হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1928)


1928 - عن جابر بن عبد الله قال: كان معاذ يُصَلِّي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم العشاء، ثم يرجع فيُصَلِّي بأصحابه ثم ذكر قصة معاذ، قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم للفتي:"وكيف تصنع يا ابن أخي إذا صليت؟" قال: أقرأ بفاتحة الكتاب، وأسأل الله الجنة، وأعوذ به من النار، وإني لا أدري ما دندنتك ولا دندنةَ معاذ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني ومعاذٌ حول هاتين"
أو نحو هذا.

حسن: رواه أبو داود (793) عن يحيى بن حبيب، ثنا خالد بن الحارث، ثنا محمد بن عجلان، عن عبيد الله بن مقسم، عن جابر فذكر نحوه، وعن أبي داود رواه كل من البغوي في"شرح السنة" (601)، والبيهقي (3/ 116 - 117).

وصحَّحه ابن خزيمة فرواه في صحيحه (1634) عن يحيى بن حبيب الحارثي به مطولًا، ورواه الإمام أحمد (14241) عن يحيى (وهو ابن سعيد) عن ابن عجلان به مختصرًا، ولم يذكر موضع الشاهد كما ذكره أبو داود.

وإسناده حسن لأجل محمد بن عجلان فإنه"صدوق" كما قال الحافظ مع أن كبار أئمة الحديث وثَّقوه منهم أحمد وابن معين وأبو زرعة وأبو حاتم والنسائي والعجلي وغيرهم، إلا أنه اختلطت عليه أحاديث أبي هريرة كما أنه كان يضطرب في حديث نافع، وهنا سلم من هذه العلل.

وأما أصل القصة فهي ثابتة في الصحيحين، وسوف تأتي في جموع أبواب الإمامة. والبيهقي رحمه الله تعالى لم يخرج حديث جابر هذا في"باب الاقتصار على فاتحة الكتاب"، وإنما أخرج فيه حديث ابن عباس:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى ركعتين، لم يقرأ فيهما إلا بفاتحة الكتاب".

أخرجه في السنن الكبري (2/ 61)، وأحمد (2550)، وأبو يعلى (2561) وابن خزيمة (513) كلهم من طريق حنظلة السدوسي، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكر الحديث، إلا ابن أبي يعلى فإنه رواه من طريق حنظلة عن شهر بن حوشب، عن ابن عباس فذكره. وإسناده ضعيف، لأن حنظلة السدوسي هو: ابن عبد الله، ضعيف.

قال ابن التركماني،"قال البيهقي في باب"معانقة الرجل الرجل" كان قد اختلط، تركهـ يحيى القطان لاختلاطه، وضعَّفه أحمد وقال: منكر الحديث يحدث بأعاجيب، وقال ابن معين: ليس بشيء تغير في آخر عمره". انتهى.

وكان حديث جابر أحق من أن يخرج في هذا الباب من حديث ابن عباس.

وحديث عبادة بن الصامت في الصحيحين وغيرهما:"لا صلاة لمن لم يقرأ بفاتحة الكتاب" يفهم منه أن من قرأ فاتحة الكتاب صحت صلاته، والأخذ بمفهوم المخالفة فيه خلاف معروف بين أهل العلم.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুআয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ইশার সালাত আদায় করতেন, এরপর ফিরে এসে তিনি তাঁর সাথীদের নিয়ে সালাত আদায় করতেন। এরপর মুআযের ঘটনা উল্লেখ করে বলা হয়েছে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই যুবককে বললেন: "হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র, তুমি যখন সালাত আদায় করো তখন কেমন করো?" সে বলল: আমি ফাতিহাতুল কিতাব (সূরা ফাতিহা) পাঠ করি এবং আল্লাহর কাছে জান্নাত প্রার্থনা করি ও তাঁর কাছে জাহান্নাম থেকে আশ্রয় চাই। আর আমি আপনার দীর্ঘ কিরাআত ও মুআযের দীর্ঘ কিরাআত সম্পর্কে অবগত নই। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আমি এবং মুআয তো এই দুটির (জান্নাত চাওয়া ও জাহান্নাম থেকে আশ্রয় চাওয়ার) কাছাকাছিই থাকি।" অথবা এই ধরনেরই কিছু বলেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1929)


1929 - عن عمران بن حصين قال: صَلَّى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة الظهر - أو العصر فقال:"أيكم قرأ خلفي بسبِّح اسم ربك الأعلى" فقال رجل: أنا، ولم أرد بها إلا الخير، قال:"قد علمت أن بعضكم خالجنيها".
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (398) عن سعيد بن منصور وقتيبة بن سعيد، كلاهما عن أبي عوانة، قال سعيد: حدثنا أبو عوانة، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن عمران بن حصين فذكره.

ورواه أبو داود (828) من طريق شعبة عن قتادة، وقال له: كأنه كرهه. قال قتادة: لو كرهه نهى عنه.

وقوله:"خالجنيها" أي: جاذبنيها، والخلج: الجذب. وهذا وقوله:"نازعنيها" سواء. وإنما أنكر عليه محاذاته في قراءة السورة حتى تداخلت القراءتان وتجاذبنا، كذا قال الخطابي.

وقال النووي في"شرح مسلم":"والإنكار عليه في جهره، أو رفع صوته بحيث أسمع غيره، لا عن أصل القراءة". انتهى.

وعليه يحمل قول زيد بن ثابت: لا أقرأ مع الإمام في شيء، وفي رواية: لا قراءة مع الإمام في شيء - أي الجهر بالقراءة مع الإمام.

وما جاء في بعض الروايات: فنهي عن القراءة خلف الإمام فهو منكر، تفرد به الحجاج بن أرطاة عن قتادة ولم يوافق عليه من أصحابه أحد.




