হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2008)


2008 - عن أبي عبد الله الأشعري قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بأصحابه ثمّ جلس في طائفة منهم، فدخل رجل فقام يُصَلِّي فجعل يركع وينقر في سجوده. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أترون هذا، مَنْ مات على هذا مات على غير ملّة محمّد ينقر صلاته كما ينقر الغُراب الدَّم، إنّما مثل الذي يركع وينقر في سجوده كالجائع لا يأكل إِلَّا التمرة والتمرتين فماذا تغنيان عنه. فأسبغوا الوضوء، ويل للأعقاب من النّار، أتموا الركوع والسجود".

قال أبو صالح: فقلت لأبي عبد الله الأشعري: من حدَّثك بهذا الحديث؟ فقال: أمراء الأجناد عمرو بن العاص وخالد بن الوليد ويزيد بن أبي سفيان وشرحبيل بن حسنة كل هؤلاء سمعوه من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه ابن خزيمة (665) عن إسماعيل بن إسحاق، حَدَّثَنَا صفوان بن صالح، حَدَّثَنَا الوليد بن مسلم، حَدَّثَنَا شيبة بن الأحنف الأوزاعيّ، حَدَّثَنَا أبو سلّام الأسود، نا أبو صالح الأشعريّ، عن أبي عبد الله الأشعريّ، فذكره.

ورواه البيهقيّ (2/ 89) من حديث عثمان بن سعيد الدارميّ، ثنا صفوان بن صالح الدمشقيّ، بإسناده، مثله.

ورواه أبو يعلى (7184)، والطَّبرانيّ في"الكبير" (4/ 115 - 116) بإسنادين آخرين عن الوليد بن مسلم بإسناده، مثله.

وذكره الهيثميّ في"المجمع" (2/ 121) وعزاه إلى الطبرانيّ في"الكبير" وأبي يعلى وقال: إسناده حسن.

قلت: وهو كما قال، فإن فيه شيبة بن الأحنف الأوزاعي. روى عنه جماعة منهم الوليد بن مسلم وهو مدلِّس ولكنه صرَّح بالتحديث. وذكره أبو الحسن بن سُميع في الطبقة الخامسة، وقال أبو زرعة الدمشقي:"في ذكر نفر ذوي أسنان وعلم" فذكر منهم شيبة بن الأحنف.

وذكره ابن حبَّان في"الثِّقات" (6/ 445). وقال الذّهبيّ في"الكاشف":"وثق"، فمثله يحسن
حديثه، وأمّا الحافظ ابن حجر فذكره في مرتبة:"مقبول".

وأمّا قول ابن التركماني في"الجوهر النقي": ذكر صاحب الكمال أن دحيمًا قال: لم يسمع الوليد بن مسلم من حديث شيبة بن الأحنف شيئًا".

فوقع فيه تحريف، فإن في تهذيب الكمال: قال أبو حاتم: سمعت دحيمًا يقول:"لم أسمع من الوليد بن مسلم من حديث شيبة بن الأحنف شيئًا".

وقال عثمان بن سعيد الدَّارميّ عن دحيم: كان الوليد برُوي عنه، ما سمعتُ أحدًا يعرفه.

فهذان النقلان يختلفان عمّا نقله ابن التركماني عن دحيم، فليس فيهما نفي سماع الوليد بن مسلم من شيبة بن الأحنف، بل نفي هو عن نفسه أن يسمع من الوليد بن مسلم شيئًا يرويه عن شيبة بن الأحنف.

فإن نفي هو عن نفسه فقد ثبت عن غيره من روى عنه كما رأيت، وفيه تصريح من الوليد بالتحديث فلا يجوز تكذيبه.

بل قد أكد دحيم في رواية عثمان بن سعيد الدَّارميّ أن الوليد كان يروي عنه إِلَّا أنه نفى العلم بالمعرفة عنه فوجب التنبيه عليه.




আবু আব্দুল্লাহ আল-আশআরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে নিয়ে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি তাঁদের এক দলের মাঝে বসলেন। তখন এক ব্যক্তি প্রবেশ করলো এবং সালাত আদায় করতে দাঁড়ালো। সে রুকূ করতে লাগলো এবং সিজদায় ঠোকর মারতে লাগলো (অর্থাৎ অতি দ্রুত সিজদা করতে লাগলো)।

তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা কি এই ব্যক্তিকে দেখছো? যে ব্যক্তি এই অবস্থায় মারা যাবে, সে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দ্বীন ব্যতীত অন্য কিছুর ওপর মারা যাবে। সে তার সালাতকে ঠোকর মারে, যেমন কাক রক্ত ঠোকর মারে। নিশ্চয় যে ব্যক্তি রুকূ করে এবং তার সিজদায় ঠোকর মারে, তার উপমা হলো ক্ষুধার্ত ব্যক্তির মতো, যে কেবল একটি বা দুটি খেজুর খায়। তা তার কী কাজে আসবে? অতএব, তোমরা উত্তমরূপে ওযূ করো। গোড়ালির জন্য জাহান্নামের শাস্তি রয়েছে! তোমরা রুকূ ও সিজদা পূর্ণ করো।

আবু সালিহ বললেন: আমি আবু আব্দুল্লাহ আল-আশআরীকে জিজ্ঞাসা করলাম: কে আপনাকে এই হাদীস বর্ণনা করেছেন? তিনি বললেন: সেনাবাহিনীর সেনাপতিগণ—আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), ইয়াযিদ ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং শুরাহবিল ইবনু হাসানা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। এঁদের প্রত্যেকেই এটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2009)


2009 - عن أبي هريرة قال: أمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم بثلاث ونهاني عن ثلاث، أمرني بصيام ثلاثة أيام من كل شهر، وأن لا أنام إِلَّا على وتر، وركعتي الضحى. ونهاني عن الالتفات في الصّلاة التفات الثعلب، وأقعى إقعاء القرد، وأنقر نقر الديك.

حسن: رواه البيهقيّ في سننه (2/ 120) من طريق ليث، عن مجاهد، عن أبي هريرة، فذكره.

وليث هو ابن أبي سليم صدوق إِلَّا أنه اختلط فلم يتميز حديثه فترك، ولكنه توبع. رواه الإمام أحمد (7595)، وأبو داود الطيالسي (2716) كلاهما من حديث يزيد بن أبي زياد، حَدَّثَنِي من سمع أبا هريرة يقول:"أوصاني خليلي بثلاث ..". فذكره.

ويزيد بن أبي زياد هو الهاشمي ضعيف، وأمّا الراوي الذي لم يسم فهو مجاهد كما في رواية أحمد (8106) وكما في الرواية السابقة.

