হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1681)


1681 - عن طارق بن شهاب أن رجلًا أجنب فلم يُصلّ، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له فقال:"أصبت". فأجنب رجل آخر فتيمّمَ وصلَّى، فأتاه فقال نحو ما قال للآخر، يعني"أصبت".

صحيح: رواه النسائي (324) قال: حدَّثنا محمد بن عبد الأعلى، قال: حدَّثنا خالد بن الحارث) قال: أنبأنا شعبة، أن مخارقا أخبرهم، عن طارق، فذكر الحديث.

إسناده صحيح، ورجاله ثقات. ومخارق هو ابن خليفة، من رجال البخاري، وطارق بن شهاب من صغار الصحابة، له رؤية فقط ولم يسمع منه، فحديثه مرسل صحابي، ومراسيل الصحابة حجة.

وفي رواية عند أحمد (18832) من طريق شعبة:"فلم يعِبْ عليهما".

وقوله صلى الله عليه وسلم لهما:"أصبت" لأن كلًّا منهم اجتهد، فأقر النبي صلى الله عليه وسلم اجتهادهما ولم يُخطِّئ واحدًا منهما، ولكن الذي صلّى بالتّيمم أولى، ويمكن حمل هذا أيضًا أنّ هذه القصّة مع هذا الرجل الذي لم يصل وقعت قبل نزول آية التيمم ولم يجد الماء.

وقوله:"لم يصل" أي في وقتها إلى أن يغتسل فيصليها ولو بعد خروج الوقت قضاءً.




তারিক ইবনু শিহাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, এক ব্যক্তি জুনুবী (গোসল ফরয) হলো, কিন্তু সালাত আদায় করলো না। অতঃপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁকে বিষয়টি বললো। তখন তিনি বললেন: "তুমি সঠিক করেছ।" অতঃপর অন্য এক ব্যক্তি জুনুবী হলো এবং সে তায়াম্মুম করে সালাত আদায় করলো। সে তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলো। তখন তিনি তাকেও অনুরূপ বললেন যা অপর ব্যক্তিকে বলেছিলেন, অর্থাৎ "তুমি সঠিক করেছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (1682)


1682 - عن أبي سعيد الخدري قال: خرج رجلان في سفر، فحضرت الصلاةُ وليس معهما ماء، فتيمما صعيدًا طيبًا فصلَّيا، ثم وجدا الماء في الوقت، فأعاد أحدُهما الصلاةَ والوضوءَ، ولم يُعد الآخر، ثم أتيا رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكرا ذلك له، فقال للذي لم يُعد:"أصبتَ السنة وأجزأتْ صلاتُك". وقال للذي توضأ وأعاد:"لك الأجرُ مرتين".

صحيح: رواه أبو داود (338) والنسائي (433) كلاهما من طريق عبد الله بن نافع، عن الليث بن سعد، عن بكر بن سوادة، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد، فذكر الحديث.

قال أبو داود: وغير ابن نافع يرويه عن الليث، عن عميرة بن أبي ناجية، عن بكر بن سوادة، عن عطاء بن يسار، عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقال أبو داود: وذكر أبي سعيد في هذا الحديث ليس
بمحفوظ، وهو مرسل.

ثم روى هو من طريق ابن لهيعة، عن بكر بن سوادة، عن أبي عبد الله مولى إسماعيل بن عبيد، عن عطاء بن يسار أن رجلين من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. بمعناه.

قلت: عبد الله بن نافع هو الصائغ مختلف فيه، والخلاصة فيه: أنَّه إذا حدّث من حفظه أخطأ، وهو صحيح الكتاب إلَّا أنَّه لم ينفرد به، فقد رواه أبو علي بن السكن قال: حدَّثنا أبو بكر محمد بن أحمد الواسطي، ثنا عباس بن محمد، ثنا أبو الوليد الطيالسي، ثنا الليث بن سعد، عن عمرو بن الحارث وعميرة بن أبي ناجية، عن بكر بن سوادة، عن عطاء، عن أبي سعيد، فذكر الحديث. ذكره ابن القطان في"الوهم والإيهام" (2/ 434).

ورجاله ثقات، وعميرة تكلّم فيه ابن القطاّن، وهو ثّقة وثقه النسائي وغيره.

ورواه النسائي (433، 434) مسندًا ومرسلًا.

ويظهر من هذا أن عطاء بن يسار كان يرويه من وجهين

وأمَّا قول الحاكم: صحيح على شرط الشيخين، فالصواب أنَّه على شرط مسلم وحده؛ فإنَّ بكر بن سوادة وعبد الله بن نافع وإن كانا من الثقات فإنهما من رجال مسلم وحده.

ويستفاد من هذا الحديث ما يلي:

1 - إن المتيمم كالمتطهّر يصلي في أول الوقت، وبه قال مالك وغيره. وذهب جمهور أهل العلم منهم الأئمة الأربعة، وقد قال قبل ذلك الفقهاء السبعة من أهل المدينة.

فقد روى البيهقي في السنن الكبرى 1/ 232 بإسناده عن أبي الزناد أنَّه قال: كان من أدركتُ من فقهائنا الذين ينتهي إلى قولهم منهم: سعيد بن المسيب - وذكر تمام الفقهاء السبعة - يقولون: من تيمم وصلّى ثم وجد الماء وهو في الوقت أو بعده لا إعادة عليه.

2 - إنّ المتيمّم إن وجد الماء قبل خروج الوقت فالجمهور على أنَّه لا يعيد الصلاة. واستحبّ الأوزاعي إعادته ولم يوجبه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, দু'জন লোক সফরে বের হলো। অতঃপর সালাতের সময় উপস্থিত হলো, কিন্তু তাদের সাথে কোনো পানি ছিল না। তাই তারা পবিত্র মাটি দ্বারা তায়াম্মুম করে সালাত আদায় করল। এরপর তারা (সালাতের) সময়ের মধ্যেই পানি খুঁজে পেল। তখন তাদের একজন সালাত ও ওযূ পুনরায় আদায় করল, কিন্তু অন্যজন তা পুনরায় আদায় করল না। অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বিষয়টি তাঁকে জানাল। তখন যিনি সালাত পুনরায় আদায় করেননি, তাঁকে তিনি বললেন: "তুমি সুন্নাতকে গ্রহণ করেছো এবং তোমার সালাত যথেষ্ট হয়েছে।" আর যিনি ওযূ করে সালাত পুনরায় আদায় করেছেন, তাঁকে বললেন: "তোমার জন্য রয়েছে দ্বিগুণ পুরস্কার।"









