আল-জামি` আল-কামিল
1988 - عن عوف بن مالك الأشجعي، قال: قمتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة، فقام فقرأ سورة البقرة، لا يمر بآية رحمة إلا وقف فسأل، ولا يمر بآية عذاب إلا وقف فتعوّذ.
حسن: رواه أبو داود (783)، والنسائي (1132)، وأحمد (23980) كلهم من حديث معاوية بن صالح، عن عمرو بن قيس، عن عاصم بن حميد، عن عوف بن مالك الأشجعي، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن حميد فإنه حسن الحديث.
আওফ ইবনে মালিক আল-আশজা‘ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (নামাযে) দাঁড়ালাম, তিনি দাঁড়ালেন এবং সূরাহ আল-বাক্বারাহ পড়লেন। তিনি যখনই কোনো রহমতের আয়াত অতিক্রম করতেন, তখনই থামতেন এবং (আল্লাহর কাছে) প্রার্থনা করতেন, আর যখনই কোনো আযাবের আয়াত অতিক্রম করতেন, তখনই থামতেন এবং (আল্লাহর কাছে) আশ্রয় চাইতেন।
1989 - عن موسى بن أبي عائشة، قال: كان رجل يصلي فوق بيته، وكان إذا قرأ: {أَلَيْسَ ذَلِكَ بِقَادِرٍ عَلَى أَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتَى} [القيامة: 40] قال: سبحانك، فبلى. فسألوه عن ذلك، فقال: سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه أبو داود (884) عن محمد بن المثنى، حدّثنا محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن موسى بن أبي عائشة، فذكره. ومن طريقه رواه البيهقي (2/ 310).
وإسناده صحيح، ولا يضر عدم معرفة اسم الصحابي.
قال ابن كثير:"تفرد به أبو داود، ولم يسم هذا الصحابي ولا يضر ذلك".
وقد أعلّه البعض بأن موسى بن أبي عائشة ثقة لم يلق أحدا من الصحابة، ولكن في الإسناد ما يدل على أنه سمع من هذا الرجل الذي يصلي فوق بيته، وهو صحابي.
ويقويه مرسل قتادة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا قرأها قال:"سبحانك فبلى" رواه ابن جرير الطبري وغيره بإسناد صحيح إلى قتادة.
মূসা ইবনু আবী আইশা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি তাঁর বাড়ির ছাদে সালাত আদায় করতেন। আর যখন তিনি এই আয়াতটি পড়তেন: {আল্লাহ কি মৃতদেরকে জীবিত করতে সক্ষম নন?} (সূরা আল-কিয়ামাহ: ৪০), তখন তিনি বলতেন: "সুবহানাকা ফাবালা" (আপনি পবিত্র, হ্যাঁ নিশ্চয়ই)। লোকেরা তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: আমি এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি।
1990 - عن ابن عباس، أنّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا قرأ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} [الأعلى: 1] قال:"سبحان ربي الأعلى".
صحيح: رواه أبو داود (883) عن زهير بن حرب، حدثنا وكيع، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره. ورواه الإمام أحمد (2066)، والحاكم (1/ 263) كلاهما من حديث وكيع. وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: ولكن أعلّه أبو داود فقال:"خولف وكيع في هذا الحديث. رواه أبو وكيع وشعبة عن أبي إسحاق، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس موقوفًا".
قلت: أبو وكيع هو الجراح بن مليح بن عدي. قال في القريب:"صدوق يهم" ولكن متابعة شعبة له تقويه، كما أن شعبة ممن سمع من أبي إسحاق قبل اختلاطه، فالموقوف هو الأشبه، وله حكم الرفع، فلعلّ أبا إسحاق وهو السبيعي روي من وجهين.
ورواه الحاكم (2/ 521) من وجه آخر عن سعيد بن جبير، عن ابن عمر أنه كان إذا قرأ: {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} قال:"سبحان ربي الأعلى الذي خلق فسوّى. قال: وهي قراءة أبي بن كعب".
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وفي الباب ما رُوي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من قرأ منكم: {وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ} فانتهى إلى آخرها {أَلَيْسَ اللَّهُ بِأَحْكَمِ الْحَاكِمِينَ} فليقل: بلى، وأنا على ذلك من الشاهدين. ومن قرأ: {لَا أُقْسِمُ بِيَوْمِ الْقِيَامَةِ} فانتهى إلى {أَلَيْسَ ذَلِكَ بِقَادِرٍ عَلَى أَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتَى} فليقل: بلى. ومن قرأ: {وَالْمُرْسَلَاتِ عُرْفًا} فبلغ {فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ} فليقل: آمنا بالله".
قال إسماعيل: ذهبتُ أعيد على الرجل الأعرابي وأنظر لعله؟ ! فقال: يا ابن أخي، أتظن أني لم أحفظه؟ لقد حججتُ ستين حجّة ما منها حجة إلا وأنا أعرف البعير الذي حججت عليه.
رواه أبو داود (887) - واللفظ له -، وأحمد (7391)، والترمذي (3347) مختصرًا كلّهم من حديث سفيان، قال: حدثني إسماعيل بن أمية، قال: سمعت أعرابيا يقول: سمعت أبا هريرة يقول (فذكره).
قال الترمذي:"إنما يروى بهذا الإسناد عن الأعرابي ولا يسمي".
قلت: علة هذا الحديث جهالة الأعرابي الذي لم يسم.
وإن قال ابن كثير في"تفسيره": وقد رواه شعبة، عن إسماعيل بن أمية، قال: قلت له من حدّثك؟ قال: رجل صدق عن أبي هريرة، فهو على كل حال مجهول.
ورواه الحاكم (2/ 510) من وجه آخر عن إسماعيل بن أمية، عن أبي اليسع، عن أبي هريرة، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا قرأ: {أَلَيْسَ ذَلِكَ بِقَادِرٍ عَلَى أَنْ يُحْيِيَ الْمَوْتَى} قال: بلى. وإذا قرأ: {أَلَيْسَ اللَّهُ بِأَحْكَمِ الْحَاكِمِينَ} قال: بلى.
وقال: صحيح الإسناد.
وأبو اليسع قال فيه الذهبي في"الميزان":"مجهول". ولعله هو الأعرابي نفسه كما في الإسناد الأول.
ويستفاد من هذا الباب أنه يستحب للإمام والمأموم السؤال عند المرور بآية فيها ذكر الرحمة والجنة، والتعوذ عند المرور بآية فيها ذكر العذاب والنار، والتسبيح عند قراءة آية فيها التنزيه والتسبيح، وهو قول الشافعية كما نقله النووي في"شرح مسلم".
وقيده بعض أهل العلم بصلاة النافلة وهم الحنابلة، وقالوا: ولا يستحب ذلك في الفريضة؛ لأنه لم ينقل عن النبي صلى الله عليه وسلم في فريضة مع كثرة من وصف قراءته فيها. انظر: المغني (1/ 632).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন {সَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} (তোমার মহান রবের নামের পবিত্রতা ঘোষণা করো) তেলাওয়াত করতেন, তখন তিনি বলতেন: "সুবহানা রাব্বিয়াল আ'লা।"
1991 - عن أبي يعفور قال: سمعتُ مصعب بن سعد يقول: صليت إلى جنب أبي، فطبَّقتُ بين كفيَّ، ثم وضعتُهما بين فخذِيَّ، فنهاني أبي وقال:"كنَّا نفعله فنُهينا عنه، وأمرنا أن نضع أيدينا على الركب".
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (790)، ومسلم في المساجد (535) كلاهما من طريق أبي يعفور به مثله، واللفظ للبخاري.
وفي لفظ مسلم:"وجعلت يديَّ بين ركبتيَّ فقال لي أبي: اضرب بكفيك على ركبتيك، قال: ثم فعلت ذلك مرة أخرى، فضرب يديَّ وقال: إنا نُهِينا عن هذا، وأُمرنا أن نضربَ بالأكفِّ على الركب.
وفي رواية عنده من طريق الزبير بن عدي، عن مصعب بن سعد بن أبي وقاص قال:"صليت إلى جنب أبي، فلما ركعتُ شَبّكْتُ أصابعي، وجعلتُهما بين ركبتيَّ، فضرب يديَّ، فلما صلى قال: قد كنَّا نفعلُ هذا، ثم أُمرنا أن نرفع إلى الركب".