وعزاه المنذري في الترغيب والترهيب (794) إلى أحمد وأبي يعلى وقال:"إسناد أحمد حسن". وقال: ورواه ابن أبي شيبة في"المصنف" وقال:"كإقعاء القرد" مكان"الكلب".

قلت: في الرواية الأولى عند الإمام أحمد:"كإقعاء القرد" وفي الرواية الثانية عنده:"كإقعاء الكلب". وهي التي ذكرها المنذري.

وقوله:"بإسناد حسن" كذا قال، وفيه علتان:

الأوّلى: يزيد بن أبي زياد الهاشمي وهو ضعيف كما سبق.
والثانية: الراوي عنه هو شريك هو ابن عبد الله النخعي وهو سيء الحفظ إِلَّا أنه توبع في الرواية الأوّلى عند أحمد وأبي داود الطيالسي.

فإذا ضم يزيد بن أبي زياد إلى ليث بن أبي سليم يعطي قُوة للمتن، ويزيد بن أبي زياد قال فيه أبو زرعة:"لين يكتب حديثه ولا يحتج به" ثمّ ليس في المتن نكارة بل لكل من الجزأين شواهد بمعناه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি কাজের নির্দেশ দিয়েছেন এবং তিনটি কাজ থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি আমাকে প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখার নির্দেশ দিয়েছেন, আর যেন বিতর (সালাত) আদায় না করে না ঘুমাই এবং চাশতের দু'রাকাত (সালাত আদায়ের নির্দেশ দিয়েছেন)। আর তিনি আমাকে নামাযে শিয়ালের মতো এদিক-ওদিক তাকানো থেকে নিষেধ করেছেন, বানরের মতো পাছার উপর ভর দিয়ে বসা থেকে নিষেধ করেছেন এবং মোরগের মতো ঠোকর মারার (দ্রুত সেজদা করার) থেকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2010)


2010 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أسوأ الناس سرقة الذي يسرق صلاته" قال: وكيف يسرق صلاته؟ قال:"لا يتُم ركوعها ولا سجودها".

حسن: رواه ابن حبَّان (1888)، والحاكم (1/ 229)، والبيهقي (2/ 386) كلّهم من حديث هشام بن عمار، قال: حَدَّثَنَا عبد الحميد بن أبي العشرين، عن الأوزاعيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الحميد بن أبي العشرين وهو كاتب الأوزاعي غير أنه حسن الحديث.

قال الحاكم: كلا الإسنادين (يقصد هذا والذي يأتي بعده) صحيحان ولم يخرجاه.

والإسناد الآخر هو ما رواه الإمام أحمد (22642) وصحّحه ابن خزيمة (662)، والحاكم وعنه البيهقيّ (2/ 386) كلّهم من حديث الوليد بن مسلم، عن الأوزاعيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث، مثله.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه، والذي عندي أنهما لم يخرجاه لخلاف فيه بين كاتب الأوزاعي والوليد بن مسلم".

قلت: كاتب الأوزاعي هو عبد الحميد بن أبي العشرين وهو حسن الحديث كما سبق، وجعل الحديث من مسند أبي هريرة.

وأمّا الوليد بن مسلم فهو مدلِّس كثير التسوية عن الأوزاعي ويسقط الضّعفاء كما قال الدَّارقطنيّ:"يروي عن الأوزاعي أحاديث عند الأوزاعي عن شيوخ ضعفاء".

وقد نُبِّه إلى ذلك فلم يتنبه فمثله لا يعارض ما رواه عبد الحميد بن أبي العشرين إِلَّا أن يقال: لعل يحيى بن أبي كثير له شيخان. والله أعلم.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষের মধ্যে সবচেয়ে খারাপ চোর হলো সে, যে তার সালাত চুরি করে।" জিজ্ঞেস করা হলো: কিভাবে সে তার সালাত চুরি করে? তিনি বললেন: "সে তার রুকু এবং সিজদা পূর্ণভাবে সম্পন্ন করে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2011)


2011 - عن عبد الرحمن بن شِبْل قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن ثلاث: عن نقرة الغراب، وعن افتراش السبع، وأن يوطن الرّجل المقام كما يوطن البعير.

حسن: رواه أبو داود (862)، والنسائي (113)، وابن ماجة (1429)، وصحّحه ابن خزيمة (662)، وابن حبَّان (2277)، والحاكم (1/ 229)، والبيهقي (2/ 118) كلّهم من حديث جعفر بن عبد الله، أن تميم بن محمود أخبره، أن عبد الرحمن بن شِبْل أخبره فذكر الحديث.

قال الحاكم:"صحيح ولم يخرجاه لما قدمت ذكره من التفرد عن الصّحابة بالرواية". وقال
الذّهبيّ:"صحيح، تفرّد تميم عن ابن شبل".

وجعفر بن عبد الله هو ابن الحكم الأنصاريّ، وقد ينسب إلى جده فيقال: جعفر بن الحكم وهو والد عبد الحميد. وفي بعض طرقه روي هذا الحديث عن أبيه جعفر.

وإسناده حسن من أجل تميم بن محمود الأنصاري وهو تابعيّ، وثَّقه ابن حبَّان وليس له إِلَّا هذا الحديث ولكن قال البخاريّ في"التاريخ الكبير" (2/ 154):"في حديثه نظر" وكل من ترجم تميم بن محمود لم يذكر فيه إِلَّا قول البخاريّ هذا مثل ابن عديّ، والعقيلي والمزي في"تهذيب الكمال"، والذّهبيّ، وابن حجر في"التهذيب" وغيرهم.

وقول البخاريّ:"في حديثه نظر" له عدة معانٍ كما ذكرته في كتابي"دراسات في الجرح والتعديل" ومن هذه المعاني: الإسناد الذي روي منه هذا الحديث فيه نظر. وهو كما قال، فقد رواه عثمان بن مسلم البتّي، عن عبد الحميد بن سلمة، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن نُقرة الغُراب، وعن فِرشة السبع، وأن يوطن الرّجل مقامه في الصّلاة كما يوطن البعير.

رواه الإمام أحمد (23758) عن إسماعيل: أخبرنا عثمان البتيّ، به.

وفيه وهم من عثمان البتي في ذكر أبي عبد الحميد، والصحيح أنه جعفر بن عبد الله كما سبق.

وكذلك رواه الإمام أحمد (15532) عن يحيى بن سعيد، عن عبد الحميد، قال: حَدَّثَنِي أبيّ، عن تميم بن محمود بإسناده إِلَّا أنه لم يسمه وهو جعفر بن عبد الله، كما هو ظاهر من الروايات الأخرى.