ইমরান বিন হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নিয়ে যুহরের—কিংবা আসরের—সালাত আদায় করলেন। অতঃপর বললেন, "তোমাদের মধ্যে কে আমার পিছনে 'সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ‘লা' (সূরা আল-আ‘লা) পাঠ করেছ?" একজন লোক বলল: আমি। আমি তো কেবল কল্যাণই চেয়েছিলাম। তিনি বললেন: "আমি তো জানতাম যে, তোমাদের কেউ কেউ আমার সাথে তা নিয়ে টানাটানি করেছ (অর্থাৎ আমার ক্বিরাতে বিঘ্ন ঘটিয়েছ)।"

সহীহ: মুসলিম এটি সালাত অধ্যায়ে (৩৯৮) সাঈদ ইবনু মানসূর ও কুতাইবা ইবনু সাঈদ উভয়ের সূত্রে আবূ ‘আওয়ানাহ হতে বর্ণনা করেছেন। সাঈদ বলেছেন: আবূ ‘আওয়ানাহ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি ক্বাতাদাহ হতে, তিনি যুরারাহ ইবনু আওফা হতে, তিনি ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন।

আবূ দাঊদ (৮২৮) এটি শু‘বা-এর সূত্রে ক্বাতাদাহ হতে রিওয়ায়াত করেছেন এবং তাকে বলেছেন: যেন তিনি তা অপছন্দ করেছেন। ক্বাতাদাহ বলেছেন: যদি তিনি তা অপছন্দ করতেন, তাহলে তা থেকে নিষেধ করে দিতেন।

রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী: "খালাজানীয়াহা" (خالجنيها) অর্থ হলো, আমার সাথে টানাটানি করেছ (جاذبنيها)। আর ‘আল-খাল্জ’ (الخلج) অর্থ: টানা। আর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী "নাযা‘আনীয়াহা" (নাযা‘আনিহা) এবং এই বাণীটি (খালাজানীয়াহা) একই অর্থবোধক। আল-খাত্তাবী বলেন: তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল সূরা পাঠে ইমামের পাশাপাশি হয়ে যাওয়ার কারণে আপত্তি জানিয়েছেন, যাতে ক্বিরাত দুটি পরস্পরের সাথে মিশে না যায় এবং টানাটানি সৃষ্টি না হয়।

আর ইমাম নববী (রাহিমাহুল্লাহ) শারহু মুসলিমে বলেছেন: "তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আপত্তিটি ছিল তার সজোরে পড়ার উপর, অথবা এমনভাবে আওয়াজ উঁচু করার উপর যাতে অন্যেরা শুনতে পায়, মূল ক্বিরাত পড়ার উপর নয়।" সমাপ্ত। আর এভাবেই যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাণী: "আমি ইমামের সাথে কোনো কিছু পড়ব না" এবং অন্য রিওয়ায়াতে, "ইমামের সাথে কোনো কিছু পড়া যাবে না"—এর অর্থ হলো, ইমামের সাথে সজোরে ক্বিরাত পড়া।

আর কোনো কোনো রিওয়ায়াতে যা এসেছে: "অতঃপর ইমামের পিছনে ক্বিরাত করতে নিষেধ করা হলো" তা মুনকার (অগ্রহণযোগ্য)। এটি হাজ্জাজ ইবনু আরত্বাহ ক্বাতাদাহ হতে এককভাবে বর্ণনা করেছেন এবং তাঁর সাথীদের কেউ এতে তার সাথে একমত হননি।









আল-জামি` আল-কামিল (1930)


1930 - عن عبد الله بن مسعود قال: كان الناس يجهرون بالقرآن خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خلطتم عليَّ القرآن".

حسن: رواه أحمد (4309) وأبو يعلي - المقصد العلي (269)، والبزار - كشف الأستار (488) والبخاري في جزء القراءة (ص 126) كلهم من طريق يونس بن أبي إسحاق، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد الله، واللفظ لأبي يعلى، ولفظ البخاري مثله.

وإسناده حسن لأجل يونس بن أبي إسحاق فإنه مختلف فيه فقال الإمام أحمد: حديثه مضطرب، ووثّقه ابن معين، وقال أبو حاتم: كان صدوقًا إلا أنه لا يحتج بحديثه، وقال النسائي: ليس به بأس.

والخلاصة كما قال الحافظ في التقريب:"صدوق يهم قليلًا".

قلت: وهو كما قال، إلا أنه لم يهم في هذا الحديث، لأنه موافق لما رواه الثقات من جهر الناس بالقراءة خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم فإنه لم يخلط عليه إلا بالجهر، فمنعوا من ذلك، وأجيز لهم أن يقرؤا في أنفسهم، وبه بوّبه الإمام البخاري في"جزء القراءة" قائلًا: باب لا يجهر خلف الإمام بالقراءة.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পেছনে লোকেরা উচ্চস্বরে কুরআন তিলাওয়াত করছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদের বললেন: "তোমরা আমার জন্য কুরআনকে গুলিয়ে দিচ্ছো।"









আল-জামি` আল-কামিল (1931)


1931 - عن وعن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قال الإمام: {غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ} فقولوا: آمين، فإنه من وافق قولُه قول الملائكة غُفِر له ما تقدم من ذنبه".

متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (45) عن سُمَيّ مولى أبي بكر، عن أبي صالح السمان، عن
أبي هريرة فذكر الحديث. وعن مالك رواه البخاري في الأذان (782) وفي التفسير (4475).

قال البخاري:"تابعه محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ونُعيم المجمر، عن أبي هريرة".

قلت: حديث أبي سلمة رواه مالك، ومن طريقه البخاري في الأذان (780) ومسلم في الصلاة عن مالك (410) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن أنهما أخبراه عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أمَّن الإمام فأمِّنوا، فإنه من وافق تأمينُه تأمينَ الملائكة غفر له ما تقدم من ذنبه" قال ابن شهاب: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"آمين".

ورواه مالك أيضًا عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قال أحدكم آمين، وقالت الملائكة في السماء: آمين، فوافقت إحداهما الأخرى، غفر له ما تقدم من ذنبه"

رواه البخاري في الأذان (781) من طريق مالك، ومسلم من حديث المغيرة، عن أبي الزناد، به مثله.

وحديث نعيم المجمِّر عن أبي هريرة قال: صلَّى بنا أبو هريرة حتى بلغ"ولا الضالين"، قال:"آمين" فقال الناس:"آمين" ثم قال: والذي نفسي بيده إني لأشبهكم صلاةً برسول الله صلى الله عليه وسلم" رواه النسائي (2/ 134).

