আল-জামি` আল-কামিল
1708 - عن الحارث مولى عثمان بن عفان قال: جلس عثمان يوما، وجلسنا معه، فجاءه المؤذن، فدعا بماء في إناء، أظنه سيكون فيه مد، فتوضأ. ثم قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يتوضأ وضوئي هذا، ثم قال:"ومن توضأ وضوئي هذا، ثم قام. فصلى صلاة الظهر، غفر له ما كان بينها وبين الصبح، ثم صلى العصر غفر له ما بينها وبين صلاة الظهر، ثم صلي المغرب غفر له ما بينها وبين صلاة العصر، ثم صلى العشاء غفر له ما بينها وبين صلاة المغرب، ثم لعله أن يبيت يتمرغ ليلته، ثم إن قام، فتوضأ، وصلى الصبح غفر له ما بينها وبين صلاة العشاء، وهن الحسنات يذهبن السيئات". قالوا: هذه الحسنات، فما الباقيات يا عثمان؟ قال: هن: لا إله إلا الله، وسبحان الله، والحمد لله، والله أكبر، ولا حول ولا قوة إلا بالله.
حسن: رواه أحمد (513)، والبزار (405)، والطبري في تفسيره (12/ 615)، وابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 2092) كلهم من طريق أبي عقيل - وهو زهرة بن معبد -، أنه سمع الحارث مولى عثمان بن عفان قال: فذكره. وإسناده حسن من أجل الحارث مولى عثمان؛ فإنه وإنْ لم يوثقه أحدٌ غير ابن حبان، فإن لحديثه هذا أصلا.
وفي الباب عن ابن عباس رواه الإمام أحمد (2206)، والطبراني (12931) وفيه علي بن زيد ضعيف، وعن معاذ بن جبل رواه الترمذي (3113) وقال: ليس إسناده بمتصل، عبد الرحمن بن أبي
ليلي لم يسمع من معاذ، ومعاذ بن جبل مات في خلافة عمر، وقُتل عمر وعبد الرحمن بن أبي ليلى غلام صغير ابن ستِّ سنين، وقد روي عن عمر. انتهى.
وعن أبي اليسر وهو كعب بن عمرو رواه أيضًا الترمذي (3115) وفيه قيس بن الربيع ضعيف ضعَّفه وكيع وغيره، إلا أن الترمذي حكم عليه بأنه حسن صحيح.
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর মুক্ত দাস হারিস বলেন: একদিন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসলেন এবং আমরা তাঁর সাথে বসলাম। তখন মুয়াজ্জিন তাঁর কাছে এলেন। তিনি একটি পাত্রে পানি আনতে বললেন—আমার ধারণা তাতে এক মুদ পরিমাণ পানি ছিল। এরপর তিনি ওযু করলেন। অতঃপর তিনি (উসমান) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমার এই ওযুর মতোই ওযু করতে দেখেছি। এরপর তিনি (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমার এই ওযুর মতো ওযু করে, অতঃপর দাঁড়িয়ে যুহরের সালাত আদায় করে, তার সেই ওযু এবং ফজর সালাতের মধ্যবর্তী গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। অতঃপর সে আসরের সালাত আদায় করলে, যুহরের সালাত ও এর মধ্যবর্তী গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। অতঃপর সে মাগরিবের সালাত আদায় করলে, আসরের সালাত ও এর মধ্যবর্তী গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। অতঃপর সে ইশার সালাত আদায় করলে, মাগরিবের সালাত ও এর মধ্যবর্তী গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। এরপর সে হয়তো রাতে শয়ন করে এবং সারা রাত গড়াগড়ি করে কাটায়। অতঃপর সে যদি উঠে ওযু করে এবং ফজরের সালাত আদায় করে, তাহলে ইশার সালাত ও এর মধ্যবর্তী গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। আর এগুলিই হলো সেই নেক আমল যা গুনাহসমূহকে দূর করে দেয়।" উপস্থিত লোকেরা বললেন: এগুলো তো হলো নেক আমল। হে উসমান! বাকিগুলো কী? তিনি বললেন: সেগুলো হলো: লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, সুবহানাল্লাহ, আলহামদুলিল্লাহ, আল্লাহু আকবার এবং লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ।
1709 - عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه ذكر الصلاة يومًا فقال:"من حافظ عليها كانت له نورًا وبرهانًا ونجاةً يوم القيامة، ومن لم يحافظ عليها لم يكن له نور ولا برهان ولا نجاة، وكان يوم القيامة مع قارونَ وفرعونَ وهامان وأبيّ بن خَلفَ".
حسن: رواه أحمد (6576) عن أبي عبد الرحمن - وهو عبد الله بن يزيد المقرئ - ثنا سعيد - وهو ابن أبي أيوب، حدثني كعب بن علقمة، عن عيسى بن هلال الصدفي، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكر الحديث.
ومن هذا الطّريق رواه ابن حبان (1467) في صحيحه.
ورواه أيضًا الطبراني في الكبير والأوسط - مجمع البحرين - (1/ 406 رقم 528) من طريق ابن ثوبان، عن سعيد بن أبي أيوب به إلا أنه لم يذكر الجزء الثاني من الحديث وهو قوله:"ومن لم يحافظ عليها .....".
وإسناده حسن من أجل عيسى بن هلال الصدفي، فإنه صدوق كما قال الحافظ وباقي رجال الإسناد ثقات. قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 292): رواه أحمد والطبراني في الكبير والأوسط، ورجال أحمد ثقات.
وذكره المنذريّ في الترغيب والترهيب (839) وقال: رواه أحمد بإسناد جيّد.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একদিন সালাত সম্পর্কে আলোচনা করলেন এবং বললেন: "যে ব্যক্তি এর (সালাতের) রক্ষণাবেক্ষণ করবে, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য নূর (আলো), প্রমাণ এবং নাজাত (মুক্তি) হবে। আর যে ব্যক্তি এর রক্ষণাবেক্ষণ করবে না, কিয়ামতের দিন তার জন্য কোনো নূর, প্রমাণ বা নাজাত থাকবে না। আর সে কিয়ামতের দিন কারূন, ফিরআউন, হামান ও উবাই ইবনু খালাফের সাথে থাকবে।"
1710 - عن أبي أمامة الباهلي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لتُنْقَضَنَّ عُرى الإِسلام عُروةً عَروةً، فكلما انتُقِضَتْ عُروة تَشَبَّثَ الناس بالتي تليها، وأولُهن نَقْضًا الحكمُ، وآخرهُنَّ الصلاةُ".
حسن: رواه أحمد (22160) ومن طريقه الطبراني في الكبير (7486) عن الوليد بن مسلم، حدَّثني عبد العزيز بن إسماعيل بن عبد الله، أن سليمان بن حبيب حدَّثهم، عن أبي أمامة فذكر الحديث. وصححه ابن حبان (6715)، فرواه من هذا الطريق.
وإسناده حسن، فإن عبد العزيز بن إسماعيل بن عبد الله قال فيه ابن أبي حاتم: سألت أبي عنه فقال: ليس به بأس، ووثَّقه ابن حبان. وهو من رجال"التعجيل" (660). ومنه يظهر خطأ الهيثمي في"المجمع" (7/ 281) في قوله:"رجالهما رجال الصحيح". والوليد بن مسلم مدلس إلا أنه
صرَّح بالسماع.
আবূ উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ইসলামের বন্ধনগুলো (বা রজ্জুগুলো) একটির পর একটি অবশ্যই খুলে যাবে। যখনই একটি বন্ধন খুলে যাবে, মানুষ তার পরবর্তী বন্ধনটি শক্তভাবে আঁকড়ে ধরবে। আর সেগুলোর মধ্যে প্রথম যা ভাঙবে তা হলো শাসন (বা আল্লাহর বিধান অনুসারে বিচার/হুকুম), এবং সেগুলোর শেষ যা ভাঙবে তা হলো সালাত।
1711 - عن جابر بن عبد الله أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لكعب بن عجرة:"يا كعب بن عجرة! الصوم جُنّة، والصدقة تطفئ الخطيئة، والصلاة قربان - أو قال -: برهان، يا كعب بن عجرة! إنه لا يدخل الجنة لحم نبت من سحت، النار أولى بها الحديث.
حسن: رواه أحمد (14441)، وأبو يعلى (1999)، والبزار - الكشف (1609)، وصحّحه ابن حبان (4514)، والحاكم (3/ 479 - 480) كلهم من حديث عبد الرزاق - وهو في مصنفه (20719) - عن معمر، عن ابن خُثيم، عن عبد الرحمن بن سابط، عن جابر بن عبد الله فذكره في حديث طويل.
وإسناده حسن من أجل ابن خُثيم - مصغرا - وهو عبد الله بن عثمان بن خثيم فإنه حسن الحديث.
জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা'ব ইবনে উজরাকে বললেন: "হে কা'ব ইবনে উজরা! রোযা হলো ঢাল, আর সদকা পাপকে নির্বাপিত করে, এবং সালাত হলো নৈকট্য লাভের উপায়—অথবা তিনি বললেন—দলিল বা প্রমাণ। হে কা'ব ইবনে উজরা! নিশ্চয়ই সেই গোশত জান্নাতে প্রবেশ করবে না যা হারাম উপার্জন দ্বারা সৃষ্টি হয়েছে। জাহান্নামই তার জন্য বেশি উপযুক্ত।"
1712 - عن كعب بن عجرة قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا كعب بن عجرة! الصلاة برهان والصوم جنة حصينة والصدقة تطفئ الخطيئة كما يطفيء الماء النار يا كعب بن عجرة! إنه لا يربو لحم نبت من سحت إلا كانت النار أولى به" الحديث.