আল-জামি` আল-কামিল (1683)


1683 - عن * *




১৬৮৩ - থেকে ** **









আল-জামি` আল-কামিল (1684)


1684 - عن طلحة بن عبيد الله يقول: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من أهل نجد، ثائر الرأس يُسمع دَوي صوته، ولا يُفقه ما يقول، حتَّى دنا فإذا هو يسأل عن الإسلام، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خمس صلوات في اليوم والليلة" فقال: هل عليَّ غيرها؟ قال:"لا، إلا أن تطوع" قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وصيام رمضان" قال: هل عليَّ غيره؟ قال:"لا، إلا أن تطوع" قال: وذكر رسول الله في الزكاة، قال: هل عليّ غيرُها؟ قال:"لا، إلَّا أن تطوعه، قال: فأدبر الرجل وهو يقول: والله لا أزيد على هذا ولا أنقص، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفلح إن صدق".

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (94) عن عمه أبي سُهيل بن مالك، عن أبيه، أنه سمع طلحة بن عبيد الله فذكر الحديث، ورواه البخاري عن إسماعيل، عن مالك في الإيمان (46)، ومسلم في الإيمان (8) عن قتيبة بن سعيد بن جميل بن طريف بن عبد الله الثقفي، عن مالك، ومضى هذا الحديث بكامله في كتاب الإيمان.

ومن لطائف إسناد البخاري: الرواةُ كلهم من الأقارب، إسماعيل هو ابن أبي أويس ابن أخت مالك، ومالك خاله، ووالد أبي سُهيل هو ابن أبي عامر الأصبحي حليف طلحة بن عبيد الله، فهو من رواية إسماعيل، عن خاله، عن عمه، عن أبيه، عن حليفه.




তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নজদবাসী এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলেন। তার মাথার চুল ছিল এলোমেলো, তার কণ্ঠস্বরের চাপা গুঞ্জন শোনা যাচ্ছিল, কিন্তু তিনি কী বলছিলেন তা বোঝা যাচ্ছিল না। অবশেষে যখন তিনি নিকটবর্তী হলেন, তখন দেখা গেল তিনি ইসলাম সম্পর্কে জিজ্ঞেস করছেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "(তা হলো) দিন ও রাতে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ)।" লোকটি জিজ্ঞেস করল: আমার উপর কি এর বাইরে আর কিছু আছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, যদি না তুমি স্বেচ্ছায় কিছু করো।" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আর রমযানের সওম (রোজা)।" লোকটি জিজ্ঞেস করল: আমার উপর কি এর বাইরে আর কিছু আছে? তিনি বললেন: "না, যদি না তুমি স্বেচ্ছায় কিছু করো।" বর্ণনাকারী বলেন: আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যাকাতের কথা উল্লেখ করলেন। লোকটি জিজ্ঞেস করল: আমার উপর কি এর বাইরে আর কিছু আছে? তিনি বললেন: "না, যদি না তুমি স্বেচ্ছায় কিছু করো।" লোকটি তখন এই বলে প্রস্থান করল যে, আল্লাহর কসম! আমি এর চেয়ে বেশিও করব না এবং কমও করব না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সে সফলকাম হবে, যদি সে সত্য বলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1685)


1685 - عن أنس قال: فرضتْ على النبي صلى الله عليه وسلم ليلة أسري به الصلوات خمسين، ثم نُقِصَت حتى جُعلتْ خمسًا، ثم نُودي: يا محمد! إنه لا يُبدّل القول لديّ، وإن لك بهذه الخمس خمسين.

متفق عليه: رواه الترمذي في الصلاة (213) بهذا اللفظ مختصرًا عن محمد بن يحيى النيسابوري، ثنا عبد الرزاق، نا معمر، عن الزهري، عن أنس.

وقال: حسن صحيح غريب.
وهو حديث طويل سيأتي في قصة الإسراء والمعراج، وهذا القدر أخرجه أيضًا البخاري في بدء الخلق (3207)، عن سعيد وهشام، قالا: حدَّثنا قتادة، ثنا أنس، ومسلم في الإيمان (163) من طريق يونس، عن ابن شهاب، عن أنس.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মি'রাজের রাতে পঞ্চাশ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ) ফরয করা হয়েছিল। অতঃপর তা হ্রাস করা হয় এবং পাঁচ ওয়াক্তে পরিণত করা হয়। এরপর ঘোষণা করা হলো: হে মুহাম্মাদ! আমার কাছে কথা রদবদল হয় না, আর এই পাঁচ ওয়াক্তের বিনিময়ে তোমার জন্য পঞ্চাশ (ওয়াক্তের) সওয়াব রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (1686)


1686 - عن أنس قال: سأل رجل نبي الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! كم فرض الله على عباده من الصلوات؟ قال:"افترض الله على عباده صلوات خمسًا" قال: يا رسول الله! هل قبلهن أو بعدهن من شيء؟ ، قال:"افترض الله على عباده صلوات خمسًا" فحلف الرجل لا يزيد عليه شيئًا، ولا ينقص منه شيئًا، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن صدق ليدخلنَّ الجنة".

صحيح: رواه النسائي (459) عن قتيبة قال: ثنا نوح بن قيس، عن خالد بن قيس، عن قتادة، عن أنس، فذكر الحديث.

وإسناده صحيح رجاله ثقات، فنوح بن قيس وثَّقه أحمد، وابن معين، وأبو داود، والعجلي، وغيرهم، وخالد بن قيس وثَّقه ابن معين، والعجلي، وقال ابن المديني:"ليس به بأس".

وهذا الحديث مختصر لما رواه مسلم في الإيمان (10) مطولًا من وجه آخر عن أنس وقال فيه: نُهينا أن نسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن شيء فكان يُعجبنا أن يجيء الرجل من أهل البادية العاقِلُ فيسأله ونحن نسمع، فجاء رجل من أهل البادية فسأل الأسئلة، منها قوله: زعم رسولك أن علينا خمس صلوات في يومنا وليلتنا. قال:

"صدق" وسأل عن بقية شرائع الإسلام ثمَّ ولَّى وقال: والذي بعثك بالحق لا أزيد عليهن ولا أنقص منهن. فقال النبي صلى الله عليه وسلم: لئن صدق ليدخُلَن الجنة".

