হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2088)


2088 - عن عبد الله بن مسعود، قال: علَّمني رسول الله صلى الله عليه وسلم التّشهد في وسط الصّلاة
وفي آخرها. فكنّا نحفظ عن عبد الله حين أخبرنا أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم علَّمه إيَّاه قال: فكان يقول: إذا جلس في وسط الصّلاة وفي آخرها على وركهـ اليُسرى:"التّحيّات لله، والصَّلوات والطّيّبات، السّلام عليك أيُّها النَّبِيّ ورحمة الله وبركاته، السّلام علينا وعلى عباد الله الصّالحين، أشهد أن لا إله إِلَّا الله، وأشهد أنَّ محمدًا عبدُه ورسوله". قال: ثمّ إن كان في وسط الصّلاة. نهض حتَّى يفرُغ من تشهده، وإن كان في آخرها دعا بعد تشهده بما شاء الله أن يدعو، ثمّ يسلِّم.

حسن: رواه الإمام أحمد (4382) عن يعقوب، قال: حَدَّثَنِي أبيّ، عن ابن إسحاق، قال: حَدِّثْنِي عن تشهّد رسول الله صلى الله عليه وسلم وفي آخرها عبد الرحمن بن الأسود بن يزيد النَّخعيّ، عن أبيه، عن عبد الله، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنَّه مدلِّس، إذا صرَّح بالتحديث يكون حسن الحديث.

وقد صحَّحه ابن خزيمة (702) ورواه من طريق محمد بن إسحاق بإسناده إِلَّا أنه لم يذكر قوله:"في وسط الصّلاة".

وبهذا أخذ مالك رحمه الله تعالى فقال:"يجلسُ متورِّكًا على كل حال، أي في وسط الصّلاة وآخرها. والجلوس بين السجدتين مثل الجلوس في التّشهّد، وقد جاء تفسير الوسط كما سيأتي بقوله:"إذا قعدتم في كلّ ركعتين". وحقيقة التورك: أن ينصب رجله اليُمنى ويجعل باطن رجله اليُسرى تحت فخذه اليُمنى، ويجعل أليتيه على الأرض، قاله الخرقيّ، انظر: المغني (1/ 225).

وأمّا الحنفيَّة فسوّوا بين التشهدين فقالوا: يجلس على رجله اليُسرى وينصب اليُمنى.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে মধ্যবর্তী সালাতে এবং শেষ সালাতে তাশাহহুদ (আত্তাহিয়্যাতু) শিক্ষা দিয়েছেন। তিনি (আব্দুল্লাহ) বলেন: যখন তিনি (সালাতে) মধ্যবর্তী বা শেষ বৈঠকে বাম নিতম্বের উপর বসতেন, তখন বলতেন:

"আত্তাহিয়্যাতু লিল্লাহি ওয়াস-সালাওয়াতু ওয়াত-ত্বাইয়্যিবাতু। আস-সালামু আলাইকা আইয়্যুহান-নাবিয়্যু ওয়ারাহমাতুল্লাহি ওয়াবারাকাতুহু। আস-সালামু আলাইনা ওয়া আলা ইবাদিল্লাহিস-সালিহীন। আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, ওয়া আশহাদু আন্না মুহাম্মাদান আবদুহু ওয়া রাসূলুহু।"

তিনি (ইবনু মাসউদ) বলেন: এরপর যদি তা মধ্যবর্তী সালাতে (তাশাহহুদ) হতো, তাহলে তিনি তার তাশাহহুদ সমাপ্ত করেই দাঁড়িয়ে যেতেন। আর যদি তা শেষ সালাতে হতো, তবে তাশাহহুদের পরে তিনি আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী যা ইচ্ছা দোয়া করতেন এবং এরপর সালাম ফিরাতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2089)


2089 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يستفتح الصّلاة إلى أن ذكرت: وكان يقول في كل ركعتين التحية، وكان يفرِش رجله اليُسرى، وينصب رجله اليُمنى، وكان ينهى عن عقبة الشّيطان.

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (498) في سياق صفة صلاة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من طريق حسين المعلم، عن بديل بن ميسرة، عن أبي الجوزاء، عن عائشة، فذكرت مثله.

وقد تكلم بعض أهل العلم فقالوا: إن أبا الجوزاء لم يدرك عائشة، والصحيح أنه أدركها.

قولها:"في كل ركعتين التحية" فيه مستدل لمن أوجب التّشهد الأوّل، ورواه أبو يعلى (4356 تحقيق الأثري) من طريق عبد السّلام بن حرب، عن بديل به ولفظه:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان لا يزيد في الركعتين على التشهد" وفيه حجة لمن يقول: لا يُصلَّى على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في التّشهد الأوّل. وهم الجمهور خلافًا للشافعيّ، انظر للمزيد: باب الصّلاة على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.
وقولها: كان يفرش رجله اليُسرى وينصب رجله اليُمنى: أي في التّشهد الأوّل لم يكن يتورك بخلاف التّشهد الثانيّ، فإنه كان يتورك فيه، وبهذا تجتمع الأحاديث، ومن حمله على التّشهد الثاني فقد اضطر إلى تأويل حديث أبي حُميد وغيره. ومن المحتمل أيضًا أن يترك التورك أحيانًا لبيان بأنه من السنة وليس بواجب، ومعنى عقبة الشّيطان تقدّم في باب الإقعاء المكروه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক দুই রাকাআতে তাশাহহুদ পড়তেন। তিনি তাঁর বাম পা বিছিয়ে দিতেন এবং ডান পা খাড়া করে রাখতেন। আর তিনি শয়তানের বসার মতো করে (বসতে) নিষেধ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2090)


2090 - عن رفاعة بن رافع عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فذكر حديث المُسِيء صلاته وقال فيه: فإذا جلست في وسط الصّلاة فاطمئن، وافترش فخذك اليُسرى، ثمّ تشهَّدْ، ثمّ إذا قمتَ فمثل ذلك حتَّى تفرغ من صلاتك".

حسن: رواه أبو داود (860) حَدَّثَنَا مؤمّل بن هشام، ثنا إسماعيل، عن محمد بن إسحاق، حدثني عليّ بن يحيى بن خلَّاد بن رافع، عن أبيه، عن عمه رفاعة بن رافع فذكره. ومحمد بن إسحاق مدلِّس، ولكنه صرَّح بالتحديث.




রفاعা ইবনে রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে সেই ব্যক্তির সালাত সংক্রান্ত হাদীসটি উল্লেখ করেছেন, যে তার সালাত সঠিকভাবে আদায় করেনি। তাতে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি সালাতের মাঝখানে বসবে, তখন শান্ত ও স্থিরভাবে অবস্থান করো, তোমার বাম উরু বিছিয়ে দাও (অর্থাৎ তার উপর বসো), এরপর তাশাহ্হুদ পাঠ করো। তারপর যখন তুমি দাঁড়াবে, তখন সেরূপেই (শান্ত ও স্থিরভাবে) করো, যতক্ষণ না তুমি তোমার সালাত শেষ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2091)


2091 - عن عبد الله بن مسعود قال: كنَّا لا ندري ما نقول في كل ركعتين، غير أن نُسَبِّح ونكبِّر ونحمد ربنا، وأن محمدًا صلى الله عليه وسلم علَّم فواتح الخير وخواتمه، فقال:"إذا قعدتم في كل ركعتين فقولوا: التحيات لله، والصلوات، والطيبات، السّلام عليك أيها النَّبِيّ ورحمة الله وبركاته، السّلام علينا وعلى عباد الله الصالحين، أشهد أن لا إله إِلَّا الله، وأشهد أن محمدًا عبده ورسولُه"، ولْيَتخير أحدكم من الدعاء أعجبَه إليه، فليدعُ الله عز وجل.

صحيح: رواه النسائيّ (1163) قال: أخبرنا محمد بن المثنى، قال: حَدَّثَنَا محمد قال: حَدَّثَنَا شعبةُ قال: سمعت أبا إسحاق يحدث، عن أبي الأحوص، عن عبد الله فذكره.

وإسناده صحيح، ومحمد هو: ابن جعفر، وعنه رواه أحمد في مسنده (4160).