حسن: رواه الترمذي (614) عن عبد الله بن زياد القطواني الكوفي، حدثنا عبيد الله بن موسى، حدثنا غالب أبو بشر، عن أيوب بن عائذ الطائي، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، عن كعب بن عجرة فذكره في سياق طويل.
قال الترمذي: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه لانعرفه إلا من حديث عبد الله بن موسى، وأيوب بن عائذ يضعف ويقال كان يرى رأي الإرجاء، وسألت محمدًا - يعني البخاري - عن هذا فلم يعرفه إلا من حديث عبيد الله بن موسى واستغربه جدًّا اهـ.
قلت: إسناده حسن من أجل غالب أبي بشر وثّقه ابن معين، وذكره ابن حبان في ثقاته، وهو حسن الحديث، وأما أيوب بن عائذ فأكثر أهل العلم على توثيقه.
কা'ব ইবনে 'উজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন, "হে কা'ব ইবনে 'উজরাহ! সালাত (নামায) হচ্ছে প্রমাণ (বা দলিল), সাওম (রোযা) হলো মজবুত ঢাল, আর সাদাকাহ (দান) গুনাহকে নিভিয়ে দেয়, যেমন পানি আগুনকে নিভিয়ে দেয়। হে কা'ব ইবনে 'উজরাহ! নিশ্চয় যে গোশত হারাম উপার্জন (সুহত) থেকে উৎপন্ন হয়, জাহান্নামের আগুনই তার জন্য অধিক উপযুক্ত।" (আল-হাদীস)।
1713 - عن رجل من الأنصار قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"قم يا بلال، فأرحْنا بالصلاة".
صحيح: رواه أبو داود (4986)، وأحمد (23154) كلاهما من حديث إسرائيل، حدثنا عثمان بن المغيرة، عن سالم بن أبي الجعد، عن عبد الله بن محمد ابن الحنفية قال: انطلقت أنا وأبي إلى صهر لنا من الأنصار نعوده، فحضرت الصلاة، فقال لبعض أهله: يا جارية ائتوني بوضوء لعلي
أصلي وأستريح قال: فأنكرنا ذلك عليه فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث. وإسناده صحيح.
ورواه أبو داود (4985)، وأحمد (23088) كلاهما من وجه آخر عن مسعر بن كدام، عن عمرو بن مرة، عن سالم بن أبي الجعد، عن رجل من أسلم - كذا عند أحمد، وعند أبي داود رجل من خزاعة - أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يا بلال أقم الصلاة، أرحنا بها". فإنْ صحّ هذا الطريق فهو شاهد للطريق الأول، وقد روي مرسلا عن محمد ابن الحنفية، والحكم لمن وصل.
قوله:"أرحنا بالصلاة" أي نتفرغ من الصلاة لأن القلب مشغول بها.
وقيل: معناه كان اشتغاله بالصلاة راحة له، وهذا المعنى لا يناسب في هذا المقام.
আনসারী এক ব্যক্তি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "হে বেলাল, ওঠো, সালাতের মাধ্যমে আমাদের শান্তি দাও।"
1714 - عن * *
১৭১৪ - থেকে * *
1715 - عن عمر بن عبد العزيز أنه أخَّرَ الصلاة يومًا، فدخل عليه عروة بن الزبير، فأخبره أن المغيرة بن شعبة أخر الصلاة يومًا وهو بالكوفة، فدخل عليه أبو مسعود الأنصاري فقال: ما هذا يا مغيرة! أليس قد علمت؟ أن جبريل نزل فصلَّى، فصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم صلَّى، فصلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم صلَّى، فصلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم صلَّى، فصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم صلَّى فصلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال"بهذا أمرتُ".
فقال عمر بن عبد العزيز: اعلَمْ ما تُحدثُ به يا عروةُ! أو إنَّ جبريل هو الذي أقام لرسول الله صلى الله عليه وسلم في وقت الصلاة، قال عروة: كذلك كان بشير بن أبي مسعود الأنصاري يُحدث عن أبيه.
متفق عليه: رواه مالك في وقوت الصلاة (1) عن ابن شهاب، عن عمر بن عبد العزيز.
ورواه البخاري في مواقيت الصلاة (521) ومسلم في المساجد (610) كلاهما من طريق مالك، بإسناده.
ورواه الشيخان، البخاري (3221)، ومسلم من طريق الليث بن سعد، عن ابن شهاب، أن عمر بن عبد العزيز أخَّر العصر شيئًا، وقال في آخره: يحسب بأصابعه خمس صلوات، هذه القصة سمعها ابن شهاب من عروة بن الزبير كما رواه تلميذه شعيب عنه. البخاري (4007).
قال أبو داود:"روى هذا الحديث عن الزهري معمر ومالك وابن عينة وشعيب بن أبي حمزة والليث بن سعد وغيرهم، ولم يذكروا الوقت الذي صلى فيه ولم يفسروه" اهـ.
قلت: وأما أبو داود نفسه فروي مفسرًا (394) من طريق أسامة بن زيد الليثي أن ابن شهاب أخبره، أن عمر بن عبد العزيز كان قاعدًا على المنبر فأخَّر العصرَ شيئًا، فقال له عروة بن الزبير: أما إن جبريل عليه السلام قد أخبر محمدًا صلى الله عليه وسلم بوقت الصلاة، فقال له عمر: اعلم ما تقول، فقال عروة: سمعت بشير بن أبي مسعود بقول: سمعتُ أبا مسعود الأنصاري يقول: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"نزل جبريل عليه السلام فأخبرني بوقت الصلاة، فصلَّيْتُ معه، ثم صلَّيْتُ معه، ثم صلَّيتُ معه، ثم صلَّيتُ معه"، ثم صلَّيتُ معه"، بحسب بأصابعه خمس صلوات، فرأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم صَلَّى الظُّهْرَ حين تزول الشمسُ، وربما أخَّرها حين يشتد الحَرُّ، ورأيتُه يُصَلِّي العصر والشمسُ مرتفعة بيضاء قبل أن تدخلها الصفرةُ، فينصرف الرجل من الصلاة فيأتي ذا الحليفة قبل غروب الشَّمْسِ، ويُصَلِّي المغربَ حين تسقطُ الشمسُ، ويُصَلِّي العِشاءَ حين يَسْوَدُّ الأُفق، وربما أخَّرها حتى يجتمع الناس، وَصلَّى الصُبْحَ مرَّةٌ بغلَسٍ ثم صَلَّى مرةً أخرى فأسْفَر بها، ثم كانت صلاته بعد ذلك في التغليس حتى مات، ولم يَعُد إلى أن يُسْفِر". رواه أيضًا النسائي (495)، وابن ماجة (168) مختصرًا.
আবু মাসউদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনে আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) একদিন সালাত আদায়ে বিলম্ব করলেন। তখন উরওয়া ইবন আয-যুবাইর তাঁর কাছে প্রবেশ করে তাকে জানালেন যে, একবার আল-মুগীরাহ ইবন শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুফায় থাকাকালে একদিন সালাত আদায়ে বিলম্ব করেছিলেন। তখন আবূ মাসউদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার কাছে গিয়ে বললেন: হে মুগীরাহ! এটা কী? তুমি কি জানো না? জিবরীল (আঃ) অবতরণ করে সালাত আদায় করলেন, ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি (জিবরীল) সালাত আদায় করলেন, ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি সালাত আদায় করলেন, ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি সালাত আদায় করলেন, ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি সালাত আদায় করলেন, ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও সালাত আদায় করলেন। তারপর তিনি (জিবরীল) বললেন, "আমাকে এই বিষয়েই আদেশ করা হয়েছে।"
তখন উমর ইবন আব্দুল আযীয বললেন: হে উরওয়া, তুমি যা বর্ণনা করছো, তা জেনে বলো! নাকি জিবরীলই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য সালাতের সময় নির্ধারণ করে দিয়েছিলেন? উরওয়া বললেন: আনসারী আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পুত্র বাশীর তাঁর পিতার সূত্রে এমনই বর্ণনা করতেন।
(আবু মাসউদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরও বর্ণিত, তিনি বলেন) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "জিবরীল (আঃ) অবতরণ করলেন এবং আমাকে সালাতের সময় সম্পর্কে জানালেন। আমি তাঁর সাথে সালাত আদায় করলাম, অতঃপর তাঁর সাথে সালাত আদায় করলাম, অতঃপর তাঁর সাথে সালাত আদায় করলাম, অতঃপর তাঁর সাথে সালাত আদায় করলাম, অতঃপর তাঁর সাথে সালাত আদায় করলাম।" তিনি (বর্ণনাকারী) আঙ্গুলে গুণে পাঁচটি সালাত গণনা করলেন। (আবূ মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন,) আমি দেখেছি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহরের সালাত আদায় করতেন যখন সূর্য ঢলে যেত, তবে কখনো কখনো গরম খুব তীব্র হলে কিছুটা বিলম্ব করতেন। আমি তাঁকে আসরের সালাত আদায় করতে দেখেছি যখন সূর্য উজ্জ্বল ও সাদা থাকত এবং তাতে হলদে ভাব আসার আগেই তিনি তা শেষ করতেন। ফলে এক ব্যক্তি সালাত শেষ করে রওনা হলে সূর্য ডোবার আগেই যুল-হুল্লাইফা পৌঁছতে পারত। তিনি মাগরিবের সালাত আদায় করতেন সূর্য ডুবে যাওয়ার সাথে সাথে। তিনি ইশার সালাত আদায় করতেন যখন দিগন্তে অন্ধকার ঘনিয়ে আসত; তবে কখনো কখনো লোকজনের সমাবেশ ঘটার জন্য তা বিলম্ব করতেন। তিনি ফজরের সালাত একবার আদায় করলেন যখন অন্ধকার ছিল, অতঃপর আরেকবার আদায় করলেন যখন ফর্সা হয়েছিল, কিন্তু এর পরে মৃত্যু পর্যন্ত তিনি সবসময় অন্ধকারের মধ্যেই (তাগলিস) সালাত আদায় করতেন এবং ফর্সা হওয়ার দিকে আর ফিরে যাননি।
1716 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمَّني جبريل عليه السلام عند البيت مرتين، فصَلَّى بي الظُّهْر حين زالتِ الشمسُ، وكانت قدر الشِّراكِ، وصَلَّى بي العصرَ حين كان ظِلُّه مثله، وصَلَّى بي - يعني المغربَ حين أفْطَر الصائمُ، وصلى بي العِشَاءَ حيث غاب الشَّفقُ، وصلى بي الفجر حين حُرمَ الطعامُ والشرابُ على الصائم، فلما كان الغدُ صَلَّى بي الظُّهْرَ حين كان ظِلُّه مثلَه، وصلَّى به العصر حين كان ظِلُّه مثْليْه، وصلَّى بي المغربَ حين أفْطَر الصائم، وصلى بي العشاءَ إلى ثُلُثِ اللَيْلِ، وصَلَّى بي الفجر، فأسْفَر ثم التفتَ إليَّ فقال: يا محمد! هذا وقت الأنبياء من قبلك، والوقت ما بين هذين الوقتين".
