আল-জামি` আল-কামিল
2468 - عن أبي سعيد الخدريّ أنه دخل على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فرآهُ يُصلِّي على حصيرٍ يسجد عليه قال:"ورأيته يصلِّي في ثوبٍ واحدٍ متوشِّحًا به".
صحيحٌ: رواه مسلم في الصّلاة (519) من طريق الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، قال: حَدَّثَنِي أبو سعيد الخدريّ فذكره. وفي رواية:"واضعًا طرفيه على عاتقيه".
قال النوويّ:"المشتمل والمتوشِّح والمخالف بين طرفيه معناه واحد هنا. قال ابن السِّكِّيت: التوشُّح أن يأخذ طرف الثوب الذي ألقاه على منكبه الأيمن من تحت يده اليُسرى، ويأخذ طرفه الذي ألقاه على الأيسر من تحت يده اليُمنى، ثمّ يعقدهما على صدره. وفيه جواز الصّلاة في ثوب واحد". انتهى.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একবার নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে একটি চাটাইয়ের উপর সালাত আদায় করতে দেখলেন, যার উপর তিনি সিজদা করছিলেন। তিনি বলেন: ‘আমি তাঁকে একটি মাত্র কাপড়ে সালাত আদায় করতে দেখলাম, যা তিনি জড়িয়ে (শরীরের সাথে বেষ্টন করে) রেখেছিলেন।’
2469 - عن قيس بن طلق، عن أبيه قال: قَدِمْنا على نبي الله صلى الله عليه وسلم فجاء رجل فقال: يا نبي الله! ما ترى في الصّلاة في الثوب الواحد؟ قال: فأطلق رسول الله صلى الله عليه وسلم إزاره، طارق به رداءَه فاشتمل بهما، ثمّ قام فصلي بنا نبي الله صلى الله عليه وسلم. فلمّا أن قضى الصّلاة قال:"أو كلكم يجد ثوبين؟".
حسن: أخرجه أبو داود (629) عن مسدد، حَدَّثَنَا ملازم بن عمرو الحنفيّ، حَدَّثَنَا عبد الله بن بدر، عن قيس بن طلق، عن أبيه فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل قيس بن طلق بن عليّ الحنفي فإنه"صدوق".
وأخرجه أيضًا ابن حبان (2297) من طريق ملازم بن عمرو به مثله.
তালক্ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তখন একজন লোক এসে বলল: হে আল্লাহর নবী! এক কাপড়ে সালাত (নামায) আদায় করা সম্পর্কে আপনি কী মনে করেন? বর্ণনাকারী বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাঁর লুঙ্গিটি (ইযার) খুললেন, সেটিকে তাঁর চাদরের (রিদা) উপর দিয়ে ঢেকে দিলেন এবং উভয়টি দিয়ে নিজেকে আবৃত করলেন। এরপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: "তোমাদের সকলের কাছে কি দুটি কাপড় আছে?"
2470 - عن سلمة بن الأكوع قال: قلت يا رسول الله! إني رجل أصيد أفأصلي في القميص الواحد؟ قال: نعم وازْرُرْه ولو بشوكة".
حسن: رواه أبو داود (632)، والنسائي (761) كلاهما من طريق موسى بن إبراهيم، عن سلمة بن الأكوع فذكر مثله.
وإسناده حسن لأجل موسى بن إبراهيم، وهو ابن عبد الرحمن بن أبي ربيعة المخزوميّ، اشتبه على بعض النقاد هذا بموسى بن محمد بن إبراهيم الذي قال فيه أبو داود ضعيف، وكره أحمد
الرواية عنه. وأمّا موسى بن إبراهيم المخزومي هذا فلم ينقل عن أحد تضعيفه بل قال فيه ابن المديني:"وَسَط" ووثَّقه ابن حبان وأخرج حديثه هو وشيخه ابن خزيمة في صحيحيهما: ابن خزيمة (777، 778)، وابن حبان (2294)، وقال الحاكم (1/ 250):"هذا حديث مديني صحيح، فإن موسى هذا هو: ابن إبراهيم بن عبد الله المخزومي".
وقال ابن خزيمة: موسى بن إبراهيم هذا هو: ابن عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي ربيعة. وأنا أظنه: ابن إبراهيم بن عبد الله بن عبد الرحمن بن معمر بن أبي ربيعة، أبوه إبراهيم هو الذي ذكره شرحبيل بن سعد أنه دخل وإبراهيم بن عبد الله بن عبد الرحمن بن معمر بن أبي ربيعة على جابر بن عبد الله في حديث طويل ذكره". انتهى.
وحسَّنه أيضًا النوويّ في المجموعه (3/ 175)، والخلاصة (1/ 328).
وقد صرَّح موسى بن إبراهيم بسماعه من سلمة بن الأكوع عند الحاكم في المستدرك (1/ 250).
وما رواه الطحاويّ (1/ 380) من طريق موسى بن محمد بن إبراهيم، عن أبيه، عن سلمة بن الأكوع لا يُعِلُّ ما صحَّ، فإن فيه خطأ في موضعين: أحدهما قوله: موسى بن محمد بن إبراهيم، فهو مما اشتبه على بعض الرواة، والثاني: قوله عن أبيه، وقد ثبت سماع موسى بن إبراهيم، كما قلت، عن سلمة بن الأكوع بدون واسطة.
قوله:"وازرره" وفي رواية:"وزرَّه" أي ربّط جيبه لئلا تظهر عورتُك.
وأمّا ما رُوي عن ابن عمر أنَّه كان يصلِّي محلول إزاره وقال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعله" فهو ضعيف جدًّا.
رواه ابن خزيمة (779)، والحاكم (1/ 250) وعنه البيهقيّ (2/ 240) من طريق الوليد بن مسلم، ثنا زهير بن محمد التميميّ، ثنا زيد بن اسلم، قال: رأيت ابن عمر يصلِّي محلول إزاره فسألته عن ذلك فقال: فذكره.
