হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2048)


2048 - عن أبي حُميد الساعدي في عشرة من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فيهم أبو قتادة فذكر الحديث في صفة صلاة النبي صلى الله عليه وسلم وفيه: ثم يعود - يعني إلى السجود، ثم يرفع فيقول: الله أكبر، ثم يثني رجله فيقعد عليها معتدلًا حتى يرجع، أو يقر كل عظم موضعه معتدلًا.

صحيح: رواه البيهقي (2/ 123) واللفظ له، عن شيخه الحاكم أبي عبد الله، ثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، ثنا محمد بن سنان، ثنا أبو عاصم، عن عبد الحميد بن جعفر، قال: حدثني محمد بن عمرو بن عطاء قال: سمعتُ أبا حُميد الساعدي في عشرة من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم … فذكر مثله.

وإله أشار البيهقي في"المعرفة" (3/ 42) قائلًا:"وروينا جلسة الاستراحة في حديث أبي حُميد الساعدي" إلا أنه لم يذكره في الباب، والحديث رواه أيضًا أبو داود (963) من طريقين؛ عن الإمام أحمد بن حنبل، ثنا أبو عاصم الضحاك بن مخلد، وعن مسدد، عن يحيي - (وهو ابن سعيد) كلاهما عن عبد الحميد بن جعفر به، في حديث صفة صلاة النبي صلى الله عليه وسلم إلا إنه لم يتضح لي موضع الشاهد إلا قوله:"يفتخ بالخاء - أصابع رجليه إذا سجده، ثم يقول:"الله أكبر ويرفع، ويُثني رجله اليُسرى فيقعد عليها، ثم يصنع في الأخرى مثل ذلك"، ولكن الحافظ ابن حجر أكد على أن جميع الروايات عن أبي حُميد لم تتفق على نفي جلسة الاستراحة، بل أخرجه أبو داود أيضًا من وجه آخر عنه بإثباتها، وذلك ردًّا على الطحاوي الذي ادعى بخلو حديث أبي حُميد عنها، انظر:"الفتح" (2/ 302).

قلت: هكذا رواه أبو داود حديث أبي عاصم عن الإمام أحمد، ولم أجده في المسند، وإنما رواه الإمام أحمد في مسنده (23599) عن يحيى بن سعيد، عن عبد الحميد بن جعفر به في صفة صلاة النبي صلى الله عليه وسلم، والشاهد فيه قوله:"ثم هوى ساجدًّا وقال: الله أكبر ثم جافي، وفتح عَضُديه عن
بطنه، وفتح أصابع رجليه، ثم ثَنَى رجله اليسرى، وقعد عليها، واعتدل حتى رجع كل عظم في موضعه، ثم هوى ساجدًّا وقال: الله أكبر، ثم ثنى رجله، وقعد عليها حتى يرجع كل عضو إلى موضعه، ثم نهض، فصنع في الركعة الثانية مثل ذلك".

ورواه أيضًا الترمذي (304) عن محمد بن بشار ومحمد بن المثنَّى قالا: حدثنا يحيى بن سعيد القطان فذكر صفة صلاة النبي! صلى الله عليه وسلم، والشاهد مثله.

وقوله: فتخ - بالخاء المعجمة - أي فتح أصابع رجليه: أي نصبها وغمز موضع المفاصل منها، وثناها إلى باطن الرجل، وأصل الفتخ: اللين، وفيه يقال للعقاب: فتخاء، لأنها إذا انحطت كسرت جناحيها" كذا في النهاية.

وأما ما جاء في بعض الروايات: فتح - بالحاء المهملة، فيرى بعض أهل العلم أنه تصحيف، وإن كان معناه قريب منه.




আবূ হুমাইদ সা'ঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দশজন সাহাবীর উপস্থিতিতে, যাদের মধ্যে আবূ ক্বাতাদাহও ছিলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের পদ্ধতি সম্পর্কিত হাদীসটি বর্ণনা করেন। এতে রয়েছে: এরপর তিনি ফিরে আসতেন—অর্থাৎ সাজদার দিকে; অতঃপর তিনি মাথা তুলে 'আল্লাহু আকবার' বলতেন। এরপর তিনি তাঁর পা ভাঁজ করে তার উপর সোজা হয়ে বসতেন, এমনকি প্রতিটি অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ তার নিজ নিজ স্থানে সোজাভাবে স্থির হয়ে যেত।









আল-জামি` আল-কামিল (2049)


2049 - عن أبي الزبير أنه سمع طاوسًا يقول: قلنا لابن عباس في الإقعاء على القدمين؟ فقال: هي السنَّة، فقلنا له: إنا لنراه جفاءً بالرجُلِ فقال ابن عباس: بل هي سنة نبيك محمد صلى الله عليه وسلم.

صحيح: أخرجه مسلم في المساجد (536) عن إسحاق بن إبراهيم، أنبا محمد بن بكر، أنبأ ابن جريج، أخبرني أبو الزبير فذكر الحديث.

اختلف أهل العلم في حكم الإقعاء وتفسيره؛ فإن كان تفسيره أن يجعل أليتيه على عقبيه بين السجدتين، وهو المراد به في حديث ابن عباس فهو مستحبة عند الشافعي، وبه قال أكثر أهل الحديث.

وقد ثبت ذلك عن العبادلة، قال الأعمش، عن عطية: رأيتُ العبادلة يقعون في الصلاة بين السجدتين، يعني عبد الله بن الزبير، وابن عمر، وابن عباس. رواه ابن أبي شيبة (1/ 285، 286) عن أبي معاوية، عن الأعمش. وكذلك رواه أيضًا طاوس، قال معاوية بن خديج: رأيتُ طاوسًا يقعي، فقلتُ: رأيتك تقعي؟ فقال: ما رأيتني أقعي، ولكنها الصلاة. رأيت العبادلة الثلاثة يفعلون ذلك؟ عبد الله بن عباس، وعبد الله بن عمر، وعبد الله بن الزبير، رواه البيهقي (2/ 119) من طريق سفيان، ثنا أبو زهير معاوية بن خليج فذكر مثله.

قال البيهقي: فهذا الإقعاء المرخص فيه، أو المسنون على ما روينا عن ابن عباس وابن عمر، وهو أن بضع أطراف أصابع رجليه على الأرض، ويضع ألْيتيه على عقبيه، ويضع ركبتيه على الأرض".

قال الترمذي (283) بعد ما روى حديث ابن عباس: وقد ذهب بعض أهل العلم إلى هذا الحديث من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يرون بأسًا بالإقعاء. وهو قول بعض أهل مكة من أهل العلم
والفقه". انتهى.

وقال المازري في"المعلم" (1/ 274): وقد روي عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يُصلي مُقْعِيًا، قال ابن شُميل: الإقعاء أن يجلس على وركيه، وهو الاحتفاز والاستيفاز.

وقال المازري أيضًا: حكى الثعالبي في أشكال الجلوس عن الأئمة: أن الإنسان إذا ألصق عَقِبيه بأليتيه قيل: أقعى، وإذا استوفز في جلوسه، كأنه يريد أن يثور للقيام، قيل: احتفز واقعنفز، أو قعد القَعْفَزي، فإذا ألصق أليتيه بالأرض، وتوسط سناقيه قيل: قرطس. انتهى.

قلت: ولا منافاة بين هذا الإقعاء الذي ذكره ابن عباس، وفسره ابن شُميل وغيره من أهل اللغة وبين الاقتراش الذي ورد في حديث أبي حُميد وغيره فإنها كلها سنة، وقد قال به أهل العلم والفقه من أهل مكة، ويظهر منه أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يفعل تارة هذه، وتارة هذه. فلا حاجة إلى تأويل بأن ذلك كان لأجل عذر من مرض وغيره.

وأما إن فسرنا الإقعاء بأن يُلصق ألْيتيه بالأرض، وينصبَ ساقيه، ويضعَ يديه على الأرض كإقعاء الكلب والقرد كما قال الهروي وغيره من أهل اللغة، فهذا الذي ورد النهي في الأحاديث، وإن كان أسانيدها ضعيفة مثل حديث علي بن أبي طالب قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا علي أحب لك ما أحب لنفسي، وأكره لك ما أكره لنفسي، لا تُقْعِ بين السجدتين".

رواه الترمذي (282) عن عبد الله بن عبد الرحمن، أخبرنا عبيد الله بن موسى، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي بن أبي طالب فذكره، قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه من حديث علي إلا من حديث أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي. وقال: وقد ضعَّف بعض أهل العلم الحارث الأعور". انتهى

قلت: الحارث الأعور مع ضعفه عند أهل العلم فيه أيضًا أبو إسحاق السبيعي وهو مدلس قد عنعن.

ومثل حديث أبي هريرة قال:"أمرني خليلي بثلاث، ونهاني عن ثلاث، أمرني بركعتي الضحى، وصوم ثلاثة أيام من الشهر، والوتر قبل النوم، ونهاني عن ثلاثة: عن الالتفات في الصلاة كالتفات الثعلب، وإقعاء كإقعاء القرد، ونقر كنقر الديك"، روي عن أبي هريرة من طريقين: أحدهما من طريق ليث بن أبي سليم، عن مجاهد، عن أبي هريرة، ومن طريقه رواه البيهقي (2/ 120)، ورواه ابن أبي شيبة (1/ 285) عن علي بن مسهر، عن ليث به مكتفيا بقوله:"نهاني خليلي أن أقعي كإقعاء القرد".