حسن: أخرجه أبو داود (393)، والترمذي (149) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن الحارث بن عَيَّاش بن ربيعة، عن حكيم بن حكيم، عن نافع بن جبير بن مطعم، عن ابن عباس فذكر مثله، واللفظ لأبي داود.
وإسناده حسن للكلام في عبد الرحمن بن عبد الله بن عيَّاش فقد وثَّقه ابن سعد والعجلي، وقال ابن معين: صالح، وفي رواية: ليس به بأس، وضعَّفه ابن المديني، وقال النسائي: ليس بالقوي.
وكذلك فيه حكيم بن حكيم بن عباس بن حنيف الأنصاري وثَّقه العجلي، وذكره ابن حبان في الثقات، وضعَّفه ابن المديني، وقال النسائي: ليس به بأس.
قال ابن عبد البر: وقد تكلم بعض الناس في حديث ابن عباس هذا بكلام لا وجه له، ورواته كلُّهم مشهورون بالعلم، وقد أخرجه عبد الرزاق (2028) عن الثوري وابن أبي سبرة، عن عبد الرحمن بن الحارث، وأخرجه أيضًا عن العمري، عن عمر بن نافع بن جبير بن مطعم، عن أبيه، عن ابن عباس نحوه. انتهى.
قلت: وحسَّنه الترمذي، وفي نسخة: حسن صحيح كما نقل الزيلعي، وصحّحه ابن خزيمة (325)، والحاكم (1/ 193) وقال: صحيح الإسناد ولم يخرجاه.
قلت: عبد الرحمن بن الحارث لم يتفرد به، بل تابعه محمد بن عمرو، عن حكيم، كما أن حكيم بن حكيم تابعه زياد بن أبي زياد وعبيد الله بن مقسم، كلاهما عن نافع بن جبير به، وحديث هؤلاء أخرجه الدارقطني (1/ 258 - 259).
وقال الحافظ في التلخيص (1/ 173): وصحّحه أبو بكر بن العربي وابن عبد البر، وقال ابن عبد البر: لا توجد هذه اللفظة، وهي قوله:"هذا وقتك ووقت الأنبياء من قبلك" إلا في هذا الحديث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জিবরীল (আঃ) আমাকে বাইতুল্লাহর (কা'বার) নিকট দু'বার ইমামতি করিয়েছেন। তিনি আমাকে নিয়ে যুহরের সালাত আদায় করলেন যখন সূর্য ঢলে পড়ল এবং (ছায়া) জুতার ফিতার পরিমাণের ছিল। আর আমাকে নিয়ে আসরের সালাত আদায় করলেন যখন কোনো বস্তুর ছায়া তার সমান হয়েছিল। আর আমাকে নিয়ে মাগরিবের সালাত আদায় করলেন যখন রোযাদার ইফতার করে। আর আমাকে নিয়ে এশার সালাত আদায় করলেন যখন শাফাক (লাল আভা) অদৃশ্য হলো। আর আমাকে নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন যখন রোযাদারের জন্য পানাহার হারাম হয়ে যায় (অর্থাৎ সুবহে সাদিক হওয়ার পর)। এরপর যখন পরের দিন হলো, তখন তিনি আমাকে নিয়ে যুহরের সালাত আদায় করলেন যখন কোনো বস্তুর ছায়া তার সমান হলো। আর আমাকে নিয়ে আসরের সালাত আদায় করলেন যখন তার ছায়া দ্বিগুণ হয়েছিল। আর আমাকে নিয়ে মাগরিবের সালাত আদায় করলেন যখন রোযাদার ইফতার করে। আর আমাকে নিয়ে এশার সালাত আদায় করলেন রাতের এক-তৃতীয়াংশ পর্যন্ত। আর আমাকে নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন যখন বেশ আলো হয়ে গেল। অতঃপর তিনি আমার দিকে ফিরে তাকালেন এবং বললেন: হে মুহাম্মাদ! এটি আপনার পূর্ববর্তী নবীগণের (সালাতের) সময় ছিল। আর (সালাতের) সময় হলো এই দুই সময়ের মধ্যবর্তী।
1717 - عن جابر بن عبد الله قال: جاء جبريل عليه السلام إلى النبي صلى الله عليه وسلم حين زالت الشمسُ فقال: قُم يا محمد! فصَلِّ الظُّهْرَ حين مالتِ الشمسُ، ثم مكثَ حتى إذا كان فيءُ الرجلِ مثلُه جاءه للعصر فقال: قم يا محمد! فَصَلِّ العصر، ثم مكث حتى إذا غابتِ الشمسُ جاءه فقال: قُم فصَلِّ المغربَ، فقام فصلَّاها حين غابتِ الشمسُ سواءً، ثم مكثَ حتى إذا ذهب الشَفقُ جاءه فقال: قُم فصَلِّ العِشاءَ فقام فصلَّاها، ثم جاءه حين سَطَعَ الفَجْرُ في الصُّبْح فقال: قُم يا محمد! فصَلِّ فقام فصلَّى الصُّبْحَ، ثم جاءه من الغَدِ حين كان فيءُ الرجُلِ مثلَه فقال: قم يا محمد! فصَلِّ الظُّهْرَ، ثم جاءه جبريل عليه السلام حين كان فيءُ الرجُلِ مِثْلَيْه فقال: قم يا محمد! فصَلِّ فصَلَّى العصرَ، ثم جاءه للمغرب حين غابتِ الشَمس وقْتًا واحدًا لم يَزُلْ عنه فقال: قُم فصَلِّ، فَصَلَّى المغربَ، ثم جاءه للعشَاء حين ذهب ثُلُثُ اللَّيْل الأولُ فقال: قُم فصَلِّ فصَلَّى العِشَاءَ، ثم جاءه للصُّبْح حين أسْفَر جدًّا، فقال: قم فَصَلِّ فَصَلَّى الصُّبْحَ فقال: ما بين هذين وقت كلُّه.
حسن: رواه النسائي (526) واللفظ له، والترمذي (150) كلاهما من طريق عبد الله بن
المبارك، عن حسين بن علي بن حسين، قال: أخبرني وهب بن كيسان، قال: حدثنا جابر بن عبد الله فذكره.
وأما الترمذي فلم يسق لفظ الحديث، وإنما أحال على حديث ابن عباس فقال:"بمعناه". وقال: قال محمد:"أَصَحُّ شيء في المواقيتِ حديث جابر عن النبي صلى الله عليه وسلم".
وقال الحاكم بعد أن أخرج الحديث من طريق ابن المبارك (1/ 195 - 196):"هذا حديث صحيح مشهور من حديث عبد الله بن المبارك، والشيخان لم يخرجاه لعِلة حديث الحسين بن علي الأصغر، وقد روى عنه عبد الرحمن بن أبي الموال وغيره".
قلت: إسناده حسن من أجل حسين الأصغر هو أخو أبي جعفر بن علي بن الحسين، قال النسائي: ثقة، وذكره ابن حبان في الثقات.
ولحديث جابر طريق آخر وهو عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر رواه النسائي (513)، وابن خزيمة (353)، والحاكم (1/ 196) والبيهقي (1/ 368 - 368)، وأحمد (14790) كلهم من طرق عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر قال: إن جبريل أتى النبي صلى الله عليه وسلم يُعلِّمه مواقيت الصلاة، فتقدم جبريلُ ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم خلْقَه، والناسُ خَلْفَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ثم ذكر نحوه.
وقد أشار إلى هذه الطرق الترمذي نقلًا عن البخاري، فقال: وحديث جابر في المواقيت قد رواه عطاء بن أبي رباح وعمرو بن دينار وأبو الزبير، عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو حديث وهب بن كيسان، عن جابر بن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم".