قال البيهقيّ: تفرّد به زهير بن محمد. وبلغني عن أبي عيسى الترمذيّ أنه قال: سألت محمدًا يعني البخاريّ عن حديث زهير هذا. فقال:"أنا أتقي هذا الشّيخ كأن حديثه موضوع. وليس هذا عندي زهير بن محمد. وكان أحمد بن حنبل يضعّف هذا الشّيخ، ويقول: هذا شيخ ينبغي أن يكونوا قلبوا اسمه".
قلت: زهير بن محمد هو التميمي أبو المنذر الخراسانيّ، سكن الشام ثمّ الحجاز. رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، فضُعِّف بسببها. وكان الوليد بن مسلم الراوي عنه من الشاميين.
সালামা ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি একজন শিকারী মানুষ। আমি কি এক কাপড়ে (একটি মাত্র জামা পরিধান করে) সালাত আদায় করতে পারি? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তবে তুমি তা কাঁটা দিয়ে হলেও সেলাই করে/আটকে নাও।
2471 - عن أنس، قال: آخر صلاة صلَّاها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مع القوم، صلّى في ثوب واحد متوشِّحًا به خلف أبي بكر.
صحيح: رواه النسائيّ (2/ 79)، وأحمد (12617)، وابن حبان (2125)، والبيهقي في
"الدلائل" (7/ 192) كلّهم من حديث حميد الطّويل، عن أنس، فذكره.
وقد صرَّح حميد بالسَّماع عن أنس في بعض المصادر.
ولكن رواه الترمذيّ (363)، والبيهقي في"الدلائل" (7/ 192) وغيرهما عن حميد الطّويل، عن ثابت، عن أنس، فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح. قال: وهكذا رواه يحيى بن أيوب، عن حميد، عن ثابت، عن أنس. وقد رواه غير واحد عن حميد، عن أنس. ولم يذكروا فيه: عن ثابت، ومن ذكر فيه عن ثابت فهو أصح" انتهى.
قلت: بلى كلاهما صحيح؛ لأنَّه ثبت سماع حميد عن أنس، كما ثبت سماعه عن ثابت عن أنس؛ فلعله سمع منهما جميعًا.
وقوله:"متوشِّحًا به" أي ملتحفًا بثوبه. والتوشح أن يأخذ طرف الثوب الذي ألقاه على منكبه الأيمن من تحت يده اليُسرى، ويأخذ طرفه الذي ألقاه على الأيسر من تحت يده اليُمنى ثمّ يعقدهما على صدره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকেদের সাথে যে শেষ সালাত আদায় করেন, তাতে তিনি এক কাপড়ে সেই কাপড়টি জড়িয়ে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পেছনে সালাত আদায় করেছিলেন।
2472 - عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يصلِّي في لِحاف لا يتوشَّح به، والآخر أن تُصلي في سراويل وليس عليك رداء".
حسن: رواه أبو داود (636) قال: حَدَّثَنَا محمد بن يحيى الذهليّ، حَدَّثَنَا سعيد بن محمد، حَدَّثَنَا أبو تُميلة، حَدَّثَنَا أبو المُنيب عبيد الله العتكيّ، عن عبد الله بن بريدة به فذكر مثله.
وإسناده حسن من أجل أبي المنيب عبد الله العتكي.
وقد صحَّحه الحاكم (1/ 250) فرواه من طريق أبي تُميلة يحيى بن واضح به مثله. وقال:"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه، واحتجا بأبي تُميلة، وأمّا أبو المنيب المروزي فإنه عبيد الله بن العتكي من ثقات المراوِزة، وممن يجمع حديثه في الخراسانيين".
قلت: ليس كما قال؛ فإنَّ أبا المنيب عبد الله بن عبد الله العَتَكي المروزيّ ليس من رجال الشّيخين، وإنما أخرج له أبو داود والنسائي وابن ماجة.
تكلم فيه البخاريّ وأدخله في"الضّعفاء" فقال أبو حاتم:"هو صالح يحول من كتاب الضعفاء" وثَّقه النسائيّ وقال أبو داود: لا بأس به.
وهذا الحديث ضعَّفه ابن عبد البر في"التمهيد" (6/ 374) لضعف فيه أعتقد يقصد به"أبو المنيب" ولمعارضته للأحاديث السابقة ثمّ قال:"ولو صحَّ كان معناه الندب لمن قدر".
قلت: أما تضعيف أبي المنيب فيرده ما ذكرته، وأمّا معارضته للأحاديث الصحيحة فليس
بصحيح لوجود شواهد بمعناه كما مضى فقوله: أن تصلي في سراويل وليس عليك رداء فهو بمعني حديث أبي هريرة:"ليس على عاتقيه شيء" فإن من السنة أن يُصلِّي في إزار ورداء إذا وجدهما كما سبق النقل عن البغويّ، وحديث بريدة يؤيِّد ما قاله البغوي.
وقوله:"ولو صحَّ كان معناه الندب لمن قدر" كلام متجه.
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি বিষয় থেকে নিষেধ করেছেন: (এক) এমন লেপ বা কম্বলের ভেতরে সালাত আদায় করা, যা দ্বারা নিজেকে আবৃত (ইততিশাহ) করা হয়নি, এবং (দুই) পায়জামা পরিধান করে সালাত আদায় করা, অথচ তোমার শরীরে কোনো চাদর (রদা/ওপরের পোশাক) নেই।
2473 - عن سعيد بن الحارث قال: سألنا جابر بن عبد الله عن الصّلاة في الثوب الواحد. فقال: خرجتُ مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره، فجئتُ ليلةً لبعض أمري، فوجدتُه يُصلي، وعليَّ ثوب واحد فاشتملتُ به، وصليتُ إلى جانبه، فلمّا انصرف قال:"ما السُرى يا جابر؟" فأخبرته بحاجتي. فلمّا فرغت قال: ما هذا الاشتمالُ الذي رأيتُ؟"، قلت: كان ثوب، يعني ضاق. قال: فإن كان واسعًا فالتحف به، وإن كان ضيقًا فاتزر به".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (361) عن يحيى بن صالح، حَدَّثَنَا فُلَيح بن سليمان، عن سعيد بن الحارث، قال: سألت جابر بن عبد الله عن الصّلاة في الثوب الواحد فذكره.
