হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (208)


208 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه تجاوز عن أُمّتي ما حدَّثتْ به
أنفسُها ما لم تعمل أو تتكلّم".

قال قتادة:"إذا طلّق في نفسه فليس بشيء".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الطّلاق (5269)، ومسلم في الإيمان (127) كلاهما من طريق هشام، حدثنا قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن أبي هريرة، فذكره، ولفظهما سواء إِلَّا أَنَّ مسلمًا لم يذكر قولَ قتادة.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা আমার উম্মতের জন্য তাদের অন্তরে উদিত হওয়া (কুচিন্তা বা খেয়াল) বিষয়গুলো ক্ষমা করে দিয়েছেন, যতক্ষণ না তারা সে অনুযায়ী কাজ করে অথবা (মুখে) কথা বলে।”

কাতাদা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: “যদি কেউ মনে মনে (স্ত্রীকে) তালাক দেয়, তবে তা কোনো কিছু (ধর্তব্য) নয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (209)


209 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"نحن أحقُّ بالشّك من إبراهيم إذ قال: {رَبِّ أَرِنِي كَيْفَ تُحْيِ الْمَوْتَى قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِنْ قَالَ بَلَى وَلَكِنْ لِيَطْمَئِنَّ قَلْبِي} [سورة البقرة: 260]، ويرحم اللَّه لوطًا لقد كان يأوي إلى ركن شديد. ولو لبثتُ في السِّجن طولَ ما لبث يوسفُ لأجبتُ الدَّاعيَ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأنبياء (3372)، ومسلم في الفضائل (2370: 152) كلاهما من حديث ابن وهب، قال: أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، وسعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.

وقوله:"لأجبتُ الدّاعي" أي لأسرعتُ الإجابة في الخروج من السّجن.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সন্দেহের ব্যাপারে আমরা ইবরাহীম (আঃ)-এর চেয়ে অধিক হকদার। যখন তিনি (ইবরাহীম আঃ) বলেছিলেন: "হে আমার প্রতিপালক, আমাকে দেখান, কীভাবে আপনি মৃতকে জীবিত করেন।" আল্লাহ বললেন: "তুমি কি বিশ্বাস করো না?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, বিশ্বাস করি, কিন্তু আমার অন্তরকে প্রশান্ত করার জন্য।" (সূরা বাকারা: ২৬০) আর আল্লাহ লূত (আঃ)-এর প্রতি রহম করুন। তিনি অবশ্যই এক সুদৃঢ় স্তম্ভের আশ্রয় নিতে চেয়েছিলেন। আর যদি আমি ইউসুফ (আঃ)-এর মতো দীর্ঘকাল কারাগারে থাকতাম, তাহলে অবশ্যই আমি আহ্বানকারীর ডাকে সাড়া দিতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (210)


210 - عن أبي هريرة، قال: جاء ناسٌ من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم فسألوه: إنَّا نجد في أنفسنا ما يتعاظم أحدُنا أن يتكلَّم به! ؟ قال:"وقد وجدتموه؟" قالوا: نعم! قال:"ذاك صريحُ الإيمان".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (132) عن زهير بن حرب، حدثنا جرير، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (9876)، وابن منده في الإيمان (341)، وصحّحه ابنُ حبان (146) كلّهم من طريق شعبة، عن عاصم بن بهدلة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة: أنَّهم قالوا: يا رسول اللَّه، إنَّا لنجد في أنفسنا شيئًا لأَنْ يكون حُمَّمة أحبّ إليه من أن يتكلَّم به! . قال:"ذاك محض الإيمان".

وهذا إسناد حسن من أجل عاصم بن بهدلة، فإنّه حسن الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে কিছু লোক তাঁর নিকট এসে জিজ্ঞেস করলেন: "আমরা আমাদের অন্তরে এমন কিছু চিন্তা অনুভব করি, যা নিয়ে কথা বলতে আমাদের কেউ কেউ (ভয়ে) অত্যন্ত গুরুতর মনে করে!" তিনি বললেন: "তোমরা কি সত্যিই তা অনুভব করেছ?" তাঁরা বললেন: "হ্যাঁ!" তিনি বললেন: "এটাই হচ্ছে খাঁটি ঈমান।"









আল-জামি` আল-কামিল (211)


211 - عن عبد اللَّه، قال: سئل النّبيُّ صلى الله عليه وسلم عن الوسوسة، قال:"تلك محض الإيمان".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (133) عن يوسف بن يعقوب الصفّار، حدَّثني عليّ بن عثَّام، عن سُعير بن الخِمْس، عن مغيرة بن مقسم، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد اللَّه، فذكر الحديث.

ورواه البغويّ في"شرحه" (59) من وجه آخر عن محمد بن عبد الوهاب، قال: سمعتُ عليّ
ابن عثّام، يقول: أتيتُ سعير بن الخمس، فسألته عن حديث الوسوسة فلم يحدّثني، فأدبرتُ أبكي، ثم لقيني، فقال لي: تعالَ، حدثنا مغيرة، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد اللَّه، قال: سألنا رسول اللَّه عن الرّجل يجدُ الشّيء، لو خرَّ من السَّماء فتخطفه الطّير كان أحبَّ إليه من أن يتكلَّم به؟ قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"ذلك محضُ -أو صريح- الإيمان" انتهى.

قال الخطّابي:"قوله:"صريح الإيمان" معناه أنّ صريح الإيمان هو الذي يمنعكم من قبول ما يلقيه الشّيطان في أنفسكم، والتصديق به، وليس معناه أنّ الوسوسةَ نفسَها صريحُ الإيمان، وذلك أنها إنّما تتولّد من فعل الشّيطان وتسويله، فكيف يكون إيمانًا صريحًا، وروي في حديث آخر أنّهم لما شكوا إليه ذلك قال:"الحمد للَّه الذي ردّ كيده إلى الوسوسة". وهو حديث ابن عباس الآتي.

وقال النّوويّ:"معناه استعظامكم الكلام به هو صريح الإيمان، فإنّ استعظام هذا وشدّة الخوف منه، ومن النَّطق به فضلًا عن اعتقاده إنّما يكون لمن استكمل الإيمان استكمالًا محقّقًا، وانتفت عنه الرّيبة والشّكوك".