وأبو الأحوص هو: عوف بن مالك بن نضلة الجشمي من رجال مسلم.

وصحه ابن خزيمة (720) فرواه من طريق محمد بن جعفر به مثله.

كما صحَّحه أيضًا ابن حبان (1951) فرواه من وجه آخر عن شعبة به مثله.

ورواه أيضًا النسائيّ (1162)، والتِّرمذيّ (289) كلاهما عن يعقوب بن إبراهيم الدورقيّ، حَدَّثَنَا عبيد الله الأشجعيّ، عن سفيان الثوريّ، عن أبي إسحاق، عن الأسود بن يزيد، عن عبد الله بن مسعود قال: علَّمنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: إذا قعدنا في الركعتين أن نقول: فذكر التّشهد مثله.

قلت: رجاله ثقات غير أبي إسحاق فإنه مدلِّس وقد عنعن، وأكد بعض أهل العلم من عدم سماعه من الأسود بن يزيد.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা জানতাম না যে, প্রতি দুই রাকআতে আমরা কী বলবো। শুধু এইটুকু জানতাম যে, আমরা তাসবীহ পড়বো, তাকবীর বলবো এবং আমাদের রবের প্রশংসা করবো। আর নিশ্চয়ই মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কল্যাণ ও মঙ্গলের শুরু ও শেষ উভয়ই শিক্ষা দিয়েছেন। এরপর তিনি বললেন: "যখন তোমরা প্রতি দুই রাকআতে বসবে, তখন তোমরা বলবে: 'আত্তাহিয়্যাতু লিল্লা-হি, ওয়াস সালা-ওয়া-তু ওয়াত্ ত্বাইয়িবা-তু। আসসালা-মু আলাইকা আইয়্যুহান্ নাবিইয়্যু ওয়া রাহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকা-তুহূ। আসসালা-মু আলাইনা- ওয়া আলা- ইবা-দিল্লা-হিস স-লিহী-ন। আশহাদু আল্লা- ইলা-হা ইল্লাল্লা-হু, ওয়া আশহাদু আন্না মুহাম্মাদান আবদুহূ ওয়া রাসুলুহূ'।" এরপর তোমাদের প্রত্যেকেই দু'আর মধ্য থেকে তার কাছে যা পছন্দনীয়, তা বেছে নেবে এবং আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কাছে দু'আ করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (2092)


2092 - عن عبد الله بن بُحينة - وهو من أزدِ شنوءةَ - وهو حليف لبني عبد مناف، وكان من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: أن النَّبِيّ صلى بهم الظهرَ، فقام في الركعتين الأَوّلَيين لم يجلس، فقام الناس معه، حتَّى إذا قضى الصّلاة وانتظر الناسُ تسليمَه كبَّر وهو جالس، فسجد سجدتين قبل أن يُسَلِّمَ، ثمّ سَلَّم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (829) ومسلم في المساجد (570) كلاهما من حديث ابن شهاب، قال: حَدَّثَنِي عبد الرحمن بن هرمز الأعرج، مولى بني عبد المطلب، قال مرة: مولى ربيعة بن الحارث، عن عبد الله بن بُحينة الأسديّ، فذكر الحديث. واللّفظ للبخاريّ وبوَّب بقوله:"من لم ير التّشهد الأوّل واجبًا، لأن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قام من الركعتين ولم يرجع".

وبوَّب النسائيّ بقوله:"باب ترك التّشهد الأوّل" (1177) وفيه: فسبَّحوا فمضى، فلمّا فرغ من صلاته سجد سجدتين ثمّ سلَّم.




আব্দুল্লাহ ইবনু বুহাইনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবীগণকে নিয়ে যোহরের সালাত আদায় করলেন। তিনি প্রথম দুই রাকাআত শেষে (তাশাহহুদের জন্য) না বসে দাঁড়িয়ে গেলেন। লোকেরাও তাঁর সাথে দাঁড়িয়ে গেল। এমনকি যখন তিনি সালাত শেষ করলেন এবং লোকেরা তাঁর সালামের জন্য অপেক্ষা করছিল, তখন তিনি বসা অবস্থায় তাকবীর বললেন, অতঃপর সালাম ফিরানোর আগে দুটি সিজদা করলেন, তারপর সালাম ফিরালেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2093)


2093 - عن وعن عبد الله بن الزُّبير قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قعد في الصّلاة جعل قدَمه اليُسرى بين فخذه وساقه، وفرش قدمه اليُمنى، ووضع يده اليُسرى على ركبته اليُسرى، ووضع يده اليُمنى على فخذه اليُمنى، وأشار بإصبعِه.

وفي رواية: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قعد يدعو وضع يده اليُمنى على فخذه اليُمنى، ويده اليُسرى على فخذه اليُسرى، وأشار بإصبعه السَّبابة، ووضع إبهامَه على إصبعه الوُسْطى، ويُلقِمُ كفَّه اليُسرى ركبته.

صحيح: أخرجه مسلم في المساجد (579) الرواية الأوّلى من طريق عثمان بن حكيم، حَدَّثَنِي عامر بن عبد الله بن الزُّبير، عن أبيه فذكر مثله.

والرّواية الثانية من طريق اللّيث، وأبي خالد الأحمر، كلاهما عن ابن عجلان، عن عامر بن عبد الله بن الزُّبير، عن أبيه فذكر مثله.

ورواه أبو داود (989)، والنسائي (1270)، والبيهقي (2/ 131) من طريق زياد بن سعد الخراسانيّ، عن محمد بن عجلان.

وزاد فيه:"وكان يشير بأصبعه إذا دعا، ولا يُحرِّكها".

وزياد بن سعد الخراساني ثقة من رجال الجماعة.

قال النّوويّ في"المجموع" (3/ 454):"إسناده صحيح".
وإسناده حسن فإنَّ محمد بن عجلان صدوق، ثمّ قوله:"لا يحرِّكها هو تفسير تقوله:"يشير بها". ولذا لا منافاة بين اللَّفظين.




আব্দুল্লাহ ইবন আয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাতের বৈঠকে বসতেন, তখন তিনি তাঁর বাম পা-কে তাঁর উরু ও নলার মাঝখানে রাখতেন, তাঁর ডান পা খাড়া করে রাখতেন, তাঁর বাম হাত বাম হাঁটুর ওপর রাখতেন, তাঁর ডান হাত ডান উরুর ওপর রাখতেন এবং তাঁর আঙ্গুল দ্বারা ইশারা করতেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (তাশাহহুদের জন্য) বসতেন ও দোয়া করতেন, তখন তিনি তাঁর ডান হাত ডান উরুর ওপর এবং তাঁর বাম হাত বাম উরুর ওপর রাখতেন। তিনি শাহাদাত আঙ্গুল দ্বারা ইশারা করতেন, তাঁর বৃদ্ধাঙ্গুলি মধ্যমা আঙ্গুলের ওপর রাখতেন এবং তাঁর বাম হাতের তালু দিয়ে বাম হাঁটু আঁকড়ে ধরতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2094)


2094 - عن ابن عمر أنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم إذا قعد في التّشهُّد وضع يده اليُسرى على ركبته اليُسرى، ووضع يده اليُمنى على ركبته اليُمنى، وعقد ثلاثة وخمسين، وأشار بالسبابة.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (580) من طريق حمَّاد بن سلمة، عن أيُّوب، عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله.