ورواه مسلم في كتاب الزهد والرقائق (3010) من وجه آخر عن عبادة بن الوليد بن الصَّامت قال: خرجتُ أنا وأبي نطلب العلم في هذا الحيّ من الأنصار قبل أن يهلِكوا في حديث طويل وفيه: ثمّ مضينا حتَّى أتينا جابر بن عبد الله في مسجده وهو يُصَلِّي في ثوب واحد مشتملًا به. تخطي القوم حتَّى جلستُ بينه وبين القبلة. فقلت: يرحمك الله أتُصلِّي في ثوب واحد، ورداؤك إلى جنبك؟ قال: فقال يده في صدري هكذا. وفرق بين أصابعه وقوَّسها: أردتُ أن يدخُل عليَّ الأحمقُ مثلُك فيراني كيف أصنع؟ فيصنع مثلَه.
ثمّ قال جابر: سِرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة بطن بُواط وذكر صلاته مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال: وكانت عليَّ بردةٌ ذهبتُ أن أخالف بين طرفيها، فلم يبلغ ليّ، وكانت لها ذباذبُ فنكّستُها، ثمّ خالفتُ بين طرفيها. ثمّ تواقصتُ عليها، ثمّ جئت حتَّى قمتُ عن يسار رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخذ بيدي فأدارني حتَّى أقامني عن يمينه … فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يرمُقَني وأنا لا أشعر. ثمّ فطِنتُ به. فقال:"هكذا بيده" يعني شُدَّ وَسَطَك. فلمّا فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يا جابر" قلت: لبيك يا رسول الله! قال:"إذا كان واسِعًا فخالف بين طرفَيه، وإذا كان ضيِّقًا فاشدده على حِقْوِك".
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। সাঈদ ইবনুল হারিস বলেন: আমরা জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এক কাপড়ে সালাত আদায় করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে তাঁর কোনো এক সফরে বের হয়েছিলাম। এক রাতে আমি আমার কিছু প্রয়োজনে এসে দেখলাম যে, তিনি সালাত আদায় করছেন। আমার পরনে ছিল একটি মাত্র কাপড়। আমি তা দিয়ে ইশতিমাল (শরীর আবৃত) করলাম এবং তাঁর পাশে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করলাম। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: “হে জাবির, এত রাতে আসার কারণ কী?” আমি তাঁকে আমার প্রয়োজনের কথা বললাম। যখন আমি প্রয়োজন শেষ করলাম, তখন তিনি বললেন: “আমি তোমার যে ইশতিমাল (আবৃত করা) দেখলাম, এর কারণ কী?” আমি বললাম: আমার একটি মাত্র কাপড় ছিল, অর্থাৎ এটি সংকীর্ণ ছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যদি কাপড়টি প্রশস্ত হয়, তবে তা দিয়ে পূর্ণ আচ্ছাদন করো (আলতাহাফ), আর যদি তা সংকীর্ণ হয়, তবে তা দিয়ে ইযার (নিচের অংশ) বাঁধো।”
(মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় আছে) উবাদাহ ইবনুল ওয়ালীদ ইবনুস সামিত বলেন: আমি ও আমার পিতা জ্ঞানার্জনের উদ্দেশ্যে আনসারদের এই মহল্লায় গিয়েছিলাম, তাদের বিলুপ্ত হয়ে যাওয়ার পূর্বে। একটি দীর্ঘ হাদীসের মাঝে তিনি উল্লেখ করেন: এরপর আমরা জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তাঁর মসজিদে আসলাম। তিনি তখন একটি মাত্র কাপড়ে ইশতিমাল করে সালাত আদায় করছিলেন। আমি লোকেদের অতিক্রম করে তাঁর ও কিবলার মাঝখানে বসে পড়লাম। আমি বললাম: আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন, আপনি কি একটি মাত্র কাপড়ে সালাত আদায় করছেন, অথচ আপনার চাদর আপনার পাশে? বর্ণনাকারী বলেন: তখন তিনি তাঁর হাত এভাবে আমার বুকে রাখলেন এবং তাঁর আঙ্গুলগুলো ফাঁক করে বাঁকা করলেন। (তিনি বললেন:) আমি চেয়েছিলাম যে, তোমার মতো কোনো নির্বোধ যেন আমার কাছে এসে আমি যেভাবে করি, তা দেখে সেও যেন সেই রকম করে।
এরপর জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে বাতনে বুওয়াত যুদ্ধে ছিলাম এবং তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে তাঁর সালাত আদায়ের ঘটনা উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: আমার কাছে একটি চাদর ছিল। আমি তার দুই প্রান্ত উল্টে বাঁধতে চাইলাম, কিন্তু তা নাগাল পেল না। সেটির কিছু ঝালর ছিল, তাই আমি সেটিকে উল্টিয়ে দিলাম, এরপর তার দুই প্রান্তকে আড়াআড়ি করলাম। এরপর আমি তাতে নুয়ে পড়লাম, আর আমি এসে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর বাম দিকে দাঁড়ালাম। তিনি আমার হাত ধরে আমাকে ঘুরিয়ে দিলেন এবং তাঁর ডান দিকে দাঁড় করালেন...। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমার দিকে তাকাচ্ছিলেন আর আমি তা জানতে পারিনি। এরপর আমি তাঁর দিকে মনোযোগ দিলাম। তিনি তাঁর হাত দ্বারা এভাবে ইশারা করলেন—অর্থাৎ তোমার কোমর শক্ত করো। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: “হে জাবির!” আমি বললাম: লাব্বাইক, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন: “যদি কাপড় প্রশস্ত হয়, তবে তার দুই প্রান্তকে আড়াআড়ি করে বাঁধো, আর যদি সংকীর্ণ হয়, তবে তা তোমার কোমরের ওপর শক্ত করে বেঁধে নাও।”
2474 - عن وعن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، أو قال: قال عمر:"إذا كان لأحدكم ثوبان فليصل فيهما، فإن لم يكن إِلَّا ثوب واحد فليتزر به، ولا يشتمل اشتمال اليهود".
صحيح: رواه أبو داود (635) عن سليمان بن حرب، حَدَّثَنَا حمّاد بن زيد، عن أيوب، عن
نافع، عن ابن عمر به فذكر مثله.
