হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2288)


2288 - عن عبد الرحمن بن أبي عمرةَ قال: دخل عثمان بن عفَّان المسجد بعد صلاة المغرب، فقعد وحده، فقعدتُ إليه، فقال: يا ابن أخي! سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صلَّى العشاء في جماعة فكأنما قام نصفَ الليل. ومن صلَّى الصبحَ في جماعة فكأنما صلى كلَّه".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (656) عن إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا المغيرة بن سلمة المخزوميّ، حَدَّثَنَا عبد الواحد (وهو ابن زياد) حَدَّثَنَا عثمان بن حكيم، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن أبي عمرة فذكره، وفي رواية أبي داود (555)، والتِّرمذيّ (221) من طريق عثمان بن حكيم به بلفظ:"من شهد العشاءَ في جماعة كان له قيامُ نصفِ ليلةٍ، ومن صَلَّى العِشاءَ والفجرَ في جماعة كان له كقيام ليلةٍ، قال الترمذيّ: حسن صحيح.




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (আব্দুর রহমান ইবনে আবি উমরাহ বলেন) তিনি মাগরিবের সালাতের পর মসজিদে প্রবেশ করে একাকী বসলেন। আমি তাঁর কাছে বসলে তিনি বললেন, হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি জামা‘আতের সাথে ইশার সালাত আদায় করল, সে যেন অর্ধ রাত দাঁড়িয়ে (ইবাদতে) রইল। আর যে ব্যক্তি জামা‘আতের সাথে ফজরের সালাত আদায় করল, সে যেন পূর্ণ রাত দাঁড়িয়ে (ইবাদতে) রইল।"









আল-জামি` আল-কামিল (2289)


2289 - عن جندب بن عبد الله يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى الصُبح فهو في ذمة الله، فلا يَطلبَنَّكم الله من ذِمَّته بشيء فيدركَه فيكبَّه في نار جهنّم".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (157) عن نصر بن عليّ الجهضميّ، حَدَّثَنَا بشر (يعني ابن مفضَّل) عن خالد، عن أنس بن سيرين قال: سمعتُ جندبَ بن عبد الله يقول فذكره. ورواه أيضًا عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون، عن داود بن أبي هند، عن الحسن، عن جندب بن سفيان، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بهذا ولم يذكر:"فيكبه في نار جهنّم".

ومن هذا الوجه رواه الترمذيّ (222) فقال: حَدَّثَنَا محمد بن بشار، حَدَّثَنَا يزيد بن هارون به مثله، وقال:"حسن صحيح".

ولا يضر رواية أبي داود الطيالسي (980) عن شعبة، عن أنس بن سيرين موقوفًا فإنه قال: وروى هذا الحديثَ بشرُ بن المفضَّل، عن خالد الحذاء، عن أنس بن سيرين، عن جندب، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. فلعل أنس بن سيرين روي على وجهين. ويكون المرفوع هو الوجه الأخير، وهو الذي اختاره مسلم فرواه من حديث بشر بن المفضَّل.

وجندب هو: ابن عبد الله بن سفيان البجليّ، وربما نسب إلى جده.




জুনদুব ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি ফজরের সালাত আদায় করল, সে আল্লাহর জিম্মায় (নিরাপত্তায়) রইল। সুতরাং আল্লাহ যেন তোমাদেরকে তাঁর জিম্মা সংক্রান্ত কোনো বিষয়ে তলব না করেন, যার ফলে তিনি তাকে পাকড়াও করে জাহান্নামের আগুনে উপুড় করে নিক্ষেপ করেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (2290)


2290 - عن سمرة بن جندب عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: من صلى صلاة الغداة فهو في ذمة الله، فلا تخفروا الله في ذمته.

صحيح: رواه ابن ماجة (3946)، وأحمد (20113) واللّفظ له، كلاهما من حديث روح بن عبادة، حَدَّثَنَا أشعث (هو ابن عبد الملك الحمرانيّ، عن الحسن، عن سمرة بن جندب فذكره.

وإسناده صحيح، وصحّحه أيضًا المنذري في الترغيب (613).
والطريقان محفوظان فإن الحسن البصري ممع جندب بن عبد الله بن سفيان كما سمع من سمرة بن جندب، وفي معناه ما رُوي عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من صلي الصبح فهو في ذمة الله، فلا يتبعنكم الله بشيء من ذمته".

رواه الترمذيّ (2164) عن بندار، حَدَّثَنَا معدي بن سليمان، حَدَّثَنَا ابن عجلان، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وبهذا الإسناد رواه أيضًا ابن ماجة كما ذكره المزي في تحفة الأشراف (10/ 250)، ولم أجده في النسخ المطبوعة.

وإسناده ضعيف من أجل معدي بن سليمان وهو ضعيف، ضعَّفه أبو زرعة، والنسائيّ، وقال ابن حبان:"يروي المقلوبات عن الثّقات، والملزقات عن الأثبات، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد.

وأمّا الترمذيّ فقال: هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".

وفي معناه أيضًا ما رُوي عن أبي بكر الصديق قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلى الصبح فهو في ذمة الله. فلا تخفروا الله في عهده فمن قتله طلبه الله حتَّى يكبه في النّار على وجهه".

رواه ابن ماجة (3945) عن عمرو بن عثمان بن سعيد بن كثير بن دينار الحمصيّ، حَدَّثَنَا أحمد بن خالد الوهبيّ، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون، عن عبد الواحد بن أبي عون، عن سعد بن إبراهيم، عن حابس اليمانيّ، عن أبي بكر الصديق فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل الانقطاع؛ فإن سعد بن إبراهيم لم يدرك حابس بن سعد.

وأمّا حابس اليماني وهو حابس بن سعد، ويقال: ابن ربيعة بن منذر بن سعد الطائيّ، فهو مختلف في صحبته، فذكره ابن سعد في تسمية من نزل الشام من الصّحابة. وقال البخاريّ:"أدرك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم".

