আল-জামি` আল-কামিল
1948 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه صلى صلاة الصّبح، فقرأ"الروم" فالتبس عليه. فلما صلى قال:"ما بال أقوام يصلّون معنا لا يحسنون الطهور، فإنما يلبس علينا القرآن أولئك".
حسن: رواه النسائي (947) عن محمد بن بشار، قال: حدثنا عبد الرحمن، قال: أنبأنا سفيان، عن عبد الملك بن عمير، عن شبيب بن أبي روح، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (23072) عن وكيع، عن سفيان، بإسناده، نحوه وزاد فيه:"من شهد معنا الصّلاة فليحسن الطهور".
ورواه أيضًا من طريق شعبة عن عبد الملك بن عمير مختصرًا (23125).
وإسناده حسن من اجل الكلام في عبد الملك بن عمير، فقد ضعفه أحمد.
وقال النسائي: لا بأس به، وأخرج عنه الشيخان.
وفيه أيضًا شبيب بن أبي روح، روى عنه جمع منهم حريز بن عثمان. وقد قال أبو داود:"شيوخ حريز كلهم ثقات".
ووثقه أيضًا ابن حبان، فمثله يحسّن حديثه، ولا يضر إبهام الصحابي لأن الصحابة كلّهم عدول، وقد قيل: إنه الأغر المزني، رواه البزار - كشف الأستار (477) - عن زياد بن يحيى الحساني، ثنا مؤمل، ثنا شعبة، عن عبد الملك بن عمير، عن شبيب بن أبي روح، عن الأغر المزني، فذكر الحديث.
ومؤمل هو ابن إسماعيل. قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 119):"هو ثقة، وقيل: إنه كثير الغلط". فلعله وهم في تسمية الصحابي.
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাত আদায় করলেন এবং তাতে তিনি সূরাহ ‘আর-রূম’ তিলাওয়াত করলেন, কিন্তু তাঁর ভুল হয়ে গেল (বা আয়াত বুঝতে সমস্যা হলো)। সালাত শেষ করার পর তিনি বললেন: “কী হলো সেইসব লোকদের, যারা আমাদের সাথে সালাত আদায় করে অথচ সঠিকভাবে পবিত্রতা অর্জন করে না? তারাই কেবল আমাদের জন্য কুরআনের তিলাওয়াতে ভুল ঘটিয়ে দেয় (বা গোলমাল সৃষ্টি করে)।”
1949 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في الجمعة في صلاة الفجر: {الم (1) تَنْزِيلُ} [السجدة]، و {هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ} [الإنسان].
متفق عليه: أخرجه البخاري في الجمعة (891)، ومسلم في الجمعة (880) كلاهما من طريق سفيان، عن سعد بن إبراهيم، عن عبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
ورواه مسلم من طريق ابن وهب، عن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن الأعرج به وفيه: كان يقرأ في الصبح يوم الجمعة بـ {الم (1) تَنْزِيلُ} في الركعة الأولى، وفي الثانية: {هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ حِينٌ مِنَ الدَّهْرِ لَمْ يَكُنْ شَيْئًا مَذْكُورًا}.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জুমার দিন ফজরের সালাতে {الم (1) تَنْزِيلُ} [সূরা আস-সাজদাহ] এবং {هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ} [সূরা আল-ইনসান] তিলাওয়াত করতেন।
1950 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في صلاة الفجر يوم الجمعة: {الم (1) تَنْزِيلُ} [السجدة 32: 1 - 2] {هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ حِينٌ مِنَ الدَّهْرِ} [الإنسان 76: 1] وأن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في صلاة الجمعة: سورة الجمعة والمنافقين.
صحيح: رواه مسلم في الجمعة (879) من طريق سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিন ফজরের সালাতে সূরা সাজদার প্রথম অংশ {আলিফ লাম মীম, তানযীল...} এবং সূরা ইনসানের প্রথম অংশ {মানুষের উপর এমন এক সময় এসেছিল যখন সে উল্লেখযোগ্য কিছুই ছিল না?} পাঠ করতেন। আর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর (ফরয) সালাতে সূরা জুমু‘আ এবং সূরা মুনাফিকূন পাঠ করতেন।
1951 - عن عبد الله بن مسعود أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في صلاة الصبح يوم الجمعة: {الم (1) تَنْزِيلُ} و {هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ}.
حسن: رواه ابن ماجه (824) قال: حدثنا إسحاق بن منصور قال: أنبأنا إسحاق بن سليمان، قال: أنبأنا عمرو بن أبي قيس، عن أبي فروة، عن أبي الأحوص، عن عبد الله بن مسعود فذكر الحديث.
قال إسحاق: هكذا حدثنا عمرو، عن عبد الله. لا أشك فيه. انتهى.
قال البوصيري في زوائد ابن ماجه:"هذا إسنادٌ صحيح، رجاله تقات وله شواهد من حديث أبي هريرة رواه النسائي في الصغري". انتهى.
قلت: الصواب أنه حسن فإن عمرو بن أبي قيس مختلف فيه، فوثَّقَه ابن معين، وقال أبو داود: في حديثه خطأ، ولذا جعله الحافظ في درجة:"صدوق له أوهام"، فمثله يحسن حديثه في الشواهد.
وأبو فروة هو: مسلم بن سلم النهدي، ويقال له: الجهني لنزوله فيهم، مشهور بكنيته من رجال الشيخين وهو حسن الحديث.
