আল-জামি` আল-কামিল
1861 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الإمام ضامنٌ والمؤذن مُؤْتَمن، اللَّهُمَّ أَرْشِد الأئمة واغفر للمؤذنين".
صحيح: رواه الترمذيّ (207) قال: حَدَّثَنَا هناد، حَدَّثَنَا أبو الأحوص وأبو معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وهذا إسناد رجاله ثقات، وقد اختلف على الأعمش. فرواه سفيان الثوري عند الإمام أحمد (9942) وزائدة عند أبي داود الطيالسي (2526) وشريك عند الإمام أحمد (9478/ 1) كل هؤلاء وغيرهم مثل حديث أبي الأحوص وأبي معاوية عن الأعمش متصلا.
ورواه محمد بن فضيل عن الأعمش، عن رجل، عن أبي صالح، عنه وحديثه عند أبي داود (517) عن الإمام أحمد وهو في مسنده (7169) فأدخل بين الأعمش وأبي صالح رجلًا غير مسمى.
فاختلف أهل العلم في سماع الأعمش هذا الحديث من أبي صالح: فقال ابن معين: لم يسمع الأعمش هذا الحديث من أبي صالح.
والتحقيق في ذلك أن الأعمش سمع هذا الحديث أولًا عن رجل، عن أبي صالح، ثمّ تيسر له السماع من أبي صالح مباشرة، وعليه أكثر أصحابه منهم: معمر والثوري وأبو الأحوص وأبو معاوية وحفص بن غياث وجرير بن عبد الحميد وغيرهم، وقد صرَّح الأعمش في بعض رواياته أنه سمع من أبي صالح.
ثمّ اختلف أيضًا على أبي صالح، فقيل عنه، عن أبي هريرة رواه عنه ابنه سهيل، عن أبيه أبي صالح انظر ابن خزيمة (3/ 16) ولكن قال الإمام أحمد: هذا الحديث لم يسمعه سهيل من أبيه،
وإنما سمعه من الأعمش كذا نقله البيهقيّ (1/ 430) ولكن سهيل ثقة، ولم يعرف بالتدليس، وقد روي كثيرًا عن أبيه، فعنعنته محمولة على السماع.
وكذلك رواه أبو إسحاق السبيعيّ، عن أبي صالح، عن أبي هريرة.
رواه الإمام أحمد (8909 و 1066) عن موسى بن داود، ثنا زهير، عن أبي إسحاق به، وصحَّحه ابن خزيمة (3/ 16) فرواه من طريقه.
وخالفه نافع بن سليمان فرواه عن محمد بن أبي صالح، عن أبيه، عن عائشة، رواه الإمام أحمد (24363) عن أبي عبد الرحمن، ثنا حيوة بن شريح، قال: حَدَّثَنِي نافع بن سليمان به مثله.
وقد أنكر بعض أهل العلم أن يكون لأبي صالح ولد اسمه محمد ولذا اختلفت أقوال أهل العلم في هذه الروايات فنقل الترمذيّ عن أبي زرعة قوله: حديث أبي صالح عن أبي هريرة أصح من حديث أبي صالح عن عائشة، ونقل عن البخاريّ أنه قال: حديث أبي صالح، عن عائشة أصح، وذكر عن عليّ بن المديني أنه لم يثبتْ حديث أبي صالح، عن أبي هريرة، ولا حديث أبي صالح عن عائشة. انتهى.
ونقل الحافظ في التلخيص (1/ 207) عن ابن حبان: أنه صحَّح طريقين فقال: قد سمع أبو صالح هذين الخبرين من عائشة وأبي هريرة جميعًا.
قلت: هذا الذي يدل عليه الصناعة الحديثية إن ثبت وجود محمد بن أبي صالح، وإلَّا فحديث أبي صالح عن أبي هريرة أصح، وبه قال أكثر أهل العلم منهم أبو زرعة والعقيلي والدارقطني وغيرهم.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইমাম হলেন দায়িত্বশীল (জামিনদার) এবং মুআযযিন হলেন আমানতদার (বিশ্বস্ত)। হে আল্লাহ! আপনি ইমামগণকে সঠিক পথে পরিচালিত করুন এবং মুআযযিনদেরকে ক্ষমা করুন।"
1862 - عن ابن عمر أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الإمام ضامنٌ، والمؤذِّن موتَمن. اللَّهُمَّ ارشد الأئمَّة واغفر للمؤذِّنين".
صحيح: رواه أبو العباس السراج في"مسنده" (72) عن محمد بن عقيل، حَدَّثَنَا حفص.
وحدثنا أحمد بن حفص بن عبد الله، قال: حَدَّثَنِي أبيّ، قال: حَدَّثَنِي إبراهيم بن طهمان، حَدَّثَنَا سليمان الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عمر فذكر الحديث.
وإسناده صحيح، ونقل الحافظ في"التلخيص" (1/ 207) تصحيحه من الضياء في"المختارة" بعد عزوه إلى أبي العباس السراج، ولكن رواه البيهقيّ (1/ 431) من طريق حفص بن عبد الله، عن إبراهيم بن طهمان. وأعلَّه بما رواه عمار بن رُزَيق، عن الأعمش، عن مجاهد، عن عبد الله بن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يُغفر للمؤذِّن مدى صوته، ويشهد له كل رطبٍ ويابس سمع صوته". هذا القدر مرفوعًا دون الحديث الآخر. انتهى.
قلت: حديث عمار بن رُزَيق سبق تخريجه في باب رفع الصوت بالنداء، وفضل الأذان. وردَّ ابن التركماني على البيهقيّ قائلًا:"إنَّ كان البيهقيّ قصد بذلك زيادة غيره لا سيما مع انفصال أحد المتنين عن الآخر في المعنى، فهما حديثان مستقلان، فبعض الرواة روى أحدهما، وبعضهم شارك
في ذلك وانفرد بالحديث الآخر".
قلت: ما قاله ابن التركماني كلام وجيه حسب الصناعة الحديثية.
وقوله:"الإمام ضامن" قال أهل اللغة: الضامن في كلام العرب معناه الراعيّ، والضمان معناه: الرعاية.
والإمام ضامن معناه: أنه يحفظ الصّلاة، وعدد الركعات على القوم، وقيل معناه: ضامن الدعاء بعمهم به، ولا يختص بذلك دونهم، وليس الضمان الذي يوجب الغرامة من هذا في شيء، وقد تأوله قوم على أنه يتحمل القراءة عنهم في بعض الأحوال، وكذلك يتحمل القيام أيضًا إذا أدركهـ راكعًا. أفاده الخطّابي.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইমাম হলেন জামিন (দায়িত্বশীল), আর মুয়াজ্জিন হলেন বিশ্বস্ত (আমানতদার)। হে আল্লাহ! ইমামগণকে সঠিক পথের দিশা দিন এবং মুয়াজ্জিনগণকে ক্ষমা করে দিন।"
1863 - عن أبي عليّ الهمداني أنه خرج في سفينة فيها عقبة بن عامر الجُهنيّ، فحانت صلاة من الصلوات، فأمرنا أن يؤمَّنا، وقلنا له: إنك أحقُّنا بذلك، أنت صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم فأبى فقال: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أم الناس فأصاب فالصلاة له ولهم، ومن انتقص من ذلك شيئًا فعليه، ولا عليهم".
حسن: رواه أبو داود (580) وابن ماجة (983) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن حرملة، عن أبي عليّ الهمداني فذكر الحديث.
وإسناده حسن، فإن عبد الرحمن بن حرملة حسن الحديث إذا لم يخطئ، وهو من رجال مسلم، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ولا يحتج به، وقال ابن سعد: كان ثقة كثير الحديث.
وأبو عليّ هو: ثمامة بن شُفيّ، وثَّقه النسائيّ وغيره من رجال مسلم، وأخرجه الحاكم (1/ 210) من طريق عبد الرحمن بن حرملة، وصحّحه.
وفي الباب عن سهل بن سعد، وسلامة بنت الحر أخت حرشة، وابن عمر، وواثلة، وأبي محذورة، وأبي أمامة، وكلها معلولة لم يسلم منها إِلَّا ما ذكرت.