وهذا الذي رجَّحه ابن حجر في"التهذيب" بعد ذكر أقوال أهل العلم الأخرى في إثبات صحبته.

وأمّا قول الدَّارقطنيّ:"إنه مجهول متروك" فيبدو أنه لم يقف على قول ابن سعد والبخاري وغيرهما ممن سبقوه.

والخلاصة فيه: أن هذا الحديث صحيح من حديث جندب بن عبد الله، وسمرة بن جندب، وأمّا حديث أبي بكر الصديق فلا، من أجل الانقطاع.

وفي معناه روي أيضًا عن عبد الله بن عمر، وأنس بن مالك، وطارق بن أشيم، وفي أسانيدها مقال.




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি ফজরের সালাত আদায় করে, সে আল্লাহর জিম্মায় (নিরাপত্তায়) থাকে। সুতরাং তোমরা আল্লাহর জিম্মা ভঙ্গ করো না।









আল-জামি` আল-কামিল (2291)


2291 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يتعاقبون فيكم ملائكة بالليل وملائكة بالنهار. ويجتمعون في صلاة العصر، وصلاة الفجر. ثمّ يَعْرُج الذين باتوا فيكم. فيسألُهم وهو أعلم بهم: كيف تركتم عبادي؟ فيقولون: تركناهم وهم يصلون، وأتيناهم وهم يُصلون".

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصّلاة (82) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر مثله.

ورواه البخاريّ في مواقيت الصّلاة (555) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المساجد (632) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে একদল ফেরেশতা রাতে এবং আরেক দল দিনে পালাক্রমে আগমন করে। তারা আসরের সালাত ও ফজরের সালাতের সময় একত্র হয়। অতঃপর যারা তোমাদের মাঝে রাত কাটিয়েছে, তারা উপরে আরোহণ করে। তখন আল্লাহ্ তাদেরকে জিজ্ঞেস করেন—যদিও তিনি তাদের সম্পর্কে সর্বাধিক অবগত—তোমরা আমার বান্দাদেরকে কোন অবস্থায় ছেড়ে এসেছো? তারা উত্তর দেয়: আমরা যখন তাদের ছেড়ে এসেছি, তখনও তারা সালাত আদায় করছিল এবং যখন তাদের কাছে গিয়েছিলাম, তখনও তারা সালাত আদায় করছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (2292)


2292 - عن جرير بن عبد الله يقول: كنا جلوسًا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ نظر إلى القمر ليلة البدْر، فقال:"أما إنكم سترون ربّكم كما ترون هذا القمر. لا تُضامُّون في رؤيته. فإن استطعتم أن لا تُغلبوا على صلاة قبل طلوع الشّمس وقبل غروبها" يعني العصر والفجر. ثمّ قرأ جرير: {وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوبِهَا} [طه: 130].

متفق عليه: رواه البخاريّ في مواقيت الصّلاة (554)، ومسلم في المساجد (633) كلاهما من حديث مروان بن معاوية الفزاريّ، أخبرنا إسماعيل بن أبي خالد، حَدَّثَنَا قيس بن أبي حازم، قال: سمعت جرير بن عبد الله فذكر مثله.

وقوله:"لا تُضامُّون" - بضم أوله وتشديد الميم - أي لا ينضم بعضكم إلى بعض، ولا يقول: أرنيه. بل كل ينفرد برؤيته.

وقوله:"فإن استطعم" - شرط، وجزاؤه ساقط وتقديره: فافعلوا.

وفي رواية عند مسلم:"أما إنكم ستعرضون على ربّكم فترونه كما ترون هذا القمر" رواه عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا عبد الله بن نمير وأبو أسامة ووكيع بهذا الإسناد. وقال: ثمّ قرأ. ولم يقل: جرير. انتهى.

وقوله:"فترونه كما ترون هذا القمر"، أي: ترونه رؤية محققة لا شك فيها ولا مشقة، كما ترون هذا القمر رؤية محققة بلا مشقة. فهو تشبيه للرؤية بالرؤية، لا المرئي بالمرئي. والرؤية مختصة بالمؤمنين، وأمّا الكفار والمنافقون فلا يرونه وعليه جمهور أهل السنة. أفاده النوويّ.




জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট বসে ছিলাম, যখন তিনি পূর্ণিমা রাতে চাঁদের দিকে তাকালেন। অতঃপর তিনি বললেন: "সাবধান! নিশ্চয় তোমরা তোমাদের রবকে দেখবে, যেমন তোমরা এই চাঁদকে দেখছ। তাঁকে দেখতে তোমাদের কোনো প্রকার কষ্ট বা ভিড় হবে না। সুতরাং, যদি তোমরা এমন সালাত আদায়ে দুর্বল না হতে পারো যা সূর্যোদয়ের আগে ও সূর্যাস্তের আগে (আদায় করতে হয়)," অর্থাৎ আসর ও ফজর (এর সালাত)। অতঃপর জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিলাওয়াত করলেন: "আর তোমার রবের প্রশংসাসহ তাঁর পবিত্রতা বর্ণনা করো সূর্যোদয়ের পূর্বে এবং সূর্যাস্তের পূর্বে।" (সূরা ত্বাহা: ১৩০)।









আল-জামি` আল-কামিল (2293)


2293 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى البَرْدَين دخل الجنّة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المواقيت (574)، ومسلم في المساجد (635) كلاهما عن هُدْبة ابن خالد، حَدَّثَنَا همام بن يحيى، حَدَّثَنِي أبو جمرة الضُّبَعيُّ، عن أبي بكر بن أبي موسى، عن أبيه فذكر مثله.
وهُدبة بن خالد - ويقال له: هَدَّابَ بالتثقيل وفتح أوله أيضًا كما في صحيح مسلم. وأبو جمرة - بالجيم.

وقوله:"البَرْدَين" - يعني العصر والفجر.