مضى هذا الحديث بطوله في كتاب الإيمان.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল এবং বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ তাঁর বান্দাদের উপর কয় ওয়াক্ত সালাত ফরজ করেছেন?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাঁর বান্দাদের উপর পাঁচ ওয়াক্ত সালাত ফরজ করেছেন।" সে বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! এর আগে বা পরে কি আরও কিছু (সালাত) আছে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাঁর বান্দাদের উপর পাঁচ ওয়াক্ত সালাত ফরজ করেছেন।" অতঃপর লোকটি কসম করে বলল যে, সে এর উপর কিছু বাড়াবেও না এবং তা থেকে কিছু কমাবেও না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে সত্য বলে থাকে, তবে অবশ্যই সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1687)


1687 - عن عبد الله بن الصنابحي قال: زعم أبو محمد أن الوتر واجب، فقال عبادة بن الصامت: كذب أبو محمّد، أشهد أنّي سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"خمس صلوات افترضهنّ الله تعالى من أحسن وضوءهُنَّ وصلَّاهُنَّ لوقتهنّ، وأتمّ ركوعهنَّ وخشوعَهُّنّ، كان له على الله عهد أن يغفر له، ومن لم يفعل فليس له على الله عهدٌ، إن شاء غفر له، وإن شاء عذَّبه".

صحيح: رواه أبو داود (452) عن محمد بن حرب الواسطي، حدَّثنا يزيد بن هارون، حدثنا محمد بن مطرف، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد الله بن الصُّنابحي، فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه الإمام أحمد (22704) عن حسين بن محمد عن محمد بن مطرف به، وقال فيه: عبد الله
الصنابحي بدون لفظ"ابن".

ورواه البيهقي من طريق آدم بن أبي إياس، عن أبي غسّان محمد بن مطرف وقال فيه: أبو عبد الله الصنابحي، وليس فيه ذكر للوتر.

وقد صوّب الحافظ وغيره أنّه أبو عبد الله الصنابحي، واسمه: عبد الرحمن بن عُسيلة، وهو ثقة. وللحديث طريق آخر يأتي تفصيله في صلاة الوتر.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনুস সানাবিহী বলেন, আবূ মুহাম্মাদ যখন বিতর সালাতকে ওয়াজিব বলে দাবি করল, তখন উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আবূ মুহাম্মাদ মিথ্যা বলেছে। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আল্লাহ তাআলা পাঁচটি সালাত ফরয করেছেন। যে ব্যক্তি সেগুলোর জন্য উত্তমরূপে ওযু করে, সেগুলোকে সঠিক সময়ে আদায় করে, এবং সেগুলোর রুকূ ও খুশূ’ (নম্রতা) পূর্ণাঙ্গভাবে সম্পন্ন করে, তার জন্য আল্লাহর কাছে প্রতিশ্রুতি রয়েছে যে তিনি তাকে ক্ষমা করে দেবেন। আর যে ব্যক্তি তা করে না, তার জন্য আল্লাহর কাছে কোনো প্রতিশ্রুতি নেই; তিনি চাইলে তাকে ক্ষমা করবেন, অথবা চাইলে শাস্তি দেবেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (1688)


1688 - عن أبي الدرداء قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خمسٌ من جاء بهنَّ مع إيمان دخل الجنة، من حافظ على الصلوات الخمس؛ على وضوئهنَّ وركوعهِنَّ وسجودهِنَّ ومواقيتهنّ، وصام رمضان، وحجَّ البيت إن استطاع إليه سبيلًا، وأعطى الزكاة طيّبة بها نفسه، وأدّى الأمانة". قالوا: يا أبا الدرداء! وما أداء الأمانة؟ قال: الغسل من الجنابة.

حسن: رواه أبو داود (429) عن محمد بن عبد الرحمن العنبري، حدَّثنا أبو علي الحنفي عبد الله بن عبد المجيد، حدَّثنا عمران القطان، حدَّثنا قتادة وأبان، كلاهما عن خُليد العَصَري، عن أمّ الدرداء، عن أبي الدرداء فذكر مثله.

وهذه رواية ابن الأعرابي كما جاء في هامش النسخة الهندية: قال أبو سعيد بن الأعرابي: حدثنا محمد بن عبد الملك بن يزيد الرواس، يُكنى أبا أُمامة، قال: حدَّثنا أبو الدرداء …". ولم تثبت في رواية اللؤلؤي.

وإسناده حسن للكلام في عمران، وهو ابن داوَر، بفتح الواو وبعدها الراء، القمِّي أبو العوام البصري، مختلف فيه، غير أنّه حسن الحديث. وأمّا أبان فهو: ابن أبي عياش، وهو متروك، ولكنه مقرون هنا بقتادة، فلا يضر وجوده في الإسناد.

وأورده الهيثمي في مجمع الزوائد: (1/ 47) وعزاه إلى الطبراني في الكبير، وقال: إسناده جيِّد غير أنَّه جعل تفسير الأمانة مرفوعًا، وزاد في آخر الحديث:"إنّ الله لم يأمن ابن آدم على شيءٍ من دينه غيرها". وذلك اعتمادًا على رواية ابن اللؤلؤي التي لم يثبت فيها هذا الحديث.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "পাঁচটি কাজ, যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে তা নিয়ে আসবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে। যে ব্যক্তি পাঁচ ওয়াক্ত সালাত তার ওযু, রুকু, সিজদা এবং ওয়াক্তসমূহ সহকারে সংরক্ষণ (নিয়মিত আদায়) করবে, রমজানের সিয়াম পালন করবে, বাইতুল্লাহর হজ্জ করবে যদি তার সেখানে যাওয়ার সামর্থ্য থাকে, সন্তুষ্ট চিত্তে যাকাত প্রদান করবে, এবং আমানত আদায় করবে।"
সাহাবীগণ জিজ্ঞাসা করলেন: হে আবু দারদা! আমানত আদায় করা কী? তিনি বললেন: জানাবাত (বড় নাপাকী) থেকে গোসল করা।









আল-জামি` আল-কামিল (1689)


