আল-জামি` আল-কামিল
1748 - عن أم سلمة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أشد تعجيلًا للظُّهر منكم، وأنتُم أشَدُّ تعجيلًا للعصر منه.
صحيح: رواه الترمذي (161) حدثنا علي بن حُجر، حدثنا إسماعيل ابن عُلَيَّة، عن أيوب، عن ابن أبي مليكة، عن أم سلمة فذكر الحديث. وهذا إسناد صحيح، ورجاله ثقات.
إلا أن الترمذي أظهر له علة وهي ليست بعلة في علم الحديث، أن إسماعيل بن عُلَيَّة روى هذا الحديث عن ابن جُريج، عن ابن أبي مُليكة، عن أم سلمة، ويقول: وجدتُ في كتابي: أخبرني علي بن حُجر، عن إسماعيل ابن إبراهيم (وهو ابن عُلَيَّة) عن ابن جُريج، ثم قال: وحدثنا بشر بن مُعاذ البصري قال: حدثنا إسماعيل بن عُلَيَّة، عن ابن جُريج بهذا الإسناد نحوه، وهذا أصح. انتهى كلامه.
قلت: هكذا رواه الإمام أحمد في مسنده (26478 و 26647) عن إسماعيل بن عُلَيَّة، عن ابن جُريج، عن ابن أبي مُليكة، عن أم سلمة، ولكن لا يمنع هذا من أن يكون عند علي بن حُجر من وجهين:
أحدهما: عن إسماعيل ابن عُلَية، عن أيوب، عن ابن أبي مُليكة.
والثاني: من طريقه ومن طريق بشر بن معاذ، كلاهما عن إسماعيل ابن علية، عن ابن جُريج، ابن أبي مليكة به.
وهو أمر سائغ في علم الحديث فلا حاجة إلى تخطئة علي بن حُجر وهو ثقة حافظ، وترجيح روايته عن إسماعيل ابن عُلَيَّة عن ابن جُريج، وإن كان له ما يؤيده، وابن جُريج مدلس وقد عنعن، وهو يفتقر إلى المتابعة، وأيوب متابع قوي له، ومتن الحديث ثابت من روايات الآخرين.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের চেয়ে যুহরের সালাত (আদায় করতে) বেশি দ্রুততা করতেন, আর তোমরা তাঁর চেয়ে আসরের সালাত (আদায় করতে) বেশি দ্রুততা করো।
1749 - عن أنس بن مالك يقول: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا نزل منزلًا لم يرتحل منه حتى يُصَلِّي الظُّهر، فقال له رجل: وإن كان بنصف النهار؟ قال: وإن كان بنصف النهار.
حسن: أخرجه أبو داود (1205) والنسائي (498) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن شُعبة، قال: حدثني حمزة العائذي، قال: سمعت أنس بن مالك، فذكر الحديث. وإسناده حسن.
وحمزة العائذي هو: ابن عمرو الضبي البصري، وثقه النسائي، وقال أبو حاتم: شيخ، وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق" وهو من رجال مسلم، وبقية رجاله ثقات، وسيأتي مزيد من التخريج في صلاة المسافرين.
وقوله:"إذا نزل منزلًا" أي قبيل الظُّهر لا مطلقًا؛ لأنه قد ثبت أنه إذا ارتحل قبل أن تزيغ الشمسُ أخَّر الظُّهر إلى العصر.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো স্থানে (পথিমধ্যে) অবতরণ করতেন বা বিরতি নিতেন, তখন তিনি যুহরের সালাত আদায় না করা পর্যন্ত সেখান থেকে প্রস্থান করতেন না। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করল: যদি সেটা দ্বিপ্রহরের সময়ও হয়? তিনি বললেন: যদিও তা দ্বিপ্রহরের সময় হয়।
1750 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى العصر، والشمسُ في حجرتها، لم يظهر الفيءُ من حجرتها.
متفق عليه: رواه البخاري (545)، ومسلم (611) كلاهما عن ابن شهاب عن عروة، عن عائشة، وقد ذكره مالك والبخاري ومسلم عقب حديث أبي مسعود لبيان وقت صلاة العصر معلقًا من مقولة ابن شهاب، ثم إن الشيخين أسندا من طرقهما عن ابن شهاب ومن لفظه: كان النبي صلى الله عليه وسلم يصلي العصر، والشمسُ طالعة في حجرتي، لم يظهر الفيء بعد.