ثمّ سلمة هذا والد عبد الحميد لم يدرك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فحديثه مرسل؛ لأن منهم من جعل هذا الإسناد شاهدًا للإسناد الأوّل وبهذا صحَّ قول البخاريّ:"في حديثه نظر" والله تعالى أعلم.

وفي الباب ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ مرفوعًا:"إن أسوأ الناس سَرِقة الذي يسرق صلاته" قالوا: يا رسول الله! وكيف يسرِقُها؟ قال:"لا يُتم ركوعَها ولا سجودها".

رواه الإمام أحمد (11532)، وابن أبي شيبة (1/ 288)، وأبو يعلى (1311) كلّهم عن عفّان، حَدَّثَنَا حمّاد، أخبرنا عليّ بن زيد، عن سعيد بن المسيب، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره.

وعلي بن زيد وهو: ابن جُدعان أبو الحسن القرشي التيميّ، قال شعبة: حَدَّثَنَا عليّ بن زيد - وكان رفاعًا، وكان ابن عينة يُضعفه، وقال الفلاس: كان يحيى القطان يتقي الحديث عن عليّ بن زيد، وقال أحمد: ضعيف، وتكلم فيه أيضًا يحيى بن معين، وأبو حاتم، والبخاري والفسوي وغيرهم.

وما رُوي عن عبد الله بن مغفل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أسرقُ الناس الذي يسرقُ صلاته" قيل: يا رسول الله، كيف يسرقُ صلاته؟ قال:"لا يُتم ركوعَها ولا سجودَها، وأبخلُ الناس من بَخل بالسلام".

رواه الطبرانيّ في الأوسط (3416) عن جعفر"هو ابن معدان الأهوازيّ" قال: حَدَّثَنَا زيد، قال: حَدَّثَنَا عثمان بن الهيثم، قال: حَدَّثَنَا عوف، عن الحسن، عن عبد الله بن مغفل فذكر مثله.
قال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن عبد الله إِلَّا الحسن، ولا عن الحسن إِلَّا عوف، ولا عن عوف إِلَّا عثمان، تفرّد به زيد.

انتهى. قلت: زيد هو: ابن الحَرِيش كما هو الظاهر من الرواية التي ذكرها الطبرانيّ قبل هذا عن جعفر بن معدان الأهوازيّ، قال: حَدَّثَنَا زيد بن الحَريش، وزيد هذا أيضًا الأهوازي كما قال ابن حبَّان في الثّقات (8/ 251) وقال فيه:"ربما أخطأ".

وترجمه الحافظ في اللسان (2/ 503) ولكن قال: زيد بن الحرش الأهوازي ثمّ نقل قول ابن حبَّان وقال: قال ابن القطان:"مجهول الحال".

وأمّا الهيثميّ فقال في مجمع الزوائد (2722)، رواه الطبرانيّ في الثلاثة، ورجاله ثقات، وذلك على قاعدته في توثيق كل من ذكره ابن حبَّان في الثّقات.

وعثمان بن الهيثم وإن كان من رجال البخاريّ إِلَّا أن الإمام أحمد أومأ بأنه ليس بثبت، وقال أبو حاتم: كان صدوقًا غير أنه بآخره كان يتلقن ما يُلقن، وذكره ابن حبَّان في الثّقات. وكذلك فيه الحسن، وهو الإمام البصريّ، معروف بالتدليس ولم أجد له تصريحًا.

وما رُوي عن النعمان بن مُرة أن رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما ترون في الشارب والسارق والزاني" وذلك قبل أن ينزل فيهم، قالوا: الله ورسولُه أعلم. قال:"هن فواحش، وفيهن عقويةٌ، وأسوأ السرقة الذي يسرقُ صلاته"، قالوا: وكيف يسرقُ صلاته يا رسول الله؟ ، قال:"لا يُتم ركوعَها ولا سجودَها".

رواه مالك في قصر الصّلاة (72) عن يحيى بن سعيد، عن النعمان بن مرة، فذكره. قال ابن عبد البر:"لم يختلف الرواة عن مالك في إرسال هذا الحديث عن النعمان بن مرة".




আব্দুর রহমান ইবনে শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তিনটি বিষয় থেকে নিষেধ করতে শুনেছি: কাকের ঠোকরের মতো (সিজদা করা), হিংস্র পশুর মতো (হাত ও বাহু) বিছিয়ে দেওয়া, এবং কোনো ব্যক্তির (নামাযের) স্থানকে উট যেমন তার বসার স্থান নির্দিষ্ট করে নেয়, তেমন নির্দিষ্ট করে নেওয়া।









আল-জামি` আল-কামিল (2012)


2012 - عن ابن أبي أوفى قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع ظهره من الركوع قال: سمع الله لمن حَمِدَه، اللَّهُمَّ ربنا لك الحمدُ، مِلأُ السماواتِ ومِلأُ الأرض. ومِلأُ ما شِئت من شيء بعدُ".

وفي رواية:"اللَّهُمَّ لك الحمد، مِلأُ السماء ومِلأُ الأرض، ومِلأُ ما شِئت من شيء بعدُ. اللَّهُمَّ طَهِّرني بالثَلْجِ والبَرَدِ والماء البارد، اللَّهُمَّ طَهِّرني من الذنوب والخطايا كما يُنَقَّى الثوبُ الأبيضُ من الوسخ".

صحيح: رواهما مسلم في الصّلاة (476) الأوّلى من طرق عن عبيد بن الحسن، والثانية من طريق مَجْزأة بن زاهر، كلاهما عن عبد الله بن أبي أوفى، فذكر الحديث.




ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন রুকু থেকে তাঁর পিঠ উঠাতেন, তখন বলতেন: “সামি'আল্লাহু লিমান হামিদাহ (আল্লাহ তার কথা শোনেন যে তাঁর প্রশংসা করে)। হে আল্লাহ, আমাদের রব! আপনার জন্যই সমস্ত প্রশংসা—যা আসমানসমূহ ভর্তি, যা জমিন ভর্তি এবং এরপরে আপনি যা কিছু ইচ্ছা করেন তা ভর্তি।”

অন্য এক বর্ণনায় আছে: “হে আল্লাহ! আপনার জন্যই সমস্ত প্রশংসা—যা আকাশ ভর্তি, যা জমিন ভর্তি এবং এরপরে আপনি যা কিছু ইচ্ছা করেন তা ভর্তি। হে আল্লাহ, আমাকে বরফ, শিলাবৃষ্টি ও ঠাণ্ডা পানি দিয়ে পবিত্র করুন। হে আল্লাহ, আমাকে গুনাহ ও ভুল-ত্রুটি থেকে তেমনি পবিত্র করুন, যেমন সাদা কাপড় ময়লা থেকে পরিচ্ছন্ন করা হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (2013)


2013 - عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان إذا رفع رأسه من الركوع قال:"اللَّهُمَّ ربَّنا لك الحمدُ، مِلأُ السماوات ومِلأُ الأرض وما بينهما، ومِلأُ ما شئتَ من شيء بعد، أهلَ الثناء
والمجد، لا مانع لما أعطيتَ، ولا مُعْطِي لما منعتَ، ولا ينفعُ ذا الجدِّ منك الجدُّ".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (478) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا هُشيم بن بَشير، أخبرنا هشامُ بن حسَّان، عن قيس بن سعد، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রুকু থেকে মাথা উঠাতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ! আমাদের প্রতিপালক! আপনারই জন্য সমস্ত প্রশংসা। যা আসমানসমূহ পূর্ণ করে, যা যমীন পূর্ণ করে, আর যা এদের উভয়ের মধ্যবর্তী স্থান পূর্ণ করে এবং এরপরে আপনি যা কিছু ইচ্ছা করেন, তা পূর্ণ করে। আপনিই প্রশংসা ও গৌরবের যোগ্য। আপনি যা দান করেন, তা রোধ করার কেউ নেই। আর আপনি যা বারণ করেন, তা দেওয়ার কেউ নেই। আর ধন-সম্পদশালীর ধন-সম্পদ আপনার নিকট কোনো উপকার করতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2014)


2014 - عن أبي سعيد الخُدريّ قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع رأسه من الركوع قال:"ربنا لك الحمدُ، مِلْءَ السماوات والأرض، ومِلْءَ ما شئت من شيء بعدُ، أهلَ الثناء والمجد، أحقُّ ما قال العبدُ، وكلُّنا لك عبدٌ، اللَّهُمَّ لا مانع لما أعطيتَ، ولا مُعْطِيَ لما منعتَ، ولا ينفعُ ذا الجدِّ منك الجدُّ".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (477) عن عبد الله بن عبد الرحمن الدارميّ، أخبرنا مروان بن محمد الدمشقيّ، حَدَّثَنَا سعيد بن عبد العزيز، عن عطية بن قيس، عن قَزْعة، عن أبي سعيد الخدريّ فذكر مثله.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন রুকু থেকে মাথা উঠাতেন, তখন বলতেন: "হে আমাদের প্রতিপালক! সমস্ত প্রশংসা কেবল আপনারই জন্য, আকাশসমূহ ও পৃথিবী পূর্ণ করে, আর এরপরে আপনি যা কিছু ইচ্ছা করেন তা পূর্ণ করে। প্রশংসা ও মহত্ত্বের অধিকারী আপনি, বান্দা যা কিছু বলেছে, তার মধ্যে এটিই সবচেয়ে সত্য (বা শ্রেষ্ঠ) কথা। আর আমরা সকলেই আপনার বান্দা। হে আল্লাহ! আপনি যা প্রদান করেন, তা রোধ করার কেউ নেই। আর আপনি যা রোধ করেন, তা দেওয়ারও কেউ নেই। আর কোনো সম্পদশালী ব্যক্তির সম্পদ আপনার (শাস্তি) থেকে তাকে রক্ষা করতে পারে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2015)


2015 - عن عليّ بن أبي طالب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع رأسه من الركوع قال:"سمع الله لمن حمده، ربنا ولك الحمد مِلْءَ السماوات ومِلْءَ الأرض، ومِلْءَ ما بينهما، ومِلْءَ ما شئت من شيء بعدُ".

صحيح: رواه الترمذيّ (266) عن محمود بن غيلان، حَدَّثَنَا أبو داود الطيالسيّ، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن عبد الله بن أبي سلمة الماجشون، حَدَّثَنِي عَمِّي، عن عبد الرحمن بن الأعرج، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن عليّ بن أبي طالب فذكر مثله. قال الترمذيّ: حسن صحيح.

قلت: وهو كما قال. والحديث رواه أبو داود الطيالسي في مسنده (147) وسمى عم عبد العزيز - الماجشونُ عبد الله بن أبي سلمة في سياق دعاء طويل ابتداء من استفتاح الصّلاة، وهو ما رواه مسلم في صلاة المسافرين (771) عن محمد بن أبي بكر المُقَدّميّ، حَدَّثَنَا يوسف الماجشون حَدَّثَنِي أبيّ، عن عبد الرحمن الأعرج، به فذكر الحديث بطوله، وسبق إيرادهُ كاملًا في استفتاح الصّلاة.

وقوله: حَدَّثَنِي أبي - قلت: هو يعقوب بن أبي سلمة الماجشون، إذ يوسف هو ولد يعقوب، ومن هنا يظهر الخطأ الذي وقع في مسند أبي داود الطيالسي فإنه سمي عم عبد العزيز (عبد الله بن أبي سلمة) والحق أنه والده، وأمّا عمه فهو يعقوب بن أبي سلمة، فإن عبد الله ويعقوب هما ابنا أبي سلمة، وأمّا الماجشون فهو لقب لهم جميعًا.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রুকূ' থেকে মাথা উঠাতেন, তখন বলতেন: "সামি'আল্লাহু লিমান হামিদাহ, রাব্বানা ওয়া লাকাল হামদ। (যে ব্যক্তি আল্লাহর প্রশংসা করে, আল্লাহ তা শোনেন; হে আমাদের প্রতিপালক! আর আপনারই জন্য সকল প্রশংসা,) আকাশসমূহ পূর্ণ করে, আর যমীন পূর্ণ করে, এবং এ দুটির মাঝে যা কিছু আছে তা পূর্ণ করে, আর এর পরে আপনি যা চান তা পূর্ণ করে (প্রশংসা আপনারই জন্য)।”









আল-জামি` আল-কামিল (2016)


2016 - عن ابن عمر أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم حين رفع رأسه من الركوع قال:"ربنا ولك الحمد".

صحيح: رواه أحمد (6346) عن عبد الرزّاق - وهو في المصنف (2911)، حَدَّثَنَا معمر، عن
الزّهريّ، عن سالم، عن ابن عمر فذكر مثله، وهذا الحديث جزء من الحديث الذي سبق ذكره في باب رفع اليدين عند الركوع وعند الرفع من الركوع.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে রুকু থেকে মাথা তোলার সময় বলতে শুনেছেন, তিনি (রাসূল) বলেছেন: "রব্বানা ওয়া লাকাল হামদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (2017)


2017 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع رأسه من الركوع قال:"اللَّهُمَّ ربنا ولك الحمد".