1689 - عن ابن عباس قال: جاء أعرابي من بني سعد بن بكر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: السلام عليك يا غلام بني عبد المطلب! فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"وعليك السلام" فقال: إني رجل من أخوالك من بني سعد بن بكر، وأنا رسول قومي إليك ووافدهم، وإني سائلك فمشتدَّة مسألتي إياك، ومناشدك فمشتدة مناشدني إياك، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"دونك يا أخا بني سعد!" فقال: من خلقك ومن خلق من قبلك ومن هو خالق بعدك؟ قال:"الله" قال: فنشدتك بذلك أهو أرسلك؟ قال:"نعم" قال: أخبرني من خلق السماوات السبع والأرضين السبع وأجرى بينهم الرزق؟
قال:"الله" قال: فنشدتك بذلك أهو أرسلك؟ قال: نعم، قال: فإنا قد وجدنا في كتابك وأمرتنا رسلك أن نصلي بالليل والنهار خمس صلوات لمواقيتها فنشدتك بذلك أهو أمرك؟ قال: نعم، قال: فإنا قد وجدنا في كتابك وأمرتنا رسلك أن تصوم شهر رمضان فنشدتك بذلك أهو أمرك؟ قال: نعم، قال: فإنا قد وجدنا في كتابك وأمرتنا رسلك أن تأخذ من حواشي أموالنا متجعلة في فقرائنا، فنشدتك بذلك، أهو أمرك؟ قال:"نعم" قال: أما الخامسة فلست سائلا عنها، ولا أرب لي فيها - يعني: الفواحش - ثمَّ قال: أما والذي بعثك بالحق لأعملن بها ومن أطاعني من قومي، ثمَّ رجع، فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى بدت نواجذه ثم قال:"لئن صدق ليدخلن الجنة".

صحيح: رواه الطبراني في الكير (8/ 366) وابن خزيمة (2383) والدارمي (677) وابن أبي شيبة (14914) كلهم من حديث محمد بن فضيل بن غزوان، ثنا عطاء بن السائب وموسى بن السائب أبو جعفر، عن سالم بن أبي الجعد، عن ابن عباس فذكره. ومحمد بن فضيل حسن الحديث مع تشيعه لكنه توبع.

ومنهم من روى عن عطاء بن السائب وحده، وعطاء هذا مختلط ولكنه توبع، ورواه أيضًا الدارمي (678) من وجه آخر عن ابن عباس نحوه، وفيه: بعث بنو سعد بن بكر ضمام بن ثعلبة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم.

وفي الباب عن أبي قتادة بن الربعي، رواه أبو داود (430) وابن ماجه (1403) وفيه بقية، وهو مدلس إلَّا أنَّه صرَّح في رواية ابن ماجه، وضُبارة بن عبد الله بن أبي السليك مجهول، ودريد بن نافع شيخ.

وعن كعب بن عُجرة، رواه الإمام أحمد (18132) وفيه عيسى بن المسيب ضعيف، والشعبي لم يسمع من كعب بن عُجرة، ورواه الدارمي من طريق إسحاق بن سعد بن كعب بن عُجرة، عن أبيه. وإسحاق بن سعد مجهولٌ أيضًا.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনু সা‘দ ইবনে বাকর গোত্রের একজন বেদুঈন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করে বলল: হে বনু আব্দুল মুত্তালিবের যুবক, আপনার উপর শান্তি বর্ষিত হোক! তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার উপরও শান্তি বর্ষিত হোক।"

সে বলল: আমি আপনার মামাদের বংশের লোক, বনু সা‘দ ইবনে বাকরের একজন। আমি আপনার নিকট আমার গোত্রের পক্ষ থেকে দূত ও প্রতিনিধি হিসেবে এসেছি। আমি আপনাকে কঠিনভাবে কিছু জিজ্ঞাসা করব এবং আপনাকে কঠিনভাবে শপথ দিয়ে জানতে চাইব। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে বনু সা‘দের ভাই, জিজ্ঞেস করো!"

সে বলল: আপনাকে কে সৃষ্টি করেছেন? আর আপনার পূর্বে যারা ছিল, তাদেরকে কে সৃষ্টি করেছেন? এবং আপনার পরে যারা সৃষ্টি হবে, তাদের স্রষ্টা কে? তিনি বললেন: "আল্লাহ।" সে বলল: তাহলে আমি সেই স্রষ্টার কসম দিয়ে আপনাকে জিজ্ঞাসা করছি, তিনি কি আপনাকে পাঠিয়েছেন? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"

সে বলল: আমাকে বলুন, কে সাত আসমান ও সাত জমিন সৃষ্টি করেছেন এবং তাদের মধ্যে রিযিক প্রবাহিত করেছেন? তিনি বললেন: "আল্লাহ।" সে বলল: তাহলে আমি সেই স্রষ্টার কসম দিয়ে আপনাকে জিজ্ঞাসা করছি, তিনি কি আপনাকে পাঠিয়েছেন? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"

সে বলল: আমরা আপনার কিতাবে পেয়েছি এবং আপনার প্রেরিত ব্যক্তিরা আমাদের আদেশ করেছেন যে, আমরা যেন রাত-দিনে পাঁচ ওয়াক্ত নামাজ তার নির্দিষ্ট সময়ে আদায় করি। আমি সেই স্রষ্টার কসম দিয়ে জিজ্ঞাসা করছি, এ কি তাঁরই নির্দেশ? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"

সে বলল: আমরা আপনার কিতাবে পেয়েছি এবং আপনার প্রেরিত ব্যক্তিরা আমাদের আদেশ করেছেন যে, আমরা যেন রমজান মাসে রোজা রাখি। আমি সেই স্রষ্টার কসম দিয়ে জিজ্ঞাসা করছি, এ কি তাঁরই নির্দেশ? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"

সে বলল: আমরা আপনার কিতাবে পেয়েছি এবং আপনার প্রেরিত ব্যক্তিরা আমাদের আদেশ করেছেন যে, আমাদের সম্পদের অতিরিক্ত অংশ থেকে সাদাকা (যাকাত) গ্রহণ করা হবে, যা আমাদের দরিদ্রদের জন্য ব্যয়িত হবে। আমি সেই স্রষ্টার কসম দিয়ে জিজ্ঞাসা করছি, এ কি তাঁরই নির্দেশ? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"

সে বলল: পঞ্চম বিষয়টি সম্পর্কে আমি জিজ্ঞাসা করব না এবং সে বিষয়ে আমার কোনো আগ্রহ নেই—এর দ্বারা তার উদ্দেশ্য ছিল অশ্লীলতা। অতঃপর সে বলল: যিনি আপনাকে সত্যসহকারে পাঠিয়েছেন, তাঁর কসম! আমি অবশ্যই এগুলো মেনে চলব এবং আমার গোত্রের যারা আমার অনুসরণ করবে, তারাও মেনে চলবে। এরপর সে ফিরে গেল।

এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনভাবে হাসলেন যে, তার মাড়ির দাঁত দৃশ্যমান হলো। অতঃপর তিনি বললেন: "যদি সে সত্য বলে থাকে, তবে সে অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1690)


1690 - عن جرير بن عبد الله، قال: بايعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم على إقام الصّلاة، وإيتاء الزكاة، والنّصح لكلّ مسلم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في مواقيت الصّلاة (524)، ومسلم في الإيمان (56) كلاهما من حديث إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس، عن جرير بن عبد الله، فذكره.




জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বাইয়াত (শপথ) গ্রহণ করেছিলাম সালাত (নামাজ) প্রতিষ্ঠা করা, যাকাত প্রদান করা এবং প্রত্যেক মুসলমানের কল্যাণ কামনা (উপদেশ) করার উপর।









আল-জামি` আল-কামিল (1691)


1691 - عن أبي هريرة، قال: لما توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم، واستخلف أبو بكر بعده، وكفر من كفر من العرب قال عمر بن الخطاب لأبي بكر: كيف تقاتل النّاس وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أُمرتُ أن أقاتل النّاس حتى يقولوا: لا إله إلَّا الله. فمن قال: لا إله إلَّا الله، فقد عصم مني ماله ونفسه إلَّا بحقه، وحسابه على الله". فقال أبو بكر: والله! لأقاتلن من فرَّق بين الصلاة والزّكاة، فإن الزّكاة حق المال، والله! لو منعوني عقالًا كانوا يؤدّونه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم لقاتلتهم على منعه. فقال عمر: فوالله! ما هو إلَّا أن رأيت الله عز وجل قد شرح صدر أبي بكر للقتال، فعرفت أنّه الحقّ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1399)، ومسلم في الإيمان (20) كلاهما من حديث الزهري، قال: أخبرني عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن أبي هريرة، فذكره، واللّفظ لمسلم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর ওফাত হলো এবং তাঁর পরে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, আর আরবদের মধ্যে যারা কুফরী করার তারা কুফরী করল (মুরতাদ হয়ে গেল), তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আপনি কিভাবে লোকেদের সাথে যুদ্ধ করবেন? অথচ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে, আমি যেন লোকেদের সাথে ততক্ষণ পর্যন্ত যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে। অতএব, যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে তার সম্পদ ও জীবন আমার থেকে রক্ষা করে নিল, তবে ইসলামের হক বা অধিকার ব্যতীত। আর তার হিসাব-নিকাশ আল্লাহর উপর ন্যস্ত।" তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই তার সাথে যুদ্ধ করব, যে সালাত (নামায) ও যাকাতের মধ্যে পার্থক্য করে। কেননা যাকাত হলো সম্পদের অধিকার (হক)। আল্লাহর কসম! যদি তারা একটি উট বাঁধার রশিও (বা ছাগলের বাচ্চা) দিতে অস্বীকার করে, যা তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে আদায় করত, তবুও আমি তাদের বিরুদ্ধে সেই অস্বীকারের কারণে যুদ্ধ করব। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমার কাছে মনে হলো আল্লাহ তা‘আলা যুদ্ধের জন্য আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্ষ উন্মোচন করে দিয়েছেন। ফলে আমি বুঝতে পারলাম যে, এটাই সত্য (সঠিক)।









আল-জামি` আল-কামিল (1692)


1692 - عن جابر يقول: سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن بين الرجل وبين الشرك والكفر تركَ الصلاة".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (82) من طريقين: أبو سفيان، وأبو الزبير، كلاهما عن جابر بن عبد الله قال: فذكره.

قال الترمذي (2618) بعد أن رواه من طريق أبي سفيان: اسمه: طلحة بن نافع.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি এবং শির্ক ও কুফরের মাঝে ব্যবধান হলো সালাত ছেড়ে দেওয়া।”









আল-জামি` আল-কামিল (1693)


1693 - عن بريدة بن الحُصيب الأسلمي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن العَهد الذي بيننا وبينهم الصلاة، فمن تركها فقد كفر".

حسن: رواه الترمذي (2621)، والنسائي (464) وابن ماجه (1079) كلهم من طريق حسين بن واقد، قال: حدَّثنا عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكر مثله.

قال الترمذي: حسن صحيح غريب.

وإسناده حسن، فإنَّ الحين بن واقد المروزي أبو عبد الله القاضي في درجة"صدوق" وثَّقه ابن معين، وقال الإمام أحمد: ليس به بأس، وكذا قال أبو حاتم والنسائي، وأبو داود، وقال ابن سعد: كان حسن الحديث، فهو لا يرتقي إلى درجة"ثقة" كما قال الحافظ في التقريب، ثم هو جمع بين"ثقة" وبين"له أوهام" وهو جمع غير مستحسن، وأما الحاكم (1/ 6 - 7) فصحّحه وقال: لا تعرف له علة بوجه من الوجوه، فقد احتجا جميعًا بعبد الله بن بريدة، عن أبيه، واحتج مسلم بالحسين بن واقد، ولم يخرجاه بهذا اللفظ، ولهذا الحديث شاهد صحيح على شرطهما". انتهى.
قلت: وهو حديث أبي هريرة الآتي، ولكنه ليس بمحفوظ، كما سيأتي بيانه.

كما صححه أيضًا ابن حبان (1454) فرواه من طريق الحسين بن واقد به مثله.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাদের এবং তাদের (অর্থাৎ কাফিরদের) মধ্যে যে চুক্তি বা পার্থক্য, তা হলো সালাত (নামায)। সুতরাং যে তা ত্যাগ করল, সে অবশ্যই কুফরি করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (1694)


1694 - عن ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"بين العبد وبين الكفر والإيمان الصلاةُ، فإذا تركها فقد أشرك".

صحيح: رواه اللالكائيّ في أصول الاعتقاد (1521) من طريق شعيب بن إسحاق الدّمشقيّ، ثنا أبو المغيرة (هو عبد القدوس بن الحجاج)، ثنا الأوزاعي، ثنا الوليد بن هشام، ثنا معدان بن أبي طلحة، قال: قلت لثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم حدّثنا حديثًا ينفعنا الله به، فسكت، فقلت: حدّثنا حديثًا ينفعنا الله به، قال (فذكره).

قال اللالكائي: إسناد صحيح على شرط مسلم.