قال الخطّابي: سميتا بَردين لأنهما تصليان في بَردي النهار، وهما طرفاه حين يطيب الهواء، وتذهب سورة الحر.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি দুটি শীতল সময়ের (ফজর ও আসর) সালাত আদায় করবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2294)


2294 - عن عُمارة بن رُؤَيبة قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لن يلج النّار أحد صَلَّى قبل طلوع الشّمس، وقبل غروبها" يعني الفجر والعصر. فقال له رجل من أهل البصرة: أنت سمعتَ هذا من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم. قال الرّجل: وأنا أشهد أني سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، سِمِعتْه أُذُناي ووَعَاه قلبي.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (634) من أوجه عن أبي بكر بن عُمارة بن رُؤَيْبَة، عن أبيه فذكره.




উমারা ইবনে রুওয়াইবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো ব্যক্তি জাহান্নামে প্রবেশ করবে না, যে সূর্যোদয়ের পূর্বে এবং সূর্যাস্তের পূর্বে সালাত আদায় করেছে।" (তিনি এ দ্বারা) ফজর ও আসরের সালাতের কথা বুঝিয়েছেন। তখন বসরাবাসীদের মধ্য থেকে একজন লোক তাঁকে বলল: আপনি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট থেকে এটি শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। লোকটি বলল: আমিও সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট থেকে শুনেছি; আমার দুই কান তা শুনেছে এবং আমার অন্তর তা সংরক্ষণ করেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (2295)


2295 - عن عبد الله بن فَضالة، عن أبيه قال: علَّمني رسول الله صلى الله عليه وسلم فكان فيما علَّمني:"وحافظ على الصلوات الخمس" قال: قلت: إن هذه ساعات لي فيها أشغال، فمرني بأمر جامع إذا أنا فعلتُه أجزأ عَنِّي؟ فقال:"حافظ على العصرين" وما كانت مِن لُغَتِنَا؟ فقلت: وما العصران؟ فقال:"صلاة قبل طلوع الشّمس، وصلاة قبل غروبها".

صحيح: رواه أبو داود (428) عن عمرو بن عون، أنا خالد، عن داود بن أبي هند، عن أبي حرب بن أبي الأسود، عن عبد الله بن فَضالة فذكره.

إسناده صحيح. وصحّحه ابن حبان (1742)، والحاكم (1/ 199 - 200) فروياه من طريق خالد به مثله. وقال:"صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه، وعبد الله هو: ابن فضالة بن عبيد، وقد خُرِّج له في الصَّحيح حديثان".

قلت: عبد الله بن فضالة بن عبيد الليثي الزهراني ليس من رجال مسلم، ولكنه ثقة، واختلف في صحبته فالصحيح أنه رآه ولم يسمع منه، فمن روى عنه عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فهو مرسل، ومن أثبت بينهما ذكر أبيه فهو الصواب.

وللحديث أسانيد أخرى، والذي ذكرته أمثلها.




ফাযালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে শিক্ষা দিয়েছিলেন। তিনি আমাকে যা শিক্ষা দিয়েছিলেন তার মধ্যে ছিল: "আর তুমি পাঁচ ওয়াক্ত সালাতের প্রতি যত্নবান হও।" [বর্ণনাকারী] বললেন, আমি বললাম: এই সময়গুলিতে আমার অনেক কাজ থাকে, তাই আমাকে এমন একটি ব্যাপক নির্দেশ দিন যা আমি পালন করলে আমার জন্য যথেষ্ট হবে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি 'আসরান' (দুই আসর)-এর প্রতি যত্নবান হও।" শব্দটি আমাদের ভাষায় প্রচলিত ছিল না। তাই আমি বললাম: 'আসরান' কী? তিনি বললেন: "সূর্যোদয়ের আগের সালাত এবং সূর্যাস্তের আগের সালাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2296)


2296 - عن ابن عمر أنه أذَّن بالصلاة في ليلة ذات بردٍ وريح فقال: ألا صلوا في الرحال، ثمّ قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمر بالمؤذِّن إذا كانت ليلة باردةً ذاتُ مطر يقول:"ألا صلوا في الرحال".
متفق عليه: رواه مالك في الصّلاة (10) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ورواه البخاريّ في الأذان (666)، ومسلم في صلاة المسافرين (697) كلاهما من طريق مالك به مثله.

ولهما: البخاريّ (632)، ومسلم عن عبيد الله بن عمر قال: حَدَّثَنِي نافع قال: أذَّن ابن عمر في ليلة باردة بضجْنان ثمّ قال: صَلُّوا في رحالكم. فأخبرنا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمر مؤذِّنًا يؤذِّن ثمّ يقول على أثره:"ألا صلُّوا في الرِّحال" في الليلة الباردة، أو المطيرة في السَّفر.

قوله: بضَجْنان - بفتح الضاد المعجمة، وبالجيم، بعدها نون على وزن فعلان غير مصروف، قال صاحب الصحاح: هو جبل بناحية مكة. وقال غيره: جبل بين مكة والمدينة.




ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ঠাণ্ডা ও ঝড়ো রাতে সালাতের জন্য আযান দিলেন এবং (আযানের পর) বললেন: সাবধান! তোমরা নিজ নিজ বাসস্থানে সালাত আদায় করো। অতঃপর তিনি (ইবন উমার) বললেন, যখন ঠাণ্ডা ও বৃষ্টির রাত হতো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুয়াযযিনকে নির্দেশ দিতেন যেন সে বলে: "সাবধান! তোমরা নিজ নিজ বাসস্থানে সালাত আদায় করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2297)


2297 - عن عبد الله بن الحارث قال: خطبنا ابن عباس في يومٍ رَدْغٍ فلمّا بلغ المؤذِّن: حيَّ على الصَّلاة فأمره أن ينادي: الصَّلاة في الرِّحال، فنظر القومُ بعضُهم إلى بعض فقال: فعل هذا من هو خير منه، وإنها عَزْمةٌ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان (616) ومسلم في صلاة المسافرين (699) كلاهما عن عبد الحميد صاحب الزياديّ، عن عبد الله بن الحارث فذكره، واللّفظ للبخاريّ.

