আল-জামি` আল-কামিল
2328 - عن أم سلمة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"خير مساجد النساء قعر بيوتهن".
حسن: رواه أحمد (26542، 26570)، وأبو يعلى (7025)، والطبراني في الكبير (23/ 709)، وابن خزيمة (1683)، والحاكم (1/ 209)، والبيهقي (3/ 131) كلهم من طرق عن السائب مولى أم سلمة، عن أم سلمة.
وإسناده حسن من أجل السائب بن عبد الله مولى أم سلمة، وثّقه ابن حبان، وليس في حديثه ما ينكر عليه، بل له أصل كما مضى فيحسّن حديثه.
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "মহিলাদের জন্য সর্বোত্তম মসজিদ (সালাতের স্থান) হলো তাদের ঘরের ভেতরের অংশ।"
2329 - عن * *
২২২৯ - হতে বর্ণিত * *
2330 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله قال: من عادَى لي وليًّا فقد آذنتُه بالحرب، وما تقرب إليَّ عبدي بشيء أحبَّ إليَّ مما افترضتُ عليه، وما يزال عبدي يتقرب إلي بالنوافل حتَّى أحِبَّه، فإذا أحببتُه كنت سَمْعَه الذي يسمع به، وبصرَه الذي يُبصر به، ويَده التي يبطِشُ بها، ورجلَه التي يمشِي بها، وإن سألني لأُعْطِينَّه، ولئِن استعاذني لأعِيذنَّه، وما ترددتُّ عن شيء أنا فاعله ترددِي عن نفس المؤمن، يكره الموتَ، وأنا أكره مساءتَه".
صحيح: رواه البخاري في الرقاق (6502) عن محمد بن عثمان، حدثنا خالد بن مَخْلد، حدثنا سليمان بن بلال، حدثني شريك بن عبد الله بن أبي نمر، عن عطاء، عن أبي هريرة فذكر مثله.
انفرد البخاري في إخراج هذا الحديث وفي إسناده خالد بن مَخْلد وهو: القطواني الكوفي أبو الهيثم تكلم فيه غير واحد من أهل العلم قال أحمد: له مناكير، وقال ابن سعد: منكر الحديث مفرط في التشيع.
قال أبو حاتم: يكتب حديثه ولا يحتج به. ولكن قال يحيى وغيره: لا بأس به.
وساق له ابن عدي عدة أحاديث وليس فيها حديث أبي هريرة هذا، وقال: لا بأس به إن شاء الله.
وشدَّد فيه الحافظ الذهبي في ترجمته في"الميزان" فبعد أن ذكر أقوال أهل العلم في خالد بن مخلد، ثم ذكر حديث أبي هريرة ثم قال:"فهذا حديث غريب جدًّا، لولا هية الجامع الصحيح لعدُّوه في منكرات خالد بن مخلد، وذلك لغرابة لفظه، ولأنه مما ينفرد به شريك، وليس بالحافظ، ولم يُرو هذا المتن إلا بهذا الإسناد، ولا خرَّجه من عدا البخاريّ، ولا أظنه في مسند أحمد، وقد اختلف في عطاء، فقيل: هو ابن أبي رباح، والصحيح أنه عطاء بن يسار".
وتعقبه الحافظ في"الفتح" (11/ 341) فقال: ليس هو في مسند أحمد جزمًا، وإطلاق أنه لم يُرو هذا المتن إلا بهذا الإسناد مردود، ثم قال: وللحديث طرق أخرى بدل مجموعها على أن له أصلا" وهو يقصد بالطرق هنا الشّواهد، لأنه لم يذكر طريقًا لحديث أبي هريرة.
وأما الشواهد التي ذكرها فهي عن عائشة، وأبي أمامة، وعلي، وابن عباس، وأنس، وحذيفة، ومعاذ بن جبل، وفي كل منها مقال ولذا تجاوزت عنها ولم أذكرها، ولكن يثبت من هذه الشواهد
الضّعيفة بأن حديث أبي هريرة الذي أخرجه البخاري له أصل كما قال الحافظ.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা বলেছেন: যে ব্যক্তি আমার কোনো অলীর (বন্ধুর) সাথে শত্রুতা পোষণ করে, আমি তার বিরুদ্ধে যুদ্ধ ঘোষণা করি। আমার বান্দার প্রতি আমি যা ফরয করেছি, তা দ্বারা সে আমার নৈকট্য লাভ করার চেয়ে প্রিয় আর কোনো কিছু দ্বারা আমার নৈকট্য লাভ করেনি। আমার বান্দা নফল ইবাদতের মাধ্যমে আমার নৈকট্য লাভ করতে থাকে, যতক্ষণ না আমি তাকে ভালোবাসি। যখন আমি তাকে ভালোবাসি, তখন আমি তার সেই শ্রবণশক্তি হয়ে যাই, যা দিয়ে সে শোনে; তার সেই দৃষ্টিশক্তি হয়ে যাই, যা দিয়ে সে দেখে; তার সেই হাত হয়ে যাই, যা দিয়ে সে আঘাত করে; এবং তার সেই পা হয়ে যাই, যা দিয়ে সে হাঁটে। যদি সে আমার কাছে কিছু চায়, তবে আমি অবশ্যই তাকে তা দান করি; আর যদি সে আমার কাছে আশ্রয় চায়, তবে আমি অবশ্যই তাকে আশ্রয় দেই। আমি যা কিছু করার ইচ্ছা করি, তার মধ্যে মুমিন বান্দার জান কবজ করার বিষয়ে যে দ্বিধা অনুভব করি, অন্য কিছুতে সে দ্বিধা অনুভব করি না। কারণ সে মৃত্যুকে অপছন্দ করে, আর আমিও তাকে কষ্ট দেওয়া অপছন্দ করি।
2331 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ بقبرٍ فقال:"من صاحب هذا القبر؟" فقالوا: فلان. فقال:"ركعتان أحب إلى هذا من بقية دنياكم".
حسن: رواه الطبراني في"الأوسط" (924) عن أحمد قال: حدثنا حفص بن عبد الله الحلواني، قال: حدثنا حفص بن غياث، عن أبي مالك الأشجعي عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكر مثله.
إسناده حسن لأجل حفص بن عبد الله الحلواني فإنه صدوق، وبقية رجاله ثقات.
وأحمد شيخ الطبراني هو: أحمد بن يحيى الحلواني أبو جعفر البجلي ثقة توفي سنة 296 هـ، انظر تاريخ بغداد (5/ 212)، وشذرات الذهب (2/ 224).