وقول البوصيري: وله شاهد من حديث أبي هريرة رواه النسائي في الصغرى. فيه تقصير في العزو، فإن الحديث أخرجه الشيخان كما سبق من طريق سفيان، عن سعد بن إبراهيم، عن عبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرة. ومن الطريق نفسه أخرجه أيضًا النسائي في الصغري (955) كما قال البوصيري.
وفي الباب أيضًا روي عن سعد بن أبي وقاص عند ابن ماجه. وفيه الحارث بن نبهان ضعيف،
وعن علي بن أبي طالب عند الطبراني في"الأوسط"، و"الصغير" وفيه الحارث ضعيف كما قال الهيثمي في"المجمع"
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমআর দিন ফজরের সালাতে (নামাযে) {আলিফ লাম মীম তানযীল} (সূরা আস-সাজদাহ) এবং {হাল আতা আলাল ইনসান} (সূরা আল-ইনসান) তিলাওয়াত করতেন।
1952 - عن أبي قتادة قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ في الركعتين الأوليين من صلاة الظهر بفاتحة الكتاب، وسورتين. يُطَوِّلُ في الأولى، ويُقَصِّر في الثانية، ويُسمع الآية أحيانًا. وكان يقرأ في العصر بفاتحة الكتاب، وسورتين، وكان يُطَوِّلُ في الركعة الأولى من صلاة الصبح، ويُقَصِّر في الثانية.
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان، من طريق شيبان (759)، ومسلم في الصلاة من طريق حجَّاج الصواف (451) كلاهما عن يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه فذكر مثله.
وروى أبو داود (800) من طريق عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن يحيى عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه قال: فظننا أنه يريد بذلك أن يدرك الناس الركعة الأولى.
ورواه الشيخان - البخاري (776) ومسلم، كلاهما من حديث همام بن يحيى - وقرنه مسلم بأبان بن يزيد - كلاهما عن يحيى بن أبي كثير به. وفيه:"وفي الركعتين الأخريين بأم الكتاب" يعني الاقتصار على الفاتحة في الركعتين الأخريين، وبه بوَّب البخاري. وفيه ردٌّ على من يقول:"لا يقرأ فيهما شيئًا وإنَّما يسبِّح".
قال ابن خزيمة (503) بعد أن رواه من حديث همام بن يحيى وأبان بن يزيد:"كنت أحسب زمانًا أن هذا الخبر في ذكر قراءة فاتحة الكتاب في الركعتين الأخريين من الظهر والعصر لم يروه غير أبان بن يزيد، وهمام بن يحيى على ما كنت أسمع أصحابنا من أهل الآثار يقولون، فإذا الأوزاعي مع جلالته قد ذكر في خبره هذه الزيادة".
يعني أنَّه كان يخشى من شذوذ هذه الزيادة، وهي قراءة فاتحة الكتاب في الركعتين الأخريين؛ لأنَّ بعض الفقهاء ذهبوا إلى أنَّه لا يقرأ فيهما شيئًا، وإنَّما يسبِّح فقط، حتَّى قويت عنده هذه الزيادة بمتابعة الأوزاعي.
قال ابن خزيمة في تبويبه لهذا الحديث:"ضد قول من زعم أنَّ المصلِّي ظهرًا أو عصرًا مخيَّرٌ بين أن يقرأ في الأخريين منهما بفاتحة الكتاب وبين أن يسبِّحَ في الأُخرين منهما. وخلاف قول من زعم أنَّه يُسبِّح في الأخريين، ولا يقرأ في الأخريين منهما".
قلت: حديث الأوزاعي رواه البخاري (778) عن محمد بن يوسف، عنه، قال: حدَّثني يحيى بن أبي كثير. إلا أنه لم يذكر في حديثه قراءة الفاتحة في الركعتين الأخريين. وأرجع الحافظ هذا الاختلاف إلى أصحاب الأوزاعي بأنَّهم لم يتَّفِقوا عليه.
وقوله:"كان يقول في الركعة الأولى من صلاة الصبح - وهكذا في العصر" والظهر في رواية.
هذه الصفة من صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم لها شاهد من حديث أبي مالك الأشعري. رواه أحمد (22911) عن أبي النضر، حدثنا أبو معاوية - يعني شيان -، وليث، عن شهر بن حوشب، عن أبي مالك الأشعريّ، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه كان يسوي بين الأربع ركعات في القراءة والقيام، ويجعل الركعة الأولى هي أطولهن لكي يثوبَ الناس. ويجعل الرجال قدام الغلمان، والغلمان خلفهم، والنساء خلف الغلمان، ويكبر كلما سجد، وكلما رفع، ويكبر كلما نهض بين الركعتين إذا كان جالسًا. وشهر بن حوشب فيه كلام معروف، إلا أن هذا الحديث له شواهد صحيحة.
وتطويل الركعة الأولى في الرباعيات أو الثنائيات لم يرد في الأحاديث الصحيحة الأخرى - وهي كما يأتي، فيحمل هذا على أنه كان يفعل أحيانًا هكذا وأخرى يسوي بينهما.
আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যুহরের সালাতের প্রথম দুই রাকআতে সূরা ফাতিহা এবং দুইটি সূরা পাঠ করতেন। তিনি প্রথমটি লম্বা করতেন এবং দ্বিতীয়টি ছোট করতেন। আর কখনো কখনো তিনি কোনো কোনো আয়াত শোনাতেন। তিনি আসরের সালাতেও সূরা ফাতিহা ও দুইটি সূরা পাঠ করতেন। আর তিনি ফজরের সালাতের প্রথম রাকআতটি লম্বা করতেন এবং দ্বিতীয়টি ছোট করতেন।
1953 - عن جابر بن سمرة قال: شكا أهل الكوفة سعدًا إلى عمر فعزله واستعمل عليهم عمارًا، فشكوا حتى ذكروا أنه لا يُحسن يُصَلي، فأرسل إليه فقال: يا أبا إسحاق! (كنية سعد) إن هؤلاء يزعمون أنك لا تُحسن تُصلي، قال أبو إسحاق: أما أنا والله! فإني كنت أصلي بهم صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم ما أخرم عنها، أصلي صلاة العشاء فأركدُ في الأُولَيين، وأخِفُّ في الأُخْريين، قال: ذاك الظن بك يا أبا إسحاق! فأرسل معه رجلًا، أو رجلين، إلى الكوفة، فسأل عنه أهل الكوفة، ولم يدع مسجدًا إلا سأل عنه ويُثنون معروفًا، حتى دخل مسجدًا لبني عبسٍ، فقام رجل منهم يقال له: أسامة بن قتادة يكنى أبا سعدة، قال: أما إذا نشدتنا فإن سعدًا كان لا يسير بالسرية، ولا يَقْسِم بالسوية، ولا يعدل في القضية.
قال سعد: أما والله! لأدْعُونَّ بثلاث: اللهم إن كان عبدك هذا كاذبًا قام رياءٌ وسمعةٌ فأطل عمره، وأطِل فقره، وعَرِّضه بالفتن، وكان بعد إذا سئل يقول: شيخ كبير مفتون، أصابتني دعوة سعد.
قال عبد الملك: فأنا رأيته بعد قد سقط حاجباه على عينيه من الكبر، وإنه ليتعرض للجواري في الطرق يغمزهُنَّ.
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (755) ومسلم في الصلاة (453) كلاهما من طريق عبد الملك بن عمير، عن جابر بن سمرة واللفظ للبخاري، وأما مسلم فذكره مختصرًا بدون قصة دعوة سعد على أسامة بن قتادة.
وقوله: فأركد في الأولين - أي أقيم طويلًا يعني أطون فيهما القراءة.
قوله: فأرسل معه رجلًا هو: محمد بن مسلمة، فإن كان رجلان فيكون الثاني هو: عبد الله بن أرقم.
وقوله:"صلاة العشاء" كذا هنا، وسيأتي أيضًا في القراءة في صلاة العشاء. وفي رواية:"صلاتي العشي" كما عند البخاري (758) والمراد منها الظهر والعصر.
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
কুফার অধিবাসীরা সা'দ (ইবনে আবী ওয়াক্কাস)-এর বিরুদ্ধে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে অভিযোগ করল। তখন তিনি তাঁকে (সা'দকে) বরখাস্ত করে তাঁদের ওপর আম্মারকে নিয়োগ করলেন। এরপরও তারা অভিযোগ করতে লাগল, এমনকি তারা বলল যে, তিনি ঠিকভাবে সালাত আদায় করতে পারেন না। তখন (উমার রাঃ) তাঁর (সা'দ) কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন, হে আবূ ইসহাক! (সা'দের উপনাম) এই লোকেরা দাবি করছে যে আপনি ঠিকমতো সালাত আদায় করতে পারেন না। আবূ ইসহাক বললেন, আল্লাহর কসম! আমি তো তাদের নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সালাতের মতোই সালাত আদায় করতাম, এর থেকে কোনো কিছু বাদ দিতাম না। আমি ইশার সালাত পড়তাম এবং প্রথম দুই রাকাতে লম্বা করতাম এবং শেষের দুই রাকাতে সংক্ষিপ্ত করতাম। তিনি (উমার রাঃ) বললেন, হে আবূ ইসহাক! আপনার প্রতি এমন ধারণাই পোষণ করা যায়।
এরপর তিনি সা'দের সঙ্গে এক বা দু'জন লোককে কুফায় পাঠালেন। তারা কুফার অধিবাসীদের কাছে তাঁর (সা'দের) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তারা এমন কোনো মসজিদ বাকি রাখলেন না যেখানে তাঁর ব্যাপারে জিজ্ঞেস করেননি। আর লোকেরা তাঁর প্রশংসা করত। অবশেষে তাঁরা বানী আবস্ গোত্রের একটি মসজিদে প্রবেশ করলেন। তাদের মধ্যে উসামা ইবনে ক্বাতাদাহ নামক আবূ সা'দাহ উপনামধারী এক ব্যক্তি দাঁড়ালেন এবং বললেন, যেহেতু আপনি আমাদের কাছে কসম করে জানতে চেয়েছেন, তাই বলছি: সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সামরিক অভিযানে লোক পাঠাতেন না, তিনি সম্পদ ন্যায্যভাবে ভাগ করতেন না এবং বিচারে ন্যায়বিচার করতেন না।
সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই তিনটি দু'আ করব: হে আল্লাহ! যদি তোমার এই বান্দা মিথ্যাবাদী হয়ে থাকে, কেবল রিয়া (লোক দেখানো ইবাদত) ও সুখ্যাতি লাভের জন্য দাঁড়িয়ে থাকে, তবে তার হায়াতকে দীর্ঘ করে দাও, তার দারিদ্র্যকে দীর্ঘ করে দাও এবং তাকে ফিতনার সম্মুখীন করো।
এরপর যখনই তাকে (উসামাকে) জিজ্ঞেস করা হতো, সে বলত: আমি এক বুড়ো, ফিতনাগ্রস্ত মানুষ। সা'দের বদ দু'আ আমাকে পেয়ে বসেছে।
(বর্ণনাকারী) আব্দুল মালিক বলেন: আমি তাকে এরপরে দেখেছি, বার্ধক্যজনিত কারণে তার ভ্রুদ্বয় চোখের ওপর ঝুলে পড়েছিল এবং সে রাস্তায় যুবতী দাসীদের উত্ত্যক্ত করত।
1954 - عن أبي معمر قال: قلنا لخبَّاب: أكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في الظهر والعصر؟ قال: نعم، قلنا: بم كنتم تعرفون ذلك؟ قال: باضطراب لحيته.