وقوله:"عقد ثلاثة وخمسين، فسّروا هذا العقد بأن يعقد الخنصر والبنصر والوسطى، ويرسل الإبهام إلى أصل المسبحة، وفي"التلخيص" (1/ 262): وصورتها أن يجعل الإبهام معترضة تحت المسبحة".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাশাহহুদে বসতেন, তখন তাঁর বাম হাত বাম হাঁটুর উপর রাখতেন, এবং তাঁর ডান হাত ডান হাঁটুর উপর রাখতেন, আর তিপ্পান্ন (৫৩)-এর গাঁট বাঁধতেন এবং শাহাদাত আঙুল দিয়ে ইশারা করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2095)


2095 - عن ابن عمر:"أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان إذا جلس في الصّلاة وضع يديه على رُكبتيه، ورفع إصبعه اليُمنى التي تلي الإبهام فدعا بها، ويده اليُسرى على ركبته اليُسرى، باسطها عليها".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (580) من طرق عن عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

قال الترمذيّ بعد أن أخرج الحديث وحسَّنه:"والعمل عليه عند بعض أهل العلم من أصحاب

النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم والتابعين، يختارون الإشارة في التّشهد، وهو قول أصحابنا" يعني أهل الحديث.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন সালাতে বসতেন, তখন তিনি তাঁর উভয় হাত তাঁর উভয় হাঁটুর উপর রাখতেন, আর তাঁর ডান হাতের বৃদ্ধাঙ্গুলির পাশের শাহাদাত আঙ্গুলটি উপরে উঠিয়ে তার দ্বারা দু‘আ করতেন, এবং তাঁর বাম হাত বাম হাঁটুর উপরে সম্প্রসারিত অবস্থায় রাখতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2096)


2096 - عن عليّ بن عبد الرحمن المُعاوِيِّ أنه قال: رآني عبد الله بن عمر، وأنا أعبث بالحصباء في الصّلاة، فلمّا انصرفتُ نهاني وقال: اصنع كما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع، فقلتُ: وكيف كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنعُ؟ قال: كان إذا جلس في الصّلاة وضع كفَّه اليُمنى على فخذه اليُمنى، وقبض أصابعه كلَّها، وأشار بإصبعه التي تلي الإبهام، ووضع كفَّه اليُسْرى على فخذه اليُسرى، وقال: هكذا كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعل.

صحيح: رواه مالك في الصّلاة (48) عن مسلم بن أبي مريم، عن عليّ بن عبد الرحمن المعاوِي به مثله، ورواه مسلم في المساجد (580/ 116) عن يحيى بن يحيى قال: قرأت على مالك به مثله.




আলী ইবনে আবদুর রহমান আল-মু'আউয়ী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে দেখলেন, যখন আমি সালাতের মধ্যে কঙ্কর (ছোট পাথর) নাড়াচাড়া করছিলাম। যখন আমি সালাত শেষ করলাম, তিনি আমাকে নিষেধ করলেন এবং বললেন: তুমি তেমনই করো যেমন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করতেন। আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কীভাবে করতেন? তিনি (আবদুল্লাহ ইবনে উমর) বললেন: তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাতে বসতেন, তখন তাঁর ডান হাতের তালু ডান উরুর উপর রাখতেন, তাঁর সমস্ত আঙ্গুলকে গুটিয়ে নিতেন এবং বৃদ্ধাঙ্গুলির নিকটবর্তী আঙ্গুলটি দ্বারা ইশারা করতেন। আর তাঁর বাম হাতের তালু বাম উরুর উপর রাখতেন। এবং তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এভাবেই করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2097)


2097 - عن نافع قال: كان عبد الله بن عمر إذا جلس في الصّلاة وضع يديه على ركبتيه، وأشار بإصبعه، وأتبعها بصرَه ثمّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لهي أشدُّ على الشّيطان من الحديد، يعني السَّبابة.

حسن: رواه الإمام أحمد (600) والبزّار - كشف الأستار (563) كلاهما من طريق محمد بن
عبد الله أبي أحمد الزُّبيريّ، حَدَّثَنَا كثير بن زيد، عن نافع، فذكر مثله.

وكثير بن زيد هو: الأسلمي ثمّ السهمي مولاهم أبو محمد المدنيّ، مختلف فيه، تكلم فيه النسائيّ، وأمّا ابن معين فاختلف عليه أصحابه. فقال عبد الله بن الدورقي عنه: ليس به بأس، وقال معاوية بن صالح وغيره عنه: صالح، وقال ابن أبي خيثمة عنه: ليس بذاك. ووثَّقه ابن عمار الموصليّ، ومشَّاه أبو زرعة وأحمد وابن عدي وغيرهم. فمثله يحسن حديثه وخاصة في الشواهد، ولذا لم يتكلم عليه البيهقيّ (2/ 132) بشيء، وإنما تكلم على محمد بن عمر الواقدي الذي رُوي عن كثير بن زيد بلفظ:"تحريك الإصبع في الصّلاة مذعرة للشيطان" ومن هذا الوجه رواه أيضًا الرّوياني في مسنده (1439) وابن عدي في"الكامل" (6/ 4247).

قال البيهقيّ: تفرّد به محمد بن عمر الواقدي وئيس بالقوي. وقال: روينا عن مجاهد أنه قال: تحريك الرّجل إصبعه في الجلوس في الصّلاة مقمعة للشيطان" انتهى.




নাফে' থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন সালাতে (তাশাহহুদে) বসতেন, তখন তিনি তাঁর হাত দুটো তাঁর হাঁটুর উপর রাখতেন, আর তাঁর (শাহাদাত) আঙ্গুল দ্বারা ইশারা করতেন, এবং সেটির দিকে দৃষ্টি নিবদ্ধ রাখতেন। অতঃপর তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই তা শয়তানের জন্য লোহার চেয়েও কঠিন।" (তিনি শাহাদাত আঙ্গুলকে উদ্দেশ্য করলেন।)









আল-জামি` আল-কামিল (2098)


2098 - عن عباس بن سهل الساعديّ، قال: اجتمع أبو حميد، وأبو أَسيد، وسهل بن سعد، ومحمد بن مسلمة، فذكروا صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال أبو حميد: أنا أعلمكم بصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر صفة صلاة رسول الله، وقال فيه: فافترش رجله اليُسرى، وأقبل بصدر اليُمنى على قبلته، ووضع كفَّه اليُمنى على ركبته اليُمنى، وكفَّه اليُسرى على ركبته اليُسرى، وأشار بإصبعه - يعني السبَّابة.

حسن: رواه أبو داود (734) والتِّرمذيّ (293) كلاهما من طريق أبي عامر العقدي - هو عبد الملك بن عمرو، قال: أخبرني فُلَيح بن سليمان المدنيّ، حَدَّثَنَا عبَّاس بن سهل. فذكره.

قال الترمذيّ: حسن صحيح.

وصحَّحه ابن خزيمة (689) وابن حبَّان (1871) وروياه عن أبي عامر العقديّ، به مثله.

قلت: في الإسناد فليح بن سليمان بن أبي المغيرة الخزاعيّ، من رجال الجماعة، إِلَّا أنَّه مختلف فيه؛ فقال ابن معين، وأبو حاتم: ليس بالقوي. وقال النائي: ضعيف. ولكن قال الدَّارقطنيّ: مختلف فيه، ولا بأس به. وقال ابن عدي: له أحاديث صالحة مستقيمة، وغرائب، وهو عندي لا بأس به. وذكره ابن حبان في الثّقات. فمثله يقوي حديثه عند المتابعة، ومن متابعته القاصرة ما رواه عبد الرزّاق (3046) عن إبراهيم بن محمد، عن ابن حلحلة. وهو محمد بن عمرو بن حلحلة الديليّ، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن أبي حميد الساعديّ، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا جلس في الصّلاة في الركعتين الأوّليين نصب قدمه اليُمنى، وافترش اليُسرى، وأشار بإصبعه التي تلي الإبهام .. فذكر الحديث.

وأصل حديث أبي حميد في صحيح البخاريّ، انظر تخريجه بالتفصيل في بابِ رفعِ اليدين عند الركوع، وعند رفعِ الرأسِ منه.