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এমন ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম, যে (অন্তরে) এমন কিছু অনুভব করে যে, যদি সে আকাশ থেকে পড়ে যায় এবং পাখি তাকে ছিনিয়ে নিয়ে যায়, তবুও সে বিষয়টি মুখে উচ্চারণ করার চেয়ে তা তার কাছে অধিক প্রিয়। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা খাঁটি—অথবা স্পষ্ট—ঈমান।"









আল-জামি` আল-কামিল (212)


212 - عن ابن عباس قال: جاء رجلٌ إلى النّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسولَ اللَّه إنّ أحدنا يجدُ في نفسه -يُعرِّض بالشيء- لأن يكون حُمَمَةً أحبُّ إليه من أن يتكلّم به. فقال:"اللَّه أكبر! اللَّه أكبر! اللَّه أكبر! الحمد للَّه الذي ردّ كيده إلى الوسوسة".

صحيح: رواه أبو داود (5112) عن عثمان بن أبي شيبة، وابن قدامة بن أعين، قالا: حدثنا جرير، عن منصور، عن ذر، عن عبد اللَّه بن شدّاد، عن ابن عباس، فذكره.

قال أبو داود: وقال ابن قدامة بن أعين:"ردّ أمره" مكان"ردّ كيده".

ورواه الإمام أحمد (2097)، وابن منده في الإيمان (345)، وصحّحه ابن حبان (147) كلّهم من حديث منصور بإسناده مثله.

ورواه ابنُ أبي عاصم في"السنة" (658) من وجه آخر بإسناد حسن عن ابن عباس، به، مثله.

وقوله:"الحمد للَّه الذي ردّ كيده. . ." أي كيد الشّيطان إلى الوسوسة التي لا يؤاخذ بها المرء، ولم يُمكنه من غير الوسوسة، وإلّا لسعى فيه كما يسعى في الوسوسة، بل جعل ذلك في يد الإنسان، فلذلك امتنع من التكلم" قاله السِّنديّ.

وروى أبو داود (5110) بإسناد قوي عن أبي زميل قال: سألت ابن عباس فقلت: ما شيء أجده في صدري؟ قال: ما هو؟ قلت: واللَّه ما أتكلم به، قال: فقال لي: أشيء من شك؟ قال: وضحك قال: ما نجا من ذلك أحد حتى أنزل اللَّه عز وجل: {فَإِنْ كُنْتَ فِي شَكٍّ مِمَّا أَنْزَلْنَا إِلَيْكَ فَاسْأَلِ الَّذِينَ يَقْرَءُونَ الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِكَ} الآية [سورة يونس: 94]. قال: فقال لي: إذا وجدت في نفسك شيئًا فقل: {هُوَ الْأَوَّلُ وَالْآخِرُ وَالظَّاهِرُ وَالْبَاطِنُ وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ} [الحديد: 3].




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের কেউ কেউ তার মনে এমন কিছু অনুভব করে - সে বিষয়টির প্রতি ইঙ্গিত করল - যে বিষয়ে কথা বলার চেয়ে সে অঙ্গার হয়ে যাওয়াকে বেশি পছন্দ করে। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহু আকবার! আল্লাহু আকবার! আল্লাহু আকবার! সকল প্রশংসা সেই আল্লাহর, যিনি তার ষড়যন্ত্রকে শুধু কুমন্ত্রণার (ওয়াসওয়াসার) দিকে ফিরিয়ে দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (213)


213 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لم يكذب إبراهيم قط إِلَّا ثلاث كذبات، ثنتين في ذات اللَّه: قوله {إِنِّي سَقِيمٌ} [سورة الصّافات: 89]، وقوله: {قَالَ بَلْ فَعَلَهُ كَبِيرُهُمْ هَذَا} [سورة الأنبياء: 63]-وفي شأن سارة-:"إنّكِ أختي" وذكر الحديث.

متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب الأنباء (3358)، ومسلم في كتاب الفضائل (2371) كلاهما من حديث أيوب السختياني، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ইবরাহীম (আঃ) কখনও মিথ্যা বলেননি, তবে তিনটি মিথ্যা ব্যতীত। এর দুটি ছিল আল্লাহর সন্তুষ্টির জন্য: তাঁর বাণী, {আমি অসুস্থ} [সূরা সাফফাত: ৮৯], এবং তাঁর বাণী, {তিনি (ইবরাহীম) বললেন, বরং এদের এই বড়টাই একাজ করেছে} [সূরা আম্বিয়া: ৬৩]। আর সারাহ (আঃ)-এর ব্যাপারে (তাঁর উক্তি ছিল): "নিশ্চয় তুমি আমার বোন।" এবং হাদীসটি উল্লেখ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (214)


214 - عن أبي هريرة، قال: بعث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عشرة منهم خبيب الأنصاريّ، فأخبرني عبيد اللَّه بن عياض، أنّ ابنة الحارث أخبرته أنَّهم حين اجتمعوا استعار منها موسى يستحدّ بها، فلما خرجوا من الحرم ليقتلوه قال خبيب الأنصاريّ:

ولست أبالي حين أقتل مسلمًا … على أي شق كان اللَّه مصرَعي

وذلك في ذات الإله وإن يشأ … يبارك على أوصال شِلو ممزّع

فقتله ابن الحارث، فأخبر النّبيُّ صلى الله عليه وسلم أصحابّه خبرهم يوم أصيبوا.

صحيح: رواه البخاريّ في التوحيد (7402) وبوّب عليه: ما يُذكر في الذّات والنّعوت وأسامي اللَّه عز وجل عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزّهريّ، أخبرني عمرو بن أبي سفيان بن أسيد ابن خارجة الثّقفيّ حليف لبني زهرة وكان من أصحاب أبي هريرة، أنّ أبا هريرة قال (فذكره).

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس: فكّروا في كلِّ شيء، ولا تفكِّروا في ذات اللَّه، فإنّ بين السّماء السّابعة إلى كرسيّه ألف نور، وهو فوق ذلك.

فهو موقوف ضعيف. رواه أبو جعفر بن أبي شيبة في كتاب"العرش" (16) واللّفظ له، من طريق خالد بن عبد اللَّه، وأبو الشّيخ في"العظمة" (1/ 214)، والبيهقيّ في"الأسماء والصّفات" (618) كلاهما من طريق عليّ بن عاصم الواسطيّ -كلاهما أعني خالدًا وعاصمًا- عن عطاء بن السّائب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

وفي"العظمة": سبعة آلاف سنةٍ نور، وفي"الأسماء والصفات" مختصرًا جدًّا، ولفظه: تفكّروا في كلّ شيء، ولا تفكّروا في ذات اللَّه.

وإسناده ضعيف -مع وقفه- من أجل عطاء بن السّائب فإنه اختلط، وخالد وعاصم رويا عنه في حال اختلاطه، وقد رُوي مرفوعًا وهو ضعيف أيضًا.