قال الترمذي (2/ 44): والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم والتابعين، ومن بعدهم، لا اختلاف بينهم في ذلك إلا ما روي عن ابن مسعود وبعض أصحابه، أنهم كانوا يُطبقون، والتطبيق منسوخ عند أهل العلم". وسيأتي حديث عبد الله بن مسعود.
আবু ইয়া'ফুর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মুসআব ইবনু সা'দকে বলতে শুনেছি: আমি আমার পিতার (সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস) পাশে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলাম। তখন আমি আমার উভয় হাত একত্রিত করে (আঙ্গুলগুলো পরস্পরের সাথে মিলিয়ে) সে দুটোকে আমার উরুর মাঝখানে রাখলাম। আমার পিতা তখন আমাকে নিষেধ করলেন এবং বললেন, "আমরা এটা করতাম, কিন্তু পরে আমাদের এটা করতে নিষেধ করা হয়েছে এবং নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যেন আমরা আমাদের হাত হাঁটুতে রাখি।"
মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় আছে: আমি আমার হাত দু'টো আমার হাঁটুর মাঝখানে রাখলাম। তখন আমার পিতা আমাকে বললেন: তুমি তোমার হাতের তালু দিয়ে তোমার হাঁটু ধরে রাখো। তিনি (মুসআব) বলেন, এরপর আমি আরেকবার তা-ই করলাম (হাঁটুর মাঝে রাখলাম)। তখন তিনি আমার হাতে আঘাত করলেন এবং বললেন: আমাদেরকে এটা করতে নিষেধ করা হয়েছে এবং নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যেন আমরা হাতের তালু দিয়ে হাঁটু ধরে রাখি।
তাঁর (মুসলিমের) অন্য একটি বর্ণনায় যুুবাইর ইবনু আদী হতে, তিনি মুসআব ইবনু সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেন: আমি আমার পিতার পাশে দাঁড়িয়ে সালাত পড়ছিলাম। যখন আমি রুকূ করলাম, তখন আমি আমার আঙ্গুলগুলো পরস্পরের সাথে মিশিয়ে নিলাম এবং সে দুটোকে আমার হাঁটুর মাঝে রাখলাম। তখন তিনি আমার হাতে আঘাত করলেন। যখন সালাত শেষ হলো, তিনি বললেন: আমরা এই রকম করতাম, অতঃপর আমাদেরকে হাঁটু পর্যন্ত (হাত) উঠানোর জন্য নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।
ইমাম তিরমিযী (২/৪৪) বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ ও তাবেয়ীগণসহ পরবর্তী আলেমদেরও এই মতের ওপরই আমল রয়েছে। এ ব্যাপারে তাদের মাঝে কোনো মতপার্থক্য নেই। তবে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর কিছু সাথী থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, তারা ‘তাত্ববীক্ব’ (হাতের তালু একত্রিত করে উরুর মাঝে রাখা) করতেন, তা ভিন্ন কথা। আলেমদের নিকট ‘তাত্ববীক্ব’ মানসূখ (রহিত) হয়ে গেছে। আর আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস পরে আসছে।
1992 - عن الأسود وعلقمة قالا: أتينا عبد الله بن مسعود في داره فقال: أصَلَّى هؤلاء خلْفكم؟ فقلنا: لا، قال: فقوموا فصلُّوا، فلم يأمرنا بأذان ولا إقامة، قال: وذهبنا لنقومَ خلْفه، فأخذ بأيدينا فجعل أحدنا عن يمينه، والآخر عن شماله، قال: فلما ركع وضعنا أيدينا على ركبنا، قال: فضرب أيدينا، وطبَّق بين كفَّيه، ثم أدخلهما بين فخذيه، قال: فلما صلَّى قال: إنه سيكون عليكم أمراء يؤخرون الصلاة عن ميقاتها، ويخنُقونها إلى شَرَقِ الموتى، فإذا رأيتُم قد فعلوا ذلك فصلُّوا الصلاة لميقاتها، واجعلوا صلاتكم معهم سُبْحَةً، وإذا كنتُم ثلاثةً فصلوا جميعًا، وإذا كنتُم أكثر من ذلك فليؤمكم أحدكم، وإذا ركع أحدكم فليُفرش ذراعَيه على فخذيه، ولْيَجْنأ وليطبِّق بين كفيه، فكأَنِّي أنظر إلى اختلاف أصابع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأراهم.
وفي رواية: فكأنِّي أنظر إلى اختلاف أصايع رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو راكع.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (534)، من طرق عن إبراهيم النخعي، عن الأسود وعلقمة به مثله.
ورواه النسائي (1031) من طريق عاصم بن كليب، عن عبد الرحمن بن الأسود عن علقمة، عن عبد الله قال: علَّمنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الصلاة فقام فكبِّر فلما أراد أن يركع طبَّق يديه بين ركبتيه، وركع، فبلغ ذلك سعدًا فقال: صدق أخي قد كنَّا نفعل هذا، ثم أمرنا بهذا - يعني الإمساك بالركب، ثم روي حديث مصعب بن سعد كما مضى.
وفي الحديث دليل على أن سنة التطبيق منسوخة، وأن النسخ لم يلغ ابن مسعود وأصحابه، وهو حديث سعد بن أبي وقاص وغيره، كما أنه لم يبلغه أن الإمام إذا كان معه رجلان وَقَفَا وراءه صفًا.
وقوله:"يخنقونها": بضم النون - معناه يفقون وقتها، ويؤخرون أداءها.
وقوله:"شرق الموتى": قال ابن الأعرابي: فيه معنيان: أحدهما: أن الشمس في ذلك الوقت - وهو آخر النهار - إنما تبقى ساعة، ثم تغيب.
والثاني: أنه من قولهم: شرق المبيت بِرِيقه إذا لم يبق بعده إلا يسيرًا، ثم يموت، أفاده النووي.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল-আসওয়াদ ও আলক্বামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমরা তাঁর (আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদের) বাড়িতে গেলাম। তিনি বললেন, তোমাদের পেছনের লোকগুলো কি সালাত আদায় করেছে? আমরা বললাম, না। তিনি বললেন, তবে তোমরা দাঁড়াও এবং সালাত আদায় করো। তিনি আমাদের আযান বা ইকামতের নির্দেশ দেননি। তিনি বলেন, আমরা তাঁর পেছনে দাঁড়াতে গেলে তিনি আমাদের হাত ধরে একজনকে তাঁর ডানে এবং অন্যজনকে তাঁর বামে দাঁড় করালেন। তিনি বলেন, যখন তিনি রুকু করলেন, আমরা আমাদের হাতগুলো হাঁটুতে রাখলাম। তিনি আমাদের হাতে আঘাত করলেন এবং তার দু'হাতকে মিলিয়ে (আঙ্গুলসমূহ পরস্পরের সাথে জড়িয়ে) দিলেন, অতঃপর সেগুলো দু'উরুর মাঝে প্রবেশ করালেন।
তিনি বলেন, যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: তোমাদের ওপর এমন শাসকবর্গ আসবে যারা সালাতকে তার নির্ধারিত সময় থেকে বিলম্বিত করবে এবং তা মৃতদের মৃত্যুর কাছাকাছি সময়ের (অর্থাৎ দিনের শেষ ভাগের) দিকে টেনে নিয়ে যাবে। যখন তোমরা দেখবে তারা এরূপ করেছে, তখন তোমরা সালাতকে তার নির্দিষ্ট সময়ে আদায় করো এবং তাদের সাথে তোমাদের সালাতকে নফল হিসেবে গণ্য করো।
আর যখন তোমরা তিনজন হবে, তখন তোমরা সকলে একসাথে সালাত আদায় করবে। আর যদি তোমরা এর চেয়ে বেশি হও, তবে তোমাদের একজন ইমামতি করবে। যখন তোমাদের কেউ রুকু করবে, সে যেন তার দু’হাত তার দু’উরুর উপর বিছিয়ে রাখে, সামনের দিকে ঝুঁকে যায় এবং তার হাতের তালু দু’টিকে মিলিয়ে রাখে (তাতবীক করে)। যেন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আঙ্গুলগুলোর জড়ানো অবস্থা দেখছি এবং তাঁদেরকে (সাহাবীদেরকে) তা দেখাচ্ছি।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: যেন আমি রুকু করা অবস্থায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আঙ্গুলগুলোর জড়ানো অবস্থা দেখছি।
1993 - عن ابن عباس قال: سأل رجل النبي صلى الله عليه وسلم عن شيء من أمر الصلاة؛ فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"خلِّل أصابع يديك ورجليك - يعني إسباغ الوضوءه وكان فيما قال له:"إذا ركعت فضع كفيك على ركبتيك حتى تطْمَئِنَّ، (وقال الهاشمي مرة): حتى تَطْمَئِنَّا - وإذا سَجدتَ فأَمْكِنْ جبَهتَك من الأرضي، حتى تجدَ حَجْم الأرضِ".