আবূ হুমাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (আব্বাস ইবনু সাহল বলেন,) আবূ হুমাইদ, আবূ উসাইদ, সাহল ইবনু সা’দ এবং মুহাম্মাদ ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একত্রিত হলেন। তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত (নামাজ) সম্পর্কে আলোচনা করলেন। তখন আবূ হুমাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত সম্পর্কে অধিক অবগত। এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের বর্ণনা দিলেন। তিনি তার বর্ণনায় বললেন: তিনি তাঁর বাম পা বিছিয়ে দিতেন এবং ডান পায়ের সম্মুখভাগ কিবলার দিকে মুখ করে রাখতেন। আর তাঁর ডান হাতের তালু ডান হাঁটুর উপর এবং বাম হাতের তালু বাম হাঁটুর উপর রাখতেন এবং তিনি তাঁর আঙ্গুল দ্বারা ইশারা করতেন—অর্থাৎ শাহাদাত আঙ্গুল (তর্জনী) দ্বারা।









আল-জামি` আল-কামিল (2099)


2099 - عن وائل بن حجر أنه ذكر صفة صلاة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وجاء فيه: ثمّ جلس فافترش رجله اليُسرى، ووضع يده اليُسرى على فخذه اليُسرى، وحدَّ مرفقه الأيمن على فخذه اليُمنى، وقبض اثنتين، وحلَّق حلْقَةً، ورأيته يقول: هكذا. وحلَّق بشر الإبهام والوسطى، وأشار بالسبابة.

حسن: رواه أبو داود (726) واللّفظ له، والنسائي (1267) وابن ماجة (867) كلّهم من طريق بشر بن المفضل، عن عاصم بن كُلَيب، عن أبيه، عن وائل بن حجر .. فذكر الحديث.

وإسناده حسن؛ لأجل عاصم بن كليب؛ فإنَّه"صدوق". وقال النوويّ في"المجموع" (3/ 312): رواه أبو داود بإسناد صحيح.

ورواه البيهقيّ (3/ 131) من طريق خالد بن عبد الله، ثنا عاصم بن كليب، عن أبيه، عن وائل، بلفظ:"ثمّ عقد الخنصر والبنصر، ثمّ حلق الوسطى بالإبهام، وأشار بالسَّبابة".

فبشر بن المفضل، وخالد بن عبد الله - وهو الواسطيّ - ومن تابعهما - كما سيأتي رووه عن عاصم بن كليب فقالوا:"وأشار بالسبابة".

وانفرد زائدة بن قدامة فرواه عن عاصم بن كليب بإسناده ومعناه، وقال فيه:"ثمّ وضع يده اليُمنى على ظهر كفه اليُسرى، والرسغ والساعد"، وقال فيه:"ثمّ جئت بعد ذلك في زمان فيه برد شديد، فرأيت الناس عليهم الثياب تحرك أيديهم تحت الثياب" كما عند أبي داود وغيره.

وفي رواية:"فرأيته يُحرِّكها يدعو بها".

رواه أبو داود، والنسائي (889) وابن الجارود (208) والإمام أحمد (18870) وابن خزيمة (714) وابن حبان (1860) والبيهقي (2/ 27، 28) كلّهم من طرق عن زائدة بن قدامة، عن عاصم بن كليب، بإسناده.

وقد روي هذا الحديث عن عاصم أكثر من عشرة، وهم: عبد الواحد بن زياد، وشعبة، وسفيان الثوريّ، وزهير بن معاوية، وسفيان بن عيينة، وسلام بن سليم، وأبو الأحوص، وبشر بن المفضل، وعبد الله بن إدريس، وقيس بن الربيع، وأبو عوانة، وخالد بن عبد الله الواسطيّ، فلم يذكروا في حديثهم"فرأيته يحركها يدعو بهاء؛ ولذا حكم بعض أهل العلم على هذه الزيادة بأنَّها شاذَّة.

قال ابن خزيمة:"ليس في شيء من الأخبار"يحركها" إِلَّا في هذا الخبر … زائدة ذكره".

وعلى صحة ثبوتها - لأنَّ زائدة بن قُدامة الثقفيّ، أحد الثّقات المشهورين بالتثبت، حتَّى قال الإمام أحمد: المتثبِّون في الحديث أربعةٌ .. وذكر منهم زائدة - فيحمل قوله:"فرأيته يحركها يدعو بها على ما قاله البيهقيّ رحمه الله تعالى (2/ 132):"فيحتمل أن يكون المراد بالتحريك الإشارة بها، لا تكرير تحريكها، فيكون موافقًا لرواية ابن الزُّبير". والله أعلم.

قلت: وفي الباب عن نمير الخزاعيّ قال:"رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم واضعًا يده اليُمنى على فخذه
اليُمنى في الصّلاة، ويشيرُ بأصبعه".

رواه النسائيّ (1271)، وأبو داود (991)، وابن ماجة (911)، وابن خزيمة (715)، وابن حبان (1946) كلّهم من طريق عصام بن قدامة، عن مالك بن نمير الخزاعيّ، عن أبيه، فذكره.

ومالك بن نمير لا يُعرف كما قال الذّهبيّ، وفي التقريب:"مقبول" أي إذا توبع، وإلَّا فليّن الحديث. وهو لا بأس به في الاستشهاد.

أما الإشارة بالسبابة فلا خلاف بين أهل العلم كما قال ابن عبد البر وغيره، وما قاله بعض الحنفية في كتبهم بأن الإشارة بالسبابة في التّشهد مكروهة، فقد خالفوا الإمام أبا حنيفة نفسه، إذ نقل محمد بن الحسن في موطئه عن الإمام بعد أن روي حديث مالك عن مسلم بن أبي مريم قال:

"وبصنيع رسول الله صلى الله عليه وسلم نأخذ، وهو قول أبي حنيفة" انتهى.

قال العلامة عبد الحي اللكنوي:"إنَّ أصحابنا الثلاثة اتفقوا على تجويز الإشارة لثبوتها عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه بروايات متعددة، وطرق متكثرة لا سبيل إلى إنكارها ولا إلى ردِّها"، ووجه نقدًا شديدًا إلى أصحاب الفتاوى كصاحب"الخلاصة" و"البزازية الكبرى" و"العتابية" و"الغياثية" و"الولوجية" و"عمدة المفتي" و"الظهيرية" وغيرها حيث أنهم ذكروا أن المختار هو عدم الإشارة، بل ذكر بعضهم أنها مكروهة. انتهى."التعليق الممجد على موطأ محمد" (1/ 464).

ثمّ إنَّ من السنَّة أن يستمرَّ في الإشارة بالسبَّابة، من بداية التّشهُّد إلى نهاية السّلام، ولا دليل لمن يقول بأنَّ الإشارةَ تكون عند كلمة الشهادة فقط، وهي قوله:"أشهد أن لا إله إِلَّا الله، وأشهد أنَّ محمَّدًا رسول الله".




ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের বিবরণ দিয়েছেন। তাতে উল্লেখ আছে: তারপর তিনি বসলেন এবং বাম পা বিছিয়ে দিলেন, এবং বাম হাত বাম উরুর উপর রাখলেন, আর ডান কনুইকে তার ডান উরুর উপর প্রসারিত করলেন/পৃথক রাখলেন, এবং তিনি (দুটি আঙুল) গুটিয়ে নিলেন, আর একটি বৃত্তাকার করলেন, আর আমি তাকে বলতে দেখলাম: এভাবে। আর বিশর বৃদ্ধাঙ্গুলি ও মধ্যমা দিয়ে বৃত্ত তৈরি করলেন, আর শাহাদাত (তর্জনী) আঙুল দিয়ে ইশারা করলেন।

হাসান: এটি আবু দাঊদ (৭২৬), আর শব্দাবলী তারই, নাসাঈ (১২৬৭) ও ইবনু মাজাহ (৮৬৭) সকলে বিশর ইবনুল মুফাদ্দাল সূত্রে, আ-সিম ইবনু কুলাইব, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি ওয়াইল ইবনু হুজর থেকে... হাদিসটি বর্ণনা করেছেন। এর সনদ হাসান। কারণ আ-সিম ইবনু কুলাইব 'সাদুক' (সত্যবাদী)। ইমাম নববী তাঁর "আল-মাজমু" (৩/৩১২)-এ বলেন: আবু দাঊদ সহীহ সনদে এটি বর্ণনা করেছেন।

বায়হাকী (৩/১৩১) খালিদ ইবনু আব্দুল্লাহ সূত্রে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন, আমাদের কাছে আ-সিম ইবনু কুলাইব, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি ওয়াইল থেকে এই শব্দে বর্ণনা করেন: "তারপর কনিষ্ঠা ও অনামিকা গুটিয়ে নিলেন, তারপর বৃদ্ধাঙ্গুলি ও মধ্যমা দিয়ে বৃত্ত তৈরি করলেন এবং শাহাদাত (তর্জনী) আঙুল দিয়ে ইশারা করলেন।"