ولكن معناه صحيح؛ لأنّنا أُمرنا بالتفكير واستعمال النّظر في خلق اللَّه، وقد أثنى اللَّه سبحانه وتعالى على الذين يتفكّرون في خلق السموات والأرض، فقال تعالى: {إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ
وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآيَاتٍ لِأُولِي الْأَلْبَابِ (190) الَّذِينَ يَذْكُرُونَ اللَّهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَى جُنُوبِهِمْ وَيَتَفَكَّرُونَ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَذَا بَاطِلًا سُبْحَانَكَ فَقِنَا عَذَابَ النَّارِ} [سورة آل عمران: 190، 191]، وقد ذمّ اللَّه سبحانه وتعالى الذين لا يتفكّرون في خلقه تعالى {أَوَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ كَانُوا مِنْ قَبْلِهِمْ كَانُوا هُمْ أَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةً} [سورة غافر: 21].

وجاء النّهي عن التفكير في ذات اللَّه تعالى في حديث صحيح كما سيأتي.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দশজন ব্যক্তিকে (অভিযানে) প্রেরণ করলেন। তাঁদের মধ্যে খুবাইব আল-আনসারীও ছিলেন।

উবাইদুল্লাহ ইবনু ইয়াদ আমাকে জানিয়েছেন যে, (খুবাইবের বন্দীদশার সময়) আল-হারিসের কন্যা তাকে অবহিত করেন যে, যখন তারা সমবেত হন, তখন খুবাইব তার নিকট থেকে একটি ক্ষুর চেয়ে নিলেন, যা দ্বারা তিনি (শরীরের অবাঞ্ছিত) চুল পরিষ্কার করবেন। যখন তারা খুবাইবকে হত্যা করার জন্য হারামের এলাকা থেকে বাইরে নিয়ে গেল, তখন খুবাইব আল-আনসারী বললেন:

"মুসলিম অবস্থায় যখন আমাকে হত্যা করা হয়, তখন আমি কোনো পরোয়া করি না;
আল্লাহর পথে আমার মৃত্যু কোথায় হয়।
আর এই মৃত্যু তো আল্লাহর সন্তুষ্টির জন্য।
যদি তিনি চান, তবে আমার ছিন্ন-ভিন্ন অঙ্গ-প্রত্যঙ্গের জোড়াসমূহেও বরকত দেবেন।"

অতঃপর হারিসের পুত্র তাকে হত্যা করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে তাদের শহীদ হওয়ার দিনেই তাদের সম্পর্কে খবর জানিয়েছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (215)


215 - عن ابن عباس أنّ معاذًا قال: بعثني رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى اليمن، فقال:"إنّك تأتي قومًا من أهل الكتاب، فادُعهم إلى شهادة أن لا إله إلّا اللَّه، وأنّي رسولُ اللَّه، فإن هم أطاعوا لذلك فأعلمهم أنّ اللَّه افترض عليهم خمس صلوات في كلّ يوم وليلة، فإن هم أطاعوا لذلك فأعلمهم أنّ اللَّه افترض عليهم ضدقة تؤخذ من أغنيائهم فتردُّ في فقرائهم، فإن هم أطاعوا لذلك فإيّاك وكرائمَ أموالهم، واتقِ دعوةَ المظلوم فإنه ليس بينها وبين اللَّه حجاب".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1496)، ومسلم في الإيمان (19) كلاهما من طريق
زكريا بن إسحاق، عن يحيى بن عبد اللَّه بن صيفيّ، عن أبي معبد مولى ابن عباس، عن ابن عباس، فذكره، ولفظهما سواء.

ورواه البخاريّ (7372) عن عبد اللَّه بن أبي الأسود، حدثنا الفضل بن العلاء، ثنا إسماعيل بن أمية، عن يحيى بن عبد اللَّه بن صيفي، أنه سمع أبا معبد يقول: سمعتُ ابن عباس يقول: لما بعث النّبيُّ صلى الله عليه وسلم معاذًا نحو اليمن قال له:"إنّك تقدم على قوم من أهل الكتاب فليكن أوّل ما تدعوهم إلى أن يوحّدوا اللَّه تعالى" ثم ذكر بقية الحديث مثله.

وفي رواية عندهما البخاريّ (1458):"فليكن أوّل ما تدعوهم إليه عبادة اللَّه عز وجل، فإذا عرفوا اللَّه. . . .".

أخرجاه عن شيخ واحد، وهو أميّة بن بِسْطام العيشيّ، عن يزيد بن زريع، عن روح بن القاسم، عن إسماعيل بن أمية، بإسناده مثله.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ইয়ামেনে প্রেরণ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তুমি আহলে কিতাবদের এমন এক সম্প্রদায়ের কাছে যাচ্ছ। সুতরাং তুমি তাদেরকে এই সাক্ষ্যদানের দিকে আহ্বান করবে যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল। যদি তারা এই বিষয়ে তোমার আনুগত্য করে, তবে তুমি তাদেরকে জানিয়ে দেবে যে, আল্লাহ তাদের উপর প্রতি দিন ও রাতে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত ফরয করেছেন। যদি তারা এই বিষয়ে তোমার আনুগত্য করে, তবে তুমি তাদেরকে জানিয়ে দেবে যে, আল্লাহ তাদের উপর যাকাত ফরয করেছেন; যা তাদের ধনীদের কাছ থেকে গ্রহণ করা হবে এবং তাদের দরিদ্রদের মাঝে ফিরিয়ে দেওয়া হবে। যদি তারা এই বিষয়ে তোমার আনুগত্য করে, তবে তাদের উত্তম (বা মূল্যবান) সম্পদ গ্রহণ করা থেকে বিরত থাকবে। আর মজলুমের (অত্যাচারিতের) অভিশাপকে ভয় করবে, কেননা তার এবং আল্লাহর মাঝে কোনো পর্দা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (216)


216 - عن طارق بن أشيم الأشجعيّ، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من قال: لا إله إلا اللَّه، وكفر بما يُعبد من دون اللَّه، حرُم ماله، ودمُه، وحسابُه على اللَّه".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (23) من طرق عن مروان بن معاوية الفزاريّ وغيره، عن أبي مالك سعد بن طارق الأشجعيّ، عن أبيه طارق بن أشيم الأشجعيّ، فذكره.