حسن: رواه الإمام أحمد (2604) حدثنا سليمان بن داود الهاشمي، حدثنا عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن موسى بن عقبة، عن صالح مولى التوأمة قال: سمعت ابن عباس يقول فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل عبد الرحمن بن أبي الزناد فإنه مختلف فيه، وصالح مولى التوأمة اختلط، ولكن روى عنه موسى بن عقبة قبل الاختلاط، وسبق تخريج هذا الحديث في كتاب الوضوء، باب تخليل الأصابع، فإن الجزء الأول من الحديث رواه الترمذي وابن ماجة بهذا الإسناد.
وقال الحافظ في التلخيص (1/ 44):"وفيه صالح مولى التوأمة وهو ضعيف، لكن حينه البخاري، لأنه من رواية موسى بن عقبة، عن صالح، وسماع موسى منه قبل أن يختلط".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে সালাতের (নামাজের) কোনো একটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: "তুমি তোমার হাত ও পায়ের আঙুলগুলো খিলাল করো"— (এ দ্বারা উদ্দেশ্য হলো উত্তমরূপে ওযু করা)। তিনি তাকে আরও যা বলেছিলেন তার মধ্যে ছিল: "যখন তুমি রুকু করবে, তখন তোমার হাতের তালু দুটিকে তোমার হাঁটুদ্বয়ের উপর রাখো, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তি লাভ করো (তথা স্থির হও)। আর যখন তুমি সিজদা করবে, তখন তোমার কপালকে ভূমির উপর সুপ্রতিষ্ঠিত করো, যাতে তুমি মাটির দৃঢ়তা (স্পর্শ) অনুভব করতে পারো।"
1994 - عن محمد بن عمرو بن عطاء قال: سمعتُ أبا حميد الساعدي في عشرةٍ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فيهم: أبو قتادة فقال أبو حُميد: أنا أعلمُكم لِصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم وفيه: ثم يركعُ ويَضَعُ رُكبتيه على ركبتيه معتمدًا، لا يَصُبُّ رأسه ولا يُقْنِعُ، معتدلًا.
صحيح: رواه أبو داود (730)، والترمذي (304)، وابن ماجة (1061) كلهم من طريق عبد الحميد بن جعفر، حدثنا محمد بن عمرو بن عطاء به مثله في حديث طويل وسبق تخريجه في باب رفع اليدين وفيه كلام. ورواه أيضًا النسائي (1040) من طريق عبد الحميد مختصرًا بقوله:
"كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا ركع اعتدل، فلم ينصب رأسه، ولم يُقْنِعه، ووضع يديه على ركبتيه".
وقوله: لا يَصُبُّ رأسه - أي لم يُملْه إلى أسفل، وفي رواية الترمذي:"لم يُصوِّب رأسه" من التصويب، وهو تنكيس الرأس إلى أسفل، ومعناهما واحد.
وقوله: ولم يُقْنِع - أي لم يرفع رأسه حتى يكون أعلى من ظهره، من قولهم: أقنع رأسه - إذا نصبه، ولكن كان بين ذلك.
আবূ হুমাইদ আস-সাঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মাদ ইবনু ‘আমর ইবনু ‘আত্বা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আবূ কাতাদাহসহ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দশজন সাহাবীর মাঝে আবূ হুমাইদ আস-সাঈদীকে বলতে শুনেছি। আবূ হুমাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সালাত সম্পর্কে অধিক অবগত। (সালাতের বর্ণনায় তিনি বললেন): এরপর তিনি রুকূ’ করতেন এবং উভয় হাঁটুতে ভর দিয়ে রাখতেন। তিনি তাঁর মাথা নিচের দিকে ঝুঁকিয়ে রাখতেন না এবং উপর দিকে উঠিয়েও রাখতেন না, বরং তা মধ্যম অবস্থায় রাখতেন।
1995 - عن وائل بن حجر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ركع فرَّج أصابعه، وإذا سجد ضَمَّ أصابعه.
حسن: رواه الطبراني (22/ 19) عن موسى بن هارون، ثنا الحارث بن عبد الله، أخبرنا هُشيم، عن عاصم بن كليب، عن علقمة بن وائل، عن أبيه وائل بن حجر فذكر مثله.
قال الهيثمي في المجمع (2807): رواه الطبراني في الكبير، وإسناده حسن.
قلت: وأخرجه أيضًا ابن خزيمة في صحيحه (994) عن موسى بن هارون بن عبد الله البزار، حدثني أبو الحسن الحارث بن عبد الله الهمداني - يعرف بابن الخازن، حدثنا هُشيم به إلا أنه لم يذكر"وإذا سجد ضَمَّ أصابعه".
وأخرجه الحاكم في المستدرك (1/ 224) من طريق عمرو بن عون، عن هُشيم به مثل رواية ابن خزيمة مختصرًا وقال: صحيح على شرط مسلم.
ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রুকূ করতেন, তখন তাঁর আঙ্গুলসমূহ ফাঁকা রাখতেন, আর যখন সিজদা করতেন, তখন তাঁর আঙ্গুলসমূহ মিলিয়ে রাখতেন।
1996 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل المسجد، فدخل رجل فصَلَّى، فسلَّم على النبي صلى الله عليه وسلم فردَّ وقال:"ارجع فصَلِّ فإنك لم تُصلِّ" فرجع يُصلِّي كما صَلَّى، ثم جاء فسَلَّم على النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"ارجع فصَلَّ فإنك لم تُصلِّ" - ثلاثًا. فقال: والذي بعثك بالحق ما أحسن غيره، فعَلِّمْنِي، فقال:"إذا قُمت إلى الصلاة فكبِّر، ثم اقرأ ما تيسر معك من القرآن، ثم اركع حتى تطمئن راكعًا، ثم ارفع حتى تعدِلَ قائمًا، ثم اسجد
حتى تطمئن ساجدًا، ثم ارفع حتى تطمئن جالسًا، وافعل ذلك في صلاتك كلها".
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (757)، ومسلم في الصلاة (397) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد القطان، عن عبد الله، قال: حدثني سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
هكذا رواه يحيى فقال فيه:"عن أبيه، ورواه غيره عن عبد الله فلم يقولوا فيه:"عن أبيه" وكلاهما صحيح، فإن سعيدًا لم يكن مدلِّسًا، وقد ثبت سماعه من أبي هريرة فصحَّ الإسناد من الطريقين، ولذا أخرج الشيخان من الوجهين.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে প্রবেশ করলেন। তখন এক ব্যক্তি প্রবেশ করে সালাত আদায় করল এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিল। তিনি সালামের উত্তর দিয়ে বললেন, "ফিরে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ তুমি সালাত আদায় করোনি।" লোকটি ফিরে গিয়ে ঠিক সেভাবেই সালাত আদায় করল যেমন সে প্রথমে করেছিল। এরপর সে আবার এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিল। তিনি বললেন, "ফিরে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ তুমি সালাত আদায় করোনি।" — এভাবে তিনি তিনবার বললেন। তখন লোকটি বলল, 'যিনি আপনাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমি এর চেয়ে ভালো করে সালাত আদায় করতে জানি না। সুতরাং আমাকে শিখিয়ে দিন।' তিনি (নবী) বললেন, "যখন তুমি সালাতের জন্য দাঁড়াও, তখন তাকবীর দাও। এরপর কুরআন থেকে যা তোমার জন্য সহজ হয়, তা পাঠ করো। অতঃপর রুকুতে যাও এবং রুকুতে প্রশান্তি (স্থিরতা) লাভ করা পর্যন্ত থাকো। এরপর সোজা হয়ে দাঁড়াও যতক্ষণ না তোমার পিঠ সম্পূর্ণ সোজা হয়। তারপর সিজদা করো এবং সিজদাতে প্রশান্তি লাভ করা পর্যন্ত থাকো। তারপর উঠে বসো যতক্ষণ না স্থিরভাবে বসে যাও। আর তোমার সব সালাতে এরূপ করো।"
1997 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: أترون قِبلَي هاهنا؟ فوالله! ما يخفي علي خشوعُكم، ولا ركوعُكم، إنِّي لأراكم من وراء ظهري".
