আল-জামি` আল-কামিল
1728 - عن عائشة قالت: ما صَلَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم صلاةً لوقتها الآخر حتى قبضه الله.
صحيح: رواه الحاكم في المستدرك (1/ 190) وعنه البيهقي في السنن (1/ 435) عن محمد بن صالح بن هانئ، ثنا الحسين بن الفضل البجلي، ثنا هاشم بن القاسم، ثنا الليث بن سعد، عن أبي النظر، عن عمرة، عن عائشة فذكرته.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وأورده البيهقي في الخلافيات (1/ 525) ونقل قول الحاكم بأنه صحيح على شرط الشيخين.
قلت: هذا أصح الأسانيد لهذا الحديث. وكون أصحاب الليث اختلفوا عليه لا يُضِعِّف ما صَحَّ.
ومن هؤلاء قتيبة بن سعيد فإنه روي عن الليث، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن إسحاق بن عمر، عن عائشة، قالت:"ما صلَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم صلاة لوقتها الآخِر مرتين حتى قبضه الله".
رواه الترمذي (174) عن قتيبة بن سعيد به، وقال: هذا حديث غريب وليس إسناده بمتصل.
ورواه الحاكم (1/ 435) وعنه البيهقي في السنن (1/ 435) من طريق محمد بن شاذان، عن قتيبة بن سعيد به، قال البيهقي: هذا مرسل، إسحاق بن عمر لم يدرك عائشة. انتهى.
ونقل الزيلعي في"نصب الراية" (1/ 244) عن ابن أبي حاتم، عن أبيه - إسحاق بن عمر روي عن موسى بن وردان، روى عنه سعيد بن أبي هلال مجهول، وكذلك قال ابن القطان في كتابه: إنه منقطع، وإسحاق بن عمر مجهول. انتهى.
ورواه الدارقطني (1/ 249) من طريق معلى بن عبد الرحمن، ثنا الليث بن سعد به مثله.
قال البيهقي: معلى هذا ليس بثقة، كان يضع الحديث.
وللحديث إسناد آخر من حديث الواقدي، ثنا ربيعة بن عثمان، عن عمران بن أبي أنس، عن أبي سلمة، عن عائشة فذكرت الحديث. قال الحاكم:"شاهد آخر من حديث الواقدي، وليس من شرط هذا الكتاب" ثم أسند عنه.
والخلاصة: إذا صح إسناد هاشم بن القاسم وهو ثقة، عن الليث فلا يُعَلُّ بالأسانيد الضعيفة.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মৃত্যুবরণ করা পর্যন্ত কোনো সালাতকেই (নামাযকে) তার শেষ ওয়াক্তে আদায় করেননি।
1729 - عن أبي ذر قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كيف أنت إذا كانت عليك أمراء يُؤخِّرُون الصلاة عن وقتها، أو يُمِيتُونَ الصلاةَ عن وقتِها؟" قال قلتُ: فما تأمرني؟ قال:"فصَلِّ الصلاة لوقتها، فإن أدركتَها معهم فَصلّ فإنها لك نافلة".
وفي رواية:"فصَلِّ الصلاة لوقتها، فإن صلَّيتَ لوقتِها كانت لك نافلةً، وإلا كنتَ قد أحرزتَ صلاتك".
وفي رواية"فإن أقيمتِ الصلاة وأنت في المسجد فَصَلِّ".
وفي رواية عن أبي العالية البراء قال: أخَّر ابنُ زيادٍ الصلاةَ. فجاءني عبد الله بن الصامت، فألقيتُ له كرسيًا فجلس عليه، فذكرتُ له صنيعَ ابن زيادٍ، فعَضَّ على شَفَتِه وضرب فَخِذِي وقال: إني سألت أبا ذر كما سألتني، فضرب فَخِذِي كما ضربتُ فَخِذك وقال: إني سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم كما سألتني، فضرب فَخِذِي كما ضربتُ فَخِذك، وقال:"صَلِّ الصلاة لوقتها، فإن أدركت الصلاة معهم فصَلِّ ولا تقل: إني قد صليتُ فلا أصَلِّي".
وفي رواية:"فصَلِّ الصلاة لوقتها، ثم إن أقيمتِ الصلاة فصَلِّ معهم، فإنها زيادة خير".
وفي رواية: عن أبي العالية البرَّاءِ قال: قلت لعبد الله بن الصامت: نُصلي يوم الجمعة خلفَ أُمراء فيُوخِّرون الصلاةَ، قال: فضربَ فَخِذِي ضربةً أوجعتني، وقال:
سألت أبا ذَرٍّ عن ذلك، فضرب فَخِذِي وقال: سألتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك فقال:"صَلُّوا الصلاةَ لوقتها، واجعلوا صلاتكم معهم نافلةً".
صحيح: هذه الروايات كلها أخرجها مسلم في المساجد (648) من طرق عن عبد الله بن الصامت، عن أبي ذر.
وقوله:"ولا تقل إني قد صليت فلا أصلي". فيه الحثُّ على موافقة الأمراء في غير المعصية، لثلَّا تفترق الكلمة وتقع الفتنة، ولذلك كان أبو ذر يقول:"إنَّ خليلي أوصاني أن أسمع وأطيع، وإن كان عبدًا مجدَّعَ الأطراف". رواه مسلم (1837).
আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "তোমার কেমন লাগবে, যখন তোমার ওপর এমন শাসক থাকবে যারা সালাতকে তার নির্ধারিত সময় থেকে বিলম্বিত করবে, অথবা সালাতকে (তার সময় থেকে) বিলুপ্ত করে দেবে?" আমি বললাম: আপনি আমাকে কী আদেশ করেন? তিনি বললেন: "তুমি সালাতকে তার সঠিক সময়ে আদায় করে নাও। এরপর যদি তুমি তাদের সাথে জামাআত পাও, তবে (পুনরায়) সালাত আদায় করো। কারণ তা তোমার জন্য নফল (অতিরিক্ত ইবাদত) হবে।"
অন্য বর্ণনায় আছে: "তুমি সালাতকে তার সময়ে আদায় করো। কেননা, তুমি যদি তোমার সালাত তার সময়ে আদায় করো, তবে (তাদের সাথে আদায়কৃত সালাত) তোমার জন্য নফল হবে। অন্যথায় তুমি তোমার সালাত রক্ষা করে নিলে।"
আরেক বর্ণনায় রয়েছে: "আর যখন সালাতের ইকামত দেওয়া হবে এবং তুমি মসজিদে উপস্থিত থাকবে, তখন সালাত আদায় করো।"
আবূ আলিয়াহ আল-বাররা’ হতে অপর এক বর্ণনায় এসেছে, তিনি বলেন: ইবনু যিয়াদ সালাতে বিলম্ব করলো। তখন আবদুল্লাহ ইবনুস সামিত আমার কাছে আসলেন। আমি তার জন্য একটি চেয়ার রাখলাম, তিনি তাতে বসলেন। আমি ইবনু যিয়াদের এই কাজের কথা তাকে বললাম। তিনি তার ঠোঁটে কামড় দিলেন এবং আমার উরুতে আঘাত করে বললেন: তুমি যেমন আমাকে জিজ্ঞাসা করলে, আমিও আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তেমনই জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তখন তিনি আমার উরুতে আঘাত করলেন, যেমন আমি তোমার উরুতে আঘাত করলাম, এবং বললেন: তুমি যেমন আমাকে জিজ্ঞাসা করলে, আমিও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তেমনই জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তখন তিনি আমার উরুতে আঘাত করলেন, যেমন আমি তোমার উরুতে আঘাত করলাম, এবং বললেন: "তুমি সালাতকে তার সঠিক সময়ে আদায় করো। এরপর যদি তুমি তাদের সাথে সালাত পাও, তবে (পুনরায়) সালাত আদায় করো এবং এ কথা বলো না যে, আমি তো সালাত আদায় করে নিয়েছি, তাই আর সালাত আদায় করব না।"
আরেক বর্ণনায় আছে: "তুমি সালাতকে তার সময়ে আদায় করো। এরপর যদি সালাতের ইকামত দেওয়া হয়, তবে তাদের সাথেও সালাত আদায় করো। কেননা এটি পুণ্যের আধিক্য।"
আবূ আলিয়াহ আল-বাররা’ হতে অপর এক বর্ণনায় এসেছে, তিনি বলেন: আমি আবদুল্লাহ ইবনুস সামিতকে বললাম: আমরা জুমু‘আর দিন শাসকদের পেছনে সালাত আদায় করি, অথচ তারা সালাতে বিলম্ব করে। তিনি আমার উরুতে এমন জোরে আঘাত করলেন যে আমি ব্যথা পেলাম, অতঃপর বললেন: আমি আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি আমার উরুতে আঘাত করে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি বললেন: "তোমরা সালাতকে তার সঠিক সময়ে আদায় করো, আর তাদের সাথে তোমাদের সালাতকে নফল হিসেবে গণ্য করো।"
1730 - عن عمرو بن ميمون الأودي قال: قدم علينا معاذ بن جبل اليمن رسولَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إلينا قال: فسمعتُ تكبيره مع الفجْرِ رجلٌ أجَشَّ الصوت، قال: فألقيتُ عليه محبتي. فما فارقتُه حتى دفنتُه بالشام ميتًا، ثم نظرتُ إلى أفقه الناس بعده، فأتيتُ ابن مسعود فلزمتُه حتى مات، فقال: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"كيف بكم إذا أتت عليكم أُمراء يُصَلُّون الصلاةَ لغير ميقاتها؟".
قلت: فما تأمرني إن أدركني ذلك يا رسول الله؟ قال:"صَلِّ الصلاة لميقاتها، واجعل صلاتك معهم سُبحة".
صحيح: رواه أبو داود (432) عن عبد الرحمن بن إبراهيم - دُحيم - الدمشقي، حدثنا الوليد، حدثنا الأوزاعي، حدثني حسان بن عطية، عن عبد الرحمن بن سابط، عن عمرو بن ميمون فذكره.
رجاله ثقات وإسناده صحيح، والوليد: ابن مسلم القرشي ثقة إلا أنه كان يدلس تدليس التسوية، فلما صرح بالتحديث من شيخه وهو الأوزاعي، وصرَّح شيخه من شيخه انتفت تهمة التدليس.
وصحّحه ابن حبان (1481) فرواه عن عبد الله بن محمد بن سلم، قال: حدثنا عبد الرحمن بن إبراهيم به مثله.
ورواه النسائي (779) عن عبيد الله بن سعيد، وابن ماجة (1255) عن محمد بن الصباح، كلاهما قالا: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن عاصم، عن زِر، عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لعلكم ستدركون أقوامًا يُصلون الصلاة لغير وقتها، فإن أدركتموهم فصلوا في بيوتكم للوقت الذي تعرفون، ثم صلوا معهم، واجعلوها سُبحةً".
وصححه ابن خزيمة (1640) فرواه من طريقين آخرين، عن أبي بكر بن عياش به مثله. وهي متابعة قوية لما سبق.
وفي الباب أيضًا عن عبادة بن الصامت وقبيصة بن وقاص روي حديثهما أبو داود وفي إسنادهما رجال لا يعرفون.