ورواه أيضًا هشام عن أبيه، عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي العصر، والشمسُ لم تخرج من حجرتها، كذا عند البخاي، وعند مسلم: والشمسُ واقعة في حجرتي.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের সালাত আদায় করতেন, যখন সূর্য তাঁর কক্ষেই ছিল এবং তাঁর কক্ষ থেকে (দেয়ালের) ছায়া তখনও প্রকাশ পায়নি।
1751 - عن أنس بن مالك قال: كنّا نُصلي العصر، ثم يخرج الإنسان إلى بني عمرو بن عوف فيجدهم يصلون العصر.
متفق عليه: رواه مالك في وقوت الصلاة (10) عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك، فذكره.
ومن طريق مالك رواه البخاري في المواقيت (548)، ومسلم في المساجد (621: 194).
قال العلماء: ومنازل بني عمرو بن عوف على ميلين من المدينة، قال النووي:"وهذا يدل على المبالغة في تعجيل صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكانت صلاة بني عمرو بن عوف في وسط الوقت، ولولا هذا لم يكن فيه حجة، ولعل تأخير بني عمرو بن عوف لكونهم كانوا أهل أعمال في حروثهم، وزروعهم وحوائطهم، فإذا فرغوا من أعمالهم، تأهبوا للصلاة بالطهارة وغيرها، ثم اجتمعوا لها، فتتأخر صلاتُهم إلى وسط الوقت لهذا المعنى". انتهى.
وقال ابن عبد البر: وهذا يدل على اختلاف أحوال المدينة، في صلاة العصر على سعة وقتها ما دامت الشمسُ بيضاء نقية.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা আসরের সালাত আদায় করতাম, এরপর কোনো ব্যক্তি বনী আমর ইবনু আওফের নিকট গেলে দেখত যে, তারা (তখনও) আসরের সালাত আদায় করছে।
1752 - عن أنس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي العصر والشّمس مرتفعة حيّة، فيذهب الذّاهب إلى العوالي فيأتيهم، والشمسُ مرتفِعة.
متفق عليه: البخاري في المواقيت (550) من طريق شعيب، ومسلم في المساجد (621: 192) من طريق الليث وعمرو، ثلاثتهم عن ابن شهاب الزهريّ، عن أنس، فذكره.
ورواه مالك في وقوت الصلاة (11) وعن ابن شهاب، به، بلفظ: كنا نصلي العصر، ثم يذهب الذّاهب منا إلى قباء، فيأتيهم والشّمس مرتفعة.
ومن طريق مالك رواه البخاري (551)، ومسلم (621: 193).
هكذا قال:"إلى قباء" بدل"إلى العوالي".
قال ابن عبد البر في (التمهيد 6/ 178):"هكذا قال فيه جماعة أصحاب ابن شهاب عنه:"يذهب الذّاهب إلى العوالي" وهو الصّواب عند أهل الحديث، وقول مالك عندهم"إلى قباء" وهم لا شك فيه، ولم يتابعه أحد عليه في حديث ابن شهاب هذا، إلا أن معنى في ذلك متقارب على سعة الوقت؛ لأن العوالي مختلفة المسافة، وأقربها إلى المدينة ما كان على ميلين أو ثلاثة، ومنها: ما يكون على ثمانية أميال وعشرة، ومثل هذا في المسافة بين قباء وبين المدينة، وقباء موضع بني عمرو بن عوف، وقد نصّ علي بني عمرو بن عوف في حديث أنس هذا إسحاق بن أبي طلحة" اهـ.
وقال ابن حجر في الفتح 2/ 29:"ولعلّ مالكًا لما رأى أنّ في رواية الزهري إجمالًا حملها على الرواية المفسرة وهي روايته المتقدّمة عن إسحاق حيث قال فيها:"ثم يخرج الإنسان إلى بني عمرو بن عوف، وقد تقدم أنهم أهل قباء، فبني مالك على أن القصة واحدة لأنهما جميعًا حدّثاه عن أنس والمعنى متقارب، فهذا الجمع أولى من الجزم بأنّ مالكًا وهم فيه".