وأبو حازم هو: سلمان الكوفي من رجال الجماعة، وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 249):"رواه الطبراني في الأوسط ورجاله ثقات".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন: "এই কবরের অধিবাসী কে?" তারা বলল: "অমুক।" তিনি বললেন: "এই ব্যক্তির কাছে তোমাদের অবশিষ্ট দুনিয়ার চেয়েও দু'রাকাত (সালাত/নামায) অধিক প্রিয়। "
2332 - عن زيد بن ثابت قال: احتجر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حُجيرةً بخصَفَةٍ أو حصيرٍ، فخرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي فيها. قال: فتتبع إليه رجال، وجاؤُا يُصلون بصلاته، قال: ثم جاؤا ليلةً فحضروا. وأبْطأَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عنهم، قال: فلم يخرج إليهم، فرفعوا أصواتهم، وحصبوا البابَ، فخرج إليهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مغضبًا فقال لهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"ما زال بكم صنيعُكم حتَّى ظننتُ أنه سيكتبُ عليكم. فعليكم بالصلاة في بيوتكم، فإن خيرَ صلاةِ المرءِ في بيته إلا الصلاةَ المكتوبةَ".
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (731)، ومسلم في صلاة المسافرين (781) كلاهما من طريق سالم أبي النضْر مولى عمر بن عبد الله، عن بُسْر بن سعيد، عن زيد بن ثابت فذكره، واللفظ لمسلم.
وفي لفظ البخاري: وذلك في رمضان، فصلى فيها لياليَ، فصلَّى بصلاته ناس من أصحابه، فلما علم ذلك جعل يقعدُ، فخرج إليهم فقال" فذكر مثله.
যায়দ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খেজুরের ডাল বা চাটাই দ্বারা একটি ছোট কক্ষ তৈরি করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার মধ্যে (রাতে) নামায আদায়ের জন্য বের হলেন। তিনি (যায়দ) বলেন: লোকেরা তাঁর অনুসরণ করে সেখানে আসলেন এবং তাঁর সাথে নামাযে শরীক হলেন। তিনি বলেন: এরপর তাঁরা (এক) রাতে আসলেন এবং উপস্থিত হলেন। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের কাছে বের হতে বিলম্ব করলেন। তিনি বলেন: অতঃপর তিনি তাদের কাছে বের হলেন না, তাই তারা তাদের কণ্ঠস্বর উচ্চ করলেন এবং দরজায় ছোট পাথর নিক্ষেপ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাগান্বিত অবস্থায় তাদের কাছে বের হয়ে আসলেন এবং তাদের বললেন: "তোমাদের এই কাজটি তোমাদের এমনভাবে লেগে থাকার অভ্যাস সৃষ্টি করেছে যে, আমার মনে হলো তা তোমাদের উপর ফরয করে দেওয়া হবে। অতএব, তোমরা তোমাদের নিজ নিজ ঘরে সালাত আদায় করো। কেননা, ফরয সালাত ব্যতীত ব্যক্তির শ্রেষ্ঠ সালাত হলো তার নিজ ঘরে আদায়কৃত সালাত।"
2333 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اجعلوا في بيوتكم من صلاتكم، ولا تتخذوها قبورا".
متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (432)، ومسلم في صلاة المسافرين (777) كلاهما من حديث يحيى، عن عبد الله، قال: أخبرني نافع، عن ابن عمر فذكر مثله ولفظهما سواء.
ويحيى هو: ابن سعيد القطان.
وعبد الله هو: ابن عمر بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب المدني.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা তোমাদের ঘরের মধ্যে তোমাদের সালাতের কিছু অংশ আদায় করো, আর সেগুলোকে কবর বানিও না।"
2334 - عن أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"مثلُ البيتِ الذي يُذكرُ اللهُ فيه، والبيتِ الذي لا يُذكرُ الله فيه، مثلُ الحي والميت".
متفق عليه: رواه البخاري في الدعوات (6407)، ومسلم في صلاة المسافرين (779) كلاهما عن محمد بن العلاء، حدثنا أبو أسامة، عن بُريد بن عبد الله، عن أبي بُرْدة، عن أبي موسى، فذكره واللفظ لمسلم.
وأما لفظ البخاري:"مثلُ الذي يذكر ربه، والذي لا يذكر ربه مثلُ الحي والميت".
قال الحافظ:"هكذا وقع في جميع نسخ البخاري، وأخرجه مسلم عن أبي كريب وهو: محمد بن العلاء شيخ البخاري فيه بسنده المذكور بلفظ"مثل البيت الذي بذكر الله فيه، والبيت الذي لا يذكر الله فيه مثل الحي والميت" وكذا أخرجه الإسماعيلي وابن حبان (854) في صحيحه جميعًا عن أبي يعلى، عن أبي كريب، وكذا أخرجه أبو عوانة، عن أحمد بن عبد الحميد، والإسماعيلي أيضا عن الحسن بن سفيان، عن عبد الله بن براد، وعن القاسم بن زكريا، عن يوسف بن موسى وإبراهيم بن سعيد الجوهري وموسى بن عبد الرحمن المسروقي والقاسم بن دينار، كلهم عن أبي أسامة. فتوارد هؤلاء على هذا اللفظ يدل على أنه هو الذي حدَّث به بُريد بن عبد الله شيخ أبي أسامة، وانفراد البخاري باللفظ المذكور دون بقية أصحاب أبي كريب وأصحاب أبي أسامة يُشعر بأنه رواه من حفظه، وتجوَّز في روايته ..""الفتح" (11/ 210).
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ঘরে আল্লাহকে স্মরণ করা হয় এবং যে ঘরে আল্লাহকে স্মরণ করা হয় না, তার উদাহরণ হলো জীবিত ও মৃতের মতো।"
2335 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تجعلوا بيوتكم مقابر. إن الشيطان يَنْفِرُ من البيت الذي تُقرأ فيه سورةُ البقرة".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (780) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا يعقوب (وهو: ابن عبد الرحمن القاري) عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের ঘরকে কবর বানিয়ো না। নিশ্চয়ই শয়তান সেই ঘর থেকে পালায়, যেখানে সূরা আল-বাক্বারাহ তিলাওয়াত করা হয়।"
2336 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قضى أحدكم الصلاة في مسجده، فليجعلْ لبيته نصيبًا من صلاته، فإن الله جاعل في بيته من صلاته خيرًا".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (778) عن أبي بكر بن أبي شيبة وغيره عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.
وكذلك رواه عبد الواحد بن زياد، عن الأعمش.
ورواه سفيان الثوري، عن الأعمش فجعله من مسند أبي سعيد كما سيأتي.
وعن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قضى أحدكم صلاتَه في المسجد فليجعل لبيته نصيبًا من صلاته، إن الله جاعل في بيته من صلاته خيرًا".
صحيح: رواه ابن ماجه (1376) عن محمد بن بشار وغيره، عن عبد الرحمن بن مهدي، قال: حدثنا ـ
سفيان، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر بن عبد الله، عن أبي سعيد الخدري، فذكر مثله.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (11567) عن عبد الرزاق، وهو في مصنفه (4837)، عن سفيان، فذكر مثله.