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিবরীল আলাইহিস সালাম সূর্য হেলে যাওয়ার পর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলেন এবং বললেন, "হে মুহাম্মাদ! উঠুন এবং যুহরের সালাত আদায় করুন যখন সূর্য হেলে গেল।" তারপর তিনি অবস্থান করলেন। যখন কোনো ব্যক্তির ছায়া তার সমান হলো, তখন তিনি আসরের জন্য তাঁর কাছে এলেন এবং বললেন, "হে মুহাম্মাদ! উঠুন এবং আসরের সালাত আদায় করুন।" তারপর তিনি অবস্থান করলেন। যখন সূর্য ডুবে গেল, তখন তিনি তাঁর কাছে এসে বললেন, "উঠুন এবং মাগরিবের সালাত আদায় করুন।" তিনি উঠলেন এবং সূর্য ডোবার সঙ্গে সঙ্গেই তা আদায় করলেন। তারপর তিনি অবস্থান করলেন। যখন শাফাক (আকাশের লালিমা) দূর হয়ে গেল, তখন তিনি তাঁর কাছে এসে বললেন, "উঠুন এবং ঈশার সালাত আদায় করুন।" তিনি উঠলেন এবং তা আদায় করলেন। এরপর সুবহে সাদিকের সময় ফজর উদিত হলে তিনি এলেন এবং বললেন, "হে মুহাম্মাদ! উঠুন এবং সালাত আদায় করুন।" তিনি উঠলেন এবং ফজরের সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি পরের দিন এলেন যখন কোনো ব্যক্তির ছায়া তার (দৈর্ঘ্যের) সমান হলো। তিনি বললেন, "হে মুহাম্মাদ! উঠুন এবং যুহরের সালাত আদায় করুন।" এরপর জিবরীল আলাইহিস সালাম তাঁর কাছে এলেন যখন ব্যক্তির ছায়া তার দ্বিগুণ হলো। তিনি বললেন, "হে মুহাম্মাদ! উঠুন এবং সালাত আদায় করুন।" তিনি আসরের সালাত আদায় করলেন। এরপর মাগরিবের জন্য তিনি তাঁর কাছে এলেন যখন সূর্য একই সময়ে (প্রথম দিনের মতোই) ডুবে গেল এবং তিনি সেখান থেকে সরলেন না। তিনি বললেন, "উঠুন এবং সালাত আদায় করুন।" তিনি মাগরিবের সালাত আদায় করলেন। এরপর ঈশার জন্য তিনি তাঁর কাছে এলেন যখন রাতের প্রথম এক তৃতীয়াংশ চলে গেল। তিনি বললেন, "উঠুন এবং সালাত আদায় করুন।" তিনি ঈশার সালাত আদায় করলেন। এরপর ফজরের জন্য তিনি তাঁর কাছে এলেন যখন খুব ভোরে বেশ আলো ছড়াল (ইস্ফার হলো)। তিনি বললেন, "উঠুন এবং সালাত আদায় করুন।" তিনি ফজরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি (জিবরীল) বললেন: এই দুই সময়ের মধ্যবর্তী পুরোটা সময়।
1718 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: هذا جبريل عليه السلام جاءكم يُعلمكم دينكم، فصلَّى الصُّبْحَ حين طَلَعَ الفَجْرُ، وصَلَّى الظُّهْرَ حينَ زَاغَتِ الشمسُ، ثم صَلَّى العَصْر حين رأى الظِّلِّ مِثْلَه، ثم صَلَّى المغربَ حينَ غَرَبتِ الشمسُ، وحَلَّ فِطْرُ الصائم، ثم صَلَّى العِشَاءَ حينَ ذهبَ شَفَقُ اللَّيْل، ثم جاءَه الغدَ فصَلَّى به الصُّبْحَ حين أسْفَر قليلًا، ثم صلَّى به الظُّهرَ حينَ كان الظِّلُّ مثْلَه ثم صلَّى العَصْر حين كان الظِّلُّ مِثْلَيه، ثم صَلَّى المغْرِبَ بوقتٍ واحدٍ حينَ غربتِ الشمسُ، وحَلَّ فِطْرُ الصائم، ثم صَلَّى العِشَاءَ حين ذهبَ ساعةٌ من اللَّيْلِ، ثم قال: الصلاة ما بين صلاتِك أمْسِ وصلاتِك اليومَ".
حسن: رواه النسائي (502) قال: أخبرنا الحسين بن حُريثٍ، قال: أنبأنا الفضل بن موسى، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وصحّحه الحاكم (1/ 194) من طريق الفضل بن موسى به مختصرًا.
قلت: إسناده حسن فإن محمد بن عمرو وهو: ابن علقمة الليثي أبو عبد الله"صدوق"، وقد
تكلم فيه يعقوب بن شيبة وابن سعد، وروى له الجماعة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ইনি হলেন জিবরাঈল (আঃ), যিনি তোমাদের নিকট এসেছেন তোমাদের দ্বীন শিক্ষা দিতে। তিনি সুবহে সাদিক উদিত হওয়ার সময় ফজরের সালাত আদায় করলেন, আর সূর্য যখন ঢলে পড়ল, তখন যোহরের সালাত আদায় করলেন, এরপর ছায়া যখন কোনো বস্তুর সমান হলো, তখন আসরের সালাত আদায় করলেন, এরপর সূর্য যখন ডুবে গেল এবং রোযাদারের ইফতার বৈধ হলো, তখন মাগরিবের সালাত আদায় করলেন, এরপর রাতের লালিমা (শাফাক) যখন অদৃশ্য হলো, তখন ইশার সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি পরের দিন এলেন এবং তাঁর সাথে ফজরের সালাত আদায় করলেন যখন কিছুটা ফর্সা হয়ে গিয়েছিল, এরপর তাঁর সাথে যোহরের সালাত আদায় করলেন যখন ছায়া তার সমান হয়েছিল, এরপর আসরের সালাত আদায় করলেন যখন ছায়া দ্বিগুণ হয়ে গিয়েছিল, এরপর তিনি মাগরিবের সালাত একই সময়ে আদায় করলেন—যখন সূর্য ডুবে গেল এবং রোযাদারের ইফতার বৈধ হলো, এরপর ইশার সালাত আদায় করলেন যখন রাতের এক প্রহর পার হয়ে গিয়েছিল। অতঃপর তিনি বললেন: গতকাল তোমার সালাত এবং আজকের তোমার সালাতের মধ্যবর্তী সময়গুলোই হলো সালাতের সময়।”
1719 - عن عمرو بن حزم قال: جاء جبريل عليه السلام يُصَلِّي بالنبي صلى الله عليه وسلم، وصلَّى النبي صلى الله عليه وسلم بالناس حين زالتِ الشمس، ثم صلى العصر حين كان ظِلُّه مثله، ثم صلَّى المغربَ حين غربتِ الشمسُ، ثم صلى العِشَاءَ بعد ذلك - كأنه يريد ذهاب الشفق - ثم صَلَّى الفجر بغلسٍ حين فجر الفجرُ، ثم جاء جبريل عليه السلام من الغدِ، فصلَّى الظُّهر بالنبي صلى الله عليه وسلم، وصلى النبي صلى الله عليه وسلم بالناس الظُّهْرَ حين كان ظِلُّه مثله، ثم صلى العصر حين صار ظِلُّه مثليه، ثم صلي المغرب حين غربت الشمسُ لوقت واحد، ثم صلى العشاء بعد ما ذهب هوى من الليل، ثم صلى الفجْرَ فأسْفَرَ جدًّا.
حسن: رواه إسحاق بن راهويه في"مسنده" عن عبد الرزاق، ثنا معمر، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن أبيه، عن جده، عمرو بن حزم، فذكر الحديث.
أورده الحافظ في"المطالب العالية" (1/ 140) والبوصيري في"إتحاف الخيرة" (1/ 40 - 41) رقم (1133) كلاهما من مسند إسحاق بإسناده.
قال البوصيري:"هذا إسناد حسن". وقال الحافظ:"هذا إسناد حسن إلا أن محمد بن عمرو بن حزم لم يسمع من النبي صلى الله عليه وسلم لصغره، فإن كان الضمير في جده يعود على أبي بكر توقف على سماع أبي بكر من عمرو". انتهى.
قلت: كلاهما رويا من عبد الرزاق، عن معمر، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حرم، عن أبيه، عن جده، فجاء هذا الإشكال.
والذي في مصنف عبد الرزاق (1/ 534) رقم (2032): عن معمر، عن عبد الله بن أبي بكر، عن محمد بن عمرو بن حزم، عن أبيه فذكر الحديث، فلا إشكال فيه، فهل كان في نسختهما كما ذكرا؟ والله تعالى أعلم.
ورجال الإسناد كلهم ثقات، ومحمد وأبوه عمرو بن حزم كان لهما صحبة، إلا أن محمدًا لم يرو عن النبي صلى الله عليه وسلم لأنه كان له رؤية فقط.
আমর ইবনে হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিবরীল (আঃ) এলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাত আদায়ের সময় জানাতে। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন যখন সূর্য পশ্চিম দিকে হেলে গেল। অতঃপর তিনি আসরের সালাত আদায় করলেন যখন কোনো বস্তুর ছায়া তার সমান হয়েছিল। অতঃপর তিনি মাগরিবের সালাত আদায় করলেন যখন সূর্য ডুবে গেল। এরপর তিনি ইশার সালাত আদায় করলেন—সম্ভবত তিনি মনে করছিলেন যে (পশ্চিম আকাশের) লালিমা দূর হয়ে গেছে। অতঃপর তিনি ফজরের সালাত আদায় করলেন যখন ফজর উদিত হলো, তখনো হালকা অন্ধকার ছিল। এরপর পরের দিন জিবরীল (আঃ) এলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিয়ে যোহরের সালাত আদায় করলেন। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের নিয়ে যোহরের সালাত আদায় করলেন যখন কোনো বস্তুর ছায়া তার সমান হয়েছিল। অতঃপর তিনি আসরের সালাত আদায় করলেন যখন তার ছায়া দ্বিগুণ হয়ে গেল। অতঃপর তিনি মাগরিবের সালাত আদায় করলেন যখন সূর্য ডুবে গেল—(প্রথম দিনের) একই সময়ে। অতঃপর তিনি ইশার সালাত আদায় করলেন যখন রাতের কিছুটা অংশ চলে গিয়েছিল। অতঃপর তিনি ফজরের সালাত আদায় করলেন যখন (আলো হয়ে) বেশ ফর্সা হয়ে গিয়েছিল।
1720 - عن جابر بن عبد الله أن سئل عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الظُّهْر بالهاجِرة، والعَصْرَ والشمسُ نقيةٌ، والمغربَ إذا وجبتْ، والعِشاءَ أحيانًا وأحيانًا: إذا رآهم اجتمعوا عَجَّل، وإذا رآهم أبطؤوا أخَّرَ، والصُّبْحَ كانوا أو كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّيها بغَلَسٍ.
متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (560، 565)، ومسلم في المساجد (646) كلاهما من
طريق شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن محمد بن عمرو بن الحسن بن عَليٍّ قال: لما قَدِم الحجَّاجُ المدينة فسألنا جابر بن عبد الله فذكر الحديث ولفظهما سواء.
وفي رواية عند مسلم: كان الحجَّاجُ يُؤخِّر الصلوات فسألنا جابر بن عبد الله فذكر الحديث.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত (নামাজ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহরের সালাত আদায় করতেন দিনের মধ্যভাগে (তীব্র দুপুরে); আর আসরের সালাত আদায় করতেন যখন সূর্য নির্মল ও উজ্জ্বল থাকত; আর মাগরিবের সালাত আদায় করতেন যখন (সূর্য) ডুবে যেত। আর ইশার সালাত তিনি কখনো আগে এবং কখনো পরে আদায় করতেন। যদি তিনি দেখতেন যে সাহাবীরা দ্রুত একত্রিত হয়েছেন, তবে তিনি তা দ্রুত আদায় করতেন। আর যদি দেখতেন যে তারা বিলম্ব করছেন, তবে তিনি দেরি করতেন। আর ফজরের সালাত নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভোরের অন্ধকার (অন্ধকার থাকা অবস্থায়) থাকতেই আদায় করতেন।
1721 - عن أبي برزَة كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الصُّبْح، وأحدنا يعرف جَليسَه، ويقرأ فيها ما بين الستين إلى المائة، ويُصلي الظهر إذا زالت الشمسُ، والعصْرَ وأحدنا يذهبُ إلى أقصى المدينة رجع والشمسُ حيَّةٌ، ونَسيتُ ما قال في المغرب، ولا يُبالي بتأخير العِشاء إلى ثلثِ اللَّيل - ثم قال: إلى شطر الليل.
وقال مُعاذ قال شعبة: ثم لقيته مرة فقال:"أو ثلث الليل".
متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (541) عن حفص بن عمر، ثنا شعبة، عن أبي المنهال، عن أبي برزَة فذكر الحديث، ورواه مسلم في المساجد (647) من أوجه عن شعبة به مثله.
وأبو المنهال اسمه: سيّار بن سلامة.
وقول البخاري: وقال معاذ - يقصد به - معاذ بن معاذ بن نصر بن حسان العنبري البصري، وروى حديثه مسلم في صحيحه عن عبيد الله بن معاذ، ثنا أبي، ثنا شعبة فذكر مثله.
ورواه حماد بن سلمة عن سيار بن سلامة أبي المنهال قال: سمعت أبا برزَة الأسلمي فذكر الحديث في تأخير العشاء إلى ثلث الليل ثم قال:"ويكره النوم قبلها والحديث بعدها" رواه مسلم.
আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাত আদায় করতেন, তখন আমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার পার্শ্ববর্তী ব্যক্তিকে চিনতে পারত, আর তিনি তাতে (সালাতে) ষাট থেকে একশো আয়াতের মধ্যবর্তী অংশ তিলাওয়াত করতেন। তিনি যুহরের সালাত আদায় করতেন যখন সূর্য হেলে যেত, এবং আসরের সালাত আদায় করতেন যখন আমাদের কেউ মদীনার দূরবর্তী স্থানে গিয়েও ফিরে আসতে পারত, আর তখনও সূর্য সতেজ থাকতো। আর মাগরিব সম্পর্কে তিনি কী বলেছেন, তা আমি ভুলে গেছি। আর ইশার সালাত রাতের এক-তৃতীয়াংশ পর্যন্ত বিলম্বিত করাকে তিনি গুরুত্ব দিতেন না – এরপর তিনি বললেন: বরং (কখনো কখনো) রাতের অর্ধাংশ পর্যন্ত।
1722 - عن عبد الله بن عمرو، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا صَلَّيتُم الفَجْرَ فإنه وقتٌ إلى أن يطْلُعَ قرنُ الشمسِ الأولِ، ثم إذا صَلَّيتُم الظُّهْرَ فإنّه وقت إلى أن يحضر العَصْرُ، فإذا صَلَّيتُم العَصْرَ فإنه وقتٌ إلى أن تصْفَرَّ الشمسُ، فإذا صَلَّيتُم المغرب فإنه وقتٌ إلى أن يسقُطَ الشَفَقُ، فإذا صَلَّيتُم العِشَاءِ فإنه وقتٌ إلى نصفِ اللَّيلِ".
وفي رواية:"وقْتُ الظُّهْرِ ما لم يحضرِ العصرُ، ووقْتُ العَصْرِ ما لم تصْفَرَّ الشمسُ، ووقتُ المغْربِ ما لم يسقُطْ ثَورُ الشَّفَق، ووقت العِشاء إلى نصِف اللّيلِ، وقت الفَجْرِ ما لم تطْلُعِ الشمسُ".
وفي رواية:"وقتُ الظُّهْرِ إذا زالتِ الشمسُ، وكان ظِلُّ الرجل كطولِه، ما لم يحضُرِ العصرُ، ووقتُ العصْرِ ما لم تَصْفَرَّ الشمسُ، ووقتُ صلاة المغربِ ما لم يَغِبِ الشَّفَقُ، ووقتُ صلاة العشاء إلى نصف الليل الأوسط، ووقْتُ صلاةِ الصُبح من طلوع الفَجْر ما لم تطْلُعِ الشمسُ، فإذا طَلَعتِ الشمسُ فأَمْسِكْ عن الصلاة، فإنَّها تطلعُ بين قرني شيطان".
وفي رواية سئل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن الصلوات فقال:"وقْتُ صلاة الفجر ما لم يطلُعْ قرنُ الشمس الأول، ووقتُ صلاةِ الظُّهْرِ إذا زالتِ الشمسُ عن بَطْن السماءِ ما لم يحضرِ العصرُ، ووقتُ صلاة العصر ما لم تصْفَرَّ الشمسُ ويسقُطْ قرنُها الأوَّلُ، ووقتُ صلاةِ المغربِ إذا غابَتِ الشمسُ ما لم يسقُطِ الشَّفَقُ، ووقتُ صلاةِ العِشاء إلى نصفِ الليل".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (612) كل هذه الروايات من طريق قتادة، عن أبي أيوب، عن عبد الله بن عمرو فذكر مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন তোমরা ফজরের সালাত আদায় করো, তখন তা হলো এমন সময়কাল যা সূর্যের প্রথম শিং উদিত না হওয়া পর্যন্ত স্থায়ী থাকে। এরপর যখন তোমরা যুহরের সালাত আদায় করো, তখন তা হলো এমন সময়কাল যা আসরের সময়কাল উপস্থিত না হওয়া পর্যন্ত স্থায়ী থাকে। এরপর যখন তোমরা আসরের সালাত আদায় করো, তখন তা হলো এমন সময়কাল যা সূর্য হলুদ বর্ণ ধারণ না করা পর্যন্ত স্থায়ী থাকে। এরপর যখন তোমরা মাগরিবের সালাত আদায় করো, তখন তা হলো এমন সময়কাল যা শাফাক্ব (লাল আভা) বিলীন না হওয়া পর্যন্ত স্থায়ী থাকে। আর যখন তোমরা ইশার সালাত আদায় করো, তখন তা হলো এমন সময়কাল যা অর্ধরাত পর্যন্ত স্থায়ী থাকে।”
অন্য এক বর্ণনায় আছে: “যুহরের সময়কাল ততক্ষণ পর্যন্ত, যতক্ষণ না আসর উপস্থিত হয়। আর আসরের সময়কাল ততক্ষণ পর্যন্ত, যতক্ষণ না সূর্য হলুদ বর্ণ ধারণ করে। আর মাগরিবের সময়কাল ততক্ষণ পর্যন্ত, যতক্ষণ না শাফাক্বের লালিমা বিলীন হয়। আর ইশার সময়কাল হলো অর্ধরাত পর্যন্ত। ফজরের সময়কাল ততক্ষণ পর্যন্ত, যতক্ষণ না সূর্য উদিত হয়।”
আরেক বর্ণনায় আছে: “যুহরের সময়কাল শুরু হয় যখন সূর্য হেলে যায় (যাওয়াল হয়), আর ব্যক্তির ছায়া তার উচ্চতার সমান হয়, যতক্ষণ না আসর উপস্থিত হয়। আর আসরের সময়কাল যতক্ষণ না সূর্য হলুদ বর্ণ ধারণ করে। আর মাগরিবের সালাতের সময়কাল ততক্ষণ পর্যন্ত, যতক্ষণ না শাফাক্ব (সন্ধ্যার আভা) অদৃশ্য হয়। আর ইশার সালাতের সময়কাল মধ্য রাতের মাঝামাঝি পর্যন্ত। আর ফজরের সালাতের সময়কাল ফজর উদিত হওয়া থেকে যতক্ষণ না সূর্য উদিত হয়। যখন সূর্য উদিত হয়, তখন সালাত থেকে বিরত থাকো, কেননা তা শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্য দিয়ে উদিত হয়।”
অন্য এক বর্ণনায় রয়েছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে সালাতসমূহের সময়কাল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: “ফজরের সালাতের সময়কাল ততক্ষণ পর্যন্ত, যতক্ষণ না সূর্যের প্রথম শিং উদিত হয়। যুহরের সালাতের সময়কাল তখন, যখন সূর্য আসমানের মধ্যভাগ থেকে হেলে যায়, যতক্ষণ না আসর উপস্থিত হয়। আসরের সালাতের সময়কাল ততক্ষণ পর্যন্ত, যতক্ষণ না সূর্য হলুদ বর্ণ ধারণ করে এবং তার প্রথম শিং ডুবে যায়। মাগরিবের সালাতের সময়কাল তখন, যখন সূর্য ডুবে যায়, যতক্ষণ না শাফাক্ব (লাল আভা) বিলীন হয়। আর ইশার সালাতের সময়কাল অর্ধরাত পর্যন্ত।”
1723 - عن عمرو بن عَبَسَة السُّلَمي إنه حين أسلم سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن الصلاة فقال له:"صَلِّ صلاةَ الصُبْحٍ ثم أقْصِر عن الصلاةِ حتَّى تطلعَ الشمسُ حتَّى ترتفعَ، فإنَّها تطلعُ حِينَ تطلعُ بينَ قرنيْ شَيطان، وحينَئِذٍ يسجدُ لها الكفارُ، ثم صَلِّ فإنَّ الصلاةَ مَشْهُودةٌ محْضُورةٌ حتى يستَقِلَّ الظِلُّ بالرُمْحٍ، ثم أقْصِرْ عن الصلاةِ فإنَّ حينَئِذٍ تُسْجَرُ جَهَنَّمُ، فإذا أقبلَ الفيءْ فصَلِّ فإنَّ الصلاة مشهودةٌ محضورةٌ حتَّى تُصَلِّي العَصْرَ، ثم أَقْصِرْ عن الصلاة حتَّى تغربَ الشمسُ، فإنَّها تغربُ بين قَرْنَيْ شيطانٍ وحينَئِذٍ يسجدُ لها الكفارُ".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (832) في سباق طويل وسبق ذكره في كتاب الوضوء، في باب ما جاء في ثواب الطهور.