আবূ আলী আল-হামদানী থেকে বর্ণিত, তিনি উকবাহ ইবনু আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিয়ে একটি নৌকায় বের হলেন। অতঃপর (পাঁচ ওয়াক্তের) কোনো এক সালাতের সময় হলো। তখন তিনি আমাদের ইমামতি করার নির্দেশ দিলেন। আমরা তাঁকে বললাম: আপনি আমাদের মধ্যে এর (ইমামতির) সবচেয়ে বেশি হকদার, কেননা আপনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবী। তখন তিনি অস্বীকার করলেন এবং বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি লোকদের ইমামতি করল এবং সঠিকভাবে তা সম্পাদন করল, তবে তার নিজের জন্যও সালাতের সওয়াব রয়েছে এবং তাদের (মুক্তাদিদের) জন্যও রয়েছে। আর যে ব্যক্তি তাতে (ইমামতিতে) কোনো ত্রুটি করল, তবে তার (পাপ) তার উপরই বর্তাবে, তাদের উপর বর্তাবে না।"
1864 - عن أبي جحيفة قال: أتيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بمكة وهو في قُبَّةٍ حمراء من أدَم، فخرج بلالٌ فأذَّن. فكنتُ أتتبعُ فَمه ههنا وههنا، قال: ثمّ خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وعليه حُلَّةٌ حمراءُ بُرودٌ يمانية قِطري.
وقال موسى: قال: رأيتُ بلالًا خرج إلى الأبطح فأذَّن فلمّا بلغ:"حيَّ على الصّلاة، حيَّ على الفلاح" لوى عُنُقَه يمينًا وشمالًا، ولم يستدر، ثمّ دخل فأخرج العنزة … وساق حديثه.
صحيح: رواه أبو داود (520) عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا قيس - يعني ابن الربيع - ح
وحدثنا محمد بن سليمان الأنباريّ، حَدَّثَنَا وكيع، عن سفيان، جميعًا عن عون بن أبي حجيفة، عن أبيه فذكر الحديث.
قلت: الإسناد الأوّل فيه قيس بن الربيع ضعَّفه عليّ بن المديني والنسائي والدارقطني وغيرهم.
ولكن تابعه سفيان إِلَّا في قوله:"ولم يستدر" وقد ثبت ذلك في روايات أخرى.
فقد رواه الترمذيّ (197) والحاكم (1/ 202) من حديث عبد الرزّاق، عن سفيان وفيه:"رأيت بلالًا يُؤذِّن ويدور، ويتبع فاه هاهنا وهاهنا، وإصبعاه في أذنيه" وقال:"حسن صحيح".
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشّيخين.
والمراد منه التواء العنق يمينًا وشمالًا كما ذكره النسائيّ (2/ 12) بقوله: ينحرف يمينًا وشمالًا.
وأمّا إدخال الاصبعين في الأذنين فهو صحيح.
قال الترمذيّ:"حديث أبي جحيفة حسن صحيح، وعليه العمل عند أهل العلم، يستحبون أن يُدخل المؤذن إصبعيه في أذنيه في الأذان. وقال بعض أهل العلم: وفي الإقامة أيضًا، يُدخل إصبعيه في أذنيه وهو قول الأوزاعي" انتهى.
قلت: أصل حديث أبي جحيفة في الصحيحين. وسبق ذكره في الطهارة في باب استعمال فضل الوضوء إِلَّا أن البخاريّ لم يسق لفظ الحديث كاملًا كما لم يذكر هو ولا مسلم إدخال الاصبعين في الأذنين.
আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মক্কায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলাম। তিনি চামড়ার তৈরি একটি লাল তাঁবুর মধ্যে ছিলেন। তখন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন এবং আযান দিলেন। আমি তার মুখ এদিক-ওদিক অনুসরণ করছিলাম (দেখছিলাম)। তিনি (আবু জুহাইফা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, আর তাঁর পরিধানে ছিল ইয়ামানের তৈরী লাল রঙের ডোরাকাটা চাদর (হুল্লা)।
আর মূসা (ইবনে ইসমাঈল) বলেন: তিনি (আবু জুহাইফা) বলেছেন: আমি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, তিনি বাতহা নামক স্থানে বের হয়ে আযান দিলেন। যখন তিনি “হাইয়্যা আলাস-সালাহ”, “হাইয়্যা আলাল-ফালাহ” বললেন, তখন তিনি তার ঘাড় ডানে ও বামে বাঁকালেন, কিন্তু শরীর ঘোরালেন না। এরপর তিনি প্রবেশ করলেন এবং (একটি) আনযা (বর্শা বা লাঠি) বের করে আনলেন... এবং তিনি তার হাদীসটি বর্ণনা করলেন।
সহীহ: আবূ দাউদ (৫২০) মূসা ইবনে ইসমাঈল হতে, তিনি কাইস—অর্থাৎ ইবনু আর-রাবী‘—হতে... (অন্য সনদ: আবূ দাউদ) মুহাম্মাদ ইবনে সুলাইমান আল-আম্বারী হতে, তিনি ওয়াকী‘ হতে, তিনি সুফিয়ান হতে, সকলে আওন ইবনে আবী জুহাইফা হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে বর্ণনা করেছেন এবং হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
আমি (আলবানী) বলি: প্রথম সনদটিতে কাইস ইবনু আর-রাবী’ রয়েছেন, যাঁকে আলী ইবনুল মাদীনী, নাসাঈ, দারাকুতনি এবং অন্যান্যরা দুর্বল বলেছেন। কিন্তু সুফিয়ান তাকে অনুসরণ করেছেন, শুধু তার "তিনি শরীর ঘোরাননি" এই কথাটি ছাড়া। আর এই অংশটি অন্যান্য বর্ণনায় প্রমাণিত হয়েছে।
তিরমিযী (১৯৭) এবং হাকিম (১/২০২) হাদীসটি আব্দুর রাযযাক হতে, তিনি সুফিয়ান হতে বর্ণনা করেছেন। তাতে রয়েছে: "আমি বিলালকে আযান দিতে দেখলাম, আর তিনি (ডানে-বামে) ঘুরছিলেন, এবং তার মুখমণ্ডল এদিক-ওদিক অনুসরণ করছিলেন, আর তার উভয় আঙ্গুল তার কানে ছিল।" এবং তিনি (তিরমিযী) বলেছেন: "হাসান সহীহ।"
আর হাকিম বলেছেন: এটি শায়খাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুসারে সহীহ। এর উদ্দেশ্য হল ডানে ও বামে ঘাড় বাঁকানো, যেমনটি নাসাঈ (২/১২) উল্লেখ করেছেন তার এই কথা দ্বারা: তিনি ডানে ও বামে বাঁকেন।
আর কানে আঙ্গুল প্রবেশ করানো সহীহ। তিরমিযী বলেছেন: "আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি হাসান সহীহ। আর ইলমপন্থীদের নিকট এর উপর আমল রয়েছে; তারা মুআযযিনের জন্য আযানের সময় কানে আঙ্গুল প্রবেশ করানোকে মুস্তাহাব মনে করেন। আর কতিপয় ইলমপন্থী বলেছেন: ইকামাতের সময়ও তিনি তার আঙ্গুল কানে প্রবেশ করাবেন। এটি আওযাঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর অভিমত।" সমাপ্ত।
আমি (আলবানী) বলি: আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের মূল অংশ সহীহাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এ রয়েছে। অযু শেষে অবশিষ্ট পানির ব্যবহার সংক্রান্ত পবিত্রতা অধ্যায়ে এর আলোচনা পূর্বে করা হয়েছে। তবে বুখারী হাদীসের সম্পূর্ণ শব্দাবলী উল্লেখ করেননি, যেমন তিনি ও মুসলিম কেউই কানে আঙ্গুল প্রবেশ করানোর বিষয়টি উল্লেখ করেননি।
1865 - عن جابر بن سمرة قال: كان بلال يؤذِّن إذا دحضتْ، فلا يُقيم حتَّى يخرجَ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فإذا خرج أقام الصّلاةَ حين يراه.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (606) عن سلمة بن شبيب، ثنا الحسن بن أعين، ثنا زهير، ثنا سماك بن حرْب، عن جابر بن عبد الله فذكر الحديث.