وعزاه له المنذري في"الترغيب والترهيب" (818): وقال:"إسناده صحيح".

وقال ابن القيم في"كتاب الصلاة" (ص 46):"وإسناده صحيح على شرط مسلم".




সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: বান্দা এবং কুফর ও ঈমানের মধ্যে পার্থক্যকারী হলো সালাত (নামায)। যখন সে তা ত্যাগ করে, তখন সে শিরক করে।









আল-জামি` আল-কামিল (1695)


1695 - عن أبي الدرداء قال: أوصاني خليلي صلى الله عليه وسلم أن:"لا تُشركْ بالله شيئًا، وإن قُطِّعتَ وحُرِّقْتَ، ولا تتركْ صلاةً مكتوبةً متعمدًا فمن تركها متعمِّدًا فقد برِئت منه الذمَّة، ولا تشرب الخمرَ، فإنَّها مفتاح كلِّ شرٍّ".

حسن: رواه ابن ماجه (4034) من طريق راشد أبي محمد الحِمَّاني، عن شهر بن حوشب، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء فذكره.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا البخاري في الأدب المفرد (18)، واللالكائي في أصول الاعتقاد (1524).

وشهر فيه كلام غير أنه لا ينزل عن درجة حسن الحديث إذا لم يخالف.

ومن شواهده ما رُوي عن أنس بن مالك، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس بين العبد والشرك إلّا ترك الصّلاة، فإذا تركها فقد كفر".

رواه ابن ماجه (1080) عن عبد الرحمن بن إبراهيم الدّمشقي، قال: حدثنا الوليد بن مسلم، قال: حدّثنا الأوزاعيّ، عن عمرو بن سعيد، عن يزيد الرّقاشيّ، عن أنس بن مالك، فذكره.

ويزيد هو ابن أبان الرّقاشيّ كان رجلًا صالحًا زاهدًا بكّاء، فغفل عن مذاكرة الحديث ولذلك ضعّفه جمهور أهل العلم.

ورُوي أيضا عن أنس بن مالك مرفوعًا بلفظ:"من ترك الصلاة متعمدًا فقد كفر جهارًا".

رواه الطبراني في الأوسط (3372) قال: حدثنا جعفر، ثنا محمد بن أبي داود الأنباري، ثنا هاشم بن القاسم، عن أبي جعفر الرازي، عن الربيع بن أنس، عن أنس فذكر الحديث.
وقد سئل الدّارقطني عن هذا الحديث فقال:"وخالفه علي بن الجعد، فرواه عن أبي جعفر، عن الرّبيع مرسلًا، والمرسل أشبه بالصّواب".

قلت: ومداره أيضًا على أبي جعفر الرّازيّ وهو عيسى بن أبي عيسى عبد الله بن ماهان، ذكره ابن حبان في المجروحين (702)، فقال:"كان ممن ينفرد بالمناكير عن المشاهير، لا يعجبني الاحتجاج بخبره، إلَّا فيما وافق الثقات، ولا يجوز الاعتبار بروايته إلّا فيما لم يخالف الأثبات".

وقال الحافظ في التقريب:"صدوق سيء الحفظ". فلعله مما أخطأ فيه، فزاد كلمة"جهارًا".

فإنه لم يتابع على هذه الزّيادة.

وأما تعليل الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 295) بقوله:"رواه الطبراني في الأوسط ورجاله موثقون إلّا محمد بن أبي داود فإني لم أجد من ترجمه، وقد ذكر ابن حبان في الثقات محمد بن أبي داود البغدادي فلا أدري هو هذا أم لا؟".

قلت: هو من رجال التهذيب جعله الحافظ في مرتبة"صدوق". وأبو داود هو سليمان الأنباريّ أبو هارون بن أبي داود، ولعل الهيثميّ لما لم يعرف اسم أبيه اشتبه عليه.

ومن شواهده ما رُوي عن أمّ أيمن أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تترك الصّلاة متعمّدًا، فإنّه من ترك الصّلاة متعمدًا فقد برئتْ منه ذمّة الله ورسوله".

رواه الإمام أحمد (27364) عن الوليد بن مسلم، قال: أخبرنا سعيد بن عبد العزيز، عن مكحول، عن أمّ أيمن، فذكرته. ورواه عبد بن حميد (1594) عن عمر بن سعيد الدّمشقيّ، عن سعيد بن عبد العزيز التَّنوخيّ، بإسناده أطول من هذا، قال عمر: ثنا غير سعيد أن الزهري قال: كان الموصى بهذه الوصية ثوبان.

قلت: وفي الإسناد مكحول وهو الشامي لم يسمع من أمّ أيمن.

قال أبو حاتم: سألت أبا مسهر: هل سمع مكحول من أحد من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم؟ قال: ما صحّ عندنا إلّا أنس بن مالك.

وقد أكّد المزي وغيره أن روايته عن أمّ أيمن مرسلة.

ومن شواهده ما رُوي عن معاذ قال:"أوصاني رسول الله صلى الله عليه وسلم بعشر كلمات، قال: لا تشركْ بالله شيئًا وإن قُتلتَ وحرِّقتَ، ولا تعقنَّ والديك وإن أمراك أن تخرج من أهلك ومالك، ولا تتركنَّ صلاةً مكتوبة، فإنّ من ترك صلاةً مكتوبة متعمّدًا، فقد برئت منه ذمّة الله، ولا نشربنَّ خمرًا فإنّه رأسُ كلِّ فاحشة، وإيّاك والمعصية، فإنّ بالمعصية حلَّ سخطُ الله عز وجل، وإيّاك والفرار من الزّحف وإن هلك النّاس، وإذا أصاب الناس موتان وأنت فيهم فاثبُت، وأنفق على عيالك من طوْلك، ولا ترفعْ عنهم عصاك أدبًا، وأخفهم في الله".

رواه الإمام أحمد (22075) عن أبي اليمان، أخبرنا إسماعيل بن عياش، عن صفوان بن
عمرو، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير الحضرميّ، عن معاذ، فذكره.

وعبد الرحمن بن جبير بن نفير لم يدرك معاذًا، وروايته عنه مرسلة.

انظر: تحفة التحصيل (ص 196).