আমর ইবনু মাইমুন আল-আওদী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দূত মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের কাছে ইয়ামানে আসলেন। তিনি (আমর) বলেন: ফজরের সময় আমি তাঁর তাকবীরের শব্দ শুনলাম। তিনি ছিলেন কিছুটা ভরাট কণ্ঠের মানুষ। তিনি বলেন: আমি তাঁকে খুব ভালোবাসতাম। আমি তাঁর থেকে আলাদা হইনি যতক্ষণ না সিরিয়ায় তাঁকে মৃত অবস্থায় দাফন করলাম। এরপর আমি তাঁর (মু'আযের) পরে সবচেয়ে বিজ্ঞ ব্যক্তির দিকে দৃষ্টি দিলাম এবং ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাঁর মৃত্যুর আগ পর্যন্ত তাঁর সাথে থাকলাম। তিনি (ইবনু মাসঊদ) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন: "তোমাদের কেমন লাগবে, যখন তোমাদের ওপর এমন শাসকরা আসবে, যারা সালাতকে তার নির্ধারিত সময়ের বাইরে আদায় করবে?" আমি (ইবনু মাসঊদ) বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! যদি আমি সেই সময় পাই, তবে আপনি আমাকে কী আদেশ করেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি সালাতকে তার নির্ধারিত সময়ে আদায় করো, আর তাদের সাথে তোমার সালাতকে নফল হিসেবে গণ্য করো।"
1731 - عن عائشة قالت: إن كانَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ليُصَلّي الصُّبْحَ فينصرفُ النِّسَاءُ متُلَفِّعاتٍ بمُرُطهنَّ ما يُعرَفنَ من الغَلَسِ.
متفق عليه: أخرجه مالك في الوقوف (4) عن يحيى بن سعيد، عن عمرة بنتِ عبد الرحمن، عن عائشة فذكرت الحديث. ومن طريقه أخرجه البخاري في الأذان (867)، ومسلم في المساجد (645/ 232) كما رواه أيضًا الشيخان من أوجه عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة نحوه البخاري (372، 578)، ومسلم، والبخاري وحده (872) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة: أن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي بغلسِ فيَنصَرِفنَ نِسَاءُ المؤمنين، لا يُعرَفنَ من الغَلَسِ، أو لا يَعرِفُ بعضُهنَّ بعضًا.
قال الحافظ: فينصرِفنَ: هو على لغة بني الحارث، وكذا قوله: لا يُعرَفنَ بعضُهن بَعضًا. وهذا في رواية الحموي والكشميهني، ولغيرهما"لا يعرف" بالإفراد على الجادة.
وقوله:"متلفعات" قال الأصمعي: التلفعُ أن تشتمل بالثوب حتى تجلل به جسدك، وفي شرح الموطأ لابن حبيب: التلفع لا يكون إلا بتغطية الرأس، والتلفف يكون بتغطية الرأس وكشفه.
"والمروط". جمع مِرط - بكسر أوله - كساء من خزٍّ، أو صوفٍ أو غيره. انظر:"الفتح" (1/ 482).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাত আদায় করতেন। অতঃপর মহিলারা তাদের চাদর দ্বারা নিজেদের আবৃত অবস্থায় (বাড়ি) ফিরে যেতেন, অন্ধকারের কারণে তাদের চেনা যেত না।
1732 - عن سهل بن سعد يقول: كنت أتسحر في أهلي، ثم يكون سرعة بي أن أدرك صلاة الفجر مع رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البخاري في المواقيت (577) عن إسماعيل بن أبي أويس، عن أخيه، عن سليمان، عن أبي حازم، أنه سمع سهل بن سعد يقول فذكر مثله.
قوله: عن أخيه - هو أبو بكر عبد الحميد. وسليمان هو: ابن بلال.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার পরিবার পরিজনের সাথে সাহরী খেতাম, এরপর দ্রুত যেতাম যাতে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে ফজরের সালাত ধরতে পারি।
1733 - عن مُغِيث بن سُمَيّ قال: صَلَّيتُ مع عبد الله بن الزبير الصُّبحَ بغَلَسٍ، فلمَّا سَلَّم أقبلتُ على ابن عمر، فقلتُ: ما هذه الصلاةُ؟ قال: هذه صلاتُنا كانت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر، فَلمَّا طُعِن عمرُ أسفَرَ بها عثمانُ.
صحيح: رواه ابن ماجة (671) قال: حدثنا عبد الرحمن بن إبراهيم الدمشقِي، قال: حدَّثَنا الوليدُ بن مُسلم، قال: حدثنا الأوزَاعيُّ، قال: حدثنا نَهيكُ بن يَريمَ قال: حدثنا مُغيثُ بن سُمَي فذكر الحديث.
ونهيك، بوزن عظيم، ويريم - بتحتانية وكذلك أوله، الأوزاعي الشامي ثقة.
وإسناده صحيح، رجاله ثقات غير الوليد بن مسلم فإنه مدلس إلا أنه صرَّح بالتحديثِ عن شيخِه، كما صَرَّح شيخه - وهو الأوزاعي - عن شيخه، فانتفت عنه تهمة التدليس.
قال البيهقي في سننه (1/ 456) بعد أن روى الحديث من جهة العباس بن الوليد بن مزيد: أخبرني أبي، قال: سمعتُ الأوزاعي فذكر مثله.
قال: في كتاب العلل لأبي عيسى الترمذي قال: قال محمد بن إسماعيل البخاري:"حديث الأوزاعي عن نَهيك بن يَريم في التغليس بالفجر حديث حسن". انتهى.