صحيح: رواه البخاري في الأذان (746) من طريق الأعمش قال: سمعت عمارة بن عمير، يُحدث عن أبي معمر قال: فذكر الحديث. وأبو معمر هو: عبد الله بن سَخْبرة - بفتح المهملة، وسكون المعجمة، وفتح الموحدة - الأزدي الكوفيّ.
খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু মা’মার বলেন, আমরা খাব্বাবকে জিজ্ঞাসা করলাম: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি যুহর ও আসরের সালাতে কিরাত পাঠ করতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আমরা জিজ্ঞাসা করলাম: আপনারা তা কীসের মাধ্যমে জানতে পারতেন? তিনি বললেন: তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাড়ির নড়াচড়া দেখে।
1955 - عن أبي سعيد الخدري قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في صلاة الظهر في الركعتين الأوليين في كل ركعة قدر ثلاثين آية، وفي الأخريين قدر خمس عشرة آية، أو قال: نصف ذلك. وفي العصر في الركعتين الأوليين في كل ركعة قدر قراءة خمس عشرة آية، وفي الأخريين قدر نصف ذلك.
وفي رواية: فحزرنا قيامه في الركعتين الأوليين من الظهر قدر قراءة {الم (1) تَنْزِيلُ} [السجدة] وحزرنا قيامه في الأخريين قدر النصف من ذلك، وحرزنا قيامه في الركعتين الأوليين من العصر على قدر قيامه في الأخريين من الظهر، وفي الأخرين من العصر على النصف من ذلك.
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (452) من طريق منصور، عن الوليد بن أبي بشر، عن أبي الصديق الناجي، عن أبي سعيد فذكره. وفي رواية أخرى (454) قال: لقد كانت صلاة الظهر تقام، فيذهب الذاهب إلى البقيع، فيقضي حاجته، ثم يتوضأ، ثم يأتي ورسول الله صلى الله عليه وسلم في الركعة الأولى مما يطولها.
আবূ সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যুহরের সালাতে প্রথম দু’ রাকা‘আতে প্রতি রাকা‘আতে প্রায় ত্রিশ আয়াত পরিমাণ পড়তেন, আর শেষের দু’ রাকা‘আতে পনেরো আয়াত পরিমাণ পড়তেন, অথবা তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: এর অর্ধেক। আর আছরের সালাতে প্রথম দু’ রাকা‘আতে প্রতি রাকা‘আতে প্রায় পনেরো আয়াত পরিমাণ পড়তেন, আর শেষের দু’ রাকা‘আতে এর অর্ধেক পরিমাণ পড়তেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমরা যুহরের প্রথম দু’ রাকা‘আতে তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের) কিয়াম (দাঁড়িয়ে থাকার সময়) অনুমান করলাম {আলিফ লাম মীম তানযীল} [সূরাহ সাজদাহ] পড়ার সমপরিমাণ, আর শেষের দু’ রাকা‘আতে তাঁর কিয়াম তার অর্ধেক পরিমাণ অনুমান করলাম। আর আছরের প্রথম দু’ রাকা‘আতে তাঁর কিয়াম যুহরের শেষ দু’ রাকা‘আতে তাঁর কিয়ামের সমপরিমাণ অনুমান করলাম, আর আছরের শেষের দু’ রাকা‘আতে তাঁর কিয়াম এর অর্ধেক পরিমাণ অনুমান করলাম।
অন্য এক বর্ণনায় আছে, তিনি (আবূ সাঈদ) বলেন: যুহরের সালাতের ইক্বামাত (ইকামত) দেওয়া হতো। অতঃপর যে ব্যক্তি জান্নাতুল বাক্বী'তে যেতো, সে তার প্রয়োজন পূর্ণ করে ওযূ (অযু) করে আসতো, তখনও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রথম রাকা‘আতেই থাকতেন, কারণ তিনি তা অনেক দীর্ঘ করতেন।
1956 - عن جابر بن سمرة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} وفي الصبح بأطول من ذلك.
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (460) من طريق أبي داود الطيالسي، عن شعبة، عن سماك، عن جابر بن سمرة فذكره.
وهو في مسند أبي داود الطيالسي (800) من هذا الوجه وفيه:"يقرأ في الظهر والعصر - بـ {وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَى} ونحوها، ويقرأ في الصبح بأطول من ذلك. وهذا اللفظ أخرجه مسلم (459) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن شعبة به.