ورواه أبو داود (537) والتِّرمذيّ (202) من طريق إسرائيل، عن سماك بن حرب وفيه:"كان مؤذن رسول الله صلى الله عليه وسلم يؤذن، ثمّ يُمْهِل، فإذا رأى النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قد خرج أقام الصّلاة".
ولم يُسم الترمذيّ اسم المؤذِّنِ، وسماه أبو داود بأنه بلال.
قال الترمذيّ: هكذا قال بعض أهل العلم:"إنَّ المؤذِّن أملكُ بالأذان، والإمام أملك بالإقامة".
قلت: قول الترمذيّ هو الصواب، وأمّا ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:
"المؤذِّن أملك بالأذان، والإمام أملك بالإقامة، اللَّهُمَّ أرشد الأئمة واغفر للمؤذنين" فهو ضعيف، رواه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1327) عن محمد بن إسحاق بن إبراهيم بن فروخ، ثنا عليّ بن أشكاب، ثنا يحيى بن إسحاق، ثنا شريك، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة
فذكر الحديث.
قال ابن عدي: هذا بهذا اللّفظ لا يُروى إِلَّا عن شريك من رواية يحيى بن إسحاق عنه، وإنما رواه الناس عن الأعمش بلفظ آخر وهو قول:"الإمام ضَامِنٌ والمؤذِّن مُؤتمن. اللَّهُمَّ أرشد الأئمة واغفر للمؤذنين". وحديث الأعمش سبق تخريجه.
ورواه البيهقيّ في"الكبرى" (2/ 19) من كلام عليّ بن أبي طالب وقال:"ورُوي عن شريك، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة مرفوعًا وليس بمحفوظ".
وقوله:"فإذا خرج أقام الصّلاة حين يراه" لا يعارض ما ثبت في الصحيحين - البخاريّ في الدعوات (6310) ومسلم في صلاة المسافرين (736):"فإذا طلع الفجرُ صلي رسول الله صلى الله عليه وسلم ركعتين خفيفتين، ثمّ اضطلع على شقه الأيمن حتَّى يجيءَ المؤذِّنُ فيؤذِنُه" وفي رواية مسلم:"حتَّى يأتيه المؤذِّن للإقامة" فمعنى هذا أن بلالًا كان يراقب خروجَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإذا رآه يشرع في الإقامة قبل أن يراه الناس. وأحيانا إذا تأخر خروجُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يذهب إلى بابه لتفقد أحواله، وليُخبره بأن الوقت قد حان، فإن خرج شرع في الإقامة.
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন আযান দিতেন যখন সূর্য ঢলে পড়ত (যোহরের ওয়াক্ত শুরু হতো)। তিনি ইকামত দিতেন না, যতক্ষণ না নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হতেন। যখন তিনি বের হতেন, তখন তাঁকে দেখেই সালাতের জন্য ইকামত দিতেন।
সহীহ: এটি মুসলিম সালাতের স্থান অধ্যায়ে (৬০৬) বর্ণনা করেছেন।
এটি আবু দাউদ (৫৩৭) এবং তিরমিযী (২০২) ইসরাঈলের সূত্রে সিমা ইবনু হারব থেকে বর্ণনা করেছেন এবং তাতে আছে: "রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুআযযিন আযান দিতেন, তারপর অপেক্ষা করতেন। যখন তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বের হতে দেখতেন, তখন সালাতের জন্য ইকামত দিতেন।"
তিরমিযী (রঃ) মুআযযিনের নাম উল্লেখ করেননি, কিন্তু আবু দাউদ (রঃ) তাঁর নাম বিলাল বলে উল্লেখ করেছেন।
তিরমিযী (রঃ) বলেছেন: কিছু সংখ্যক আহলে ইলম এই মত পোষণ করেন যে, "আযান দেওয়ার ক্ষেত্রে মুআযযিন অধিক ক্ষমতাবান এবং ইকামত দেওয়ার ক্ষেত্রে ইমাম অধিক ক্ষমতাবান।"
আমি (লেখক) বলি: তিরমিযী (রঃ)-এর কথাই সঠিক। আর আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে: "আযান দেওয়ার ক্ষেত্রে মুআযযিন অধিক ক্ষমতাবান এবং ইকামত দেওয়ার ক্ষেত্রে ইমাম অধিক ক্ষমতাবান। হে আল্লাহ, ইমামদের সঠিক পথ দেখাও এবং মুআযযিনদের ক্ষমা করো"—এই বর্ণনাটি দুর্বল।
[... অন্যান্য রাবী ও দুর্বলতার বিস্তারিত আলোচনা]
আর তাঁর এই উক্তি: "যখন তিনি বের হতেন, তখন তাঁকে দেখেই সালাতের জন্য ইকামত দিতেন"—এটি সহীহ্ বুখারী (৬৩১০) এবং মুসলিমের (৭৩৬) বর্ণনার বিরোধী নয়, যেখানে বলা হয়েছে: "যখন ফজর উদয় হতো, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'রাকাআত হালকা সালাত আদায় করতেন, এরপর মুআযযিন এসে তাঁকে জানানোর পূর্ব পর্যন্ত তিনি তাঁর ডান পার্শ্বের উপর কাত হয়ে শুয়ে থাকতেন।" মুসলিমের বর্ণনায় আছে: "ইকামতের জন্য মুআযযিন তাঁর কাছে আসা পর্যন্ত।" এর অর্থ হলো: বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বের হওয়া পর্যবেক্ষণ করতেন। যখন তিনি তাঁকে দেখতে পেতেন, মানুষের দেখার আগেই তিনি ইকামত শুরু করে দিতেন। আর কখনও কখনও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বের হতে দেরি হলে তিনি তাঁর দরজায় যেতেন তাঁর অবস্থা জানতে এবং তাঁকে জানাতে যে, সময় হয়ে গেছে। এরপর তিনি বের হলে বিলাল ইকামত শুরু করতেন।
1866 - عن أبي هريرة قال: أقيمت الصّلاة، فقمنا، فعدَّلْنا الصفوف قبل أن يخرج إلينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فأتى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتَّى إذا قام في مصلاه قبل أن يكبر ذكر، فانصرف وقال لنا:"مكانكم" فلم نزَلْ قيامًا ننتظره حتَّى خرج إلينا وقد اغتسل، ينظفُ رأسُه ماء، فكبر فصلى بنا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الغسل (275)، ومسلم في المساجد (605) - واللّفظ له - كلاهما من طريق يونس، عن الزّهريّ، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সালাতের ইকামত দেওয়া হলো, অতঃপর আমরা দাঁড়ালাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট বের হয়ে আসার আগেই আমরা কাতারগুলো সোজা করে নিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন। যখন তিনি তাঁর সালাতের স্থানে দাঁড়ালেন এবং তাকবীর বলার আগেই তাঁর কিছু স্মরণ হলো, তখন তিনি ফিরে গেলেন এবং আমাদের বললেন: "তোমরা তোমাদের জায়গায় থাকো।" অতঃপর আমরা দাঁড়িয়ে তাঁর জন্য অপেক্ষা করতে লাগলাম, যতক্ষণ না তিনি আমাদের নিকট বেরিয়ে এলেন। তিনি (ইতিমধ্যে) গোসল করে নিয়েছিলেন, তাঁর মাথা থেকে পানি ঝরছিল। অতঃপর তিনি তাকবীর বললেন এবং আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন।
1867 - عن أبي قتادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أقيمت الصّلاة فلا تقوموا حتَّى تروْني".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (637) ومسلم في المساجد (604) كلاهما من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة - وقرنه مسلم بأبي سلمة - عن أبي قتادة فذكر الحديث.