قال ابن خزيمة في قول النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا أمن الإمام فأمنوا" ما بان وثبت أن الإمام يجهر بآمين، إذ معلوم عند من يفهم العلم أن النبي صلى الله عليه وسلم لا يأمر المأموم أن يقول:"أمين" عند تأمين الإمام، إلا والمأموم يعلم أن الإمام يقوله: ولو كان الإمام يسر"آمين" لا يجهر به، لم يعلم المأموم أن إمامه قال"آمين" أو لم يقله، ومحال أن يقال للرجل: إذا قال فلان كذا فقل مثل مقالته، وأنت لا تسمع مقالته، هذا عين المحال، وما يتوهمه عالم أن النبي صلى الله عليه وسلم يأمر المأموم أن يقول:"آمين" إذا قاله إمامه، وهو لا يسمع تأمين إمامه". (2/ 286).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন ইমাম বলেন, {গাইরিল মাগদূবি আলাইহিম ওয়ালাদ্ দাল্লিন} (অর্থাৎ তাদের পথ নয় যাদের উপর ক্রোধ বর্ষিত হয়েছে এবং যারা পথভ্রষ্ট হয়েছে), তখন তোমরা ‘আমীন’ বলো। কারণ, যার কথা ফেরেশতাদের কথার সাথে মিলে যাবে, তার পূর্ববর্তী গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1932)


1932 - عن أبي هريرة، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا فرغ من قراءة أمّ القرآن، رفع صوته وقال:"آمين".

حسن: رواه الدارقطني (1274)، وابن حبان (1806)، والحاكم (1/ 223)، والبيهقي (2/ 58) كلهم من طريق إسحاق بن إبراهيم الزبيدي، حدّثني عمرو بن الحارث، حدثني عبد الله بن سالم، عن الزبيدي، أخبرني الزهري، عن أبي سلمة وسعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الدارقطني:"هذا إسناد حسن". وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

قلت: فيه إسحاق بن إبراهيم بن العلاء الزبيدي مختلف فيه. قال أبو حاتم:"شيخ لا بأس به، ولكنهم يحسدونه".

وذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 163) وأخرج عنه في"صحيحه" وحسّن حديثه الدارقطني وصحّحه الحاكم.
وللحديث إسناد آخر وهو ما رواه أبو داود (934)، وابن ماجه (853) كلاهما من طريق صفوان بن عيسى، قال: حدثنا بشر بن رافع، عن أبي عبد الله ابن عم أبي هريرة، عن أبي هريرة، قال: ترك الناس التأمين. وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قال: {غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ} قال:"آمين" حتى يسمعها أهل الصف الأول، فيرتج بها المسجد، ولكن فيه بشر بن رافع الحارثي ضعيف الحديث. وأبو عبد الله ابن عمّ أبي هريرة، مجهول.

ورواه الدارقطني (1272، 1273) من طريق بحر السقاء، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وعن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا قال: {وَلَا الضَّالِّينَ} قال:"آمين" يرفع بها صوته.

قال الدارقطني: بحر السقاء ضعيف. ويحسن الحديث بمجموع هذين الإسنادين.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন উম্মুল কুরআন (সূরা ফাতিহা) পাঠ করা শেষ করতেন, তখন তিনি তাঁর কণ্ঠস্বর উঁচু করতেন এবং বলতেন: "আমীন"।









আল-জামি` আল-কামিল (1933)


1933 - عن أبي موسى الأشعريّ، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خطبنا فبيَّن لنا سنّتنا، وعلّمنا صلاتنا، فقال:"إذا صليتُم فأقيموا صفوفكم، ثم ليؤمّكم أحدكم فإذا كبَّر فكبِّروا، وإذا قال: {غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ} فقولوا: آمين، يجبكم الله ....".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (404) من طرق عن أبي عوانة، عن قتادة، عن يونس بن جبير، عن حِطّان بن عبد الله الرقاشي، قال:"صليتُ مع أبي موسى الأشعريّ صلاة …" فذكر الحديث بطوله.




আবু মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং আমাদের জন্য আমাদের সুন্নাতসমূহ স্পষ্ট করে দিলেন, আর আমাদের সালাত (নামাজ) শিক্ষা দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "যখন তোমরা সালাত আদায় করবে, তখন তোমাদের কাতার সোজা করো। অতঃপর তোমাদের মধ্যে থেকে কেউ তোমাদের ইমামতি করুক। অতঃপর যখন সে (ইমাম) তাকবীর বলে, তোমরাও তাকবীর বলো। আর যখন সে (ইমাম) বলে: {গাইরিল মাগদূবি আলাইহিম ওয়া লাদ-দ্বা-ল্লীন}, তখন তোমরা বলো: 'আমীন' (আমিন)। আল্লাহ তোমাদের ডাকে সাড়া দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (1934)


1934 - عن وائل بن حُجْر قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم قرأ: {غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ} فقال:"آمين" ومدَّ بها صوته.

حسن: رواه أبو داود (932)، والترمذي (248) كلاهما من طريق سفيان، عن سلمة بن كُهيل، عن حُجْر بن عَنْبس، عن وائل بن حُجْر، واللفظ للترمذي، ولفظ أبي داود:"ورفع بها صوته".

ورواه النسائي (879) وابن ماجه (855) من وجه آخر عن أبي إسحاق، عن عبد الجبار بن وائل، عن أبيه قال: صلَّيتُ مع النبي صلى الله عليه وسلم فلما قال: قال:"آمين" فسمعناها. ورواه أيضًا الدارقطني (1271) من طريق أبي إسحاق به وفيه:"مدَّ بها صوته" وقال:"هذا إسناد صحيح".

وقال الترمذي:"حسن".

ولكن لم يسمع عبد الجبار بن وائل عن أبيه عند أكثر أهل العلم، وإنما أخذه من أهله.

ثم قال الترمذي:"روي شعبة هذا الحديث عن سلمة بن كُهيل، عن حُجْر أبي العَنْبس، عن علقمة بن وائل، عن أبيه أن النبي قرأ: {غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ} فقال: آمين، وخفض بها صوته".

قال الترمذي: سمعت محمدًا يقول: حديث سفيان أصحُّ من حديث شعبة في هذا، وأخطأ شعبةُ في مواضع من هذا الحديث، فقال:"عن حُجْر أبي العنبس" وإنما هو"حُجْر بن عَنْبس" ويُكَنَّى"أبا السكن" وزاد فيه"عن علقمة بن وائل" وليس فيه عن علقمة، وإنما هو: عن حُجْر بن
عنْبَس، عن وائل بن حُجْر، وقال:"خفض بها صوته" وإنما هو"ومدَّ بها صوته".