ثم نقل عن ابن رُشيد السبتي أنه قال:"قضى البخاريّ بالصّواب لمالك بأحسن إشارة وأوجز عبارة؛ لأنه قدّم أوّلًا المجمل ثم أتبعه بحديث مالك المفسّر المعين".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের সালাত আদায় করতেন এমন সময় যখন সূর্য উজ্জ্বল ও সতেজ (উঁচু) থাকতো। অতঃপর কোনো ব্যক্তি আল-আওয়ালী (নামক স্থানে) যেত এবং তাদের কাছে পৌঁছাত, তখনও সূর্য উপরে (উঁচু) থাকতো।
1753 - عن أنس، أن أبا أمامة بن سهل يقول: صلَّينا مع عمر بن عبد العزيز الظُّهرَ، ثم خرجنا حتى دخلنا على أنس بن مالك فوجدناه يُصَلِّي العصرَ، فقلت يا عَمَّ! ما هذه الصلاةُ التي صلَّيتَ؟ قال: العصر. وهذه صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم التي كُنَّا نُصَلِّي معه.
متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (549)، ومسلم في المساجد (623) كلاهما من طريق عبد الله بن المبارك، عن أبي بكر بن عثمان بن سهل بن حُنَيف، قال سمعت أبا أمامة يقول: فذكر الحديث.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু উমামা ইবনে সাহল বলেন: আমরা উমর ইবনে আব্দুল আযীযের সাথে যুহরের সালাত আদায় করলাম, তারপর বের হলাম এবং আনাস ইবনে মালিকের কাছে প্রবেশ করলাম। আমরা তাকে আসরের সালাত আদায় করতে দেখলাম। আমি বললাম, "হে চাচা! আপনি এই যে সালাত আদায় করলেন, এটা কী?" তিনি বললেন, "আসরের সালাত। আর এটা হলো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই সালাত যা আমরা তাঁর সাথে আদায় করতাম।।"
1754 - عن رافع بن خديج قال: كنا نُصلّي العصر مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم تُنحر الجزورُ، فتُقسم عشرَ قِسم، ثم تُطبخُ فنأكلُ لحمًا نضيجًا قبل مَغيب الشمس.
متفق عليه: رواه البخاري في الشركة (2485)، ومسلم في المساجد (625)، واللفظ له،
كلاهما من طريق الأوزاعي، قال: ثنا أبو النجاشي، قال: سمعتُ رافع بن خديج فذكر الحديث.
وفي رواية: كُنا نَنحرُ الجزورَ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد العصر. ولم يقُل:"كنا نصلي معه".
রাফে' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে আসরের সালাত আদায় করতাম, অতঃপর উট (বা বড় পশু) যবেহ করা হতো এবং তা দশ ভাগে ভাগ করা হতো, এরপর তা রান্না করা হতো এবং আমরা সূর্যাস্তের পূর্বে রান্না করা গোশত খেতাম।
1755 - عن العلاء بن عبد الرحمن أنه دخل على أنس بن مالك بعد الظُّهْر، فقام يُصلّي العَصرَ، فلما فرغ من صلاته ذكرنا تعجيلَ الصلاةِ، أو ذكرهَا، فقال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"تلك صلاةُ المنافقين، تلك صلاةُ المنافقين، تلك صلاةُ المنافقين، يجلسُ أحدُهم حتى إذا اصفرتِ الشمسُ، وكانت بين قرنَي الشَيطانِ، أو على قرنِ الشيطانِ قام فَنَقَرَ أربعًا، لا يذكرُ الله فيها إلا قليلًا".
صحيح: رواه مالك في القرآن (46) عن العلاء بن عبد الرحمن قال: دخلنا على أنس بن مالك فذكر الحديث.