وقوله:"حتى يستقلَّ الظِلُّ بالرمح" أي يقوم مقابله في جهة الشمال، ليس مائلًا إلى المغرب، ولا إلى المشرق. وهذه حالة الاستواء
وفي الحديث التصريح بالنهي عن الصلاة حينئذ حتى تزول الشمسُ.
আমর ইবনে আবাসা আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যখন ইসলাম গ্রহণ করেন, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি ফজরের সালাত আদায় করো, এরপর সালাত আদায় করা থেকে বিরত থাকো যতক্ষণ না সূর্য পুরোপুরি উদিত হয়ে উপরে উঠে যায়। কেননা সূর্য যখন উদিত হয়, তখন তা শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যখান দিয়ে উদিত হয়, আর ওই সময় কাফেররা তাকে সিজদা করে। এরপর তুমি সালাত আদায় করো। কেননা এই সালাত (নফল) সাক্ষীযুক্ত ও (ফেরেশতাদের দ্বারা) পরিবেষ্টিত থাকে, যতক্ষণ না কোনো বর্শার ছায়া তার নিচে স্থির হয় (অর্থাৎ সূর্য ঠিক মধ্যাকাশে আসে)। এরপর সালাত আদায় করা থেকে বিরত থাকো। কেননা ওই সময় জাহান্নামকে উত্তপ্ত করা হয়। এরপর যখন ছায়া পশ্চিম দিকে হেলে পড়ে (যুহরের সময় শুরু হয়), তখন তুমি সালাত আদায় করো। কেননা এই সালাতও সাক্ষীযুক্ত ও উপস্থিত ফেরেশতাদের দ্বারা পরিবেষ্টিত থাকে যতক্ষণ না তুমি আসরের সালাত আদায় করো। এরপর সালাত আদায় করা থেকে বিরত থাকো যতক্ষণ না সূর্য অস্তমিত হয়। কেননা তা শয়তানের দুই শিংয়ের মধ্যখান দিয়ে অস্তমিত হয়, আর ওই সময় কাফেররা তাকে সিজদা করে।"
1724 - عن بُريدة بن الحُصَيب عن النبي صلى الله عليه وسلم أن رجلًا سأله عن وَقْتِ الصلاةِ فقال له:"صَلِّ معنا هذين" يعني اليومين - فلما زالت الشمسُ أمر بلالًا فأذَّن، ثم أمره فأقَام الظُّهر، ثم أمره فأقام العَصْرَ، والشمس مُرتِفِعَةٌ بَيْضاء نَقِيَّةٌ، ثم أمره فأقام المغربَ حين غابتِ الشمسُ، ثم أمره فأقامَ العِشاءَ حين غابَ الشفقُ، ثم أمره فأقام الفَجْرَ حين طلع الفجْرُ، فلما أن كان اليوم الثاني أمره فأبْردَ بالظُّهْرِ فأَبْرَد بها، فأنْعَم أن يُبْرِدَ بها، وصَلَّى العصرَ والشمسُ مرتَفِعَةٌ أَخَّرها فوقَ الَّذي كان، وصَلَّى المغربَ قبلَ أن يَغيبَ الشفق، وصلى العِشاء بعد ما ذهب ثلثُ الليل، وصلَّى الفَجْرَ فأسْفر بها ثم قال:"أين السائلُ عن وقتِ الصلاة؟"، فقال الرجلُ: أنا يا رسولَ الله!
قال:"وقتُ صلاتكم بين ما رَأيْتُم".
وفي رواية:"اشهدْ معنا الصلاة" فأمر بلالًا فأذَّنَ بَغَلَسٍ فصَلَّي الصبحَ حين طلع الفجرُ، ثم أمره بالظُّهْرِ حين زالتِ الشمسُ عن بطن السماء، ثم أمره بالعصرِ والشمس مرتفِعةٌ، ثم أمره بالمغرب حين وجبتِ الشمسُ، ثم أمره بالعشاء حين وقعَ الشفقُ، ثم أمره الغدَ فنَوَّر بالصُّبْحِ، ثم أمره بالظُّهْرِ فأبْردَ ثم أمره بالعصر والشمس بيضاء نقيةٌ لم تخالطها صُفْرةٌ، ثم أمره بالمغربِ قبل أن يقعَ الشَفَقُ، ثم أمره بالعِشاءِ عند ذهابِ ثُلُثُ اللَّيلِ أو بعضه - فلما أصبح قال:"أين السائل؟ ما بين ما رأيتَ وقتٌ".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (613) عن علقمة بن مَرْثدٍ، عن سليمان بن بُريدة، عن أبيه فذكر الحديث.
বুরয়দা ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে। এক ব্যক্তি তাঁকে সালাতের সময় সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তিনি তাকে বললেন: "এই দুই দিন আমাদের সাথে সালাত আদায় করো"—অর্থাৎ দুই দিন। যখন সূর্য ঢলে গেল, তিনি বিলালকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আযান দিতে নির্দেশ দিলেন, অতঃপর তাঁকে ইক্বামাহ দিতে নির্দেশ দিলেন এবং যোহরের সালাত আদায় করলেন। এরপর তাঁকে আসরের জন্য ইক্বামাহ দিতে নির্দেশ দিলেন; তখন সূর্য ছিল উজ্জ্বল, সাদা ও পরিচ্ছন্ন (খুব উপরে)। এরপর তাঁকে মাগরিবের জন্য ইক্বামাহ দিতে নির্দেশ দিলেন যখন সূর্য ডুবে গেল। এরপর তাঁকে ইশার জন্য ইক্বামাহ দিতে নির্দেশ দিলেন যখন শফক (পশ্চিমাকাশের লালিমা) অদৃশ্য হলো। এরপর তাঁকে ফজরের জন্য ইক্বামাহ দিতে নির্দেশ দিলেন যখন ফজর উদিত হলো।
এরপর যখন দ্বিতীয় দিন হলো, তিনি বিলালকে যোহর ঠাণ্ডা করে (বিলম্ব করে) আদায় করতে নির্দেশ দিলেন এবং তা ঠাণ্ডা করে (বিলম্ব করে) আদায় করলেন। (রাবী বলেন: তিনি ঠাণ্ডা করে (বিলম্ব করে) আদায় করতে খুব আনন্দ পেলেন)। আর তিনি আসরের সালাত আদায় করলেন যখন সূর্য উপরেই ছিল, তবে প্রথম দিনের চেয়ে তা বিলম্ব করলেন। আর মাগরিবের সালাত আদায় করলেন শফক (পশ্চিমাকাশের লালিমা) অদৃশ্য হওয়ার আগেই। আর ইশার সালাত আদায় করলেন রাতের এক-তৃতীয়াংশ চলে যাওয়ার পর। আর ফজরের সালাত আদায় করলেন যখন বেশ আলো হয়ে গেছে (ইস্ফার করে)। অতঃপর তিনি বললেন: "সালাতের সময় সম্পর্কে প্রশ্নকারী কোথায়?" লোকটি বলল: "আমি, হে আল্লাহর রাসূল!" তিনি বললেন: "তোমাদের সালাতের সময় হলো তোমরা যা দেখলে তার মধ্যবর্তী।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: (তিনি বললেন): "আমাদের সাথে সালাতে উপস্থিত থেকো।" অতঃপর তিনি বিলালকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ফজর উদিত হলো তখন (অন্ধকার থাকতে) আযান দিতে নির্দেশ দিলেন এবং সুবহের (ফজরের) সালাত আদায় করলেন। এরপর তাঁকে যোহরের জন্য নির্দেশ দিলেন যখন সূর্য আকাশের মধ্যখান থেকে ঢলে গেল। এরপর তাঁকে আসরের জন্য নির্দেশ দিলেন যখন সূর্য উপরে ছিল। এরপর তাঁকে মাগরিবের জন্য নির্দেশ দিলেন যখন সূর্য ডুবে গেল। এরপর তাঁকে ইশার জন্য নির্দেশ দিলেন যখন শফক (পশ্চিমাকাশের লালিমা) চলে গেল। এরপর পরের দিন তিনি তাঁকে সুবহের (ফজরের) সালাত আলো থাকাবস্থায় (বিলম্ব করে) আদায় করতে নির্দেশ দিলেন। এরপর যোহরের জন্য নির্দেশ দিলেন এবং তা ঠাণ্ডা করে (বিলম্ব করে) আদায় করলেন। এরপর আসরের জন্য নির্দেশ দিলেন যখন সূর্য সাদা ও পরিচ্ছন্ন ছিল, কোনো হলুদাব (হরিদ্রাভ) তার সাথে মিশ্রিত হয়নি। এরপর তাঁকে মাগরিবের জন্য নির্দেশ দিলেন শফক (পশ্চিমাকাশের লালিমা) অদৃশ্য হওয়ার আগে। এরপর তাঁকে ইশার জন্য নির্দেশ দিলেন রাতের এক-তৃতীয়াংশ বা তার কিছু অংশ চলে যাওয়ার পর। যখন সকাল হলো, তিনি বললেন: "প্রশ্নকারী কোথায়? তুমি যা দেখলে, তার মধ্যবর্তী সময়টুকুই হলো (সালাতের) সময়।"