متفق عليه: رواه مالك في قصر السفر (70) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
ومن طريق مالك رواه البخاري في الصلاة (418)، وفي الأذان (741)، ومسلم في الصلاة (424) إلا أنه زاد"ولا سجودُكم".
ولمسلم أيضًا (423) من طريق سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يومًا، ثم انصرف فقال: يا فلان! ألا تُحسنُ صلاتَك؟ ألا ينظر المُصَلِّي إذا صلَّى كيف يُصَلِّي؟ فإنما يُصَلِّي لنفسه، إني والله! لأبْصر من ورائي كما أبصر من بين يدي".
وفي الحديث حث أيضًا على الخشوع، وإتمام الركوع والسجود من أكبر أسباب الخشوع.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা কি আমার ক্বিবলার দিকটা দেখছো? আল্লাহর কসম! তোমাদের খুশু (বিনয়), তোমাদের রুকু আমার কাছে গোপন থাকে না। আমি তোমাদেরকে আমার পিছন থেকেও দেখতে পাই।
(মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় এসেছে): আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি ফিরলেন এবং বললেন: হে অমুক! তুমি কি তোমার সালাতকে উত্তম কর না? যখন কোনো মুসল্লি সালাত আদায় করে, তখন সে কীভাবে সালাত আদায় করছে, সেদিকে কি সে লক্ষ্য করে না? কারণ সে তো কেবল নিজের জন্যই সালাত আদায় করে। আল্লাহর কসম! আমি আমার পিছন থেকে ঠিক সেভাবেই দেখতে পাই, যেভাবে আমি আমার সামনে থেকে দেখি।
1998 - عن رِفاعة بن رافع قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم جالسًا في المسجد فدخل رجل فصلى ركعتين، ثم جاء فسلم على النبي صلى الله عليه وسلم وقد كان النبي صلى الله عليه وسلم يرمقه في صلاته فرد عليه السلام ثم قال له:"ارجع فصل فإنك لم تصل" فرجع فصلى ثم جاء فسلم على النبي صلى الله عليه وسلم فرد عليه السلام ثم قال:"ارجع فصل فإنك لم تصل" حتى كان عند الثالثة أو الرابعة فقال: والذي أنزل عليك الكتاب! لقد جهدت وحرصت فأرني وعلمني. قال:"إذا أردت أن تصلي فتوضأ فأحسن وضوءك، ثم استقبل القبلة، فكبر، ثم اقرأ، ثم اركع حتى تطمئن راكعًا، ثم ارفع حتى تعتدل قائمًا، ثم اسجد حتى تطمئن ساجدًا، ثم ارفع حتى تطمئن قاعدًا، ثم اسجد حتى تطمئن ساجدًا، ثم ارفع، فإذا أتممت صلاتك على هذا فقد تمت، وما انتقصتَ من هذا فإنما تنتقصه من صلاتك".
صحيح: رواه النسائي (1314) من طريق داود بن قيس، قال: حدّثني علي بن يحيى بن خلّاد بن رافع بن مالك الأنصاريّ، قال: حدّثني أبي، عن عمّ له بدريّ، قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم،
فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا الحاكم (1/ 242، 243).
وهذا إسناد صحيح، وقد اختلف فيه على عَليّ بن يحيى بن خلَّاد، فرواه عنه داود بن قيس هكذا، وقد صحَّح البيهقيّ رواية داود بن قيس ومن وافقه.
قلت: وممن وافقه:
1 - محمد بن عجلان. ومن طريقه رواه النسائيّ (1313)، والإمام أحمد (18997).
2 - ومحمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي عليّ بن يحيى بن خلَّاد، عن أبيه، عن عمّه رفاعة بن رافع. ومن طريقه أخرجه أبو داود (860)، وابن خزيمة (597)، والحاكم (1/ 243)، والبيهقي (2/ 133، 134).
3 - وإسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة. ومن طريقه أبو داود (858)، والنسائيّ (1136)، وابن ماجة (460) كلّهم من طريق همّام بن يحيى، حَدَّثَنَا إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، قال: حَدَّثَنِي عليّ بن يحيى بن خلَّاد، عن أبيه، عن عمّه رفاعة بن رافع، فذكر الحديث.
وخالفهم محمد بن عمرو، فرواه عن عليّ بن يحيى بن خلَّاد ولم يذكر أباه.
ومن طريقه رواه أحمد (18995)، وأشار البيهقيّ (2/ 373) إلى رواية محمد بن عمرو، عن عليّ بن يحيى بن خلَّاد، عن رفاعة ولم يذكر فيه:"عن أبيه".
ولكن رواه أبو داود (859) من طريق محمد بن عمرو فقال: عن عليّ بن يحيى بن خلَّاد، عن أبيه، عن رفاعة.
فهل هذا خطأ مطبعيّ، أو اختلاف على محمد بن عمرو، والذي يظهر أنه خطأ مطبعيّ، يدل عليه ما نقله ابن أبي حاتم في"العلل" (1/ 82) عن أبيه قال:"رواه شريك بن عبد الله بن أبي نمر، وداود بن قيس، وابن عجلان، عن عليّ بن يحيى بن خلَّاد، فقالوا: عن أبيه رفاعة. وحماد بن سلمة، ومحمد بن عمرو لا يقولان:"عن أبيه، والصحيح عن أبيه، عن عمّه رفاعة".
قلت: وكذلك اختلف على إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، فأقام همام بن يحيى إسناده كما قال الحاكم (1/ 241) فإنّه حافظ ثقة، وكلّ من أفسد قوله فالقول قول همّام". انتهى.
وخالفه حمّاد بن سلمة، فرواه عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة فلم يذكر في إسناده أباه كما قال أبو حاتم وغيره.
والخلاصة: إنَّ هذا الحديث صحيح ثابت لا اضطراب فيه كما قال بعض أهل العلم، وهو موافق لحديث أبي هريرة.
قال البيهقيّ:"فالقول قول من حفظ، والرّواية التي ذكرناها بسياقها موافقة للحديث الثابت عن أبي هريرة في ذلك وإن كان بعض هؤلاء يزيد في ألفاظها وينقص، وليس في هذا الباب حديث أصح
من حديث أبي هريرة". (2/ 373).
রিফায়াহ ইবনে রাফি' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে মসজিদে বসে ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি প্রবেশ করে দুই রাকাত সালাত আদায় করল। অতঃপর সে এসে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে সালাম দিল। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার সালাত লক্ষ্য করছিলেন। তিনি সালামের উত্তর দিয়ে তাকে বললেন: "ফিরে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ তুমি সালাত আদায় করোনি।" লোকটি ফিরে গিয়ে সালাত আদায় করল, অতঃপর এসে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে সালাম দিল। তিনি সালামের উত্তর দিয়ে বললেন: "ফিরে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ তুমি সালাত আদায় করোনি।" এভাবে তৃতীয় বা চতুর্থবার হলে লোকটি বলল: যিনি আপনার উপর কিতাব নাযিল করেছেন, তাঁর শপথ! আমি তো যথেষ্ট চেষ্টা ও আগ্রহ নিয়ে আদায় করেছি। সুতরাং আপনি আমাকে দেখান এবং শিখিয়ে দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তুমি সালাত আদায় করতে চাও, তখন ওযু করো এবং উত্তমরূপে ওযু সম্পন্ন করো। এরপর কিবলামুখী হও, তাকবীর দাও, তারপর কুরআন পাঠ করো। অতঃপর রুকুতে যাও, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তির সাথে রুকুতে স্থির হও। তারপর মাথা তোলো, যতক্ষণ না তুমি সোজা হয়ে দাঁড়াও। এরপর সাজদায় যাও, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তির সাথে সাজদায় স্থির হও। এরপর মাথা তোলো, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তির সাথে বসে পড়ো। এরপর পুনরায় সাজদায় যাও, যতক্ষণ না তুমি প্রশান্তির সাথে সাজদায় স্থির হও। এরপর মাথা তোলো। যখন তুমি তোমার সালাত এভাবে পূর্ণ করবে, তখনই তা পূর্ণ হবে। আর যদি তুমি এর কোনো অংশ বাদ দাও, তাহলে তুমি তোমার সালাত থেকে তা-ই বাদ দিলে।"
1999 - عن أنس بن مالك، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أقيموا الركوعَ والسجودَ، فوالله! إني لأراكم من بَعدي - وربما قال: من بعد ظهري إذا ركعتم وسجدتم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (742)، ومسلم في الصّلاة (452) كلاهما عن محمد بن بشار، ثنا محمد بن جعفر غندر، ثنا شعبة، قال: سمعتُ قتادة، عن أنس فذكر الحديث.
