হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1841)


1841 - عن ابن عمر قال: كان لرسول الله صلى الله عليه وسلم مؤذنان: بلال وابن أم مكتوم الأعمى.

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (380) عن ابن نمير، قال: حَدَّثَنَا أبيّ، حَدَّثَنَا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكر مثله.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুইজন মুয়াজ্জিন ছিলেন: বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং ইবনু উম্মে মাকতূম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি ছিলেন অন্ধ।









আল-জামি` আল-কামিল (1842)


1842 - عن عائشة: كان الرسول الله صلى الله عليه وسلم مؤذنان، بلال وابن أم مكتوم.

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (380) عن ابن نمير، ثنا أبيّ، ثنا عبيد الله، ثنا القاسم، عن عائشة، فذكرته. ولم يذكر مسلمُ لفظه وإنما حال على حديث ابن عمر.

ورواه ابن أبي شيبة عنها فقالت: كان لرسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاثة مؤذنين، بلال، وأبو محذورة، وابن أم مكتوم. (السنن الكبرى للبيهقي: 1/ 429، رقم: 2098).

رواه عن يحيى بن آدم، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن الأسود، عن عائشة.

وعنه رواه ابن خزيمة وقال: والخبران صحيحان، فمن قال: كان له مؤذنان أراد اللذين كانا يؤذنان
بالمدينة، ومن قال: له ثلاثة أراد أبا محذورة الذي كان يؤذِّن بمكة، انظر:"إتحاف المهرة" (2/ 126).

وقلت: وكذلك سعد بن عائذ، أو ابن عبد الرحمن مولى الأنصاري المعروف بسعد القرظ كان مؤذن رسول الله صلى الله عليه وسلم بقباء كما أخرجه الحاكم (3/ 608) من طريق بقية، ثنا الزبيديّ، عن الزّهريّ، عن حفص بن عمر بن سعد القرظ أن أباه وعمومته أخبروه أن سعد القرظ كان مؤذِّنًا لأهل قباء، فانتقله عمر بن الخطّاب فاتخذه مؤذنًا لمسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم. سكت عليه الحاكم والذّهبيّ، وفي الإسناد حفص بن عمر بن سعد جعله الحافظ في مرتبة"مقبول".

وذلك بعد أن مات رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وترك بلالٌ الأذان، وانتقل إلى الشام.

ويقال له: سعد القُرَظ، لأنه كان يتجر في القرظ، روى البغوي عن القاسم بن الحسن بن محمد بن عمرو بن حفص بن عمرو بن سعد القرظ، عن آبائه أن سعدًا اشتكى إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قلة ذات يده، فأمره النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالتجارة، فخرج إلى السوق فاشترى شيئًا من قرظ فباعه فربح فيه، فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فأمره بلزوم ذلك. ذكره الحافظ في"الإصابة" (2/ 29).

وقال ابن عبد البر في"الاستيعاب":"فلم يزل يؤذن في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أن مات، وتوارث عنه بنوه الأذان فيه إلى زمن مالك وبعده أيضًا".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দুজন মুআযযিন ছিলেন, বিলাল এবং ইবনু উম্মে মাকতুম।









আল-জামি` আল-কামিল (1843)


1843 - عن عثمان بن أبي العاص قال: يا رسول الله! اجعلني إمام قوميّ، قال:"أنت إمامُهم، واقتد بأضعفهم، واتخذ مؤذِّنًا لا يأخذ على أذانه أجرًا".

صحيح: رواه أبو داود (531)، والنسائي (672) كلاهما من طريق حمّاد بن سلمة، ثنا سعيد الجريريّ، عن أبي العلاء، عن مطرف بن عبد الله، عن عثمان بن أبي العاص فذكر الحديث.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن خزيمة (423)، والحاكم (1/ 199 - 200) وقال: صحيح على شرط مسلم.

قلت: وهو كما قال، وسعيد الجُريري هو: ابن إياس أبو مسعود البصري ثقة إِلَّا أنه اختلط قبل موته بثلاث سنين، وحماد بن سلمة ممن سمع منه قبل الاختلاط.

ورواه الترمذيّ (209) من وجه آخر قال: حَدَّثَنَا هناد، حَدَّثَنَا أبو زُبيد وهو: عَبْثَرُ بن القاسم، عن أشعث، عن الحسن، عن عثمان بن أبي العاص قال:"إن من آخِر ما عهد إليَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن اتخذ مؤذِّنًا لا يأخذ على أذانه أجرًا".

ورواه ابن ماجة (714) من طريق حفص بن غياث، عن أشعث به مثله.

قال الترمذيّ: حديث حسن، وفي نسخة: حسن صحيح، والذي نقل عنه الزيلعي وغيره:"حسن" فقط وهو الصواب فإن أشعث هو: ابن سوَّار الكندي النجار ضعَّفه النسائيّ والدارقطني وغيرهما، وقال بعض
أهل العلم: إنّما هو ابن عبد الملك الحمرانيّ، وهو ثقة فقيه، والصواب هو الأوّل.

فيه أيضًا الحسن البصري وهو مدلِّس وقد عنعن، وإن كان ثبت سماعه من عثمان بن أبي العاص، كما قال البزّار. انظر: نصب الراية (1/ 90).

وبناء على هذا الحديث، ذهب الحنفية إلى أن أخذ الأجرة على التأذين حرام، وكرهه الشافعية، وأكثر أهل العلم على أن الذي يحرم هو إذا كان الأذان مشروطًا بالأجرة، وإن أُعطي بغير مسألة فلا حرج في ذلك، مثل أن يكون الأمر معروفا بين المؤذنين والمؤسّسات الإسلامية.




উসমান ইবনে আবিল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে আমার গোত্রের ইমাম নিযুক্ত করুন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমিই তাদের ইমাম, আর তাদের মধ্যে দুর্বলতমের প্রতি খেয়াল রাখবে, এবং এমন একজন মুয়াজ্জিন রাখবে যে তার আযানের জন্য কোনো পারিশ্রমিক গ্রহণ করবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1844)


1844 - عن عبد الله بن مغفل المزني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"بين كل أذانين صلاة" قالها ثلاثًا: قال في الثالثة:"لمن شاء".