ورواه ابن خزيمة (510) من طريق أبي داود الطيالسي، بإسناده، وفيه: {وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَى} و {وَالشَّمْسِ وَضُحَاهَا} ونحوها والباقي مثله.
জাবির ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহরের সালাতে {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ‘লা} (সূরা আল-আ‘লা) দ্বারা কিরাত পড়তেন, আর ফজরের সালাতে এর চেয়ে দীর্ঘ সূরা দ্বারা কিরাত পড়তেন।
1957 - عن جابر بن سمرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر والعصر بـ {وَالسَّمَاءِ وَالطَّارِقِ} و {وَالسَّمَاءِ ذَاتِ الْبُرُوجِ} ونحوهما من السور.
حسن: رواه أبو داود (805) والترمذي (307) والنسائي (979) والدارمي (1293) كلّهم من طريق حماد بن سلمة، عن سماك بن حرب، عن جابر بن سمرة فذكره، وزاد الدارمي: {وَالْعَصْر}.
قال الترمذي: حسن صحيح. كذا في نسخة، ونقل المنذري عن الترمذي تحسينه فقط، وهو الصّواب فإن سماك بن حرب ليس في مرتبة"ثقة" بل وقد تغير بآخره، ولكن يحسن حديثه.
জাবির ইবন সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যোহর এবং আসরের সালাতে {وَالسَّمَاءِ وَالطَّارِقِ} (সূরা তারিক) এবং {وَالسَّمَاءِ ذَاتِ الْبُرُوجِ} (সূরা বুরূজ) ও অনুরূপ সূরাসমূহ তিলাওয়াত করতেন।
1958 - عن عبد الله بن عبيد الله بن عباس بن عبد المطلب قال: دخلت على ابن عباس في شباب من بني هاشم، فقلنا لشاب منا: سَلْ ابن عباس أكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في الظهر والعصر؟ فقال: لا، لا. فقيل له: فلعله كان يقرأ في نفسه، فقال: خَمشًا هذه شر من الأولى، كان عبدًا مأمورًا بلَّغ ما أرسل به، وما اختصَّنا دون الناس بشيْء إلا بثلاث خصال:"أمرنا أن نُسْبغ الوضوء، وأن لا نأكل الصدقة، وأن لا نُنزي الحمار على الفرس".
حسن: رواه أبو داود (808) واللفظ له، والترمذي (1701) والنسائي (141) وابن ماجه (426) كلهم من طرق عن أبي جهضم موسى بن سالم، عن عبد الله بن عبيد الله به فذكر مثله، قال الترمذي: حسن صحيح؛ إلا أن ابن ماجه اختصره.
قلت: إسناده حسن لأجل أبي جهضم موسى بن سالم فإنه صدوق، وسبق تخريجه في كتاب الوضوء - باب وجوب استيعاب جميع أجزاء محل الطهارة.
اختلفت الروايات عن ابن عباس في قراءة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الظهر والعصر، فروي عنه النفي كما في هذه الرواية، ثم التردد فيه كما رواه أبو داود (809) عن زياد بن أيوب، حدثنا هشيم، أخبرنا حصين، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: لا أدري أكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في الظهر والعصر أم لا؟ .
ثم اليقين بالقراءة كما رواه الطحاوي في شرح معاني الآثار (1/ 206) عن يزيد بن هارون قال: أنا إسماعيل بن أبي خالد، عن العيزار بن حريث، عن ابن عباس قال: اقرأ خلف الإمام بفاتحة الكتاب في الظهر والعصر. ورواه أيضًا عن علي بن شيبة قال: ثنا أبو نعيم، قال: ثنا يونس بن أبي إسحاق، عن العيزار بن حريث قال: شهدت ابن عباس فسمعتُه يقول: لا تُصلِّ صلاة إلا قرأت فيها ولو بفاتحة الكتاب. ورواه أيضًا عن أحمد بن داود بن موسى، قال: ثنا عبيد الله بن محمد التيمي وموسى بن إسماعيل قال: ثنا حماد بن سلمة، عن أيوب، عن أبي العالية البراء قال: سألت ابن عباس، أو سئل عن القراءة في الظهر والعصر؟ فقال: هو إمامك (أي القرآن) فاقرأ منه ما قلَّ
وما كثر، وليس من القرآن شيء قليل.
ثم قال الطحاوي بعد أن روى القراءة في الظهر والعصر عن عدد من الصّحابة منهم: أبو قتادة، وأبو سعيد الخدري، وجابر بن سمرة وغيرهم:"فلما ثبت بما ذكرنا من رسول الله صلى الله عليه وسلم تحقيق القراءة في الظهر والعصر، وانتفى ما روي عن ابن عباس ما يخالف ذلك، رجعنا إلى النظر بعد ذلك، هل نجد فيه ما يدل على صحة أحد القولين اللذين ذكرنا …" ثم رجَّع بالأدلة القاطعة وجوب القراءة في الظهر والعصر.