সুতরাং বিশর ইবনুল মুফাদ্দাল, খালিদ ইবনু আব্দুল্লাহ – তিনি হলেন ওয়াসিতী – এবং যারা তাদের অনুসরণ করেছেন, যেমনটি পরে আসবে, তারা আ-সিম ইবনু কুলাইব থেকে বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: "আর শাহাদাত আঙুল দিয়ে ইশারা করলেন।"

তবে যায়েদা ইবনু কুদামাহ এককভাবে আ-সিম ইবনু কুলাইব থেকে তার সনদ ও অর্থসহ বর্ণনা করে বলেন: "তারপর তিনি তার ডান হাত বাম হাতের পিঠ, কবজি ও বাহুর উপর রাখলেন," এবং তিনি তাতে বলেন: "তারপর আমি এরপরে তীব্র শীতের সময়ে এলাম। আমি দেখলাম লোকজন তাদের পোশাকের নিচে হাত নাড়াচ্ছে।" যেমনটি আবু দাঊদ ও অন্যান্যদের কাছে রয়েছে।

অপর এক বর্ণনায়: "আমি তাকে সেটি নাড়াতে দেখলাম, যার মাধ্যমে তিনি দু'আ করছিলেন।"

এটি আবু দাঊদ, নাসাঈ (৮৮৯), ইবনু জারুদ (২০৮), ইমাম আহমাদ (১৮৮৭০), ইবনু খুযাইমাহ (৭১৪), ইবনু হিব্বান (১৮৬০) এবং বায়হাকী (২/২৭, ২৮) বর্ণনা করেছেন। সকলে যায়েদা ইবনু কুদামাহ সূত্রে, আ-সিম ইবনু কুলাইব থেকে তার সনদসহ বর্ণনা করেছেন।

এই হাদীসটি আ-সিম থেকে দশজনেরও অধিক রাবী বর্ণনা করেছেন। তারা হলেন: আব্দুল ওয়াহিদ ইবনু যিয়াদ, শু'বাহ, সুফিয়ান সাওরী, যুহায়র ইবনু মু'আবিয়াহ, সুফিয়ান ইবনু উয়ায়নাহ, সালাম ইবনু সুলাইম, আবু আল-আহওয়াস, বিশর ইবনুল মুফাদ্দাল, আব্দুল্লাহ ইবনু ইদ্রীস, কাইস ইবনু রাবী', আবু 'আওয়ানাহ এবং খালিদ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-ওয়াসিতী। তারা তাদের হাদিসে "আমি তাকে সেটি নাড়াতে দেখলাম, যার মাধ্যমে তিনি দু'আ করছিলেন" কথাটি উল্লেখ করেননি। এ কারণেই কিছু বিশেষজ্ঞ এই অতিরিক্ত অংশটিকে 'শায' (বিরল) বলে মত দিয়েছেন।

ইবনু খুযাইমাহ বলেন: "নাড়াতে দেখলাম" কথাটি এই একটি বর্ণনা ছাড়া আর কোনো খবরে নেই... এটি যায়েদা বর্ণনা করেছেন।"

আর যদি এর বিশুদ্ধতা প্রমাণিত হয় (কারণ যায়েদা ইবনু কুদামাহ আস-সাকাফী নির্ভরযোগ্যদের মধ্যে অন্যতম এবং সুদৃঢ় স্মৃতিশক্তির জন্য প্রসিদ্ধ; এমনকি ইমাম আহমাদ বলেছেন: হাদীসের ক্ষেত্রে দৃঢ় (আল-মুতাথাabitūn) চারজন... এবং তাদের মধ্যে যায়েদার নাম উল্লেখ করেছেন), তবে তাঁর এই কথাটিকে: "আমি তাকে নাড়াতে দেখলাম, যার মাধ্যমে তিনি দু'আ করছিলেন" – ইমাম বায়হাকী (২/১৩২) যা বলেছেন, সেভাবে ব্যাখ্যা করা হবে: "সম্ভবত এই নাড়ানোর উদ্দেশ্য হলো এর মাধ্যমে ইশারা করা, এর পুনরাবৃত্তিমূলক নাড়ানো নয়। ফলে এটি ইবনু যুবাইরের বর্ণনার সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ হবে।" আল্লাহই ভালো জানেন।

আমি বলি: এ বিষয়ে নুমাইর আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এরও বর্ণনা রয়েছে। তিনি বলেন: "আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাতে তাঁর ডান উরুর উপর ডান হাত রেখে তাঁর আঙুল দিয়ে ইশারা করতে দেখেছি।"

এটি নাসাঈ (১২৭১), আবু দাঊদ (৯৯১), ইবনু মাজাহ (৯১১), ইবনু খুযাইমাহ (৭১৫) এবং ইবনু হিব্বান (১৯৪৬) সকলেই ইসাম ইবনু কুদামাহ সূত্রে, মালিক ইবনু নুমাইর আল-খুযাঈ, তিনি তার পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন।

মালিক ইবনু নুমাইরকে ইমাম যাহাবী যেমনটি বলেছেন, তেমন পরিচিত নন। আর 'আত-তাকরীব' গ্রন্থে বলা হয়েছে: তিনি 'মাকবুল' (গ্রহণযোগ্য), যদি তিনি অন্য রাবীর দ্বারা সমর্থিত হন; অন্যথায় তিনি দুর্বল রাবী। তবে ইশতিহাদ (সমর্থক প্রমাণ হিসেবে) পেশ করার ক্ষেত্রে তাঁর কোনো সমস্যা নেই।

শাহাদাত আঙুল দিয়ে ইশারা করার বিষয়ে আহলে ইলমদের মধ্যে কোনো দ্বিমত নেই, যেমনটি ইবনু আব্দুল বার্র ও অন্যান্যরা বলেছেন। কিছু হানাফী তাদের কিতাবে তাশাহহুদে শাহাদাত আঙুল দিয়ে ইশারা করাকে মাকরুহ বললেও, তারা ইমাম আবূ হানীফা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মতের বিরোধিতা করেছেন। কারণ মুহাম্মদ ইবনু হাসান তাঁর 'মুওয়াত্তা'য় ইমাম আবূ হানীফা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মত বর্ণনা করার পর বলেন:

"আর আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই আমলকেই গ্রহণ করি এবং এটিই আবূ হানীফা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মত।" সমাপ্ত।

আল্লামা আব্দুল হাই লাখনৌভী বলেন: "আমাদের তিনজন সাথী (আবূ ইউসুফ, মুহাম্মাদ ও যুফার) ইশারা করার বৈধতার বিষয়ে একমত। কারণ এটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীদের থেকে একাধিক বর্ণনা ও বহু সূত্রে প্রমাণিত, যা অস্বীকার বা প্রত্যাখ্যান করার কোনো সুযোগ নেই।" আর তিনি 'আল-খুলাসাহ', 'আল-বাযযাযিয়াহ আল-কুবরা', 'আল-ইতাবিয়াহ', 'আল-গিয়াসিয়াহ', 'আল-ওয়ালুজিয়াহ' এবং 'উমদাতুল মুফতী', 'আয-যাহিরিয়াহ' ইত্যাদির মুফতীদের তীব্র সমালোচনা করেছেন, কারণ তারা উল্লেখ করেছেন যে, ইশারা না করাই হলো মুختار (পছন্দনীয়), বরং তাদের কেউ কেউ উল্লেখ করেছেন যে, ইশারা করা মাকরুহ। সমাপ্ত। ["আত-তা'লীক আল-মুমাজ্জাদ আলা মুওয়াত্তা মুহাম্মাদ" (১/৪৬৪)]।

তাছাড়া সুন্নাত হলো, ইশারাটি তাশাহহুদের শুরু থেকে সালাম শেষ হওয়া পর্যন্ত চালিয়ে যাওয়া। যারা বলেন যে, ইশারা কেবল শাহাদাতের কালেমার সময় হবে, অর্থাৎ তাঁর উক্তি: "আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, ওয়া আশহাদু আন্না মুহাম্মাদান রাসূলুল্লাহ" - তাদের পক্ষে কোনো দলীল নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (2100)


2100 - عن عبد الله بن الزُّبير قال: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذا جلس في التّشهد وضع كفَّه اليُسرى على فخذه اليُسرى، وأشار بالسّبابة لا يجاوز بصرُه إشارتَه.