وفي رواية: قال في الرابعة"لمن شاء".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (634)، ومسلم في صلاة المسافرين (838) كلاهما من طريق عبد الله بن بريدة، عن عبد الله بن المغفل فذكر الحديث. والرّواية الثانية عند مسلم.

وقوله:"بين كل أذانين" أي: أذان وإقامة.

قال الخطّابي: أراد بالأذانين - الأذان والإقامة، حمل أحد الاسمين على الآخر، كقولهم: الأسودين: التمر والماء، وإنما الأسود أحدهما: وكقولهم: سيرةُ العمرين، يريدون أبا بكر وعمر، ويحتمل أن يكون الاسم لكل واحد منهما حقيقة، لأن الأذان في اللغة: الإعلام، فالأذان إعلام بحضور الوقت، والإقامة أذان بفعل الصّلاة. انتهى.

وقد جاء استثناء إِلَّا المغرب في بعض الروايات في غير الصحيحين وهي زيادة شاذة مخالفة لما رواه الحفاظ، ذكره الحافظ في الفتح (2/ 108) وعزاه للبزار وهي من رواية حبان بن عبيد الله، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه مثله، وقال: رواية حيان - وهو بفتح المهملة والنحتانية - شاذة؛ لأنه وإن كان صدوقًا عند البزّار وغيره، ولكنه خالف الحفاظ من أصحاب عبد الله بن بريدة في إسناد الحديث ومتنه. ثم قال: وقد نقل ابن الجوزي في الموضوعات عن الفلاس أنه كذَّب حيَّانًا المذكور.




আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফফাল আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “প্রত্যেক দুই আযানের (অর্থাৎ আযান ও ইকামতের) মধ্যবর্তী সময়ে সালাত রয়েছে।” তিনি এই কথাটি তিনবার বললেন। তৃতীয়বার তিনি বললেন: “যে চায় তার জন্য।”

অন্য এক বর্ণনায় আছে, তিনি চতুর্থবার বললেন: “যে চায় তার জন্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (1845)


1845 - عن أنس بن مالك قال: كان المؤذِّن إذا أذّن قام ناس من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يبتدرون السواري حتَّى يخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهم كذلك يُصَلُّون الركعتين قبل المغرب، ولم يكن بين الأذان والإقامة شيء.

وقال عثمان بن جبلة وأبو داود عن شعبة:"لم يكن بينهما إِلَّا قليل".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (625) من طريق شعبة قال: سمعتُ عمرو بن عامر الأنصاريّ، عن أنس بن مالك فذكر الحديث.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (837) قال: حَدَّثَنَا شيبان بن فرُّوخ، حَدَّثَنَا عبد الوارث، عن عبد العزيز (وهو ابن صُهيب) عن أنس بن مالك قال: كنا بالمدينة، فإذا أَذَّن المؤذِّن لصلاة المغرب ابتدروا السواريّ، فيركعون ركعتين ركعتين، حتَّى إن الرّجل الغريب ليدخل المسجد فيحسِبُ أن الصّلاة قد صُلِّيَتْ من كثرة من يصليها.

وفي رواية أخرى عنده: عن مختار بن فُلفل قال: سألت أنس بن مالك عن التطوع بعد العصر، فقال: كان عمر يضرب الأيدي على صلاة بعد العصر، وكنَّا نُصلِّي على عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ركعتين بعد غروب الشّمس قبل صلاة المغرب، فقلت له: أكان رسولُ الله صلاهما؟ قال: كان يرانا نصليها، فلم يأمرنا ولم يَنْهنا.

وقوله:"يبتدرون السواري" أي: يتسارعون ويستبقون إليها للاستتار بها عند الصّلاة.

وقوله: لم يكن بين الأذان والإقامة شيء" أي: وقت كثير، يريد أنهم كانوا يُسرعون في الركعتين لقلة ما بين الأذان والإقامة من الوقت.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন মুয়াজ্জিন আযান দিতেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে কিছু লোক দাঁড়িয়ে খুঁটিগুলোর দিকে দ্রুত ধাবিত হতেন, যতক্ষণ না নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (সালাতের জন্য) বের হতেন, তারা সেভাবেই মাগরিবের পূর্বে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। আযান ও ইকামতের মাঝে কিছু সময় ছাড়া (দীর্ঘ) কোনো ব্যবধান ছিল না।

উসমান ইবনু জাবালাহ এবং আবু দাউদ শু‘বাহ (রহ.) হতে বর্ণনা করে বলেন: আযান ও ইকামতের মাঝে খুব সামান্যই সময় ছিল।

আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মদীনায় ছিলাম। যখন মুয়াজ্জিন মাগরিবের সালাতের জন্য আযান দিতেন, তখন লোকেরা খুঁটিগুলোর দিকে দ্রুত ধাবিত হয়ে দুই দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। এমনকি কোনো অপরিচিত লোক মাসজিদে প্রবেশ করলে সে মনে করতো যে, সালাত (ফরয) আদায় হয়ে গেছে, এত বেশি লোক সালাত আদায় করতো।

মুক্তার ইবনু ফুলফুল (রহ.) হতে অপর এক বর্ণনায় বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আসরের পরের নফল সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসরের পর সালাত আদায়ের জন্য লোকেদের হাতে আঘাত করতেন (বা কঠোরতা করতেন)। তবে আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যাস্তের পরে মাগরিবের ফরযের পূর্বে দুই রাকাত সালাত আদায় করতাম। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি এই সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: তিনি আমাদেরকে তা আদায় করতে দেখতেন, কিন্তু তিনি আমাদেরকে এর আদেশও করেননি এবং নিষেধও করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (1846)


1846 - عن أبي سعيد الخدريّ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا سمعتم النداء فقولوا مِثل ما يقول المؤذن".

متفق عليه: رواه مالك في الصّلاة (2) عن ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد الليثيّ، عن أبي سعيد، ورواه البخاريّ في الأذان (611)، ومسلم في الصّلاة (383) كلاهما من طريق مالك به.