قال الترمذي: وسألت أبا زرعة عن هذا الحديث فقال: حديث سفيان في هذا أصح من حديث شعبة، قال: وروى العلاء بن صالح الأسدي، عن سلمة بن كهيل نحو رواية سفيان" انتهى.

ثم روى الترمذي (249) عن أبي بكر بن محمد بن أبان، حدثنا عبد الله بن نُمير، حدثنا العلاء بن صالح الأسدي، عن سلمة بن كهيل، عن حُجْر بن عنْبس، عن وائل بن حجر، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو حديث سفيان عن سلمة بن كُهيل.

وكذلك قال أيضًا الدارقطني (1/ 332) بأن شعبة خالفه في إسناده ومتنه، لأن سفيان الثوري ومحمد بن سلمة بن كهيل وغيرهما رووه عن سلمة فقالوا:"ورفع صوته بآمين" وهو الصواب. انتهى.

وقال البيهقي في"السنن الكبري" (2/ 57) بعد أن أخرج الحديث من طريق سفيان:"رواه

العلاء بن صالح ومحمد بن سلمة بن كهيل، عن سلمة بن كهيل (أي مثل رواية سفيان) وخالفهم شعبة في إسناده ومتنه، ثم روى من طريق أبي داود الطيالسي (وهو في مسنده (1117) بتحقيق التركي) ثنا شعبة، قال: أخبرني سلمة بن كُهيل قال: سمعتُ حُجرًا أبا العنبس، قال: سمعتُ علقمة بن وائل، يحدث عن وائل - وقد سمعته من وائل، أنه صَلَّى مع النبي صلى الله عليه وسلم فلما قرأ: {غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ} قال:"آمين" خفض بها صوته".

ثم ذكر قول البخاري ثم قال: وقد رواه أبو الوليد الطيالسي، عن شعبة نحو رواية الثوري - ثم أسنده عن الحاكم في"الفوائد الكبير" لأبي العباس في حديث شعبة وفيه:"رافعًا بها صوته".

ثم قال:"وقد روى من وجهين آخرين عن وائل بن حُجر، نحو رواية سفيان".

قال الحافظ في التلخيص (1/ 237):"وقد رجحت رواية سفيان بمتابعة اثنين له".

ومن الأمور المعروفة عند النقاد أن سفيان وشعبة إذا اختلفا في شيء فالقول قول سفيان، فكيف وقد روى شعبة نفسه موافقًا لرواية سفيان، مع متابعة اثنين له، وبهذا صح الجهرُ بالتأمين.

وفي الباب ما روي عن علي بن أبي طالب عند ابن ماجه، وعن ابن عمر عند الدارقطني، وعن أم الحصين عند الطبراني، وفي كلها ضعف.

وفي هذه الأحاديث دليل على أن السنة في حق الإمام أن يرفع صوته بآمين، ويتبعه من خلفه وهو قول غير واحد من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.

قال عطاء بن أبي رباح: أدركتُ مائتين من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في هذا المسجد - يعني المسجد الحرام - إذا قال الإمام: {وَلَا الضَّالِّينَ} رفعوا أصواتهم بآمين".

أخرجه ابن حبان في"الثقات" (6/ 265) عن عبد الله بن محمد، قال: ثنا إسحاق بن إبراهيم، ثنا علي بن الحسن، قال: ثنا أبو حمزة السكري، عن مطرف، عن خالد بن أبي نوف، عن عطاء بن أبي رباح، فذكره.
وذكر الحافظ ابن القيم في"إعلام الموقعين" (2/ 431): قال الربيع: سئل الشافعي عن الإمام هل يرفع صوته بآمين؟ قال: نعم، ويرفع بها مَنْ خلفه أصواتَهم، فقلت: وما الحجّة؟ قال: أخبرنا مالك، وذكر حديث أبي هريرة المتفق على صحته، ثم قال: ففي قول رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أمَّن الإمام فأمِّنوا" دلالة على أنه أمر الإمام أن يجهر بآمين، لأن من خلفه لا يعرفون وقت تأمينه إلا أن يسمع تأمينه، ثم بينه ابنُ شهاب فقال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم بقول:"آمين". فقلت للشافعي: فإنّا نكره للإمام أن يرفع صوته بآمين. فقال: هذا خلاف ما روي صاحبُنا وصاحبكم عن رسول الله صلى الله عليه وسلم".

وكان أبو هريرة يقول للإمام: لا تسبقني بآمين، وكان يؤذن له، أخبرنا مسلم بن خالد، عن ابن جريج، عن عطاء: كنت أسمع الأئمة ابن الزبير ومن بعده يقولون: آمين، ومن خلفهم: آمين، حتى إن للمسجد للجّةٌ.

وقوله: كان أبو هريرة يقول للإمام: لا تسبقني بآمين، يريد ما ذكره البيهقي بإسناده عن أبي رافع، أنّ أبا هريرة كان يؤذن لمروان بن الحكم، فاشترط أن لا يسبقه بـ {وَلَا الضَّالِّينَ} حتى يعلم أنه قد وصل الصّف، فكان مروان إذا قال، قال أبو هريرة: آمين، يمدُّ بها صوتَه، وقال: إذا وافق تأمينُ أهل الأرض تأمينَ أهل السماء غُفر لهم" انتهى كلام ابن القيم

وقال الترمذي:"وبه يقول غير واحد من أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم والتابعين ومن بعدهم، يرون أن الرجل يرفع صوته بالتأمين، ولا يخفيها. وبه يقول الشافعي وأحمد وإسحاق".




