হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2488)


2488 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلِّي قائمًا وقاعدًا، وحافيًا ومنتعلًا.

حسن: رواه الإمام أحمد (7384) حَدَّثَنَا سفيان، عن عبد الملك بن عُمَير، عن أبي الأوبر، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البزّار"كشف الأستار" (601) من وجه آخر عن عبد الله بن عُمَير به، وإسناده حسن لأجل أبي الأوبر وقد سماه ابن معين والنسائي وغيرهما: زيادًا الحارثيّ، وثَّقه ابن حبان، قال الحافظ في العجيل (343):"وقد جزم الحُسيني بأنه أبو الأوبر، وهو معروف، ولكنه مشهور بكنيته أكثر من اسمه، وقد سماه زيادًا النسائيّ والدولابي وأبو أحمد الحاكم وغيرهم، ووثَّقه ابن معين وابن حبان وصحَّح حديثه". انتهى.
وتردد فيه الحافظ الهيثميّ فقال مرة:"لم أجد من ترجمه بثقة، ولا ضعف"."مجمع الزوائد" (2/ 54) وأخرى:"ثقة" (8/ 293).

انظر للمزيد: الانصراف عن اليمين والشمال بعد التسلم.

وللحديث إسناد آخر أخرجه أبو الشّيخ في"أخلاق النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم" (ص 120) عن إبراهيم بن محمد بن الحارث، نا محمد بن عمرو بن جَبَلَة، نا محمد بن مروان العُقَيليّ، عن هشام، عن محمد، عن أبي هريرة قال: إن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صلى حافيًا ومنتعلًا.

وفيه محمد بن مروان بن قدامة العُقيلي مختلف فيه غير أنه حسن الإسناد. قال أبو داود: ثقة صدوق، وذكره ابن حبان في الثّقات.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়ানো অবস্থায় এবং বসা অবস্থায়, খালি পায়ে এবং জুতা পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2489)


2489 - عن أبي العلاء يزيد بن عبد الله بن الشِخّير، عن أبيه قال:"رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي في نعليه".

صحيح: رواه الإمام أحمد (16309) عن عبد الرزّاق، حَدَّثَنَا معمر، عن سعيد الجُريريّ، عن أبي العلاء به مثله.

والحديث في"مصنف عبد الرزّاق" (1500).

ورواه البزّار"كشف الأستار" (603) عن أحمد بن عبدة، ثنا يزيد بن زُريع، ثنا الجُريريّ، به وفيه: رأيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صلي في نعليه، ثمّ بزق، ثمّ دلكها بنعله.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (16310) عن عبد الرزّاق، ثنا معمر، عن سعيد الجُريريّ، عن أبي العلاء به وفيه. رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَليّ، ثمّ تنخَّم تحت قدمه، ثمّ دلكها بنعله وهي في رجله.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات، وسعيد الجُريري وإن كان اختلط بأخره فإن معمرًا ويزيد بن زُريع رويا عنه قبل الاختلاط.

وصحّحه ابن حبان (2184) فرواه من وجه آخر عن كهمس بن الحسن، عن أبي العلاء، عن أبيه، أنه رأى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي وعليه نعل مخصوفة.




আব্দুল্লাহ ইবন আশ-শিখ্খীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর জুতা পরিহিত অবস্থায় সালাত (নামাজ) আদায় করতে দেখেছি।

(আল-বায্‌যারের অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে যে) তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর জুতা পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করতে দেখেছেন, অতঃপর তিনি থুথু ফেললেন এবং তা তাঁর জুতা দ্বারা ডলে দিলেন।

(ইমাম আহমাদের অন্য একটি বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে যে) তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাত আদায় করতে দেখেছেন। অতঃপর তিনি তাঁর পায়ের নিচে কফ ফেললেন, অতঃপর তাঁর পায়ে থাকা জুতা দিয়েই তা ডলে দিলেন।

(ইবনু হিব্বানের অন্য একটি সূত্রে এসেছে যে) তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাত আদায় করতে দেখেছেন এমন অবস্থায় যে তিনি তালিবদ্ধ (patchwork করা) জুতা পরিহিত ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2490)


2490 - عن عائشة قالت: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يشرب قائمًا وقاعدًا، ويُصلي منتعِلًا وحافيًا، وينصرف من الصّلاة عن يمينه وعن يساره.