وفي البخاريّ: عن مسلم بن إبراهيم قال: حَدَّثَنَا هشام، قال: كتب إليَّ يحيى عن عبد الله بن أبي قتادة فذكر الحديث.
والكتابة أحد وجوه التحمل، ثمّ رواه أيضًا (638) عن أبي نعيم، قال: حَدَّثَنَا شيبان، عن يحيى فذكر به مثله وزاد في آخره:"وعليكم بالسكينة"، إِلَّا أن مسلمًا لم يذكر هذه الزيادة في رواية شيبان بعد أن ذكر المتابعات.
قال المصنف رحمه الله تعالى (أي البخاريّ) وتابعه عليّ بن المبارك. وهذه المتابعة وصلها المصنف في كتاب الجمعة (909) فقال: حَدَّثَنَا عمرو بن عليّ، قال: حَدَّثَنِي أبو قُتَيبة، قال: حَدَّثَنَا عليّ بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة، لا أعلمه إِلَّا عن أبيه، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، قال:"لا تقوموا حتَّى ترونيّ، وعليكم السكينةُ" وتابعهما معاوية بن سلّام كما ذكره أبو داود (539) فقال: ورواه معاوية بن سلّام وعلي بن المبارك عن يحييّ، وقالا فيه:"حتَّى تروني وعليكم السكينة".
وهذه الرواية المعلقة وصلها الإسماعيلي من طريق الوليد بن مسلم، عن معاوية بن سلّام وشيبان جميعًا عن يحيى. انظر:"فتح الباري" (2/ 121).
ومعنى قوله:"وعليكم السكينة" أي لا يزاحم بعضكم بعضًا عند القيام إلى الصّلاة، فيحاول من هو بعيد من الصف الأوّل أن يُسرع من غير مبالاة من المدافعة والمزاحمة فإن ذلك يخالف الوقار.
وبَيَّن ابن رشيد معني آخر وهو قوله:"والنكتة في النهي عن ذلك لئلا يكون مقامهم سببًا لإسراعه في الدخول إلى الصّلاة، فينافي مقصوده من هيئة الوقار". انظر:"فتح الباري".
وحديث جابر بن سمرة وحديث أبي هريرة وحديث أبي قتادة يعارضه حديث بلال أنه كان يؤذِّن إذا دحضت، ولا يقيم حتَّى يخرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فإذا خرج أقام الصّلاة حين يراه، ويمكن الجمع بين هذه الأحاديث:
بأن بلالًا كان يراقب خروج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من حيث لا يراه غيره، أو إِلَّا القليل، فعند أول خروجه يُقيمُ، ولا يقوم الناس حتَّى يروه، ثمّ لا يقوم مقامه حتَّى يعدلوا الصفوف.
وقوله في حديث أبي هريرة:"فيأخذ الناس مقامهم قبل أن يأخذ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم"رواه أبو داود (541) بإسناد صحيح، وفيه الوليد بن مسلم قد صرَّح بالتحديث، فيحمل هذا على أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذا كان في المسجد.
أو أنه فعل ذلك مرة أو مرتين لبيان الجواز، وإلَّا فالأصل فيه أن لا تقام الصّلاة إِلَّا إذا خرج الإمام لئلا يطول عليهم القيام، لأنه قد يعرض له عارض فيتأخر بسببه كما قال القاضي عياض وغيره.
وقال النوويّ رحمه الله تعالى: اختلف العلماء من السلف فمن بعدهم مني يقوم الناس للصلاة، ومتى يكبر الإمام؟ فمذهب الشافعي رحمه الله تعالى وطائفة: أنه يستحب أن لا يقوم أحد حتَّى يفرغ المؤذن من الإقامة، ونقل القاضي عياض عن مالك رحمه الله تعالى وعامة العلماء: أنه يستحب أن يقوموا إذا أخذ المؤذن في الإقامة، وكان أنس يقوم إذا قال المؤذن:"قد قامت الصّلاة، وبه قال أحمد رحمه الله تعالى، وقال أبو حنيفة رضي الله عنه والكوفيون: يقومون في الصف إذا قال:"حيَّ على الصّلاة"، فإذا قال:"قد قامتِ الصّلاة" كبَّر الإمام، وقال جمهور العلماء من السلف والخلف: لا يكبر الإمام حتَّى يفرغ المؤذن من الإقامة".
قلت: ويحمل قول الفقهاء على أن الإمام قبل إقامة الصّلاة يُسوِّي الصفوف، ويسدُّ الفرج، ثمّ يأمر المؤذن لإقامة الصّلاة ويكبِّر، قال إبراهيم النخعي: فإذا قال:"قد قامت الصّلاة" كبَّر الإمام. ذكره محمد بن الحسن في كتاب"الآثار" وقال: وبه نأخذ وهو قول أبي حنيفة"، إِلَّا فيكون مخالفًا للسنّة الصّحيحة الصريحة.
আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সালাতের জন্য ইকামাত দেওয়া হয়, তখন তোমরা আমাকে না দেখা পর্যন্ত দাঁড়াবে না।"
1868 - عن أنس قال: أقيمت الصّلاة، فعرض للنبي صلى الله عليه وسلم رجل فحبسه بعد ما أقيمت الصّلاة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (643) ومسلم في الحيض (376)، وقد مضى الحديث في الطهارة، في باب نوم الجالس لا ينقض الوضوء.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সালাতের ইকামত দেওয়া হলো। অতঃপর এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে এলো এবং সালাতের ইকামত হয়ে যাওয়ার পরও তাঁকে আটকে রাখল।
1869 - عن مالك بن الحويرث قال: أتينا إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ونحن شَبَبَةٌ متقاربون، فأقمنا عنده عشرين يومًا وليلةً، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم رحيمًا رفيقًا، فلمّا ظنَّ أنَّا قد اشتهينا أهلنا - أو قد اشتقنا - سألنا عَمن تركنا بعدنا، فأخبرناه قال:"ارجعوا إلى أهليكم فأقيموا فيهم وعلِّموهم، ومروهم" وذكر أشياء أحفظُها، أو لا أحفظُها -"وصلُّوا كما رأيتموني أصَلِّي، فإذا حضرتِ الصّلاةُ فليؤذِّنْ لكم أحدُكم ولْيؤمَّكم أكبرُكم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (631) واللّفظ له، ومسلم في المساجد (674) كلاهما عن أبي قِلابة، عن مالك بن الحويرث فذكر مثله، ولم يذكر مسلم:"صلوا كما رأيتموني أصلي".
والحديث قد سبق ذكره في أبواب الأذان، وسيأتي أيضًا في باب رفع اليدين عند الركوع، وعند رفع الرأس منه.
মালিক ইবনুল হুওয়াইরিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা প্রায় সমবয়সী যুবক ছিলাম। এমতাবস্থায় আমরা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। অতঃপর আমরা বিশ দিন ও বিশ রাত তাঁর কাছে অবস্থান করলাম। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছিলেন অত্যন্ত দয়ালু ও কোমল হৃদয়ের অধিকারী। যখন তিনি বুঝলেন যে, আমরা আমাদের পরিবারের প্রতি আগ্রহী হয়ে উঠেছি—অথবা (বর্ণনাকারী সন্দেহ করে বললেন) আমরা হয়তো (তাদের জন্য) ব্যাকুল হয়ে পড়েছি—তখন তিনি জানতে চাইলেন, আমরা আমাদের পেছনে কাদের রেখে এসেছি? আমরা তাঁকে জানালাম। তিনি বললেন: 'তোমরা তোমাদের পরিবারের কাছে ফিরে যাও এবং তাদের মাঝে অবস্থান করো, আর তাদের শিক্ষা দাও এবং তাদের আদেশ করো।' তিনি আরও কিছু বিষয়ের উল্লেখ করলেন, যা আমি মনে রাখতে পেরেছি, বা (সম্ভবত) পারিনি— 'আর তোমরা সালাত আদায় করো যেভাবে তোমরা আমাকে সালাত আদায় করতে দেখেছ। যখন সালাতের সময় উপস্থিত হবে, তখন তোমাদের মধ্যে কেউ একজন আযান দেবে এবং তোমাদের মধ্যে যে বয়সে বড়, সে তোমাদের ইমামতি করবে।'
1870 - عن البراء بن عازب قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم صلَّى نحو بيت المقدس ستة عشر - أو سبعة عشر - شهرًا. وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يحب أن يُوَجِّه إلى الكعبة، فأنزل الله: {قَدْ نَرَى تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ} [سورة البقرة: 148] فتوجه نحو الكعبة. وقال السفهاء من الناس - وهم اليهود -: {مَا وَلَّاهُمْ عَنْ قِبْلَتِهِمُ الَّتِي كَانُوا عَلَيْهَا قُلْ لِلَّهِ الْمَشْرِقُ وَالْمَغْرِبُ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ} [سورة البقرة: 142]. فصلى مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم رجل، ثمّ خرج بعد ما صلَّى فمَرَّ على قوم من الأنصار في صلاة العصر نحو بيت.