وما رواه ابن ماجة (718) من طريق عباد بن إسحق، عن ابن شهاب، عن سعيد، عن أبي هريرة مثله فهو معلول، والمحفوظ ما رواه مالك من حديث أبي سعيد، وقد أشار إلى هذا الترمذيّ (208) عقب حديث أبي سعيد قائلًا: وروى عبد الرحمن بن إسحاق، عن الزهري هذا الحديث عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: ورواية مالك أصح. انتهى.

وقال النسائيّ في عمل اليوم والليلة (33) بعد أن روي حديث عبد الرحمن بن إسحاق عن الزهري: خالفه مالك، ثم قال: الصواب حديث مالك، وحديث عبد الرحمن بن إسحاق خطأ، وعبد الرحمن هذا يقال له: عبَّاد بن إسحاق وهو لا بأس به، وعبد الرحمن بن إسحاق يرُوي عنه جماعة من أهل الكوفة وهو ضعيف الحديث. انتهى.

وأعلَّه أيضًا البوصيري في زوائد ابن ماجة فقال: هذا إسناد معلول والمحفوظ عن الزهري عن عطاء بن يزيد، عن أبي سعيد الخدريّ كما أخرجه الأئمة الستة.

وكذلك من الشاذ أيضًا ما رواه ابن أبي شيبة (1/ 227) من طريق زيد بن حباب، عن مالك به من فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم أي أنَّه كان يقول مثل ما يقول المؤذِّن. فخالف زيدُ بن حباب الحفاظَ من أصحاب مالك؛ فإنَّهم لم يذكروا من فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم، وزيد ممن وصف بأنه كان يهم




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন তোমরা আযান শুনতে পাও, তখন মুআযযিন যা বলে, তোমরাও তাই বলো।”









আল-জামি` আল-কামিল (1847)


1847 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أنه سمع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا سمعتم المؤذن فقولوا مثل ما يقول: ثم صلوا عليَّ، فإنه من صلى عليّ صلاة صلى الله عليه بها عشرَا، ثم سَلُوا الله لي الوسيلةَ، فإنها منزلة في الجنّة لا تنبغي إِلَّا لعبد من عباد الله، وأرجو أن أكون أنا هو، فمن سأل لي الوسيلةَ حلَّتْ له الشفاعة".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (384) من طريق كعب بن علقمة، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যখন তোমরা মুআযযিনের আযান শুনবে, তখন সে যা বলে, তোমরাও তাই বলো। এরপর আমার উপর দরূদ পাঠ করো। কেননা যে আমার উপর একবার দরূদ পড়ে, আল্লাহ তার উপর এর বিনিময়ে দশটি রহমত নাযিল করেন। এরপর আল্লাহর কাছে আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করো। কেননা এটি জান্নাতের এমন একটি স্থান যা আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে মাত্র একজন ছাড়া আর কারো জন্য শোভনীয় নয়। আর আমি আশা করি যে, আমিই হবো সেই বান্দা। সুতরাং যে ব্যক্তি আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করবে, তার জন্য আমার শাফা‘আত (সুপারিশ) আবশ্যক হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1848)


1848 - عن عمر بن الخطّاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قال المؤذن: الله أكبر الله أكبر، فقال أحدكم: الله أكبر الله أكبر، ثم قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، ثم قال: أشهد أن محمدًا رسول الله، قال: أشهد أن محمدًا رسول الله، ثم قال: حيَّ على الصّلاة، قال: لا حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله، ثم قال: حيَّ على الفلاح، قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، ثم قال: الله أكبر الله أكبر، قال: الله أكبر الله أكبر، ثم قال: لا إله إِلَّا الله. قال: لا إله إِلَّا الله من قَلْبه دخل الجنّة".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (385) حَدَّثَنَا إسحاق بن منصور، أخبرنا أبو جعفر محمد بن جَهْضَم الثقفيّ، حَدَّثَنَا إسماعيل بن جعفر، عن عُمارة بن غَزية، عن خُبيب بن عبد الرحمن بن إساف، عن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطّاب، عن أبيه، عن جده فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মুয়াজ্জিন 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে, তখন তোমাদের কেউ যদি 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'আশহাদু আল লা-ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে, তখন সেও 'আশহাদু আল লা-ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ' বলে, তখন সেও 'আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'হাইয়্যা আলাস-সালাহ' বলে, তখন সে 'লা হাওলা ওয়ালা কুওওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'হাইয়্যা আলাল-ফালাহ' বলে, তখন সে 'লা হাওলা ওয়ালা কুওওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে, তখন সেও 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে; এরপর মুয়াজ্জিন যখন 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে, তখন যে ব্যক্তি অন্তর থেকে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1849)


1849 - عن سعد بن أبي وقَّاص عن رسول الله لا أنه قال:"من قال حين يسمع المؤذنَ: أشهد أن لا إله إِلَّا الله وحده لا شريك له، وأن محمدًا عبدُه ورسولُه، رضيتُ بالله ربًا، وبمحمدٍ رسولًا، وبالإسلام دينًا غفر له ذنبه".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (386) من طريق اللّيث، عن الحُكيم بن عبد الله، عن عامر بن سعد بن أبي وقَّاص، عن سعد بن أبي وقَّاص، فذكره.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মুয়াযযিনের আযান শুনে বলে: 'আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই, তিনি এক, তাঁর কোনো অংশীদার নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল। আমি আল্লাহকে রব হিসাবে, মুহাম্মাদকে রাসূল হিসাবে এবং ইসলামকে দ্বীন হিসাবে সন্তুষ্ট চিত্তে গ্রহণ করে নিয়েছি,' তার গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1850)


1850 - عن علقمة بن وقَّاص قال: كُنَّا عند معاوية، فقال المؤذن: الله أكبر، الله أكبر، فقال معاوية: الله أكبر الله أكبر، فقال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، فقال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، فقال: أشهد أن محمدًا رسول الله، فقال: أشهد أن محمدًا رسول الله، فقال: حيَّ على الصّلاة، فقال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، فقال: حيَّ على الفلاح، فقال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، فقال: الله أكبر الله أكبر، فقال: الله أكبر الله أكبر، فقال: لا إله إِلَّا الله، قال: لا إله إِلَّا الله. قال: هكذا كان رسول
الله صلى الله عليه وسلم يقول - أو نبيُّكم - إذا أذَّن المُؤذن.