ورواه مسلم في المساجد (623) من أوجه عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء بن عبد الرحمن أنه دخل على أنس بن مالك في داره بالبصرة حين انصرف من الظُّهرِ، وداره بجنب المسجد، فلما دخلنا عليه قال: أصلَّيتُم العَصرَ؟ فقلنا له: إنما انصرفنَا الساعة من الظُّهرِ، قال: فصلُّوا العصر، فقُمنا فصلينا. فلما انصرفنا قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"تلك صلاةُ المنافق، يجلس يرقُبُ الشمسَ، حتى إذا كانت بين قرني الشيطان قام فنقرها أربعًا، لا يذكر الله فيها إلا قليلًا".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলা ইবনু আবদুর রহমান (রাহ.) যুহরের পর তাঁর (আনাস ইবনে মালিকের) কাছে প্রবেশ করলেন। তখন আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে আসরের সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন আমরা সালাত দ্রুত আদায় করা নিয়ে আলোচনা করলাম—অথবা আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেটির কথা উল্লেখ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এটা মুনাফিকদের সালাত, এটা মুনাফিকদের সালাত, এটা মুনাফিকদের সালাত। তাদের কেউ বসে থাকে, যখন সূর্য হলুদবর্ণ ধারণ করে এবং তা শয়তানের দুই শিংয়ের মাঝখানে চলে যায় (বা শয়তানের শিংয়ের উপর চলে যায়), তখন সে দাঁড়ায় এবং ঠোকর মেরে চার রাক‘আত আদায় করে। তাতে সে আল্লাহকে খুব কমই স্মরণ করে।"
1756 - عن أنس بن مالك قال: صلى لنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم العصر، فلما انصرف أتاه رجل من بني سَلِمةَ فقال: يا رسول الله! إنا نريد أن ننحرَ جزُورًا لنا، ونحنُ نُحب أن تَحضُرَها قال:"نعم" فانطلق وانطلقنا معه، فوجدنا الجُزورَ لم تُنحَر، فنُحرت، ثم قُطِّعَت، ثم طُبخَ منها، ثم أكلنَا قبل أن تغيبَ الشمسُ.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (624) من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن يزيد بن أبي حبيب، أن موسى بن سعد الأنصاري حدَّثه، عن حفص بن عبيد الله، عن أنس بن مالك فذكره.
قال مسلم: وقال المرادي (وهو محمد بن سلمة المرادي من شيوخ مسلم) حدثنا ابن وهب، عن ابن لهيعة وعمرو بن الحارث في هذا الحديث.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে আসরের সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বনি সালামাহ গোত্রের এক লোক তাঁর কাছে এসে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আমাদের একটি উট জবাই করতে চাই, আর আমরা চাই যে আপনি সেখানে উপস্থিত থাকুন।" তিনি বললেন, "হ্যাঁ।" এরপর তিনি গেলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে গেলাম। আমরা সেখানে গিয়ে দেখলাম উটটি এখনও জবাই করা হয়নি। তারপর সেটি জবাই করা হলো, এরপর তা টুকরা টুকরা করা হলো, তারপর তার কিছু অংশ রান্না করা হলো, তারপর সূর্য ডোবার আগেই আমরা তা খেলাম।
1757 - عن وعن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي بنا العَصرَ والشمسُ بيضاء مُحلِّقَة.
صحيح: رواه النسائي (508) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: حدثنا جرير، عن منصور، عن رِبعي بن حِراش، عن أبي الأبيض، عن أنس فذكر الحديث.
وأورده الهيثمي في زوائد أبي يعلى"المقصد العلي" (190) وفي زوائد البزار"كشف الأستار" (373) كلاهما من طريق منصور به مثله في البزار، ولفظ أبي يعلى: كُنَّا نُصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم -
العصر، فآتي عشيرتي فأجدهم جلوسًا، فأقول لهم: قوموا فصلوا، فقد صلَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم.
قال الهيثمي:"اختصره النسائي".
وقال في"مجمع الزوائد" (1/ 308): رجاله ثقات.
قلت: وهو كما قال فإن رجاله ثقات، وإسناده صحيح، وأبو الأبيض هو: العنسي الشامي، ويقال المدني، قال ابن أبي حاتم: سئل أبو زرعة عن اسم أبي الأبيض فقال: لا يعرف اسمه، وثَّقه العجلي وغيره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নিয়ে আসরের সালাত আদায় করতেন যখন সূর্য সাদা ও উজ্জ্বল অবস্থায় উঁচুতে অবস্থান করত।
1758 - عن وعن عبد الله بن عمر قال: إنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنما بقاؤكم فيما سلفَ قبلكم من الأُمَم كما بين صلاة العَصرِ إلى غروبِ الشمسِ، أُوتي أهلُ التوراةِ التوراةَ فعملوا حتى إذا انتصفَ النهارُ عَجزوا، فأُعطوا قيراطًا قيراطًا، ثم أُوتي أهلُ الإنجِيل الإنجِيلَ فعملوا إلى صلاةِ العَصرِ ثم عجزوا فأُعطوا قيراطًا قيراطًا. ثم أُوتينا القرآن فعمِلنا إلى غروب الشمسِ، فأعطينا قيراطين قيراطَين، فقال أهلُ الكتابين: أي ربَّنا! أعطيتَ هؤلاء قيراطين قيراطَين، وأعطَيتنا قيراطًا قيراطًا، ونحن كُنَّا أكثرَ عَملًا، قال: قال الله عز وجل: هل ظلمتُكُم من أجركم من شيء؟ قالوا: لا، قال: فهو فَضلي أوتيه من أشَاءُ".