তারিক ইবনে আশয়াম আল-আশজা‘ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে এবং আল্লাহ ছাড়া যার ইবাদত করা হয়, তাকে অস্বীকার করবে, তার সম্পদ ও রক্ত (হত্যা করা) হারাম হয়ে যাবে। আর তার হিসাব আল্লাহর উপর ন্যস্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (217)


217 - عن زيد بن سلّام، أنّ أبا سلّام حدّثه، أنّ الحارث الأشعريَّ حدّثه، أنّ النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه أمر يحيى بن زكريا بخمس كلماتٍ أن يعمل بها ويأمر بني إسرائيل أن يعملوا بها، وإنه كادَ أن يُبْطئ بها، قال عيسى: إنّ اللَّه أمرك بخمس كلمات لتعمل بها وتأمر بني إسرائيل أن يعملوا بها، فإمّا أن تأمرَهُم وإمّا أنْ آمرَهُم، فقال يحيى: أخشى إن سبقتَني بها أن يُخسفَ بي أو أُعذّب، فجمع الناس في بيت المقدس فامتلأ المسجدُ وتَعدَّوا على الشُّرَف، فقال: إنّ اللَّه أمرني بخمس كلمات أن أعمل بهن وآمركم أن تعملوا بهن.

أوَّلُهن: أن تعبدوا اللَّه ولا تشركوا به شيئًا، وإنَّ مَثَلَ مَنْ أشرك باللَّه كمثل رجل اشترى عبدًا من خالص ماله بذهب أو ورق فقال: هذه داري وهذا عملي، فاعمل وأدِّ إليَّ، فكان يعمل ويؤدي إلى غير سيِّدِه، فأيُّكم يرضى أن يكون عبده كذلك؟ .

وإنّ اللَّه أمَرَكم بالصّلاة فإذا صليتم فلا تلتفتوا، فإنّ اللَّه يَنْصِبُ وجهه لوجه عبده في صلاته ما لم يلتفتْ.

وآمركم بالصِّيام، فإنَّ مَثَلَ ذلك كمثل رجل في عصابة معه صُرَّةٌ فيها مِسْك، فكلُّهم
يَعْجبُ -أو يُعجِبُه ريحُها- وإنَّ ريح الصائم أطيب عند اللَّه من ريح المسك.

وآمركم بالصَّدقة، فإنَّ مَثَلَ ذلك كمثل رجل أَسَرَهُ العَدُوُّ فأوثقوا بده إلى عنقه، وقدّمُوه ليضربوا عُنُقَه فقال: أنا أفديه منكم بالقليل والكثير ففدى نفسه منهم.

وآمركم أن تذكروا اللَّه، فإنّ مَثَلَ ذلك كمثل رجل خرج العدُوُّ في أثره سِرَاعًا حتى إذا أتى على حِصْن حَصِينٍ فأَحْرَز نفسَه منهم، كذلك العبد لا يُحْرِز نفسَه من الشيطان إلا بذكر اللَّه".

قال النّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"وأنا آمركم بخمسٍ اللَّه أمرني بهنّ: السّمع والطّاعة، والجهاد والهجرة، والجماعة، فإنه من فارق الجماعة قيد شبر فقد خلع ربقة الإسلام من عنقه إلا أن يُراجِعَ، ومَنِ ادَّعى دَعْوَى الجاهليّة، فإنّه من جُثا جهنّم". فقال رجل: يا رسول اللَّه، وإن صلّى وصام؟ قال:"وإنْ صلّى وصام، فادْعُوا بدَعْوى اللَّه الذي سَمَّاكُم المسلمين المؤمنين عباد اللَّه".

صحيح: رواه الترمذيّ (2863) عن محمد بن إسماعيل (البخاريّ) حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا أبان بن يزيد، حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلام، أنّ أبا سلّام، حدّثه، فذكر مثله.

قال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح غريب. قال محمد بن إسماعيل (البخاريّ):"الحارث الأشعري له صحبة وله غير هذا الحديثه".

ورواه أيضًا عن محمد بن بشّار، حدّثنا أبو داود الطّيالسيّ، حدّثنا أبان بن يزيد، عن يحيى بن أبي كثير، عن زيد بن سلّام، عن أبي سلّام، عن الحارث الأشعريّ، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، بمعناه.

وقال:"هذا حديث حسن غريب، وأبو سلّام: اسمه ممطور، وقد رواه علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثيره". انتهى.

قلت: ورواه أحمد (17170)، وصحّحه ابن خزيمة (1895)، وابن حبان (6233)، والحاكم (1/ 421) كلّهم من طرق عن يحيى بن أبي كثير، به نحوه.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".




হারিস আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা ইয়াহইয়া ইবনু যাকারিয়া (আঃ)-কে পাঁচটি কথা দ্বারা নির্দেশ দিয়েছেন, যেন তিনি নিজে সেগুলোর ওপর আমল করেন এবং বনী ইসরাঈলকে সেগুলোর ওপর আমল করার নির্দেশ দেন। কিন্তু তিনি তাতে যেন কিছুটা ধীরগতি করছিলেন। তখন ঈসা (আঃ) বললেন: আল্লাহ আপনাকে পাঁচটি কথার নির্দেশ দিয়েছেন, যেন আপনি নিজে সেগুলোর ওপর আমল করেন এবং বনী ইসরাঈলকে সেগুলোর ওপর আমল করার নির্দেশ দেন। হয় আপনি তাদের আদেশ করুন, নতুবা আমি তাদের আদেশ করব। ইয়াহইয়া (আঃ) বললেন: আমি আশঙ্কা করি, আপনি যদি আমার আগে এই আদেশগুলো পৌঁছে দেন, তবে আমি ভূমিধসে চাপা পড়ব বা শাস্তিপ্রাপ্ত হব। এরপর তিনি বায়তুল মুকাদ্দাসে জনগণকে সমবেত করলেন। মসজিদ পরিপূর্ণ হয়ে গেল এবং লোকেরা ছাদের ওপরও উঠে গেল। তখন তিনি বললেন: আল্লাহ তাআলা আমাকে পাঁচটি কথা দ্বারা নির্দেশ দিয়েছেন, যেন আমি নিজে সেগুলোর ওপর আমল করি এবং তোমাদেরকেও সেগুলোর ওপর আমল করার নির্দেশ দিই।

সেগুলোর প্রথমটি হলো: তোমরা আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না। আল্লাহর সাথে যে ব্যক্তি শরীক করে, তার উদাহরণ হলো এমন ব্যক্তির মতো, যে তার খাঁটি মাল দিয়ে সোনা বা রূপা দ্বারা একটি দাস ক্রয় করল। সে তাকে বলল: এটা আমার ঘর, আর এটা আমার কাজ। তুমি কাজ করো এবং আমার কাছে (উপহার) পৌঁছে দাও। কিন্তু সে কাজ করত এবং তার মনিব ছাড়া অন্যকে (উপহার) পৌঁছে দিত। তোমাদের মধ্যে এমন কে আছে, যে তার দাস এরূপ হোক তা পছন্দ করবে?