حسن: رواه الإمام أحمد (16896) قال: حَدَّثَنَا يحيي (ابن سعيد) عن محمد بن عمرو قال: حَدَّثَنِي أبيّ، عن جديّ، قال: فذكر الحديث.

ومحمد بن عمرو هو: ابن علقمة الليثي صدوق، وأبوه عمرو بن علقمة بن وقَّاص الليثي المدني"مقبول" ذكره ابن حبان في الثّقات (5/ 174) هكذا رواه الإمام أحمد بالتفصيل.

ورواه النسائيّ (677) عن مجاهد بن موسى وإبراهيم بن الحسن المقْسَمِيّ قالا: حَدَّثَنَا حجَّاج، قال ابن جريج: أخبرني عمرو بن يحيى، أن عيسى بن عمر أخبره، عن عبد الله بن علقمة بن وقَّاص، عن علقمة بن وقَّاص قال: إنِّي عند معاوية إذ أذَّن مؤذِّنه فقال معاوية كما قال المؤذِّن حتَّى إذا قال: حيَّ على الصّلاة: قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، فلمّا قال: حيَّ على الفلاح، قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، وقال بعد ذلك مثل ما قال المؤذِّن ثم قال: سمعتُ رسول الله يقول مثل ذلك. انتهى.

ورواه أبو داود الطيالسي (1052) قال: حَدَّثَنَا هشام (الدستوائي)، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن إبراهيم التيميّ، عن عيسى بن طلحة، قال: كُنَّا عند معاوية فنادي المنادي بالصلاة، فقال: مِثل ما قال، ثم قال: هكذا سمعت نبيُّكم صلى الله عليه وسلم.

وأخرجه البخاريّ في الأذان (612) عن مُعاذ بن فَضالة، قال: حَدَّثَنَا هشام به وفيه: فقال: مثله إلى قوله:"وأشهد أن محمدًا رسول الله" ولم يذكر فيه الحوقلة، ثم رواه عن إسحاق بن راهويه قال: ثنا وهب بن جرير قال: حَدَّثَنَا هشام، عن يحيي نحوه - يعني لم يذكر فيه الحوقلة.

ثم قال البخاريّ: قال يحيي: وحدثني بعض إخواننا أنه قال: لما قال حيَّ على الصّلاة، قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله، وقال: هكذا سمعت نبيَّكم صلى الله عليه وسلم يقول.

فقول البخاريّ: قال يحيي (هو ابن أبي كثير) الظاهر أنه عطف على إسناد إسحاق بن راهويه السابق.

وهذا إسناد صحيح غير أن فيه رجلًا مبهمًا في قول يحيى بن أبي كثير: وحدثني بعض إخواننا، هكذا رواه أيضًا الإمام أحمد (16828) عن إسماعيل بن إبراهيم المعروف بابن عُلية) قال: أخبرنا هشام الدستوائي بإسناده إلى أن قال يحيى: فحدثنا رجل: أنه لما قال: حيَّ على الصّلاة، قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله.

ولكن رواه ابن خزيمة (414) من طريق ابن علية به، وجعل:"ولا حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله" موصولًا، ولم يذكر قول يحيى بن أبي كثير: حَدَّثَنِي رجل. فالظاهر أَنَّ فيه سقطًا من الناسخ.

وقد تحير الحافظ ابن حجر العسقلاني في تعيين هذا الرّجل الساقط في الإسناد فلم يجزم بشيء.

فإذا جعلنا هذا الرّجل المبهم يقوي ما ذكره عمرو بن علقمة الليثي فيكون ذكر الحوقلة في حديث معاوية حسنًا لغيره مع الاحتمال أن يكون هذا المبهم هو عمرو بن علقمة نفسه، كما قال الحافظ، أو أخوه عبد الله بن علقمة، ومثله لا بأس به في الاستشهاد.




মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলকামা ইবনে ওয়াক্কাস বলেন: আমরা মু'আবিয়ার নিকট ছিলাম। মুআযযিন যখন বললো: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার', তখন মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার।' মুআযযিন যখন বললো: 'আশহাদু আল-লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ', তখন তিনি বললেন: 'আশহাদু আল-লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ।' মুআযযিন যখন বললো: 'আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ', তখন তিনি বললেন: 'আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ।' মুআযযিন যখন বললো: 'হাইয়া আলাস-সালাহ', তখন তিনি বললেন: 'লা হাওলা ওয়ালা কুওওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ।' মুআযযিন যখন বললো: 'হাইয়া আলাল-ফালাহ', তখন তিনি বললেন: 'লা হাওলা ওয়ালা কুওওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ।' মুআযযিন যখন বললো: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার', তখন তিনি বললেন: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার।' মুআযযিন যখন বললো: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ', তখন তিনি বললেন: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ।' এরপর তিনি (মু'আবিয়া) বললেন: যখন মুআযযিন আযান দিতো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)—অথবা বললেন তোমাদের নবী—এভাবেই বলতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1851)


1851 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا سمع المؤذِّن يتشهد قال:"وأنا وأنا".

حسن: رواه أبو داود (526) قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن مهديّ، ثنا عليّ بن مسهر، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث.

وإسناده حسن، ورجاله ثقات غير إبراهيم بن مهدي المصيصي البغدادي فإنه"مقبول" كما قال الحافظ، والحق أنه صدوق، فإنه ممن وثَّقه أبو حاتم مع ابن حبان، ثم رواه ابن حبان (1683) والحاكم (1/ 204) من وجه آخر من طريق هشام بن عروة به مثله، وفيه متابعة قوية لإبراهيم بن مهدي.