ورواه أيضًا البخاريّ (668) عن عبد الله بن عبد الوهّاب، قال: حَدَّثَنَا حمّاد بن زيد، قال: حَدَّثَنَا عبد الحميد به وفيه: فنظر بعضهم إلى بعض فكأنهم أنكروا. فقال: كأنكم أنكرتم هذا، إن هذا فعله من هو خير مني - يعني النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم - إنها عَزْمَةٌ، وإني كرهتُ أن أُحرجكم.

وعن حمّاد عن عاصم، عن عبد الله بن الحارث، عن ابن عباس نحوه. غير أنه قال: كرهتُ أن أؤثِّمكم، فتجيئون تدوسون الطين إلى رُكبكم.

ورواه أيضًا (901) عن مسدد، قال: حَدَّثَنَا إسماعيل - وهو ابن علية، قال: أخبرني عبد الحميد صاحب الزيادي به وفيه: وإني كرهت أن أُحرجكم فتمشون في الطين والدحض.

وقوله: يوم رَدْغ - بفتح الراء وسكون الدال المهملة - وهو الماء القليل، وقيل: إنه طين وحل، وقيل: الرزغ - بالزاء والمعنى واحد.

وقوله: عَزْمة - بسكون الراء - ضد الرخصة.

وقوله: والدَحْض - بفتح الدال وسكون الحاء وهو الزلق.




আব্দুল্লাহ ইবনুল হারিস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি কাদাচ্ছন্ন দিনে আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন। মুয়াজ্জিন যখন ‘হাইয়্যা আলাস-সালাহ’ পর্যন্ত পৌঁছালেন, তখন তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন যেন ঘোষণা দেয়: ‘আস-সালাতু ফির-রিহাল’ (তোমরা যার যার স্থানে সালাত আদায় করো)। এতে লোকেরা পরস্পরের দিকে তাকাতে লাগল। তখন তিনি বললেন: ‘আমার চেয়ে উত্তম ব্যক্তি এটি করেছেন, আর এটি অবশ্যই একটি দৃঢ় আদেশ (বা অবশ্যপালনীয় বিধান)।’









আল-জামি` আল-কামিল (2298)


2298 - عن محمود بن الربيع الأنصاري أنَّ عِتبان بن مالك وهو من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم ممن شهد بدرًا من الأنصار أنه أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! قد أنكرتُ بَصَرِي وأنا أصلِّي لقَوميّ، فإذا كانتِ الأمطارُ سالَ الوادي الذي بَيني وبينَهم لم أستَطِع أن آتيَ مسجدَهم فأُصلِّي بهم. وودِدْتُ يا رسولُ الله! أَنَّكَ تأتيني فتُصَلِّي في بَيتي فأَتخذَهُ مُصلًّى. قال: فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"سأفعلُ إن شاءَ الله". قال
عِتبانُ: فغدا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر حينَ ارتَفَعَ النهارُ فاستأذَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فَأَذِنتُ له، فلم يجلسْ حتَّى دخلَ البيتَ ثمّ قال:"أينَ تُحِبُّ أن أصلِّيَ من بَيْتِكَ؟" قال: فأشرتُ له إلى ناحيةٍ من البيت، فقام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فكبَّرَ، فقُمنا فصفَفْنا فصلَّى رَكعتَيِنِ ثمّ سلَّمَ. فذكر الحديث. وهو في كتاب الإيمان بطوله. قال ابنُ شِهابٍ: ثمَّ سَأَلتُ الْحُصينَ بنَ محمد الأنصاري - وهو أحدُ بني سالم وهو من سَراتِهم - عن حديث محمود بن الربيع، فصدَّقه بذلك.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (425)، ومسلم في المساجد (263) كلاهما من طريق ابن شهاب، قال: أخبرني محمود بن الربيع فذكر مثله واللّفظ للبخاريّ.

وفي مسلم قال محمود: فحدثتُ بهذا الحديث نفرًا فيهم أبو أيوب الأنصاريّ، فقال: ما أظنُّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال ما قُلتَ. قال: فحلفتُ إن رجعتُ إلى عِتْبان أن أسألَه، قال: فرجعت إليه فوجدته شيخًا كبيرًا قد ذهب بصرُه. وهو إمام قومه، فجلستُ إلى جنبه فسألتُه عن هذا الحديث فحدثنيه كما حدثنيه أولَ مرةٍ.

قال الزهري: ثمّ نزلتْ بعد ذلك فرائض وأمور نرى أن الأمر انتهى إليها. فمن استطاع أن لا يغتر فلا يغترَّ. انتهى.

ورواه البخاريّ (670) عن أنس يقول: قال رجل من الأنصار: إني لا أستطيع الصّلاةَ معك - وكان رجلًا ضخمًا - فصنع للنبي صلى الله عليه وسلم طعامًا فدعاه إلى منزله، فبسط له حصيرًا، ونضح طرف الحصير، فصلى عليه ركعتين …

وقوله: رجل من الأنصار - يقال: هو عتبان بن مالك السالمي الأنصاري الأعمى، لأن قصته شبيهة بقصته.

وقوله: ضخمًا - أي سمينًا، وفي هذا الوصف إشارة إلى علة تخلفه، وقد عدَّد ابن حبان من الأعذار المرخصة في التأخير عن الجماعة. انظر"فتح الباري" (2/ 158).