ورواه الإمام أحمد (10450، 10483) عن طريقين، عن ليث به إلا أنه اكتفى بذكر الشطر الأول من الحديث، ولم يذكر الشطر الثاني، وإن الشطر الأول جاء من طرق صحيحة، وسيأتي في صلاتي الضُّحى والوتر.

والطريق الثاني ما رواه أبو داود الطيالسي (2716) قال: حدثنا أبو عوانة، عن يزيد بن أبي
زياد، عمن سمع أبا هريرة يقول فذكر الحديث بطوله.

ورواه الإمام أحمد (7595) عن محمد بن فُضيل، حدثنا يزيد بن أبي زياد به، وفيه علتان: إحداهما زياد بن أبي زياد فإنه ضعيف، والثانية: جهالة الراوي عن أبي هريرة، وقد سماه شريك في رواية عن يزيد بن أبي زياد بأنه مجاهد، رواه الإمام أحمد (8106) عن يحيى بن آدم، حدثنا شريك به، وشريك وشيخه ضعيفان.

وفي هذا المعنى أحاديث أخرى غير ما ذكرتُ وكلها ضعيفة وأكد بذلك النووي وغيره، انظر للمزيد"السنن الكبري"




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবুয যুবাইর (আবুজ জুবায়ের) তাউসকে (তাউস ইবনু কায়সান) বলতে শুনেছেন: আমরা ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দুই পায়ের পাতার উপর ‘ইক্বা’ (পায়ের ওপর ভর দিয়ে বসা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম? তিনি বললেন: এটি সুন্নাহ। আমরা তাঁকে বললাম: আমরা এটিকে পুরুষের জন্য রূঢ়তা (কষ্টকর) মনে করি। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বরং এটি তোমাদের নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর সুন্নাহ।

সহীহ: এটি মুসলিম তাঁর মসজিদ অধ্যায়ে (৫৩৬) ইসহাক ইবনু ইবরাহীম সূত্রে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু বাকর সূত্রে, তিনি ইবনু জুরাইজ সূত্রে, তিনি আবূয যুবাইর সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

‘ইক্বা’র হুকুম এবং ব্যাখ্যা নিয়ে ইলমপন্থীদের মধ্যে মতভেদ রয়েছে। যদি এর ব্যাখ্যা এই হয় যে, দুই সিজদার মাঝে উভয় গোড়ালির ওপর নিতম্ব স্থাপন করা, যা ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে উদ্দেশ্য, তবে এটি ইমাম শাফেঈর মতে মুস্তাহাব (পছন্দনীয়) এবং অধিকাংশ আহলে হাদীসের মতও এটি।

এটা আবাদিলাদের (আবদুল্লাহ নামধারীদের) থেকেও প্রমাণিত। আ’মাশ (রহ.) আতিয়্যা (রহ.) থেকে বর্ণনা করেছেন: আমি আবাদিলাদের—অর্থাৎ আবদুল্লাহ ইবনু যুবাইর, ইবনু উমার এবং ইবনু আব্বাসকে—সালাতের মধ্যে দুই সিজদার মাঝখানে ‘ইক্বা’ করতে দেখেছি। এটি ইবনু আবী শায়বাহ (১/২৮৫, ২৮৬) আবূ মু’আবিয়া সূত্রে আ’মাশ থেকে বর্ণনা করেছেন। তাউসও অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। মু’আবিয়াহ ইবনু খুদাইজ বলেছেন: আমি তাউসকে ‘ইক্বা’ করতে দেখলাম। আমি বললাম: আমি কি আপনাকে ‘ইক্বা’ করতে দেখেছি? তিনি বললেন: আমাকে তুমি ‘ইক্বা’ করতে দেখনি, বরং এটি সালাত। আমি তিন আবাদিলাকে—আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস, আবদুল্লাহ ইবনু উমার এবং আবদুল্লাহ ইবনু যুবাইরকে—তা করতে দেখেছি। বায়হাকী (২/১১৯) সুফইয়ান সূত্রে, তিনি আবূ যুহায়র মু’আবিয়াহ ইবনু খুলইজ সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

বায়হাকী বলেছেন: এটাই সেই ‘ইক্বা’ যা করার অনুমতি দেওয়া হয়েছে, অথবা সুন্নাহ হিসেবে বর্ণনা করা হয়েছে যেমনটি আমরা ইবনু আব্বাস ও ইবনু উমার থেকে বর্ণনা করেছি। আর তা হলো: উভয় পায়ের আঙুলের মাথা মাটিতে রাখা এবং নিতম্ব গোড়ালির ওপর রাখা ও উভয় হাঁটু মাটিতে স্থাপন করা।

ইমাম তিরমিযী (২৮৩) ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস বর্ণনা করার পর বলেছেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্য থেকে কিছু ইলমপন্থী এই হাদীসের দিকে ঝুঁকেছেন। মক্কার কিছু ইলম ও ফিকাহপন্থী এই ‘ইক্বা’কে খারাপ মনে করতেন না। সমাপ্ত।

মাযিরি ‘আল-মু'আল্লিম’ (১/২৭৪)-এ বলেছেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) থেকে বর্ণিত আছে যে, তিনি ‘ইক্বা’ অবস্থায় সালাত আদায় করতেন। ইবনু শুমাইল বলেছেন: ‘ইক্বা’ হলো নিতম্বের উপর বসা, যা আল-ইহতিফায (দৃঢ়ভাবে বসা) এবং আল-ইসতিফায (তাড়াতাড়ি ওঠার জন্য প্রস্তুত থাকা)। মাযিরি আরও বলেছেন: ছা'লাবী বিভিন্ন প্রকার বসার ধরণ সম্পর্কে ইমামদের থেকে বর্ণনা করেছেন: যখন মানুষ তার উভয় গোড়ালিকে তার নিতম্বের সাথে সংযুক্ত করে, তখন বলা হয়: ইকা’ করেছে। আর যখন সে তার বসার মধ্যে দ্রুত ওঠার জন্য প্রস্তুত থাকে, যেন সে দাঁড়ানোর জন্য উঠতে চাইছে, তখন বলা হয়: ইহতাফাঝা ওয়া-কা'আনফাঝা। অথবা সে আল-ক্বা'ফাযীহ ভঙ্গিতে বসেছে। আর যখন সে তার নিতম্বকে মাটির সাথে সংযুক্ত করে এবং উভয় গোছা মাটিতে রাখে, তখন বলা হয়: ক্বরতাস। সমাপ্ত।

আমি (লেখক) বলছি: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যে ‘ইক্বা’র কথা উল্লেখ করেছেন এবং ইবনু শুমাইল এবং অন্যান্য ভাষাবিদগণ যা ব্যাখ্যা করেছেন, তার সাথে আবূ হুমাইদ এবং অন্যান্যদের হাদীসে বর্ণিত ইক্তিরাশ (পায়ের গোছা বিছিয়ে বসা)-এর কোনো বিরোধ নেই। কারণ এগুলোর সবই সুন্নাহ। মক্কার আহলে ইলম ও ফিকাহপন্থীগণ এই মত গ্রহণ করেছেন। এর থেকে বোঝা যায় যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) কখনো এটা করতেন, আবার কখনো ওটা করতেন। সুতরাং, রোগ বা অন্য কোনো ওজরের কারণে এটি করা হয়েছিল—এমন ব্যাখ্যার কোনো প্রয়োজন নেই।

আর যদি আমরা ‘ইক্বা’র ব্যাখ্যা করি যে, নিতম্ব মাটিতে চেপে রেখে পায়ের গোছা দুটো খাড়া রাখা এবং হাত দুটো মাটিতে রাখা—যেমন কুকুর বা বানরের বসা—যেমনটি হারাবী এবং অন্যান্য ভাষাবিদগণ বলেছেন, তবে এটিই সেই ‘ইক্বা’ যা হাদীসগুলোতে নিষিদ্ধ করা হয়েছে। যদিও এর সনদগুলো দুর্বল। যেমন, আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) আমাকে বললেন: “হে আলী! আমি তোমার জন্য সেটাই পছন্দ করি যা নিজের জন্য পছন্দ করি, আর তোমার জন্য সেটাই অপছন্দ করি যা নিজের জন্য অপছন্দ করি। তুমি দুই সিজদার মাঝখানে ‘ইক্বা’ করো না।”

এই হাদীসটি তিরমিযী (২৮২) আবদুল্লাহ ইবনু আবদুর রহমান সূত্রে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা সূত্রে, তিনি ইসরাঈল সূত্রে, তিনি আবূ ইসহাক সূত্রে, তিনি আল-হারিস সূত্রে, তিনি আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ইমাম তিরমিযী বলেন: “আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসটি আমরা আবূ ইসহাক থেকে আল-হারিস, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে ব্যতীত অন্যভাবে জানি না। আর আল-হারিস আল-আ'ওয়ারকে কিছু ইলমপন্থী দুর্বল বলেছেন।” সমাপ্ত।

আমি বলছি: হারিস আল-আ'ওয়ার, ইলমপন্থীদের নিকট দুর্বল হওয়ার পাশাপাশি, এই সনদে আবূ ইসহাক আস-সাবীয়ীও আছেন, যিনি মুদাল্লিস (যারা শাইখ থেকে না শুনেও শুনার ভান করেন) এবং তিনি (আনআনা) করেছেন।