ورواه الإمام أحمد (24933) عن عفّان قال: حَدَّثَنَا عبد الواحد بن زياد، قال: حَدَّثَنِي عمرو بن ميمون بن مهران، قال: أخبرني أبي قال: قالت عائشة: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا سمع المنادي قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله وأشهد أن محمدًا رسولُ الله".

ورجاله ثقات غير أن ميمون بن مهران قد اختلف في سماعه من عائشة والصواب أنه سمع منها لأنه ولد سنة سبع عشرة، وتوفي سنة ست عشرة ومائة ولم يذكر العلائي في جامع التحصيل أنه لم يدرك عائشة، ونص في التهذيب أنه رُوي عن أبي هريرة وعائشة وابن عباس وابن عمر وابن الزُّبير وصفية بنت شيبة وأم الدّرداء من الصّحابة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মুয়ায্যিনকে শাহাদাত (তাশাহহুদ) পাঠ করতে শুনতেন, তখন তিনি বলতেন: "আর আমিও (সাক্ষ্য দিচ্ছি), আর আমিও (সাক্ষ্য দিচ্ছি)।"









আল-জামি` আল-কামিল (1852)


1852 - عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف قال: سمعتُ معاوية بن أبي سفيان وهو جالس على المنبر أذَّن المؤذِّن قال: الله أكبر الله أكبر، قال معاوية: الله أكبر الله أكبر، قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله، فقال معاوية: وأنا، فقال: أشهد أن محمدًا رسول الله، فقال معاوية: وأنا، فلمّا قضى التأذين قال:"يا أيها الناس، إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم على هذا المجلس - حين أذَّن المؤذِّن - يقول ما سمعتم مني من مقالتي".

صحيح: رواه البخاريّ في الجمعة (914) قال: حَدَّثَنَا ابن مقاتل: قال: أخبرنا عبد الله (وهو: ابن المبارك) قال: أخبرنا أبو بكر بن عثمان بن سهل بن حُنيف، عن أبي أمامة بن سهل بن حُنَيف فذكر الحديث.

وبوّب عليه البخاريّ بقوله: يُجيب الإمام على المنبر إذا سمع النداء. قال الحافظ: وفي هذا الحديث من الفوائد: تعلم العلم وتعليمه من الامام وهو على المنبر، وأن الخطيب يجيب المؤذِّن وهو على المنبر، وأن قول المجيب"وأنا كذلك" ونحوه يكفي في إجابة المؤذِّن.




মুয়াবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ উমামাহ ইবনু সাহল ইবনু হুনাইফ বলেন, আমি মুয়াবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ানকে মিম্বরে বসা অবস্থায় শুনতে পেলাম, যখন মুআযযিন আযান দিচ্ছিলেন। মুআযযিন যখন বললেন: আল্লাহু আকবার আল্লাহু আকবার, তখন মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহু আকবার আল্লাহু আকবার। মুআযযিন যখন বললেন: আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, তখন মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিও। মুআযযিন যখন বললেন: আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ, তখন মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিও। অতঃপর যখন আযান সমাপ্ত হলো, তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আমি এই মিম্বরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুআযযিন যখন আযান দিচ্ছিলেন, তখন আমি আমার পক্ষ থেকে যে কথাগুলো বললাম, হুবহু সেগুলোই বলতে শুনেছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (1853)


1853 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الدعاء لا يُرد بين الأذان والإقامة فادعوا".

حسن: رواه أبو داود (521) والتِّرمذيّ (212) والنسائي في"عمل اليوم والليلة" (68 - 70)
كلّهم من طرق عن زيد العَمّي، عن أبي إياس، عن أنس بن مالك فذكر الحديث.

قال الترمذيّ: حسن وفي نسخة: حسن صحيح. والأوّل قريب من الصواب؛ لأن في إسناده زيد العَمِّي زيد بن الحواريّ، أبو الحواري البصريّ، اختلف في سبب نسبته هذه، فقيل: هو منسوب إلى"بني العم" وهو بطن من بني تميم، وقال عليّ بن مصعب: سمي العَمِّي لأنه كان كلما سئل عن شيء قال: حتَّى أسأل عَمِّي، وهو ضعيف فقد ضعَّفه أبو حاتم والنسائي وابن سعد وابن المدينيّ، وقال ابن حبان: يروي عن أنس أحاديث موضوعة لا أصول لها.

فمثله لا يحسن حديثه فضلًا من تصحيحه.

ولكن للحديث طرق أخرى ولذا أدخلته في الجامع، ومن هذه الطرق ما رواه الإمام أحمد في مسنده (12584) قال: حَدَّثَنَا أسود وحسين بن محمد قالا: حَدَّثَنَا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن بُريد بن أبي مريم، عن أنس فذكر الحديث ورواه أيضًا أبو يعلى (3679) من طريق إسرائيل به، وأشار إليه الترمذيّ بقوله:"وقد رواه أبو إسحاق الهمدانيّ، عن بُريد بن أبي مريم، عن أنس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مثل هذا".

ورجاله ثقات غير أبي إسحاق وهو عمرو بن عبد الله السبيعي المشهور بكنيته وهو تابعي ثقة إِلَّا أنه كان يدلس وهو من المرتبة الثالثة عند الحافظ ابن حجر الذين لم يحتج الأئمة من أحاديثهم إِلَّا بما صرحوا فيه بالسماع، ولكن تابعه ابنه يونس فرواه الإمام أحمد (13357) عن إسماعيل بن عمر قال: حَدَّثَنَا يونس - وهو بن أبي إسحاق - قال: حَدَّثَنَا بُريد بن أبي مريم عن أنس فذكر الحديث.

ويونس بن أبي إسحاق صدوق ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن خزيمة في صحيحه (426، 427) وقال: يريد الدعوة المجابة.

وأسود هو: ابن عامر الملقب بشاذان، ثقة من رجال الجماعة وحسين بن محمد هو: ابن بهرام المروَّذي - بتشديد الواو وبذال معجمة - ثقة من رجال الجماعة.