ইতবান ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের এবং আনসারদের মধ্যে যারা বদরে অংশ নিয়েছিলেন তাদের অন্যতম, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার দৃষ্টিশক্তি কমে গেছে। আমি আমার কওমের ইমামতি করি। যখন বৃষ্টি হয়, তখন আমার ও তাদের মধ্যবর্তী উপত্যকা প্লাবিত হয়। ফলে তাদের মসজিদে গিয়ে তাদের নিয়ে সালাত আদায় করা আমার পক্ষে সম্ভব হয় না। ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি চাই যে আপনি আমার ঘরে এসে সালাত আদায় করুন, যাতে আমি সেই স্থানটিকে সালাতের স্থান (মুসাল্লা) বানিয়ে নিতে পারি।" তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "ইনশাআল্লাহ আমি তা করব।" ইতবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: পরের দিন, যখন দিন কিছুটা চড়ে উঠলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। আমি তাকে অনুমতি দিলাম। তিনি বসার আগেই ঘরে প্রবেশ করলেন এবং বললেন: "তোমার ঘরের কোন জায়গাটিতে আমি সালাত আদায় করি, তা তুমি পছন্দ করো?" তিনি বললেন: আমি ঘরের এক কোণে তাঁর দিকে ইশারা করলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে তাকবীর বললেন। আমরাও দাঁড়ালাম এবং কাতারবদ্ধ হলাম। তিনি দু’রাকআত সালাত আদায় করলেন এবং সালাম ফিরালেন। (হাদীসের অবশিষ্ট অংশ কিতাবুল ঈমানে বিস্তারিতভাবে বর্ণিত আছে।)









আল-জামি` আল-কামিল (2299)


2299 - عن جابر قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفرٍ فمُطرنا فقال:"ليُصَلِّ من شاء منكم في رحله".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (698) من طريق زهير أبي خيثمة، قال: حَدَّثَنَا أبو الزُّبير، عن جابر فذكر الحديث.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে এক সফরে বের হলাম। অতঃপর আমরা বৃষ্টির সম্মুখীন হলাম। তখন তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে যে ইচ্ছা করে, সে যেন নিজ নিজ আস্তানায় সালাত আদায় করে নেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2300)


2300 - عن عمرو بن أوس يقول: أنبأنا رجل من ثقيف أنه سمع مُنادي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يعني في ليلة مَطيرةٍ في السفر يقول:"حيَّ على الصّلاة، حيَّ على الفلاح، صَلُّوا في رحالكم".

صحيح: رواه النسائيّ (653) عن قُتَيبة قال: حَدَّثَنَا سفيان، عن عمرو بن دينار، عن عمرو بن
أوس فذكر مثله. وإسناده صحيح، ولا يضر إبهام الرّجل فإنه صحابي.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (15433) عن أبي نعيم (وهو الفضل بن دكين) حَدَّثَنَا مسعر، عن عمرو بن دينار به مثله.




আমর ইবনু আওস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সাকীফ গোত্রের এক ব্যক্তি তাঁকে খবর দেন যে, সে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুআযযিনকে সফরের সময় বৃষ্টির এক রাতে (আযানে) বলতে শুনেছে: "হাইয়্যা 'আলাস-সালাহ, হাইয়্যা 'আলাল-ফালাহ (সাফল্যের জন্য এসো), তোমরা তোমাদের অবস্থানস্থলেই সালাত আদায় করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2301)


2301 - عن أبي المَليح قال: خرجتُ في ليلةٍ مطيرةٍ، فلمّا رجعتُ استفتحتُ فقال أبي:

من هذا؟ قال: أبو المَليح، قال: لقد رأيتُنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الحديبية، وأصابتْنا سماءٌ لم تَبُلَّ أسافِلُ نعالنا، فنادى مُنادي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلوا في رحالكم".

صحيح: رواه ابن ماجة (936) قال: حَدَّثَنَا أبو بكر بن أبي شيبة، قال: حَدَّثَنَا إسماعيل بن إبراهيم، عن خالد الحذاء، عن أبي قِلابة، عن أبي المَليح فذكر الحديث.

وهو في مصنف ابن أبي شيبة (2/ 234) ورواه أيضًا عن هُشَيم، عن خالد عنه به، وشك فيه كان ذلك عام الحديبية أو حُنين.

ورواه أبو داود (1059) من طريق سفيان بن حبيب قال: خبَّرنا عن خالد الحذاء به ولم يشك أن ذلك كان زمن الحديبية يوم الجمعة.

وصحَّح هذا الإسناد النوويّ وغيره. انظر:"الخلاصة" (2273).

وقوله:"خبَّرنا" هكذا بصيغة المعلوم، بمعني حَدَّثَنَا، ومن ضبط بصيغة المجهول فقد وهم، لأنه يكون الإسناد حينئذ منقطعًا، وقد صحَّح هذا الإسناد الحاكم في المستدرك (1/ 293)، ورواه شعبة، عن قتادة، عن أبي المليح عنه أن ذلك كان يوم حنين.

رواه أبو داود والنسائي (854) والإمام أحمد (20702) من طرق عنه، كما رواه أيضًا من طريق همام (وهو ابن يحيى العوذي) (20700) عن قتادة به مثله، ومن طريقه رواه أيضًا ابن خزيمة (1658) في صحيحه.

وقتادة وإن كان مدلسًا، ولكن رواية شعبة عنه تُبعد تهمةَ التدليس، لما اشتهر من قوله: كفيتكم تدليس ثلاثة: الأعمش، وقتادة، وأبي إسحاق.

وبهذه الطرق صحَّ كون ذلك وقع يوم حنين، واليقين لا يزول بالشك، كما وقع التصريح في بعض الروايات بأن ذلك كان يوم الجمعة، ولكن لم يظهر لي كان ذلك لصلاة الجمعة، أو لصلاة من صلوات يوم الجمعة، والقلب يميل إلى أن القصة وقعت لصلاة الجمعة.