আবদুল্লাহ ইবনে উবাইদুল্লাহ ইবনে আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বনী হাশিমের কিছু যুবকের সাথে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। আমরা আমাদের এক যুবককে বললাম: তুমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করো, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি যুহর (দুপুর) এবং আসর (বিকেল) এর সালাতে কিরাত (কুরআন) পড়তেন? তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: না, না। তখন তাকে বলা হলো: সম্ভবত তিনি মনে মনে পড়তেন। তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: হায় আফসোস! এটা তো প্রথমটির চেয়েও খারাপ কথা! তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছিলেন আল্লাহর আজ্ঞাবহ বান্দা, তাঁকে যা দিয়ে পাঠানো হয়েছিল তিনি তা পৌঁছে দিয়েছেন। তিনি শুধুমাত্র তিনটি বিষয় ছাড়া অন্য কোনো কিছুতে আমাদের (বনী হাশিমকে) সাধারণ মানুষ থেকে আলাদা করেননি। (তা হলো:) তিনি আমাদের পূর্ণাঙ্গরূপে উযূ (ওযু) করতে আদেশ করেছেন, সাদাকা (যাকাত) গ্রহণ না করতে আদেশ করেছেন, এবং গাধাকে ঘোড়ার উপর প্রজনন ঘটাতে নিষেধ করেছেন।
1959 - عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة قال: ما صليت وراء أحد أشبه صلاة برسول الله صلى الله عليه وسلم من فلان.
قال سليمان: فصلينا وراء ذلك الإنسان وكان يُطيل الأُولَيين من الظهر، ويخفف في الأخريين، ويُخَفِّفُ في العصر ويقرأ في المغرب بقصار المُفَصَّل، ويقرأ في العشاء بالشمس وضحاها وأشباهِها، ويقرأ في الصبح بسورتين طويلتين.
حسن: رواه النسائي (982، 983) واللفظ له، وابن ماجه (827) مختصرًا كلاهما من طريق الضحاك بن عثمان، عن بكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل الضحاك بن عثمان فإنه حسن الحديث.
وصحَّحه ابن خزيمة فأخرجه في صحيحه (520)، وابن حبان (1837)، وأحمد (8366) كلهم من هذا الطريق.
وفيه يقول أبو هريرة:"ما رأيت أحدًا أشبه صلاة برسول الله صلى الله عليه وسلم من فلان - لأمير كان بالمدينة".
يقول سليمان بن يسار:"فصلَّيت أنا وراءه فكان يُطيل في الأُوليين، ويخفف الأخريين، ويخفف العصر. وكان يقرأ في الأوليين من المغرب بقصار المفصل، وفي الأُوليين من العشاء بوسط المفصل، وفي الصبح بطول المفصل" انتهى.
ولم أقف على اسم هذا الأمير، وقد قيل اسمه عمرو بن سلمة، وليس هو عمر بن عبد العزيز كما سيأتي في حديث الضّحاك بن عثمان، فإنه ولد بعد وفاة أبي هريرة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অমুক ব্যক্তির চেয়ে অন্য কারো পেছনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের সাথে এত বেশি সাদৃশ্যপূর্ণ সালাত আদায় করতে দেখিনি।
সুলাইমান (বিন ইয়াসার) বলেন: আমরাও সেই ব্যক্তির পেছনে সালাত আদায় করলাম। তিনি যুহরের প্রথম দু'রাকাআত দীর্ঘ করতেন এবং শেষ দু'রাকাআত হালকা করতেন। তিনি আসরের সালাত হালকা করতেন। মাগরিবের সালাতে তিনি কিসার আল-মুফাস্সাল (মুফাস্সাল-এর ছোট সূরাগুলো) দ্বারা কিরাআত করতেন। ইশার সালাতে তিনি ‘ওয়াশ শামসি ওয়া দুহাহা’ (সূরা শামস) এবং তার মতো সূরাসমূহ দ্বারা কিরাআত করতেন। আর ফজরের সালাতে তিনি দুটি লম্বা সূরা দ্বারা কিরাআত করতেন।
1960 - عن أنس بن مالك، قال: ما رأيتُ أحدًا أشبه بصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم من هذا الفتى، يعني عمر بن عبد العزيز.
قال الضّحاك: فصليتُ خلف عمر بن عبد العزيز فكان يصنع مثل ما قال سليمان بن يسار.
حسن: رواه أحمد (8366) عن أبي بكر الحنفي، حدّثنا الضحاك بن عثمان، حدثني بكير بن عبد الله بن الأشج، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة، فذكر الحديث كما سبق.
وقال الضحاك: وحدثني من سمع أنس بن مالك يقول (فذكره).
وكذا ذكره أيضًا البيهقي (2/ 388) وقال (فذكر الحديث بنحوه) بالإسنادين جميعًا.
ولم يسم هنا الضحاك عمن سمع حديث أنس، وصرَّح في موضع آخر أنه هو يحيى بن سعيد أو شريك بن أبي نمر لا يُدرى أيهما حدثه عن أنس.
أخرجه ابن سعد في الطبقات (5/ 332) عن محمد بن إسماعيل بن أبي فديك، عن الضحاك بن عثمان، عن يحيى بن سعيد أو عن شريك بن أبي نمر، به.
قال الضحاك: وكنت أصلي خلفه، فكان يطيل الأوليين من الظهر إلى آخره.
ولأنس حديث آخر ذكر فيه وصف صلاته مجملًا.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এই যুবক—অর্থাৎ উমর ইবনু আব্দুল আযীয—এর চেয়ে বেশি আর কাউকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সালাতের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ দেখিনি।
আদ-দাহহাক বলেন, আমি উমর ইবনু আব্দুল আযীযের পিছনে সালাত আদায় করলাম, তখন তিনি সুলাইমান ইবনু ইয়াসার যা বলেছেন, ঠিক সেভাবেই (সালাত) করতেন।
1961 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر والعصر: {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ}.