আর আল্লাহ তোমাদের সালাতের নির্দেশ দিয়েছেন। যখন তোমরা সালাত আদায় করবে, তখন ডানে-বামে দৃষ্টি দেবে না। কেননা আল্লাহ তাআলা সালাতের সময় তাঁর বান্দার মুখের দিকে (রহমতের দৃষ্টিতে) ফেরানো থাকেন, যতক্ষণ না সে অন্যদিকে দৃষ্টি ফেরে।

আমি তোমাদের সাওমের (রোজার) নির্দেশ দিচ্ছি। এর উদাহরণ হলো এমন ব্যক্তির মতো, যে একটি দলের মাঝে আছে এবং তার কাছে একটি থলেতে মিশক (কস্তুরি) আছে। তাদের প্রত্যেকেই অবাক হয়—অথবা এর সুগন্ধি তাকে মুগ্ধ করে। আর রোজাদারের মুখের গন্ধ আল্লাহর কাছে মিশকের গন্ধের চেয়েও বেশি উত্তম।

আর আমি তোমাদের সদকার (দানের) নির্দেশ দিচ্ছি। এর উদাহরণ হলো এমন ব্যক্তির মতো, যাকে শত্রুরা ধরে নিয়ে গেল এবং তার হাত তার গর্দানের সঙ্গে বেঁধে ফেলল। এরপর তাকে হত্যা করার জন্য এগিয়ে নিয়ে গেল। তখন সে বলল: আমি তোমাদের কাছে অল্প বা বেশি কিছুর বিনিময়ে নিজেকে মুক্ত করতে চাই। অতঃপর সে তাদের কাছ থেকে নিজেকে মুক্ত করল (মুক্তিপণের মাধ্যমে)।

আর আমি তোমাদের আল্লাহর যিকির (স্মরণ) করার নির্দেশ দিচ্ছি। এর উদাহরণ হলো এমন ব্যক্তির মতো, যার পিছু দ্রুত গতিতে শত্রুরা ধাওয়া করছে। অবশেষে যখন সে একটি মজবুত দুর্গে প্রবেশ করল, তখন সে তাদের হাত থেকে নিজেকে রক্ষা করতে সক্ষম হলো। অনুরূপভাবে, আল্লাহর যিকির ব্যতীত বান্দা শয়তানের হাত থেকে নিজেকে রক্ষা করতে পারে না।"

নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমিও তোমাদের পাঁচটি বিষয়ের নির্দেশ দিচ্ছি, যা আল্লাহ আমাকে নির্দেশ দিয়েছেন: শোনা ও আনুগত্য করা, জিহাদ, হিজরত এবং জামাআতকে ধরে থাকা। কারণ, যে ব্যক্তি জামাআত থেকে এক বিঘত পরিমাণও সরে গেল, সে যেন তার গলা থেকে ইসলামের রজ্জু খুলে ফেলল, যতক্ষণ না সে প্রত্যাবর্তন করে। আর যে ব্যক্তি জাহেলিয়াতের (অন্ধকার যুগের) আহ্বান করে, সে জাহান্নামের কয়লার স্তূপের অংশ।" তখন এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল: "হে আল্লাহর রাসূল! যদি সে সালাত আদায় করে এবং রোজা রাখে তবুও?" তিনি বললেন: "যদি সে সালাত আদায় করে এবং রোজা রাখে তবুও। সুতরাং তোমরা আল্লাহর আহ্বানেই আহ্বান করো, যিনি তোমাদের মুসলিম, মুমিন, ও আল্লাহর বান্দা হিসেবে নামকরণ করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (218)


218 - عن أبي ذرّ، قال: سألتُ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم: أيّ العمل أفضل؟ قال:"إيمان باللَّه، وجهاد في سبيله، قلت: فأيُّ الرّقاب أفضل؟ قال:"أغلاها ثمنًا، وأنفسُها عند أهلها". قلت: فإن لم أفعل؟ قال:"تعين صانعًا، أو تصنع لأخرق" قال: فإن لم أفعل:"تدع النّاسَ من الشّر، فإنّها صدقة، تصدّق بها على نفسك".

متفق عليه: رواه البخاريّ في العتق (2518)، ومسلم في الإيمان (84) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن أبي مراوح، عن أبي ذرّ، فذكر الحديث، واللّفظ للبخاريّ.

وفي لفظ لمسلم:"تَكُفُّ شرَّك عن النّاس، فإنّها صدقةٌ منك على نفسك".




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: কোন্ আমল সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "আল্লাহর প্রতি ঈমান এবং তাঁর পথে জিহাদ।" আমি বললাম: তাহলে কোন্ গোলাম আযাদ করা সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "যা মূল্যের দিক থেকে সবচেয়ে দামি এবং তার মালিকদের কাছে যা সবচেয়ে প্রিয়।" আমি বললাম: যদি আমি তা করতে না পারি? তিনি বললেন: "তুমি কোনো কারিগরকে সাহায্য করবে, অথবা আনাড়ি ব্যক্তির জন্য কিছু কাজ করে দেবে।" আমি বললাম: যদি আমি এটাও না করতে পারি? তিনি বললেন: "তুমি তোমার অনিষ্ট থেকে লোকদেরকে বিরত রাখবে। কারণ এটাও একটি সাদাকা, যা তুমি তোমার নিজের উপর সাদাকা করলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (219)


219 - عن عبد اللَّه بن مسعود، قال: سألت النّبيّ صلى الله عليه وسلم: أيُّ الذّنب أعظمُ عند اللَّه؟ قال:"أن تجعل اللَّه نِدًّا وهو خلقك" قلت: إنّ ذلك لعظيم، قلت: ثم أيٌّ؟ قال:"وأن تقتل ولدَك تخاف أن يَطْعَم معك" قلت: ثم أيٌّ؟ قال:"أن تُزاني حليلة جارك".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4477)، ومسلم في الإيمان (86) كلاهما عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن عمرو بن شرحبيل، عن عبد اللَّه، فذكره، ولفظهما سواء.