মুগীস ইবনে সুমাই থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে অতি ভোরে (অন্ধকার থাকা অবস্থায়) ফজরের সালাত আদায় করলাম। যখন তিনি সালাম ফিরালেন, তখন আমি ইবনে উমারের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দিকে এগিয়ে গেলাম এবং জিজ্ঞেস করলাম: এটি কেমন সালাত? তিনি বললেন: এটি আমাদের সেই সালাত যা আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আদায় করতাম। অতঃপর যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আঘাতপ্রাপ্ত হলেন, তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফর্সা হওয়া (আলো স্পষ্ট হওয়া) অবস্থায় এই সালাত আদায় করতেন।
1734 - عن أم سلمة قالت: كنَّ نساء يشهدنَ مع رسول الله صلاة الصُّبح فينصرفنَ مُتلفِّعاتٍ بمروطهن، ما يُعرفنَ من الغلس.
قالت: وكان النبي صلى الله عليه وسلم إذا سَلَّم مكانه مكانه قليلًا، وكانوا يرون أن ذلك كيما ينفذ النساءُ قبل الرجال.
صحيح: أخرجه عبد الرزاق (2181) عن معمر، عن الزهري، عن هند بنت الحارث، عن أم سلمة فذكرت الحديث.
ورجاله ثقات وإسناده صحيح، وهند بنت الحارث هي الفراسية - بكسر الفاء، ويقال: القرشية، كانت تحت معبد بن المقداد بن الأسود، روت عن أم سلمة، وكانت من صواحباتها، وعنها الزهري، ذكرها ابن حبان في الثقات، وكانت تدخل على أزواج النبي صلى الله عليه وسلم وهي"ثقة" كما في التقريب.
وأورده الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 318) وعزاه للطبراني في"الكبير" وقال:"رجاله رجال الصحيح خلا شيخ الطبراني".
تنبيه: تحرف في المصنف:"هند بنت الحارث" إلى"هند بن الحارث".
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মহিলারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ফজরের সালাতে উপস্থিত হতেন। অতঃপর তারা নিজেদের চাদরে আবৃত অবস্থায় ফিরে যেতেন। অন্ধকারের কারণে তাদের শনাক্ত করা যেত না।
তিনি আরও বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাম ফেরাতেন, তখন তিনি নিজ স্থানে কিছুক্ষণ অপেক্ষা করতেন। তারা (সাহাবাগণ) মনে করতেন, এর উদ্দেশ্য হলো যাতে মহিলারা পুরুষদের আগে (সালাতের স্থান থেকে) বেরিয়ে যেতে পারে।
1735 - عن رافع بن خديج قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أصبحوا بالصُّبح، فإنَّه أعظمُ لأجوركم" أو"أعظم للأجر".
صحيح: رواه أبو داود (424)، والترمذي (154)، والنسائي (548، 549)، وابن ماجة (672) كلهم من طرق عن عاصم بن عُمر بن قتادة، عن محمود بن لَبيد، عن رافِع بن خَديج فذكر مثله واللفظ لأبي داود، ولفظ الترمذي والنسائي:"أَسفِرُوا بالفجرِ، فإنه أعظمُ للأجرِ".
قال الترمذي:"حديث رافع بن خديج حديث حسن صحيح، وقد رأي غير واحد من أهل العلم من أصحابِ النبيِّ صلى الله عليه وسلم والتابعين الإسفار بصلاة الفجر. وبه يقول سفيان الثوري. وقال الشافعي وأحمد وإسحاق: معنى الإسفار: أن يَضِحَ الفجْرُ فلا يُشَكُّ فيه، ولم يروا أن معنى الإسفارِ تأخير الصلاة". انتهى.
قوله: يَضِح من وَضَحَ - يقال: وَضَحَ الفجرُ إذا أضاء.
وظاهر هذا الحديث يعارض الأحاديث الصحيحة في أداء صلاة الفجر في الغلس، فأجابوا عنه
بأجوبة منها ما ذكره الترمذي.
ومنها: ما ذكر الطحاوي في"شرح معاني الآثار" (1/ 184):"فالذي ينبغي الدخول في الفجر في وقت التغليس، والخروج منها في وقت الإسفار، على موافقة ما روينا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو قول أبي حنيفة وأبي يوسف ومحمد رحمهم الله تعالى". انتهى.
وتعقب بأن عائشة تقول:"فينصرف النساء مُتَلفِّعاتٍ بمروطهنَّ ما يُعرفنَ من الغلسِ".
ومنها: ما ذكره الحافظ ابن القيم في إعلام الموقعين.
"وهذا بعد ثبوته إنما المراد به الاسفار دوامًا لا ابتداءً، فيدخل فيها مُغلسًا، ويخرج منها مُسفرًا كما كان يفعله صلى الله عليه وسلم، فقوله موافق لفعله لا مناقض له، وكيف يُظن به المواظبة على فعل ما الأجر الأعظم في خلافه". انتهى. وهو قريب مما قاله الطحاوي.
ومنها: أنَّ قوله:"أسفِرُوا بالفجر". مرويٌّ بالمعنى، والأصل أصبحوا بالصبح كما في رواية أبي داود.
قال الجزري: أي:"صلوها عند طلوع الصبح، يقال: أصبح الرجل إذا دخل في الصبح". انتهى.
قال السيوطي في حاشية النسائي:"وبهذا يعرف أن رواية من روى هذا الحديث بلفظ:"أسفِرُوا بالفجْرِ" مروية بالمعنى، وأنه دليل على أفضلية التغليس بها، لا على التأخر إلى الأسفار". انتهى.
انظر: مرعاة المفاتيح (1/ 322).
ومنها: أنهم لما أمروا بالتعجيل ففهم البعض منهم الفجر الأول فأمروا بالاسفار إلى الفجر الثاني الذي هو وقت صلاة الصبح.