عن حذيفة أنه رأى رجلًا لا يُتم الركوعَ والسجودَ قال:"ما صلَّيتَ، ولو مُتَّ مُتَّ على غير الفطرةِ التي فطر الله محمدًا صلى الله عليه وسلم".
وفي رواية:"مُتَّ على غير سنة محمد صلى الله عليه وسلم".
صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (791، 808) من الوجهين، عن حذيفة.
أدخل البخاريّ هذا الحديث في الجامع على رأي الجمهور بأن الصحابي إذا قال: سنة محمد، أو فطرته كان حديثًا مرفوعًا، وقد خالف فيه قوم قال الحافظ: والراجح الأوّل.
وأمّا ما رواه الإمام أحمد (23258) من طريق الأعمش، والنسائي (1312) من طريق طلحة بن مصرف، كلاهما عن زيد بن وهب، قال: دخل حذيفةُ المسجدَ، فإذا رجل يُصَلِّي مما يلي أبواب كِندة، فجعل لا يُتم الركوعَ ولا السجود، فلمّا انصرف قال له حذيفة: منذ كم هذه صلاتُك؟ قال: منذ أربعين سنة. قال: فقال له حذيفة: ما صليتَ منذ أربعين سنةً، ولو مُتَّ، وهذه صلاتُك لمُتَّ على غير الفطرة التي فطر عليها محمَّد صلى الله عليه وسلم قال: ثمّ أقبلَ عليه يُعَلِّمه فقال: إن الرّجل ليُخِفُّ في صلاته، وإنه ليُتم الركوعَ والسجودَ.
فإسناده وإن كان صحيحًا فلعله يحمل على المبالغة، لأن حذيفة مات سنة ست وثلاثين، فعلي هذا يكون ابتداء صلاة المذكور قبل الهجرة بأربع سنوات أو أكثر، ولعل الصّلاة لم تكن فُرِضتْ بعد. فلعله أطلق وأراد المبالغة. انظر"فتح الباري" (2/ 275).
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা রুকূ ও সিজদা সঠিকভাবে সম্পন্ন করো। আল্লাহর কসম! আমি তোমাদেরকে আমার পেছন থেকেও দেখতে পাই—আর সম্ভবত তিনি বলেছেন: আমার পিঠের পেছন থেকে—যখন তোমরা রুকূ ও সিজদা করো।"
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এক ব্যক্তিকে দেখলেন, যে রুকূ ও সিজদা সঠিকভাবে সম্পন্ন করছে না। তিনি বললেন: "তুমি সালাত পড়োনি। আর যদি তুমি মারা যাও, তাহলে তুমি সেই ফিতরাত (প্রকৃতি) ব্যতীত অন্য কিছুর ওপর মারা যাবে যার ওপর আল্লাহ মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সৃষ্টি করেছেন।"
অন্য এক বর্ণনায়: "তুমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতের বাইরে মৃত্যুবরণ করবে।"
আর ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনায় (যেইদ ইবনু ওয়াহাব থেকে বর্ণিত), তিনি বলেন: হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদে প্রবেশ করলেন। তখন কিন্দাহ ফটকের দিকে এক ব্যক্তি সালাত আদায় করছিল। সে রুকূ ও সিজদা পূর্ণ করছিল না। যখন সে (সালাত শেষে) ফিরল, তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তুমি কতদিন ধরে এভাবে সালাত আদায় করছো? সে বলল: চল্লিশ বছর ধরে। হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: তুমি চল্লিশ বছর ধরে সালাত আদায় করোনি! আর যদি তুমি মারা যাও, আর এটিই তোমার সালাত থাকে, তবে তুমি সেই ফিতরাত (প্রকৃতি) ব্যতীত অন্য কিছুর ওপর মারা যাবে যার ওপর মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সৃষ্টি করা হয়েছিল। এরপর তিনি তার দিকে ফিরে তাকে শিক্ষা দিতে শুরু করলেন এবং বললেন: নিঃসন্দেহে মানুষ তার সালাতে দ্রুততা করতে পারে, তবে সে যেন রুকূ ও সিজদা পূর্ণ করে।
2000 - عن إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، حَدَّثَنِي أبيّ، عن أبيه، قال: كنت عند عثمان فدعا بطَهورٍ فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من امرئ مسلمٍ تحضره صلاة مكتوبة فيُحسن وضوءَها، وخشوعَها، وركوعَها، إِلَّا كانت كفَّارةَ لما قبلها من الذنوب، ما لم يُؤت كبيرةً، وذلك الدَّهر كلّه".
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (228)، عن عبد بن حُميد، وحجَّاج بن الشاعر، كلاهما عن أبي الوليد، حَدَّثَنَا إسحاق بن سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص، فذكره.
উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো মুসলিম ব্যক্তি নেই যার সামনে কোনো ফরয নামায উপস্থিত হয় এবং সে তার ওযু, বিনয় (খুশূ) এবং রুকূ সুন্দরভাবে সম্পাদন করে, তবে তা তার পূর্ববর্তী সকল গুনাহের কাফফারা হয়ে যায়, যতক্ষণ না সে কবীরা গুনাহে লিপ্ত হয়। আর এই বিধান সর্বকালের জন্য প্রযোজ্য।"
2001 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يستفتح الصّلاة بالتكبير والقراءة بالحمد لله ربّ العالمين، وكان إذ ركع لم يُشْخِصْ رأسه ولم يُصوِّبْه ولكن بين ذلك، وكان
إذا رفع رأسه من الركوع لم يسجد حتَّى يستوي قائمًا، وكان إذا رفع رأسه من السجدة لم يسجُدْ حتَّى يستوي جالسًا، وكان يقول في كل ركعتين التحية، وكان يفْرِشُ رجْلَه اليُسرى، وينصِبُ رجله اليُمنى، وكان ينهى عن عُقْبَة الشّيطان، وينهي أن يفترِشَ الرّجل ذِراعَيه افتراش السبُعِ، وكان يختم الصّلاة بالتسليم.
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (498) من طريق حسين المعلم، عن بُديل بن ميسرة، عن أبي الجوزاء، عن عائشة فذكرتِ الحديث.
وقوله:"لم يشخص رأسه ولم يُصوِّبْه" الأشخاص هو الرفع، والتصويب الخفض، أي كان يعدل فيه بين الأشخاص والتصويب.
وقوله:"عُقبة الشّيطان" وفي رواية أخرى: عَقِب، فسره أبو عبيدة وغيره بالإقعاء المنهي عنه، وهو أن يلصق أليتيه بالأرض، وينصب سباقيه، ويضع يديه على الأرض، كما يُفْرِش الكلب وغيره من السباع.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকবীর দ্বারা সালাত শুরু করতেন এবং 'আলহামদু লিল্লাহি রাব্বিল আলামীন' দ্বারা কিরাত শুরু করতেন। তিনি যখন রুকু করতেন, তখন তাঁর মাথা অতি উচ্চও রাখতেন না আবার অতি নিম্নও করতেন না, বরং এর মাঝামাঝি রাখতেন। তিনি যখন রুকু থেকে মাথা উঠাতেন, তখন সোজা হয়ে দাঁড়ানো পর্যন্ত সিজদা করতেন না। তিনি যখন সিজদা থেকে মাথা উঠাতেন, তখন সোজা হয়ে বসা পর্যন্ত পুনরায় সিজদা করতেন না। তিনি প্রতি দুই রাকাতে তাশাহহুদ পড়তেন। তিনি তাঁর বাম পা বিছিয়ে দিতেন এবং ডান পা খাড়া রাখতেন। তিনি শয়তানের বসার ভঙ্গিকে নিষেধ করতেন এবং কোনো ব্যক্তি যেন হিংস্র পশুর মতো তার দুই বাহু বিছিয়ে না দেয়, সে বিষয়েও নিষেধ করতেন। আর তিনি সালামের মাধ্যমে সালাত শেষ করতেন।
2002 - عن أبي مسعود البدري قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُجْزِئُ صلاةُ الرّجل حتَّى يُقيمَ ظَهره في الركوع والسجود".