ورواه الشّيخان أيضًا: البخاريّ (4761، 6001، 6861، 7532)، ومسلم كلاهما من طرق عن جرير، به، وزاد في آخر الحديث:"فأنزل اللَّه عز وجل تصديقها: {وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ يَلْقَ أَثَامًا} [الفرقان: 68]".




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: আল্লাহর কাছে সবচেয়ে বড় গুনাহ কোনটি? তিনি বললেন: "তুমি আল্লাহর সাথে কাউকে শরীক করবে, অথচ তিনিই তোমাকে সৃষ্টি করেছেন।" আমি বললাম: নিশ্চয় এটি খুবই গুরুতর। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: তারপর কোনটি? তিনি বললেন: "আর এই ভয়ে তোমার সন্তানকে হত্যা করা যে, সে তোমার সাথে আহার করবে।" আমি বললাম: তারপর কোনটি? তিনি বললেন: "তোমার প্রতিবেশীর স্ত্রীর সাথে যেনা (ব্যভিচার) করা।"

মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী (৪৪৭৭) ও মুসলিম (৮৬) উভয়েই উসমান ইবনে আবি শাইবা থেকে, তিনি জারীর থেকে, তিনি মানসূর থেকে, তিনি আবূ ওয়াইল থেকে, তিনি আমর ইবনে শুরাহবীল থেকে, তিনি আবদুল্লাহ (ইবনে মাসঊদ) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন, এবং উভয়ের শব্দ একই।

শাইখান (বুখারী ৪৭৬১, ৬০০১, ৬৮৬১, ৭৫৩২ ও মুসলিম) উভয়েই জারীর থেকে বিভিন্ন সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। হাদীসের শেষে অতিরিক্ত রয়েছে যে: "এরপর আল্লাহ তা'আলা এর সত্যতা প্রমাণ করে নাযিল করেন: 'আর তারা হল যারা আল্লাহর সাথে অন্য কোনো ইলাহকে ডাকে না এবং আল্লাহ যার হত্যা নিষিদ্ধ করেছেন, যথার্থ কারণ ছাড়া তাকে হত্যা করে না, আর তারা যেনা করে না। আর যে ব্যক্তি এসব করবে, সে শাস্তি ভোগ করবে।' [সূরা ফুরকান: ৬৮]।"









আল-জামি` আল-কামিল (220)


220 - عن وعن عبد اللَّه قال: لما نزلتْ {الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُمْ بِظُلْمٍ} [سورة الأنعام: 82] شقّ ذلك على أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وقالوا: أيّنا لا يظلم نفسه؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ليس هو كما تظنون، إنّما هو كما قال لقمان لابنه: {يَابُنَيَّ لَا تُشْرِكْ بِاللَّهِ إِنَّ الشِّرْكَ لَظُلْمٌ عَظِيمٌ} [سورة لقمان: 13]".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3360)، ومسلم في الإيمان (124) كلاهما من حديث الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد اللَّه. . . فذكر الحديث، ولفظهما سواء.

وسُمّي الشّرك ظلمًا؛ لأنّ أصل الظّلم: هو وضع الشيء في غير موضعه، ومن أشرك فقد جعل للَّه ندًّا، وهو من أعظم الظّلم.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "যারা ঈমান এনেছে এবং তাদের ঈমানকে যুলমের (অন্যায়) সাথে মিশ্রিত করেনি।" [সূরা আল-আনআম: ৮২], বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবিদের জন্য কঠিন মনে হলো। তাঁরা বললেন: আমাদের মধ্যে এমন কে আছে, যে নিজের উপর যুলম করে না? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বিষয়টি এমন নয় যেমন তোমরা মনে করছো। বরং তা হলো তেমনই যেমন লুকমান তার পুত্রকে বলেছিলেন: 'হে আমার প্রিয় বৎস, আল্লাহর সাথে কাউকে শরীক করো না। নিশ্চয়ই শিরক হচ্ছে চরম যুলম (মহাবিপর্যয়)।' [সূরা লুকমান: ১৩]"

এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি বর্ণনা করেছেন আহাদীসুল আম্বিয়া (৩৩৬০) গ্রন্থে এবং ইমাম মুসলিম বর্ণনা করেছেন ঈমান (১২৪) গ্রন্থে। তাঁরা উভয়েই আল-আ'মাশ থেকে, তিনি ইবরাহীম থেকে, তিনি আলকামা থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ থেকে... হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। উভয়ের শব্দ প্রায় অভিন্ন।

আর শিরককে যুলম বলা হয়েছে; কারণ যুলমের মূল অর্থ হলো কোনো বস্তুকে তার স্থান ছাড়া অন্য স্থানে স্থাপন করা। যে ব্যক্তি শিরক করে, সে আল্লাহ তা'আলার জন্য অংশীদার স্থাপন করে, আর এটিই সবচেয়ে বড় যুলম।









আল-জামি` আল-কামিল (221)


221 - عن أبي بكرة، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"ألا أُنبّئكم بأكبر الكبائر؟" ثلاثًا. قالوا:
بلي يا رسول اللَّه. قال:"الإشراك باللَّه، وعقوق الوالدين" وجلس وكان متكئًا فقال:"ألا وقول الزّور". قال: فما زال يكرِّرها حتى قلنا: ليته سكت. متفق عليه: رواه البخاريّ في الشهادات (2654)، ومسلم في الإيمان (87) كلاهما من طريق سعيد الجريريّ، حدثنا عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه، فذكره.

وأبو بكرة أسمه نفيع بن الحارث الثقفيّ، سكن البصرة، ومات فيها سنة إحدى وخمسين.




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি কি তোমাদেরকে সবচেয়ে বড় কবীরা গুনাহগুলো সম্পর্কে অবহিত করব না?— তিনি এই কথাটি তিনবার বললেন। তাঁরা বললেন: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি বললেন: আল্লাহর সাথে শিরক করা এবং পিতা-মাতার অবাধ্য হওয়া। তিনি হেলান দিয়ে বসেছিলেন, এরপর সোজা হয়ে বসলেন এবং বললেন: সাবধান! আর মিথ্যা কথা (বলা/সাক্ষ্য দেওয়া)। রাবী বলেন: তিনি এই বাক্যটি বারবার বলতে থাকলেন, এমনকি আমরা বললাম: যদি তিনি নীরব হতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (222)