وإسناده صحيح، وقد صحَّحه ابن خزيمة (769) فرواه من طريق عبد الوهّاب بن عطاء، عن سعيد بن أبي عروبة، عن أيوب به ولفظه:"إذا صلى أحدكم في ثوب واحد فليشده على حِقوه، ولا تشتملوا كاشتمال اليهود".
ورواه أيضًا (766) من طريق أبي بحر عبد الرحمن بن عثمان البكراويّ، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي عروبة، عن أيوب، عن نافع، قال: رآني ابن عمر وأنا أصلي في ثوب واحد، فقال: ألم أكن أكسك ثوبين؟ قال: قلت: بلى، قال: أرأيت لو أرسلتك في حاجة أكنت منطلقًا في ثوب واحد؟ قلت: لا قال: فالله أحق أن تزين له، ثمّ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا لم يكن لأحدكم إِلَّا ثوب واحد فليشُدَّ به حِقْوَه، ولا يشتمِل به اشتمال اليهود". انتهى.
ولم يتردد نافع في هذه الروايات كما تردد في رواية أبي داود بين رفيه إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وبين وقفه على عمر بن الخطّاب، والأخذ باليقين أولى من الأخذ بالشك، وقد أكد بأنه مرفوع في رواية أخرى أخرجها الإمام أحمد (96) عن يعقوب، حَدَّثَنَا أبيّ، عن ابن إسحاق، كما حَدَّثَنِي عنه نافع مولاه قال: كان عبد الله بن عمر يقول: إذا لم يكن للرجل إِلَّا ثوب واحد فليأتزر به، ثمّ ليصلِّ فإني سمعت عمر بن الخطّاب يقول ذلك. ويقول: لا تلتحفوا بالثوب إذا كان وحده كما تفعل اليهود.
قال نافع:"ولو قلت لك: إنه أسند ذلك إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم لرجوت أن لا أكون كذبتُ".
ورواه البيهقيّ (2/ 236) من طريق حمّاد بن زيد، عن أيوب عن نافع، قال: احتسبت له في علف الركاب. وذكر الحديث فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، أو قال عمر، وأكثر ظني أنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
قال البيهقيّ: ورواه اللّيث بن سعد، عن نافع هكذا بالشك.
قلت: وقوله: أكثر ظني … هذا يكفي لثبوت الرفع إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم؛ لأنه لولا غلب عليه جانب الرفع لما قال مثل هذا.
وقوله:"اشتمال اليهود" وهو أن يجلل بدنَه الثوبَ ويَسْدِله من غير أن يُشيل طرفَه. كذا قاله الخطابي.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, অথবা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, "তোমাদের কারো যদি দুটি কাপড় থাকে, তবে সে যেন তা দিয়ে সালাত আদায় করে। আর যদি কেবল একটিই কাপড় থাকে, তবে সে যেন তা দিয়ে ইযার (লুঙ্গির মতো) করে নেয়। আর সে যেন ইয়াহুদিদের মতো (সারাদেহে) ইশতিমাল (জড়িয়ে নেওয়া) না করে।"
2475 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن لبستين، واللبستان: اشتمال الصماء، والصماء: أن يجعل ثوبه على أحد عاتقيه، فيبدو أحد شِقَّيه ليس عليه ثوب، واللبسة الأخرى: احتباؤُه بثوبه وهو جالس، ليس على فرجه منه شيء.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5820) واللّفظ له، ومسلم في البيوع (1512) غير أنه لم يذكر تفسير اللبستين، كلاهما من طريق يونس، عن ابن شهاب، قال: أخبرني عامر بن سعد، أن
أبا سعيد الخدريّ أخبره فذكر الحديث.
قال الحافظ:"ظاهر سياق البخاريّ أن التفسير المذكور فيها مرفوع، وهو موافق لما قاله الفقهاء، وعلى تقدير أن يكون موقوفًا فهو حجة على الصَّحيح؛ لأنه تفسير من الراوي لا يخالف ظاهر الخبر"."الفتح" (1/ 477).
وقوله:"فيبدو أحد شقيه" أي فييدو منه فرجُه.
وقيل: الصماء هو اشتمال اليهود، وقد جاء النهي عنه في حديث ابن عمر، فيكون الصماء واشتمال اليهود بمعنى واحد.
والصماء: بالصاد المهملة والمد. قال أهل اللغة: هو أن يُجلِّل جسده بالثوب، لا يرفع منه جانبًا، ولا يُبقي ما يخرج منه يده.
قال ابن قُتَيبة: سُميِّت صنماء، لأنه يسد المنافذ كلها فتصير كالصخرة الصماء التي ليس فيها فرق.
وقال الفقهاء: هو أن يلتحف بالثوب، ثمّ يرفعه من أحد جانبيه فيضعه على منكبيه فيصير فرجه باديًا.
قال النوويّ: فعلى تفسير أهل اللغة يكون مكروهًا لئلا يعرض له حاجة فيتعسَّر عليه إخراج يدِه، فيلحقه الضرر، وعلى تفسير الفقهاء يحرم لأجل انكشاف العورة. انظر:"فتح الباري" (1/ 477).
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দু’টি প্রকারের পোশাক পরিধান করতে নিষেধ করেছেন। আর সেই দু’টি পোশাক হলো: ‘ইশতিমালুস সাম্মা’ (আস-সাম্মা পরিধান করা)। ‘আস-সাম্মা’ হলো: যখন সে তার কাপড় তার দুই কাঁধের এক কাঁধের উপর রাখে, ফলে তার শরীরের এক পার্শ্ব উন্মুক্ত থাকে এবং তাতে কোনো বস্ত্র থাকে না। আর অপর পোশাকটি হলো: যখন সে বসে থাকে, তখন তার কাপড় দ্বারা এমনভাবে ই’হতিবা (আঁটসাঁট করে বসা) করা যে, তার লজ্জাস্থানের উপর কাপড়ের সামান্যতম অংশও থাকে না।
2476 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن بيعتين، وعن لِبْسَتين، وعن صلاتين وعن اشتمال الصماء، وعن الاحتباء في ثوب واحد يُفْضِي بفرجه إلى السّماء.