صحيح: رواه أبو داود (855) والتِّرمذيّ (265)، والنسائي (1027)، وابن ماجة (870) كلّهم من طريق الأعمش، عن عُمارة بن عُمير، عن أبي معمر، عن أبي مسعود الأنصاري البدري فذكر مثله.
وفي رواية النسائيّ:"حتَّى يُقيم الرّجل صُلْبَه في الركوع والسجود"، وأمّا الترمذيّ فجعل كلمة"صلبه" تفسيرًا. قال الترمذيّ: حسن صحيح.
قلت: وهو كما قال، فإن رجاله ثقات وإسناده صحيح.
وقد صحَّحه ابن خزيمة (592)، وابن حبَّان (1893) فروياه من هذا الطريق.
وأبو مسعود اسمه: عقبة بن عمرو، واختلف في نسبته إلى بدر فقيل: لم يشهد بدرًا، إنّما نسب إليه لأنه نزل ماء ببدر، والصواب أنه ممن شهد بدرًا، وبه قال البخاريّ ومسلم وأبو عبيد والحاكم أبو أحمد، انظر"فتح الباري" (7/ 246).
আবূ মাসঊদ আল-বদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “রুকু ও সিজদায় তার পিঠ সোজা না করা পর্যন্ত কোনো ব্যক্তির সালাত যথেষ্ট হবে না।”
2003 - عن قَالَ: جَلَسْنَا إِلَى عَبْدِ الرَّحْمَنِ بْنِ أَبْزَى فَقَالَ: أَلَا أُرِيكُمْ صَلَاةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم؟ قَالَ: فَقُلْنَا: بَلَى. قَالَ: فَقَامَ فَكَبَّرَ، ثُمَّ قَرَأَ، ثُمَّ رَكَعَ فَوَضَعَ يَدَيْهِ عَلَى رُكْبَتَيْهِ، حَتَّى أَخَذَ كُلُّ عُضْوٍ مَأْخَذَهُ، ثُمَّ رَفَعَ حَتَّى أَخَذَ كُلُّ عُضْوٍ مَأْخَذَهُ، ثُمَّ سَجَدَ حَتَّى أَخَذَ كُلُّ عُضْوٍ مَأْخَذَهُ، ثُمَّ رَفَعَ حَتَّى أَخَذَ كُلُّ عَظْمٍ مَأْخَذَهُ، ثُمَّ سَجَدَ حَتَّى أَخَذَ كُلُّ عَظْمٍ مَأْخَذَهُ، ثُمَّ رَفَعَ فَصَنَعَ فِي الرَّكْعَةِ الثَّانِيَةِ كَمَا صَنَعَ فِي الرَّكْعَةِ الْأُولَى، ثُمَّ قَالَ: هَكَذَا صَلَاةُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه الإمام أحمد (15371) عن هَارُونُ بْنُ مَعْرُوفٍ، حَدَّثَنَا ضَمْرَةُ، عَنِ ابْنِ شَوْذَبَ،
عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْقَاسِمِ قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام الخفيف في ضمرة وهو ابن ربيعة الفلسطيني وشيخه ابن شوذب، وهو عبد الله بن شوذب الخراساني غير أنهما حسن الحديث.
আব্দুর রহমান ইবনে আবযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [বর্ণনাকারী] বলেন, আমরা তাঁর কাছে বসলাম। তিনি বললেন, আমি কি তোমাদেরকে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত (নামায) দেখাবো না? আমরা বললাম, হ্যাঁ, অবশ্যই। বর্ণনাকারী বলেন, তখন তিনি দাঁড়ালেন এবং তাকবীর দিলেন, তারপর কিরাত পড়লেন, তারপর রুকূ’ করলেন এবং তার দু’হাত হাঁটুর উপর রাখলেন, যতক্ষণ না তার প্রতিটি অঙ্গ নিজ নিজ স্থানে স্থির হলো। তারপর তিনি রুকূ’ থেকে মাথা উঠালেন, যতক্ষণ না তার প্রতিটি অঙ্গ নিজ নিজ স্থানে স্থির হলো। তারপর তিনি সিজদা করলেন, যতক্ষণ না তার প্রতিটি অঙ্গ নিজ নিজ স্থানে স্থির হলো। তারপর তিনি মাথা উঠালেন, যতক্ষণ না তার প্রতিটি অস্থি নিজ নিজ স্থানে স্থির হলো। তারপর তিনি আবার সিজদা করলেন, যতক্ষণ না তার প্রতিটি অস্থি নিজ নিজ স্থানে স্থির হলো, তারপর তিনি মাথা উঠালেন। আর দ্বিতীয় রাক’আতেও তিনি তাই করলেন, যা প্রথম রাক’আতে করেছিলেন। এরপর তিনি বললেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত (নামায) এমনিই ছিল।
2004 - عن سالم البراد، قال: أتينا عقبة بن عمرو الأنصاريّ أبا مسعود فقلنا له: حَدَّثَنَا عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقام بين أيدينا في المسجد، فكبَّر فلمّا ركع وضع يده على ركبتيه، وجعل أصابعه أسفل من ذلك، وجافي بين مرفقيه، حتَّى استقر كل شيء منه، ثمّ قال: سمع الله لمن حمده، فقام حتَّى استقر كل شي منه، ثمّ كبَّر وسجد، ووضع كفيه على الأرض، ثمّ جافي بين مرفقيه حتَّى استقرَّ كل شيء منه، ثمّ رفع رأسه، فجلس حتَّى استقر كل شيء منه. ففعل مثل ذلك أيضًا. ثمّ صلى أربع ركعات مثل هذه الركعة، فصلى صلاته، ثمّ قال: هكذا رأينا رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي.
حسن: رواه أبو داود (863) عن زهير بن حرب، حَدَّثَنَا جرير، عن عطاء بن السائب، عن سالم البرَّاد، فذكره.
وجرير ممن روى عن عطاء بن السائب بعد اختلاطه، وتابعه على ذلك زائدة بن قدامة عند النسائيّ (2/ 186)، وأحمد (17081)، والبيهقي (2/ 121) وهو أيضًا ممن روي بعد الاختلاط.
ولكن رواه أبو عوانة عند الإمام أحمد (22359) عنه وهو ممن روي قبل الاختلاط وبعده، ومتابعة هؤلاء تؤكد أنه لم يختلط في هذا الحديث؛ ولأن ما رواه مجتمعًا جاء متفرقًا في الأحاديث الأخرى.