حسن: رواه أبو داود (990)، والنسائي (1275) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد، عن ابن عجلان، عن عامر بن عبد الله بن الزُّبير، عن أبيه فذكر مثله.

وإسناده حسن لأجل محمد بن عجلان فإنه صدوق، وصحَّحه ابن خزيمة فأخرجه في صحيحه (718)، وابن حبان (1944) من طريق يحيى بن سعيد به مثله. وأصل الحديث في صحيح مسلم (579) كما سبق من طرق عن ابن عجلان دون قوله:"لا يجاوز بصرُه إشارتَه".




আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাশাহহুদে বসতেন, তখন তিনি তাঁর বাম হাতের তালু বাম উরুর উপর রাখতেন, এবং শাহাদাত (তর্জনী) অঙ্গুলি দ্বারা ইশারা করতেন। তাঁর দৃষ্টি ইশারার বাইরে যেতো না।









আল-জামি` আল-কামিল (2101)


2101 - عن سعد بن أبي وقَّاص قال: مرَّ عليَّ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم وأنا أدعو بإصبَعَيَّ فقال:"أَحِّد أحِّد" وأشار بالسبابة.
صحيح: رواه أبو داود (1499)، والنسائي (1273) كلاهما من طريق أبي معاوية، قال: حَدَّثَنَا الأعمش، عن أبي صالح، عن سعد بن أبي وقَّاص فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله: أحِّد أحِّد - أي أشر بواحدة ليوافق التوحيد.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন আমি আমার দুই আঙুল দ্বারা দু‘আ করছিলাম। তখন তিনি বললেন: “এক, এক করো।” আর তিনি শাহাদাত আঙুল দ্বারা ইশারা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2102)


2102 - عن أبي هريرة أن رجلًا كان يدعو بإصبعيه فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم"أحِّد أحِّد".

حسن: رواه النسائيّ (1272)، والتِّرمذيّ (3557) كلاهما عن محمد بن بشار، ثنا صفوان بن عيسيّ، قال: حَدَّثَنَا محمد بن عجلان، عن القعقاع، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

قال الترمذيّ: حسن صحيح غريب.

قلت: إسناده حسن لأجل محمد بن عجلان، وأمّا القعقاع فهر: ابن حكيم الكناني من رجال مسلم.

قال الترمذيّ: ومعنى هذا الحديث إذا أشار الرّجل بإصبعيه في الدعاء عند الشهادة لا يشير إِلَّا بإصبع واحدة. انتهى.

قلت: والرجل المبهم لعلّه هو سعد بن أبي وقَّاص كما ذكر في الحديث السابق، أو رجل آخر في قصة أخرى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তার দু’টি আঙ্গুল দিয়ে দু’আ করছিলো (অথবা শাহাদাত দিচ্ছিলো)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এক, এক (অর্থাৎ একটি আঙ্গুল দিয়ে ইশারা করো)।"









আল-জামি` আল-কামিল (2103)


2103 - عن عبد الله بن مسعود، قال:"من السنة أن يخفي التشهد".

حسن: رواه أبو داود (986)، والتِّرمذيّ (291) كلاهما من طريق يونس بن بكير، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.

ورواه الحاكم (1/ 267) وعنه البيهقيّ (2/ 146) كلاهما من طريق محمد بن إسحاق، به، مثله.

قال الترمذيّ:"حسن غريب". وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

ومحمد بن إسحاق مدلِّس وقد عنعن، ولكنه توبع.

رواه الحاكم (1/ 230) من وجه آخر عن العلاء بن عبد الجبار العطّار، ثنا عبد الواحد بن زياد، ثنا الحسن بن عبيد الله، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عبد الله بن مسعود، فذكره، ومن طريقه رواه أيضًا البيهقيّ (2/ 146).

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

وهو وهم منه؛ فإنَّ العلاء بن عبد الرحمن ليس من رجال مسلم، وشيخ شيخه الحسن بن عبيد الله ليس من رجال البخاريّ، إِلَّا أنهما ثقتان، والحديث صحيح.

قال الترمذيّ عقب تخريج الحديث:"والعمل عليه عند أهل العلم".

قلت: لا أعلم من خالف في ذلك، بل قال النوويّ في"شرح المهذب" (3/ 463):"أجمع العلماء على الإسرار بالتشهدين وكراهة الجهر بهما، واحتجوا له بحديث ابن مسعود هذا".




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, "তাসাহহুদ (আত্তাহিয়্যাতু) নীরবে (আস্তে) পড়া সুন্নাতের অন্তর্ভুক্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2104)


2104 - عن عبد الله بن مسعود قال: كنا إذا صلَّينا خلف النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قلنا: السّلام على جبريل وميكائيل، السّلام على فلان وفلان، فالتفت إلينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنَّ الله هو السّلام، فإذا صلَّى أحدكم فليقل: التحيات لله والصلوات والطيبات، السّلام عليك أيها النَّبِيّ ورحمة الله وبركاته، السّلام علينا وعلى عباد الله الصالحين - فإنكم إذا قلتموها أصابت كلَّ عبد لله صالح في السماء والأرض - أشهد أن لا إله إِلَّا الله، وأشهد أن محمدًا عبدُهُ ورسولُه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (831) عن أبي نعيم، قال: حَدَّثَنَا الأعمش، عن شقيق بن سلمة، قال: قال عبد الله … فذكر الحديث.

وفي رواية يحيى، عن الأعمش حَدَّثَنِي شقيق، عن عبد الله (835) قال: كنا إذا كنا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في الصّلاة، قلنا: السّلام على الله من عباده، السّلام على فلان وفلان، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لا تقولوا السّلام على الله فإن الله هو السّلام ثمّ ذكر بقية التّشهد مثله، وقال في آخره:"ثمّ يتخيرُ من الدُّعاء أعجَبَه إليه فيدعو".

ورواه أيضًا في الدعوات (6328)، ومسلم في الصّلاة (402) كلاهما عن عثمان بن أبي شيبة، ثنا جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن عبد الله قال: كنا نقول في الصّلاة خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم كذا ذكره مسلم وقال أيضًا:"تم يتخيَّرُ من المسألة ما شاء" وفي رواية:"ثمّ ليتخيَّر بعد من المسألة ما شاء".

وفي الصحيحين أيضًا - البخاريّ في الاستئذان (6265) واللّفظ له، ومسلم في الصّلاة كلاهما عن أبي نعيم، قال: حَدَّثَنَا سيف بن سليمان، قال: سمعت مجاهدًا يقول: حَدَّثَنِي عبد الله بن سَخْبَرة قال: سمعتُ ابن مسعود يقول: عَلَّمني رسول الله صلى الله عليه وسلم وكفّي بين كفَّيه - التّشهُّدَ كما يُعلِّمني السورةَ من القرآن فذكر مثله إلى قوله:"وأشهد أن محمدًا رسول الله" وقال: وهو بين ظهْرانَينا، فلمّا قُبِض قلنا: السّلام - يعني على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.

يعني أنهم كانوا يقولون في حياة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: السّلام عليك أيها النَّبِيّ" بكاف الخطّاب، فلمّا مات عليه السلام عدلوا عن ذلك وقالوا:"السّلام على النَّبِيّ" تركوا الخطّاب، وذكروه بلفظ الغيبة.

وقد صحَّ عن الصّحابة أنّهم كانوا يقولون والنَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حيٌّ:"السّلام عليك أيّها النَّبِيّ. فلمّا مات قالوا: السّلام على النَّبِيّ".

رواه عبد الرزّاق قال: أخبرنا ابن جريج، أخبرني عطاء، أن الصّحابة، فذكره.