وله إسناد آخر، رواه الطبراني في الكبير (20/ 82) من طريق عمرو بن واقد، عن يونس بن ميسرة بن حلبس، عن أبي إدريس الخولانيّ، عن معاذ بن جبل، أنّ رجلًا قال: يا رسول الله! علّمني عملًا إذا ما عملته دخلتُ الجنة. قال:"لا تشرك بالله …" الحديث بنحوه، وزاد:"لا تنازع الأمر أهله وإن رأيت أن لك".

ولكن هذا الإسناد لا يفرح به؛ لأنّ فيه عمرو بن واقد وهو الدّمشقيّ ضعيف جدًّا، ضعّفه جماهير أهل العلم، وفي التقريب:"متروك".

وقال الهيثمي في"المجمع" (1/ 138) في حديث آخر: عمرو بن واقد رمي بالكذب، وهو منكر الحديث.

ومن شواهده ما رُوي عن أميمة مولاة النبيّ صلى الله عليه وسلم قالت:"كنتُ أوضِّئه يومًا، أفرغ على يديه الماء، إذْ جاءه أعرابيٌّ، فقال: أوصني يا رسول الله! فإني أريد اللّحوق بأهلي، قال:"لا تشركنّ بالله شيئًا، وإن قطعت وحرّقت بالنّار، وأطع والديك فيما أمراك، وإن أمراك أن تخلي من دنياك وأهلك، فتخلّى منها، ولا تدعنّ صلاة متعمّدًا، فإنه من تركها، فقد برئتْ منه ذمة الله تعالى، وذمّة رسوله صلى الله عليه وسلم".

رواه المروزيّ في تعظيم قدر الصلاة (912) عن محمود بن آدم، قال: حدّثنا الفضل بن موسى، قال: حدّثنا أبو فروة الرّهاويّ، عن أبي يحيى الكلاعيّ، عن حبيب بن نفير، عن أميمة مولاة النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكرته.

وأبو فروة هو يزيد بن سنان، ومن طريقه أخرجه الحاكم (4/ 41) وزاد فيه، ولم يتكلّم بشيء. وقال الذهبي: سنده واه.

قلت: فيه يزيد بن سنان الّتميميّ أبو فروة الرّهاويّ جمهور أهل العلم على تضعيفه، وبه أعلّه المنذريّ في الترغيب والترهيب (828).

وقد ذكر الحافظ المنذري هذه الأحاديث وغيرها في الترغيب والترهيب، وتكلّم في أسانيد بعضها.

كما أن ابن نصر المروزيّ أخرج هذه الأحاديث في كتاب"تعظيم قدر الصلاة" وقام المحقّق الدكتور عبد الرحمن الفريوائي بدراسة أسانيدها والحكم عليها فراجعه.

ونظرا لكثرة هذه الشّواهد ذهب بعضُ أهل العلم إلى تحسينه، والله الموفق.

وقد وردت آثار عن جماعة من الصّحابة والتابعين ومن بعدهم بأنهم لا يرون فرقًا بين الكفر والإيمان إلا ترك الصلاة.
منها ما رواه المروزي في"تعظيم قدر الصلاة" (947) عن يحيى بن يحيى، قال: أخبرنا أبو خيثمة، عن أبي الزبير، قال: سمعتُ جابرًا رضي الله عنه، وسأله رجل: أكنتُم تعدون الذنب فيكم شركًا؟ قال: لا، قال: وسئل ما بين العبد وبين الكفر. قال: ترك الصلاة. وإسناده حسن من أجل أبي الزبير، وأبو خيثمة هو زهير بن معاوية الجعفيّ.

وأخرج المروزيّ أيضًا (892) من وجه آخر عن ابن إسحاق، قال: حدّثني أبان بن صالح، عن مجاهد بن جبر أبي الحجاج، عن جابر بن عبد الله، قال: قلت له: ما كان يفرّق بين الكفر والإيمان عندكم من الأعمال في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الصّلاة". وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وهو مدلّس وقد صرح بالتحديث.

وأخرج أيضًا المروزي (924) عن محمد بن يحيى قال: حدثنا عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري، عن عبيد الله، عن ابن عباس قال: لما طُعن عمر رضي الله عنه احتملته أنا، ونفر من الأنصار حتى أدخلناه منزله، فلم يزل في غشية واحدةٍ حتى أسفر، فقلنا: الصلاة يا أمير المؤمنين! ففتح عينيه فقال: أصلَّى الناس؟ قلنا: نعم، قال: أما إنه لا حظ في الإسلام لأحد ترك الصلاة. فصلى، وجرحه يثعبُ دمًا.

وإسناده صحيح، عبيد الله هو: ابن عبد الله بن عتبة بن مسعود الهذلي، قال الحافظ ابن القيم: قال هذا بمحضر من الصحابة، ولم ينكروا عليه."كتاب الصلاة وحكم تاركها" (ص 50).

ويؤيّد ذلك قول عبد الله بن شقيق:"كان أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يرون شيئًا من الأعمال تركهـ كفرًا غير الصّلاة".

رواه الترمذيّ (2622) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا بشر بن المفضّل، عن الجريريّ، عن عبد الله بن شقيق، فذكره. وإسناده صحيح.

وروي عن أبي هريرة ولا يصح، والمحفوظ عن عبد الله بن شقيق.

وحكى إسحاق بن راهويه الإجماع على ذلك، فقال:"قد صحّ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنّ تارك الصّلاة كافرٌ، وكذلك كان رأي أهل العلم من لدن النبيّ صلى الله عليه وسلم إلى يومنا هذا أن تارك الصّلاة عمدًا من غير عذر حتى يذهب وقتُها كافر" تعظيم قدر الصلاة (990).




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার বন্ধু (খলীল) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে উপদেশ দিয়েছেন যে, "আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না, যদিও তোমাকে কেটে ফেলা হয় এবং আগুনে পুড়িয়ে দেওয়া হয়। আর ইচ্ছাকৃতভাবে কোনো ফরয সালাত ত্যাগ করবে না; কারণ যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে তা ত্যাগ করে, তার থেকে নিরাপত্তা (যিম্মা) উঠে যায়। আর মদ পান করবে না, কেননা তা সকল অকল্যাণের চাবিকাঠি।"









আল-জামি` আল-কামিল (1696)


1696 - عن أبي موسى قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أعظمُ الناس أجرًا في الصلاة أبعدهم فأبعدهم ممشى، والذي ينتظر الصلاة حتى يصليها مع الإمام أعظم أجرًا من الذي يصلي ثم ينام".

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (651) واللفظ له، ومسلم في المساجد (662) كلاهما
من طريق أبي أسامة، عن يزيد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبي موسى، وزاد"حتى يصليها مع الإمام في جماعة".