অনুরূপ, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস, তিনি বলেন: “আমার খলীল (অন্তরঙ্গ বন্ধু) আমাকে তিনটি জিনিসের আদেশ দিয়েছেন এবং তিনটি জিনিস থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি আমাকে চাশতের দু’রাকাত সালাত, প্রতি মাসে তিন দিন সিয়াম এবং ঘুমের পূর্বে বিতর আদায়ের আদেশ দিয়েছেন। আর তিনি আমাকে তিনটি জিনিস থেকে নিষেধ করেছেন: সালাতে শিয়ালের মতো এদিক-ওদিক তাকানো, বানরের মতো ‘ইক্বা’ করা এবং মোরগের মতো ঠোকর মারা।” আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই হাদীসটি দুটি সূত্রে বর্ণিত হয়েছে: একটি হলো লাইছ ইবনু আবী সুলাইম সূত্রে, তিনি মুজাহিদ সূত্রে, তিনি আবূ হুরায়রা সূত্রে। এই সূত্রেই বায়হাকী (২/১২০) এবং ইবনু আবী শায়বাহ (১/২৮৫) আলী ইবনু মুসহির সূত্রে, তিনি লাইছ সূত্রে সংক্ষিপ্তভাবে বর্ণনা করেছেন: “আমার খলীল আমাকে বানরের মতো ‘ইক্বা’ করতে নিষেধ করেছেন।” ইমাম আহমাদ (১০৪৫০, ১০৪৮৩) দু’টি সূত্রে লাইছ থেকে বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি হাদীসের প্রথম অংশটুকুই উল্লেখ করেছেন, দ্বিতীয় অংশ উল্লেখ করেননি। অবশ্য প্রথম অংশ সহীহ সূত্রে এসেছে এবং তা চাশত ও বিতরের সালাত আলোচনায় আসবে।

দ্বিতীয় সূত্রটি হলো: আবূ দাউদ তায়ালিসী (২৭১৬) বলেছেন: আমাদের কাছে আবূ আওয়ানাহ, তিনি ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ সূত্রে, তিনি এমন ব্যক্তির সূত্রে, যিনি আবূ হুরায়রাকে বলতে শুনেছেন—দীর্ঘভাবে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। ইমাম আহমাদ (৭৫৯৫) মুহাম্মাদ ইবনু ফুযাইল সূত্রে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এতে দু’টি দুর্বলতা রয়েছে: প্রথমত, ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ দুর্বল। দ্বিতীয়ত, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনাকারী রাবী অজ্ঞাত। শারীক, ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ সূত্রে তার বর্ণনায় এই অজ্ঞাত রাবীর নাম মুজাহিদ বলে উল্লেখ করেছেন। ইমাম আহমাদ (৮১০৬) ইয়াহইয়া ইবনু আদম সূত্রে, তিনি শারীক সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তবে শারীক এবং তার শায়খ উভয়ই দুর্বল।

এই অর্থে আমার উল্লিখিত হাদীস ছাড়াও আরও কিছু হাদীস আছে, কিন্তু সবগুলিই দুর্বল। ইমাম নববী এবং অন্যান্যরা এই দুর্বলতার বিষয়টি নিশ্চিত করেছেন। আরও বিস্তারিত জানার জন্য “আস-সুনানুল কুবরা” দেখুন।









আল-জামি` আল-কামিল (2050)


2050 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يفرش رجْلَه اليُسرى، وينصبُ رجْلَه اليُمنى، وكان ينهى عن عُقْبةِ الشيطان.

وفي رواية: كان ينهى عن عَقِبِ الشيطان.

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (448) من طريق حسين المعلم، عن بُديل بن ميسرة، عن أبي الجوزاء، عن عائشة في حديث طويل سبق ذكره في بداية القراءة بفاتحة الكتاب، وفي باب الاعتدال في الركوع والسجود.

وقوله: كان ينهى عن عُقْبَة الشيطان - وهو الإقعاء المكروه الذي فسره أهل اللغة كما سبق فإذا جعلنا الإقعاء على نوعين نوع فسره أهل اللغة فيكون مكروهًا، ونوع فسره الفقهاء فيكون مستحبًا وبهذا يمكن الجمع بين الحديثين، ولا نحتاج إلى نسخ ما قاله ابن عباس كما ادعى المازري بأنه لم يعلم ما ورد من الأحاديث الناسخة التي فيها النهي عن الإقعاء.

وأبدى الحافظ ابن حجر احتمالًا آخر، وهو أن يكون النهي الوارد في هذا الحديث للجلوس للتشهد الأخير، ويكون القعود على العقبين بين السجدتين.

انظر"التلخيص" (1/ 258) وهو تبع في ذلك البيهقي (1/ 120) يقول:"فلا يكون منافيا لما روينا عن ابن عباس وابن عمر في الجلوس بين السجدتين" انتهين

ومن الإقعاء المكروه أن يجلس الرجل في الصلاة معتمدًا على يده اليسرى لما جاء:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (নামাযে বসার সময়) তাঁর বাম পা বিছিয়ে দিতেন এবং ডান পা খাড়া করে রাখতেন। আর তিনি শয়তানের 'উক্ববাহ (বসার ভঙ্গিমা) থেকে নিষেধ করতেন।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি শয়তানের 'আক্বিব (গোড়ালির উপর বসা) থেকে নিষেধ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2051)


2051 - عن ابن عمر، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم نهى رجلًا وهو جالس معتمدًا على يده اليسرى في الصلاة، فقال: إنّها صلاة اليهود".

صحيح: رواه الحاكم (1/ 272) من طريق هشام بن يوسف، عن معمر، عن إسماعيل بن أمية، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه".
ومن طريقه رواه البيهقي (2/ 136) أيضًا مثله.

وتابعه عبد الرزاق عن معمر، وعنه رواه الإمام أحمد (1347) - وعنه أبو داود (992) - ولفظه:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يجلس الرجل في الصلاة، وهو يعتمد على يديه".

وهذا هو الصحيح من حديث عبد الرزاق الذي رواه أحمد، وأخطأ من جعل الحديث في الاعتماد في الرفع من السجود كما في سنن أبي داود عن أحمد بن محمد بن شبُويه ومحمد بن رافع ومحمد بن عبد الملك الغزال، كلهم عن عبد الرزاق.

قال البيهقي:"والذي يدل عليه رواية أحمد بن حنبل هي المراد بالحديث".

ثم رواه أبو داود (994) من طرق عن هشام بن سعد، عن نافع، عن ابن عمر، أنه رأى رجلًا يتكئ على يده اليسرى، وهو قاعد في الصلاة.

وفي رواية:"ساقطًا على شقه الأيسر. فقال: لا تجلس هكذا، فإن هكذا يجلس الذين يعذّبون".

وهي قرينة قوية بأن المقصود من حديث ابن عمر هو الإقعاء المكروه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে সালাতের মধ্যে তার বাম হাতের উপর ভর দিয়ে উপবিষ্ট থাকতে দেখে তাকে নিষেধ করলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই এটা ইয়াহুদীদের সালাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2052)


2052 - عن أبي قِلابة قال: جاءنا مالك بن الحويرث فصلَّى بنا في مسجدنا هذا فقال: إنِّي لأصَلِّي بكم وما أريد الصلاةَ، ولكن أريد أن أريكم كيف رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي، قال أيوب: فقلت لأبي قِلابة: وكيف كانت صلاتُه؟ قال: مثل صلاة شيخنا هذا يعني عمرو بن سلمة، قال أيوب: وكان ذلك الشيخ يُتم التكبيرَ، وإذا رفع رأسه عن السجدة الثانية جلس، واعتمد على الأرض، ثم قام.

صحيح: رواه البخاري في الأذان (824) عن معلي بن أسد، قال: حدثنا وُهيب، عن أيوب، عن أبي قِلابة فذكر مثله.

قال الشافعي في الأم (1/ 117) بعد أن روى حديث مالك بن الحويرث عن عبد الوهاب الثقفي، عن خالد الحذاء، عن أبي قِلابة به مثله:"وبهذا نأخذ فنأمر من قام من سجود، أو جلوس في الصلاة أن يعتمد على الأرض بيديه معًا اتباعًا للسنة".




মালিক ইবনুল হুওয়াইরিছ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (একবার) আমাদের এই মসজিদে এসে আমাদের সাথে সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমি তোমাদের সাথে সালাত আদায় করছি বটে, কিন্তু (শুধু) সালাত আদায় করতে চাই না, বরং আমি তোমাদেরকে দেখাতে চাই যে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কিভাবে সালাত আদায় করতে দেখেছি। আইয়্যুব বলেন: আমি আবূ কিলাবাকে জিজ্ঞেস করলাম: তাঁর সালাত কেমন ছিল? তিনি (আবূ কিলাবা) বললেন: আমাদের এই শাইখ—অর্থাৎ আমর ইবনু সালামাহ-এর সালাতের মতো। আইয়্যুব বলেন: আর ঐ শাইখ তাকবীরসমূহ পূর্ণ করতেন, এবং যখন তিনি দ্বিতীয় সাজদাহ থেকে মাথা উঠাতেন, তখন বসতেন, মাটির উপর ভর করতেন, এরপর উঠে দাঁড়াতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2053)


2053 - عن الأزرق بن قيس قال: رأيتُ ابن عمر إذا قام من الركعتين اعتمد على الأرض بيده. فقلت لولده ولجلسائه: لعله يفعل هذا من الكبر؟ قالوا: لا ولكن هذا يكون.