هذه من أجود الأسانيد التي رُوي عنها هذا الدعاء. لا أعلم حديثًا صحيحًا غير حديث أنس في هذا الباب.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আযান ও ইকামতের মধ্যবর্তী সময়ে করা দোয়া ফিরিয়ে দেওয়া হয় না (অর্থাৎ কবুল হয়), সুতরাং তোমরা দোয়া করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (1854)


1854 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من قال حين يسمعُ النداءَ: اللَّهُمَّ ربَّ هذه الدعوة التامة والصلاة القائمة، آتِ محمدًا الوسيلة والفضيلة، وابعثه مقامًا محمودًا الذي وعدته، حلَّتْ له شفاعتي يوم القيامة".

صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (614) وفي التفسير (4719) في قوله تعالى: {عَسَى أَنْ يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَحْمُودًا} [الإسراء: 79] عن عليّ بن عَيَّاش قال: حَدَّثَنَا شعيب بن أبي حمزة، عن
محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আযান শুনে এই দু'আটি পড়ে: 'হে আল্লাহ! এই পরিপূর্ণ আহ্বান এবং প্রতিষ্ঠিত সালাতের রব্ব! আপনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আল-ওয়াসীলা (জান্নাতের এক বিশেষ স্থান) ও আল-ফযীলা (শ্রেষ্ঠত্ব) দান করুন এবং তাঁকে সেই 'মাকামে মাহমুদ' (প্রশংসিত স্থান)-এ প্রতিষ্ঠিত করুন, যার প্রতিশ্রুতি আপনি তাঁকে দিয়েছেন।' — কিয়ামতের দিন তার জন্য আমার শাফাআত (সুপারিশ) ওয়াজিব হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1855)


1855 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم" … ثم سلوا الله لي الوسيلة فإنها منزلة في الجنّة لا تنبغي لعبد من عباد الله، وأرجو أن أكون أنا هو، فمن سأل لي الوسيلة حلَّتْ له شفاعتي".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (384) من طريق كعب بن علقمة، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "…এরপর তোমরা আল্লাহর কাছে আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করো। কারণ এটি জান্নাতের এমন একটি স্থান যা আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে একজনের জন্য ছাড়া আর কারো জন্য শোভনীয় নয়। আর আমি আশা করি যে আমিই হব সেই ব্যক্তি। সুতরাং, যে ব্যক্তি আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করবে, তার জন্য আমার সুপারিশ (শাফা‘আত) আবশ্যক হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1856)


1856 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"سلوا الله لي الوسيلة، فإنه لا يسألها عبد في الدُّنيا إِلَّا كنت له شهيدًا أو شفيعًا يوم القيامة".

حسن: أخرجه الطبرانيّ في الأوسط - مجمع البحرين (639) قال: حَدَّثَنَا أحمد - يعني ابن عليّ الأبار، ثنا الوليد بن عبد الملك الحرانيّ، ثنا موسى بن أعين، عن ابن أبي ذئب، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن ابن عباس فذكره.

قال الطبرانيّ: لم يروه عن ابن أبي ذئب إِلَّا موسى.

وقال الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (1/ 333) فيه الوليد بن عبد الملك الحرانيّ، وقد ذكره ابن حبان في الثّقات (9/ 227) وقال:"مستقيم الحديث إذا روى عن الثّقات"، قال الهيثميّ:"وهذا من روايته عن موسى بن أعين وهو ثقة" انتهى.

قلت: موسى بن أعين الراوي عنه من رجال الشّيخين، وثَّقه أبو زرعة وأبو حاتم والدارقطني وغيرهم، والاسناد حسن لأجل الوليد بن عبد الملك نفسه فإنه لم يبلغ درجة الثقة.

قال عبد الرحمن بن أبي حاتم: سألت أبي عنه فقال:"صدوق"."الجرح والتعديل" (9/ 10).

ولحديث ابن عباس هذا أسانيد أخرى، من أجودها ما رواه عبد بن حميد في"المنتخب" (ص 585) (687) عن عبيد الله بن موسى، عن موسى بن عبيد، عن محمد بن عمرو بن عطاء عنه مثله. وموسى بن عبيدة - وهو ابن نشيط الربذيّ، ضعيف.

ورواه أيضًا ابن أبي شيبة، وأحمد بن منيع من طريق موسى بن عبيدة"المطالب العالية" (1/ 136) رقم (255).




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর কাছে আমার জন্য 'আল-ওয়াসিলাহ' প্রার্থনা করো। কারণ যে বান্দাই দুনিয়াতে আমার জন্য এটি (আল-ওয়াসিলাহ) প্রার্থনা করবে, কিয়ামতের দিন আমি তার জন্য সাক্ষী অথবা সুপারিশকারী হব।"









আল-জামি` আল-কামিল (1857)


1857 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أنَّ رجلًا قال: يا رسول الله! إنَّ المؤذنين يَفْضُلوننا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قل كما يقولون، فإذا انتهيت فسلْ تُعطه".

حسن: رواه أبو داود (524) واللّفظ له، وأحمد (6601) والبيهقي (1/ 410) كلّهم من طريق حُييّ، عن أبي عبد الرحمن - يعني الحُبلِّي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وحُييّ هو: ابن عبد الله بن شريح المعافري المصريّ، مختلف فيه؛ فقال البخاريّ: فيه نظر.
وقال أحمد: أحاديثه مناكير. وقال النسائيُّ ليس بالقويِّ.

ولكن قال ابن معين: ليس به بأس. وقال ابن عديّ: أرجو أنه لا بأس به إذا روى عنه ثقة.

قلت: وهنا روى عنه ابن وهب وهو ثقة، وحسَّنه أيضًا الحافظ في"نتائج الأفكار" (1/ 378).

وأمّا ما رواه مالك في الصّلاة (7) عن أبي حازم بن دينار، عن سهل بن سعد الساعدي أنَّه قال:"ساعتان يفتح لهما أبواب السماء، وقلَّ داعٍ تُردُّ عليه دعوته: حين يحضرُ النداء للصلاة، والصفُّ في سبيل الله". فهو موقوف.

قال ابن عبد البرِّ في التمهيد (21/ 138):"هكذا هو موقوف على سهل بن سعد في الموطأ عند جماعة الرواة، ومثله لا يقال من جهة الرأي. وقد رواه أيوب بن سويد ومحمد بن خالد وإسماعيل بن عمر عن مالك مرفوعًا". ثمَّ أسند عن هؤلاء.