وصحّحه ابن خزيمة (1206)، ورواه من طريق عبد الرحمن بن مهدي وقال:"روي هذا الخبر أبو خالد الأحمر وأبو معاوية وعبدة بن سليمان وغيرهم، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، ولم يذكروا أبا سعيد".
قلت: وهو يشير إلى بعض طرق الحديث الذي أخرجه مسلم كما سبق، وكله صحيح. فالذي يظهر أن جابر بن عبد الله مرة كان يروي عن أبي سعيد، وأخرى عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مباشرة بدون ذكر أبي سعيد وهو أمر كان معروفًا عند الصّحابة رضي الله عنهم جميعًا.
ولحديث أبي سعيد الخدري طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها منها ما رواه الإمام أحمد (11112) من طريق ابن لَهيعة، حدثنا أبو الزبير، عن جابر، عن أبي سعيد، فذكر مثله إلا بزيادة:"فليصل في بيته ركعتين" وابن لهيعة فيه كلام معروف ولعل هذه الزيادة من تخليطه.
ومنها ما رواه أبو يعلى (1408) عن سفيان بن وكيع، حدثنا أبي، عن عبيد الله بن أبي حُميد، عن أبي مليح قال: حدثني أبو سعيد الخدري قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث. وإسناده ضعيف، سفيان بن وكيع بن الجراح متكلم فيه، قال البخاري: يتكلمون فيه، وقال النسائي: ليس بثقة.
ويقال: إن السبب في ذلك أنه ابتلي بوراقه، فأدخل عليه ما ليس من حديثه، فنُصح فلم يقبل، فسقط حديثه.
وأبو المليح بن أسامة لم يسمع من أبي سعيد.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার মসজিদে সালাত (নামাজ) শেষ করে, তখন সে যেন তার সালাতের একটি অংশ তার ঘরের জন্য রাখে। কেননা আল্লাহ তার সেই সালাতের মাধ্যমে তার ঘরে কল্যাণ সৃষ্টি করেন।"
2337 - عن عبد الله بن سعد قال: سألت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم: أيهما أفضل؟ الصلاة في بيتي أو الصلاة في المسجد؟ قال:"ألا ترى إلى بيتي؟ ما أقربه من المسجد! فلأن أصلي في بيتي أحبُّ إلي من أن أصلي في المسجد إلا أن تكون صلاة مكتوبةً".
حسن: رواه ابن ماجه (1378) عن أبي بشر بكر بن خلف، قال: حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، عن معاوية بن صالح، عن العلاء بن الحارث، عن حرام بن حكيم، عن عمه عبد الله بن سعد فذكر مثله وأخرجه ابن خزيمة (1202) من طريق عبد الرحمن به مثله. وسبق ذكر هذا الإسناد في كتاب الحيض باب مؤاكلة الحائض وسؤرها.
ويُروى بهذا الإسناد مطولًا ومختصرًا، وقد جمع الإمام أحمد الأمور كلها في مسند عبد الله بن سعد (19007)، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، عن معاوية - يعني ابن صالح -، عن العلاء - يعني ابن الحارث -، عن حَرَام بن حكيم، عن عمِّه عبد الله بن سَعْد: أنَّه سأل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عما يوجب
الغُسْلَ، وعن الماء يكون بعد الماء، وعن الصلاة في بيتي، وعن الصَّلاة في المسجد، وعن مُؤَاكلَةِ الحائض. فقال:"إنَّ الله لا يَستَحي من الحق، أما أنا فإذا فَعَلْتُ كذا وكذا" فذكر الغُسْلَ، قال:"أتَوَضَّأ وُضُوئِي لِلصَّلاةِ أغْسِلُ فَرْجِي" ثم ذكر الغُسل، فأغسلُ من ذلك فَرْجي وأتَوَضَّأ، وأمَّا الصلاةُ في المسجد والصلاةُ في بيتي، فقد تَرَى ما أقْرَب بَيْتي منَ المَسْجد، ولأن أصَلِّي في بَيْتي أحَبُّ إليَّ من أن أُصَلِّي في المسجد إلا أن تكون صلاة مكتوبة، وأمَّا مُؤاكلةُ الحائِض فواكِلْها".
واختلف في اسم والد حرام، فقيل هو: حكيم، كما في هذه الرواية، وقيل: معاوية، فظن بعض من ترجم له أنه اثنان، والصواب هما واحد كما نبَّه عليه الخطيب في"موضع أوهام الجمع والتفريق" والحافظ في التقريب في ترجمة"حرام بن حكيم" غير أنه لا يرتقي إلى درجة"ثقة" كما قال الحافظ، ولذا حسَّنه لما فيه من كلام خفيف.
আব্দুল্লাহ ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: কোনটি উত্তম? আমার ঘরে সালাত (নামাজ) আদায় করা, নাকি মসজিদে সালাত (নামাজ) আদায় করা? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কি আমার ঘরের দিকে তাকাও না? এটি মসজিদের কত নিকটবর্তী! আমি যদি আমার ঘরে সালাত আদায় করি, তা আমার নিকট মসজিদে সালাত আদায় করার চেয়ে বেশি প্রিয়, তবে যদি তা ফরয সালাত (নামাজ) হয় (তবে মসজিদে আদায় করতে হবে)।"
2338 - عن محمود بن لبيد أخي بني عبد الأشهل قال: أتانا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فصلَّى بنا المغرب في مسجدنا. فلما سلَّم منها قال:"اركعوا هاتين الركعتين في بيوتكم" للسبحة بعد المغرب.
حسن: رواه أحمد (23624) عن يعقوب، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عاصم بن عمر بن قتادة الأنصاري، عن محمود بن لبيد، فذكره.
وإسناده حسن لأجل محمد بن إسحاق، فإنه صرَّح بالتحديث، ورواه ابن خزيمة (1200) من طريق محمد بن إسحاق إلا أنه لم يصرح فيه بالتحديث.
ورواه ابن ماجه (1165) من طريق إسماعيل بن عياش، عن ابن إسحاق به مثله.
وفيه شيخ ابن ماجه وهو: عبد الوهاب بن الضحاك متروك كذَّبه أبو حاتم: وقال أبو داود: كان يضع الحديث.
ورواية إسماعيل بن عياش عن غير الشاميين ضعيفة.
وقد صحَّ عن عائشة وابن عمر وغيرهما أنه صلى الله عليه وسلم كان يصلي ركعتين بعد المغرب في البيت.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن سعد بن إسحاق بن كعب بن عُجرة، عن أبيه، عن جده قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة المغرب في مسجد بني عبد الأشهل، فلما صَلَّى قام ناس يتنفلون، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"عليكم بهذه الصلاة في البيوت".
رواه أبو داود (1300)، والترمذي (604)، والنسائي (1600) كلهم عن ابن أبي الوزير، قال: حدثنا محمد بن موسى الفطري، عن سعد بن إسحاق عن كعب فذكر مثله.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا ابن خزيمة في صحيحه (1201) وفيه إسحاق بن كعب بن عجرة مجهول الحال، لم يوثقه غير ابن حبان.