ومنها: أن المراد به الليلة المقمرة، فإن الصبح لا يبين بضوء القمر، فأمِرُوا بالإسفار، أي الإصباح كما قال ابن حبان في صحيحه (4/ 358 - 359) بقوله: أراد النبي صلى الله عليه وسلم بقوله:"أسفِروا" في الليالي المُقمِرة التي لا يتبين فيها وضوحُ طلوع الفجر، لئلا يؤدي المرء صلاة الصُبح إلا بعد التيقن بالإسفار بطلوع الفجر، فإن الصلاة إذا أُدِّيت كما وصفنا كان أعظمَ للأجر من أن تُصلي على غير يقين من طلوع الفجر". انتهى.
ولابد من قبول إحدى هذه التأويلات حتى لا يتعارض فِعلُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قولَه.
وفي الحديث دليل أيضًا على أن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أحيانًا كان يدخل في صلاة الفجر في الغلس، ويخرج منها في الغلس، كما قالت عائشة، وأحيانًا كان يدخل في الغلس، ويُطيلُ القراءةَ فيخرج منها في الإسفار كما في حديث أبي برزة الأسلمي، وحديث أنس.
تنبيه: حديث رافع بن خديج أصح ما رُوي في الإسفار، وما رُوي عن بلال وقتادة بن النعمان وابن مسعود وأبي هريرة وحواء الأنصارية فبعضها يعود إلى حديث رافع بن خديج، والبقية لا تقوم بها الحجة لضعف فيها. انظر للمزيد:"نصب الراية" (1/ 235).
রাফে' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সুব্হ (ফজরের সালাত) সুব্হ (দিনের আলোর স্পষ্টতার) সাথে আদায় করো, কারণ এটাই তোমাদের পুরস্কারের জন্য অনেক বেশি মহৎ।" অথবা "(এটা) পুরস্কারের জন্য অনেক বেশি মহৎ।"
1736 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا اشتدَّ الحرُّ، فأبرِدُوا عن الصلاة فإن شِدَّة الحَرِّ من فَيح جَهنَّم".
متفق عليه: رواه مالك في وقوت الصلاة (28، 29) من طريقين، عن عبد الله بن يزيد مولى الأسود بن سفيان، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، وعن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن أبي هريرة فذكر مثله، وقال فيه:"وذكر أن النارَ اشتَكت إلى ربِّها، فأَذِنَ لها في كل عامٍ بنفَسَين: نَفَس في الشِّتاء، ونَفَس في الصيف".
وعن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة ولم يذكر الجزء الثاني.
ومن طريق مالك عن عبد الله بن يزيد رواه مسلم في المساجد (617) مثله، ثم رواه أيضًا من طريق يونس، عن ابن شهاب قال: حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن أنه سمع أبا هريرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم"اشتكتِ النارُ إلى ربِّها فقالت: يا رب! أكل بعضي بعضا، فأذن لها بنفَسَين: نَفَسٍ في الشتاء، ونَفَسٍ في الصيف، فهو أشدُّ ما تجدون من الحَرِّ، وأشد ما تجدون من الزمهرير".
وفي رواية:"فما وجدتم من بَردٍ أو زَمهرير فمن نَفَس جَهنَّم، وما وجدتم من حَرٍّ أو حَرُورٍ فمن نَفَس جَهَنَّم".
وأما البخاري فرواه في مواقيت الصلاة (533، 534) من غير طريق مالك من حديث صالح بن كيسان، ثنا الأعرج عبد الرحمن وغيره، عن أبي هريرة، ونافع مولى عبد الله بن عمر، عن عبد الله بن عمر أنهما حدَّثاه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا اشتد الحرُّ فأبرِدُوا عن الصلاة، فإن شِدَّةِ الحَر من فَيحِ جهنَّم".
وكذلك من حديث سفيان قال: حفظناه من الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا اشتدَّ الحَرُّ فأبرِدُوا بالصلاة، فإن شدَّةِ الحرِّ من فَيح جَهنَّم" وقال:"واشتكتِ النارُ إلى ربِّها فقالت" فذكر مثله كما سبق.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন গরম তীব্র হয়, তখন তোমরা সালাত ঠান্ডা সময়ে (বিলম্ব করে) আদায় করো। কারণ, গরমের তীব্রতা জাহান্নামের নিঃশ্বাস (বা উত্তাপ) থেকে আসে।
তিনি আরও উল্লেখ করেছেন যে, আগুন তার প্রতিপালকের কাছে অভিযোগ করেছিল। তখন আল্লাহ তাকে প্রতি বছর দুটি নিঃশ্বাস ফেলার অনুমতি দিলেন: একটি নিঃশ্বাস শীতকালে এবং একটি নিঃশ্বাস গ্রীষ্মকালে। তোমরা গরমের যে তীব্রতা পাও এবং শীতের যে তীব্রতা (জমহারীর) পাও, তা সেই (জাহান্নামের) নিঃশ্বাস থেকেই আসে।
1737 - عن أبي ذر قال: أَذَّنَ مؤذِّنُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بالظُّهر، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أَبرِد أَبرِد" أو قال:"انتَظِر انتَظِر" وقال:"إنَّ شِدَّةَ الحَرِّ من فَيحِ جهنَّم، فإذا اشتدَّ الحَرُّ فأَبرِدُوا عن الصلاة".
قال أبو ذر: حتى رأينا فيءَ التُّلولِ.
متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (535)، ومسلم في المساجد (616) كلاهما من طريق شعبة، عن مهاجر أبي الحسن، قال: سَمِعتُ زيد بن وهب، يقول: سمعتُ أباذر فذكر ولفظهما قريب، وفي لفظ للبخاري (539): كُنَّا مع النبي صلى الله عليه وسلم في سَفرٍ، فذكر الحديث.
قال ابن عباس: يتفيَّأُ يَتَميَّلُ.