حسن: رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (1235) عن أحمد، قال: حَدَّثَنَا يحيى بن حكيم المقدِّمُ، قال: حَدَّثَنَا مخلد بن يزيد الحرانيّ، عن يحيى بن سعيد الأنصاريّ، عن عطاء، عن عائشة. فذكرت الحديث.

ورجاله ثقات غير مَخلد بن يزيد فهو متكلم فيه من قبل حفظه غير أنه حسن الحديث، وهو من رجال الشّيخين.
قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 55):"رواه الطبرانيّ في"الأوسط" ورجاله ثقات". انظر للمزيد: جموع أبواب السّلام.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি দাঁড়িয়ে এবং বসে উভয় অবস্থাতেই পান করতেন, জুতা পরিহিত অবস্থায় ও খালি পায়ে সালাত (নামাজ) আদায় করতেন এবং সালাত (নামাজ) শেষে ডান দিকে ও বাম দিকে ফিরতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2491)


2491 - عن عبد الله بن السائب قال: رأيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصلي يوم الفتح، ووضع نعليه عن يساره.

صحيح: رواه أبو داود (648)، والنسائي (777)، وابن ماجة (1431) كلّهم من طريق يحيى بن سعيد، عن ابن جريج قال: حَدَّثَنِي محمد بن عباد بن جعفر، عن عبد الله بن سفيان، عن عبد الله بن السائب فذكره.

وإسناده صحيح. وصحّحه ابن خزيمة (1014، 1015) فرواه من طريق يحيى بن سعيد وعثمان بن عمر كلاهما من ابن جريج به مثله.




আব্দুল্লাহ ইবনুস সাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মক্কা বিজয়ের দিন সালাত আদায় করতে দেখেছি। তিনি তাঁর জুতো জোড়া তাঁর বাম দিকে রেখেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2492)


2492 - عن ميمونة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنها كانت تكون حائضًا لا تُصلي، وهي مفترشةٌ بحذاء مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يُصلِّي على خُمرته، إذا سجد أصابها بعض ثوبه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحيض (333) والصلاة (381)، ومسلم في الصّلاة (513) كلاهما من طريق سليمان الشيبانيّ، عن عبد الله بن شداد، قال: سمعتُ خالتي ميمونة فذكر الحديث.

والخُمرة: بضم الخاء المعجمة وسكون الميم قال الطبريّ: هو مصلّى صغير يُعْمل من سعف النخل، سُمِّيت بذلك لسترها الوجه والكفين من حرِّ الأرض وبردها، فإن كانت كبيرة سُميت حصيرًا.




মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের স্ত্রী মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঋতুমতী অবস্থায় সালাত আদায় করতেন না। অথচ তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদের সন্নিকটে (বিছানায়) শুয়ে থাকতেন। আর তিনি (নবী) তাঁর নিজস্ব খুমরাহ (ছোট জায়নামায)-এর উপর সালাত আদায় করতেন। যখন তিনি সিজদা করতেন, তখন তাঁর কাপড়ের অংশবিশেষ তাঁকে স্পর্শ করত।









আল-জামি` আল-কামিল (2493)


2493 - عن أنس بن مالك قال: دعتْ جدتي مليكةُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم الطعام فأكل منه، ثمّ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قوموا فلأُصلِّي لكم، قال: أنس: فقمتُ إلى حصير لنا قد اسْوَدَّ؛ من طول ما لُبِس فنضحتُه بماء. فقام عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وصفَفتُ أنا واليتيم وراءه، والعجوز من ورائنا فصلى ركعتين ثمّ انصرف.