وخالف موسى بن يعقوب مالكًا فرواه عن أبي حازم، عن سهل بن سعد مرفوعًا. رواه أبو داود (2540) وابن خزيمة (419) والحاكم (1/ 198) والبيهقي (1/ 410) كلّهم من هذا الوجه. ولفظه:"ثنتان لا تُردَّان، أو قلَّما تُردان: الدعاء عند النداء، وعند البأس حين يلحم بعضهم بعضًا".

قال الحاكم:"هذا حديث ينفرد به موسى بن يعقوب، وقد رُوي عن مالك، عن أبي حازم، وموسى بن يعقوب ممن يوجد عنه التفرد".

وقال البيهقيّ: رفعه الزمعي - موسى بن يعقوب، ووقَّفه مالك بن أنس الإمام". انتهى.

قلت: الظاهر أنَّ موسى بن يعقوب أخطأ في رفع هذا الحديث؛ لأنَّه وُصِف بسوء الحفظ.

وقال ابن المديني: ضعيف الحديث منكر الحديث. وضعَّفه النسائيُّ وغيره.

وأشار الحافظ إلى أنَّه مختلف فيه ولكنَّه قال:"حديث حسن صحيح"."نتائج الأفكار" (1/ 379 - 380) فلعلَّه لأجل الشواهد.

فالخُلاصة: أنَّه يُحسَّن حديثه إذا لم يُخالف، وقد خالف هنا إمامًا من الأئمة وهو مالك بن أنس.

وورد في سؤال الوسيلة عند سماع الأذان من حديث أبي الدّرداء وابن مسعود مرفوعًا وفي إسنادهما ضعف، قاله ابن رجب في"فتحه" (3/ 464).

قلت: وفيه أيضًا عن أبي سعيد الخدريّ، وأنس بن مالك، وأبي هريرة، أخرج بعضها الطبرانيّ في"كتاب الدعاء" وهي كلُّها ضعيفة.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! নিশ্চয়ই মুয়াজ্জিনগণ আমাদের চেয়ে শ্রেষ্ঠত্ব লাভ করছে।’ তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “তারা যা বলে, তোমরাও তা-ই বলো। যখন তোমরা শেষ করবে, তখন (আল্লাহর কাছে) প্রার্থনা করো, তোমাদেরকে তা দেওয়া হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (1858)


1858 - عن عمر بن الخطّاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قال المؤذِّن: الله أكبر، الله أكبر. قال أحدكم: الله أكبر، الله أكبر. إلى أن قال: حيَّ على الصّلاة. قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله. ثم قال: حيَّ على الفلاح. قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا
بالله. ثمّ قال: الله أكبر، الله أكبر. قال: الله أكبر الله أكبر. ثمّ قال: لا إله إِلَّا الله، قال: لا إله إِلَّا الله من قلبه دخل الجنّة".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (385) من طريق حفص بن عاصم بن عمر بن الخطّاب، عن أبيه، عن جدِّه عمر بن الخطّاب فذكر الحديث بطوله.

وقوله:"الحول" معناه: الحركة. أي لا حركة لي ولا استطاعة إِلَّا بمشيئة الله.

ويُقال في التعبير عن قولهم: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله" الحوقلة. الحاء والواو من الحول. والقاف من القوة. واللام من اسم الله تعالى. هو مثل البسملة في بسم الله. والحمدلة في الحمد لله.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মুয়াজ্জিন 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে, তখন তোমাদের কেউ 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলবে। ... যতক্ষণ না সে 'হাইয়্যা আলাস সালাহ' বলে, তখন সে বলবে: 'লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ'। অতঃপর যখন সে 'হাইয়্যা আলাল ফালাহ' বলে, তখন সে বলবে: 'লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ'। এরপর যখন সে 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার' বলে, তখন সে বলবে: 'আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার'। এরপর যখন সে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে, তখন যে ব্যক্তি অন্তর থেকে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1859)


1859 - عن عيسى بن طلحة قال: دخلنا على معاوية، فنادي المنادي بالصلاة فقال: الله أكبر الله أكبر. فقال معاوية: الله أكبر الله أكبر. ثمّ قال: أشهد أن لا إله إِلَّا الله. فقال معاوية: وأنا أشهد. ثمّ قال: أشهد أن محمدًا رسول الله. فقال معاوية: وأنا أشهد. ثمّ قال: حيَّ على الصّلاة. فقال معاوية: لا حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله. ثمّ قال: حيَّ على الفلاح. فقال معاوية: لا حول ولا قُوَّة إِلَّا بالله. ثمّ قال: هكذا سمعت نبيكم صلى الله عليه وسلم يقول.

حسن: رواه ابن خزيمة (414) عن يعقوب بن إبراهيم الدورقيّ، ثنا ابن علية (وهو إسماعيل بن إبراهيم) عن هشام الدستوائيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن إبراهيم، عن عيسى بن طلحة فذكر مثله. هكذا رواه ابن خزيمة ذكر الحوقلة متصلًا.

وأورده البخاريّ في الأذان (613) قائلًا: وقال يحبي: وحدثني بعض إخواننا أنَّه قال: لما قال: حيَّ على الصّلاة قال: لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله. وقال: هكذا سمعنا نبيَّكم صلى الله عليه وسلم يقول.

فأبهم البخاريّ الذين حدث عنهم يحيى بن أبي كثير. فلم يثبت عنده من هم الذين حدثوا به ولنا ذكر"الحوقلة" مقطوعًا .. ولم يصل شراح البخاريّ إلى تعيين المبهمين، إنّما قال كلٌّ بما أدّى إليه اجتهاده.

وهذا الحديث بتمامه أخرجه الإمام أحمد (16828) عن إسماعيل بن إبراهيم (وهو ابن علية) وأبي عامر العقَدي قالا: حَدَّثَنَا هشام به مثله، إِلَّا"الحوقلة" فإنَّه ذكره أيضًا مقطوعًا.