আবূ মাসউদ উকবাহ ইবন আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সালেম আল-বাররাদ বলেছেন: আমরা আবূ মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাঁকে বললাম, আপনি আমাদেরকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত সম্পর্কে বলুন। অতঃপর তিনি মসজিদের মধ্যে আমাদের সামনে দাঁড়ালেন এবং তাকবীর বললেন। যখন তিনি রুকু করলেন, তখন তিনি তাঁর হাত দুটোকে তাঁর হাঁটুর উপর রাখলেন এবং তাঁর আঙ্গুলগুলো তার নিচে রাখলেন এবং তাঁর উভয় কনুইকে ফাঁকা রাখলেন, যতক্ষণ না তাঁর সমস্ত অঙ্গ স্থির হলো। অতঃপর তিনি বললেন, 'সামিআল্লাহু লিমান হামিদা'। অতঃপর তিনি সোজা হয়ে দাঁড়ালেন, যতক্ষণ না তাঁর সমস্ত অঙ্গ স্থির হলো। এরপর তিনি তাকবীর বললেন এবং সিজদা করলেন। তিনি তাঁর হাতের তালু যমীনে রাখলেন, অতঃপর তাঁর উভয় কনুইকে ফাঁকা রাখলেন, যতক্ষণ না তাঁর সমস্ত অঙ্গ স্থির হলো। অতঃপর তিনি মাথা তুললেন এবং বসলেন, যতক্ষণ না তাঁর সমস্ত অঙ্গ স্থির হলো। এরপর তিনি অনুরূপভাবে আবার (সিজদা) করলেন। অতঃপর তিনি এই রাকাআতের মতোই চার রাকাআত সালাত আদায় করলেন। এভাবে তিনি তাঁর সালাত শেষ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এভাবেই সালাত আদায় করতে দেখেছি।
2005 - عن عليّ بن شيبان، وكان من الوفد قال: خرجنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فبايعناه وصلَّينا خلفه، فلمح بمؤْخِر عَيْنِه رجلًا لا يُقيم صلاتَه - يعني صُلْبَه في الركوع والسجود، فلمّا قضى النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم، قال: يا معشر المسلمين! لا صلاة لمن لا يُقيمُ صُلْبَه في الركوع والسجود".
صحيح: أخرجه ابن ماجة (871) عن أبي بكر بن أبي شية، قال: حَدَّثَنَا ملازم بن عمرو، عن عبد الله بن بدر، قال: أخبرني عبد الرحمن بن عليّ بن شيبان، عن أبيه عليّ بن شيبان فذكر الحديث.
ورجاله ثقات وإسناده صحيح، وصحَّحه أيضًا ابن خزيمة (593)، وابن حبَّان (1891) فرويا من طريق ملازم بن عمرو به مثله.
قال البوصيري في زوائد ابن ماجة: إسناده صحيح ورجاله ثقات.
আলী ইবনে শাইবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি একটি প্রতিনিধিদলের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। আমরা তাঁর হাতে বায়আত করলাম এবং তাঁর পিছনে সালাত আদায় করলাম। তখন তিনি চোখের কোণ দিয়ে এমন একজন ব্যক্তিকে দেখলেন, যিনি তার সালাত সঠিকভাবে আদায় করছিলেন না—অর্থাৎ রুকূ ও সিজদায় তার পিঠ সোজা রাখছিলেন না। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি বললেন: হে মুসলিম সমাজ! রুকূ ও সিজদায় যে তার পিঠ সোজা করে না, তার সালাত হয় না।
2006 - عن أبي حُميد الساعدي في عشرة من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم منهم أبو قتادة الحارث بن رِبْعيّ، فقال أبو حميد الساعدي: أنا أعلمكم بصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، قالوا: لِم؟ ما كنتَ أكثرَنا له اتباعًا، ولا أقْدَمنا له صحبةً؟ قال: بلى، قالوا:
فأعرض علينا، قال: فقال"كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا قام إلى الصّلاة أعتدل قائمًا، ورفع يديه حتى يُحاذِيَ بهما منكبَيْه، فإذا أراد أن يركع رفع يديه حتى يُحاذِيَ بهما منكبيه، ثمّ قال: الله أكبر، وركع، ثمّ اعتدل، فلم يُصَوِّبْ رأسه، ولم يُقْنِع، ووضع يديه على ركبتيه، ثمّ قال: سمع الله لمن حَمِده، ورفع يديه واعتدل، حتَّى يرجعَ كلُّ عظْمٍ في موضعه معتدلًا، ثمّ أهوَى إلى الأرض ساجدًا ثمّ قال: الله أكبر، ثمّ جافى عَضُديه عن إِبْطَيه، وفتح أصابع رجليه، ثمّ ثني رجله اليُسْرَى وقعد عليها، ثمّ اعتدل، حتَّى يرجعَ كل عظْمٍ في موضعه معتدلًا، ثمّ أهوى ساجدًا، ثمّ قال: الله أكبر، ثمّ ثنى رِجْلَه وقعد، واعتدل حتَّى يرجع كل عظمٍ في موضعه، ثمّ نهض، ثمّ صنع في الركعة الثانية مثل ذلك حتَّى إذا قام من السجدتين كَبَّر، ورفع يديه حتى يُحاذِيَ بهما منكبَيْه كما صنع حين افتتح الصّلاة، ثمّ صنع كذلك حتَّى كانت الركعة التي تَنْقَضِي فيها صلاتُه أخَّر رجله اليُسرى وقعد على شِقِّه مُتَورِّكًا، ثمّ سلم".
صحيح: رواه أبو داود (963)، والتِّرمذيّ (304)، والنسائي (1039)، وابن ماجة (862) كلّهم من طرق عن عبد الحميد بن جعفر، ثنا محمد بن عمرو بن عطاء، عن أبي حُميد السَّاعدي فذكر الحديث، واللّفظ للترمذي وقال: حسن صحيح، ولفظ النسائيّ مختصر، وسبق ذكر الحديث في باب رفع اليدين في الصّلاة. وصحَّحه ابن حبَّان (1870).
قال الحافظ في التلخيص (1/ 223):"وأعله الطحاويّ بأن محمد بن عمرو لم يدرك أبا قتادة قال: ويزيد ذلك بيانًا أن عطاف بن خالد رواه عن محمد بن عمرو وقال: حَدَّثَنِي رجل أنه وجد عشرة من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم جلوسًا ثمّ نقل قول ابن حبَّان وقال: والسياق يأبي ذلك كل الإباء، والتحقيق عندي أن محمد بن عمرو الذي روى عطاف بن خالد عنه هو محمد بن عمرو بن علقمة بن وقَّاص الليثي المدنيّ، وهو لم يلق أبا قتادة ولا قارب ذلك، إنّما يرُوي عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، وغيره من كبار التابعين، وأمّا محمد بن عمرو الذي روى عبد الحميد بن جعفر عنه فهو محمد بن عمرو بن عطاء تابعي كبير جزم البخاريّ بأنه سمع من أبي حميد وغيره، وأخرج الحديث من طريقه، وللحديث طرق عن أبي حُميد سَمَّى في بعضها من العشرة: محمد بن سلمة وأبو أسيد وسهل بن سعد، وهذه رواية ابن ماجة من حديث عباس بن سهل بن سعد، عن أبيه، ورواها ابن خزيمة من طرق أيضًا". انتهى.
أما عبد الحميد فقال ابن حبَّان في صحيحه (5/ 184):"أحد الثّقات المتقنين، قد سبرتُ أخباره فلم أره انفرد بحديث منكر لم يُشَارك فيه، وقد وافق فُليحُ بن سليمان وعيسى بن عبد الله بن مالك، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن أبي حميد، عبد الحميد بن جعفر في هذا الخبر". انتهى.