صحيح: رواه البزار"كشف الأستار" (482) عن محمد بن معمر، ثنا روح بن عبادة، ثنا حماد بن سلمة، عن ثابت وقتادة وحُميد، عن أنس فذكر الحديث.
ورجاله تقات وإسناده صحيح، قال الهيثمي (2687)،"رواه البزار ورجاله رجال الصحيح، ورواه الطبراني في الأوسط".
ورواه ابن خزيمة (512)، وابن حبان (1824) كلاهما من حديث محمد بن معمر بن ربعي القيسي، قال: حدثنا روح بن عبادة بإسناده مثله.
وفيه:"أنهم كانوا يسمعون منه النغمة في الظهر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} ....".
وأخرجه النسائي (973) من وجه آخر عن أنس نحوه.
وقال البوصيري في"الإتحاف" (1850) بعد أن رواه عن أبي بكر بن أبي شيبة قال: ثنا سعيد بن سليمان، ثنا عبادة بن سفيان بن حسين، أنبأنا أبو عبيدة، عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى}. قال: رواه البزار بإسناد صحيح: إن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر والعصر {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ}. انتهى.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যুহরের ও আসরের সালাতে (নামাজে) {সুবহানাল্লাযী সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ’লা} এবং {হাল আতা-কা হাদীসুল গা-শিয়াহ্} তিলাওয়াত করতেন।
1962 - عن زيد بن أسلم، قال: دخلنا على أنس بن مالك فقال: صليتُم؟ قلنا: نعم. قال: يا جارية! هلُمّي لي وَضُوءًا ما صليتُ وراء إمام أشبه صلاةً برسول الله صلى الله عليه وسلم من إمامكم هذا.
قال زيد: وكان عمر بن عبد العزيز يُتم الركوع والسجود ويخفّف القيام والقعود.
حسن: رواه النسائي (981) عن قتيبة، قال: حدّثنا العطَّاف بن خالد، عن زيد بن أسلم، قال (فذكره). وإسناده حسن من أجل الكلام في العطّاف بن خالد المخزوميّ إلا أنه حسن الحديث إذا
لم يخالف.
وله إسناد آخر وهو ما رواه أحمد (13672) عن إبراهيم بن خالد، قال: أخبرني أمية بن شبل، عن عثمان بن يَزْدريه، قال: خرجتُ إلى المدينة مع عمر بن يزيد، وعمر بن عبد العزيز عامل عليها قبل أن يُستخلف. قال: فسمعتُ أنس بن مالك - وكان به وضع شديد، قال: وكان عمر يصلي بنا فقال أنس: ما رأيتُ أحدًا أشبه صلاة بصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم من هذا الفتى، كان يخفف في تمام. وإسناده حسن.
وهذا يقوي ما رواه أبو داود (888)، والنسائي (1135)، والإمام أحمد (12661) كلهم من حديث عبد الله بن إبراهيم بن عمر بن كيسان، حدثني أبي، عن وهب بن مانوس، قال: سمعت سعيد بن جبير يقول: سمعت أنس بن مالك يقول: ما صليتُ وراء أحد بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم أشبه صلاة برسول الله صلى الله عليه وسلم من هذا الفتى - بعني عمر بن عبد العزيز - قال: فحزرنا في ركوعه عشر تسبيحات، وفي سجوده عشر تسبيحات.
ووهب بن مانوس ذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 557) ولم أجد من وثقه غيره؛ ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مستور".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যায়দ ইবনে আসলাম (রহ.) বলেন, আমরা আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, তোমরা কি সালাত আদায় করেছো? আমরা বললাম, হ্যাঁ। তিনি বললেন, হে দাসী! আমার জন্য ওযূর পানি নিয়ে এসো। আমি তোমাদের এই ইমামের চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের সাথে অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ সালাত আদায়কারী আর কারো পেছনে সালাত আদায় করিনি।
যায়দ (রহ.) বলেন, উমার ইবনে আব্দুল আযীয (রহ.) রুকু ও সিজদাহ পরিপূর্ণ করতেন, কিন্তু ক্বিয়াম (দাঁড়ানো) ও ক্বুউদ (বসা) হালকা করতেন।
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে আমি এই যুবকের (অর্থাৎ উমার ইবনে আব্দুল আযীযের) সালাতের চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের সাথে অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ সালাত আর কারো পেছনে পড়িনি। বর্ণনাকারী বলেন: আমরা হিসাব করে দেখতাম যে, তিনি তাঁর রুকুতে দশটি তাসবীহ এবং তাঁর সিজদাহয় দশটি তাসবীহ পাঠ করতেন।
1963 - عن عبد الله بن بريدة الأسلمي، عن أبيه أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الظهر بـ {إِذَا السَّمَاءُ انْشَقَّتْ} ونحوها.