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "সালাতে (নামাযের জন্য) মানুষের মধ্যে সর্বাধিক বড় প্রতিদান (আজর) তার, যে দূর থেকে দূরতম পথ হেঁটে আসে। আর যে ব্যক্তি ইমামের সাথে সালাত আদায় করা পর্যন্ত অপেক্ষা করে, তার প্রতিদান ঐ ব্যক্তির চেয়ে বেশি, যে (তাড়াতাড়ি) সালাত আদায় করে অতঃপর ঘুমিয়ে পড়ে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1697)


1697 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من غدا إلى المسجد وراح أعدَّ الله له نُزُلَه من الجنة كلما غدا وراح".

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (662)، ومسلم في المساجد (669)، كلاهما من طريق يزيد بن هارون، قال: أخبرنا محمد بن مُطَرِّف، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة واللفظ للبخاري، وفي لفظ مسلم:"في الجنة نزُلًا". والنُزل: هو ما يُهيأ للضيف عند قدومه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যে ব্যক্তি সকাল-সন্ধ্যায় মসজিদের দিকে গমন করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য জান্নাতে তার আতিথেয়তার স্থান (নূযূল) প্রস্তুত করে রাখেন; যতবার সে সকাল-সন্ধ্যায় গমন করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1698)


1698 - عن أنس بن مالك قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا بني سلمة! ألا تحسبون آثارَكم".

قال مجاهد: في قوله: {وَنَكْتُبُ مَا قَدَّمُوا وَآثَارَهُمْ} [يس 12]. قال خُطاهم.

صحيح: رواه البخاري في الأذان (655)، وفي رواية (656): أن بني سلمة أرادوا أن يتحولوا عن منازلهم، فينزلوا قريبًا من النبي صلى الله عليه وسلم قال: فكره رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُعرُوا المدينة فقال:"ألا تحتسبون آثاركم" قال مجاهد: خُطاهم، أثارهم أن يُمشَي في الأرض بأرجلهم. رواه الرواية الأولى متصلًا، وقال في الثانية: وقال ابن أبي مريم فذكر إسناده، هكذا في رواية الأكثرين، وفي رواية أبي ذر: وحدثنا ابن أبي مريم، قال أبو نعيم في المستخرج: ذكره البخاري بلا رواية - يعني معلقًا. قال الحافظ: وهذا هو الصواب.

قلت: ثم رواه في فضائل المدينة (1887) متصلًا عن ابن سلام به مثله وزاد: فأقاموا.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হে বানু সালামা! তোমরা কি তোমাদের পদক্ষেপগুলোর (সওয়াবের) হিসাব রাখ না?"

মুজাহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) আল্লাহ্‌র বাণী: {আর আমরা লিখি যা তারা অগ্রে প্রেরণ করে এবং তাদের পদচিহ্নসমূহ} [সূরা ইয়াসিন ১২]-এর ব্যাখ্যায় বলেন: এর অর্থ হলো—তাদের পদক্ষেপসমূহ।









আল-জামি` আল-কামিল (1699)


1699 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من تَطهَّر في بيته ثم مشى إلى بيت من بيوت الله ليقضي فريضة من فرائض الله، كانت خطوتاه إحداهما تحط خطيئةً، والأخرى ترفع درجةً".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (666) من طريق عدي بن ثابت، عن أبي حازم الأشجعي، عن أبي هريرة فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার ঘরে পবিত্রতা অর্জন করে, অতঃপর আল্লাহ্‌র ঘরসমূহের (মসজিদ) কোনো এক ঘরের দিকে হেঁটে যায় আল্লাহ্‌র ফরজসমূহের মধ্য থেকে কোনো এক ফরজ আদায় করার জন্য, তার প্রতিটি পদক্ষেপের একটি পাপ মোচন করে এবং অন্যটি মর্যাদা বৃদ্ধি করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1700)


1700 - عن جابر بن عبد الله قال: كانت ديارنا نائية عن المسجد، فأردنا أن نبيع بيوتنا فنقتربَ من المسجد. فنهانا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إن لكم بكل خُطْوة درجةً".

وفي رواية: قال جابر بن عبد الله: خَلتِ البقاعُ حول المسجد، فأراد بنو سَلِمة أن تنتقلوا إلى قرب المسجد" فبلغ ذلك رسوَل الله صلى الله عليه وسلم فقال لهم:"إنه بلغني أنكم تريدون أن تنتقلوا قرب المسجد" قالوا: نعم يا رسول الله! قد أردنا ذلك، فقال:"يا بني سَلِمة دياركم تُكتبُ آثارُكم، ديارَكم تكتبُ آثارُكم"، فقالوا: ما كان يَسُرُّنا أنّا كنا تحولنا.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (664) الرواية الأولى عن أبي الزبير قال: سمعت جابر بن
عبد الله، والرواية الثانية (665) عن أبي نضرة، عن جابر.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের ঘরগুলো মসজিদ থেকে অনেক দূরে ছিল। আমরা চেয়েছিলাম আমাদের বাড়িগুলো বিক্রি করে মসজিদের কাছাকাছি চলে আসি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে বারণ করলেন এবং বললেন: "নিশ্চয় তোমাদের জন্য প্রতিটি পদক্ষেপে একটি করে মর্যাদা রয়েছে।"

অপর এক বর্ণনায় জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: মসজিদের আশপাশের জায়গাগুলো খালি হয়ে গিয়েছিল। তখন বানু সালামা গোত্র মসজিদের কাছাকাছি চলে আসতে চাইল। এই খবর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে পৌঁছালে তিনি তাদেরকে বললেন: "আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে, তোমরা মসজিদের কাছাকাছি চলে আসতে চাও।" তারা বলল: জি হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা তাই চেয়েছিলাম। তখন তিনি বললেন: "হে বানু সালামা! তোমরা তোমাদের ঘরেই থাকো, তোমাদের পদচিহ্নগুলোর (সওয়াব) লেখা হচ্ছে; তোমাদের ঘরেই থাকো, তোমাদের পদচিহ্নগুলোর (সওয়াব) লেখা হচ্ছে।" তখন তারা বলল: আমরা যদি স্থানান্তরিত হতাম, তবে এখন আমাদের খুশি হতো না (অর্থাৎ তারা দূরে থাকার সওয়াব পেয়ে খুশি হলেন)।