صحيح: رواه البخاري في المواقيت (557) من حديث ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه عبد الله بن عمر فذكر الحديث.
وقد رواه أيضًا من طرق عن عبد الله بن عمر انظر بأرقام (2268، 2269، 3459، 5021، 7467، 7533).
وفيه إشارة إلى أن وقت صلاة العصر يمتد إلى غروب الشمس، وهو تفسير لما جاء في حديث أبي هريرة:"إذا أدرك أحدكم سجدة من صلاة العصر قبل أن تغرب الشمسُ فليتم صلاته".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "তোমাদের অবস্থান বা স্থায়িত্ব তোমাদের পূর্ববর্তী উম্মতদের তুলনায় কেবল আসরের সালাত থেকে সূর্যাস্ত পর্যন্ত সময়ের মতো। তাওরাতের অনুসারীদেরকে তাওরাত দেওয়া হয়েছিল। তারা দিনের মধ্যভাগ পর্যন্ত কাজ করল, তারপর দুর্বল হয়ে গেল (বা কাজ বন্ধ করে দিল)। ফলে তাদেরকে এক ক্বিরাত এক ক্বিরাত করে দেওয়া হলো। এরপর ইনজীলের অনুসারীদেরকে ইনজীল দেওয়া হলো। তারা আসরের সালাত পর্যন্ত কাজ করল, তারপর তারা দুর্বল হয়ে গেল। ফলে তাদেরকে এক ক্বিরাত এক ক্বিরাত করে দেওয়া হলো। এরপর আমাদেরকে কুরআন দেওয়া হলো। আমরা সূর্যাস্ত পর্যন্ত কাজ করলাম। ফলে আমাদেরকে দুই ক্বিরাত দুই ক্বিরাত করে দেওয়া হলো। তখন দুই কিতাবের (আহলে কিতাব) অনুসারীরা বলল: হে আমাদের রব! আপনি এদেরকে (মুসলিমদেরকে) দুই ক্বিরাত দুই ক্বিরাত করে দিলেন, আর আমাদেরকে দিলেন এক ক্বিরাত এক ক্বিরাত করে, অথচ আমরা কাজে বেশি ছিলাম! আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বললেন: আমি কি তোমাদের মজুরি থেকে সামান্যও কমিয়ে দিয়েছি? তারা বলল: না। আল্লাহ বললেন: তাহলে এটা আমার অনুগ্রহ, যাকে ইচ্ছা আমি তা দান করি।"
1759 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الذي تفوتُه صلاةُ العصر كأنَّما وُتِر أهلَه ومالَه".
متفق عليه: رواه مالك في وقوت الصلاة (21) عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله، وعن مالكٍ رواه البخاري في المواقيت (553)، ومسلم في المساجد (300).
اختلف في المراد بالفوات، فقيل: تأخيرها عن وقت الجواز بغير عذر؛ لأن الإثم يترتب على
ذلك. وقيل: المراد بالفوات: فواتُها في الجماعة.
وقوله: وُتِر - أي نُقِص، يقال: وترتُه - إذا نقصتَه، فكأنَّك جعلته وِترًا بعد أن كان كثيًرا.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার আসরের সালাত ছুটে যায় (ফউত হয়ে যায়), সে যেন তার পরিবার ও সম্পদ হারিয়েছে।"
1760 - عن أبي المليح قال: كُنَّا مع بريدة في غزوةٍ في يومٍ ذي غيم، فقال: بَكِّروا بصلاة العصر، فإن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"من ترك صلاة العصر فقد حَبِطَ عملُه".
صحيح: رواه البخاري في المواقيت (553) عن مسلم بن إبراهيم قال: حدثنا هشام قال: حدثنا يحيى بن أبي كثير عن أبي قلابة عن أبي المليح قال: فذكره.
والترك هنا بمعنى التفريط، ولذا حَثَّ الصحابي على المبادرة.
وما جاء في بعض الروايات:"بكروا بالصلاة في يوم الغيم، فإنه من ترك الصلاة فقد كفر" رواه ابن حبان (1463) ففيه إسحاق بن إبراهيم بن العلاء الزبيدي قال أبو داود: ليس بشيء، ونقل تكذيبه عن ابن عوف.
قلت: الجزء الثاني من الحديث لا يوافق الجزء الأول الذي فيه الحث على التبكير، وعدم التأخير في أداء الصلاة.
বুরাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ আল-মালীহ বলেন, আমরা এক মেঘাচ্ছন্ন দিনে তাঁর (বুরাইদা) সাথে এক যুদ্ধে ছিলাম। তখন তিনি বললেন: তোমরা আসরের সালাত তাড়াতাড়ি আদায় কর। কেননা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আসরের সালাত ত্যাগ করল, তার আমল নষ্ট হয়ে গেল।"
1761 - عن نوفل بن معاوية مرفوعًا:"من الصلاةِ صلاة، من فَاتَته فكأنَّما وُتِر أهلَه ومالَه".
متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3603)، ومسلم في الفتن (2886/ 11) كلاهما من حديث صالح بن كيسان، عن ابن شهاب، قال: حدثني أبو بكر بن عبد الرحمن بن الحارث، عن عبد الرحمن بن مطيع بن الأسود، عن نوفل بن معاوية فذكر الحديث.
وهذا المبهم من الصلاة جاء مفسرًا في سنن النسائي (478) من طريق حيوة بن شريح، نا جعفر بن ربيعة، أن عراك بن مالك حدَّثه، أن توفل بن معاوية حدَّثه أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من فاتَته صلاة العَصرِ فكأنما وُتِر أهلَه ومالَه". قال عراك: وأخبرني عبد الله بن عمر أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من فاتته صلاةُ العَصرِ فكأنما وُتِر أهله ومالهَ" وخالفه يزيد بن أبي حبيب، قال النسائي: أخبرنا عيسى بن حَمَّاد زُغبَةُ، قال: حدثنا الليث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عراك بن مالك أنه بلغه أن نوفل بن معاوية قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من الصلاِة صلاة من فاتته فكأنما وُتِر أهلَه ومالَه".
قال ابن عمر: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"هي صلاة العَصرِ" خالفه محمد بن إسحاق، قال النسائي: أخبرنا عبيد الله بن سعد بن إبراهيم بن سعد، قال: حدثني عَمي، قال: حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني يزيد بن أبي حبيب، عن عراك بن مالك، قال: سمعتُ نوفل بن معاوية، يقول: صلاة من فاتته فإنَّما وُتِر أهلَه ومالَه، قال ابن عمر: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هي صلاة العَصر". انتهى.
ثم اعلم أن حديث نوفل بن معاوية شاهد لحديث أبي هريرة سيأتي في الفتن وأشراط الساعة ولكن لم
بذكر فيه الصلاة.
وقوله:"وُتِر أهلَه ومالَه": روي بالنصب على أن"وُتِر" بمعني"سلب" وهو يتعدى إلى مفعولين، فيكون"أهله ومالَه" مفعولًا ثانيًا، وأما المفعول الأول فأضمر في"وُتِر" لم يُسم فاعله، وهو عائد على الذي فاتته، فالمعنى أنه أصيب بأهله وماله، ومثله قوله تعالى: {وَلَنْ يَتِرَكُمْ أَعْمَالَكُمْ} [سورة محمد: 35].
وقرئ بالرفع بمعنى أخذ، فيكون أهلُه ومالُه نائب الفاعل.
নওফাল ইবনু মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তির আসরের সালাত ছুটে গেল, সে যেন তার পরিবার ও ধন-সম্পদ সব হারাল।"
1762 - عن علي بن أبي طالب، قال: لَمَّا كان يومُ الأَحْزاب قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مَلأَ الله بُيوتَهم وقُبورَهم نارًا شَغَلُونا عن الصلاة الوُسْطى حينَ غابتِ الشمسُ".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2931) وفي المغازي (4111) وفي التفسير (4533) وفي الدعوات (6396)، ومسلم في المساجد (627) كلاهما من طرق عن هشام، عن محمد، عن عَبِيدة، عن علي بن أبي طالب فذكر الحديث.
هشام هو: ابن أبي عبد الله سَنْبَر الدستوائي، ويجوز أن يكون ابن حسان القُردُوسي فإنه من أثبت الناس في محمد بن سيرين.
ومحمد هو: ابن سيرين. وعبيدة: بفتح العين، هو ابن عمرو السّلماني المرادي.
ولمسلم عن شُتَيْر بن شَكَل، عن عليٍّ قال:"شَغلونا عن الصلاةِ الوُسْطى صلاة العَصْرِ …" ثم صلَّاها بين العشاءَين بين المغرب والعِشاء.