ওয়ায়েল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পড়তে শুনেছি: {গাইরিল মাগদূবি আলাইহিম ওয়া লাদ-দোয়া-ল্লীন}। তখন তিনি বললেন: "আ-মীন" এবং এর দ্বারা তাঁর আওয়াজকে দীর্ঘায়িত করলেন (টেনে বললেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (1935)


1935 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُعلمنا يقول:"لا تُبادروا الإمام، إذا كبَّر فكبِّروا، وإذا قال: {وَلَا الضَّالِّينَ} فقولوا: آمين، وإذا ركع فاركعوا، وإذا قال: سمع الله لمن حمده، فقولوا: اللهم! ربنا لك الحمدُ".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (415) من طريق الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه أيضًا من طريق سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة بنحوه إلا قوله {وَلَا الضَّالِّينَ} فقولوا آمين وزاد"ولا ترفعوا قبله".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে শিক্ষা দিতেন এবং বলতেন: "তোমরা ইমামের আগে কোনো কিছু করবে না (তাড়াহুড়ো করবে না)। যখন তিনি তাকবীর বলেন, তখন তোমরা তাকবীর বলো। যখন তিনি '{ওয়ালাদ দা-ল্লীন}' বলেন, তখন তোমরা 'আমীন' বলো। যখন তিনি রুকু করেন, তখন তোমরা রুকু করো। আর যখন তিনি 'সামি'আল্লাহু লিমান হামিদাহ' বলেন, তখন তোমরা বলো: 'আল্লাহুম্মা রাব্বানা লাকাল হামদ'।"









আল-জামি` আল-কামিল (1936)


1936 - عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما حسَدَتْكم اليهودُ على شيء ما حسدتْكم على السلام والتأمين".

صحيح: رواه ابن ماجه (856) عن إسحاق بن منصور، قال: أخبرنا عبد الصمد بن عبد الوارث، قال: ثنا حماد بن سلمة، قال: حدثنا سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن عائشة فذكرت الحديث.
قال البوصيري في زوائده:"هذا إسناد صحيح احتج مسلم بجميع رواته".

قلت: والحديث أخرجه ابن خزيمة (574، 1585) من وجه آخر عن أبي بشر الواسطي، نا خالد بن عبد الله، عن سُهيل بن أبي صالح بإسناده بأطول منه وهذا لفظه:"دخل يهودي على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: السام عليك يا محمد! فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"وعليك". فقالت عائشة: فهممتُ أن أتكلم. فعلمت كراهية النبيّ صلى الله عليه وسلم لذلك، فسكت. ثم دخل آخر، فقال: السام عليك! فقال:"وعليك". فهممتُ أن أتكلم، فعلمت كراهية النبي صلى الله عليه وسلم لذلك. ثم دخل الثالث، فقال: السام عليك! فلم أصبر حتى قلت: وعليك السام وغضب الله ولعنته! إخوان القردة والخنازير، أتحبّون رسول الله صلى الله عليه وسلم بما لم يحيه الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله لا يحبُّ الفحش ولا التفحش. قالوا قولا فرددنا عليهم. إن اليهود فوم حُسَّد وهم لا يحسدونا على شيء كما يحسدونا على السلام وعلى آمين".

وللحديث إسناد آخر وهو ما رواه الإمام أحمد (25029) عن علي بن عاصم، عن حصين بن عبد الرحمن، عن عمر بن قيس، عن محمد بن الأشعث، عن عائشة، قالت (فذكرت نحوه).

وفيه زيادة:"وعلى القبلة التي هدانا الله لها، وضلوا عنها".

وعلي بن عاصم هو الواسطي تكلّم فيه ابن المديني فقال: كان كثير الغلط. وقال العقيلي: تعرفه بالكذب. وقال البخاري: ليس بالقوي إلا أنه توبع.

رواه البيهقي في سننه (2/ 56) من طريق سليمان بن كثير، عن حصين بإسناده نحوه بذكر القبلة. وإسناده لا بأس به. وقد تحرف في بعض المصادر:"عمر بن قيس" وهو الماصر إلى"عمرو بن قيس" وهو الملائي ثقة، والماصر"صدوق".

وفي معناه ما رُويَ عن ابن عباس:"ما حسدتْكم اليهود على شيء ما حسدتكم على آمين فأكثروا من قول آمين".

رواه ابن ماجه (857) وفي إسناده طلحة بن عمرو بن عثمان الحضرمي المكي. أطلق عليه الإمام أحمد والنسائي فقال:"متروك".

وكذلك لا يصح ما روي عن معاذ عند الطبراني في"الأوسط"، وعن أنس عند ابن خزيمة (1586) وعن غيرهم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘ইহুদিরা তোমাদেরকে অন্য কোনো কিছুর উপর ততটা হিংসা করে না, যতটা হিংসা করে সালাম (শান্তি কামনা) ও আমীন বলার উপর।’









আল-জামি` আল-কামিল (1937)


1937 - عن أبي بَرزَةَ الأَسْلَمِي قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُؤَخِّر العِشاء إلى ثُلُث اللَّيل، ويكره النوم قَبْلَها، والحديثَ بعدَها، وكان يقرأُ في صلاة الفَجْر من المائة إلى السِتِّين. وكان ينصرف حين يعرفُ بعضُنا وجه بَعْضٍ.
متفق عليه: رواه مسلم في المساجد (647) من طريق حماد بن سلمة، عن سيَّار بن سلامة أبي المنهال، قال سمعت أبا برزة الأسلمي فذكر الحديث. وهو جزء من الحديث الطويل في مواقيت الصلاة، اتفق الشيخان على تخريجه متفرقة، فأخرج البخاري في كتاب الأذان - باب القراءة في الفجر من طريق شعبة قال: حدثنا سيَّار بن سلامة قال: دخلت أنا وأبي على أبي بَرْزَة فسألناه عن وقت الصلاة فذكر الحديث وفيه:"وكان يقرأ في الركعتين أو أحدهما ما بين الستين إلى المائة". ومسلم في الصلاة (461) من طريقين أُخرين عن أبي المنهال.




আবূ বারযা আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এশার সালাত রাতের এক তৃতীয়াংশ পর্যন্ত বিলম্ব করতেন। তিনি এর আগে ঘুমানো এবং এর পরে (সালাতের পরে) কথা বলা অপছন্দ করতেন। আর তিনি ফজরের সালাতে ষাট থেকে একশ আয়াত পর্যন্ত তিলাওয়াত করতেন। আর তিনি এমন সময়ে সালাত সমাপ্ত করতেন, যখন আমাদের কেউ কেউ অন্যদের মুখমণ্ডল চিনতে পারত।









আল-জামি` আল-কামিল (1938)


1938 - عن قُطْبة بن مالك قال: صلَّيتُ، وصلَّى بنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقرأ: {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ} [سورة ق: 1] حتى قرأ: {وَالنَّخْلَ بَاسِقَاتٍ} [سورة ق: 10].

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (457) من طريق أبي عوانة، عن زياد بن عِلاقة، عن قُطْبة بن مالك فذكر الحديث.