وإسناده صحيح، كما قال الحافظ في"الفتح" (2/ 314).
ورواه أبو داود (970)، والدارقطني (1333)، وصحّحه ابن حبان (1962) كلّهم من حديث الحسن بن الحر، عن القاسم بن مخيمرة، قال: أخذ علقمة بيديّ، وأخذ ابن مسعود بيد علقمة، وأخذ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بيد ابن مسعود، فعلَّمه التّشهد كما ذكره الأعمش:"إذا قلت هذا، أو قضيت هذا، فقد قضيت صلاتك، إن شئتَ أن تقوم فقم، وإن شئت أن تقعد فاقعد".

هكذا قال أبو داود، وقال ابن حبان: قال عبد الله بن مسعود:"فإذا فرغت من هذا فقد فرغت من صلاتك، فإن شئت فاثبت، وإن شئت فانصرف".

فاختلف أهل العلم في هذه الزيادة، هل هي مرفوعة أو موقوفة على عبد الله بن مسعود؟ .

فذهب الدارقطني إلى أن مَنْ جعله مِنْ كلام ابن مسعود أشبه بالصّواب، وذكر عللها وتبعه في ذلك البيهقيّ.

وقال ابن التركماني في"الجوهر النقي" (2/ 174، 175):"لا تعلل بها رواية من رفع؛ لأن الرّفع زيادة مقبولة على ما عرف من مذاهب أهل الفقه والأصول. فيحمل على أن ابن مسعود سمعه من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فرواه كذلك مرة، وأفتى به مرة أخرى، وهذا أولى من جعل كلامه، إذ فيه تخطئة الجماعة الذين وصلوه".

قلت: وفي حال ثبوته مرفوعًا فيه دلالة على أن الصّلاة على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في التّشهد غير واجبة، وهو رأي جمهور أهل العلم من المحدثين والفقهاء إِلَّا الشافعي ورواية عن أحمد فإنهما ذهبا إلى وجوبها. وسيأتي الكلام على هذه المسألة في الباب الذي يليه.

شرح ألفاظ الحديث:

قوله:"التشهد" سُمّي بالتشهد للنطق بالشهادة بالوحدانية والرسالة.

قوله:"إنَّ الله هو السلام" معناه أن السّلام اسم من أسماء الله تعالى، ومعناه السالم من النقائص، وسمات الحدوث، ومن الشريك والنِّدّ.

قوله:"التحيات" جمع تحية وهي المِلك، يقال: حيَّاك الله - أي ملَّكك. كذا في"مختار الصحاح".

قال النوويّ:"التحيات جمع تحية وهي الملك، وقبل البقاء، وقيل العظمة، وقيل الحياة، وإنما قيل التحيات بالجمع، لأن ملوك العرب كان كل واحد منهم تحييه أصحابه بتحية مخصوصة، فقيل: جميع تحياتهم الله تعالى، وهو المستحق لذلك حقيقة". انتهى.

قوله:"فليقل التحيات لله": قال الخطّابي:"فيه إيجاب التّشهد؛ لأن الأمر على الوجوب". انتهى.

قلت: وإليه ذهب جمهور المحدثين بأن التشهدين واجبان، وذهب أبو حنيفة ومالك وجمهور الفقهاء إلى أنهما سنَّتان، وقال الشافعي: الأوّل سنة، والأخير واجب.

تشهد ابن عباس:




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সালাত আদায় করতাম, তখন বলতাম: জিবরাঈল ও মীকাইল-এর উপর সালাম, অমুক অমুকের উপর সালাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের দিকে ফিরে বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্ই হলেন আস-সালাম (শান্তি)। সুতরাং তোমাদের কেউ যখন সালাত আদায় করে, তখন সে যেন বলে: 'আত-তাহিয়্যাতু লিল্লাহি ওয়াস-সালাওয়াতু ওয়াত-ত্বাইয়্যিবাতু। আস-সালামু আলাইকা আইয়্যুহান-নাবিয়্যু ওয়া রাহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু। আস-সালামু আলাইনা ওয়া আলা ইবাদিল্লাহিস সালিহীন।' (কারণ) তোমরা যখন এটা বলবে, তখন আকাশ ও পৃথিবীর সকল নেক বান্দাকে তা স্পর্শ করবে। (এরপর বলবে:) 'আশহাদু আল-লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়া আশহাদু আন্না মুহাম্মাদান আবদুহু ওয়া রাসূলুহু'।"

ইয়াহইয়া-এর এক বর্ণনায়, আ‘মাশ (তিনি শাকীক থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ থেকে) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাতে থাকতাম, তখন বলতাম: আল্লাহর পক্ষ থেকে তাঁর বান্দাদের উপর সালাম, অমুক অমুকের উপর সালাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা 'আল্লাহর উপর সালাম' বলো না, কেননা আল্লাহ্ই হলেন আস-সালাম।" এরপর তিনি অনুরূপভাবে তাশাহ্‌হুদের অবশিষ্ট অংশ উল্লেখ করেন এবং শেষে বলেন: "অতঃপর সে দু‘আর মধ্য থেকে তার কাছে যা বেশি পছন্দনীয় তা নির্বাচন করবে এবং দু‘আ করবে।"

মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় আরও এসেছে: "অতঃপর সে তার ইচ্ছামতো যা ইচ্ছা দু‘আ বা প্রার্থনা বেছে নিতে পারে।" অন্য এক বর্ণনায় আছে: "অতঃপর সে যেন এরপর তার ইচ্ছামতো প্রার্থনা বেছে নেয়।"

বুখারী ও মুসলিমের অন্য এক সহীহ বর্ণনায় আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাশাহ্‌হুদ এমনভাবে শিক্ষা দিয়েছেন, যেমনভাবে তিনি আমাকে কুরআনের সূরা শিক্ষা দিতেন—এ সময় আমার হাতের তালু তাঁর দু'হাতের তালুর মাঝে ছিল। তিনি অনুরূপভাবে 'ওয়া আশহাদু আন্না মুহাম্মাদান রাসূলুল্লাহ' পর্যন্ত উল্লেখ করেন। তিনি বলেন: আর তিনি (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) আমাদের মাঝেই উপস্থিত ছিলেন। যখন তিনি ইন্তেকাল করলেন, তখন আমরা বললাম: "আস-সালাম—অর্থাৎ, 'নবীর উপর সালাম'।" এর অর্থ হলো, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জীবদ্দশায় তারা সম্বোধনসূচক কাফ (আলাইকা) ব্যবহার করে বলতেন: "আস-সালামু আলাইকা আইয়্যুহান-নাবিয়্যু।" যখন তিনি ইন্তেকাল করলেন, তখন তারা তা থেকে সরে এসে বললেন: "আস-সালামু আলান-নাবিয়্যি" অর্থাৎ সম্বোধন ত্যাগ করে অনুপস্থিত সূচক শব্দ ব্যবহার করলেন। সাহাবীগণ থেকে প্রমাণিত আছে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীবিত থাকা অবস্থায় তারা বলতেন: "আস-সালামু আলাইকা আইয়্যুহান-নাবিয়্যু।" যখন তিনি ইন্তেকাল করলেন, তখন তারা বললেন: "আস-সালামু আলান-নাবিয়্যি।"

ইবনু হিব্বানের বর্ণনায় আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: "যখন তুমি এটা থেকে ফারেগ হবে, তখন তুমি তোমার সালাত থেকে ফারেগ হয়ে গেলে। অতঃপর তুমি চাইলে স্থির থাকবে, আর চাইলে চলে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2105)


2105 - عن ابن عباس أنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُعَلِّمنا التّشهد كما يُعَلِّمنا السورة
من القرآن. فكان يقول:"التحيات المباركات، الصلوات الطيبات لله، السلام عليك أيها النبي ورحمة الله وبركاته، السلام علينا وعلى عباد الله الصالحين، أشهد أن لا إله إلا الله، وأشهد أنَّ محمدًا رسولُ الله".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (403) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا ليث (هو ابن سعد) عن أبي الزبير، عن سعيد بن جبير وعن طاوس، عن ابن عباس فذكره، وذكر له وجهًا آخر عن عبد الرحمن بن حميد، حدثني أبو الزبير، عن طاوس، عن ابن عباس به، فذكره.