222 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"اجتنبوا السّبع الموبقات" قالوا: يا رسول اللَّه وما هنّ؟ قال:"الشّرك باللَّه، والسِّحر، وقتل النّفس التي حرّم اللَّه إلّا بالحقّ، وأكل الرّبا، وأكل مال اليتيم، والتّولي يوم الزّحف، وقذف المحصَنات المؤمنات الغافلات".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الوصايا (2766)، ومسلم في الإيمان (89) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، عن ثور بن زيد المدنيّ، عن أبي الغيب، عن أبي هريرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাতটি ধ্বংসাত্মক (মুবিকাত) কাজ থেকে দূরে থাকো।" সাহাবীগণ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! সেগুলো কী কী? তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, যাদু করা, আল্লাহ যে প্রাণ হত্যা করা হারাম করেছেন, ন্যায়সঙ্গত কারণ (হক) ছাড়া তাকে হত্যা করা, সুদ খাওয়া, ইয়াতীমের মাল ভক্ষণ করা, (জিহাদের দিনে) রণক্ষেত্র থেকে পৃষ্ঠপ্রদর্শন করা এবং সতী-সাধ্বী, মুমিন ও সরল নারীদের প্রতি অপবাদ দেওয়া।"









আল-জামি` আল-কামিল (223)


223 - عن عبد اللَّه بن عمرو، قال: جاء أعرابيٌّ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه ما الكبائر؟ قال:"الإشراك باللَّه"، قال: ثم ماذا؟ قال:"ثم عقوق الوالدين"، قال: ثم ماذا؟ قال:"اليمين الغموس" قلت: وما اليمين الغموس؟ قال: الذي يقتطع مال امرئ مسلم هو فيها كاذب".

صحيح: رواه البخاريّ في استتابة المرتدين (6920) عن محمد بن الحسين بن إبراهيم، أخبرنا عبيد اللَّه، أخبرنا شيبان، عن فراس، عن الشعبيّ، عن عبد اللَّه بن عمرو، فذكره.

ورواه أيضًا في الأيمان والنّذور (6675) من وجه آخر عن شعبة، حدثنا فِراس بإسناده، وزاد فيه:"وقتل النّفس".

واليمين الغموس سُمّي غَموسًا؛ لأنّها تغمسُ صاحبها في الإثم، ثم في النّار.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! কাবীরা গুনাহ বা মহাপাপগুলো কী কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহর সাথে শিরক করা। সে বলল: তারপর কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তারপর পিতামাতার অবাধ্য হওয়া। সে বলল: তারপর কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল-ইয়ামিনুল গামূস (মিথ্যা কসম)। (রাবী বলেন,) আমি জিজ্ঞাসা করলাম: আল-ইয়ামিনুল গামূস কী? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এটি হলো— যার মাধ্যমে কোনো মুসলিম ব্যক্তির সম্পদ অন্যায়ভাবে ছিনিয়ে নেওয়া হয়, অথচ সে তাতে মিথ্যা কসমকারী।









আল-জামি` আল-কামিল (224)


224 - عن أنس، قال: سُئل النّبيّ صلى الله عليه وسلم عن الكبائر قال:"الإشراك باللَّه، وعقوق الوالدين، وقتل النّفس، وشهادة الزّور".

وفي رواية:"قول الزّور".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الشّهادات (2653)، ومسلم في الإيمان (88) كلاهما من طريق شعبة، عن عبيد اللَّه بن أبي بكر بن أنس، عن أنس، فذكر الحديث، ولفظهما سواء

وفي رواية عند مسلم: ذكر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الكبائر أو سُئل عن الكبائر، فقال:"الشرك باللَّه، وقتل النفس، وعقوق الوالدين". وقال:"ألا أُنّبئكم بأكبر الكبائر؟" قال:"قول الزّور" أو"شهادة الزّور".

قال شعبة: أكبر ظنّي أنّه"شهادة الزّور".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কবীরা গুনাহসমূহ (মহাপাপসমূহ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, পিতা-মাতার অবাধ্য হওয়া, কোনো আত্মাকে হত্যা করা এবং মিথ্যা সাক্ষ্য দেওয়া।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "মিথ্যা কথা বলা।"

মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবীরা গুনাহসমূহের উল্লেখ করলেন অথবা তাঁকে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, কোনো আত্মাকে হত্যা করা এবং পিতা-মাতার অবাধ্য হওয়া।" তিনি আরও বললেন: "আমি কি তোমাদেরকে সবচেয়ে বড় কবীরা গুনাহ সম্পর্কে অবহিত করব না?" তিনি বললেন: "মিথ্যা কথা বলা" অথবা "মিথ্যা সাক্ষ্য দেওয়া।" (রাবী) শু‘বাহ বলেন: আমার প্রবল ধারণা হলো, তিনি 'মিথ্যা সাক্ষ্য দেওয়া' বলেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (225)


225 - عن أبي أيوب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من عبد يعبد اللَّه لا يُشرك به شيئًا، ويقيم الصّلاة، ويؤتي الزّكاة، ويجتنب الكبائر إلّا دخل الجنّة، فسألوه: ما الكبائر؟ فقال:"الإشراك باللَّه، والفِرار من الزّحف، وقتل النّفس".

حسن: رواه ابن منده في الإيمان (478) عن أحمد بن إسحاق بن أيوب، ثنا يوسف بن يعقوب، ثنا محمد بن أبي بكر، ثنا فُضيل بن سليمان، ثنا موسى بن عقبة، سمع عبيد اللَّه بن سليمان الأغرّ، عن أبيه، عن أبي أيوب، فذكره.

قلت: وإسناده حسن؛ لأنّ فضيل بن سليمان مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث.

وقال ابن منده:"هذا إسناد صحيح ولم يخرّجوه".




আবু আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে কোনো বান্দা আল্লাহর ইবাদত করে, তাঁর সাথে কাউকে শরীক করে না, সালাত প্রতিষ্ঠা করে, যাকাত প্রদান করে এবং কবীরা গুনাহসমূহ পরিহার করে, সে অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে।" অতঃপর তারা তাঁকে জিজ্ঞেস করল: কবীরা গুনাহগুলো কী? তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে শিরক করা, (যুদ্ধের ময়দান থেকে) পলায়ন করা এবং (অন্যায়ভাবে) কাউকে হত্যা করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (226)


226 - عن عُبادة بن الصّامت -وكان شهد بدرًا، وهو أحد النّقباء ليلة العقبة- أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال -وحوله عصابة من أصحابه-:"بايعوني على أن لا تشركوا باللَّه شيئًا، ولا تسرقوا، ولا تزنوا، ولا تقتلوا أولادكم، ولا تأتوا ببهتان تفترونه بين أيديكم وأرجلكم، ولا تعصوا في معروف. فمن وفَّى منكم فأجره على اللَّه، ومن أصاب من ذلك شيئًا فعُوقب في الدّنيا فهو كفّارة له، ومن أصاب من ذلك شيئًا ثم ستره اللَّه فهو إلى اللَّه، إن شاء عفا عنه، وإن شاء عاقبه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (18)، ومسلم في الحدود (1709) كلاهما من حديث الزهريّ، عن أبي إدريس عائذ اللَّه بن عبد اللَّه، أنّ عبادة بن الصّامت قال (فذكر الحديث)، واللّفظ للبخاريّ.