ورواه أيضًا ابن عيينة، عن زياد بن علاقة به وفيه: سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ في الفجر: {وَالنَّخْلَ بَاسِقَاتٍ لَهَا طَلْعٌ نَضِيدٌ} [سورة ق: 10] وفي حديث شعبة عن زياد: فقرأ في أول ركعة: {وَالنَّخْلَ بَاسِقَاتٍ لَهَا طَلْعٌ نَضِيدٌ} وربما قال: {ق} هذه كلَّها في الركعة الأولى.




কুতবাহ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সালাত আদায় করলাম এবং আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নিয়ে সালাত আদায় করালেন। তিনি {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ} [সূরা ক্বাফ: ১] থেকে তিলাওয়াত শুরু করলেন, এমনকি তিনি {وَالنَّخْلَ بَاسِقَاتٍ} [সূরা ক্বাফ: ১০] পর্যন্ত পড়লেন। (অন্যান্য সূত্রে বর্ণিত) তিনি (কুতবাহ ইবনে মালিক) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফজরের সালাতে {وَالنَّخْلَ بَاسِقَاتٍ لَهَا طَلْعٌ نَضِيدٌ} [সূরা ক্বাফ: ১০] তিলাওয়াত করতে শুনেছিলেন। শু‘বাহ-এর বর্ণনায় আছে, তিনি প্রথম রাকাআতে {وَالنَّخْلَ بَاسِقَاتٍ লَهَا طَلْعٌ নَضِيدٌ} তিলাওয়াত করলেন। আর হয়তো বা তিনি (কুতবাহ) বলতেন: 'ক্বাফ' (অর্থাৎ সম্পূর্ণ সূরা ক্বাফ) এই সবটুকুই তিনি প্রথম রাকাআতে পড়তেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1939)


1939 - عن عمرو بن حريث أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ في الفجر: {وَاللَّيْلِ إِذَا عَسْعَسَ} [سورة التكوير: 17].

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (456) من طريق ابن بشر، عن مسعر، قال: حدثني الوليد بن سريع، عن عمرو بن حريث فذكر الحديث.

ورواه أيضًا مسلم في الصلاة (475) عن محرز بن عون بن أبي عون، حدثنا خلف بن خليفة الأشجعي أبو أحمد، عن الوليد بن سَريع مولى آل عمرو بن حُريث، عن عمرو بن حُريث قال: صلَّيتُ خلْفَ النبي صلى الله عليه وسلم الفجر فسمعته يقرأ: {فَلَا أُقْسِمُ بِالْخُنَّسِ (15) الْجَوَارِ الْكُنَّسِ} [سورة التكوير: 15 - 16] وكان لا يَحْني رجلٌ مِنَّا ظهره حتى يَسْتَتِمَّ ساجدًّا.

ورواه أبو داود (816)، وابن ماجه (817) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن أصبغ مولى عمرو بن حُريث، عن عمرو بن حريث قال: كأني أسمع صوت النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ في صلاة الغداة: {فَلَا أُقْسِمُ بِالْخُنَّسِ (15) الْجَوَارِ الْكُنَّسِ} وفي الإسناد أصبغ وثقه ابن معين، والنسائي، وقال ابن حبان: تغير بآخره حتى كُبِّل بالحديد، لا يجوز الاحتجاج بخبره إلا بعد التخليص، وذكره ابن الجارود والعقيلي في الضعفاء.

قلت: لم يُرو عنه في الكتب عن مولاه غير هذا الحديث، وقد أصاب في رواية هذا الحديث لأنه تابعه الوليد بن سريع، عن مولاه كما سبق عند مسلم، والنسائي (2/ 157).




আমর ইবনু হুরয়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফজরের সালাতে সূরা আত-তাকবীরের ১৭ নং আয়াত: {وَاللَّيْلِ إِذَا عَسْعَسَ} (অর্থাৎ, যখন রাত্রি অন্ধকার হয়) তিলাওয়াত করতে শুনেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1940)


1940 - عن جابر بن سمرة قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الفجر: {ق وَالْقُرْآنِ
الْمَجِيدِ (1)} وكانت صلاته بعد تخفيفا.

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (458) من طريق زائدة، ثنا سماك، عن جابر فذكر الحديث.

ورواه زهير، عن سماك قال: سألت جابر بن سمرة عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: كان يخفف الصلاة، ولا يُصَلِّي صلاة هؤلاء.

ورواه شعبة عن سماك به وفيه: كان النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ في الظهر بـ {وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَى} [سورة الليل: 1] وفي العصر نحو ذلك، وفي الصبح أطول من ذلك. وفي رواية: كان يقرأ في الظهر به {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} [سورة الأعلى: 1]، وفي الصبح بأطول من ذلك.




জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতে {ক্বাফ ওয়াল কুরআ-নিল মাজীদ} (ক্বাফ, মহিমান্বিত কুরআনের শপথ) তিলাওয়াত করতেন। আর এর পরের সালাতগুলো সংক্ষিপ্ত হতো।

যুহায়র, সিমাকে থেকে বর্ণনা করেন। সিমাকে বলেন, আমি জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেন, তিনি সালাত সংক্ষিপ্ত করতেন, আর তিনি এদের মতো (দীর্ঘ) সালাত আদায় করতেন না।

শু‘বাহ, সিমাকে থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তাতে আছে: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহরের সালাতে {ওয়াল্লাইলি ইযা ইয়াগশা} (শপথ রাত্রির, যখন তা আচ্ছন্ন করে) এবং আসরের সালাতে এর কাছাকাছি এবং ফজরের সালাতে এর চেয়েও লম্বা কিরাত পড়তেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি যুহরের সালাতে {সাব্বিহিছমা রাব্বিকাল আ‘লা} এবং ফজরের সালাতে এর চেয়ে লম্বা কিরাত পড়তেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1941)


1941 - عن جابر بن سمرة يقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الصلوات كنحو من صلاتكم التي تصلُّون اليوم، ولكنه كان يُخفف، كانت صلاتُه أخفَّ من صلاتِكم، وكان يقرأ في الفجر"الواقعة" ونحوَها من السور.