متفق عليه: رواه البخاريّ في مواقيت الصّلاة (584) عن عبيد بن إسماعيل، عن أبي أسامة، عن عبيد الله، عن خُبيب بن عبد الرحمن، عن حفص بن عاصم، عن أبي هريرة فذكره.
وفي كتاب اللباس (5819) عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا عبد الوهّاب، حَدَّثَنَا عبيد الله، عن خُبيب بن عبد الرحمن به نحوه.
ورواه مسلم في البيوع (1511) من طرق عن عبيد الله بن عمر، عن خبيب بن عبد الرحمن به إِلَّا أنه اختصر الحديث، ولم يذكر موضع الشاهد منه.
وعبيد الله هو: ابن عمر بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطّاب العمريّ.
والحديث سيأتي بالتفصيل في البيوع.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন দুটি বেচা-কেনা, দুটি পরিধান পদ্ধতি, দুটি সালাত (নামায) এবং সাম্মা’ পোশাক পরিধান করা থেকে, আর নিষেধ করেছেন একটি মাত্র কাপড়ে ইহতিবা (বসে থাকা) করা থেকে, যাতে তার লজ্জাস্থান আকাশের দিকে উন্মুক্ত হয়ে পড়ে।
2477 - عن ابن مسعود قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أسبل إزاره في صلاته خيلاء فليس من الله في حِلٍّ ولا حرامٍ".
صحيح: رواه أبو داود (637) عن زيد بن أخزم، حَدَّثَنَا أبو داود، عن أبي عوانة، عن عاصم،
عن أبي عثمان، عن ابن مسعود فذكره. وإسناده صحيح.
وأبو داود هو: الطيالسيّ، رواه في مسنده (349) عن أبي عوانة وثابت أبي زيد. وقال: رفعه أبو عوانة، ولم يرفعه ثابت. وفيه قصة وهي: أنه رأى أعرابيًّا عليه شَمْلَةٌ قد ذيَّلَها وهو يُصَلِّي فقال له: إن الذي يجرُّ ثوبه من الخَيَلاءِ في الصّلاة ليس من الله في حِلّ ولا حرام".
وأعلّه أيضًا أبو داود صاحب السنن قائلًا:"روي هذا جماعة عن عاصم موقوفًا على ابن مسعود منهم: حمّاد بن سلمة وحمّاد بن زيد وأبو الأحوص وأبو معاوية".
قلت: أبو عوانة هو: الوضَّاح بن عبد الله اليشكري مشهور بكنيته. انفرد برفع الحديث وهو"ثقة ثبت" كما في التقريب، اعتمده أبو داود صاحب السنن والبزّار (1884)، والنسائي في الكبرى وغيرهم، فكلهم رووه من طريقه، فيجب قبول هذه الزيادة كما هو معروف في علل الحديث، لا سيما أن مثل هذا لا يقال بالرأيّ، ويشهد له أحاديث النهي عن إسبال الإزار مطلقًا - وستأتي هذه الأحاديث في كتاب اللباس - فكيف لمن يُسْبل إزاره وهو في الصّلاة واقف أمام الله سبحانه وتعالى، والحال هذه تقتضي الخشوعَ والخضوعَ.
ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি অহংকারবশত নামাযে তার পরিধেয় বস্ত্র (ইজার) টেনে চলে (ঝুলিয়ে দেয়), সে আল্লাহ্র কাছে হালাল বা হারামের (কোনো বিধানের) অন্তর্ভুক্ত নয়।”
2478 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن السدل في الصّلاة، وأن يُغطي الرّجل فاه.
حسن: رواه أبو داود (643) عن محمد بن العلاء وإبراهيم بن موسى، عن عبد الله بن المبارك، عن الحسن بن ذكوان، عن سليمان الأحول، عن عطاء. قال إبراهيم: عن أبي هريرةَ فذكر الحديث.
وإسناده حسن للكلام في الحسن بن ذكوان غير أنه حسن الحديث قال ابن عدي: يروي أحاديث لا يرويها غيره وأرجو أنه لا بأس به". وذكره ابن حبان في الثّقات.
وصحَّح هذا الحديث شيخه ابن خزيمة (772) فأخرجه من طريق عبد الله بن المبارك به مثله.
قال أبو داود:"رواه عِسْل عن عطاء، عن أبي هريرة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نهى عن السدل في الصّلاة". قلت: هذه متابعة لما سبق، ووصله الترمذيّ (3778) فقال: حَدَّثَنَا هنَّاد، حَدَّثَنَا قبيصة، عن حمّاد بن سلمة، عن عِسْل بن سفيان، عن عطاء (هو ابن أبي رباح) به مثله.
قال الترمذيّ:"حديث أبي هريرة لا نعرفه من حديث عطاء، عن أبي هريرة مرفوعًا إِلَّا من حديث عِسْل بن سفيان".
قلت: والأمر ليس كما قال، بل يرده ما سبق، غير أن عِسْل بن سفيان ضعيف ولكن متابعة الحسن بن ذكوان له ترفع الحديث إلى درجة الحسن.
وأمّا الحاكم (1/ 253) فرواه من طريق الحسين بن ذكوان، عن الأحول، وصحّحه على شرطهما.
والحسين بن ذكوان هو: المعلم وهو ثقة معروف من رجال الجماعة وهو غير الحسن بن ذكوان أبو سلمة مختلف فيه، فلعله التبس على الحاكم فصحّحه على شرط الشّيخين، وأصاب البيهقيّ (2/ 242) فرواه عن عبد الله بن المبارك، عن الحسن بن ذكوان به مثله.
ورواه ابن ماجة (966) على الصواب ولكن الشطر الثاني فقط.
والسَّدْل هو: إرسال الثوب حتَّى يُصيب الأرض، وهو بمعنى الإسبال، هكذا فَسَّره الخطّابي.
وفي"النهاية": السَّدل أنه يلتحف بثوبه، ويدخل يديه من داخل، فيركع ويسجد وهو كذلك، وكانت اليهود تفعله.