1725 - عن أبي موسى، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه أتاه سائل يسأله عن مواقيت الصلاة فلم يرُدَّ عليه شيئًا، قال: فأقام الفَجْرَ حين انشق الفجرُ، والناسُ لا يكاد يعرفُ بَعْضُهم بعضًا، ثم أمره فأقام بالظُّهْر حين زالتِ الشمسُ، والقائل يقول: قد انتصفَ النهارُ وهو كان أعلمَ منهم، ثم أمره فأقام بالعصر والشمسُ مرتفعةٌ، ثم أمره فأقام بالمغرب حين وقعتِ الشمسُ، ثم أمره فأقام بالعِشاء حين غاب الشفقُ، ثم أخَّر الفجر من الغَدِ حتى انصرفَ منها، والقائل يقول: قد طلعتِ الشمسُ أو كادتْ، ثم أخَّرَ الظُّهْرَ حتى كان قريبًا من وقت العصْرِ بالأمسِ، ثم أخَّرَ العَصْرَ حتى انصرف منها، والقائل يقول: قد احمرَّتِ الشمسُ، ثم أخَّرَ المغربَ حتى كان عند سقوط الشفق، ثم أخَّرَ العشاء حتى كان ثلثُ الليل الأول، ثم أصبح فدعا السائلَ فقال:"الوقت بين هذين".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (614) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حدثنا أبي، حدثنا بدر بن عثمان، حدثنا أبو بكر بن أبي موسى، عن أبيه فذكره.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একজন প্রশ্নকারী এসে সালাতের ওয়াক্তসমূহ সম্পর্কে জানতে চাইলেন। তিনি তাকে কোনো উত্তর দিলেন না। বর্ণনাকারী বলেন: তারপর তিনি ফজরের সালাত পড়ালেন যখন সুবহে সাদিক (ভোর) স্পষ্ট হলো, আর তখন লোকেরা একে অপরকে প্রায় চিনতে পারছিল না। অতঃপর তিনি [মুয়াজ্জিনকে] নির্দেশ দিলেন। সে যোহরের সালাত পড়ালো যখন সূর্য ঢলে পড়ল, আর লোকেরা তখন বলছিল যে, বেলা দ্বিপ্রহর হয়ে গেছে, যদিও তিনি (নবী) তাদের চেয়ে অধিক জ্ঞানী ছিলেন। অতঃপর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন, সে আসরের সালাত পড়ালো যখন সূর্য তখনও বেশ উপরে ছিল। অতঃপর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন, সে মাগরিবের সালাত পড়ালো যখন সূর্য ডুবে গেল। অতঃপর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন, সে ইশার সালাত পড়ালো যখন লালিমা (শাফাক্ব) অদৃশ্য হয়ে গেল। অতঃপর পরের দিন তিনি ফজরের সালাত বিলম্বে পড়ালেন, এমন সময় যখন সালাত শেষ করা হলো, তখন লোকেরা বলছিল, সূর্য উঠে গেছে অথবা প্রায় ওঠার পথে। এরপর তিনি যোহরের সালাত বিলম্বে পড়ালেন, এমনকি তা গতকালের আসরের ওয়াক্তের কাছাকাছি হয়ে গেল। অতঃপর তিনি আসরের সালাত বিলম্বে পড়ালেন, এমনকি সালাত শেষ করা হলো যখন লোকেরা বলছিল, সূর্য লাল হয়ে গেছে। অতঃপর তিনি মাগরিবের সালাত বিলম্বে পড়ালেন, এমনকি তা শাফাক (লালিমা) অদৃশ্য হওয়ার সময়ের কাছাকাছি ছিল। অতঃপর তিনি ইশার সালাত বিলম্বে পড়ালেন, এমনকি তা রাতের প্রথম এক-তৃতীয়াংশ পর্যন্ত পৌঁছে গেল। এরপর যখন সকাল হলো, তিনি প্রশ্নকারীকে ডাকলেন এবং বললেন: "ওয়াক্ত হলো এই দু'টি (প্রথম দিনের ও দ্বিতীয় দিনের) সময়ের মাঝখানে।"
1726 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الظُّهْرَ إذا زالتِ الشمسُ، ويُصَلِّي العصر بين صلاتيكم هاتين، ويُصَلِّي المغربَ إذا غربتِ الشمسُ، ويُصَلِّي العِشاءَ إذا غاب الشفقُ ثم قال: على إثره، ويُصَلِّي الصُّبْحَ إلى أن يَنْفَسِحَ البصرُ.
صحيح: رواه النسائي (552) قال: أخبرنا إسماعيل بن مسعود ومحمد بن عبد الأعلى قالا: حدثنا خالد، عن شُعبة، عن أبي صدقةَ، عن أنس بن مالك فذكر الحديث.
وإسناده صحيح، خالد هو: ابن الحارث بن عبيد الهُجَيمي من رجال الجماعة.
وأبو صدقة، واسمه: توبة الأنصاري مولى أنس البصري، روى عنه جمع، ووَثَّقه النسائي في"الكنى" فيما نقله الحافظ في"التهذيب" وقال الذهبي في الكاشف ثقة.
ثم هو من شيوخ شعبة، ومن المعروف أن شعبة لا يروي إلا عن الثقات، وقد أثنى عليه خيًرا في رواية الإمام أحمد (12723) فإن الإمام أحمد رواه عن حجاج (وهو ابن محمد المصيصي) قال: حدثني شعبةُ، عن أبي صدقة مولى أنس - وأثنى عليه شعبةُ خيرًا - قال: سألت أنسًا عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث وفيه:"والصبح إذا طلع الفجرُ إلى أن ينفسح البصرُ".
كما رواه أيضًا (12311) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبةُ، عن أبي صدقة مولى أنس فذكر مثله. فالخلاصة: أنَّ أبا صدقة ثقة.
وللحديث طريق آخر أخرجه أبو يعلى (3991) - الأثري. قال: حدثنا أحمد بن حاتم، ثنا معتمر بن سليمان، قال: حدثني رجل يقال له بيان، قال: قلت لأنس حَدَّثني بوقت رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصلاة. قال: كان يُصَلِّي الظهر عند دلوك الشمس، ويُصَلِّي العصر بين صلاتيكم الأولى والعصر، وكان يُصَلِّي المغربَ عند غروب الشمس، ويُصِلِّي العشاء عند غروب الشفق، ويُصَلِّي الغداة عند طلوع الفجر حين يفتح البصر، كل ما بين ذلك وقت، أو قال: صلاة.
بيان هو: ابن بشر الأخمس أبو بشر الكوفي من رجال الجماعة.
وهذه الطريق أوردها الهيثمي في"المجمع" (1/ 340) وقال: إسناده حسن.
وأورده البوصيري في"إتحاف الخيرة" (2/ 46) هذه الطريق، وطريق آخر عن أحمد بن رجاء، عن المعتمر بن سليمان، به وقال: هذا حديث رجاله ثقات.
وقوله:"يُصَلِّي العصر بين صلاتيكم الأولى" - أي الظهر، والعصر - المراد هنا الطرف الأخير من النهار.
وقوله:"يُصَلِّي الغداة عند طلوع الفجر حين يفتح البصر".
وفي رواية:"ينفسح البصر" وفَسَحَ البصرُ وانفسحَ إذا رأى الشيء عن بُعد - يعني به الإسفار.
ومعنى الحديث بعد النظر إلى الأحاديث السابقة أنه يدخل في صلاة الفجر في الغلس، ويخرج منها في الإسفار كما سيأتي بيان ذلك في حديث رافع بن خديج.
وأما ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"إنَّ للصلاة أوّلا وآخِرًا، وإنَّ أوّلَ وقتِ الظُّهرِ حين تزول الشمسُ، وآخر وقتها حين يدخلُ وقتُ العصِر، وإنَّ أوَّلَ وقتِ صلاة العصر حين يدخلُ وقتُها، وإن آخر وقتها حين تَصفَرُّ الشمسُ، وإنَّ أوَّلَ وقتِ المغرب حين تغربُ الشمسُ، وإن آخرَ وقتها حين يَغيبُ الأفقُ، وإن أوَّلَ وقت العِشاءِ الآخرةِ حين يغيبُ الأُفقُ، وإن آخر وَقتها حين ينتصفُ اللّيلُ، وإنَّ أوَّلَ وقتِ الفَجرِ حين يطلعُ الفجرُ، وإنَّ آخر وَقتها حين تطلعُ الشمسُ".
فهو ضعيف: أخرجه الترمذي (151) قال: حدثنا هنَّاد، حدثنا محمد بن فُضَيلٍ، عن
الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
قال الترمذي: سمعتُ محمدًا (البخاري) يقول: حديث الأعمش، عن مجاهد في المواقيت أصح من حديث محمد بن فُضَيل، عن الأعمش، وحديث محمد بن فُضيل خطأ، أخطأ فيه محمد بن فُضيل" انتهى.