المقدس، فقال: هو يشهد أنه صلَّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأنه توجه نحو الكعبة. فتحرف القومُ حتَّى توجهوا نحو الكعبة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (399)، ومسلم في المساجد (525) كلاهما من حديث أبي إسحاق، عن البراء بن عازب، واللّفظ للبخاريّ، وذكره مسلم مختصرًا نحوه، وانفرد البخاريّ فذكر في كتاب الإيمان (40): وهم راكعون، فداروا كما هم قِبَل البيت، وكانت اليهود قد أعجبهم إذ كان يُصَلِّي قبل بيت المقدس وأهلُ الكتاب، فلمّا ولَّى وجْهَه قِبل البيتِ أنكروا ذلك.
আল-বারা' ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ষোলো মাস—অথবা সতেরো মাস—বায়তুল মুকাদ্দাসের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করেছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কা'বার দিকে মুখ ফিরানো পছন্দ করতেন। অতঃপর আল্লাহ নাযিল করলেন: {আমি অবশ্যই আপনার মুখমণ্ডলকে আকাশের দিকে ফিরাতে দেখছি।} [সূরা আল-বাকারা: ১৪৮] তখন তিনি কা'বার দিকে মুখ ফিরালেন। আর মানুষের মধ্যে নির্বোধেরা—অর্থাৎ ইয়াহুদিরা—বলতে শুরু করল: {তাদের সেই কিবলা থেকে কীসে ফিরিয়ে দিল, যার উপর তারা ছিল? বলুন: পূর্ব ও পশ্চিম আল্লাহরই। তিনি যাকে ইচ্ছা সরল পথে পরিচালিত করেন।} [সূরা আল-বাকারা: ১৪২] এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে একজন লোক সালাত আদায় করলেন। সালাত শেষে সে বের হয়ে গেল এবং আনসারদের একটি গোত্রের পাশ দিয়ে অতিক্রম করল, যারা তখন আসরের সালাতে বায়তুল মুকাদ্দাসের দিকে মুখ করে ছিল। সে বলল: সে সাক্ষ্য দিচ্ছে যে, সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে সালাত আদায় করেছে এবং তিনি কা'বার দিকে মুখ করেছেন। তখন রুকুতে থাকা অবস্থায় সেই গোত্রের লোকেরা তাদের মুখ ঘুরিয়ে নিল এবং কা'বার দিকে মুখ করল। ইয়াহুদি ও আহলে কিতাবগণ পছন্দ করত যে তিনি বায়তুল মুকাদ্দাসের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করতেন। কিন্তু যখন তিনি কা'বার দিকে মুখ করলেন, তখন তারা তা অপছন্দ করল।
1871 - عن البراء بن معرور، قال: إنه قال للنبيِّ صلى الله عليه وسلم: إني خرجتُ في سفري هذا، وقد هداني الله للإسلام، فرأيتُ ألا أجعل هذه البِنيةَ مني بظهر، فصليتُ إليها، وقد خالفني أصحابي في ذلك، حتَّى وقع في نفسي من ذلك شيء، فماذا ترى؟ قال:"قد كنت على قبلة لو صبرتَ عليها".
قال فرجع البراء إلى قبلة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وصلى معنا إلى الشّام.
حسن: رواه ابن خزيمة (429) من طريق ابن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي معبد بن كعب بن مالك - وكان من أعلم الأنصار -، حَدَّثَنِي أن أباه كعبًا حدَّثه.
وخبر كعب بن مالك في خروج الأنصار من المدينة إلى مكة في بيعة العقبة. وذكر في الخبر أن البراء بن معرور قال (فذكره). وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرَّح بالتحديث.
وقوله:"هذه البِنيةَ مني بظهر" يعني الكعبة.
وفيه دليل على أنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كان يصلي بمكة إلى بيت المقدس.
وهو قول ابن عباس كما سيأتي.
বারা ইবনে মা'রূর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আমি আমার এই সফরে রওনা হয়েছি, আর আল্লাহ আমাকে ইসলামের পথ দেখিয়েছেন। আমি মনে করলাম যে এই স্থাপত্যটিকে (কা'বা) আমার পিছনে রাখা উচিত নয়, তাই আমি এর দিকে ফিরে সালাত আদায় করলাম। কিন্তু আমার সাথীরা এতে আমার বিরোধিতা করলো, ফলে এ নিয়ে আমার মনে কিছুটা সংশয় সৃষ্টি হলো। আপনি কী মনে করেন (বা কী নির্দেশ দেন)? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এমন একটি কিবলার (দিকে ছিলে) যার উপর যদি তুমি ধৈর্য ধারণ করতে (অটল থাকতে)।"
(রাবী) বললেন, এরপর বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কিবলার দিকে ফিরে গেলেন এবং আমাদের সাথে শামের (বায়তুল মাকদাসের) দিকে ফিরে সালাত আদায় করলেন।
1872 - عن عبد الله بن عمر أنه قال: بينما الناس بقباء في صلاة الصُّبْحِ، إذ جاءهم آتٍ فقال: إن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قد أنزل عليه الليلة قرآن، وقد أمر أن يستقبل الكعبة، فاستقبلوها، وكانت وجوهُهم إلى الشام، فاستداروا إلى الكعبة.
متفق عليه: رواه مالك في القبلة (6) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر فذكره، ومن طريقه أخرجه البخاريّ في الصّلاة (403)، ومسلم في المساجد (526).
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন লোকেরা কুবায় ফজরের সালাতে রত ছিল, তখন একজন আগমনকারী এসে বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি আজ রাতে কুরআন নাযিল হয়েছে এবং তাঁকে কা'বার দিকে মুখ করতে আদেশ করা হয়েছে। সুতরাং তোমরাও কা'বার দিকে মুখ কর। তখন তাদের মুখ ছিল শামের (বাইতুল মাকদিসের) দিকে। তারা তৎক্ষণাৎ কা'বার দিকে ঘুরে গেল।
1873 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصلي نحو بيت المقْدِس فنزلت: {قَدْ نَرَى تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضَاهَا فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ} [سورة البقرة: 144]، فمرَّ رجل من بني سلمة، وهم ركوع في صلاة الفجر، وقد صلَّوا ركعة فنادى: ألا إن القبلة حُوِّلَتْ، فمالُوا كما هم نحو القبلة.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (527) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا عفّان، ثنا حمّاد بن
سلمة، عن ثابت، عن أنس فذكر مثله، وبقية الأحاديث في تحويل القبلة ستأتي في كتاب التفسير إن شاء الله تعالى.
ولا منافاة بين حديث البراء المتقدم فإن فيه: أنهم كانوا في صلاة العصر، وبين حديث ابن عمر وأنس بأنهم كانوا في صلاة الفجر، لاحتمال أن الخبر وصل إلى من هو في داخل المدينة وهم بنو حارثة، وقت العصر، ووصل الخبر إلى من هو في خارج المدينة وهم بنو عمرو بن عوف أهل قباء وقت الصبح. انظر"الفتح" (1/ 506).