ولذا قال الترمذي: حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، والصحيح ما رُوي عن ابن عمر
قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الركعتين بعد المغرب في بيته.
وفي الباب عن زيد بن خالد الجهني، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تتخذوا بيوتكم قبورًا، صلوا فيها".
رواه الإمام أحمد (17030)، والطبراني في الكبير (5278 - 5280) كلاهما من طريق عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن زيد بن خالد الجهني فذكر مثله، وإسناده ضعيف لأجل الانقطاع فإن عطاء هو: ابن أبي رباح لم يسمع من زيد بن خالد كما قال ابن المديني"جامع التحصيل" (237).
ولعطاء بن أبي رباح عن زيد بن خالد حديث سيأتي في كتاب الصوم.
وكذلك ما رُوي عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"اجعلوا من صلاتكم في بيوتكم، ولا تجعلوها عليكم قبورًا" فالصواب فيه أنه مرسل، رواه مالك في قصر الصلاة (73) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.
ورواه ابن لهيعة قال: حدثنا أبو الأسود، عن عروة، عن عائشة. وابن لهيعة ممن اختلط والراوي عنه حسن بن موسى الأشيب وهو ممن روى عنه بعد الاختلاط، ومن طريقه رواه الإمام أحمد (24366) ورواه أبو يعلى (4867) عن عبد الرحمن بن صالح، عن عبد الرحيم بن سليمان، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة ولفظه"اجعلوا من صلاتكم في بيوتكم".
وعبد الرحمن بن صالح هو: الأزديّ العَتَكي"صدوق يتشيع" كما في التقريب.
قال الدارقطني: والصحيح عن هشام، عن أبيه مرسلًا.
ونقل عبد الرحمن بن أبي حاتم عن أبيه قال: لا يقولون في هذا الحديث: عن عائشة"العلل" (1/ 135).
وأبو الأسود هو: محمد بن عبد الرحمن بن نوفل، يقال له: يتيم عروة.
মাহমুদ ইবনু লাবিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি ছিলেন বানী আব্দুল আশহাল গোত্রের ভাই। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট আসলেন এবং আমাদের মসজিদে আমাদের নিয়ে মাগরিবের সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাম ফিরালেন, তখন বললেন: "তোমরা এই দু'রাক'আত (নফল) তোমাদের ঘরে আদায় করো।" (এটি ছিল মাগরিবের পরের নফল সালাতের জন্য)।
2339 - عن أم حبيبة قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صلى اثنتي عشرة ركعة في يوم وليلة بُني له بهن بيتٌ في الجنة".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (728) عن محمد بن عبد الله بن نُمير، حدثنا أبو خالد (سليمان بن حيَّان) عن داود بن أبي هند، عن النعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، قال: حدثني عَنْبَسةُ بن أبي سفيان في مرضه الذي مات فيه بحديث يُتَسارُّ إليه قال: سمعت أم حبية تقول، فذكرت الحديث.
قالت أم حبيبة: فما تركتهن منذ سمعتُهن من رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال عَنْبسةُ: فما تركتهن منذ سمعتُهن من أم حبيبة.
وقال عمرو بن أوس: ما تركتهن منذ سمعتهن من عَنْبَسَة.
وقال النعمان بن سالم: ما تركتهن منذ سمعتهن من عمرو بن أوس.
وفي رواية بشر بن المفضل عن داود: ثنتي عشرة سجدة تطوعًا.
وفي رواية شعبة عن النعمان بن سالم: غير فريضة.
هكذا رواه أيضًا أبو داود (1250) من طريق ابن علية، ثنا داود بن أبي هند به مثله بدون تفصيل.
ورواه الترمذي (415) من حديث سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، عن المسيب بن رافع، عن عنبسة بن أبي سفيان عنها مبينًا فقال في حديثه:"أربعًا قبل الظهر، وركعتين بعدها، وركعتين بعد المغرب، وركعتين بعد العشاء، وركعتين قبل صلاة الفجر". قال الترمذي: حسن صحيح.
قلت: وهو كما قال فإن أبا إسحاق وإن كان قد اختلط ولكن سفيان الثوري وشعبة رويا عنه قبل الاختلاط.
ورواه النسائي (1803، 1804) هكذا، لكنه قال:"وركعتين قبل العصر" بدل"ركعتين بعد العشاء" رواه من وجهين من طريق فليح بن سليمان، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبي إسحاق به، ومن طريق أبي نعيم، عن زهير، عن أبي إسحاق به.
قال النسائي: فليح بن سليمان ليس بالقوي. انتهى
وكذلك رواه من طريق ابن عجلان، عن أبي إسحاق، عن عمرو بن أوس، عن عنبسة بن أبي سفيان عنها مثله.
قلت: كلُّ هؤلاء الذين رووا عن أبي إسحاق كانت روايتهم بعد الاختلاط، فذكر الركعتين قبل العصر في روايتهم شاذة وإن كانت ثبتت ذلك في الأحاديث الأخرى كما سيأتي في حديث علي بن أبي طالب.
وأما ما روي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى في يوم ثنتي عشرة ركعة، بُني له بيت في الجنّة: ركعتين قبل الفجر، وركعتين قبل الظّهر، وركعتين بعد الظّهر، وركعتين - أظنّه قال: قبل العصر -، وركعتين بعد المغرب - أظنّه قال: وركعتين بعد العشاء الآخرة". فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (1142) عن أبي بكر بن أبي شيبة (2/ 109 - تحقيق اللّحام) قال: حدّثنا محمد بن سليمان الأصبهانيّ، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه النسائيّ (1811) عن محمد بن عبد الله بن المبارك، قال: حدّثنا يحيى بن إسحاق، حدّثنا محمد بن سليمان، به، مختصرًا بقوله:"من صلَّى في يوم ثنتي عشرة ركعة سوى الفريضة بنى الله له بيتًا في الجنّة".
قال النسائي:"هذا خطأ، ومحمد بن سليمان ضعيف، وهو ابن الأصبهانيّ".
وقد سئل الدارقطنيّ عن هذا الحديث فقال: رواه فليح بن سليمان عن سهيل، عن أبي إسحاق
السبيعي، عن المسيب بن رافع، عن عنبسة بن أبي سفيان، عن أمّ حبيبة. وقول فليح أشبه بالصواب. انظر: العلل (1500).
উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি দিন ও রাতে বারো রাকাত (নফল) সালাত আদায় করে, তার জন্য এর বিনিময়ে জান্নাতে একটি ঘর নির্মাণ করা হয়।”
সহীহ: এটি মুসলিম সলাতুল মুসাফিরীন (৭২৮) অধ্যায়ে মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু নুমাইর থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, আমাদেরকে আবূ খালিদ (সুলাইমান ইবনু হাইয়্যান) হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি দাউদ ইবনু আবী হিন্দ, তিনি নু’মান ইবনু সালিম, তিনি আমর ইবনু আওস (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে। আমর ইবনু আওস (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আনবাসা ইবনু আবূ সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর মুমূর্ষু অবস্থায় আমাকে এমন একটি হাদীস শুনালেন, যা গোপনে আলোচনা করা হয়। তিনি (আনবাসা) বললেন: আমি উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি। অতঃপর তিনি মূল হাদীসটি উল্লেখ করেন।
উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শোনার পর থেকে আর কখনো সেগুলো বাদ দেইনি। আনবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে শোনার পর থেকে আর কখনো সেগুলো বাদ দেইনি।
আর আমর ইবনু আওস বলেন, আমি আনবাসার নিকট থেকে শোনার পর থেকে আর কখনো সেগুলো বাদ দেইনি। আর নু’মান ইবনু সালিম বলেন, আমি আমর ইবনু আওসের নিকট থেকে শোনার পর থেকে আর কখনো সেগুলো বাদ দেইনি।
বিশ্র ইবনু আল-মুফাদ্দালের বর্ণনায় দাউদ থেকে রয়েছে: স্বেচ্ছামূলক বারোটি সিজদাহ।
আর শু’বাহ-এর বর্ণনায় নু’মান ইবনু সালিম থেকে রয়েছে: ফরয ব্যতীত (নফল)।
অনুরূপভাবে আবূ দাঊদও (১২৫০) ইবনু উলাইয়্যাহর সূত্রে, তিনি দাউদ ইবনু আবী হিন্দ থেকে এটি বিশদ বিবরণ ছাড়াই বর্ণনা করেছেন।
তিরমিযীও (৪১৫) সুফিয়ান সাওরী-এর হাদীস হতে আবূ ইসহাক, তিনি আল-মুসাইয়্যাব ইবনু রাফি, তিনি আনবাসা ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি সুস্পষ্টভাবে বর্ণনা করেছেন। তাঁর হাদীসে তিনি বলেছেন: “যুহরের পূর্বে চার রাকাত, এর পরে দুই রাকাত, মাগরিবের পরে দুই রাকাত, ইশার পরে দুই রাকাত এবং ফজরের সালাতের পূর্বে দুই রাকাত।” ইমাম তিরমিযী বলেন: হাদীসটি হাসান সহীহ।
আমি (আল-আলবানী) বলি: এটি তেমনই, যেমন তিনি (তিরমিযী) বলেছেন। যদিও আবূ ইসহাক শেষ জীবনে স্মৃতিভ্রমের শিকার হয়েছিলেন, তবুও সুফিয়ান সাওরী ও শু’বাহ তাঁর থেকে স্মৃতিভ্রমের আগে বর্ণনা করেছেন।
নাসাঈও (১৮০৩, ১৮০৪) অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তিনি 'ইশার পরের দুই রাকাত'-এর পরিবর্তে 'আসরের পূর্বে দুই রাকাত' বলেছেন। তিনি এটি দু'টি সূত্রে বর্ণনা করেছেন: একটি ফালীহ ইবনু সুলাইমানের সূত্রে, তিনি সুহাইল ইবনু আবী সালিহ থেকে, তিনি আবূ ইসহাক থেকে; এবং অপরটি আবূ নু’আইমের সূত্রে, তিনি যুহাইর থেকে, তিনি আবূ ইসহাক থেকে। ইমাম নাসাঈ বলেন: ফালীহ ইবনু সুলাইমান শক্তিশালী নন। সমাপ্ত।
অনুরূপভাবে তিনি এটি ইবনু আজলান-এর সূত্রে, তিনি আবূ ইসহাক, তিনি আমর ইবনু আওস, তিনি আনবাসা ইবনু আবী সুফিয়ান, তিনি উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও একইরূপে বর্ণনা করেছেন।
আমি বলি: আবূ ইসহাক থেকে যারা বর্ণনা করেছেন তাদের সকলের বর্ণনা তাঁর স্মৃতিভ্রমের পরে করা হয়েছে। ফলে তাদের বর্ণনায় 'আসরের আগের দুই রাকাত'-এর উল্লেখ শায (বিরল ও দুর্বল)। যদিও এটি অন্যান্য হাদীসে প্রমাণিত হয়েছে, যেমনটি পরবর্তীতে আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে আসবে।
আর আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি দিনে বারো রাকাত সালাত আদায় করে, তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর নির্মাণ করা হয়: ফজরের পূর্বে দুই রাকাত, যোহরের পূর্বে দুই রাকাত, যোহরের পরে দুই রাকাত, দুই রাকাত - আমার ধারণা তিনি বলেছেন: আসরের পূর্বে -, মাগরিবের পরে দুই রাকাত - আমার ধারণা তিনি বলেছেন: এবং ইশার পরের দুই রাকাত।” এই বর্ণনাটি দুর্বল।
এটি ইবনু মাজাহ (১১৪২) আবূ বাকর ইবনু আবী শাইবা (২/১০৯ - তাহকীক আল-লাহ্হাম) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু সুলাইমান আল-আসফাহানী হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি সুহাইল থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, অতঃপর তিনি এটি উল্লেখ করেন।
নাসাঈও (১৮১১) মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনুল মুবারক থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, আমাদেরকে ইয়াহ্ইয়া ইবনু ইসহাক হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু সুলাইমান থেকে, সংক্ষেপে এই বলে: “যে ব্যক্তি দিনে ফরয ব্যতীত বারো রাকাত সালাত আদায় করে, আল্লাহ তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর নির্মাণ করেন।”
ইমাম নাসাঈ বলেন: ‘এটি ভুল, এবং মুহাম্মাদ ইবনু সুলাইমান দুর্বল, আর তিনি ইবনু আল-আসফাহানী’।
দারাকুতনীকে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: ফালীহ ইবনু সুলাইমান এটি সুহাইল থেকে, তিনি আবূ ইসহাক আস-সাবীয়ী থেকে, তিনি আল-মুসাইয়্যাব ইবনু রাফি থেকে, তিনি আনবাসা ইবনু আবী সুফিয়ান থেকে, তিনি উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ফালীহ-এর বক্তব্যই সঠিকের অধিক নিকটবর্তী। দেখুন: আল-ইলাল (১৫০০)।