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصّلاة في السفر (31) عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك فذكره.

ورواه البخاريّ في الصّلاة (380)، ومسلم في المساجد (658) كلاهما من طريق مالك به مثله.

وفي سنن أبي داود (658) من وجه آخر عن أنس قال: إنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يزور أم سُليم فتدركهـ الصّلاة أحيانًا، فيُصلِّي على بساطٍ لنا، وهو حصير ننضحه بالماء. وإسناده صحيح.

مليكة هي والدة أم سُليم، وأم سُليم هي والدة أنس بن مالك. والقصة وقعت في بيت أم سُليم كما سيأتي في حديث آخر مثله عن أم سُليم نفسِها.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার দাদী মালাইকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খাবারের জন্য দাওয়াত দিলেন। তিনি তা থেকে আহার করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা দাঁড়াও, আমি তোমাদের নিয়ে সালাত আদায় করি।” আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আমাদের একটি চাটাইয়ের কাছে গেলাম, যা দীর্ঘদিন ব্যবহারের কারণে কালো হয়ে গিয়েছিল। আমি তাতে পানি ছিটিয়ে দিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর দাঁড়ালেন এবং আমি ও একজন ইয়াতীম বালক তাঁর পিছনে কাতারবদ্ধ হলাম। আর বৃদ্ধা (দাদী) আমাদের পিছনে দাঁড়ালেন। তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন, অতঃপর চলে গেলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2494)


2494 - عن أنس بن سيرين قال: سمعتُ أنسًا يقول: قال رجل من الأنصار: إني لا أستطيع الصّلاة معك - وكان رجلًا ضخمًا - فصنع للنبي صلى الله عليه وسلم طعامًا، فدعاه إلى منزله، فبسط له حصيرًا، ونَضَحَ طرف الحصير، فصلى عليه ركعتين فقال رجل من آل الجارود لأنس: أكان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الضُحى؟ قال: ما رأيته صلاها إِلَّا يومئذ.

صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (670) عن آدم، قال: حَدَّثَنَا شعبةُ، قال: حَدَّثَنَا أنس بن سيرين فذكر مثله.

وزاد أبو داود (657) بعد قوله فدعاه إلى منزله:"فَصَلِّ حتَّى أراك كيف تُصلِّي، فأقتدِيَ بك".

وفي ابن ماجة (756) وفي البيت فحل من هذه الفحول، فأمر بناحية منه، فكُنِس ورُشَّ فصَلَّى وصلينا معه.

قال ابن ماجة: الفحل هو الحصير الذي قد اسودَّ.

وقيل: رجل من الأنصار هو: عتبان بن مالك، ورجل من آل الجارود هو: عبد الحميد بن المنذر بن الجارود البصري. انظر:"الفتح" (2/ 152).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনসারী গোত্রের একজন লোক বলল—সে ছিল একজন স্থূলকায় ব্যক্তি—‘আমি আপনার সাথে (মসজিদে জামাআতে) সালাত আদায় করতে পারি না।’ অতঃপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য খাবারের আয়োজন করল এবং তাঁকে তার বাড়িতে দাওয়াত দিল। সে তাঁর জন্য একটি চাটাই বিছিয়ে দিল এবং সেটির একপাশে পানি ছিটিয়ে দিল। অতঃপর তিনি তার উপর দু’রাকাআত সালাত আদায় করলেন। এরপর জারুদ গোত্রের এক ব্যক্তি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করল: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি দুহার (চাশত-এর) সালাত আদায় করতেন? আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাঁকে সেদিন ছাড়া আর কোনো দিন তা আদায় করতে দেখিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (2495)


2495 - عن جابر قال: حَدَّثَنَا أبو سعيد الخدريّ أنه دخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم فوجده يُصَلِّي على حصير يسجد عليه.

صحيح: رواه مسلم في المساجد (661/ 271) من طريق الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.