التلول: جمع تلٍّ، وهو كلُّ ما اجتمع على الأرض من تراب أو رملٍ أو نحو ذلك.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুয়াজ্জিন যোহরের জন্য আযান দিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "ঠান্ডা করো, ঠান্ডা করো," অথবা তিনি বললেন, "অপেক্ষা করো, অপেক্ষা করো।" তিনি আরও বললেন, "নিশ্চয়ই গরমের তীব্রতা জাহান্নামের নিঃশ্বাস (বা উত্তাপ) থেকে আসে। সুতরাং যখন গরম তীব্র হয়, তখন তোমরা সালাতকে ঠান্ডা করো (অর্থাৎ কিছুটা দেরি করে আদায় করো)।" আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (আমরা এতক্ষণ অপেক্ষা করলাম) এমনকি আমরা টিলাগুলোর ছায়া দেখতে পেলাম।
1738 - عن أبي سعيد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أَبرِدُوا بالظهر فإن شِدَّة الحرِّ من فَيحِ جَهنَّم".
صحيح: رواه البخاري في المواقيت (538) عن عمر بن حفص، قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا الأعمش، حدثنا أبو صالح، عن أبي سعيد فذكر مثله.
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যুহরের সালাত ঠান্ডা সময়ে আদায় করো, কারণ প্রচণ্ড গরম জাহান্নামের নিঃশ্বাস থেকে আসে।"
1739 - عن عبد الله بن مسعود قال: كانت قدر صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصيف ثلاثة أقدام إلى خمسة أقدام، وفي الشِّتاء خمسة أقدام إلى سبعة أقدام.
حسن: أخرجه أبو داود (400)، والنسائي (503) كلاهما من طريق عَبيدة بن حُميد، عن أبي مالك الأشجعي سعد بن طارق، عن كثير بن مُدرك، عن الأسود، أن عبد الله بن مسعود أخبره فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل عَبيدة بن حُميد الكوفي، فإنه صدوق، وبقية الرجال ثقات.
وقوله: قدر صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم - أي قدر تأخير الصلاة عن الزوال.
وحديث عبد الله بن مسعود هو تفسير للإبْراد، فإن آخر صلاة الظُّهر في الصيف ثلاثة أقدام إلى خمسة أقدام، ولا يجوز التأخير أكثر من هذا، ولذا بوَّب النسائي بقوله: آخر وقت الظهر.
ثم إن أقدام الظل يختلف في الإقليم والبلدان، ولا يستوي في جميع المدن والأمصار كما قال الخطابي.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সালাতের (সময় নির্ধারণের) পরিমাপ গ্রীষ্মকালে ছিল তিন কদম থেকে পাঁচ কদম পর্যন্ত এবং শীতকালে ছিল পাঁচ কদম থেকে সাত কদম পর্যন্ত।
1740 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أبرِدُوا بالظهر".
صحيح: رواه ابن ماجة (681) قال: حدثنا عبد الرحمن بن عمر، قال: حدثنا عبد الوهَّاب الثقفي، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكر الحديث.
ورواه ابن خزيمة (330) من طريق عبد الوهاب الثقفي به ولفظه:"إن شِدَّة الحرِّ من فَيحِ جَهنّم، فأبرِدُوا الصلاة في شِدّة الحَرِّ".
قال البوصيري في زوائد ابن ماجة: إسناده صحيح، ورواه ابن حبان في صحيحه من طريق عبد الوَّهاب.
قلت: كذا قال، والصواب: رواه ابن خزيمة. وقد سبق في حديث أبي هريرة عند البخاري أنه رواه مقرونًا بابن عمر من طريق صالح بن كيسان، ثنا الأعرج عبد الرحمن وغيره عن أبي هريرة، ونافع مولى عبد الله بن عمر، عن عبد الله بن عمر أنهما حدَّثاه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكرا الحديث.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: তোমরা যোহরের (সালাত) ঠান্ডা করে আদায় করো।
1741 - عن عائشة قالت: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أَبرِدُوا بالظهر في الحَرِّ".
صحيح: رواه مسدد في مسنده قال: حدثنا عبد الله بن داود، ثنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث، وفي بعض النسخ على الشك عن عائشة. انظر:"المطالب العالية" (291) ورواه أيضًا أبو يعلى الموصلي قال: ثنا عبد الأعلى، ثنا عبد الله بن داود به مثله"المقصد العلي" (188).
قال البوصيري في"إتحاف المهرة" (1/ 52) حديث عائشة رجاله ثقات، وقال: رواه البزار في
"مسنده" ثنا القاسم بن محمد، ثنا عبد الله بن داود الخُريبي، ثنا هشام به. ولفظه:"إن شِدَّة الحَرِّ من فَيحِ جهنَّم فأبردُوا بالصلاة".
قال البزار: لا نعلمه عن عائشة إلا من هذا الوجه، وهو غريب"كشف الأستار" (1/ 189 رقم: 371).
قلت: رجاله ثقات كما قال البوصيري، وعبد الله بن داود الخُريبي ثقة فاضل، فتفرُّده غير قادحٍ لصحة الحديث.
وأورده الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 207)، وقال: رواه البزار وأبو يعلى ورجاله موثقون. انتهى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তীব্র গরমের সময় যুহরের সালাত ঠান্ডা করে আদায় করো।"
1742 - عن صفوان بن مخرمة الزهري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أَبرِدُوا بالظُّهر، فإن شدة الحَرِّ من فَيحِ جَهَنَّم".
حسن: رواه الإمام أحمد (18036) عن وكيع، ويعلى والطبراني في الكبير (8/ 7399) من طريق عبد الله بن يوسف الفريابي وأبي نعيم - كلهم عن بشير بن سليمان، عن القاسم بن صفوان الزهري، عن أبيه فذكر الحديث.