حسن: رواه أحمد (20995)، والطبراني (1914) كلاهما من طريق عبد الرزاق - وهو في مصنفه (2720) قال: أخبرنا إسرائيل، عن سماك بن حرب، أنه سمع جابر بن سمرة فذكر الحديث. وصحّحه ابن خزيمة (531)، والحاكم (1/ 240) من هذا الوجه.

قلت: وإسناده حسن للكلام في سماك بن حرب غير أنه"صدوق".




জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের আজকের সালাতের মতোই সালাত আদায় করতেন, কিন্তু তিনি তা সংক্ষিপ্ত করতেন। তাঁর সালাত তোমাদের সালাতের চেয়ে হালকা (সংক্ষিপ্ত) ছিল। আর তিনি ফজরের সালাতে 'আল-ওয়াকি'আহ' ও এর অনুরূপ সূরাগুলো পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1942)


1942 - عن رجل من أهل المدينة أنه صلى خلف النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: فسمعتُه يقرأ في صلاة الفجر: {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ (1)} و {يس (1) وَالْقُرْآنِ الْحَكِيمِ}.

حسن: رواه الإمام أحمد (16396) عن يونس، حدثنا أبو عوانة، عن سماك بن حرب، عن رجل من أهل المدينة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل سماك بن حرب فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وقد يكون هذا الرجل من أهل المدينة، هو جابر بن سمرة، كما سبق. وزيادة {يس (1) وَالْقُرْآنِ الْحَكِيمِ} تحمل على التكرار، مرة كذا، وأخرى كذا. ولا حاجة لتضعيف هذه الزيادة.




মদীনার এক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সালাত আদায় করেছিলেন। তিনি বলেন: আমি তাঁকে ফজরের সালাতে {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ} (ক্বাফ, মহিমান্বিত কুরআনের শপথ) এবং {يس وَالْقُرْآنِ الْحَكِيمِ} (ইয়াসীন, বিজ্ঞানময় কুরআনের শপথ) তিলাওয়াত করতে শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1943)


1943 - عن عبد الله بن السائب قال: صلَّى لنا النبيُّ صلى الله عليه وسلم الصبْحَ بمكة، فاستفتح سورة (المؤمنين) حتى جاء ذكر موسى وهارون، أو ذكر عيسى عليهم السلام أخذتِ النبيَّ صلى الله عليه وسلم سَعْلَهٌ فركع، وعبد الله بن السائب حاضر ذلك.

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (455) من طريق عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، قال: سمعت محمد بن عبَّاد بن جعفر، يقول: أخبرني أبو سلمة بن سفيان وعبد الله بن عمرو بن العاص وعبد الله بن المسيب، عن عبد الله بن السّائب فذكره.

قال مسلم: وفي حديث عبد الرزاق:"فحذف، فركع".
وفي حديثه: وعبد الله بن عمرو، ولم يقل: ابن العاص

قلت: وهو كما قال فإن الحفاظ قالوا: ابن العاص غلط، والصواب حذفه فإنه ليس هذا عبد الله بن عمرو بن العاص الصحابي، بل هو عبد الله بن عمرو الحجازي كذا ذكره البخاري في تاريخه، وابن أبي حاتم، وخلائق من الحفاظ المتقدمين والمتأخرين ذكره النووي. وكذا قال أيضًا ابن خزيمة (546) بعد أن أخرج الحديث: ليس هو عبد الله بن عمرو بن العاص السهمي.




আব্দুল্লাহ ইবনুস সা'ইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় আমাদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন। তিনি (সালাতে) সূরা আল-মুমিনূন শুরু করলেন। যখন মূসা ও হারূন (আঃ)-এর উল্লেখ অথবা ঈসা (আঃ)-এর উল্লেখ এলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কাশি পেল এবং তিনি রুকুতে চলে গেলেন। আর আব্দুল্লাহ ইবনুস সা'ইব সেখানে উপস্থিত ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1944)


1944 - عن معاذ بن عبد الله الجهني، أن رجلًا من جهينة أخبره أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ في الصبح: {إِذَا زُلْزِلَتِ الْأَرْضُ زِلْزَالَهَا} [سورة الزلزلة: 1] في الركعتين كلتيهما، فلا أدري أنَسِي رسول الله صلى الله عليه وسلم أم قرأ ذلك عمدًا.

حسن: رواه أبو داود (816) عن أحمد بن صالح، حدثنا ابن وهب، أخبرني عمرو، عن ابن أبي هلال، عن معاذ بن عبد الله الجهني فذكر مثله.

وإسناده حسن للكلام في ابن أبي هلال وهو: سعيد بن أبي هلال الليثي مولاهم، أبو العلاء المصري، وقيل: مدني، وشيخه معاذ بن عبد الله الجهني غير أنهما"صدوقان" وقال النووي في"الخلاصة" (1226):"رواه أبو داود بإسناد صحيح"، وقال الشوكاني في"النيل" (2/ 54):"رجاله رجال الصحيح".

قلت: معاذ بن عبد الله الجهني لم يخرج له الشيخان، وإنما أخرج له أصحاب السنن والبخاري في خلق أفعال العباد.

وقول الصحابي:"فلا أدري، أنسي رسول الله صلى الله عليه وسلم أم قرأ ذلك عمدًا".

الأصل أن فعل النبيِّ صلى الله عليه وسلم يُعدّ مشروعًا، وتردد الصحابي بين النسيان والعمد يحكم للعمد إلا إذا قام الدّليل على خلاف ذلك، ولم أقف على المنع من تكرار سورة واحدة في الركعتين.

ولذا بوب أبو داود وغيره بقوله: باب الرجل يعيد سورة واحدة في الركعنين.




মু'আয ইবনু আব্দুল্লাহ আল-জুহানী থেকে বর্ণিত, জুহায়না গোত্রের এক ব্যক্তি তাকে জানিয়েছেন যে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফজরের নামাযে উভয় রাকা'আতেই "ইযা যুলযিলাতিল আরদু যিলযালাহা" (সূরা যিলযালের প্রথম আয়াত) তিলাওয়াত করতে শুনেছেন। (তিনি আরও বলেন,) আমি জানি না, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভুলে গিয়েছিলেন, নাকি ইচ্ছাকৃতভাবেই তা পড়েছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1945)


1945 - عن عبد الله بن عمر قال: إن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليؤمُّنا في الفجر بالصافات.