ورواه أيضًا من طرق عن شعبة قال: سمعتُ قتادة، يحدثُ عن أبي حسان، عن عبيدة، عن عليَّ"شَغَلُونا عن صلاة الوُسْطى حتى آبَتِ الشمسُ، ملأَ الله قبورهم نارًا أو بيوتهم أو بطونهم". شك شعبة في البيوت والبطون.
وروى ابن أبي عدي، عن سعيد، عن قتادة بهذا الإسناد وقال:"بيونهم وقبورهم" ولم يشك.
وقوله: آبَتِ الشمس - أي غربتْ.
আলী ইবন আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আহযাবের যুদ্ধ হয়েছিল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাদের ঘরসমূহ ও কবরসমূহ আগুনে পূর্ণ করে দিন! তারা আমাদের সালাতুল উসতা (মধ্যবর্তী সালাত) থেকে সূর্য ডোবার সময় পর্যন্ত বিরত রেখেছে।"
1763 - عن عبد الله بن مسعود قال: حبس المشركون رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صلاة العَصْرِ حتى احمرَّت الشمس، أو اصفَرَّتْ فقال رسول الله:"شَغَلُونا عن الصلاة الوُسْطى صلاة العَصرِ، ملأ الله أجْوَافَهُمْ وقبورَهم نارًا" أو قال:"حَشَا الله أجْوَافَهُمْ وقبورَهم نارًا".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (628)، عن عون بن سلام الكوفي، نا محمد بن طلحة اليامي، عن زُبيد، عن مرة، عن عبد الله فذكر الحديث.
ورواه الترمذي (181) من طريق أبي داود الطيالسي وأبي النضر، عن محمد بن طلحة به مختصرًا وفيه:"صلاة الوُسطى صلاة العصر".
وقال: حسن صحيح. وهو في مسند أبي داود الطيالسي (364) وفي آخر الحديث:"ملأ الله بيوتهم وقبورهم نارًا".
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুশরিকরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আসরের সালাত আদায় করা থেকে বিরত রেখেছিল (বা আটকে রেখেছিল), যতক্ষণ না সূর্য লালচে হয়ে গেল কিংবা হলুদ হয়ে গেল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা আমাদেরকে সালাতুল উস্তা (মধ্যবর্তী সালাত), অর্থাৎ আসরের সালাত থেকে মশগুল (ব্যস্ত) করে দিয়েছে। আল্লাহ যেন তাদের পেট ও কবরসমূহ আগুন দ্বারা পূর্ণ করে দেন।" অথবা তিনি বলেছিলেন: "আল্লাহ যেন তাদের পেট ও কবরসমূহ আগুন দ্বারা ভরে দেন।"
1764 - عن البراء بن عازب قال: نزلت هذه الآية: فقرأناها ما شاء الله. ثم نسخها الله، فنزلت: (حافظوا على الصلوات وصلاة العصر). فقرأناها ما شاء الله، ثم نسخها الله، فنزلت: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى}.
فقال رجل كان جالسًا عند شقيق له: هي إذن صلاة العصر، فقال البراء: قد أخبرتك كيف نزلت، وكيف نسخها الله.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (630) من طريق الفُضيل بن مرزوق، عن شقيق بن عُقبة، عن البراء فذكر الحديث.
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একটি আয়াত নাযিল হয়েছিল। আমরা তা আল্লাহ্র ইচ্ছানুসারে পাঠ করলাম। এরপর আল্লাহ তা রহিত করে দিলেন। অতঃপর এই আয়াত নাযিল হলো: (তোমরা সালাতসমূহ এবং আসরের সালাতের প্রতি যত্নবান হও।) অতঃপর আমরা তা আল্লাহ্র ইচ্ছানুসারে পাঠ করলাম। এরপর আল্লাহ তা রহিত করে দিলেন। অতঃপর এই আয়াত নাযিল হলো: {তোমরা সালাতসমূহ এবং সালাতুল উসতা (মধ্যবর্তী সালাত)-এর প্রতি যত্নবান হও।}
এরপর শিফীক-এর নিকট উপবিষ্ট জনৈক ব্যক্তি তাঁকে বললেন: তাহলে তো এটিই আসরের সালাত। তখন বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তো তোমাকে জানিয়েই দিয়েছি যে, কীভাবে তা নাযিল হয়েছিল এবং কীভাবে আল্লাহ তা রহিত করে দিয়েছিলেন।
1765 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"صلاةُ الوُسطى صلاةُ العصر".