وإسناده حسن، ومداره على القاسم بن صفوان الذي روى عنه الشعبي وأشعث وبشير فيما ذكره البخاري في"التاريخ الكبير" (7/ 161) ومن طريقه رواه ابن أبي شيبة (1/ 325) والحاكم في المستدرك (3/ 251) إلا أنه لم يحكم عليه بشيء، وذكره ابن حبان في الثقاته (5/ 304)، وابن خلفون في"الثقات" فيما ذكره الحافظ في"التعجيل" (223) فهو لا يتزل عن درجة"صدوق".
وأما قول أبي حاتم: لا يعرف إلا في حديث المواقيت - لا يضره إذا عرفنا أنه لا ينزل عن درجة"صدوق".
وأما ما رُوي عن المغيرة بن شعبة قال: كُنَّا نُصلِّي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الظُّهر بالهاجرةِ، فقال لنا: أَبرِدُوا بالصلاة، فإن شِدَّةَ الحرِّ من فيحِ جَهنَّم، فهو ضعيف.
رواه ابن ماجة (680) من طريق إسحق بن يوسف عن شريك، عن بيان بن بِشر، عن قيس بن أبي حازم، عن المغيرة بن شعبة فذكر مثله.
إسناده ضعيف لأجل شريك وهو: ابن عبد الله النخعي الكوفي القاضي، قال ابن المبارك: ليس حديث شريك بشيء. وقال الجوزجاني: سيئ الحفظ، مضطرب الحديث مائل. وقال الدارقطني: ليس شريك بالقوي فيما ينفرد به. ودافع عنه الذهبي قائلا: كان شريك من أوعية العلم، حمل عنه إسحاق الأزرق تسعة آلاف حديث، وقال النسائي: ليس به بأس، وقد أخرج مسلم لشريك متابعة. انتهى.
قلت: وهذا الحديث مما لم ينفرد به شريك، فقد تابعه غيره فيما نقل البيهقي في سننه (1/ 439)، عن أبي عيسى الترمذي أنه قال: فيما بلغني عنه سألتُ محمدًا - يعني البخاري - عن هذا الحديث فعدَّه محفوظًا، وقال: رواه غير شريك عن بيان، عن قيس، عن المغيرة.
ثم قال البيهقي: رواه أبو عيسى عن عمر بن إسماعيل بن مجالد، عن أبيه، عن بيان كما قال
البخاري. انتهى.
قلت: لم أجد قول أبي عيسى الترمذي في سننه، ولا في علله، ولا في شمائله، فانظر أين نقل الترمذي قول البخاري؟ .
وأما البوصيري فقال في"زوائد ابن ماجة":"هذا إسناد صحيح، ورجاله ثقات، رواه ابن حبان في صحيحه (1505) عن محمد بن عبد الرحمن السامي، حدثنا أحمد بن حنبل، حدثنا إسحاق بن يوسف، عن شريك، فذكره بحروفه ومتنه".
قلت: أخرجه الإمام أحمد في مسنده (18185) عن إسحاق بن يوسف الأزرق به مثله.
وأبو حاتم، ذكر علة أخرى، سأل ابنه عبد الرحمن عن حديث رواه إسحاق الأزرق، عن شريك، عن بيان، عن قيس، عن المغيرة بن شعبة، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
قال أبو محمد عبد الرحمن بن الإمام أبي حاتم: ورواه أبو عوانة عن طارق، عن قيس، قال: سمعتُ عمر بن الخطاب قوله:"أَبرِدُوا بالصلاة" قال أبي: أخاف أن يكون هذا الحديث يدفع ذاك الحديث، قال: قلت فأيهما أشبه؟ قال: كأنه هذا - يعني حديث عمر بن الخطاب، قال أبي في موضع آخر: لو كان عند قيس عن المغيرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم لم يحتج أن يفتقر إلى أن يُحدِّثَ عن عمر موقوفًا. انتهى.
قلت: وروي أيضًا عن عمر بن الخطاب مرفوعًا ذكره الهيثمي في"المجمع" (1/ 306) ونسبه إلى أبي يعلى والبزار، وقال:"فيه محمد بن الحسن بن زبالة، نسب إلى وضع الحديث".
সাফওয়ান ইবনে মাখরামা আয-যুহরি থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যুহরের সালাত ঠান্ডা (সময়) করে আদায় করো। কেননা, গরমের তীব্রতা জাহান্নামের নিঃশ্বাসের আঁচ থেকে।"
1743 - عن أنس قال: كُنَّا نُصلي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في شِدَّةِ الحرِّ، فإذا لم يستطِع أحدُنا أن يُمكِّنَ جبهته من الأرض، بسط ثوبَه، فسجد عليه.
متفق عليه: أخرجه البخاري في المواقيت (542)، ومسلم في المساجد (620) كلاهما من طريق غالب القطان، عن بكر بن عبد الله، عن أنس بن مالك، فذكر الحديث، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري: كنا إذا صَلَّينَا خلفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بالظهائر سجدنا على ثيابنا اتقاءَ الحَرِّ، وأخرجه أيضًا في كتاب الصلاة (385) وفي كتاب العمل في الصلاة (1208) في الجميع من طريق غالب به نحوه. ومن هذا الطريق رواه أيضًا أبو يعلى في مسنده"المقصد العلي" رقم (185) وفيه قال أنس: كُنَّا نُصلي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في شدة الحرِّ فيأخذ أحدنا الحصى في يده، فإذا برد وضعه فسجد عليه.
وغالب هو: ابن خُطَّاف - بضم المعجمة، وقيل بفتحها، وهو ابن أبي غَيلان القَطَّان أبو سليمان البصري. وبكر بن عبد الله هو: المزني أبو عبد الله البصري.