ولحديث معاوية طريق آخر رواه البخاريّ (904) كما سبق في باب إجابة الامام على المنبر إذا سمع النداء، وليس فيه ذكر الحوقلة.

فلا أدري كيف ساق ابن خزيمة متن الحديث بتمامه مع ذكر الحوقلة بهذا الإسناد، ولكن يقوي عمله هذا بما رواه الإمام أحمد (16381) والنسائي في المجتبي (677) وفي"عمل اليوم والليلة" (353) والبغوي في شرحه (422) كلُّهم من طريق ابن جريج، قال: حَدَّثَنِي عمرو بن يحيى المازنيّ،
أنَّ عيسى بن عمر أخبره، عن عبد الله بن علقمة بن وقَّاص، أنَّ علقمة بن وقَّاص قال: إنِّي لعند معاوية إذ أذَّن مؤذِّنه فقال: كما قال المؤذِّن حتَّى إذا قال: حيَّ على الصّلاة. قال معاوية:"لا حول ولا قُوة إِلَّا بالله" وقال بعد ذلك ما قال المؤذن ثمّ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ذلك.

وفيه عيسى بن عمر ويقال: ابن عُمير حجازي. قال الدَّارقطنيّ: مدني معروف يُعتبر به، ولكن قال الذّهبيُّ: لا يعرف. واعتمده الحافظ في"التقريب، فقال: مقبول". وشيخه عبد الله بن علقمة بن وقَّاص الليثي أيضًا"مقبول" أي حيث يُتابع، وقد توبع؛ تابعه أخوه عمرو بن علقمة بن وقَّاص. ومن طريقه رواه الإمام أحمد (16896) وابن خزيمة (416) وعنه ابن حبّان (1687) كلّهم من طريق يحيى بن سعيد القطان، قال: حَدَّثَنَا محمد بن عمرو قال: حَدَّثَنِي أبي عن جدِّي. أي عن عمرو بن علقمة، عن علقمة بن وقَّاص فذكر الحديث بتمامه. وعمرو بن علقمة بن وقَّاص أيضًا"مقبول" يعني عند المتابعة.

وهذه المتابعات مع الشاهد من حديث عمر بن الخطّاب يقوي حديث معاوية بن أبي سفيان، وقد أشار إليه الحافظ أيضًا.

ولحديث معاوية أسانيد أُخرى غير أنَّ ما ذكرته هي أصحُّها. انظر مزيدًا من التخريج في باب ما يقول إذا سمع النداء.




মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ঈসা ইবনু তালহা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। এমন সময় সালাতের মুয়াজ্জিন আযান দিল। মুয়াজ্জিন বলল: আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহু আকবার, আল্লাহু আকবার। এরপর মুয়াজ্জিন বলল: আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিও সাক্ষ্য দিচ্ছি। এরপর মুয়াজ্জিন বলল: আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিও সাক্ষ্য দিচ্ছি। এরপর মুয়াজ্জিন বলল: হাইয়া আলাস সালাহ। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ। এরপর মুয়াজ্জিন বলল: হাইয়া আলাল ফালাহ। মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: লা হাওলা ওয়ালা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহ। এরপর তিনি (মু'আবিয়াহ) বললেন: আমি তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এভাবে বলতে শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1860)


1860 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أنَّه سمع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا سمعتم المؤذن فقولوا مثل ما يقول، ثمّ صلّوا عليَّ؛ فإنَّه من صلَّى عليّ صلاةً صلى الله عليه بها عشرًا، ثمّ سلوا الله لي الوسيلة، فإنَّها منزلة في الجنَّة لا تنبغي إِلَّا لعبد من عباد الله. وأرجو أن أكون أنا هو. فمن سأل لي الوسيلة حلَّت له الشفاعةُ".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (384) عن محمد بن سلمة المراديّ، حَدَّثَنَا عبد الله بن وهب، عن حيوة وسعيد بن أبي أيوب وغيرهما، عن كعب بن علقمة، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.



أمامة، أو عن بعض أصحاب النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فذكر مثله.

سكت عليه أبو داود، وقال المنذري في مختصر أبي داود:"في إسناده رجل مجهول. وشهر بن حوشب تكلَّم فيه غير واحد، ووثقه الإمام أحمد ويحيى" اهـ.

قلت: وفيه علة ثالثة، وهي محمد بن ثابت العبديّ، مختلف فيه فتكلَّم فيه ابن معين وأبو حاتم والبخاري وابن عدي. ووثقه العجلي وهو لم يتابع على توثيقه، ولذا قال النوويّ في"المجموع" (3/ 122):"هو حديث ضعيف، لأنَّ الرّجل مجهول، ومحمد بن ثابت ضعيف بالاتفاق، وشهر مختلف في عدالته".

وضعف هذا الحديث الحافظ ابن حجر أيضًا في"التلخيص"، والبيهقي أشار إلى ضعَّفه بعد أن رواه من طريق أبي داود قائلًا: وهذا إن صحَّ، شاهد لما استحسنه الشافعي رحمه الله من قولهم: اللَّهُمَّ أقمها وأدمها، واجعلنا من صالح أهلها عملًا""السنن الكبرى" (1/ 411).




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যখন তোমরা মুয়াজ্জিনকে আযান দিতে শোনো, তখন সে যা বলে তোমরাও তাই বলো। এরপর আমার উপর সালাত (দরূদ) পড়ো। কারণ, যে আমার উপর একবার সালাত (দরূদ) পাঠ করে, আল্লাহ তাকে এর বিনিময়ে দশবার সালাত (রহমত) দান করেন। এরপর আল্লাহর কাছে আমার জন্য 'আল-ওয়াসীলা' কামনা করো। নিশ্চয়ই এটি জান্নাতের এমন একটি স্থান, যা আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে শুধু একজনকে দেওয়া হবে। আমি আশা করি, আমিই হব সেই ব্যক্তি। সুতরাং যে আমার জন্য আল-ওয়াসীলা প্রার্থনা করবে, তার জন্য আমার শাফা‘আত (সুপারিশ) ওয়াজিব হয়ে যাবে।"