صحيح: رواه النسائيّ (1060) عن إسحاق بن إبراهيم، عن عبد الرزّاق وهو في المصنف (2912)، عن معمر، عن الزّهريّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر الحديث. وإسناده صحيح.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রুকূ' থেকে মাথা উঠাতেন, তখন তিনি বলতেন: "আল্লাহুম্মা রব্বানা ওয়া লাকাল হামদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (2018)


2018 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قال الإمام سمع الله لمن حَمِدَه، فقولوا: اللَّهُمَّ ربنا لك الحمد، فإنه من وافق قولُه قولَ الملائكة، غفر له ما تقدّم من ذنبه".

متفق عليه: رواه مالك في الصّلاة (47) عن سُمَيٍّ مولى أبي بكر، عن أبي صالح السَمَّان، عن أبي هريرة فذكر الحديث، ومن طريقه البخاريّ في الأذان (796)، ومسلم في الصّلاة (409) وقال: عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بمعني حديث سُمي.

ويبدو أن مالكًا رحمه الله تعالى كان يروي بهذا الإسناد حديثين، حديث التأمين كما مضى، وحديث التسميع والتحميد، فأخرج البخاريّ حديثين في الموضعين، وأخرج مسلم حديث التسميع والتحميد فقط.

وأمّا قول مسلم: عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم بمعنى حديث سُمي فهو ليس في التسميع والتحميد، وإنما هو في التأمين كما رواه هو نفسه قال: حَدَّثَنَا قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا يعقوب (يعني ابن عبد الرحمن) عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قال القارئ: غير المغضوب عليهم ولا الضالين، فقال من خلْفَه آمين، فوافق قولُه قولَ أهل السماء، غفر له ما تقدّم من ذنبه" (410/ 76).

ورواه عبد الرزّاق (2912) ومن طريقه النسائيّ (1060) عن معمر، عن الزّهريّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع رأسه من الركوع قال:"اللَّهُمَّ ربنا لك الحمد".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন ইমাম 'সামি'আল্লাহু লিমান হামিদা' বলেন, তখন তোমরা বলো: 'আল্লাহুম্মা রাব্বানা লাকাল হামদ।' কেননা যার কথা ফেরেশতাদের কথার সাথে মিলে যায়, তার পূর্বের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2019)


2019 - عن رفاعة بن رافع الزرقي قال: كُنَّا نُصلِّي يومًا وراء رسول الله صلى الله عليه وسلم فلمّا رفع رأسه من الركعة قال:"سمع الله لمن حَمِدَه" قال رجل وراءَه: ربنا ولك الحمدُ حمدًا كثيرًا طيبًا مباركًا فيه، فلمّا انصرف قال: من المتكلم آنفًا؟" فقال: أنا، قال:"رأيتُ بضعةً وثلاثين مَلَكًا يبتدرونها أيُّهم يكتُبهن أول".
صحيح: رواه مالك في القرآن (25) عن نُعيم بن عبد الله المجمر، عن عليّ بن يحيى الزرقيّ، عن أبيه، عن رفاعة بن رافع فذكر مثله.

ورواه البخاريّ في الأذان (799) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك به مثله، ووهم الحاكم (1/ 225) فاستدركه، وقد رواه أيضًا من طريق مالك به.




রিফায়া’আহ ইবনু রাফি’ আল-যুরকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সালাত (নামায) আদায় করছিলাম। যখন তিনি রুকু’ থেকে মাথা উঠালেন, তখন বললেন: "সামি'আল্লাহু লিমান হামিদা" (আল্লাহ তার কথা শোনেন, যে তার প্রশংসা করে)। তখন তাঁর পিছন থেকে এক ব্যক্তি বলল: "রাব্বানা ওয়া লাকাল হামদু, হামদান কাসীরান ত্বাইয়্যিবান মুবারাকান ফীহ" (হে আমাদের রব! আপনার জন্যেই সকল প্রশংসা, বহু, পবিত্র ও বরকতময় প্রশংসা)। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: "এইমাত্র কে কথা বলল?" লোকটি বলল: "আমি।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি দেখলাম ত্রিশের কিছু বেশি সংখ্যক ফিরিশতা দ্রুত প্রতিযোগিতায় লিপ্ত হয়েছে যে, কে সবার আগে এ বাক্যগুলো লিখবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2020)


2020 - عن أنس بن مالك يقول: سقط النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن فَرَسٍ فجُحِشَ شِقُّه الأيْمَنُ، فدخلنا عليه نعودُه، فحضرتِ الصّلاة، فَصَلَّى بنا قاعدًا. فصلَّينا وراءه قعودًا، فلمّا قضى الصّلاة قال:"إنَّما جُعل الإمام ليؤتمَّ به، فإذا كبَّر فكبِّروا، وإذا سجد فاسْجُدُوا، وإذا رفع فارفعوا، وإذا قال: سمع الله لمن حَمِدَه فقولوا: ربنَّا ولك الحمد، وإذا صلى قاعدًا فصلوا قُعودًا أجمعون".

متفق عليه: رواه مسلم في الصّلاة (411) من طريق سفيان بن عيينة، عن الزّهريّ، قال: سمعتُ أنس بن مالك يقول: فذكر الحديث، ورواه البخاريّ في الأذان (805) من طريق سفيان قال غير مرة عن الزّهريّ، قال: سمعت أنس بن مالك فذكر الحديث نحوه، وستأتي بقية الأحاديث في متابعة الإمام، وانظر حديث أبي هريرة في باب التأمين.

وحديث أنس رواه عبد الرزّاق (2909) ومن طريقه الإمام أحمد (12652) عن معمر، عن الزّهريّ، عن أنس بن مالك مقتصرًا على قوله:"إذا قال الإمام: سمع الله لمن حَمِدَه، فقولوا: ربنا لك الحمد".