حسن: رواه البيهقي (2/ 135) من حديث كامل بن طلحة، نثا حماد بن سلمة، عن الأزرق، فذكره.

وإسناده حسن من أجل كامل بن طلحة وهو الجحدري فإنه لا بأس به، وهو حسن الحديث. قال البيهقي: وروينا عن نافع، عن ابن عمر أنه كان يستند على يديه إذا نهض، وكذلك كان يفعل الحسن وغير واحد من التابعين.
وقوله:"ولكن هذا يكون" إشارة إلى الرفع.

وأما ما رواه الطبراني في الأوسط (4019) من حديث يونس بن بكير، قال: حدثنا الهيثم بن علقمة، عن عطية بن قيس بن ثعلبة، عن الأزرق بن قيس، قال: رأيت عبد الله بن عمر وهو يعجن في الصلاة، يعتمد على يديه إذا قام.

فقلت: ما هذا يا أبا عبد الرحمن؟ قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يعجن في الصلاة - يعني يعتمد" فقوله:"يعجن" منكر.

قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن الأزرق إلا الهيثم، تفرد به يونس بن بكير".

قلت: يونس بن بكير مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

ولكن شيخه الهيثم بن علقمة"مجهول" ولم يتابعه أحد على قوله:"يعجن".

وقد روي ذلك أيضًا عن ابن عباس:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا قام في صلاته وضع يديه على الأرض كما يضع العاجن".

قال ابن الصلاح في كلامه على الوسيط:"هذا الحديث لا يصح، ولا يعرف، ولا يجوز أن يحتج به". وقال النووي في"شرح المهذب": هذا حديث ضعيف، أو باطل لا أصل له".

ذكره الحافظ في"التلخيص" (392) (1/ 423) وأطال الكلام فيه، فليراجعه من شاء.

وأما الاعتماد على اليدين في النهوض، فقال مالك والشافعي: السنة أن يعتمد على يديه في النهوض؛ لأنّ مالك بن الحويرث وصف صلاة النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"ثم اعتمد على الأرض". كذا ذكره ابن قدامة في"المغني" (1/ 213 - 214).

وأما الإمام أحمد فنقل عنه أنه لا يعتمد على يديه سواء جلس جلسة الاستراحة أو لم يجلس" انتهى.

وقال ابن هانئ:"سألت أبا عبد الله: الرجل ينهض على يديه في الصلاة؟ قال: لا ينهض على يديه إلا أن يكون شيخًا كبيرًا، فينهض على يديه. ولينهض على صدور قدميه".

ثم قال:"رأيت أبا عبد الله (يعني الإمام أحمد) ربما يتوكّأ على يديه إذا قام في الركعة الأخيرة، وربما استوى جالسًا، ثم ينهض". مسائل الإمام أحمد (1/ 54).

وقال النووي في"شرح المهذب" (3/ 444): وقد ذكرنا أن مذهبنا أنه يستحب أن يقوم معتمدًا على يديه، وحكى ابن المنذر هذا عن ابن عمر ومكحول وعمر بن عبد العزيز، وابن أبي زكرياء والقاسم بن عبد الرحمن ومالك وأحمد".

وأما ما رُوي عن أبي هريرة قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم ينهض في الصلاة على صدور قدميها فهو ضعيف.

رواه الترمذي (288) عن يحيى بن موسى، حدثنا أبو معاوية، حدثنا خالد بن إلياس، عن صالح مولى التواق، عن أبي هريرة فذكر مثله.

قال الترمذي:"خالد بن إلياس ضعيف عند أهل الحديث، ويقال خالد ابن إياس أيضًا".
وقال البيهقي (2/ 124): روي خالد بن إلياس، ويقال: إياس، وهو ضعيف، عن صالح مولى التوأة، عن أبي هريرة فذكر مثله، وقال: حديث مالك بن الحويرث أصح. انتهى.

وقال الحافظ في"الفتح" (2/ 303): وعند سعيد بن منصور بإسناد ضعيف عن أبي هريرة فذكر مثله، وقال: وعن ابن مسعود مثله بإسناد صحيح. انتهى.

قلت: أثر ابن مسعود أخرجه البيهقي 2/ 125) وقال: هو عن ابن مسعود صحيح، ومتابعة السنة أولى. وكذلك حديث وائل بن حجر قال: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم إذا سجد وضع ركبتيه قبل يديه، وإذا نهض رفع يديه قبل ركبتيه ضعيف أيضًا.

انظر تخريجه في باب الخرور إلى السجود.

وعن المغيرة بن حكيم أنه رأى عبد الله بن عمر يرجع في سجدتين في الصلاة على صدور قَدَمَيه، فلما انصرف ذكر له ذلك فقال: إنها ليست من سنة الصلاة، وإنما أفعل هذا من أجل أنّي أشتكي، رواه مالك في الصلاة (50) عن صدقة بن يسار، عن المغيرة بن حكيم به مثله.




আল-আযরাক ইবনে কায়স থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখেছি, যখন তিনি দুই রাকআত শেষে দাঁড়াতেন, তখন হাত দিয়ে জমিনের উপর ভর করতেন। আমি তাঁর ছেলে ও তাঁর সঙ্গীদের বললাম: সম্ভবত তিনি বার্ধক্যের কারণে এমন করেন? তাঁরা বললেন: না, বরং এটি এভাবেই হয়ে থাকে (অর্থাৎ এটি প্রতিষ্ঠিত নিয়ম)।

এটি হাসান: বায়হাকী (২/১৩৫) কামিল ইবনে তালহার সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যিনি হাম্মাদ ইবনে সালামাহ থেকে, তিনি আল-আযরাক থেকে বর্ণনা করেছেন। এর সনদ হাসান হওয়ার কারণ হলেন কামিল ইবনে তালহা আল-জাহদারী, যার ব্যাপারে কোনো অসুবিধা নেই এবং তাঁর হাদীস হাসান।

বায়হাকী বলেন: আমরা নাফে’ থেকে, তিনি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছি যে, তিনি যখন দাঁড়াতেন, তখন তাঁর হাতের উপর ভর করতেন। তাবেঈদের মধ্যে হাসান (বাসরী) ও অন্যান্য অনেকেই এভাবে করতেন।

আর তাঁর উক্তি “বরং এটি এভাবেই হয়ে থাকে” ইঙ্গিত করে ভর করার প্রতি।

তবে তাবারানী আওসাত্ব (৪০১৯)-এ ইউনুস ইবনে বুকাইরের সূত্রে যে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদের কাছে আল-হাইসাম ইবনে আলকামা বর্ণনা করেছেন, তিনি আতিয়্যাহ ইবনে কায়স ইবনে সা’লাবা থেকে, তিনি আল-আযরাক ইবনে কায়স থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, তিনি সালাতে 'ইয়া’জিনু' (আটার মন্ডের মতো মন্থন) করছেন, যখন দাঁড়াতেন, তখন হাতের ওপর ভর করতেন।

আমি বললাম: হে আবূ আব্দুর রহমান, এটা কী? তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি সালাতে 'ইয়া’জিনু' করতেন—অর্থাৎ ভর করতেন। এই বর্ণনায় 'ইয়া’জিনু' (يعجن) শব্দটি মুনকার (অস্বীকৃত)।

তাবারানী বলেন: এই হাদীসটি আল-আযরাক থেকে হাইসাম ছাড়া আর কেউ বর্ণনা করেননি এবং ইউনুস ইবনে বুকাইর এতে একক।
আমি (আলবানী) বলি: ইউনুস ইবনে বুকাইর সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে, তবে তিনি হাসানুল হাদীস। কিন্তু তাঁর শায়খ হাইসাম ইবনে আলকামা ‘মাজহুল’ (অজ্ঞাত) এবং কেউ তাঁর 'ইয়া’জিনু' উক্তির ক্ষেত্রে অনুসরণ করেনি।

আর ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাতে দাঁড়াতেন, তখন আটা মন্থনকারী যেভাবে রাখে, সেভাবে তাঁর হাত দুটো জমিনে রাখতেন।"
ইবনুস সালাহ আল-ওয়াসীত সম্পর্কে তাঁর আলোচনায় বলেন: এই হাদীস সহীহ নয়, পরিচিতও নয় এবং এর দ্বারা প্রমাণ দেওয়া বৈধ নয়। ইমাম নববী শারহুল মুহাযযাব গ্রন্থে বলেন: এই হাদীসটি দুর্বল অথবা বাতিল, এর কোনো ভিত্তি নেই।
হাফিয ইবনু হাজার আত-তালখীস (৩৯২) (১/ ৪২৩)-এ এটি উল্লেখ করেছেন এবং এ বিষয়ে বিস্তারিত আলোচনা করেছেন। যার ইচ্ছা, তিনি তা দেখে নিতে পারেন।

আর দাঁড়ানোর সময় হাতের ওপর ভর করার ব্যাপারে ইমাম মালেক ও ইমাম শাফেঈ বলেছেন: সুন্নাত হলো দাঁড়ানোর সময় হাতের ওপর ভর করা। কেননা মালেক ইবনে হুয়াইরিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের বর্ণনা দিয়ে বলেন: "এরপর তিনি জমিনের ওপর ভর করলেন।" ইবনে কুদামা আল-মুগনী গ্রন্থে এমনটি উল্লেখ করেছেন (১/ ২১৩-২১৪)।