قال الترمذيّ (332) بعد أن روى الحديث من طريق الأعمش:"حديث أبي سعيد حديث حسن (وفي بعض النسخ زيادة: صحيح) والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم، إِلَّا أن قومًا من أهل العلم اختاروا الصّلاة على الأرض استحبابًا. وأبو سفيان اسمه: طلحة بن نافع". انتهى.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে একটি চাটাইয়ের উপর সালাত আদায় করতে দেখলেন, যার উপরে তিনি সিজদা করছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2496)


2496 - عن وعن ابن عباس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي على الخُمرة.

حسن: رواه الترمذيّ (331) عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا أبو الأحوص، عن سماك بن حرْب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح" قال أحمد وإسحاق: قد ثبت عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم الصلاةُ على الخمرة. وقال: الخمرة هو: حصير قصير". انتهى.

ورواه ابن حبان في صحيحه (2310 و 2311) من طريق أبي الأحوص به.

رجاله ثقات غير سماك بن حرب وهو مختلف فيه وخاصة في روايته عن عكرمة غير أنه حسن الحديث إذا لم يحدث ما لم يحدث به غيره.

والذي رواه ابن خزيمة (1005)، والحاكم (1/ 259) من طريق زمعة بن صالح، عن سلمة بن وهرام، عن عكرمة، عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صلى على بساط. وقال الحاكم: صحيح، وقد
احتج البخاريّ بعكرمة، واحتج مسلم بزمعة، فتعقبه الذّهبيّ بقوله: قرنه، أي زمعة بآخر، وسلمة ضعَّفه أبو داود.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুমরাহর (এক ধরনের ছোট মাদুরের) উপর সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2497)


2497 - عن أم سُليم أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يأتيها فيقيل عندها، فتبسط له نِطْعًا فيقيل عندها، وكان كثير العَرَقِ، فتجمع عَرقَه، فتجعله في الطيب والقوارير، قالت: وكان يُصلِّي على الخمرة.

صحيح: رواه أحمد (27117)، والطَّبرانيّ في الكبير (25/ 122) كلاهما من طريق وُهيب، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أنس، عن أم سُليم وهي والدته واللّفظ لأحمد، وأمّا الطبرانيّ فاقتصر على قولها: كان يصلِّي على الخمرة.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات وأصل الحديث في صحيح مسلم (2332) من طريق وهيب به مثله إِلَّا أنه لم يذكر الصّلاة على الحصير.

ورواه أبو بكر بن أبي شيبة (1/ 398) ومن طريقه الطبرانيّ في الكبير (25/ 122) عن عبد الوهّاب الثقفيّ، عن أيوب، عن أنس بن سيرين، عن أنس، عن أم سُليم مختصرًا في الصّلاة على الحصير.




উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট আসতেন এবং সেখানে বিশ্রাম করতেন (কাইলুলাহ করতেন)। তখন তিনি তাঁর জন্য একটি চামড়ার দস্তরখান বিছিয়ে দিতেন, আর তিনি সেখানে বিশ্রাম করতেন। তাঁর প্রচুর ঘাম হতো। (উম্মে সুলাইম) তাঁর ঘাম সংগ্রহ করতেন এবং তা সুগন্ধি ও শিশির মধ্যে রাখতেন। তিনি (উম্মে সুলাইম) বললেন: আর তিনি 'খুমরাহ' (ছোট চাটাই) এর উপর সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2498)


2498 - عن أم حبيبة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي على الخمرة.

صحيح: رواه أبو يعلى (7095 تحقيق الأثري) عن أبي خيثمة، حَدَّثَنَا وهب بن جرير، حَدَّثَنَا شعبة، عن أبي حصين، عن يحيى بن وثَّاب، عن أبي عبد الرحمن، عن أم حبيبة فذكرت مثله.

ورواه الطبرانيّ في الكبير (23/ 342) من طريق عبيد الله بن عمر القواريريّ، عن وهب بن جرير به مثله.

قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 75): رواه أبو يعلى والطبرانيّ، ورجال أبي يعلى رجال الصَّحيح.

قلت: وهو كما قال، وأبو حصين هو: عثمان بن عاصم الأسدي الكوفي ثقة ثبت من رجال الجماعة.

وأبو عبد الرحمن السلمي هو: عبد الله بن حبيب بن رُبَيَّعة - بضم الراء، وقيل: بفتحها، السلمي الكوفي المقري مشهور بكنيته ثقة ثبت من رجال الجماعة.

ورواه أيضًا ابن حبان في صحيحه (2312) من طريق زكريا بن الحكم الرَسْعَنِي قال: حَدَّثَنَا وهب ابن جرير به مثله. وزكريا هذا ذكره المصنف في الثّقات (8/ 255) وهو مقبول لأنه تُوبع من الاثنين.




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'খুমরার' (ছোট খেজুর পাতার চাটাই) উপর সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2499)


2499 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي على خُمرة، فقال:"يا عائشةُ! ارفَعِي عنَّا حصيرَكِ هذا، فقد خشيتُ أن يَفْتِنُ في الناسُ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (26111) عن عثمان بن عمر، حَدَّثَنَا يونس، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

وأخرجه ابن خزيمة في صحيحه (1011) عن الفضل بن مهل، نا عثمان بن عمر به مثله.

قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 56):"رواه أحمد ورجاله رجال الصَّحيح".
وقوله:"ارفَعي عَنَّا حصرِكِ" قال السندي: يُريد الخمرة، كما في نسخة، ومعنى:"يفتن الناس" أنهم يعتقدون أن الصّلاة على الخمرة سنة لو داوم هو صلى الله عليه وسلم الصّلاة عليها، فترك المداومة خوفًا من ذلك. والله تعالى أعلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি খুমরা (খেজুর পাতার তৈরি ছোট চাটাই) এর উপর সালাত আদায় করতেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আয়িশা! আমাদের কাছ থেকে তোমার এই চাটাইটি সরিয়ে নাও। কেননা আমার ভয় হচ্ছে যে, মানুষ এতে ফিতনায় পড়বে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2500)


2500 - عن أمِّ سلمة قالتْ: إنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي على الخمرة.

صحيح: رواه أبو يعلى (6848 تحقيق الأثري) عن العباس بن الوليد، حَدَّثَنَا وُهيب، عن خالد، عن أبي قِلابة، عن زينب بنت أم سلمة، عن أمها أم سلمة فذكرت الحديث.

قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 57):"رواه أبو يعلى ورجاله رجال الصَّحيح، ورواه الطبرانيّ في الكبير والأوسط إِلَّا أنه قال فيه:"كان لرسول الله صلى الله عليه وسلم حصير وخُمرة يُصَلِّي عليها".




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘খুমরাহ’র (ছোট চাটাই/নামাজের মাদুর) উপর সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2501)


2501 - عن ابن عمر قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي على الخمرة، ويسجد عليها. حسن: رواه الطبرانيّ في"المعجم الكبير" (13415) وفي المعجم الأوسط"مجمع البحرين" (705) عن أحمد بن شعيب النسائيّ، أنا قُتَيبة بن سعيد، ثنا العطاف بن خالد، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن لأجل الكلام في العطاف بن خالد غير أنه حسن الحديث وقد توبع كما سيأتي.

فقد رواه ابن خزيمة (1013) والبزّار"كشف الأستار" (608) كلاهما عن محمد بن المبارك المخرميّ، كذا عند ابن خزيمة، وعند البزّار: محمد بن عبد الله بن المبارك المخرميّ، ثنا مُعلَّى بن منصور، ثنا وهيب، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي على الخمرة، لا يدعها في سفر ولا حضر، هذا لفظ ابن خزيمة.

ولفظ البزّار: كان يصلِّي على الخمرة، أحسبه قال: ويسجد عليها.