ثم روى الترمذي عن هنّاد، حدثنا أبو أسامة، عن أبي إسحاق الفزاري عن الأعمش، عن مجاهد قال: كان يقال: إن للصلاة أوَّلًا وآخرًا فذكر نحو حديث محمد بن فُضَيل عن الأعمش بمعناه. انتهى.
وما قال به البخاري قاله غير واحد من أهل الحديث منهم: أبو حاتم نقل عنه ابنه في العلل (1/ 101):"هذا خطأ، وهم فيه ابن فُضيل يرويه أصحاب الأعمش، عن الأعمش عن مجاهد قوله".
ومنهم الدارقطني فإنه قال أيضًا بعد أن أخرج الحديث في سننه (1/ 262) من حديث ابن فُضَيل: هذا لا يصح مسندًا وَهِمَ في إسناده ابن فُضيل، وغيرهُ يرويه عن الأعمش، عن مجاهد مرسلًا، ثم ساقه من طريق زائدة بن قدامة، عن الأعمش، عن مجاهد، وقال: وهو أصح من قول ابن فُضَيل، وقد تابع زائدة عبثرُ بن القاسم. انتهى.
ومنهم البيهقي: أخرجه في سننه (1/ 376) من طريق زائدة، عن الأعمش، عن مجاهد مرسلًا وقال بعد أن روى الحديث المذكور من طريق محمد بن فُضَيل: يقول العباس بن محمد الدوري: سمعتُ يحيى بن معين، يُضعِّف حديث محمد بن فُضَيل، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال البيهقي: أحسب يحيى يريد أن للصلاة أوَّلًا وآخرًا. انتهى.
وهذه التعليلات مبنية على سبر روايات الأعمش، وهو منهج معروف لدى المحدثين، وقد استعملوه للتنقيح والتهذيب.
وأمَّا قول ابن الجوزي: وابن فُضَيل ثقة يجوز أن يكون الأعمش سمعه من مجاهد مرسلًا وسمعه من أبي صالح مسندًا، وكذالك قول ابن القطان: ولا يبعد أن يكون عند الأعمش في هذا طريقان: إحداهما مرسلة، والأخرى مرفوعة، والذي رفعه صدوق من أهل العلم، وثَّقه ابن معين وهو محمد بن فضيل،"نصب الراية" (1/ 231).
فهو مجرد احتمال لا تكفي للرد على من سبر الروايات، والحكم عليها بالخطأ.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যোহরের সালাত আদায় করতেন যখন সূর্য ঢলে যেত (যাওয়াল হতো), আর আসরের সালাত আদায় করতেন এই দুটি সালাতের মধ্যবর্তী সময়ে, আর মাগরিবের সালাত আদায় করতেন যখন সূর্য ডুবে যেত, আর ইশার সালাত আদায় করতেন যখন শফক (পশ্চিম দিগন্তের লালিমা) অদৃশ্য হয়ে যেত। অতঃপর তিনি (রাবী) এর পরপরই বললেন: আর তিনি ফজরের সালাত আদায় করতেন যতক্ষণ না আলো ছড়িয়ে পড়ত (বা চক্ষু দৃষ্টি প্রসারিত হতো)।
1727 - عن عبد الله بن مسعود قال: سألتُ النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم: أي العملِ أحبُّ إلى الله؟ قال:"الصلاة على وقتها"، قال: ثم أيٌّ؟ قال:"برُّ الوالدين"، قال: ثم أيٌّ؟ قال:"الجهاد في سبيل الله".
قال: حدثني بهِنَّ ولو استزدته لزادني.
متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (527) واللفظ له، ومسلم في الإيمان (85) كلاهما من حديث شعبة، عن الوليد بن العَيزَار أنه سمع أبا عمرو الشَّيباني يقول: حدثنا صاحب هذه الدار، وأشار إلى دار عبد الله بن مسعود فذكر الحديث.
وروى ابن مسعود هذا الحديث بلفظ آخر وهو قوله مرفوعًا:"الصلاة في أول وقتها" وهو من زيادة ثقات صحيح.
رواه ابن خزيمة (327) قال: حدثنا بندار بن بشَّار، حدثنا عثمان بن عمر، نا مالك بن مغول،
عن الوليد بن العيزار، عن أبي عمرو الشيباني، عن عبد الله بن مسعود فذكر الحديث.
ورواه الحاكم في المستدرك (1/ 188) عن أبي عمرو عثمان بن أحمد بن عبد الله بن السماك - الثقة المأمون ببغداد - ثنا الحسن بن مكرم، ثنا عثمان بن عمر به ولفظه:"الصلاة في أول وقتها" قلت: ثم أي؟ قال:"الجهاد في سبيل الله" قلت: ثم أي؟ قال:"برُّ الوالدين" قال الحاكم:"هذا حديث يُعرف بهذا اللفظ بمحمد بن بشار بندار، عن عثمان بن عمر، وبندار من الحفاظ المتقنين الأثبات".
ثم روي من جهة ابن خزيمة، عن بندار به مقتصرًا على ذكر الصلاة في"أول وقتها". ثم قال:"فقد صحت هذه اللفظة باتفاق الثقتين بندار بن بشار والحسن بن مكرم على روايتهما عن عثمان بن عمر، وهو صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه، وله شواهد في هذا الباب. انتهى.
وأورده البيهقي في الخلافيات (1/ 522، 523) ووافق على أنه على شرط البخاري ومسلم وقال: لأن رواته متفق على عدالتهم، والزيادة مقبولة عند الثقة عندهما، وعند الفقهاء إذا انضم إلى روايته ما يؤكدها.
ثم ذكر له متابعًا تبعًا للحاكم من طريق حجاج بن الشاعر، ثنا علي بن حفص المدائني، ثنا شعبة، عن الوليد بن العيزار، قال: سمعت أبا عمرو الشيباني، قال: حدثنا صاحب هذه الدار - وأشار إلى دار عبد الله بن مسعود ولم يسمه فذكر الحديث، وفيه:"الصلاة في أول وقتها".
قال الحاكم:"وقد روي هذا الحديث جماعة عن شعبة، ولم يذكر هذه اللفظةَ غير حجاج بن الشاعر، عن علي بن حفص، وحجاج حافظ ثقة، وقد احتج مسلم بعلي بن حفص المدائني". وتبعه البيهقي وقال:"والباقون متفق على ثقتهم".
ثم ذكر البيهقي اللفظ المخرج في الصحيحين بأنه"الصلاة لوقتها".
وحديث حجاج بن الشاعر أخرجه الدارقطني (1/ 246) عن الحسين بن إسماعيل، عن حجاج ابن الشاعر به وذكر فيه:"الصلاة في أول وقتها".
وأما الشواهد التي أوردها البيهقي من ابن عمر"الصلاة في أول وقتها" ففيه يعقوب بن الوليد قال الحاكم: هذا شيخ من أهل المدينة سكن بغداد وليس من شرط هذا الكتاب إلا أنه شاهد عن
عبد الله. انتهى. وتعقبه الذهبي فقال: يعقوب كذَّاب.
قلت: حديث ابن عمر رواه أيضًا الترمذي (172) عن أحمد بن منيع، ثنا يعقوب بن الوليد المدني، عن عبد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:"الوقت الأول من الصلاة رضوان الله، والوقت الآخر عفو الله". قال الترمذي: غريب.
وروى البيهقي في سننه (1/ 435) من طريق أحمد بن منيع شيخ الترمذي، ونقل عن ابن عدي أنه قال:"هذا الحديث بهذا الإسناد باطل"، ثم قال البيهقي:"هذا حديث يعرف بيعقوب بن الوليد المدني، ويعقوب منكر الحديث، ضعفه يحيى بن معين، وكذّبه أحمد بن حنبل وسائر الحفاظ، ونسبوه إلى الوضع، نعوذ بالله من الخذلان".
وحديث أم مروة قالت: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم: أي العمل أفضل؟ فقال:"الصلاة في أول وقتها".
رواه أبو داود (426)، والترمذي (170) كلاهما من حديث عبد الله بن عمر العمري، عن القاسم بن غنام، عن عمته أم فروة، وكانت ممن بايعت النبي صلى الله عليه وسلم قالت: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم: أي الأعمال أفضل؟ فقال:"الصلاة لأول وقتها".
قال الترمذي:"حديث أم فَروة لا يُروي إلا من حديث عبد الله بن عمر العمري، وليس هو بالقوي عند أهل الحديث، واضطربوا عنه في هذا الحديث، وهو صدوق، وقد تكلم فيه يحيى بن سعيد من قبل حفظه". انتهى.
قلت: وقد تكلم فيه الشيخ أحمد شاكر في تعليقه على الترمذي فأطال في بيان الاضطراب وقال في نهاية الدراسة:"الحديث ضعيف بكل حال، لجهل الواسطة بين القاسم بن غنام وبين أم فَروة".
وفي الباب عن جرير، وابن عباس، وعلي بن أبي طالب، وأنس، وأبي محذورة، وأبي هريرة، وكلها معلولة. انظر: التلخيص الحبير (1/ 180 - 181).
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: আল্লাহর নিকট কোন আমলটি সবচেয়ে প্রিয়? তিনি বললেন: "সময়মতো সালাত (আদায় করা)।" আমি বললাম: এরপর কোনটি? তিনি বললেন: "পিতা-মাতার প্রতি সদ্ব্যবহার।" আমি বললাম: এরপর কোনটি? তিনি বললেন: "আল্লাহর পথে জিহাদ।" তিনি (ইবনে মাসউদ) বললেন: তিনি আমাকে এই তিনটি বিষয়েই বলেছেন। আমি যদি আরও চাইতাম, তবে তিনি আমাকে আরও বেশি বলতেন।
