাক্যটি তার থেকে (এই কুমন্ত্রণা) দূর করে দেবে।”