وفي الحديث دليل على أن المصلي إذا سجد على ثياب بدنه يجوز، وإليه ذهب عامة الفُقهاء، ولم يُجَوِّزه الشافعي، وتأوَّلَ الحديث على ثوب هو غير لابسه ومما يؤيد قوله حديث جابر بن
عبد الله الآتي: ولو جاز السجود على ثوب هو لابِسُه لم يكن يحتاج إلى تبريد الحصى في كفه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা প্রচণ্ড গরমে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে সালাত আদায় করতাম। যখন আমাদের কারো পক্ষে কপাল মাটিতে স্থিরভাবে স্থাপন করা সম্ভব হতো না, তখন সে তার কাপড় বিছিয়ে দিত এবং তার উপর সিজদা করত।
1744 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج حين زاغتِ الشمس فصلي الظُّهرَ.
صحيح: رواه البخاري في المواقيت (540) عن أبي اليمان، قال: أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني أنس بن مالك فذكر الحديث في سياق طويل، وسيأتي في صفة الجنة والنار، ورواه الترمذي (156) من طريق عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري به ولفظه: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى الظُّهر حين زالت الشمس.
وفيه دليل على أن زوال الشمس هو أول وقت الظُّهرِ، وفيه دليل على استحباب تقديمها.
قال الترمذي: حديث صحيح، وهو أحسن حديث في هذا الباب.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্য যখন হেলে পড়ল (মধ্যাকাশ থেকে সরে গেল), তখন বের হলেন এবং যোহরের সালাত আদায় করলেন।
1745 - عن جابر بن سمرة قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلي الظُّهر إذا دَحَضَتِ الشمسُ.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (618) من طريق يحيى بن سعيد وابن مهدي، عن شعبة، قال: حدثنا سماك بن حرب، عن جابر فذكره، ورواه أبو داود (806) عن عبيد الله بن معاذ، ثنا أبي، ثنا شعبة بإسناده، وفيه:"إذا دحضتِ الشمس صلي الظُّهر وقرأ بنحو من {وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَى} [الليل: 1]. والعصر كذلك، والصلوات كذلك إلا الصبح فإنه كان يطيلها". انتهى.
وقوله: دَحَضتِ الشمسُ - بفتح الدال والحاء - أي: إذا زالت
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহরের সালাত আদায় করতেন যখন সূর্য ঢলে যেত।
1746 - عن خَبَّاب بن الأرت قال: أتينا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فشكونا إليه حرَّ الَرمضَاءِ فلم يُشكِنا.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (619) من طرق عن زهير، حدثنا أبو إسحاق، عن سعيد بن وهب، عن خباب قال: فذكره.
وخبَّاب هو: خَبَّابُ بن الأَرَتِّ أبو عبد الله مولى بني زُهرة، وكان يعذب في الله، شهد بدرًا ثم نزل الكوفة، ومات بها سنة سبع وثلاثين.
قال زهير: قلت لأبي إسحاق: أفي الظُّهر؟ قال: نعم، قلت: أفي تَعجيلها؟ قال:"نعم".
وقوله:"فلم يُشكِنَا" أي: لم يُزِل شكوانا.
وقوله: حَرَّ الرَمضَاءِ - يعني ما يُصيبُ أقدامَهم من حَرِّ الشمسِ فيها بتبكير صلاة الظُّهر.
حديث خبَّاب في الظاهر يعارض أحاديث الباب السابق، فأجابوا عنه بأنه محمول على أنهم طلبوا تأخيرًا زائدًا عن وقت الإبراد، وهو زوال حَرِّ الرمضاء، وذلك قد يستلزم خروج الوقت، ولذلك لم يُجِبهم، أو هو منسوخ بأحاديث الإبراد، فإنَّها متأخرة، واستدل الطحاوي بحديث المغيرة ابن شعبة، قال: كُنا نصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم الظُّهر بالهاجرة، ثم قال لنا:"أَبرِدُوا بالصلاة" الحديث.
قال الحافظ ابن حجر: وهو حديث رجاله ثقات، رواه أحمد وابن ماجة، وصححه ابن خزيمة، ونقل الخلال عن أحمد: هذا آخر الأَمرين من رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، انتهى. انظر:"فتح الباري" (2/ 17).
قلت: وأما حديث المغيرة بن شعبة فقد سبق الكلام عليه بأن فيه شريكًا، وهو سيئ الحفظ، ولكن ذكر البخاري أن له متابعًا.
খাব্বাব ইবনুল আরাত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এলাম এবং (জমিনের) কঠিন উত্তাপের (রামদা'র) কারণে তাঁর কাছে অভিযোগ করলাম, কিন্তু তিনি আমাদের অভিযোগ দূর করলেন না।
1747 - عن جابر بن عبد الله قال: كنت أصَلِّي الظُّهر مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فآخذ قبضة من الحصى لتبرد في كفِّي أضعها لجبهتي أَسجد عليها لشدة الحَرِّ.
حسن: رواه أبو داود (399)، والنسائي (1081) كلاهما من طريق عَبَّاد بن عبَّاد، ثنا محمد بن عمرو، عن سعيد بن الحارث الأنصاري، عن جابر بن عبد الله فذكر الحديث، واللفظ لأبي داود. ولفظ النسائي:"فآخذ قبضةً من حَصى في كفِّي أُبرِّده، ثم أُحوِّلُه في كفي الآخرِ، فإذا سجدتُ وضعتُه لجبهتي".
وإسناده حسن فإن عبَّاد بن عبَّاد وهو: ابن حيب الأزدي، ومحمد بن عمرو بن علقمة"صدوقان". وفيه من الفقه أن الفعل القليل لا يبطل الصلاة.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুহরের সালাত আদায় করতাম। তখন আমি আমার হাতের মধ্যে এক মুঠো ছোট পাথর নিতাম, যাতে তা আমার হাতে ঠান্ডা হয়। প্রচণ্ড গরমের কারণে আমি আমার কপালে তা রেখে সেগুলোর উপর সিজদা করতাম।