وأمّا قوله:"وأن يُغَطّي الرّجل فاه" قال الخطّابي: كان من عادة العرب التلثُّم بالعمائم على الأفواه، فنُهوا عن ذلك إِلَّا أن يعرض للمصلي التثاؤبُ فيُعَطِّي فمه عند ذلك للحديث الذي جاء فيه".
আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের মধ্যে সাদল (কাপড় ঝুলিয়ে দেওয়া) করতে এবং কোনো পুরুষের মুখ ঢাকতে নিষেধ করেছেন।
2479 - عن أبي جحيفة قال: خرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في حلة حمراء مشمِّرًا صلى بالناس ركعتين.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (376)، ومسلم في الصّلاة (503) كلاهما من طريق عمر بن أبي زائدة، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه فذكره في حديث طويل وسبق ذكره في الطّهارة باب استعمال فضل الوضوء. وانظر أيضًا جموع أبواب السترة.
تبويب البخاريّ"الصّلاة في الثوب الأحمر" يشير إلى الجواز، وقد كره الحنفية الصّلاة في الثوب الأحمر مستدلين بحديث عبد الله بن عمرو قال: مر بالنبي صلى الله عليه وسلم رجل وعليه ثوبان أحمران، فسلم عليه، فلم يرد عليه.
رواه أبو داود (4069)، والتِّرمذيّ (2807) كلاهما من طريق إسحاق بن منصور، أخبرنا إسرائيل، عن أبي يحيى، عن مجاهد، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث.
قال الترمذيّ: حسن غريب من هذا الوجه. هذا آخر كلامه.
قلت: في إسناده أبو يحيى القتات، بقاف ومثناة مُثقلة الكوفي. قال المنذري: لا يحتج بحديثه.
وقال ابن معين: في حديثه ضعف. وقال ابن حبان: فَحُش خطؤه وكَثُر وهمه حتى سلك مسلك غير العدول في الروايات.
وقال الحافظ: هو حديث ضعيف الإسناد. وإن وقع في بعض نسخ الترمذيّ أنه قال: حديث حسن لأن في مسنده كذا. وعلى تقدير أن يكون مما يحتج به فقد عارضه ما هو أقوى منه، وهو واقعة عين، فيحتمل أن يكون ترك الرد عليه بسبب آخر" آخر كلامه.
আবূ জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লাল পোশাক পরে, যা গুটিয়ে ছিল, বের হলেন এবং লোকদের নিয়ে দুই রাকআত সালাত আদায় করলেন।
2480 - عن عقبة بن عامر قال: أهْدِي إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فَرُّوج حريرٍ فلبسه، فصلى فيه، ثمّ
انصرف فنزعه نزعًا شديدًا كالكاره له وقال:"لا ينبغي هذا للمتقين".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (375)، ومسلم في اللباس (2075) كلاهما من طريق اللّيث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر فذكره.
قال الحافظ ابن حجر:"وظاهر هذا الحديث أن صلاته صلى الله عليه وسلم فيه كانت قبل تحريم لبس الحرير، ويدل على ذلك حديث جابر عند مسلم (في اللباس 2070) ولفظه: لَبِس النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يومًا قَباءً من ديباج أُهْدِيَ له، ثمّ أوشك أن نزعه. فأرسل به إلى عمر بن الخطّاب. فقيل له: قد أوْشك ما نزعتَه يا رسول الله. فقال:"نهاني عنه جبريل" فجاءه عمر بكي. فقال: يا رسول الله! كرهتَ أمرًا، وأعطيتنيه فما لي؟ قال:"إني لم أعطِكه لتلْبسه. إنّما أعطيتكهـ تبيعه" فباعه بألْفي درهم.
وقال أيضًا: ويدل عليه أيضًا مفهوم قوله:"لا ينبغي هذا للمتقين" لأنَّ المتقي وغيره في التحريم سواء …
وقال: فلا حجة فيه لمن أجاز الصّلاة في ثياب الحرير، لكونه صلى الله عليه وسلم لم يُعِدِ الصّلاة. لأن ترك إعادتها لكونها وقعت قبل التحريم، وأمّا بعده فعند الجمهور تجزئ لكن مع التحريم، وعن مالك: يُعيد في الوقت". انتهى.
উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একটি রেশমের তৈরি ফাররূজ (পোশাক) উপহার হিসেবে আনা হয়েছিল। অতঃপর তিনি তা পরিধান করলেন এবং তা পরিধান করেই সালাত আদায় করলেন। এরপর (সালাত শেষে) তিনি ফিরে গিয়ে তা তীব্রভাবে খুলে ফেললেন, যেন তিনি তা অপছন্দ করছেন। এবং বললেন: "মুত্তাকিদের জন্য এটি শোভনীয় নয়।"
2481 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صلى في خميصةٍ لها أعلام فنظر إلى أعلامها نظرةً، فلمّا انصرف قال:"اذهبوا بخميصتي هذه إلى أبي جهم، وائتُوني بأنبجانية أبي جهم، فإنها أَلْهَتْنِي آنفًا عن صلاتي".
وقال هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"كنتُ أنظر إلى عَلَمِها، وأنا في الصّلاة، فأخاف أن تفتِنِّي".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (373)، ومسلم في المساجد (556) كلاهما من حديث ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة واللّفظ للبخاريّ.
وأمّا ما علّقه البخاريّ عن هشام فوصله مسلم عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا وكيع، عن هشام به ولكن لفظه: أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كانت له خميصةٌ لها علم، فكان يتشاغل بها في الصّلاة. فأعطاها أبا جهْم، وأخذ كِساءً له أنْبِجانيًّا. فلعل هشامًا كان يروي على اللفظين. واللّفظ الثاني له متابع، عن علقمة بن أبي علقمة، عن أمه، أن عائشة قالت: أَهدى أبو جَهْم بن حذيفة لرسول الله صلى الله عليه وسلم خميصةً شاميةً لها عَلَمٌ. فشهد فيها الصّلاة. فلمّا انصرف قال:"رُدِّي هذه الخميصة إلى أبي جَهْم، فإني نظرتُ إلى عَلَمها في الصّلاة، فكاد يفتِنُنِي" رواه مالك في الصّلاة (67) عن علقمة بن أبي علقمة به.