وروياه -البخاريّ (3893) - من وجه آخر عن الصّنابحيّ، عن عبادة بن الصّامت وفيه:"ولا ننتهب، ولا نعصي، فالجنة إن فعلنا ذلك، فإن غشينا من ذلك شيئًا كان قضاءُ ذلك إلى اللَّه".




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, —যিনি বদর যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন এবং আকাবার রাতের নকীবদের (নেতাদের) একজন ছিলেন— যে, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চারপাশে সাহাবীদের একটি দল থাকা অবস্থায় বললেন: "আমার কাছে বাই'আত করো যে, তোমরা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না, চুরি করবে না, ব্যভিচার করবে না, তোমাদের সন্তানদের হত্যা করবে না, এমন কোনো মিথ্যা অপবাদ রটনা করবে না যা তোমরা তোমাদের সামনে ও পায়ের মধ্যখানে সৃষ্টি করো, এবং কোনো ন্যায়সঙ্গত বিষয়ে (নেক কাজে) অবাধ্য হবে না। তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি এই প্রতিশ্রুতি পূর্ণ করবে, তার পুরস্কার আল্লাহর উপর ন্যস্ত। আর যে ব্যক্তি এসবের কোনো একটিতে লিপ্ত হবে এবং দুনিয়াতে তার উপর শাস্তি প্রয়োগ করা হবে, তবে তা তার জন্য কাফ্ফারা হবে। আর যে ব্যক্তি এসবের কোনো একটিতে লিপ্ত হবে, অতঃপর আল্লাহ তাকে গোপন রাখবেন, তার বিষয়টি আল্লাহর ওপর ন্যস্ত; তিনি চাইলে তাকে ক্ষমা করবেন, আর চাইলে শাস্তি দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (227)


227 - عن عائشة قالت: كان النّبيُّ صلى الله عليه وسلم يبايع النّساء بالكلام بهذه الآية: {لَا يُشْرِكْنَ بِاللَّهِ شَيْئًا} [سورة الممتحنة: 12]. قالت: وما مسَّتْ يدُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يدَ امرأةٍ قطّ إلّا امرأةً يملكها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأحكام (7214) عن محمود، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة، فذكرته هكذا مختصرًا.

ورواه ابن منده في الإيمان (493) من طريق عبد الرزاق، بإسناده، مفصّلًا وجاء فيه: قالت عائشة أمُّ المؤمنين: جاءتْ فاطمةُ بنت عتبة بن ربيعة تبايع النّبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخذ عليها: {لَا يُشْرِكْنَ بِاللَّهِ
شَيْئًا} الآية قالت: فوضعتْ يدها على رأسها حتى أقام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأعجب رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم ما رأى منها، فقالت لها عائشة: أقرّي أيتها المرأة، فواللَّه ما بايعنا إلّا على هذا. قالت: نعم إذا، فبايعها بالآية انتهى.

وأخرجه البخاريّ (5288)، ومسلم في الإمارة (1866) من طريق يونس بن يزيد، قال: قال ابن شهاب: أخبرني عروة بن الزبير، أنّ عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم قالت: كانت المؤمنات إذا هاجرن إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يُمتحنَّ بقول اللَّه عز وجل {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا جَاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ عَلَى أَنْ لَا يُشْرِكْنَ بِاللَّهِ شَيْئًا وَلَا يَسْرِقْنَ وَلَايَزْنِينَ} [سورة الممتحنة: 12] قالت عائشة: فمن أقرّ بهذا من المؤمنات فقد أقرّ بالمحنة. وهذا لفظ مسلم.

وزاد البخاريّ: فكان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا أقْررن بذلك من قولهنّ، قال لهنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"انطلقن فقد بايعتكُنّ" لا واللَّه ما مسّتْ يدُ رسول اللَّه يد امرأة قطّ غير أنه بايعهن بالكلام، واللَّه ما أخذ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على النساء إلّا بما أمره اللَّه، يقول لهنّ إذا أخذ عليهنّ:"قد بايعتكنّ" كلامًا.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই আয়াতের মাধ্যমে কেবল কথার দ্বারা নারীদের নিকট থেকে বায়আত গ্রহণ করতেন: {যেন তারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক না করে} [সূরা মুমতাহিনা: ১২]। তিনি (আয়েশা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাত কখনও কোনো নারীর হাত স্পর্শ করেনি, তবে তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যার মালিক ছিলেন (দাসী) ব্যতীত।

অন্য এক বর্ণনায় আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, মুমিন নারীরা যখন হিজরত করে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতেন, তখন আল্লাহ তাআলার এই বাণী দ্বারা তাদের পরীক্ষা নেওয়া হতো: "হে নবী! যখন মুমিন নারীরা তোমার নিকট এসে বায়আত করে যে তারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না, চুরি করবে না, ব্যভিচার করবে না..." [সূরা মুমতাহিনা: ১২]। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যে মুমিন নারী এই কথার স্বীকৃতি দিত, সে পরীক্ষায় উত্তীর্ণ হতো।

বুখারীর বর্ণনায় অতিরিক্ত রয়েছে: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নারীদের কথার মাধ্যমে এর স্বীকৃতি পেয়ে যেতেন, তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে বলতেন: "তোমরা যাও, আমি তোমাদের নিকট থেকে বায়আত গ্রহণ করলাম।" আল্লাহর শপথ! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাত কখনও কোনো নারীর হাত স্পর্শ করেনি; বরং তিনি কথার মাধ্যমে তাদের নিকট থেকে বায়আত গ্রহণ করতেন। আল্লাহর শপথ! আল্লাহ তাঁকে যা আদেশ করেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নারীদের থেকে শুধু তা-ই গ্রহণ করতেন। তিনি বায়আত গ্রহণের সময় তাদেরকে বলতেন: "আমি তোমাদের নিকট থেকে বায়আত গ্রহণ করলাম"— কেবল এই বাক্যটি।