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাইতুল মাকদিসের (জেরুজালেমের) দিকে মুখ করে সালাত আদায় করতেন। অতঃপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: "আকাশের দিকে তোমার বারবার মুখ ফেরানো আমি অবশ্যই লক্ষ্য করছি। সুতরাং আমি অবশ্যই তোমাকে সেই কিবলার দিকে ঘুরিয়ে দেব, যা তুমি পছন্দ করো। অতএব তুমি তোমার মুখ মাসজিদুল হারামের দিকে ফেরাও।" (সূরাহ আল-বাক্বারাহ: ১৪৪) এরপর বনী সালামাহ গোত্রের এক ব্যক্তি তাদের (সালাতের) পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, আর তারা ফজরের সালাতে রুকুতে ছিল এবং এক রাকআত পড়ে নিয়েছিল। তখন লোকটি উচ্চস্বরে ডাক দিয়ে বললেন: 'শুনে রাখো, কিবলা পরিবর্তন করা হয়েছে!' ফলে তারা যে অবস্থায় ছিল, সেভাবেই কিবলার দিকে ঘুরে গেল।
1874 - عن أنس بن مالك، قال: جاء منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنَّ القبلة قد حوِّلتْ". والإمام في الصّلاة قد صلّى ركعتين. فقال المنادي:"قد حوّلتِ القبلة إلى الكعبة". فصلّوا الركعتين الباقيتين إلى الكعبة.
حسن: رواه أبو بكر بن أبي شيبة (1/ 334)، والبزّار - كشف الأستار (421) - كلاهما من حديث زيد بن الجباب، ثنا جميل بن عبيد أبو النّضر، ثنا ثمامة، عن جدّه أنس بن مالك، فذكره.
قال البزّار:"لا نعلم رواه عن ثمامة إِلَّا جميل".
وقال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 13):"إسناده حسن".
قلت: وهو كما قال، فإنَّ جميل بن عبيد وشيخه ثمامة بن عبد الله بن أنس صدوقان. وقد قال ابن معين في جميل:"ثقة"، وثمامة بن عبد الله بن أنس وثَّقه أحمد والنسائي. قال ابن عدي:"له أحاديث عن أنس، وأرجو أنه لا بأس به".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের একজন ঘোষণাকারী এসে বললেন: "নিশ্চয় কিবলা পরিবর্তন করা হয়েছে।" তখন ইমাম নামাযে ছিলেন এবং তিনি ইতোমধ্যে দুই রাকাত নামায আদায় করে ফেলেছিলেন। তখন ঘোষণাকারী বললেন: "কিবলাকে কা'বার দিকে ফিরিয়ে দেওয়া হয়েছে।" অতঃপর তারা অবশিষ্ট দুই রাকাত নামায কা'বার দিকে ফিরে আদায় করলেন।
1875 - عن ابن عباس، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي وهو بمكة نحو بيت المقدس، والكعبة بين يديه، وبعدما هاجر إلى المدينة ستة عشر شهرًا، ثمّ صُرف إلى الكعبة.
صحيح: رواه أحمد (2991)، والبزّار - كشف الأستار (418) -، والطَّبرانيّ في"الكبير" (11/ 67) كلّهم من طريق يحيى بن حمّاد، حَدَّثَنَا أبو عوانة، عن الأعمش، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره. وإسناده صحيح.
وأبو عوانة هو وضّاح بن عبد الله اليشكري البزّار، المشهور بكنيته.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মক্কায় ছিলেন, তখন তিনি বায়তুল মাকদিসের (জেরুজালেম) দিকে মুখ করে সালাত আদায় করতেন, অথচ কাবা তাঁর সামনেই ছিল। এরপর তিনি যখন মদীনায় হিজরত করলেন, তখনো ষোলো মাস (একইভাবে সালাত আদায় করলেন), এরপর তাঁকে কাবার দিকে ফিরিয়ে দেওয়া হলো।
1876 - عن سهل بن سعد، قال: لما حوِّلت القبلة إلى الكعبة، مرّ رجل بأهل قباء، وهم يصلّون. فقال لهم: قد حولت القبلة إلى الكعبة، فاستداروا وإمامهم نحو الكعبة.
حسن: رواه الدَّارقطنيّ (1074)، والطَّبرانيّ في الكير (6/ 200) كلاهما من حديث عبيد الله بن موسى، حَدَّثَنَا عبد السّلام بن حفص، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 14):"رجاله موثقون".
সহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন কিবলাকে কা'বার দিকে পরিবর্তন করা হলো, তখন এক ব্যক্তি কুবাবাসীদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, আর তারা তখন সালাত আদায় করছিলেন। তিনি তাদেরকে বললেন: কিবলা পরিবর্তন করে কা'বার দিকে করা হয়েছে। তখন তারা এবং তাদের ইমাম কা'বার দিকে ঘুরে দাঁড়ালেন।
1877 - عن ابن عباس قال: كان أولَ ما نسخ اللهُ من القرآن القبلة، وذلك أنَّ رسول
الله صلى الله عليه وسلم لما هاجر إلى المدينة، وكان أكثر أهلها اليهود، أمره الله عز وجل أن يستقبل بيت المقدس، ففرحت اليهودُ، فاستقبلها رسول الله صلى الله عليه وسلم بضعة عشر شهرًا، فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحبُّ قبلة إبراهيم، فكان يدعو وينظر إلى السماء، فأنزل الله تبارك وتعالى: {قَدْ نَرَى تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ} إلى قوله: {فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُ} [البقرة: 144]. فارتاب من ذلك اليهود، وقالوا: {مَا وَلَّاهُمْ عَنْ قِبْلَتِهِمُ الَّتِي كَانُوا عَلَيْهَا}، فأنزل الله عز وجل: {قُلْ لِلَّهِ الْمَشْرِقُ وَالْمَغْرِبُ} [البقرة: 142]. وقال: {فَأَيْنَمَا تُوَلُّوا فَثَمَّ وَجْهُ اللَّهِ} [البقرة: 115].
صحيح: رواه ابن جرير في"تفسيره" (2/ 450)، وابن أبي حاتم في"تفسيره" (1/ 248)، والبيهقي (2/ 12 - 13) كلّهم من طريق أبي صالح، عن معاوية بن صالح، عن عليّ بن أبي طلحة، عن ابن عباس، فذكره.
وعلي بن أبي طلحة لم يدرك ابن عباس، إِلَّا أن الواسطة بينهما معروفة، ولذا صحح أهل العلم هذا الإسناد. وأخرجه أيضًا ابن أبي حاتم في"تفسيره"، والبيهقي من وجه آخر عن عطاء الخراسانيّ، عن ابن عباس، قال:"أوّل ما نُسخ من القرآن فيما ذكرنا - والله أعلم - شأن القبلة" فذكره بنحوه. وعطاء الخراساني لم يسمع من ابن عباس.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس، قال: لما صُرفت القبلة عن الشام إلى الكعبة - وصُرفت في رجب على رأس سبعة عشر شهرًا من مقدم رسول الله صلى الله عليه وسلم المدينة - أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم رفاعةُ بنُ قيس، وقردمُ بنُ عمرو، وكعبُ بن الأشرف، ونافع بن أبي نافع - هكذا قال ابن حميد، وقال أبو كريب: ورافع بن أبي رافع -، والحجاج بن عمرو - حليف كعب بن الأشرف -، والربيع بن الربيع بن أبي الحُقيق، وكنانة بن الربيع بن أبي الحقيق، فقالوا: يا محمد! ما ولَّاك عن قبلتكَ التي كنت عليها وأنت تزعم أنك على ملّة إبراهيم ودينه، ارجع إلى قبلتك التي كنت عليها نتبعُك ونصدِّقك. وإنّما يريدون فتنته عن دينه، فأنزل الله فيهم: {سَيَقُولُ السُّفَهَاءُ مِنَ النَّاسِ مَا وَلَّاهُمْ عَنْ قِبْلَتِهِمُ الَّتِي كَانُوا عَلَيْهَا} إلى قوله: {إِلَّا لِنَعْلَمَ مَنْ يَتَّبِعُ الرَّسُولَ مِمَّنْ يَنْقَلِبُ عَلَى عَقِبَيْهِ} [البقرة: 143 - 143].