وأم علقمة اسمها: مرجانة وهي مقبولة، لأنَّها توبِعَتْ متابعة قاصرة. وبهذا يكون إسناد مالك حسنًا.
ثمّ رواه مرسلًا عن هشام بن عروة، عن أبيه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ليس خَميصةً لها علَمٌ، ثمّ أعطاها أبا جهم، وأخذ من أبي جهم أنْبَجَانِيةً له، فقال يا رسول الله! ولِم! فقال:"إني نظرتُ إلى علمها في الصّلاة".
قال ابن عبد البر: هذا مرسل عند جميع الرواة عن مالك.
وقوله: خميصة: وهي كساء مربع من صوف.
وقوله:"بأنْبَجَانِية: قال القاضي عياض: رُوِينا بفتح الهمزة وكسرها، وبفتح الباء وكسرها أيضًا في غير مسلم، وبالوجهين ذكرها ثعلب.
قال: ورُوِيناه بتشديد الياء في آخرها، وبتخفيفها معًا في غير مسلم. إذ هو في رواية لمسلم: (بأنْبَجَانِية) مشدد مكسور على الإضافة إلى أبي جهم، وعلى التذكير كما جاء في الرواية الأخرى:"كساء له أنْبَجَانِيا"، قال ثعلب: هو كل ما كثف، قال غيره: هو كساء غليظ لا علم له، فإذا كان للكساء علم فهو خميصة، فإن لم يكن فهو: أنْبَجَانِية. كذا في شرح النوويّ.
وقال ابن الأثير في النهاية: كساء أنْبَجَانِي منسوب إلى مَنْبِج، المدينة المعروفة، وهي مكسورة الباء، ففتحتْ في النسب، وأبدلتْ الميم همزة، وقيل: إنها منسوبة إلى موضع اسمه: أَنْبِجان وهو أشبه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নকশা-আঁকা একটি চাদর (খামীসা) পরিধান করে সালাত আদায় করেন। তিনি সেটির নকশার দিকে একবার তাকালেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: "আমার এই খামীসাটি আবূ জাহমের কাছে নিয়ে যাও, এবং আবূ জাহমের 'আম্বিজানিয়্যাহ' নামক মোটা চাদরটি আমার কাছে নিয়ে আসো, কেননা এইমাত্র তা আমাকে আমার সালাত থেকে অমনোযোগী করে দিয়েছে।"
আর হিশাম ইবনু উরওয়াহ তাঁর পিতা সূত্রে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি সালাতের মধ্যে সেটির নকশার দিকে তাকাচ্ছিলাম, ফলে আমার ভয় হচ্ছিল যে, তা আমাকে ফিতনায় ফেলে দেবে।"
2482 - عن سعيد بن يزيد الأزدي قال: سألتُ أنس بن مالك: أكان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصلِّي في نعليه؟ قال: نعم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (386) وفي اللباس (5850)، ومسلم في المساجد (555) كلاهما من طريق أبي مَسْلَمة سعيد بن يزيد الأزدي به مثله.
جعل ابن دقيق العيد الصّلاة في النعال من الرُّخَص، لا من المستحبّات.
قلت: وإذا لم أجد من أهل العلم من نصَّ على أن الصّلاة فيه من الزينة التي أمر الله بها.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনে ইয়াযীদ আল-আযদী বলেন, আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তাঁর জুতো পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি: ইমাম বুখারী এটি সালাত (৩৮৬) ও লিবাস (৫৮৫০) অধ্যায়ে এবং ইমাম মুসলিম এটি মাসাজিদ (৫৫৫) অধ্যায়ে, উভয়ই আবূ মাসলামা সাঈদ ইবনে ইয়াযীদ আল-আযদীর সূত্রে অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন।
ইবনু দাকীকিল ঈদ জুতো পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করাকে মুস্তাহাব নয়, বরং রুখসাত বা অনুমতির অন্তর্ভুক্ত করেছেন।
আমি বলি (লেখক): আমি এমন কোনো আহলে ইলমকে পাইনি যারা স্পষ্টভাবে বলেছেন যে জুতো পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করা সেই সৌন্দর্যের অন্তর্ভুক্ত যা দ্বারা আল্লাহ্ আদেশ করেছেন।
2483 - عن أنس بن مالك قال: لم يخلع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نعليه في الصّلاة إِلَّا مرة، فخلع القومُ نعالهم، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لِمَ خلعتُم نعالكم؟ قالوا: رأيناك خلَعْتَ فخلعنا. فقال:"إنَّ جبريل عليه السلام أخبرني أن بها قذرًا".
حسن: رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (4305) عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، قال: حَدَّثَنِي إبراهيم بن الحجاج الساميّ، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن المثنى، قال: حَدَّثَنَا ثمامة، عن أنس فذكره.
ورواه البزّار"كشف الأستار" (605) من وجه آخر عن عبد الله بن المثنَّى به مختصرًا.
قال الهيثميّ في"المجمع" (2260) رجال الطبرانيّ رجال الصَّحيح، ورواه البزّار باختصار.
قلت: ليس كما قال، فإن إبراهيم بن حجَّاج السَّاميّ، بالمهملة، أبو إسحاق البصري ليس من
رجال الصَّحيح، وإنما هو من رجال النسائيّ غير أنه ثقة.
وعبد الله بن المثنى وإن كان من رجال البخاريّ إِلَّا أنه ضُعِّف من قبل حفظه، غير أنه حسن الحديث.
وثُمامة هو: ابن عبد الله بن أنس بن مالك الأنصاريّ، روى عن جده، من رجال الشّيخين.
قال البزّار: لا نعلمه عن أنس إِلَّا من هذا الوجه.