وفي الباب حديث أبي موسى رواه مسلم في الصّلاة (404). انظر باب التّشهد.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি ঘোড়া থেকে পড়ে গিয়েছিলেন, ফলে তাঁর ডান পাশটি আঘাতপ্রাপ্ত (বা ক্ষত-বিক্ষত) হয়েছিল। আমরা তাঁর সেবা-শুশ্রূষা করার জন্য তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম। এমন সময় সালাতের ওয়াক্ত উপস্থিত হলো। তখন তিনি বসে আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। আমরাও তাঁর পিছনে বসে সালাত আদায় করলাম। সালাত শেষ করার পর তিনি বললেন: "ইমাম নিযুক্ত করা হয়েছে যেন তাকে অনুসরণ করা হয়। সুতরাং যখন সে তাকবীর বলবে, তোমরাও তাকবীর বলো। আর যখন সে সিজদা করবে, তোমরাও সিজদা করো। যখন সে উঠবে, তোমরাও ওঠো। আর যখন সে ‘সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ’ বলবে, তখন তোমরা বলো: ‘রাব্বানা ওয়া লাকাল হামদ’ (হে আমাদের প্রভু, আর আপনার জন্যই সমস্ত প্রশংসা)। আর যখন সে বসে সালাত আদায় করবে, তখন তোমরা সকলে বসে সালাত আদায় করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2021)


2021 - عن ابن عمر أنه كان يضع يديه قبل ركبتيه، وقال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعل ذلك.

صحيح: رواه ابن خزيمة (627)، والدارقطني (1303)، والحاكم (1/ 226)، وعنه البيهقيّ (2/ 100)، والطحاوي في شرحه (1/ 254)، كلّهم من طرق عن عبد العزيز بن محمد الدراورديّ، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده صحيح ورجاله ثقات، قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم، وقال أيضًا: فأما القلب في هذا فإنه إلى حديث ابن عمر أميل لروايات في ذلك كثيرة عن الصّحابة والتابعين. انتهى.

وعلَّقه البخاريّ في صحيحه (قبل حديث: 803)، وعزاه الحافظ لمن عزوت إليهم.

ولكن رُوي عن ابن عمر خلاف ذلك. روى ابن أبي ليلى، عن نافع، عن ابن عمر، أنه كان يضع ركبتيه إذا سجد قبل يديه، ويرفع يديه إذا رفع قبل ركبتيه.

أخرجه ابن أبي شيبة (1/ 263) عن يعقوب بن إبراهيم، عن ابن أبي ليلى، عن نافع، عن ابن
عمر. إِلَّا أن إسناده ضعيف من أجل ابن أبي ليلى فإنه سيء الحفظ.

وأمّا ما جاء عن ابن عمر موقوفًا ومرفوعًا أنه قال:"إذا سجد أحدكم فليضع ركبتيه، فإذا رفع فليرفعهما، فإنَّ اليدين تسجدان كما يسجد الوجه" سيأتي تخريجه. فهو يدل على أن السجدة تكون بوضع اليدين على الأرض مثل وضع الوجه عليها.

فهذا لا يعارض المرفوع كما فهم البيهقيّ (2/ 100، 101) فقال عقب إخراج حديث الدراوردي:"والمشهور عن عبد الله بن عمر في هذا ما أخبرنا أبو الحسن عليّ بن محمد المقرئ، أخبرنا الحسن بن محمد بن إسحاق، ثنا يوسف بن يعقوب القاضي، ثنا سليمان بن حرب، ثنا حمّاد بن زيد، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، قال … (فذكره).

ثمّ رواه من طريق إسماعيل ابن علية، عن أيوب بإسناده ورفعه قال:"إنَّ اليدين تسجدان كما يسجد الوجه، فإذا وضع أحدكم وجهه فليضع يديه، فإذا رفعه فليرفعهما" وكذلك رواه أحمد بن سنان عن إسماعيل. والمقصود منه وضع اليدين في السجود، لا التقديم فيهما" انتهى.

فكأنه يقول: إن المرفوع الذي رواه الدراوردي المقصود منه هذا، لا تقديم وضع اليدين في السجود. ولكن المتبادر من السياقين أنهما يختلفان.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি সিজদা করার সময় হাঁটু রাখার পূর্বে তাঁর দু’হাত রাখতেন। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এরূপই করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2022)


2022 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا سجد أحدكم فلا يبرك كما يبرك البعير، وليضع يديه قبل ركبتيه".

صحيح: رواه أبو داود (840)، والنسائي (1091)، وأحمد (8955)، والدارقطنيّ، والبيهقي (2/ 99) كلّهم من طرق عن عبد العزيز بن محمد الدراورديّ، عن محمد بن عبد الله بن الحسن، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح. محمد بن عبد الله بن الحسن هو المعروف بالنفس الزكية الهاشمي ثقة، وثَّقه النسائيّ وغيره.

وقد أعلَّ البعض بأن الدراوردي تفرّد به عن محمد بن عبد الله بن الحسن.

قلت: ولا يضر تفرده فإنه ثقة، وقد تابعه في الجملة عبد الله بن نافع، عن محمد بن عبد الله بن الحسن به مختصرًا بلفظ:"يعمد أحدكم فيبرك في صلاته بركة الجمل" رواه أبو داود (841).

والنسائي (1090)، والتِّرمذيّ (269) كلّهم من هذا الطريق. وفيه استفهام إنكار.

وعبد الله بن نافع هو: ابن أبي نافع الصائغ، المخزومي مولاهم ثقة من رجال مسلم.

وأعله البخاريّ بالانقطاع فقال في ترجمة محمد بن عبد الله بن حسن في"التاريخ الكبير" (1/ 139):"محمد بن عبد الله بن حسن لا يتابع عليه، وقال: لا أدري أسمع من أبي الزّناد أم لا؟".

قلت: قال ذلك بناء على شرطه المعروف وهو: معرفة اللقاء، ولكن الجمهور خالفوه فاكتفوا بمجرد إمكان اللقاء مع أمْنِ التدليس. ومحمد بن عبد الله بن حسين لم يعرف بالتدليس، وقد عاصر شيخه أبا الزّناد طويلًا فإنه مات سنة (145 هـ)، ومات شيخه سنة (130 هـ)، وكان عمره ثلاثًا
وخمسين سنة.

وبهذا صحَّ الحديث. وقد صحَّحه عبد الحق في الأحكام، وقال النوويّ في"المجموع" (3/ 421):"إسناده جيد". وكذا قال أيضًا في الخلاصة (1284) وقال:"ولم يضعفه أبو داود".

وقال الحافظ في"بلوغ المرام":"هو أقوى من حديث وائل بن حجر" وهو الآتي.

ولكن أعلّه الحافظ ابن القيم رحمه الله تعالى: بأنَّ هذا الحديث وقع فيه وهم من بعض الرواة؛ فإنَّ أوَّل الحديث يخالف آخره، فإنَّه إذا وضع يديه قبل ركبتيه فقد برك كما يبرك البعير؛ فإنَّ البعير إنّما يضع يديه أوَّلًا. ولمَّا علم أصحاب هذا القول ذلك قالوا: ركبنا البعير في يديه، لا في رجليه. فهو إذا برك وضع ركبته أوَّلًا، فهذا هو المنهي عنه. ثمّ قال: وهو فاسدٌ لوجوهٍ:

أحدها: أنَّ البعير إذا برك فإنَّه يضع يديه أوَّلًا، وتبقى رجلاه قائمتين.