ولكن يعكر هذا ما رواه ابن خزيمة (1657) من طريق مؤمّل بن هشام وزياد بن أيوب، كلاهما عن إسماعيل (وهو ابن علية) عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن أبي المليح قال: خرجت في ليلة مظلمة إلى المسجد لصلاة العشاء، فلمّا رجعت استفتحتُ فقال أبي: من هذا؟ قالوا: أبو مليح، قال: لقد رأيتنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم زمن الحديبية، وأصابتنا سماء لم تبل أسفل نعالنا. فنادى منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أن صلوا في رحاكم".
ورواه أيضًا أحمد (20704) عن عبد الرزّاق، أنا سفيان، عن خالد به مثله. فإن صَحَّ ذلك فيمكن حمله على الواقعتين يوم الحديبية ويوم حنين، ورجَّح بعض أهل العلم أن ذلك وقع يوم حنين بناءً على حديث الحسن عن سمرة الآتي.

ويؤيد أن ذلك كان يوم الجمعة ما ذكره ابن عباس عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال في يوم جمعة يوم مطر:"صلوا في رحالكم" رواه ابن ماجة (938) وفيه عباد بن منصور ضعيف.

وبوَّب أبو داود بقوله: باب الجمعة في اليوم المطير، وأخرج فيه حديث أبي المليح عن أبيه.

وأبو المليح: اسمه عامر بن أسامة، وقيل: زيد بن أسامة، وقيل أسامة بن عامر، وقيل: عمير بن أسامة، هذلي بصريّ، اتفق الشيخان على الاحتجاج بحديثه، وأبوه له صحبة، ويقال: إنه لم يرو عنه إِلَّا ابنه أبو المليح. كذا أفاد المنذري.




আবুল মালীহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক বৃষ্টির রাতে (বাইরে) গিয়েছিলাম। যখন আমি ফিরে এলাম এবং প্রবেশের জন্য অনুমতি চাইলাম (বা দরজায় করাঘাত করলাম), তখন আমার পিতা বললেন: কে এ? (আমি) বললাম: আবুল মালীহ। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হুদায়বিয়ার দিনে আমাদের দেখেছিলাম। আমাদের এমন বৃষ্টি স্পর্শ করেছিল যে তা আমাদের জুতার নিচের অংশও ভেজায়নি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘোষণাকারী ঘোষণা দিলেন: “তোমরা তোমাদের বাসস্থানে (বা অবস্থানস্থলে) সালাত আদায় করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (2302)


2302 - عن سمرة بن جندب قال: أصابتنا السماءُ، ونحن مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فنادى:"الصّلاة في الرِحال".

حسن: رواه الإمام أحمد (20170) عن معاذ بن هشام، قال: حَدَّثَنِي أبيّ، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة فذكر الحديث.

ورواه أيضًا البزّار"كشف الأستار" (برقم: 464).

والطَّبرانيّ في الكبير" (برقم: 6823) وأبو يعلى"إتحاف الخيرة" (1317) كلّهم من طرق عن معاذ بن هشام به مثله.

ورواه الإمام أحمد عن بهز، عن أبان (20093)، وهمام (20153) كلاهما عن قتادة، عن الحسن به وفيه التصريح بأن ذلك كان يوم حنين.

بهز هو: ابن أسد العمي ثقة ثبت من رجال الجماعة.

وهمام هو: ابن يحيى العَوذي ثقة من رجال الجماعة وإسناده صحيح غير أن قتادة مدلِّس وقد عنعن، ولكن ثبت في حديث أبي المليح، عن أبيه أن شعبة روى عنه هذا الحديث فالذي يظهر أن قتادة له شيخان: أبو المليح والحسن، وصحَّ في إحدى طرقه أن شعبة روى عنه، وبهذا تزول تهمة التدليس عن قتادة لما سبق من قوله.

وأمّا الحسن البصري فهو الإمام الفقيه المعروف، وفي صحيح البخاريّ وغيره أنه سمع حديث العقيقة من سمرة، وهذا لا خلاف فيه، وإنما الخلاف في سماعه منه غير حديث العقيقة، فذهب عليّ بن المديني والبخاري إلى سماعه مطلقًا، وسيأتي مزيد من التحقيق في حديث العقيقة.

وقال الهيثميّ في مجمعه (2/ 47) رواه أحمد والطَّبرانيّ في الكبير والبزّار بنحوه وزاد: كراهية أن يشق علينا. ورجال أحمد رجال الصَّحيح.

قلت: وأمّا البزّار فرواه بإسناد آخر وهو ضعيف جدًّا. قال: حَدَّثَنَا خالد بن يوسف، حَدَّثَنِي
أبي يوسف بن خالد، ثنا جعفر بن سعد بن سمرة، ثنا خبيب بن سليمان، عن أبيه سليمان بن سمرة، عن سمرة بن جندب فذكر أحاديث بهذا الإسناد.

ويوسف بن خالد بن عمير السَمْتي تركوه، وكذَّبه ابن معين.

ورواه أيضًا الطبرانيّ في الكبير (7080) من طريق جعفر بن سعد به مثله.

وجعفر بن سعد بن سمرة"ليس بالقوي" كما قال الحافظ في التقريب.

وجعفر بن سعد بن سمرة، عن خبيب بن سليمان اسناد مظلم، كما في الميزان (1/ 408).

وفي الباب ما رُوي عن نُعيم بن النَّحام، قال: نُودي بالصبح في يوم بارد وأنا في مِرْط امرأتيّ، فقلت: ليت المنادي قال: من قعد فلا حرج عليه. فنادى منادي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في آخر آذانه:"من قعد فلا حرج عليه".

رواه الإمام أحمد (17943) عن عليّ بن عَيَّاش، حَدَّثَنَا إسماعيل بن عَيَّاش، قال: حَدَّثَنِي يحيى بن سعيد، قال: أخبرني محمد بن يحيى بن حبّان، عن نُعيم بن النحام، فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل إسماعيل بن عَيَّاش فإنه ثقة عن الشاميين، وضعيف عن غيرهم، وهذا منها، فإنَّ يحيى بن سعيد الأنصاري مدني.

ثمّ هو خولف، فرواه البيهقيّ (1/ 398، 423) وغيره عن الأوزاعيّ، عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث، عن نعيم.

ومحمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي لم يسمع من نعيم كما قال ابن عبد البر في"الاستيعاب":"ما أظنه سمع من نعيم". وله أسانيد أخرى وكلّها معلّلة.




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ছিলাম, তখন আমাদের ওপর বৃষ্টি নেমে আসে। তিনি তখন ঘোষণা করেন, “তোমরা যার যার অবস্থানস্থলে (ঘরে) সালাত আদায় করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (2303)


2303 - عن محمود بن الربيع الأنصاري أَنَّ عِتبان بن مالك، وهو من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم ممن شهد بدرًا من الأنصار أنه أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! قد أنكرتُ بَصَرِي وأنا أصلِّي لِقَوميّ، فإذا كانتِ الأمطارُ سالَ الوادي الذي بَيني وبينهم لم أستَطِع أن آتي مسجدهم فأُصلِّي بهم. وودِدْتُ يا رسول الله! أنَّكَ تأتيني فتُصَلِّي في بَيتي فأَتخَذَهُ مُصلًّى. قال: فقال له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"سأفعلُ إن شاء الله".

قال عِتبانُ: فغدا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر حينَ ارتَفَعَ النهارُ فاستأذَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فأَذِنتُ له، فلم يجلسْ حتَّى دخلَ البيتَ ثمّ قال:"أينَ تُحِبُّ أن أصلِّيَ من بَيتِكَ؟ ، قال: فأشرتُ له إلى ناحيةٍ من البيت، فقام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فكبَّرَ، فقُمنا فصفَفْنا فصلَّى رَكعتَينِ ثمّ سلَّمَ، فذكر الحديث كما مضى في الباب السابق.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (425)، ومسلم في المساجد (263) كلاهما من طريق
ابن شهاب، قال: أخبرني محمود بن الربيع فذكر مثله، واللّفظ للبخاريّ.

قال البخاريّ: وصلَّى البراء بن عازب في مسجده في داره جماعةً.

قال الحافظ في"الفتح": هذا الأثر أورده ابن أبي شيبة معناه في قصة".




ই'তবান ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের একজন এবং আনসারদের মধ্যে যারা বদর যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন তাদের অন্তর্ভুক্ত— তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমার দৃষ্টিশক্তি কমে গেছে। আমি আমার কওমের লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করি। যখন বৃষ্টি হয়, তখন আমার ও তাদের মধ্যবর্তী ওয়াদী (উপত্যকা) পানিতে ভরে যায়। তখন আমি তাদের মসজিদে গিয়ে তাদের নিয়ে সালাত আদায় করতে পারি না। হে আল্লাহর রাসূল! আমার একান্ত আকাঙ্ক্ষা, আপনি আমার কাছে আগমন করুন এবং আমার ঘরে সালাত আদায় করুন, যাতে আমি সেই স্থানটিকে মুসাল্লা (সালাতের স্থান) হিসাবে গ্রহণ করতে পারি।" তিনি (ই'তবান) বললেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "ইনশাআল্লাহ আমি তা করব।"

ই'তবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন দিন কিছুটা উঁচু হলো (সকাল শেষ হলো), তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার বাড়িতে আগমন করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। আমি তাঁকে অনুমতি দিলাম। তিনি বসার আগেই ঘরের ভেতরে প্রবেশ করলেন। এরপর বললেন: "তোমার ঘরের কোন জায়গায় আমি সালাত আদায় করি, তা তুমি পছন্দ কর?" তিনি (ই'তবান) বললেন: তখন আমি ঘরের এক কোণে ইশারা করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং তাকবীর দিলেন। আমরাও দাঁড়ালাম এবং কাতার বাঁধলাম। তিনি দু'রাকাআত সালাত আদায় করলেন এবং সালাম ফিরালেন। এরপর পূর্ববর্তী পরিচ্ছেদে যেমন বর্ণনা করা হয়েছে, তিনি সে হাদীসটি উল্লেখ করলেন।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। হাদীসটি বর্ণনা করেছেন বুখারী সালাত অধ্যায়ে (৪২৫) এবং মুসলিম মাসাজিদ অধ্যায়ে (২৬৩)। উভয়েই ইবনু শিহাব-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি (ইবনু শিহাব) বলেন: আমাকে মাহমুদ ইবনু আর-রাবী' খবর দিয়েছেন, অতঃপর তিনি অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আর শব্দগুলো বুখারীর।

ইমাম বুখারী বলেছেন: আল-বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিজের বাড়িতে তাঁর মসজিদে জামা'আতের সাথে সালাত আদায় করেছেন।

আল-হাফিয (ইবনু হাজার আসকালানী) ‘ফাতহুল বারী’ গ্রন্থে বলেছেন: ইবনু আবী শাইবা ঘটনাটির অর্থসহ এই আছারটি (বর্ণনাটি) উল্লেখ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2304)


2304 - عن أبي هريرة: أن رجلًا من الأنصار أرسل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تعالَ فخُطَّ لي مسجدًا في داري أصَلِّي فيه. وذلك بعد ما عَمِيّ، فجاء ففعل.

حسن: رواه ابن ماجة (750) عن يحيى بن الفَضْل الخرقيّ، قال: حَدَّثَنَا أبو عامر، قال: حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن عاصم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه ابن حبان (4798) من طريق حمّاد بن سلمة في حديث طويل.

قال البوصيري في زوائد ابن ماجة:"هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات، والرجل المبهم في هذا الحديث هو عِتبان بن مالك، وهو في الصحيحين، والنسائي من حديث عتبان بن مالك" انتهى.