رواه البيهقيّ في"الدلائل" (2/ 575)، وابن أبي حاتم في"تفسيره" (1/ 247 - 248)، والطبري في تفسيره (2/ 618 - 619) كلّهم من طريق محمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي محمد بن أبي محمد مولى زيد بن ثابت، قال: حَدَّثَنِي سعيد بن جبير - أو عكرمة، شك محمد بن أبي محمد -، عن ابن عباس، قال (فذكره).
والقصة هذه بكاملها ذكرها ابن هشام في السيرة (1/ 550) مع حذف إسنادها. وفيه محمد بن أبي محمد الأنصاري مولى زيد بن ثابت لم يرو عنه غير ابن إسحاق. قال أبو حاتم:"مجهول".
وقال الذّهبيّ:"لا يعرف". وقال الحافظ:"مجهول". وأمّا ابن حبان فذكره في"الثّقات".
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن عمارة بن أوس، قال: كنا نصلي إلى بيت المقدس، إذ أتانا آتٍ، وإمامنا راكع ونحن ركوع، فقال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أنزل عليه قرآن، قد أُمر أن يستقبل الكعبة. ألا فاستقبلوها. قال: فانحرف إمامنا وهو راكع، وانحرف القوم حتَّى استقبلوا الكعبة. فصلينا بعض تلك الصّلاة إلى بيت المقدس، وبعضها إلى الكعبة.
رواه ابن أبي شيبة (1/ 334 - 335) عن شبابة، قال: حَدَّثَنَا قيس، عن زياد بن علاقة، عن عمارة بن أوس، فذكره.
ورجاله ثقات غير قيس وهو ابن الربيع الأسدي أبو محمد الكوفيّ، ضعيف باتفاق أهل العلم، فإنه قد ابتلي بابن سوء، فكان يدخل في حديثه ما ليس من حديثه، فيحدث به عندما كبر وساء حفظه، فاختلطت أحاديثه بأحاديث غيره.
ومن طريقه رواه أيضًا أبو يعلى (1506)، وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (3/ 13)، فقال:"اختلف في الاحتجاج به".
وكذلك رُوي عن تويلة بنت أسلم - وهي من المبايعات -، قالت: إنا لبمقامنا نُصلي في بني حارثة. فقال عباد بن بشر بن قيظي: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم استقبال بيت الحرام - أو الكعبة -. فتحوَّل الرجال مكان النساء، والنساء مكان الرجال، فصلَّوا السجدتين الباقيتين نحو الكعبة.
رواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 207)، وابن منده - كما في الإصابة في ترجمة عباد بن بشر - كلاهما من طريق إبراهيم بن جعفر بن محمود بن مسلمة الحارثيّ، عن أبيه، عن جدته أم أبيه تويله بنت أسلم، فذكرته.
وفيه إبراهيم بن جعفر ولا يعلم له توثيق من الأئمة إِلَّا ما كان من ابن حبان حيث ذكره في الثّقات، وأمّا قول: الهيثميّ في"المجمع" (2/ 14):"رجاله موثقون" فهو اعتمادا منه على ابن حبان.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ কুরআনের যে বিধান সর্বপ্রথম রহিত (নসখ) করেছিলেন, তা হলো কিবলার বিধান। এর কারণ হলো, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনায় হিজরত করলেন, তখন মদিনার অধিকাংশ লোক ছিল ইহুদি। আল্লাহ তা'আলা তাঁকে বায়তুল মাকদাসের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করার নির্দেশ দিলেন। এতে ইহুদিরা আনন্দিত হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দশের অধিক মাস সেই দিকে মুখ করে সালাত আদায় করেছিলেন। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইব্রাহিমের (আঃ) কিবলাকে পছন্দ করতেন। তাই তিনি দু‘আ করতেন এবং আকাশের দিকে তাকাতেন। তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "{قَدْ نَرَى تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاءِ} (আমি আপনার মুখমণ্ডলকে আকাশের দিকে বারবার ফেরাতে দেখছি।)" এরপর থেকে এই আয়াত পর্যন্ত: "{فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُ} (সুতরাং তোমরা তোমাদের মুখমণ্ডল তার (কাবা শরীফের) দিকে ফেরাও।)" [সূরা বাকারা: ১৪৪]। এতে ইহুদিরা সন্দেহ পোষণ করল এবং বলল: "{مَا وَلَّاهُمْ عَنْ قِبْلَتِهِمُ الَّتِي كَانُوا عَلَيْهَا} (কীসে তাদের এমন কিবলা থেকে ফিরিয়ে দিল, যার ওপর তারা ছিল?)" তখন আল্লাহ তা'আলা নাযিল করলেন: "{قُلْ لِلَّهِ الْمَشْرِقُ وَالْمَغْرِبُ} (বলো! পূর্ব ও পশ্চিম আল্লাহরই।)" [সূরা বাকারা: ১৪২]। এবং তিনি বললেন: "{فَأَيْنَمَا تُوَلُّوا فَثَمَّ وَجْهُ اللَّهِ} (তোমরা যেদিকেই মুখ ফেরাও না কেন, সেদিকেই আল্লাহর মুখ (সন্তুষ্টি)।)" [সূরা বাকারা: ১১৫]।
1878 - عن أبي هريرة، أنَّ رجلًا دخل المسجد فصلّى، ثمّ جاء فسلَّم على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. فذكر الحديث، وقال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قمت إلى الصّلاة فأسبغ الوضوء، ثمّ استقبل القبلة، فكبِّر …" الحديث بطوله.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6667)، ومسلم في الصّلاة (397: 46) كلاهما من حديث أبي أسامة، حَدَّثَنَا عبيد الله بن عمر، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة، فذكره في حديث طويل وسيأتي.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি মসজিদে প্রবেশ করল এবং সালাত আদায় করল। এরপর সে এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম জানাল। অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন এবং বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যখন তুমি সালাতের জন্য দাঁড়াবে, তখন পূর্ণভাবে উযু করবে, অতঃপর কিবলামুখী হবে এবং তাকবীর বলবে..." [সম্পূর্ণ হাদীসটি রয়েছে।]
1879 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما بين المشرق والمغرب قبلة".
حسن: رواه الترمذيّ (342)، وابن ماجة (1011) كلاهما من حديث أبي معشر، عن محمد
ابن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
قال الترمذيّ:"وقد تكلم بعض أهل العلم في أبي معشر من قبل حفظه، واسمه"نجيح" مولى بني هاشم، قال محمد: لا أروي عنه شيئًا. وقد روى عنه الناس".
قلت: نَجيح هو ابن عبد الرحمن السنديّ ضعيف عند جمهور أهل العلم.
ولكن قال ابن عدي:"حدّث عنه الثّقات، ومع ضعَّفه بكتب حديثه".
إِلَّا أنَّ الحديث قد جاء من وجه آخر وهو ما رواه الترمذيّ (344) عن الحسن بن أبي بكر المروزيّ، حَدَّثَنَا المعلى بن منصور، حَدَّثَنَا عبد الله بن جعفر المخزوميّ، عن عثمان بن محمد الأخنسيّ، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره. قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
ونقل عن البخاريّ أنه قال:"حديث عبد الله بن جعفر المخزوميّ، عن عثمان بن محمد الأخنسيّ، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة أقوى من حديث أبي معشر وأصح".
قلت: فيه عثمان بن محمد الأخنسي مختلف فيه، فوثقه ابن معين والبخاريّ، وضعّفه النسائيّ.
أظن هذا التضعيف ليس على إطلاقه، وإنما وقع ذلك في أحاديثه عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة.
قال ابن المديني:"رُوي عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة أحاديث مناكير".
وحديثنا هذا ليس من رواية سعيد بن المسيب، ولعله لذلك حكم عليه الترمذيّ بأنه حسن صحيح. وللعلماء فيه كلام كثير، وهذه خلاصته.
فإذا ضُم هذا بالذي قبله يُحسن؛ لأنه ليس في حديثه ما ينكر عليه.