তবে ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: ইস্তিরাহাত-এর বৈঠকে বসুক বা না বসুক, তিনি হাতের উপর ভর করবেন না।

ইবনে হানি বলেন: আমি আবূ আব্দুল্লাহ (অর্থাৎ ইমাম আহমাদ)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: কোনো ব্যক্তি কি সালাতে হাতের ওপর ভর করে দাঁড়াবে? তিনি বললেন: সে হাতের ওপর ভর করে দাঁড়াবে না, তবে যদি সে অতিশয় বৃদ্ধ হয়, তাহলে হাতের ওপর ভর করে দাঁড়াবে। আর তাকে তার পায়ের অগ্রভাগের ওপর ভর করে দাঁড়ানো উচিত।
এরপর তিনি বলেন: আমি আবূ আব্দুল্লাহ (অর্থাৎ ইমাম আহমাদ)-কে দেখেছি, তিনি কখনও কখনও শেষ রাকআতে দাঁড়ানোর সময় হাতের ওপর ভর করতেন, আবার কখনও কখনও সোজা হয়ে বসে, এরপর দাঁড়াতেন। (মাসাইল আল-ইমাম আহমাদ, ১/ ৫৪)।

ইমাম নববী শারহুল মুহাযযাব (৩/ ৪৪৪)-এ বলেন: আমরা উল্লেখ করেছি যে, আমাদের মাযহাব হলো হাতের উপর ভর করে দাঁড়ানো মুস্তাহাব। ইবনুল মুনযির এই মত ইবনে উমর, মাকহুল, উমর ইবনে আব্দুল আযীয, ইবনে আবী যাকারিয়া, কাসিম ইবনে আব্দুর রহমান, মালেক ও আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন।

আর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতে তাঁর পায়ের অগ্রভাগের ওপর ভর করে দাঁড়াতেন—তা যঈফ (দুর্বল)।
এটি তিরমিযী (২৮৮) ইয়াহইয়া ইবনে মূসা থেকে, তিনি আবূ মুআবিয়া থেকে, তিনি খালিদ ইবনে ইলিয়াস থেকে, তিনি সালিহ মাওলা আত-তাওয়াক থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
ইমাম তিরমিযী বলেন: হাদীস বিশারদদের নিকট খালিদ ইবনে ইলিয়াস দুর্বল। তাঁকে খালিদ ইবনে ইয়াস-ও বলা হয়।
বায়হাকী (২/ ১২৪) বলেন: খালিদ ইবনে ইলিয়াস (বা ইয়াস)-এর সূত্রে বর্ণিত, যিনি দুর্বল, তিনি সালিহ মাওলা আত-তাওয়াহ থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। তিনি (বায়হাকী) বলেন: মালেক ইবনে হুয়াইরিসের হাদীসটি অধিকতর সহীহ।

হাফিয ইবনু হাজার ফাতহুল বারী (২/ ৩০৩)-এ বলেন: সাঈদ ইবনে মানসূরের নিকট দুর্বল সানাদে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ বর্ণিত আছে। আর ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও সহীহ সানাদে অনুরূপ বর্ণিত আছে।
আমি (আলবানী) বলি: ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আছারটি বায়হাকী (২/ ১২৫) বর্ণনা করেছেন এবং তিনি বলেন: ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি সহীহ, তবে সুন্নাহর অনুসরণই প্রথম। অনুরূপভাবে ওয়ায়েল ইবনে হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটিও দুর্বল। তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, যখন তিনি সাজদাহ করতেন, তখন তাঁর হাত রাখার আগে হাঁটু রাখতেন, আর যখন দাঁড়াতেন, তখন হাঁটু তোলার আগে হাত তুলতেন।
(এটির তাখরীজ সাজদায় যাওয়ার অধ্যায়ে দেখুন।)

আর মুগীরা ইবনে হাকীম থেকে বর্ণিত যে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সালাতে দুই সিজদার মাঝে তাঁর পায়ের অগ্রভাগের ওপর ভর করে উঠতে দেখেছেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: এটা সালাতের সুন্নাহ নয়, বরং আমি অসুস্থতার কারণে এমন করি। এটি মালেক আল-মুওয়াত্ত্বা (৫০) সালাত অধ্যায়ে সাদকাহ ইবনে ইয়াসার থেকে, তিনি মুগীরা ইবনে হাকীম থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2054)


2054 - عن ابن عباس قال: كشف رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الستارة، والناسُ صفوف خَلْف أبي بكر، فقال:"أيها الناس إنه لم يبق من مبشرات النبوة إلا الرؤيا الصالحة يراها المسلم. أو تُرَى له؛ ألا وإني نُهيتُ أن أقرأ القرآن راكعًا أو ساجدًا، فأما الركوع فعظموا فيه الربَّ عز وجل، وأما السجودُ فاجتهدوا في الدعاء. فقَمِن أن يُستجاب لكم".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (479) من أوجه عن سفيان بن عيينة، قال: أخبرني سليمان بن شحيم، عن إبراهيم بن عبد الله بن معبد، عن أبيه، عن ابن عباس فذكر الحديث.

ورواه أيضًا من طريق إسماعيل بن جعفر، أخبرني سليمان بن سحيم به ولفظه: كشف رسول الله صلى الله عليه وسلم السِتر، ورأسه معصوب في مَرَضِه الذي مات فيه فقال:"اللهم هل بَلَّغْتُ" ثلاث مرات"إنه لم يبق من مبشرات النبوة إلا الرؤيا يراها العبد الصالح أو تُرى له" ثم ذكر بمثل حديث سفيان.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্দা সরিয়ে দিলেন, তখন লোকেরা আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পেছনে কাতারে দাঁড়িয়েছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "হে লোক সকল! নবুওয়াতের সুসংবাদ দানকারী বিষয়ের মধ্যে আর কিছু অবশিষ্ট নেই, আছে শুধু ভালো স্বপ্ন (রু’ইয়া সালিহা), যা একজন মুসলিম দেখতে পায় অথবা তাকে দেখানো হয়। শোনো! আমাকে রুকু বা সিজদারত অবস্থায় কুরআন পড়তে নিষেধ করা হয়েছে। সুতরাং রুকূতে তোমরা মহান আল্লাহ তা‘আলার মহিমা ঘোষণা করো, আর সিজদায় তোমরা প্রাণপণে দু‘আ করার চেষ্টা করো। কারণ, তখন তোমাদের দু‘আ কবুল হওয়ার সম্ভাবনা বেশি।"









আল-জামি` আল-কামিল (2055)


2055 - عن علي بن أبي طالب قال: نهاني رسول الله صلى الله عليه وسلم أن أقرأ راكعًا وساجدًا.

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (480) من طريق ابن شهاب والوليد بن كثير وزيد بن أسلم كلهم عن إبراهيم بن عبد الله بن خنين، عن أبيه، أنه سمع علي بن أبي طالب فذكره وألفاظهم متقاربة.

ورواه داود بن قيس، عن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، فأدخل بين أبيه وبين علي بن أبي طالب - عبد الله بن عباس، ورواه مالك في الصلاة (28) عن نافع، عن إبراهيم بن عبد الله بن حنين، عن أبيه، عن أبي طالب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن لبس القَسّي، وعن تختُم الذهب، وعن قراءة القرآن في الركوع، ولم يذكر النهي عن القراءة في السجود.
ومن طريق مالك وغيره رواه مسلم في الصلاة (479/ 213) وقال: ولم يذكروا في رواياتهم النهي عنها في السجود، كما ذكره الزهري وزيد بن أسلم والوليد بن كثير وداود بن قيس، ورواه أيضًا في كتاب اللباس (2078) من طريق مالك مثل الموطأ سواء.

وأما الزهري فروى عنه يونس ولم يذكر النهي عن القراءة في السجود مثل مالك، بينما روي معمر عنه فذكر الركوع والسجود فالذين ذكروا النهي عن القراءة في الركوع والسجود حجة على من لم يذكروا.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে রুকু ও সিজদারত অবস্থায় কুরআন পাঠ করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2056)


2056 - عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا فرغ الله من القضاء بين العباد، أراد أن يُخرج برحمته من أراد مَن أهل النارِ، أمر الملائكة أن يُخرجوا من النار من كان لا يُشرك بالله شيئًا ممَّن أراد أن يَرحمه ممَّن يشهد أن لا إله إلَّا الله. فيعرفونهم في النار بأثر السجود، تأكل النار ابن آدم إلَّا أثر السجود. حرَّم الله على النار أن تأكل أثر السجود، فيخرجون من النار قد امتحشوا، فيُصبُّ عليهم ماءُ الحياةِ فينبتون تحته، كما تنبت الحِبَّة في حميل السيلِ".