আবূ হুমাইদ আস-সাঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দশজন সাহাবীর মধ্যে বিদ্যমান ছিলেন, যাদের মধ্যে আবূ কাতাদাহ হারিস ইবনে রি‘বিয়ীও ছিলেন। তখন আবূ হুমাইদ আস-সাঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত (নামায) সম্পর্কে তোমাদের সকলের চেয়ে বেশি অবগত। তারা বললেন: কেন? আপনি তো আমাদের মধ্যে তাঁর সর্বাধিক অনুসারী ছিলেন না, না সবচেয়ে দীর্ঘদিনের সাহচর্য লাভকারী ছিলেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, (আমি অবগত)। তারা বললেন: তাহলে আমাদের সামনে বর্ণনা করুন। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাতের জন্য দাঁড়াতেন, তখন সোজা হয়ে দাঁড়াতেন এবং তাঁর উভয় হাত কাঁধ বরাবর উঠাতেন। যখন তিনি রুকূ করতে ইচ্ছা করতেন, তখন তাঁর উভয় হাত কাঁধ বরাবর উঠাতেন, অতঃপর 'আল্লাহু আকবার' বলতেন এবং রুকূ করতেন। এরপর সোজা হয়ে দাঁড়াতেন। এ সময় তিনি তাঁর মাথাকে (বেশি) নীচুও করতেন না, আবার (বেশি) উঁচুও করতেন না। তিনি তাঁর উভয় হাত তাঁর উভয় হাঁটুর ওপর রাখতেন। অতঃপর যখন 'সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ' বলতেন, তখন উভয় হাত উঠাতেন এবং সোজা হয়ে দাঁড়াতেন, যতক্ষণ না প্রতিটি অঙ্গ নিজ নিজ স্থানে সঠিকভাবে ফিরে আসতো। এরপর তিনি সিজদা করার জন্য জমিনের দিকে ঝুঁকতেন, অতঃপর 'আল্লাহু আকবার' বলতেন। তিনি তাঁর দু’বাহুকে বগল থেকে দূরে রাখতেন এবং তাঁর পায়ের আঙুলগুলো খুলে রাখতেন। এরপর তিনি তাঁর বাম পা মুড়ে তার উপর বসতেন, অতঃপর সোজা হয়ে বসতেন, যতক্ষণ না প্রতিটি অঙ্গ নিজ নিজ স্থানে সঠিকভাবে ফিরে আসতো। এরপর তিনি (দ্বিতীয়) সিজদা করার জন্য ঝুঁকতেন, অতঃপর 'আল্লাহু আকবার' বলতেন। এরপর তিনি তাঁর (ডান) পা মুড়ে বসতেন এবং সোজা হয়ে বসতেন, যতক্ষণ না প্রতিটি অঙ্গ নিজ নিজ স্থানে ফিরে আসতো। অতঃপর তিনি দাঁড়াতেন। অতঃপর তিনি দ্বিতীয় রাকআতে অনুরূপ করতেন। যখন তিনি দু’সিজদা থেকে উঠে দাঁড়াতেন, তখন তাকবীর বলতেন এবং তাঁর উভয় হাত কাঁধ বরাবর উঠাতেন, যেমন তিনি সালাত শুরু করার সময় করেছিলেন। এরপর তিনি অনুরূপ করতে থাকলেন, যতক্ষণ না সেই রাকআত আসলো, যা দ্বারা তাঁর সালাত শেষ হত। তখন তিনি তাঁর বাম পা পিছনের দিকে বের করে দিতেন এবং নিতম্বের উপর ভর দিয়ে বসতেন (তাওয়াররুক)। অতঃপর সালাম ফেরাতেন।
2007 - عن ابن عمر قال: جاء رجل من الأنصار إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! كلمات أسأل عنهن. قال:"اجلس" وجاء رجل من ثقيف فقال: يا رسول الله! كلمات أسأل عنهن. فقال صلى الله عليه وسلم:"سبقك الأنصاري". فقال الأنصاري: إنه رجل غريب وإن للغريب حقًّا فابدأ به، فأقبل على الثقفي فقال:"إنَّ شئت أجبتك عما كنت تسأل، وإن شئت سألتني وأخبرك". فقال: يا رسول الله! بل أجبني عما كنت أسألك قال:"جئت تسألني عن الرّكوع والسّجود والصّلاة والصوم". فقال: لا والذي بعثك بالحق ما أخطأتَ مما كان في نفسي شيئًا قال:"فإذا ركعت فضع راحتيك على ركبتين ثمّ فرج بين أصابعك ثمّ امكث حتَّى يأخذ كل عضو مأخذه، وإذا سجدت فمكن جبهتك ولا تنقر نقرًا، وصلِّ أوَّل النهار وآخره". فقال: يا نبي الله! فإن أنا صليت بينهما؟ قال:"فأنت إذا مصلي".
حسن: رواه ابن حبَّان (1887)، والبيهقي في"دلائل النبوة" (6/ 294)، والبزّار - كشف الأستار (1082) كلّهم من حديث يحيى بن عبد الرحمن الأرحبيّ، حَدَّثَنِي عبيدة بن الأسود، عن القاسم بن الوليد، عن سنان بن الحارث بن مصرف، عن طلحة بن مصرف، عن مجاهد، عن ابن عمر، فذكر حديثًا طويلًا، وهذا جزء منه.
والجزء الثاني منه سيأتي في كتاب الحج باب فضل يوم عرفة.
وإسناده حسن من أجل يحيى بن عبد الرحمن الأرحبي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وسنان بن الحارث بن مصرف ذكره ابن حبَّان في الثّقات (6/ 424، 8/ 299) وذكر من الرواة عنه القاسم بن الوليد، ومحمد بن طلحة.
وترجمه ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (4/ 254) وزاد من الرواة عنه صالح بن حيي والد حسن بن صالح.
وقال البيهقيّ:"إسناده حسن". وقال الهيثميّ:"رجال البزّار موثقون".
وقال البزّار: وقد روي هذا الحديث من وجوه، ولا نعلم له أحسن من هذا الطريق".
قلت: وهو كما قال، فقد رواه عبد الرزّاق (8830) وعنه الطبرانيّ (3566) عن ابن مجاهد، عن أبيه، عن ابن عمر، قال (فذكر الحديث بطوله).
ولم يسم عبد الرزّاق ابن مجاهد من هو؟ فإن كان هو عبد الوهّاب، فقال وكيع: كانوا يقولون:"إنَّ عبد الوهّاب بن مجاهد لم يسمع من أبيه". أي فيه انقطاع. ثمّ هو ضعيف جدًّا؛ كذبه سفيان وقال ابن معين: ضعيف. وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث. وقال ابن عدي:"عامة ما يرويه لا يتابع عليه".
أي في الغالب وإلَّا فقد توبع في الإسناد السابق إِلَّا أنه لا يعتبر به من أجل ضعفه الشديد. فالخلاصة كما سبق قول البزّار، وقال أيضًا: وقد رُوي عن إسماعيل بن رافع، عن أنس نحو حديث ابن عمر.
قلت: رواه البزّار - كشف الأستار (1083) - بإسناده عن إسماعيل بن رافع، عن أنس بن مالك، نحو حديث ابن عمر. وإسماعيل بن رافع ضعيف.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জনৈক আনসারী ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! কিছু কথা আছে, যা আমি আপনার কাছে জানতে চাই। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "বসো।" ইতোমধ্যে সাকীফ গোত্রের আরেকজন লোক এসে বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! কিছু কথা আছে, যা আমি আপনার কাছে জানতে চাই। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আনসারী লোকটি তোমার চেয়ে এগিয়ে রয়েছে।" তখন আনসারী লোকটি বললেন, সে তো একজন আগন্তুক (মুসাফির), আর আগন্তুক ব্যক্তির হক রয়েছে, তাই আপনি তার দ্বারা শুরু করুন। এরপর তিনি সাকীফ গোত্রের লোকটির দিকে মনোযোগ দিলেন এবং বললেন, "যদি তুমি চাও, তুমি যা জানতে চেয়েছিলে আমি সেগুলোর উত্তর দেব। আর যদি তুমি চাও, তুমি আমাকে জিজ্ঞাসা করবে এবং আমি তোমাকে জানাব।" লোকটি বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! বরং আপনিই আমাকে সেগুলোর উত্তর দিন যা আমি আপনাকে জিজ্ঞাসা করতে এসেছিলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি এসেছ আমাকে রুকু, সিজদা, সালাত (নামাজ) এবং সওম (রোজা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে।" লোকটি বলল, না! যিনি আপনাকে সত্যসহকারে প্রেরণ করেছেন, আমার মনের মধ্যে যা কিছু ছিল তার কিছুই আপনি ভুল বলেননি। তিনি বললেন, "যখন তুমি রুকু করবে, তখন তোমার হাতের তালু দুটো হাঁটুতে রাখবে, এরপর তোমার আঙ্গুলগুলো ফাঁকা রাখবে। এরপর তুমি শান্তভাবে স্থির থাকবে, যতক্ষণ না প্রতিটি অঙ্গ আপন আপন স্থানে স্থির হয়। আর যখন তুমি সিজদা করবে, তখন তোমার কপালকে দৃঢ়ভাবে জমিনে রাখবে এবং মুরগির ঠোকরানোর মতো ঠোকর দেবে না। আর দিনের প্রথম ভাগেও সালাত আদায় করবে এবং শেষ ভাগেও (সালাত আদায় করবে)।" লোকটি বলল, হে আল্লাহর নবী! যদি আমি এ দুয়ের মাঝেও সালাত আদায় করি? তিনি বললেন, "তাহলে তুমি একজন সালাত আদায়কারী (অর্থাৎ তাতে কোনো দোষ নেই)।"