والثاني: أنَّ قولهم ركبنا البعير في يديه .. كلام لا يُعقل، ولا يعرفه أهل اللغة، وَإِنَّما الرُّكبة في الرجلين، وإن أُطلق على اللتين في يديه اسم الركبة فعلى سبيل التغليب.

والثالث: أنَّه لو كان كما قالوه ثقال:"فليبرك كما يبرك البعير"، وإنَّ أوَّل ما يمسُّ الأرض من البعير يداه.

ثمّ ذكر ابن القيم بقية الوجوه وهي عشرة في ترجيح حديث وائل بن حجر من عشرة وجوه، فانظرها. انظر زاد المعاد (1/ 227).

وحديث وائل بن حجر هو:"رأيتٌ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذا سجد وضع ركبتيه قبل يديه، وإذا نهض رفع يديه قبل ركبتيه".

رواه أبو داود (837) واللّفظ له، والتِّرمذيّ (268)، والنسائي (1089)، وابن ماجة (882)، وابن خزيمة (626)، والدارقطني (1307)، والدارمي (1/ 303) كلّهم من طرق عن يزيد بن هارون، نا شريك، عن عاصم بن كليب، عن أبيه، عن وائل بن حجر فذكر مثله.

قال الترمذيّ:"حسن غريب، لا نعرف أحدًا رواه مثل هذا عن شريك وقال: روي همام، عن عاصم هذا مرسلًا، ولم يذكر فيه وائل بن حجر".

قلت: شريك هو: ابن عبد الله النحفي صدوق يخطئ كثيرًا تغير حفظه منذ ولي القضاء بالكوفة، كذا في التقريب.

ولعلَّ هذا مما أخطأ فيه، ولذا قال الدَّارقطنيّ:"تفرّد به يزيد عن شريك، ولم يحدث به عن عاصم بن كليب غير شريك، وشريك ليس بالقوي فيما ينفرد به"، ومثله قال أيضًا البخاريّ، وابن أبي داود، والبيهقيّ، بأن شريكًا تفرّد به.

وقال البيهقيّ (2/ 99):"هذا حديث يعد في أفراد شريك القاضيّ، وإنما تابعه همام من هذا الوجه مرسلًا. هكذا ذكره البخاريّ وغيره من الحفاظ المتقدمين". انتهى. انظر أيضًا"التلخيص" (1/ 254).
فإذا كان شريك لا يحتج به إذا انفرد، فكيف إذا خالف، فقد روى أصحاب عاصم بن كليب عنه صفة صلاة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وسبق ذكر بعضه، ولم يذكر أحد منهم ما ذكره شريك.

وللحديث طريق آخر وهو معلول أيضًا، رواه أبو داود (839) وعنه البيهقيّ (2/ 98) عن عبد الجبار بن وائل، عن أبيه أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فذكر صفة الصّلاة، وقال:"فلمّا سجد وقعتا ركبتاه إلى الأرض قبل أن تقع كفاه". وعبد الجبار لم يسمع من أبيه شيئًا كما قال ابن معين والبخاري.

والطريق الآخر رواه شقيق قال: حَدَّثَنِي عاصم بن كليب، عن أبيه، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فذكر مثله، وزاد:"وإذا نهض نهض على ركبتيه واعتمد على فخذه". وشقيق لا يعرف.

وكذلك ما رواه الدَّارقطنيّ (1308)، والحاكم (1/ 226) - وصحَّحه على شرط الشّيخين -، من طريق حفص بن غياث، عن عاصم الأحول، عن أنس في حديثٍ فيه:"ثم انحط بالتكبير، فسبقتْ ركبتاه يديه". قال الدَّارقطنيّ: تفرّد به العلاء بن إسماعيل، عن حفص بهذا الإسناد.

وكذا قال أيضًا البيهقيّ (2/ 99). وقال الحافظ في"التلخيص" (1/ 254) وهو"مجهول".

وكذلك ما رواه مصعب بن سعد بن أبي وقَّاص، عن أبيه قال: كنَّا نَضع اليدين قبل الركبتين، فأمرنا بالركبتين قبل اليدين.

رواه ابن خزيمة (628) عن إبراهيم بن إسماعيل بن يحيى بن سلمة بن كهيل، حَدَّثَنِي أبيّ، عن أبيه، عن سلمة، عن مصعب به.

تفرّد به إبراهيم بن إسماعيل بن يحيى بن سلمة، عن أبيه وهما ضعيفان، وفي التقريب: إبراهيم بن إسماعيل"ضعيف"، وأبوه إسماعيل بن يحيى"متروك".

قال الحازمي في كتابه"الاعتبار" (ص 55):"أما حديث سعد ففي إسناده مقال، ولو كان محفوظًا لدل على النسخ، غير أن المحفوظ عن مصعب بن سعد، عن أبيه حديث نسخ التطبيق. انتهى.

وقد أعلّه أيضًا الحافظ ابن القيم قائلًا:"وإنَّما هو في قصَّة التطبيق".

وأشار الحافظ إلى رواية ابن خزيمة وقال:"لكنه من أفراد إبراهيم بن إسماعيل بن يحيى بن سلمة بن كهيل عن أبيه، وهما ضعيفان". انتهى.

قلت: ويمثل هذا الحديث الضعيف جدًّا بل مكذوب يستدل ابن خزيمة بأن وضع اليدين قبل الركبتين منسوخ! فلو قال عكس ذلك لكان متجهًا؛ لأنَّ وضع اليدين قبل الركبتين يساعد الضعفاء وكبار السن على الخرور إلى السّجود بخلاف وضع الركبتين قبل اليدين. ومن المعلوم أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لما أسنَّ وثقل اختار الوضع الذي يساعده في أداء الصّلاة، فكان أكثر صلاته النافلة في البيت جالسًا، فليكن من آخر الأمرين منه وضع اليدين قبل الركبتين.

هذه خلاصة ما قيل في أحاديث هذا الباب، وللعلماء نفس طويل في دراسة الأحاديث من المصححين
والمضعفين، ولا أرى حشد أدلتهم، إنّما أكتفي بما وصلت إليه بعد دراسة هذه الأحاديث سائلًا الله تعالى التوفيق والسَّداد.