قلت: رجاله ثقات غير عاصم وهو: ابن أبي النجود فقد تكلم في حفظه غير أنه حسن الحديث. وهو من رجال الجماعة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক আনসারী ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এই মর্মে বার্তা পাঠালেন যে, আপনি আসুন এবং আমার বাড়িতে আমার জন্য একটি মাসজিদ চিহ্নিত করে দিন, যেখানে আমি সালাত (নামায) আদায় করব। আর এই ঘটনাটি ঘটেছিল যখন তিনি (ওই আনসারী ব্যক্তি) অন্ধ হয়ে গিয়েছিলেন। অতঃপর তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং তা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2305)


2305 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قُدِّم العَشَاءُ، فابدءوا به قبل أن تُصلوا صلاة المغرب، ولا تعجلوا عن عَشائِكم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأذان من طريق عُقيل (672)، ومسلم في المساجد من طريق عمرو بن الحارث (557) كلاهما من حديث ابن شهاب الزّهريّ، قال: حَدَّثَنِي أنس بن مالك فذكر الحديث.

ولكن زاد ابن حبان (2068)، والطحاوي في"مشكله" (1992) كلاهما من حديث موسى بن أعين، عن عمرو بن الحارث به"وأحدكم صائم"، ومسلم أخرج الحديث المذكور من طريق ابن وهب، عن عمرو بن الحارث ولم يذكر هذه الزيادة. فالظاهر أن الذي زادها هو موسى بن أعين.

وقد نصَّ الطبرانيّ في الأوسط أن موسى بن أعين تفرّد بها.

قال الحافظ في"الفتح" (2/ 160):"موسى ثقة متفق عليه".

قلت: واستدل الطحاويّ بهذه الزيادة بأن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إنّما قصد بهذا القول الصُوَّام دون من سواهم. والله تعالى أعلم.

وقوله:"لا تعجلوا عن عشائكم" - أي يأكل حاجته من الأكل بكماله كما جاء توضيح ذلك في حديث ابن عمر.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন রাতের খাবার পরিবেশন করা হয়, তখন তোমরা মাগরিবের সালাত আদায়ের পূর্বে তা দিয়ে শুরু করো। আর তোমরা তোমাদের রাতের খাবার থেকে তাড়াহুড়া করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2306)


2306 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا وُضع عَشاءُ أحدِكم، وأقيمتِ الصّلاةُ فابدأوا بالعَشاءِ، ولا يعجلْ حتَّى يفرغَ منه".
وكان ابن عمر يُوضعُ له الطعامُ، وتُقام الصلاةُ، فلا يأتيها حتى يفرغَ، وإنه ليسمعُ قراءة الامام.

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (673)، ومسلم في المساجد (559) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم:"ولا يعجل حتى يفرغ منه".




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কারো রাতের খাবার (আশা) পরিবেশন করা হয় এবং সালাতের জন্য ইকামত দেওয়া হয়, তখন তোমরা খাবার দিয়েই শুরু করো। আর সে যেন তাড়াহুড়ো না করে, যতক্ষণ না সে তা শেষ করে।"
আর ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য যখন খাবার পরিবেশন করা হতো এবং সালাতের জন্য ইকামত দেওয়া হতো, তখন তিনি তা শেষ না করা পর্যন্ত সালাতে যেতেন না, এমনকি তিনি ইমামের কিরাত শুনতে পেতেন তবুও (তিনি অপেক্ষা করতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (2307)


2307 - عن عائشة قالت: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا وُضع العَشاءُ، وأقيمتِ الصلاةُ فابدأوا بالعَشاء".

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (671)، ومسلم في المساجد (558) كلاهما من طريق هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته، واللفظ للبخاري.

ولم يذكر مسلم لفظه، وإنما أحال على حديث الزهري، عن أنس.

ورواه مسلم عن محمد بن عبَّاد، ثنا حاتم (وهو ابن إسماعيل) عن يعقوب بن مجاهد، عن ابن أبي عتيق، قال: تحدثتُ أنا والقاسم عند عائشة حديثًا، وكان القاسم رجلًا لَحَّانة فذكر قصة غضبه وذهابه إلى الصلاة، وقد وُضعتِ المائدةُ. فقالت عائشة إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا صلاة بحضرة الطعام، ولا هو يدافعه الأخبثان". وسبق تخريجه في كتاب الطهارة وسيأتي أيضًا.

قال البغوي:"هذا إذا كانت نفسه، شديدةً التوقان إلى الطّعام، وكان في الوقت سعة، فأما إذا كان متماسكًا في نفسه لا يُزْعِجُه الجوعُ، ولا تنازعه شهوةُ الطعام، فلا يُعجِلْه عن إيفاء حق الصلاة، فيبدأ بالصلاة فإن النبي صلى الله عليه وسلم كان يحتزُّ من كَتِفِ شاةٍ، فدُعي إلى الصلاة، فألقاها، ثم قام فصلَّى"."شرح السنة" (3/ 356 - 357).

قلت: الحديث الذي ذكره البغوي متفق عليه، انظر تخريجه في كتاب الطهارة.

وأما ما روي عن جابر قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لا يُؤخِّرُ الصلاة لطعام، ولا لغيره، فهو ضعيف، رواه أبو داود (3758) حدثنا محمد بن حاتم بن بزيغ، حدثنا معلي - يعني ابن منصور، عن محمد بن ميمون، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر بن عبد الله فذكر الحديث.

وفيه محمد بن ميمون الزعفراني أبو النضر قال فيه البخاري وأبو داود، والنسائي: منكر الحديث، وقال الإمام أحمد: حديثه ليس بالقائم. وقال ابن حبان: منكر الحديث جدًّا لا يحل الاحتجاج به. وأما ابن معين فقال: ثقة. ومن علم حجة على من لم يعلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যখন রাতের খাবার পরিবেশন করা হয় এবং সালাতের ইক্বামত দেওয়া হয়, তখন তোমরা খাবার দিয়েই শুরু করো।"

তিনি আরও বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "খাদ্যের উপস্থিতিতে কোনো সালাত নেই, আর এমন অবস্থায়ও (সালাত নেই) যখন সে দুই অপবিত্রতা (পেশাব-পায়খানা) রোধ করে থাকে।"