قلت: وهو كما قال إِلَّا أنه شاهد قويٌّ لحديث أبي سعيد الخدريّ، وهو الحديث الآتي.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের মধ্যে তাঁর জুতা মোবারক খুলেননি, শুধুমাত্র একবার ছাড়া। তখন উপস্থিত লোকেরাও তাদের জুতা খুলে ফেলল। নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কেন তোমাদের জুতা খুললে?" তারা বলল: "আমরা আপনাকে খুলতে দেখেছি, তাই আমরাও খুললাম।" তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই জিবরীল (আঃ) আমাকে জানিয়েছেন যে, তাতে ময়লা বা নোংরা লেগে আছে।"
2484 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: بينما رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي بأصحابه إذ خلع نعليه، فوضعهما عن يساره، فلمّا رأى ذلك القوم ألقوا نعالهم، فلمّا قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاته قال:"ما حملكم على إلقاء نعالكم؟" قالوا: رأيناك ألقيت نعليك فألقينا نعالنا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن جبريل عليه السلام أتانيّ، فأخبرني أن فيها قذرًا" أو قال:"أذًى" وقال:"إذا جاء أحدكم إلى المسجد فلينظر، فإن رأى في نعليه قذرًا، أو أذًى فليمسحه وليصلِّ فيهما".
صحيح: رواه أبو داود (650) عن موسى بن إسماعيل، ثنا حمّاد، عن أبي نُعامة السعديّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ فذكر مثله.
وإسناده صحيح. وحماد هو ابن سلمة كما في مسند الإمام أحمد (11153) وصحّحه ابن خزيمة (1017)، والحاكم (1/ 260) كلاهما من طريق حمّاد بن سلمة. وقال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে নিয়ে সালাত আদায় করছিলেন, তখন তিনি তাঁর জুতা জোড়া খুলে ফেললেন এবং সে দুটিকে তাঁর বাম পাশে রাখলেন। যখন লোকজন তা দেখলেন, তখন তারাও তাদের জুতা ফেলে দিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি বললেন, "তোমাদেরকে কিসে তোমাদের জুতা ফেলে দিতে উৎসাহিত করল?" তাঁরা বললেন, "আমরা দেখলাম আপনি আপনার জুতা ফেলে দিয়েছেন, তাই আমরাও আমাদের জুতা ফেলে দিলাম।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই জিবরীল (আঃ) আমার কাছে এসেছিলেন এবং আমাকে জানিয়েছিলেন যে সে দুটোর মধ্যে নাপাকি রয়েছে"—অথবা তিনি বললেন—"কষ্টদায়ক কিছু (নোংরামি) রয়েছে।" এবং তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যখন তোমাদের কেউ মসজিদে আসে, তখন সে যেন দেখে নেয়। যদি সে তার জুতাতে নাপাকি অথবা কষ্টদায়ক কিছু (নোংরামি) দেখতে পায়, তবে যেন তা মুছে ফেলে এবং সে দুটো পরেই সালাত আদায় করে।"
2485 - عن شدَّاد بن أوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خالفوا اليهود، فإنَّهم لا يصلون في نِعالهم، ولا خِفافهم".
حسن: رواه أبو داود (652) عن قُتَيبة بن سعيد، ثنا مروان بن معاوية الفزاريّ، عن هلال بن ميمون الرمليّ، عن يعلى بن شداد بن أوس، عن أبيه فذكر الحديث.
وفيه هلال بن ميمون، وشيخه يعلى بن شداد صدوقان وصحّحه ابن حبان (2186)، والحاكم (1/ 260) وروياه من طريق مروان بن معاوية، قال الحاكم: صحيح. وزاد ابن حبان في حديثه:"والنصارى".
শাদ্দাদ ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ইহুদিদের বিরোধিতা করো। কেননা তারা তাদের জুতা এবং চামড়ার মোজা পরে সালাত আদায় করে না।"
2486 - عن عَمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدِّه قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي حافيًا ومنتعِلًا.
حسن: رواه أبو داود (653)، وابن ماجة (1038) كلاهما من طريق حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وعمرو بن شعيب صدوق. انظر للمزيد: باب الانصراف عن اليمين وعن الشمال في جموع أبواب التسليم.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খালি পায়ে এবং জুতা পরিহিত অবস্থায় সালাত (নামাজ) আদায় করতে দেখেছি।
2487 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا صلَّى أحدكم فليلبس نعليه، أو ليخلعهما بين رجليه، ولا يؤذي بهما غيره".
صحيح: رواه ابن خزيمة (1009) عن يونس بن عبد الأعلى، نا ابن وهب، نا عياض بن عبد الله القرشيّ، وغيره، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وعنه رواه ابن حبان في صحيحه (2183)، ورواه أيضًا الحاكم (1/ 259) من طريق عبد الله بن وهب به مثله. وقال:"صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه".
ولكن رواه أبو داود (655) من طريق محمد بن الوليد، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا صلى أحدكم فخلع نعليه فلا يؤذ بهما أحدًا، ليجعلهما بين رجليه، أو ليصلي فيهما".
ورواه ابن حبان في صحيحه (2182)، والحاكم في المستدرك (1/ 260) كلاهما من طريق محمد بن الوليد به مثله. وصحّحه الحاكم، . ومحمد بن الوليد هو: الزُّبيدي من رجال الشّيخين.
قلت: فزاد فيه"عن أبيه".
وقد ثبت سماع سعيد بن أبي سعيد وأبيه من أبي هريرة، فلعله سمعه أولًا من أبيه، ثمّ سمعه من أبي هريرة فروى الحديث على وجهين، ولا حاجة إلى تخطئة محمد بن الوليد أو عباض بن عبد الله القرشي فكلاهما ثقتان، وما دام أمكن الجمع فلا حاجة إلى ترجيح.
وأمّا ما رواه ابن ماجة (1432) من طريق عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة:"الزم نعليك قدميك، فإن خلعتهما فاجعلهما بين رجليك، ولا تجعلهما عن يمينك، ولا عن يمين صاحبك، ولا وراءك، فتُوذي من خلفك" فهو ضعيف جدًّا فإن عبد الله بن سعيد بن أبي سعيد ضعَّفه ابن معين وأبو زرعة والنسائي والحاكم وابن عدي وغيرهم، وقال الحافظ:"متروك".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ সালাত আদায় করে, তখন সে যেন তার জুতো পরিধান করে, অথবা সে দুটি তার দু'পায়ের মাঝে রেখে দেয়, এবং সে যেন সে দুটির দ্বারা অন্য কাউকে কষ্ট না দেয়।"