ونظرًا لتعارض الأدلة في كيفية الخرور إلى السجود اختلف أهل العلم في هذا الباب كما قال ابن المنذر: فممَّن رأى أن يضع ركبتيه قبل يديه: عمر بن الخطّاب رضي الله عنه، وبه قال النخعيّ، ومسلم بن يسار، والثوريّ، والشافعيّ، وأحمد، وإسحاق، وأبو حنيفة، وأصحابه، وأهل الكوفة.

وقالت طائفة: يضع يديه قبل ركبتيه، قاله مالك. وقال الأوزاعي: أدركنا الناس يضعون أيديهم قبل رُكَبهم. قال ابن أبي داود: وهو قول أصحاب الحديث. اهـ.

قلت: وهي رواية أخرى عن أحمد أنه يضع يديه قبل ركبتيه لحديث أبي هريرة. المغني (1/ 193).

وعن مالك وأحمد، رواية بالتخيير؛ لأنَّ ترجيح أحد المذهبين على الآخر من حيث السنة لا يظهر كما قال النوويّ.

وهذا الاختلاف في الأفضلية، والصلاة صحيحة في الحالتين باتفاق العلماء، كما قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى في الفتاوى (22/ 449).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ সিজদা করে, তখন সে যেন উট যেভাবে হাঁটু গেড়ে বসে সেভাবে হাঁটু গেড়ে না বসে। বরং সে যেন তার দুই হাঁটু রাখার পূর্বে তার দুই হাত রাখে।









আল-জামি` আল-কামিল (2023)


2023 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اعتدِلُوا في السجود، ولا يَبْسُط أحدكم ذراعيه انبساط الكلب".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (822)، ومسلم في الصّلاة (493) كلاهما من طريق محمد بن جعفر، عن شعبة، قال: سمعتُ قتادة، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সিজদায় মধ্যপন্থা অবলম্বন করো (ভারসাম্য বজায় রাখো), এবং তোমাদের কেউ যেন কুকুরের মতো তার দুই বাহু বিছিয়ে না দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2024)


2024 - عن جابر بن عبد الله قال: سمعتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يأمر بأن يعتدل في السجود، ولا يسجد الرّجل باسطًا ذراعيه كالكلب.

حسن: رواه عبد الرزّاق (2929، 2930) من وجهين: أحدهما عن ابن جريج، عن سليمان بن موسى، أن جابر بن عبد الله قال فذكر الحديث كما سبق، والوجه الثاني: عن الثوريّ، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا سجد أحدكم فليعتدل، ولا يفترش ذراعيه افتراش الكلب".

وإسناده حسن لأن سليمان بن موسى وهو الأمويّ، مولاهم أبو أيوب الأشدق فقيه أهل الشام في زمانه يرسل عن جابر وغيره، قال ابن سعد: ثقة، وأثنى عليه راويه ابن جريج، وقال يحيى بن معين ليحيى بن أكثم: سليمان بن موسى ثقة، حديثه صحيح عندنا.

وفي الإسناد الثاني: أبو سفيان وهو: طلحة بن نافع القرشي مولاهم، رُوي عن جابر وغيره،
قال ابن عدي: لا بأس به، روى عنه الأعمش أحاديث مستقيمة. قال عليّ بن المديني: أبو سفيان لم يسمع من جابر إِلَّا أربعة أحاديث وقال: يكتب حديثه وليس بالقوي.

قال الحافظ: لم يخرج البخاريّ له سوى أربعة أحاديث عن جابر، وأظنها التي عناها شيخه عليّ بن المديني منها: حديثان في الأشربة قرنه بأبي صالح، وفي الفضائل حديث اهتز العرش كذلك.

والرابع: في تفسير سورة الجمعة، قرنه بسالم بن أبي الجعد. انتهى.

قلت: وحديث الباب ليس من الأربعة، إِلَّا أنه لا بأس به في الشّواهد مع متابعة سليمان بن موسى له.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে সিজদায় ভারসাম্য রক্ষা করার নির্দেশ দিতে শুনেছি। আর তিনি (নিষেধ করেছেন) যেন কোনো ব্যক্তি কুকুরের মতো তার বাহুদ্বয় প্রসারিত করে সিজদা না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (2025)


2025 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهانا أن يفترش أحدنا ذراعيه افتراش الكلب أو السبع.

صحيح: أخرجه عبد الرزّاق (2938) عن عثمان بن مطر، عن حسين، عن بُديل العقيليّ، عن أبي الجوزاء، عن عائشة فذكرت الحديث.

ورجاله ثقات، وإسناده صحيح، حسين هو: ابن ذكوان المعلم المكتب العَوْذي - من رجال الجماعة. وبديل هو: أبن ميسرة العقيلي البصريّ، وثَّقه ابن معين والنسائي والعجلي وابن حبَّان وغيرهم، وهو من رجال مسلم.

والحديث رواه مسلم في الصّلاة (498) من طريقين عن حسين المعلم به في سياق طويل في صفة صلاة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وسبق ذكره بطوله في باب الاعتدال في الرّكوع والسجود.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নিষেধ করতেন যে, আমাদের কেউ যেন (সিজদার সময়) কুকুরের মতো অথবা হিংস্র পশুর মতো তার বাহুদ্বয় বিছিয়ে না দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2026)


2026 - عن عبد الله بن مالك بن بُحينة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان إذا صلَّى فرَّج بين يديه حتَّى يبدوَ بياضُ إبطيه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (390)، ومسلم في الصّلاة (495) كلاهما من طريق بكر بن مُضر، عن جعفر بن ربيعة، عن الأعرج، عن عبد الله بن مالك بن بحينة فذكره.

وفي رواية عند مسلم:"إذا سجد يُجَنِّح في سجوده حتى يُرَى وَضَحُ إبْطيه".

قال النوويّ: التفريج والتجنيح والتخوية بمعنى واحد، ومعناه كله: باعد مرفقيه وعضديه عن جنبيه.




আব্দুল্লাহ ইবনে মালিক ইবনে বুহাইনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি তাঁর দুই হাতের মাঝে ফাঁকা করতেন (বাহু প্রশস্ত করতেন), এমনকি তাঁর বগলের শুভ্রতা দেখা যেত।









আল-জামি` আল-কামিল (2027)


2027 - عن البراء قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا سجدت فضَعْ كفَّيك، وارفَع مرفقيك".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (494) عن يحيى بن يحيى قال: أخبرنا عبيد الله بن إياد، عن إياد، عن البراء فذكره.




বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি সিজদা করবে, তখন তোমার হাতের তালু (জমিনে) রাখবে এবং তোমার কনুইদ্বয় (মাটি থেকে) উঁচু করে রাখবে।"