حسن: رواه ابن خزيمة (511) عن محمد بن حرب الواسطي، ثنا زيد بن الحباب، عن الحسن بن واقد قاضي مرو، قال: أخبرني عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكر الحديث. وإسناده حسن لأجل الحسين بن واقد فإنه"صدوق" لأن أكثر النقاد قالوا: إنه لا بأس به، وهو من رجال مسلم، وأما الحافظ فجعله في مرتبة"ثقة له أوهام" وهو أحق أن يقال فيه:"صدوق" وسيأتي حديث آخر عن بريدة الأسلمي بهذا الإسناد في باب القراءة في صلاة العشاء، وفي الإسناد أيضًا زيد بن الحباب وهو ممن يحسن حديثه.
বুরায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যোহরের সালাতে সূরা {ইযাস সামাউ ইনশাক্কাত} এবং অনুরূপ সূরাগুলো পাঠ করতেন।
1964 - عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: كانت تعرف قراءة النبي صلى الله عليه وسلم في الظهر بتحريك لحيته.
صحيح: رواه الإمام أحمد (23153) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن أبي الزعراء، عن أبي الأحوص، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.
ورواه ايضًا ابن أبي شيبة (1/ 362) عن وكيع، عن سفيان به مثله.
وأورده البوصيري في"إتحاف المهرة" (1851) من ابن أبي شيبة وأحمد وقال:"هذا إسناد رجاله ثقات، وأبو الزعراء هو: عمرو بن عمرو". انتهى.
قلت: وهو كما قال، فإن عمرو بن عمرو بن مالك أبو الزعراء وإن لم يخرج عنه الشيخان إلا
أنه ثقة، فقد وثَّقه ابن معين، وقال أحمد: شيخ ثقة، ووثَّقه العجلي والنسائي في الكنى، وقال ابن عبد البر: أجمعوا على أنه ثقة. ولكن قال فيه أبو حاتم: صدوق.
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো এক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যোহরের সালাতে কিরাআত (তিলাওয়াত) তাঁর দাড়ি মোবারকের নড়াচড়া দেখে বোঝা যেত।
1965 - عن ابن عباس قال: إن أم الفضل بنت الحارث سمعتْه وهو يقرأ: {وَالْمُرْسَلَاتِ} فقالت: يا بنيَّ! لقد ذكرتني بقراءتك هذه السورة، إنها لآخر ما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ بها في المغرب.
متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (24) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن
مسعود، عن عبد الله بن عباس فذكره.
وعن مالك رواه البخاري في الأذان (763) ومسلم في الصلاة (462).
ورواه البخاري في المغازي (4429) ومسلم كلاهما من طرق عن الزهري من غير حديث مالك، وفيه:"ثم ما صلي لنا بعدها حتى قبضه الله".
أي أنها آخر صلوات صلَّاها رسول صلى الله عليه وسلم وهي المغرب، وسيأتي في حديث عائشة في باب:"من أحق الناس بالإمامة" أن آخر صلاة صلاها رسول الله صلى الله عليه وسلم هي صلاة الظهر - ويمكن الجمع بين الحديثين الصحيحين بأن الظهر صلاها مع أبي بكر في المسجد، وصلاة المغرب صلاها مع أهله في بيته، فأم الفضل تحكي ما صلَّاها في بيته، وعائشة تحكي ما صلاها في المسجد.
وأما ما روي عن أنس بن مالك، عن أم الفضل بنت الحارث قالت:"صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيته المغرب، فقرأ المرسلات، ما صلى بعد صلاة حتى قُبض صلى الله عليه وسلم". فالصحيح هو من حديث ابن عباس كما ذكر.
وأما هذا فرواه موسى بن داود، قال: حدثنا عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون، عن حميد، عن أنس، فذكره.
ومن طريقه رواه النسائي (985)، وأحمد (26871)، والطحاوي في شرحه (1228) ونبّه على هذا الخطأ أبو حاتم وأبو زرعة في"العلل" لابن أبي حاتم (1/ 84 - 85) بأن موسى بن داود - وهو الضبي - أدخل حديثا في حديث. فقراءة النبيّ صلى الله عليه وسلم في المغرب سورة المرسلات من حديث ابن عباس عن أم الفضل، وصلاة النبي صلى الله عليه وسلم متوشحًا في ثوب هو حديث أنس، فتبّه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উম্মুল ফাদল বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (ইবনে আব্বাসকে) শুনতে পেলেন যখন তিনি 'ওয়াল মুরসালাত' (সূরা আল-মুরসালাত) তিলাওয়াত করছিলেন। তখন তিনি বললেন, "হে আমার পুত্র! তোমার এই সূরা তিলাওয়াত আমাকে স্মরণ করিয়ে দিল, এটিই শেষ সূরা যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মাগরিবের সালাতে তিলাওয়াত করতে শুনেছি।"
1966 - عن جبير بن مطعم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ بالطور في المغرب.
متفق عليه: رواه مالك في الصلاة (23) عن ابن شهاب، عن محمد بن جبير بن مطعم، عن أبيه فذكره. ومن طريق مالك رواه البخاري في الأذان (765)، ومسلم في الصلاة (413).
জুবাইর ইবনু মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মাগরিবের সালাতে সূরাহ আত-তূর পাঠ করতে শুনেছি।
1967 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في المغرب بقصار المفصّل.
حسن: رواه الطحاوي في شرح المعاني (1243) من حديث أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا زيد بن الحباب، قال: ثنا الضحاك بن عثمان، قال: حدثني بكير بن الأشج، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده حسن.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিবের সালাতে ক্বিসারুল মুফাস্সালের (ছোট ছোট) সূরাগুলো তিলাওয়াত করতেন।