2340 - عن عبد الله بن شفيق قال: سألتُ عائشة عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم عن تطوعه، فقالت: كان يُصَلِّي في بيتي قبل الظهر أربعًا، ثم يخرج فيصلي بالناس، ثم يدخل فيُصلي ركعتين، وكان يُصلي بالناس المغربَ، ثم يدخل فيُصلي ركعتين، ويُصلي بالناس العِشاء، ويدخل بيتي فيصلي ركعتين، وكان يُصلي من الليل تسع ركعات فيهن الوتر، وكان يُصلي ليلًا طويلًا قائمًا، وليلًا طويلًا قاعدًا، وكان إذا قرأ وهو قائم ركع وسجد وهو قائم، وإذا قرأ قاعدًا ركع وسجد وهو قاعد، وكان إذا طلع الفجر صلى ركعتين.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (730) عن يحيى بن يحيى، قال: أخبرنا هُشيم، عن خالد، عن عبد الله بن شقيق فذكره، ورواه البخاري في التهجد (1182) عن مسدد، قال حدثنا يحيى، عن شعبة، عن إبراهيم بن محمد بن المنتشر، عن أبيه، عن عائشة، أن النبي صلى الله عليه وسلم كان لا يدع أربعا قبل الظهر وركعتين قبل الغداة.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুল্লাহ ইবনে শফিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নফল সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেন: তিনি আমার ঘরে যুহরের পূর্বে চার রাকাত সালাত আদায় করতেন, এরপর বের হয়ে লোকদের নিয়ে (ফরয) সালাত আদায় করতেন, তারপর ঘরে ফিরে এসে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি লোকদের নিয়ে মাগরিবের সালাত আদায় করতেন, এরপর ঘরে এসে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি লোকদের নিয়ে এশার সালাত আদায় করতেন এবং আমার ঘরে প্রবেশ করে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। আর তিনি রাতে নয় রাকাত সালাত আদায় করতেন, যার মধ্যে বিতরও অন্তর্ভুক্ত ছিল। তিনি রাতের বেলা দীর্ঘ সময় দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতেন, আবার দীর্ঘ সময় বসেও সালাত আদায় করতেন। তিনি যখন দাঁড়িয়ে কিরাত পড়তেন, তখন দাঁড়িয়েই রুকু ও সিজদা করতেন। আর যখন বসে কিরাত পড়তেন, তখন বসেই রুকু ও সিজদা করতেন। আর যখন ফজর উদিত হতো, তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।
2341 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صَلَّى في يوم وليلة ثنتي عَشْرة ركعةً سوى الفريضة، بُنِيَ له بيت في الجنة".
حسن: رواه الإمام أحمد (19709) والطبراني في الأوسط (9432) والبزار - كشف الأستار (702) كلهم من طريق حماد بن زيد، عن هارون أبي إسحاق الكوفي من همدان، عن أبي بردة بن أبي موسى، عن أبيه فذكره.
ورجاله ثقات، وهارون أبو إسحاق وثقه ابن معين في رواية، وقال في رواية: مشهور. انظر:"الجرح والتعديل" (9/ 99) وذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 582) وهو من رجال التمييز جاء اسمه في التهذيب في الكنى.
والحديث أورده الحافظ الهيثمي في"المجمع" (2/ 231) وقال: رواه أحمد والطبراني في"الأوسط" و"الكبير" والبزار، وقال: لم يتابع هارون أبي إسحاق على هذا الحديث".
قلت: هارون كما سبق ليس بمتهم بل هو حسن الحديث، ولم يأتِ بحديث غريب، فلا يضره عدم المتابعة.
وأما ما رُوِي عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من ثابر على ثنتي عشرة ركعةً من السُّنَّة، بنى الله له بيتًا في الجنة: أربع ركعات قبل الظهر وركعتين بعدها، وركعتين بعد المغرب، وركعتين بعد العشاء، وركعتين قبل الفجر".
فهو ضعيف روه الترمذي (414)، والنسائي (1794)، وابن ماجه (1140) كلهم من طريق إسحاق بن سليمان الرازي، حدثنا المغيرة بن زياد، عن عطاء، عن عائشة فذكرت الحديث.
قال الترمذي: حديث عائشة حديث غريب من هذا الوجه، والمغيرة بن زياد قد تكلم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه". انتهى.
وفي"التلخيص الحبير" (502): قال أحمد: ضعيف، وكل حديث رفعه فهو منكر، وقال النسائي: هذا خطأ، ولعل عطاء قال: عن عنبسة فتصحف بعائشة. يعني: أن المحفوظ حديث عنبسة بن أبي سفيان عن أخته أم حبيبة". انتهى.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি দিনে ও রাতে ফরয নামায ব্যতীত বারো (১২) রাকআত নামায আদায় করবে, তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর নির্মাণ করা হবে।”
2342 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي قبل الظهر ركعتين، وبعدها ركعتين، وبعد المغرب ركعتين في بيته، وبعد العشاء ركعتين، وكان لا يُصَلِّي بعد الجُمعة حتى ينصرف فيركع ركعتين.
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (69) عن نافع، عن ابن عمر، والبخاري في الجمعة (937) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به مثله، ورواه مسلم في صلاة المسافرين (729) عن عبيد الله، عن نافع به، وقال فيه: فأما المغرب والعشاء والجمعة فصليت مع النبي صلى الله عليه وسلم في بيته.
ومن طريقه رواه أيضًا البخاري في التهجد (1172).
وفي رواية أيوب، عن نافع، قال: حفظتُ من النبي صلى الله عليه وسلم عشر ركعات فذكر مثله إلا أنه جعل ركعتين قبل الصبح موضع ركعتين بعد الجمعة، رواه البخاري في التهجد (1180) عن سليمان بن حرب، قال: حدثنا حماد بن زيد، عن أيوب.
وقال فيه: حدثتني حفصةُ: أنه كان إذا أذَّن المؤذِّن وطلع الفجرُ صلى ركعتين.
قول ابن عمر:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يصلي قبل الظهر ركعتين" لعلّه فعل ذلك أحيانًا وإلّا فالغالب أنه كان صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي في البيت قبل الظهر أربعًا، كما أخبرت بذلك أم المؤمنين عائشة، وهي أعلم بصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيته.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যোহরের (ফরযের) পূর্বে দুই রাকাত এবং যোহরের (ফরযের) পরে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। আর মাগরিবের (ফরযের) পরে তিনি তাঁর বাড়িতে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন, আর ইশার (ফরযের) পরেও দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। জুমু‘আর (ফরযের) পরে তিনি ফিরে গিয়ে দুই রাকাত সালাত আদায় না করা পর্যন্ত (অন্য কোনো নফল) সালাত আদায় করতেন না।
2343 - عن عاصم بن ضَمْرَةَ السَّلُوليِّ، قال: سألنا عليًّا عن تطوُّع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالنهار فقال: إنكم لا تطيقونَه، فقلنا: أخبِرْنا به نَأخُذْ منه ما اسْتَطَعنا. قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا صلَّى الفجر يُمْهِلُ، حتى إذا كانت الشمس من هاهُنا، يعني من قبل المشرق بمقدارها من صلاة العصر من هاهنا، يعني من قبل المغرب، قام فصلى ركعتين، ثم يُمْهِلُ حتى إذا كانت الشمس من هاهنا، يعني من قبل المشرق بمقدارها من صلاة الظهر من هاهنا قام فصلى أربعًا، وأربعًا قبل الظهر إذا زالتِ
الشمس، وركعتين بعدها، وأربعًا قبل العصر، يفصِلُ بينَ كلِّ ركعتين بالتسليم على الملائكة المُقرَّبين والنَّبِيِّينَ، ومن تبعهم من المسلمين والمؤمنين.