حسن: رواه الترمذي (182) عن هنّاد، حدثنا عَبْدَةُ، عن سعيد (وهو ابن أبي عروبة) عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكر مثله.
قال الترمذي: قال محمد (يعني البخاري) قال علي بن عبد الله: حديث الحسن عن سمرة بن جندب حديث صحيح، وقد سمع منه.
وقال الترمذي: حديث سمرة في صلاة الوسطى حديث حسن، وهو قول أكثر العلماء من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم.
ورواه الإمام أحمد (20091) والطبراني في"الكبير" (6824) كلاهما من طريق أبان بن يزيد، حدثنا قتادة، عن الحسن، عن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى} قال: سماها لنا: أنها هي صلاة العصر".
وإسناده حسن لأجل الحسن، وفيه خلاف معروف في سماعه من سمرة، والتحقيق أنه سمع منه مطلقًا كما قال ابن المديني والبخاري.
সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সালাতুল উসতা (মধ্যবর্তী সালাত) হলো আসরের সালাত।"
1766 - عن ابن عباس قال: قاتل النبي صلى الله عليه وسلم عدوًّا، فلم يفرغْ منهم حتى أخَّر العصرَ عن وقْتِها، فلما رأى ذلك قال:"اللَّهم من حَسَبَنا عن الصلاة الوُسطى فاملأ بيوتَهم نارًا، واملأ قبورهم نارًا" أو نحو ذلك.
حسن: رواه الإمام أحمد (2745)، والطبراني في الكبير (11905)، والأوسط (2016)، والبزار"كشف الأستار" (389)، كلهم من طريق هلال بن خبَّاب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. ورواه عبد بن حميد في"المنتخب" (576) من هذا الوجه وقال فيه:"فاملأ قلوبهم نارًا".
وإسناده حسن، وهلال بن خباب أبو العلا البصري روى له أصحاب السنن وثقه يحيى وأحمد وغيرهما، وتكلم فيه ابن حبان بدون حجة، فهو لا ينزل عن درجة الحسن.
ورواه الطحاوي في شرح معاني الآثار" (1/ 174) بإسناد آخر عن الحكم، عن مقسم وسعيد بن جبير، عن ابن عباس مختصرًا.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক শত্রুর বিরুদ্ধে যুদ্ধ করলেন। তিনি তাদের থেকে অবসর লাভ করতে পারলেন না যতক্ষণ না আসরের সালাত (নামাজ) তার ওয়াক্ত থেকে বিলম্বিত হয়ে গেল। যখন তিনি এই অবস্থা দেখলেন, তখন বললেন: "হে আল্লাহ! যারা আমাদেরকে সালাতুল উসতা (মধ্যবর্তী সালাত) থেকে বিরত রেখেছে, তুমি তাদের ঘরগুলো আগুন দ্বারা পূর্ণ করে দাও এবং তাদের কবরগুলো আগুন দ্বারা পূর্ণ করে দাও," অথবা এই ধরনের কথা।
1767 - عن حذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم يومَ الأحزاب:"شغلونا عن الصلاة الوسطى، ملأ الله بيوتهم وقبورهم نارًا" يعني: صلاة العصر.
حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (388) عن سلمة بن شَبِيب، ثنا عبد الله بن جعفر الرّقيّ، ثنا عبيد الله بن عمرو، عن زيد بن أبي أنيسة، عن عَديّ بن ثابت، عن زِر، عن حذيفة فذكر الحديث.
قال البزار: رواه عاصم، عن زِر، عن علي، وقال عَدِي: عن زِر، عن حذيفة.
وقال الهيثمي في"المجمع" (1/ 309): رواه البزار، ورجاله رجال الصحيح.
قلت: وصحّحه أيضًا ابن حبان (2891) فرواه من طريق هاشم بن الحارث المروزي، قال: حدثنا عبيد الله بن عمرو به ولفظه:"شغلونا عن صلاة العصر" قال: ولم يُصَلِّها يومئذ حتى غابتِ الشمس.
وهاشم بن الحارث ذكره المؤلف في الثقات (9/ 244) وقال: مستقيم الحديث، وربما أغرب.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আহযাবের যুদ্ধের দিন বলেছিলেন: "তারা আমাদেরকে সালাতুল উসতা (মধ্যবর্তী সালাত) থেকে বিরত রেখেছে। আল্লাহ যেন তাদের ঘরগুলো এবং কবরগুলো আগুন দিয়ে পূর্ণ করে দেন।" অর্থাৎ: আসরের সালাত।