حسن: رواه أحمد (4989)، وأبو يعلى (5445)، وابن حبان (1817) كلّهم من حديث يزيد بن هارون، حدثنا ابن أبي ذئب، عن الحارث بن عبد الرحمن، عن سالم، عن أبيه عبد الله بن عمر، فذكر الحديث واللفظ له.

ورواه النسائي (826) من طريق خالد بن الحارث، عن ابن أبي ذئب به إلا أنه لم يذكر"الصبح" وفيه:"وكان يأمرنا بالتخفيف ويؤمُّنا بالصافات".

وصحّحه ابن خزيمة (1606) فرواه من طريق عثمان بن عمرو وخالد بن الحارث، قالا: ثنا ابن أبي ذئب - وهذا حديث خالد بن الحارث - عن خاله الحارث بن عبد الرحمن فذكر مثل حديث النسائي وإسناده حسن لأجل الكلام في الحارث بن عبد الرحمن إلا أنه"صدوق".




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অবশ্যই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতে আমাদের সূরা সাফফাত দ্বারা ইমামতি করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1946)


1946 - عن أم هشام بنت حارثة بن النعمان قالت: ما أخذتُ {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ (1)} إلا من وراء رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي بها في صلاة الصبح.

حسن: رواه النسائي (950) عن عمران بن يزيد، قال: حدثنا ابن أبي الرجال، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة، عن أم هشام فذكرت الحديث مثله.

ورواه أبا عبد الله بن أحمد، عن الحكم قال: حدثنا عبد الرحمن بن أبي الرجال قال: ذكره يحيى بن سعيد، عن عمرة به مثله.

ورجاله ثقات غير عبد الرحمن بن أبي الرجال - بكسر الراء ثم جيم، وثقه أحمد والدارقطني، وقال أبو داود:"ليس به بأس". وقال أبو حاتم:"صالح"، وجعله الحافظ في درجة"صدوق ربما أخطأ" ومثله يحسن حديثه، وقد ثبت قراءة {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ (1)} في صلاة الصبح من غير طريقه.

ولذا فلا حاجة إلى الحكم عليه بالمخالفة لرواية سليمان بن بلال ويحيى بن أيوب وغيرهما، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن أختها لأمها وهي: أم هشام بنت الحارثة بن النعمان، وكانت أكبر منها. قالت: أخذت {ق وَالْقُرْآنِ الْمَجِيدِ (1)} من في رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الجمعة، وهو يقرأ بها على المنبر في كل جمعة" رواه مسلم في الجمعة (872).

كما رواه أيضًا من وجه آخر عن أم هشام قالت:"ما حفظت {ق} إلا من في رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب بها كل جمعة، قالت: وكان تنورنا وتنور رسول الله صلى الله عليه وسلم واحدًا".

فلعلها أخذت من وجهين من صلاة الصبح، ومن يوم الجمعة على المنبر، فروتْ مرة بالصبح، وأخرى بالجمعة فلا منافاة بينهما.




উম্মু হিশাম বিনতে হারিসাহ ইবনুন নু'মান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সূরা 'ক্বাফ ওয়াল কুরআনিল মাজিদ' [১] রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পেছন থেকে (শুনেই) মুখস্থ করেছিলাম। তিনি এই সূরা দিয়ে ফজরের সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1947)


1947 - عن عقبة بن عامر قال: كنتُ أقودُ برسولِ الله صلى الله عليه وسلم في السفر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا عقبة! ألا أعلمُك خير سورتين قرئتا؟" فعلَّمني - {قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ} و {قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ} فلم يرني سررتُ بهما جدًّا، فلما نزل لصلاة الصبح، صلى بهما صلاةَ الصُّبح للناس، فلما فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم من الصلاة التفت إليَّ فقال:"يا عقبةُ! كيف رأيت؟".

صحيح: رواه أبو داود (1462)، والنسائي (5438) كلاهما عن أحمد بن عمرو قال: أنبأنا ابن وهب، قال: أخبرني معاوية بن صالح، عن العلاء بن الحارث، عن القاسم مولى معاوية، عن عقبة بن عامر فذكر مثله.

وصحَّحه ابن خزيمة (535)، والحاكم (1/ 240) كلاهما من طريق معاوية بن صالح، به مثله.

ورواه أيضًا النسائي (5437) عن محمود بن خالد قال: حدثنا الوليد (وهو ابن مسلم) قال: حدثني ابن جابر، عن القاسم أبي عبد الرحيم، عن عقبة، فذكر نحوه، وصحَّحه ابن خزيمة فأخرجه في صحيحه (534) من طريق الوليد بن مسلم به مثله. والوليد بن مسلم مدلس إلا أنه صرح بالتحديث.
والحديث بالوجهين رواه أيضًا الإمام أحمد (17392) (17296).

ثم رواه النسائي (5434) قال: أخبرنا موسى بن حزام الترمذي، قال: أنبأنا أبو أسامة، عن سفيان، عن معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جبير بن نُفير، عن أبيه، عن عقبة بن عامر أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن المعوذتين، قال عقبة: فأمنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في صلاة الغداة.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن خزيمة (536) وقال: وفي حديث أبي أسامة، قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن المعوذتين أمن القرآن هما؟ فأمَّنا بهما رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة الفجر.

ورواه أبو داود (1463) من طريق محمد بن إسحاق، والنسائي من طريق محمد بن عجلان - كلاهما عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن عقبة بن عامر. في لفظ أبي داود:"يا عقبة! تعوّذ بهما، فما تعوّذ بمثلهما. قال: وسمعته يؤمنا بهما في الصلاة". وللحديث أسانيد أخرى.




উকবা ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সফরে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর বাহনের চালক ছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “হে উকবা! আমি কি তোমাকে এমন দুটি সূরা শিখিয়ে দেব না, যা তেলাওয়াত করা হয়েছে এমন সূরাগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ?” অতঃপর তিনি আমাকে শিখিয়ে দিলেন— {قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ} এবং {قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ}। তিনি দেখলেন যে আমি এতে খুব বেশি আনন্দিত হইনি। এরপর যখন তিনি ফজরের সালাতের জন্য অবতরণ করলেন, তখন তিনি লোকদের নিয়ে ঐ দুটি সূরা দিয়েই ফজরের সালাত আদায় করলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাত শেষ করে আমার দিকে ফিরলেন এবং বললেন: “হে উকবা! কেমন দেখলে?”