قال عَلِيٌّ: فتلك سِتَّ عشرة ركعةً، تطوُّعُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بالنهار، وقَلَّ من يداومُ عليها.
قال وكيع، زاد فيه أبي: فقال حبيب بن أبي ثابتٍ: يا أبا إسحاق! ما أحبُّ أن لي بحديثك هذا ملْءَ مسْجِدِك هذا ذَهَبًا.
حسن: رواه ابن ماجه (1161) عن علي بن محمد، قال: حدثنا وكيع، قال: حدثنا سفيان وأبي وإسرائيل، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمْرة السلولي فذكر مثله واللفظ له.
ورواه الترمذي (598)، والنسائي (874)، وأبو داود (1272) كلهم من طريق شعبة، عن أبي إسحاق به مختصرًا ومطولًا.
قال الترمذي:"حسن. وقال إسحاق بن إبراهيم: أحسن شيء رُوِي في تطوع النبي صلى الله عليه وسلم في النهار هذا. ورُوي عن عبد الله بن المبارك أنه كان يُضعف هذا الحديث، وإنما ضعَّفه عندنا - والله أعلم - لأنه لا يُروى مثل هذا عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا من هذا الوجه عن عاصم بن ضمرة، عن علي، وعاصم بن ضمرة هو ثقة عند بعض أهل العلم، قال علي بن المديني: قال يحيى بن سعيد القطان: قال سفيان: كنا نعرف فضل حديث عاصم بن ضمرة على حديث الحارث" انتهى.
قلت: وهو كما قال، فإن عاصم بن ضمرة في أقل أحواله حسن الحديث كان الإمام أحمد يقول: هو أعلى من الحارث الأعور، وهو عندي حجة.
وأما الجوزجاني فطعن في عاصم لأجل هذا الحديث طعنًا شديدًا وجعله قريبًا من الحارث الأعور. وهذا فيه مبالغة من الجوزجاني، فأين عاصم بن ضمرة الذي قال فيه الإمام أحمد هو حجة عندي من الحارث الأعور الكذاب، والله لا يحب الظلم والعدوان.
قال الحافظ في التهذيب:"تعصب الجوزجاني على أصحاب علي معروف، ولا إنكار على عاصم فيما روى، هذه عائشة تقول لسائلها عن شيء من أحوال النبي صلى الله عليه وسلم: سل عليًّا. فليس بعجب أن يروي الصحابي شيئًا يرويه غيره من الصحابة بخلافه، ولا سيما في التطوع"، انتهى.
وأما أبو إسحاق فهو مدلس، ولكن روى الترمذي والنسائي وصحّحه ابن خزيمة (1211) كلهم من طريق شعبة القائل: كفيتكم تدليس أبي إسحاق، كما أنه صرَّح بسماعه من عاصم بن ضمرة عند أبي داود الطيالسي (130).
ومنهم من رد هذا الحديث بأن السنة القبلية للعصر لم تثبت في أحاديث أخرى.
قلت: وهذه أيضًا ليست بحجة فقد ثبت عن ابن عمر أربع ركعات قبل العصر كما سيأتي وهو لا يخالف ما مضى من قوله: حفظت عن النبي صلى الله عليه وسلم عشر ركعات وليس فيه أربع قبل العصر قال الحافظ ابن القيم:"وهذا ليس بعلة أصلا، فإن ابن عمر إنما أخبر بما حفظه من فعل النبي صلى الله عليه وسلم،
ولم يخبر عن ذلك فلا تنافي بين الحديثين البتة""زاد المعاد" (1/ 312).
كما أن هذا لم يكن من دأبه صلى الله عليه وسلم فإنه قلما يداومُ عليها كما رواه إسرائيل، عن أبي إسحاق."البيهقي" (2/ 51).
ومما يقوي صحة هذا الحديث قول حبيب بن ثابت في آخر حديث ابن ماجه:"يا أبا إسحاق! ما أحب أن لي بحديثك هذا ملء مسجدك هذا ذهبًا".
وأما اختصار الحديث وتطويله فاختلف أصحابه كما بوّب عليه النسائي بقوله:"ذكر اختلاف الناقلين عن أبي إسحاق" فما رواه من أصحابه الذين كثرت ملازمتهم له فهو مقبول، وما رواه من أصحابه الذين لم تكثر ملازمنهم له، وهو مخالف لغيرهم فهو مردود وشاذ.
ولعل مما انفرد به حصين بن عبد الرحمن عنه ما رواه النسائي عن محمد بن المثنى، قال: حدثنا محمد بن عبد الرحمن، قال: حدثنا حصين بن عبد الرحمن، عن أبي إسحاق عنه وقال في آخره: ويجعل التسليم في آخره".
والثابت عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يُسلم بعد كل ركعتين، وهو الذي يرويه غيره من أصحاب أبي إسحاق.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসিম ইবনু দামরাহ আস-সালূলী বলেন: আমরা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দিনের বেলায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নফল সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: তোমরা তা আদায় করতে সক্ষম হবে না। আমরা বললাম: আপনি আমাদের তা সম্পর্কে বলুন, যেন আমরা যতটুকু সম্ভব গ্রহণ করতে পারি।
তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাত আদায়ের পর অপেক্ষা করতেন। সূর্য যখন এখান থেকে (অর্থাৎ পূর্ব দিক থেকে) এতটুকু উপরে উঠত, যতটুকু উপরে উঠলে এখান থেকে (অর্থাৎ পশ্চিম দিক থেকে) আসরের সালাতের সময় হয়, তখন তিনি উঠে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। এরপর তিনি আবার অপেক্ষা করতেন। সূর্য যখন এখান থেকে (অর্থাৎ পূর্ব দিক থেকে) এতটুকু উপরে উঠত, যতটুকু উপরে উঠলে এখান থেকে (অর্থাৎ পশ্চিম দিক থেকে) যোহরের সালাতের সময় হয়, তখন তিনি উঠে চার রাকাত সালাত আদায় করতেন। আর সূর্য ঢলে যাওয়ার পর যোহরের পূর্বে চার রাকাত, যোহরের পরে দুই রাকাত এবং আসরের পূর্বে চার রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি প্রত্যেক দুই রাকাতের মাঝে নৈকট্যপ্রাপ্ত ফেরেশতাগণ, নবীগণ এবং মুসলিম ও মুমিনদের মধ্য থেকে যারা তাঁদের অনুসরণ করেন, তাঁদের প্রতি সালামের মাধ্যমে পার্থক্য করতেন।
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই হলো ষোল রাকাত, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিনের বেলার নফল সালাত। খুব কম লোকই এইগুলো নিয়মিত আদায় করে।
2344 - عن عائشة قالت: لم يكن النبي صلى الله عليه وسلم على شيء من النوافل أشدَّ منه تعاهدًا على ركعتي الفجر.
متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1169)، ومسلم في المسافرين (724/ 94) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد، عن ابن جريج، قال: حدثني عطاء، عن عبيد بن عمير، عن عائشة فذكرته.
وفي رواية حفص عن ابن جريج به قالت: ما رأيت رسول الله له في شيء من النوافل أسرع منه إلى الركعتين قبل الفجر، رواه مسلم عن ابن نمير عنه.
ورواه ابن خزيمة (1108) عن عبد الله بن سعيد الأشج، قال: حدثنا حفص - يعني ابن غياث - به وزاد فيه:"ولا إلى غنيمة".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ফযরের দুই রাকাত সুন্নাত অপেক্ষা অন্য কোনো নফল সালাতের প্রতি এতোটা গুরুত্বসহকারে নিয়মিত ছিলেন না।
2345 - عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ركعتا الفجر خير من الدنيا وما فيها"
صحيح: رواه مسلم في المسافرين (725) من طريق أبي عوانة، عن قتادة، عن زُرَارة بن أوفى، عن سعد بن هشام، عن عائشة فذكرته.
وفي رواية:"لهما أحبُّ إليَّ من الدُّنيا جميعًا".
وأما ما روي عن أبي هريرة"لا تدعوا ركعتي الفجر، ولو طردتكم الخيل" فهو ضعيف، رواه أبو داود (1258)، وأحمد (9253 و 9258) وفيه ابن سيلان وهو مجهول الحال، قال ابن
القطان: لأنه لم يرو عنه غير محمد بن زيد بن المهاجر بن منقد. وهو مخرج في"المنة الكبرى" (2/ 293).
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ফজরের দুই রাকাত (সুন্নাত) সালাত দুনিয়া ও তাতে যা কিছু আছে তার থেকেও উত্তম।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "(ফজরের) এই দুই রাকাত আমার নিকট পুরো দুনিয়ার থেকেও অধিক প্রিয়।"
2346 - عن ابن عباس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في ركعتي الفجر في الأولى منهما: {قُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْنَا} [البقرة: 136] وفي الآخرة منهما: {آمَنَّا بِاللَّهِ وَاشْهَدْ بِأَنَّا مُسْلِمُونَ} [آل عمران: 52].
وفي رواية في الثانية: {تَعَالَوْا إِلَى كَلِمَةٍ سَوَاءٍ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ} [آل عمران: 64].
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (727) من طريق مروان بن معاوية الفزاري، والرواية الثانية من طريق أبي خالد الأحْمَر، كلاهما عن عثمان بن حكيم الأنصاري، قال: أخبرني سعيد بن يسار، أن ابن عباس أخبره فذكر الحديث.
وعن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ في ركعتي الفجر: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} و {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (726) قال: حدثني محمد بن عبَّاد وابن أبي عمر، قالا: حدثنا مروان بن معاوية، عن يزيد (وهو ابن كيسان) عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
والمقصود من هذه القراءة في ركعتي سنة الفجر.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের (সুন্নাত) দুই রাকা‘আতে পাঠ করতেন। প্রথম রাকা‘আতে: {قُولُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ إِلَيْنَا} [সূরা আল-বাকারা: ১৩৬], এবং দ্বিতীয় রাকা‘আতে: {آمَنَّا بِاللَّهِ وَاشْهَدْ بِأَنَّا مُسْلِمُونَ} [সূরা আলে ইমরান: ৫২]।
অন্য এক বর্ণনায় দ্বিতীয় রাকা‘আতে: {تَعَالَوْا إِلَى كَلِمَةٍ سَوَاءٍ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ} [সূরা আলে ইমরান: ৬৪]।
আর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের দুই রাকা‘আতে: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} এবং {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} পাঠ করতেন।
আর এই তেলাওয়াতসমূহ ফজরের সুন্নাতের দুই রাকা‘আতের জন্য উদ্দেশ্য ছিল।
2347 - عن أبي هريرة أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقرأ في ركعتي الفجر {قُلْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ عَلَيْنَا} [آل عمران: 84] في الرّكعة الأولى، وفي الركعة الأخرى بهذه الآية {رَبَّنَا آمَنَّا بِمَا أَنْزَلْتَ وَاتَّبَعْنَا الرَّسُولَ فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ} [آل عمران: 53] أو {إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ بِالْحَقِّ بَشِيرًا وَنَذِيرًا وَلَا تُسْأَلُ عَنْ أَصْحَابِ الْجَحِيمِ} [البقرة: 119] شك الدّراورديّ.
حسن: رواه أبو داود (1260) عن محمد بن الصباح بن سفيان، حدّثنا عبد العزيز بن محمد، عن عثمان بن عمر - يعني ابن موسى -، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه أيضا البيهقي (3/ 43) من وجه آخر عن عبد العزيز بن محمد وهو الدراورديّ. وإسناده حسن من أجل عثمان بن عمر بن موسى التيمي المدني، كان قاضيا بالمدينة، روى عنه جمع، وذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 200). وذكره البخاري في"تاريخ الكبير" وقال:"أُراه يعدّ في أهل المدينة".
قال ابن بكار:"أمّه أمّ ولد، وكان على قضاء المدينة في زمن مروان بن محمد، ثم ولاه أمير
المؤمنين المنصور قضاءه، وكان مع المنصور حتى مات بالحيرة قبل أن يبني أمير المؤمنين مدينة السلام". فمثله يحسّن حديثه، وخاصة إذا كان له أصول صحيحة.
وكذلك فيه عبد العزيز بن محمد الدراوردي وهو حسن الحديث أيضًا.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফজরের (সুন্নাত) দুই রাকা‘আতে তিলাওয়াত করতে শুনেছেন: প্রথম রাকা‘আতে {ক্বুল আ-মান্না বিল্লা-হি ওয়ামা- উনযিলা ‘আলাইনা-} [সূরা আলে ‘ইমরান: ৮৪]। আর অন্য রাকা‘আতে এই আয়াতটি: {রব্বানা- আ-মান্না- বিমা- আনযালতা ওয়াত্তাবা‘নার রসূলা ফাকতুব্না- মা‘আশ শা-হিদীনা} [সূরা আলে ‘ইমরান: ৫৩]। অথবা {ইন্না আরসাল্না-কা বিলহাক্কি বাশী-রাওঁ ওয়া নাযী-রাওঁ ওয়ালা- তুসআলু ‘আন আসহা-বিল জাহীম} [সূরা আল-বাক্বারাহ: ১১৯]। (এ বিষয়ে) দারওয়ারদী (নামক বর্ণনাকারী) সন্দেহ করেছেন।