متفق عليه: رواه البخاري في كتاب التوحيد (7437) ومسلمٌ في الإيمانِ (182) كلاهما من طريق إبراهيم بن سعد، عن ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي هريرة .. فذكره، في حديثٍ طويلٍ سبق ذكره في الإيمان.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ বান্দাদের মধ্যে বিচারকার্য সমাপ্ত করবেন, তখন তিনি তাঁর দয়া দ্বারা জাহান্নামবাসীদের মধ্য থেকে যাদেরকে ইচ্ছা করবেন, তাদের (জাহান্নাম থেকে) বের করে আনতে চাইবেন। তিনি ফেরেশতাদের নির্দেশ দেবেন যেন তারা এমন লোকদেরকে জাহান্নাম থেকে বের করে আনে, যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করেনি, যাদের প্রতি তিনি দয়া করতে চান এবং যারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই) বলে সাক্ষ্য দিত। ফেরেশতারা তাদেরকে জাহান্নামে সিজদার চিহ্নের মাধ্যমে চিনতে পারবে। আগুন আদম সন্তানকে গ্রাস করবে, কিন্তু সিজদার চিহ্নকে নয়। আল্লাহ সিজদার চিহ্নকে গ্রাস করা আগুনের জন্য হারাম করে দিয়েছেন। এরপর তারা ঝলসে যাওয়া অবস্থায় জাহান্নাম থেকে বেরিয়ে আসবে। তাদের ওপর ‘হায়াতের পানি’ (জীবনের পানি) ঢেলে দেওয়া হবে। ফলে তারা এর নিচে এমনভাবে গজিয়ে উঠবে, যেমনভাবে সয়লাবের পানিতে শস্যদানা গজিয়ে ওঠে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2057)


2057 - عن ابن عباس قال: كشف رسول الله الستارة، والناس صفوف خلف أبي بكر فقال:"أيها الناس! إنه لم يبق من مبشرات النبوة إلا الرؤيا الصالحة يراها المسلم، أو تُرى له، ألا وإني نُهيتُ أن أقرأ القرآن راكعًا أو ساجدًا، فأما الركوع فعظِّموا فيه الربَّ عز وجل، وأما السجود فاجتهدوا في الدعاء، فقمن أن يُستجاب لكم".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (479) من طريق سفيان بن عيينة، أخبرني سليمان بن سُحيم، عن إبراهيم بن عبد الله بن معبد، عن أبيه، عن ابن عباس فذكره، وسبق ذكر الحديث في باب النهي عن قراءة القرآن في الركوع والسجود.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্দা উঠালেন। তখন লোকেরা আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পেছনে কাতারবদ্ধ ছিল। অতঃপর তিনি বললেন: “হে লোক সকল! নবুওয়াতের সুসংবাদ দানকারী নিদর্শনাবলীর মধ্যে আর কিছুই অবশিষ্ট নেই, কেবল সৎ স্বপ্ন ছাড়া, যা কোনো মুসলিম ব্যক্তি নিজে দেখে, অথবা তাকে দেখানো হয়। জেনে রাখো! আর আমি রুকু অথবা সিজদারত অবস্থায় কুরআন তিলাওয়াত করতে নিষেধ প্রাপ্ত হয়েছি। সুতরাং রুকুর সময় তোমরা পরাক্রমশালী রবের মহিমা ও শ্রেষ্ঠত্ব ঘোষণা করো, আর সিজদার সময় তোমরা বেশি করে দু'আ করতে সচেষ্ট হও। কারণ (এ অবস্থায়) তোমাদের দু'আ কবুল হওয়ার যোগ্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (2058)


2058 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أقرب ما يكون العبد من ربِّه وهو ساجد فأكثرِوا الدُّعاء".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (482) من طريق سُمي مولى أبي بكر، أنه سمع أبا صالح
ذكوان، يحدث عن أبي هريرة … فذكر الحديث.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বান্দা তার রবের সবচেয়ে নিকটবর্তী হয় যখন সে সিজদারত থাকে। সুতরাং তোমরা বেশি বেশি দু'আ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2059)


2059 - عن معدان بن أبي طلحة اليعمري قال: لقيتُ ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: أخْبِرني بعَمل أعملُه يُدخلني الله به الجنةَ، أو قال: قلت: بأحبِّ الأعمال إلى الله. فسكت ثم سألتُه فسكت، ثم سألتُه الثالثة. فقال: سألت عن ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"عليك بكثرة السجود لله. فإنك لا تسجد لله سجدةً إلا رفعك الله بها درجةً، وحطَّ عنك بها خطيئةً".

قال معدانُ: ثم لقيتُ أبا الدرداء فسألتُه. فقال لي مثل ما قال لي ثوبان.

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (488) من طريق الأوزاعي، قال: حدثني الوليد بن هشام المُعيطي، حدثني معدان بن أبي طلحة اليَعْمَري فذكر مثله.




সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মা'দান ইবনু আবি তালহা আল-ইয়া'মারী বলেন: আমি (একবার) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে সাক্ষাৎ করে তাঁকে বললাম: আমাকে এমন একটি আমলের খবর দিন যা করলে আল্লাহ আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন। অথবা (মা'দান বলেন): আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: আল্লাহর নিকট প্রিয়তম আমল কোনটি? তখন তিনি নীরব থাকলেন। আমি পুনরায় তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, তিনি নীরব থাকলেন। এরপর আমি তাঁকে তৃতীয়বার জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: আমি এই বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করেছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "তোমার কর্তব্য হলো আল্লাহর জন্য অধিক সিজদা করা। কেননা, তুমি যখনই আল্লাহর উদ্দেশ্যে একটি সিজদা করো, আল্লাহ এর বিনিময়ে তোমার মর্যাদা এক ডিগ্রি বৃদ্ধি করে দেন এবং এর দ্বারা তোমার একটি গুনাহ মুছে দেন।" মা'দান বলেন: এরপর আমি আবুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করে তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম। তিনিও আমাকে সাওবান যা বলেছিলেন, ঠিক সেই একই উত্তর দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2060)


2060 - عن ربيعة بن كعب الأسلمي قال: كنتُ أبيتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتيتُه بوضوئه وحاجته، فقال لي:"سَلْ" فقلت: أسألك مرافقتك في الجنة، قال:"أو غير ذلك" قلت: هو ذاك، قال:"فَأعِنِّي على نفسِك بكثرة السجود".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (489) من طريق الأوزاعي، قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سلمة، حدثني ربيعة بن كعب الأسلمي فذكر مثله، وفي الحديث دليل لمن يقول: إن تكثير السجود أفضل من تطويل القيام. ولكن لما عارضه حديث جابر في صحيح مسلم أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"أفضل الصلاة طول القنوت" توقف الإمام أحمد عن الترجيح. والمراد بالقنوت القيام.

ورواه الإمام أحمد (16579) من طريق أُخرى أتمّ من هذا عن محمد بن إسحاق قال: حدّثني محمّد بن عمرو بن عطاء، عن نُعيم بن مُجمر، عن ربيعة بن كعب، قال: كنت أخْدُم رسول الله صلى الله عليه وسلم وأقوم له في حوائجه نهاري أجمع، حتى يصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم العشاء الآخرة، فأجلس ببابه إذا دخل بيته أقول: لعلّها أن تحدث لرسول الله صلى الله عليه وسلم حاجة، فما أزال أسمعه يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم: سبحان الله، سبحان الله، سبحان الله وبحمده" حتى أملَّ فارجع، أو تغلبني عيني، فأرقد. قال: فقال لي يومًا لِما يرى من خفَّتي له وخدمتي إياه:"سلني يا ربيعة أُعطك" قال: فقلت: أَنظر في أمري يا رسول الله! ثم أعلمك ذلك. قال: ففكّرت في نفسي، فعرفت أنَّ الدنيا منقطعة وزائلة، وأن لي فيها رِزقًا سيكفيني ويأتيني. قال: فقلت: أسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم لآخرتي، فإنّه من الله عز وجل بالمنزل الذي هو به. قال: فجئته فقال:"ما فعلت يا ربيعة؟" قال: فقلت: نَعَم يا رسول الله! أسألك أن تشفع لي إلى ربك فيُعتقني من النار. قال: فقال:"من أمرك بهذا ياربيعة؟" قال: فقلت: لا والذي بعثك بالحقّ! ما أمرني به أحدٌ، لكنك لما قُلت سلني أُعطك، وكنت من الله بالمنزل
الذي أنت به، نظرت في أمري وعرفت أنّ الدنيا منقطعة وزائلة، وأن لي رزقًا سيأتيني، فقلت: أسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم لآخرتي. قال: فصمت رسول الله صلى الله عليه وسلم طويلًا، ثمّ قال لي:"إنِّي فاعلٌ، فأعنِّي على نفسك بكثرة السجود".

إسناده حسن لأجل محمّد بن إسحاق، وقد صرح بالتحديث.




রবী‘আহ ইবনু কা‘ব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে রাত্রি যাপন করতাম। আমি তাঁর অযু করার পানি ও অন্যান্য প্রয়োজনীয় জিনিসপত্র এনে দিতাম। তিনি আমাকে বললেন: "তুমি কিছু চাও।" আমি বললাম: আমি জান্নাতে আপনার সাথীত্ব প্রার্থনা করি। তিনি বললেন: "এছাড়া অন্য কিছু?" আমি বললাম: এটাই (আমার একমাত্র চাওয়া)। তিনি বললেন: "তবে তুমি অধিক সাজদার মাধ্যমে এ ব্যাপারে আমাকে তোমার নিজের পক্ষ থেকে সাহায্য করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2061)


2061 - عن خادم للنبي صلى الله عليه وسلم رجل أو امرأة قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم مما يقول للخادم:"ألك حاجة؟" قال: حتى كان ذات يوم، فقال: يا رسول الله حاجتي. قال:"ما حاجتك؟" قال: حاجتي أن تشفع لي يوم القيامة. قال: ومن دلك على هذا؟" قال: ربّي. قال:"إمّا لا فأعنِّي بكثرة السجود".