قال أبو عوانة في صحيحه (2024): سمعت محمد بن عبد الله بن عبد الحكم قال: سمعت الشافعي يقول: هذا أجود حديث رُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم في التشهد.

وقوله:"التحيات المباركات الصلوات الطيبات" قال النووي: تقديره:"والمباركات والصلوات والطيبات كما في حديث ابن مسعود وغيره، ولكن حذفت الواو اختصارًا، وهو جائز معروف في اللغة، ومعنى الحديث: أن التحيات وما بعدها مستحقة لله تعالى، ولا تصلح حقيقتها لغيره" انتهى.

وأما ما رواه ابن ماجه (902)، والنسائي (1175، 1281)، والحاكم (1/ 266) وعنه البيهقي (2/ 141، 142) كلهم من طريق أيمن بن نابل، قال: حدثنا أبو الزبير، عن جابر بن عبد الله، قال:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعلمنا التشهد كما بعلمنا السورة من القرآن: باسم الله وبالله التحيات …" فهو خطأ مع ما زاده في أول المتن.

قال البيهقي: تفرد به أيمن بن نابل، عن أبي الزبير، عن جابر. قال أبو عيسى: سألت البخاري عن هذا الحديث، فقال: هو خطأ، والصواب ما رواه الليث بن سعد، عن أبي الزبير، عن سعيد بن جبير وطاوس، عن ابن عباس".

ذكره الترمذي في"العلل الكبير" (2/ 228).

وقال النسائي في الموضع الثاني (3/ 43):"لا نعلم أحدًا تابع أيمن بن نابل على هذه الرواية، وأيمن عندنا لا بأس به، والحديث خطأ".

تشهد أبي موسى الأشعري:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে তাশাহহুদ এমনভাবে শিক্ষা দিতেন, যেভাবে তিনি আমাদেরকে কুরআনের কোনো সূরা শিক্ষা দিতেন। অতঃপর তিনি বলতেন: "সকল সম্মান, সকল বরকত, সকল সালাত এবং সকল উত্তম বস্তু আল্লাহর জন্য। হে নবী! আপনার উপর শান্তি, আল্লাহর রহমত এবং তাঁর বরকতসমূহ বর্ষিত হোক। আমাদের উপর এবং আল্লাহর নেককার বান্দাদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল।"









আল-জামি` আল-কামিল (2106)


2106 - عن أبي موسى الأشعري قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم خطبنا فبيَّن لنا سنَّتنا، وعلَّمنا صلاتنا فقال:"وإذا كان عند القعدة فليكُن من أوّل قول أحدكم: التحيات الطيّبات الصلوات لله، السلام عليك أيُّها النبي ورحمةُ الله وبركاته، السلام علينا وعلى عباد الله الصالحين، أشهد أن لا إله إلا الله، وأشهد أن محمدًا عبدُه ورسولُه".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (404) عن حِطَّان بن عبد الله الرقاشي قال: صليتُ مع أبي
موسى الأشعري صلاة، ثم ذكر حديثا طويلًا ومنه هذا.

تشهد ابن عمر:




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশে ভাষণ দিলেন, আর তাতে তিনি আমাদের জন্য আমাদের সুন্নাহ স্পষ্ট করে দিলেন এবং আমাদের সালাত শিখিয়ে দিলেন। এরপর তিনি বললেন: "যখন তোমরা ক্বা'দাতে (বৈঠকে) থাকবে, তখন তোমাদের কারো প্রথম কথা যেন হয়: 'আত-তাহিয়্যাতুল তাইয়িবাতুস সালাওয়াতু লিল্লাহ, আসসালামু আলাইকা আইয়্যুহান নাবিইয়ু ওয়া রাহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহ, আসসালামু আলাইনা ওয়া আলা ইবাদিল্লাহিস সালিহীন, আশহাদু আল-লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, ওয়া আশহাদু আন্না মুহাম্মাদান আবদুহু ওয়া রাসূলুহু'।"









আল-জামি` আল-কামিল (2107)


2107 - عن ابن عمر: عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في التشهد:"التحيات لله، الصلوات الطيبات، السلام عليك أيُّها النبي ورحمة الله وبركاته" - قال ابن عمر: زدتُ فيها: بركاته - السلام علينا وعلى عباد الله الصّالحين، أشهد أن لا إله إلا الله" - قال ابن عمر: زدت فيها: وحده لا شريك له -"وأشهد أن محمدًا عبده ورسوله".

صحيح: رواه أبو داود (971) عن نصر بن علي، حدثني أبي، حدثنا شعبة، عن أبي بشر، سمعتُ مجاهدًا يحدث عن ابن عمر … فذكر الحديث.

وإسناده صحيح ورجاله ثقات غير أن شعبة تكلم في أبي بشر، وزعم أنه لم يسمع شيئًا من مجاهد، ولكن جاء في الإسناد: سمعتُ مجاهدًا. وهذا نص في السماع.

رواه أيضًا الدارقطني (1/ 351) عن أبي بكر بن أبي داود، ثنا نصر بن علي به مثله وقال: هذا إسناد صحيح، وقد تابعه على رفعه ابن أبي عدي، عن شعبة، ووقَّفه غيرهما. انتهى.

وقول ابن عمر: زدت فيه"وبركاته" و"وحده لا شريك له" هذه الزيادة ليست من عند نفسه، بل إنه لم يسمع هذه من النبيّ صلى الله عليه وسلم ولكنه سمعها من أبي موسى الأشعريّ كما يدل عليه ما رواه الإمام أحمد (5360) عن عفان، قال: حدثنا أبان بن يزيد، قال: حدثنا قتادة، حدثني عبد الله بن باباه المكي، قال: صليت إلى جنب عبد الله بن عمر، قال: فلما قضى الصلاة ضرب يده على فخذه، فقال: ألا أعلمك تحية الصلاة كما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعلمنا: قتلا على هؤلاء الكلمات. يعني قول أبي موسى الأشعري في التشهد. وإسناده صحيح.

وفي تشهد أبي موسى الأشعري هؤلاء الكلمات موجودة. فالذي يظهر أنه أخذ من النبي صلى الله عليه وسلم مختصرًا، والباقي من أبي موسى الأشعريّ، وكلها مرفوعة.

وأما ما روي عنه: كان النبي صلى الله عليه وسلم يعلمنا التشهد كما يعلم المُكتب الولدان، فهو ضعيف، رواه مسدد، ثنا هُشيم، عن عبد الرحمن بن إسحاق، ثنا محارب بن دثار، قال: سمعت ابن عمر … فذكره.

ورواه أيضًا عن عبد الواحد، ثنا عبد الرحمن به وزاد"على المنبر""المطالب العالية" (534) و"إتحاف الخيرة" (1974، 1975). وقال البوصيري: رجاله ثقات، وهشيم هو: ابن أبي بشير.

قلت: ليس كما قال فإن عبد الرحمن بن إسحاق وهو: أبو شيبة الواسطي الأنصاري ضعيف، ضَعَّفه أحمد وابن معين وابن سعد ويعقوب بن سفيان وأبو داود والنسائي وابن حبان، وقال البخاري: فيه نظر. وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث منكر الحديث، يكتب حديثه ولا يحتج به، وضعَّفه أيضًا الساجي والعقيلي وغيرهم. فلعله اشتبه عليه برجل آخر.
تشهد عمر بن الخطاب:




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাশাহহুদ সম্পর্কে বলেছেন: "সমস্ত সম্মান আল্লাহ্‌র জন্য, সকল সালাত ও পবিত্রতা (আল্লাহ্‌র জন্য)। হে নবী! আপনার উপর শান্তি, আল্লাহ্‌র রহমত এবং তাঁর বরকত বর্ষিত হোক।" (ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি এর মধ্যে 'বারাকাতুহু' শব্দটি অতিরিক্ত যোগ করেছি।) "আমাদের উপর এবং আল্লাহ্‌র নেককার বান্দাদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই।" (ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি এর মধ্যে 'ওয়াহদাহু লা শারিকা লাহু' অতিরিক্ত যোগ করেছি।) "এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল।"