وهذا حكم خاص لأهل المدينة ومن على خطّهم شمالًا وجنوبًا، فإنَّ قبلتهم بين المشرق والمغرب.
وأمّا ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"ما بين المشرق والمغرب قبلة" فالصحيح أنه موقوف على عمر، فقد رواه جماعة منهم حمّاد بن سلمة وزائدة ابن قدامة ويحيى بن سعيد القطان وغيرهم، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، عن عمر من قوله. كما قال البيهقيّ (2/ 9).
فقد رواه الدَّارقطنيّ (1061)، والحاكم (1/ 206) وعنه البيهقيّ (2/ 9) من طريق يزيد بن هارون، أخبرنا محمد بن عبد الرحمن بن مجبر، عن نافع، عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
وقد سئل أبو زرعة عن هذا الحديث، فقال:"هذا وهم، الحديث حديث ابن عمر موقوف" العلل لابن أبي حاتم (528). وقال البيهقيّ: تفرّد به ابن مجبر.
ولكن للحديث إسناد آخر وهو ما أخرجه الدَّارقطنيّ (1060)، والحاكم وعنه البيهقيّ من طريق يعقوب بن يوسف الواسطيّ، عن شعيب بن أيوب، ثنا عبد الله بن نمير، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، (فذكر الحديث).
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشّيخين، فإن شعيب بن أيوب ثقة، وقد أسنده".
ولكن قال البيهقيّ:"تفرّد به يعقوب بن يوسف الخلال، والمشهور رواية الجماعة …" فذكره كما سبق.
وقال:"ورُوي عن أبي هريرة مرفوعًا. ورُوي عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي قلابة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا. ورُوي عن عليّ وابن عباس من قولهما. والمراد به أهل المدينة ومن كان قبلته على سمت أهل المدينة، فيما بين المشرق والمغرب، يطلب قبلتهم، ثمّ يطلب عينها" انتهى.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মাশরিক (পূর্ব) ও মাগরিবের (পশ্চিম) মধ্যবর্তী স্থান হলো কিবলা।"
1880 - عن أسامة بن زيد أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لما دخل البيت دعا في نواحيه كلها، ولم يُصلِّ فيه حتَّى خرج. فلمّا خرج ركع في قُبُل البيت ركعتين، وقال:"هذه القبلة".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1330) من طريق محمد بن بكر، عن ابن جريج، قال: قلت لعطاء: أسمعت ابن عباس يقول: إنّما أمرتم بالطواف، ولم تؤمروا بدخوله، قال: لم يكن ينهي عن دخوله، ولكني سمعتُ يقول: أخبرني أسامة بن زيد يقول فذكر الحديث.
ولكن رواه البخاريّ في الصّلاة (398) من طريق عبد الرزّاق، قال: أخبرنا ابن جريج، عن عطاء قال: سمعت ابن عباس قال: لما دخل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم البيت دعا في نواحيه كلها، ولم يُصلِّ حتَّى خرج منه، فلمّا خرج ركع ركعتين في قُبُل الكعبة وقال:"هذه القبلة" فجعل الحديث من مسند ابن عباس.
ورجَّح الحافظ ابن حجر أن يكون من مسند أسامة.
والنفي لا يعارض ما رواه بلال من صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في داخل الكعبة، وسيأتي الجمع بينهما في كتاب الحج إن شاء الله تعالى.
وعمرو بن قيس هذا، اختلفت نسخ أبي داود الطيالسيّ، فقيل هكذا، وقيل: عمر بن قيس، وهو الذي في سن البيهقي.
وعمرو بن قيس ثقة، وعمر بن قيس وهو المعروف بسندل المكي متروك الحديث.
وقد رجّح أكثر العلماء بأنه عمر بن قيس المكي الضعيف.
ثمّ آفته شيخهما وهو عاصم بن عبيد الله وهو ابن عاصم بن عمر بن الخطّاب العدوي ضعيف باتفاق أهل العلم. قال البخاريّ وأبو حاتم:"منكر الحديث".
وقال العقيلي في ترجمة أشعث بن سعيد السمان:"بأنه منكر الحديث. وحديث عامر بن ربيعة ليس يروي من جهة يثبت متنه".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن جابر، قال: كنا نصلي مع رسول الله في مسير - أو سير -، فأظل لنا غيم، فتحيرنا فاختلفنا في القبلة. فصلّي كلّ واحد منا على حدة، فجعل كل واحد منا يخط بين يديه لنعلم أمكنتنا، فذكرنا ذلك للنبيّ صلى الله عليه وسلم فلم يأمرنا بالإعادة وقال:"قد أجزأتْ صلاتُكم".
رواه الدَّارقطنيّ (1064)، والحاكم (1/ 206)، والبيهقي (2/ 10) كلّهم من طريق داود بن عمرو الضبيّ، ثنا محمد بن يزيد الواسطيّ، عن محمد بن سالم، عن عطاء، عن جابر، فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث محتج برواته كلّهم غير محمد بن سالم فإني لا أعرفه بعدالة ولا جرح، وقد تأملت كتاب الشّيخين، فلم يخرجا في هذا الباب شيئًا".
وتعقبه الذّهبيّ، فقال:"هو أبو سهل واهٍ".
قلت: محمد بن سالم أبو سهل الهمداني ضعيف باتفاق أهل العلم حتَّى قال الدَّارقطنيّ:"إنَّه متروك الحديث".
وقال البيهقيّ:"محمد بن سالم، ومحمد بن عبد الله العرزميّ عن عطاء، وهما ضعيفان، وله أسانيد أخرى ولا نصح".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن معاذ بن جبل، قال: صلينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في يوم غيم في سفر إلى غير القبلة، فلمّا قضى الصّلاة وسلَّم، تجلَّت الشّمس، فقلنا: يا رسول الله صلينا إلى غير القبلة! فقال:"قد رفعتْ صلاتُكم بحقِّها إلى الله عز وجل".
رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (248) عن أحمد بن رشدين، حَدَّثَنَا هشام بن سلّام البصريّ، قال: حَدَّثَنَا أبو داود الطيالسيّ، قال: حَدَّثَنَا إسماعيل بن عبد الله السكونيّ، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن أبيه، عن معاذ، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 15):"فيه أبو عبلة والد إبراهيم ذكره ابن حبان في"الثّقات" (4/ 367) واسمه شمر بن يقظان".
قلت: أبو عبلة لم يرو عنه إِلَّا ابنه، ولم يوثقه أحد فهو في عداد المجهولين.
وفيه شيخ الطبرانيّ أحمد بن رشدين وهو أحمد بن محمد بن الحجاج بن رشدين أبو جعفر المصري المهري كذَّبوه، له ترجمة في"الكامل" (1/ 201)، والميزان، واللسان (1/ 594).
وقد قال البيهقيّ: ولم نعلم لهذا الحديث إسنادًا صحيحًا قويًّا، وذلك لأنَّ عاصم بن عبيد الله بن عمر العمري ومحمد بن عبيد الله العرزمي ومحمد بن سالم السكوني كلّهم ضعفاء".
قال الترمذيّ عقب حديث عامر بن ربيعة:"وقد ذهب أكثر أهل العلم إلى هذا. قالوا: إذا صلى في الغيم لغير القبلة ثمّ استبان له بعد ما صلى أنه صلى لغير القبلة، فإن صلاته جائزة. وبه يقول سفيان الثوريّ، وابن المبارك، وأحمد، وإسحاق" انتهى. وبه قال أيضًا أبو حنيفة وأصحابه.
وذهب مالك والشافعي إلى أنه يعيد الصّلاة إذا لم يخرج وقتها.
উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (কাবার) ঘরে প্রবেশ করলেন, তখন এর সকল কোণে দুআ করলেন, কিন্তু তিনি তা থেকে বের হওয়া পর্যন্ত ভেতরে সালাত আদায় করেননি। অতঃপর যখন তিনি বের হলেন, তখন কাবার দিকে মুখ করে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন এবং বললেন: “এটাই কিবলা।”