صحيح: رواه الإمام أحمد (16076) عن عفان، حدثنا خالد - يعني الواسطي -، قال: حدثنا عمرو بن يحيى الأنصاري، عن زياد بن أبي زياد مولى بني مخزوم، عن خادم للنبي صلى الله عليه وسلم فذكره.

قال الهيثمي (2/ 249):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال؛ فرجاله رجال الشيخين غير زياد بن أبي زياد، واسم أبي زياد؛ ميسرة من رجال مسلم. وإسناده صحيح، والخادم المبهم في هذا الحديث قد يكون هو ربيعة بن كعب نفسه إلا أنه سأل في الحديث الأول الذي عند مسلم، مرافقة النبي صلى الله عليه وسلم في الجنة، وفي هذا الحديث سأل أن يُعتقه الله من النار، فلعلّ هذا سؤال آخر بعد إجابته النبيّ صلى الله عليه وسلم بسؤاله الأوّل.

وقوله:"إمَّا لا" بكسر الهمزة، وتشديد الميم، بإدغام نون"إن" الشرطية في ميم"ما" الزائدة، والتقدير: لا تترك هذه الحاجة، فكن أنت معينًا لي على قضائها بكثرة السّجود. أفاده السِّندي.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন খাদেম (পুরুষ বা নারী) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খাদেমকে প্রায়ই বলতেন, "তোমার কি কোনো প্রয়োজন আছে?" তিনি (খাদেম) বললেন: এমনকি একদিন তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার একটি প্রয়োজন আছে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার প্রয়োজন কী?" খাদেম বললেন, "আমার প্রয়োজন হলো আপনি যেন কিয়ামতের দিন আমার জন্য সুপারিশ করেন।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কে তোমাকে এ বিষয়ে পরামর্শ দিল?" খাদেম বললেন, "আমার রব।" তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যদি তা-ই হয়, তবে (এই বিষয়ে) তুমি বেশি বেশি সিজদা করার মাধ্যমে আমাকে সাহায্য করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2062)


2062 - عن أبي فاطمة قال: قلت يا رسول الله! أخبرني بعمل أستقيم عليه وأعمله. قال:"عليك بالسجود، فإنّك لا تسجد لله سجدة إلا رفعك الله درجة، وحطَّ بها عنك خطيئة".

حسن: رواه ابن ماجه (1422) عن هشام بن عمار وعبد الرحمن بن إبراهيم الدّمشقيان قالا: حدثنا الوليد بن مسلم، قال: حدثنا عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان، عن أبيه، عن مكحول، عن كثير بن مرة أنّ أبا فاطمة قال: فذكر الحديث. والوليد بن مسلم مدلس إلا أنه صرّح بالتحديث.

وعبد الرحمن بن ثابت مختلف فيه، والخلاصة أنه حسن الحديث، إلا ما يروي في تأييد مذهبه في القدر، وأنكروا عليه أحاديث يرويها عن أبيه عن مكحول.

قال ابن عدي:"له أحاديث صالحة، وكان رجلًا صالحًا، ويكتب حديثه على ضعفه، وأبوه ثقة".

والحديث في مسند الإمام أحمد (15527) من طريق ابن لهيعة، حدثنا الحارث بن زيد، عن كثير الأعرج الصدفي، قال: سمعت أبا فاطمة وهو معنا بذي العواري يقول … فذكر الحديث.
وابن لهيعة فيه كلام مشهور، ولكن في بعض الأسانيد بروي عنه عبد الله بن المبارك كما في زهده (1296) وعبد الله بن يزيد المقرئ، وقتيبة بن سعيد وسماع هؤلاء كان قديمًا.

وكثير الأعرج الصدفي لا يُعرف، ولكن المحفوظ أنه من حديث كثير بن مُرَّة كما قال المزي وغيره. وللحديث أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحّها.




আবূ ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাকে এমন একটি আমল সম্পর্কে অবহিত করুন যা আমি দৃঢ়ভাবে আঁকড়ে ধরব এবং আমল করব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি সিজদার (সালাতের) প্রতি গুরুত্বারোপ করো, কেননা তুমি যখনই আল্লাহর জন্য একটি সিজদা করো, আল্লাহ এর দ্বারা তোমার একটি মর্যাদা বৃদ্ধি করেন এবং তোমার একটি গুনাহ মোচন করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2063)


2063 - عن الأحنف بن قيس قال: دخلت بيت المقدس، فوجدت فيه رجلًا يُكثِر السجود، فوجدت في نفسي من ذلك، فلمَّا انصرف قلت: أتدري على شفع انصرفت أم على وتر؟ قال: إن أك لا أدري، فإنّ الله عز وجل يدري. ثمّ قال: أخبرني حِبِّي أبو القاسم صلى الله عليه وسلم ثمّ بكى ثمّ قال: أخبرني حِبِّي أبو القاسم صلى الله عليه وسلم ثمّ بكى ثمّ قال: أخبرني حِبِّي أبو القاسم صلى الله عليه وسلم أنه قال:"ما من عبد يسجد لله سجدة إلّا رفعه الله بها درجة، وحطّ عنه بها خطيئة، وكتب له بها حسنة".

قال: قلت: أخبرني من أنت يرحمك الله؟

قال: أنا أبو ذرٍّ صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم. فتقاصَرَتْ إِليَّ نَفْسِي.

صحيح: رواه الإمام أحمد (21452) عن عبد الرزاق - وهو في مصنَّفه (3061 - 4847) قال: سمعت الأوزاعي يقول: أخبرني هارون بن رئاب، عن الأحنف بن قيس فذكره. ورواه البزّار (3903) من طريق الأوزاعي به.

وإسناده صحيح. وللحديث أسانيد أخرى رواه الإمام أحمد والطحاوي والبيهقي وغيرهم، غير أن ما ذكرته هو أصحّها.

وفي معناه ما رُوي عن عبادة بن الصامت أنّه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من عبد يسجد لله سجدة إلّا كتب الله له بها حسنة، ومحا عنه بها سيئة، ورفع له بها درجة، فأكثروا من السجود".

رواه ابن ماجه (1434) عن العباس بن عثمان الدمشقي، قال: حدثنا الوليد بن مسلم، عن خالد بن يزيد المُرِّي، عن يونس بن ميسرة بن حلبس، عن الصُّنابحي، عن عبادة بن الصامت فذكره. وإسناده ضعيف لتدليس الوليد بن مسلم؛ فإنّه لم يُصرِّح بالسماع، وإنّه وُصف بتدليس التسوية.




আহনাফ ইবনে কাইস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বাইতুল মাকদিসে (জেরুজালেম) প্রবেশ করলাম। সেখানে একজন লোককে দেখলাম, যিনি অনেক বেশি সেজদা করছিলেন। এতে আমার মনে (আশ্চর্যবোধ) সৃষ্টি হলো। যখন তিনি (সালাত শেষে) ফিরলেন, আমি বললাম: আপনি কি জানেন, আপনি জোড় (শাফা) না বেজোড় (বিতর) এর উপর (সালাত সমাপ্ত করে) ফিরেছেন?

তিনি বললেন: যদি আমি নাও জানি, তবে আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল তা জানেন। এরপর তিনি বললেন: আমার বন্ধু আবুল কাসিম (রাসূলুল্লাহ) (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে জানিয়েছেন। এই বলে তিনি কাঁদলেন। (পুনরায় একই কথা বলে কাঁদলেন)। তিনি বললেন: আমার বন্ধু আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যে কোনো বান্দা আল্লাহ্‌র জন্য একটি সেজদা করে, এর বিনিময়ে আল্লাহ তাকে একটি মর্যাদা উন্নত করে দেন, তার একটি গুনাহ ক্ষমা করে দেন এবং তার জন্য একটি নেকি লিপিবদ্ধ করেন।"

(আহনাফ) বলেন: আমি বললাম, আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন, আপনি কে, আমাকে বলুন। তিনি বললেন: আমি আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গী। (এই পরিচয় শুনে) আমার আত্মবিশ্বাস কমে গেল (অর্থাৎ আমি তাঁকে একজন মহান সাহাবী হিসেবে চিনতে পেরে নিজেকে ছোট মনে করলাম)।









আল-জামি` আল-কামিল (2064)


2064 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُكْثِرُ أن يقول في ركوعه وسجوده:"سبحانك اللهم ربنا وبحمدك، اللهم اغفر لي" يتأوَّلُ القرآن.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4968)، ومسلم في الصلاة (484) كلاهما من طريق جرير، عن منصور، عن أبي الضُّحى، عن مسروق، عن عائشة فذكرت الحديث.

وقوله: يتأول القرآن - فيه إشارة إلى قوله تعالى: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ (1) وَرَأَيْتَ
النَّاسَ يَدْخُلُونَ فِي دِينِ اللَّهِ أَفْوَاجًا (2) فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَاسْتَغْفِرْهُ إِنَّهُ كَانَ تَوَّابًا (3)} [سورة النصر].

ففي صحيح البخاري (4967) من طريق الأعمش، عن أبي الضحى، عن مسروق، عن عائشة قالت: ما صلَّى النبي صلى الله عليه وسلم صلاة بعد أن نزلت عليه: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ} إلا يقول فيها:"سبحانك ربَّنا وبحمدك اللهم اغفر لي".

وفي مسلم: ما رأيتُ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم منذ نزل عليه: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ} يُصَلِّي صلاة إلا دعا، أو قال فيها:"سبحانك ربي وبحمدك اللهم اغفر لي" رواه من طريق الأعمش به، ورواه من طريق داود، عن عامر، عن مسروق، عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُكْثِرُ من قول:"سبحان الله وبحمده، وأستغفرُ الله وأتوبُ إليه" قالت: فقلت: يا رسول الله! أراك تُكْثِرُ من قول"سبحان الله وبحمده أستغفرُ الله وأتوبُ إليه" فقال:"خَبَّرني ربي أني سأَرَى علامةً في أمَّتي، فإذا رأيتُها أكثرتُ من قول: سبحان الله وبحمده أستغفر الله أتوبُ إليه، فقد رأتُيها. {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ} فتحُ مكة {وَرَأَيْتَ النَّاسَ يَدْخُلُونَ فِي دِينِ اللَّهِ أَفْوَاجًا (2) فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَاسْتَغْفِرْهُ إِنَّهُ كَانَ تَوَّابًا (3)}".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর রুকু ও সিজদায় এই দু'আটি বেশি বেশি পড়তেন: "সুবহানাকাল্লাহুম্মা রব্বানা ওয়া বিহামদিকা, আল্লাহুম্মাগফির-লী।" (অর্থ: হে আল্লাহ, আপনি আমাদের প্রতিপালক, আপনার সপ্রশংস পবিত্রতা ঘোষণা করছি। হে আল্লাহ, আমাকে ক্ষমা করে দিন।) তিনি এর দ্বারা কুরআনের নির্দেশনা বাস্তবায়ন করতেন।

হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। এবং তাঁর এই কথা: 'তিনি কুরআনের নির্দেশ বাস্তবায়ন করতেন' দ্বারা আল্লাহ তাআলার এই বাণীটির প্রতি ইশারা করা হয়েছে: "যখন আল্লাহর সাহায্য ও বিজয় আসবে (১) এবং আপনি মানুষকে দলে দলে আল্লাহর দ্বীনে প্রবেশ করতে দেখবেন (২) তখন আপনি আপনার রবের সপ্রশংস পবিত্রতা ঘোষণা করুন এবং তাঁর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করুন। নিশ্চয়ই তিনি ক্ষমা কবুলকারী। (৩)" [সূরা আন-নাসর]।

সহীহ আল-বুখারীর (৪৯৬৭) অন্য বর্ণনায় আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর, "إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ" (যখন আল্লাহর সাহায্য ও বিজয় আসবে) আয়াতটি নাযিল হয়, এরপর তিনি যখনই কোনো সালাত আদায় করতেন, তাতে এই দু'আটি না বলে ছাড়তেন না: "সুবহানাকা রব্বানা ওয়া বিহামদিকা আল্লাহুম্মাগফির-লী।"

সহীহ মুসলিমে আছে: "إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ" নাযিল হওয়ার পর থেকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কোনো সালাত আদায় করতে দেখিনি, যাতে তিনি এই দু'আটি পাঠ করেননি, বা তিনি এই দু'আটি বলেছেন: "সুবহানাকা রব্বি ওয়া বিহামদিকা আল্লাহুম্মাগফির-লী।"

দাউদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সূত্রে আমের (রাহিমাহুল্লাহ) ও মাসরূক (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই কথাটি বেশি বেশি বলতেন: "সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহি, ওয়া আসতাগফিরুল্লাহ ওয়া আতুবু ইলাইহি।" (অর্থ: আমি আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করছি এবং তাঁর প্রশংসা করছি, আর আমি আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাচ্ছি ও তাঁর দিকে প্রত্যাবর্তন করছি।) তিনি (আয়েশা) বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি দেখছি আপনি "সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহি, আসতাগফিরুল্লাহ ওয়া আতুবু ইলাইহি"—এই কথাটি অনেক বেশি বলছেন। তিনি বললেন: "আমার রব আমাকে জানিয়েছেন যে, আমি আমার উম্মতের মধ্যে একটি আলামত দেখতে পাব। যখন আমি তা দেখতে পাব, তখন আমি (এই দু'আটি) বেশি বেশি বলব: 'সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহি, আসতাগফিরুল্লাহ আতুবু ইলাইহি।' আর আমি সেই আলামতটি দেখেছি। (তা হলো) 'إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ' (যখন আল্লাহর সাহায্য ও বিজয় আসবে)। (এখানে 'বিজয়' হলো) মক্কা বিজয়। 'وَرَأَيْتَ النَّاسَ يَدْخُلُونَ فِي دِينِ اللَّهِ أَفْوَاجًا' (এবং আপনি মানুষকে দলে দলে আল্লাহর দ্বীনে প্রবেশ করতে দেখবেন)— 'فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَاسْتَغْفِرْهُ إِنَّهُ كَانَ تَوَّابًا' (তখন আপনি আপনার রবের সপ্রশংস পবিত্রতা ঘোষণা করুন এবং তাঁর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করুন। নিশ্চয়ই তিনি ক্ষমা কবুলকারী।)"









আল-জামি` আল-কামিল (2065)


2065 - عن عائشة قالت: افتقدتُ النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، فظننتُ أنه ذهب إلى بعض نسائه، فتحسَّسْتُ ثم رجعتُ فإذا هو راكع، أو ساجد يقول: سبحانك وبحمدك لا إله إلا أنت".

فقلت: بأبي أنت وأمي! إني لفي شأن، وإنك لفي آخر.

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (485) من طريق عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج قال: قلت

العطاء: كيف تقول أنت في الركوع؟ قال: أَّما سبحانك وبحمدك لا إله إلا أنت. فأخبرني ابن أبي

مليكة، عن عائشة قالت … فذكرتِ الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে খুঁজে পাচ্ছিলাম না। তাই আমি মনে করলাম যে তিনি হয়তো তাঁর অন্য স্ত্রীদের কারো কাছে গিয়েছেন। এরপর আমি হাতড়ে হাতড়ে (তাঁকে খুঁজতে লাগলাম), অতঃপর ফিরে এলাম। হঠাৎ দেখলাম তিনি রুকুতে আছেন অথবা সিজদায় আছেন এবং বলছেন: “সুবহানাকা ওয়া বিহামদিকা লা ইলাহা ইল্লা আন্তা।” তখন আমি বললাম: আমার মা-বাবা আপনার জন্য কুরবান হোক! আমি এক চিন্তায় মগ্ন ছিলাম আর আপনি অন্য কাজে (ইবাদতে) মগ্ন ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2066)


2066 - عن عائشة قالت: فقدتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة من الفراش. فالتمسته فوقعت يدي على بطن قدميه، وهو في المسجد، وهما منصوبتان وهو يقول: اللهم أعوذ برضاك من سَخَطِك، وبمعافاتِك من عقوبتِك، وأعوذ بك منك لا أحصي ثناءً عليك أنت كما أثنيت على نفسك".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (486) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا أبو أسامة، حدثني عبيد الله بن عمر، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن الأعرج، عن أبي هريرة، عن عائشة … فذكرت الحديث.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে আমি বিছানায় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খুঁজে পেলাম না। তখন আমি তাঁকে খুঁজতে লাগলাম। খুঁজতে গিয়ে আমার হাত তাঁর দুই পায়ের পাতার নিচের অংশে পড়ল। তিনি তখন মাসজিদে (নামাযে) ছিলেন এবং তাঁর দুই পা খাড়া (নصب করা) ছিল। তিনি তখন বলছিলেন: "হে আল্লাহ! আমি আপনার সন্তুষ্টির মাধ্যমে আপনার ক্রোধ থেকে আশ্রয় চাই, আপনার ক্ষমা ও নিরাপত্তার মাধ্যমে আপনার শাস্তি থেকে আশ্রয় চাই। আমি আপনার কাছে আপনার (ক্ষমা ও করুণার) মাধ্যমে আশ্রয় চাই। আপনার প্রশংসা আমি গুনে শেষ করতে পারব না; আপনি তেমনই, যেমন আপনি নিজে নিজের প্রশংসা করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2067)


2067 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول في ركوعه وسجوده"وسُبُّوحٌ قُدُّوس ربُّ الملائكة والروح".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (478) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا محمد بن بِشْر العبدي،
حَدَّثَنَا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن مطرف بن عبد الله بن الشخير، أن عائشة نَبَّأته … فذكرتِ الحديث.

ومعنى سُبُّوح: المبرأ من النقائص والشريك، وكل ما لا يليق بالإلهية.

ومعنى قُدُوس: المطهَّرِ من كل ما لا يليق بالخالق.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর রুকু ও সিজদায় বলতেন: "সুব্বূহুন ক্বুদ্দূস, রাব্বুল মালাইকাতি ওয়ার রূহ।" (অর্থ: আপনি অতি পবিত্র ও পুতঃপবিত্র, ফেরেশতাকুল এবং রূহ্-এর (জিবরাইল অথবা আত্মার) রব)।