ومعلى بن منصور مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

ومحمد بن عبد الله بن المبارك هو: القرشي المخرَّميّ، بمعجمة وتثقيل، أبو جعفر البغدادي المدائني الحافظ قاضي حلوان. روى عنه البخاريّ وأبو داود والنسائيّ، وهو ثقة حافظ مات سنة ستين ومائتين أو قبلها بقليل وهو من رجال التهذيب، وليس هو: محمد بن المبارك المخرَّمي القرشي الصوري فإنه مات سنة 215 هـ، ووُلِد ابن خزيمة سنة 223 هـ.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (5660) عن أبي النضر، حَدَّثَنَا شريك، عن أبي إسحاق، عن البهيّ، عن ابن عمر فذكره مثله.

ورواه أيضًا (5733) عن إبراهيم بن أبي العباس، حَدَّثَنَا شريك به وشك فيه شريك في رفعه فهذه كلها ضعيفة؛ لأن شريك بن عبد الله سيء الحفظ، وقد صحَّ الحديث من غير طريقه كما يؤيده ما رواه ابن أبي شيبة (1/ 399) من فعل ابن عمر أنه كان يُصلِّي على الخمرة عن وكيع، قال: حَدَّثَنَا سفيان، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر وهو لا يعارض المرفوع.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুমরাহ (খেজুর পাতার তৈরি ছোট চাটাই)-এর উপর সালাত আদায় করতেন এবং তার উপর সিজদা করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2502)


2502 - عن عائشة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقبل الله صلاة حائض إِلَّا بخمار".

صحيح: رواه أبو داود (641)، والتِّرمذيّ (377)، وابن ماجة (655) كلّهم من طرق عن حمّاد بن سلمة، عن قتادة، عن محمد بن سيرين، عن صفية بنت الحارث، عن عائشة فذكرتِ الحديث.

قال الترمذيّ: حسن.

وإسناده صحيح، وقد صحَّحه ابن خزيمة (775) وعنه رواه ابن حبان (1712)، والحاكم (1/ 251) كلّهم من طريق حمّاد بن سلمة به مثله.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم ولم يخرجاه، وأظن أنه لخلاف فيه على قتادة".

ثمّ ساق رواية ابن أبي عروبة، عن قتادة، عن الحسن عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فذكر مثله. مرسلًا، وقد أشار إليه أبو داود عقب الحديث المتصل.

قلت: وهذه ليست بعلة، فإن الصَّحيح لا يُعَلُّ بالضعيف كما هو معروف في علم علل الحديث. فإذا كان ابن أبي عروبة يرُوي عن قتادة مرسلًا وحماد بن سلمة يرويه متصلًا فالحكم لمن زاد لا سيما أن حمّاد بن سلمة ثقة، وقد تابعه حمّاد بن زيد فروى عن قتادة متصلًا ابن حزم في"المحلى" (3/ 219) وأظهر الدَّارقطنيّ علة أخرى وهي أن شعبة وسعيد بن بشير روياه عن قتادة موقوفًا. قلت: والحكم لمن زاد.

وقوله: الحائض، أي التي بلغت سن الحيض، ولم يرد به المرأة التي هي في أيام حيضها، فإن الحائض لا تُصلي بوجه.

ولباس المرأة في الصّلاة مما لا خلاف فيه الدرع والخمار، فإن الدرع الذي يُشبه القميص يُغطي ظاهر قدميها، والخمار يغطي رأسها وعنقها، فهي إذا سجدت قد يبدو باطن القدم كما قال شيخ الإسلام ابن تيمية في رسالة"حجاب المرأة ولباسها في الصّلاة" (ص 26).

وقد رُوي عن ميمونة وأم سلمة أنهما كانتا تصليان في درع وخمار، ليس عليهما إزار، ذكره مالك في الموطأ، ولذا قال أحمد: قد اتفق عامتهم على الدرع والخمار،"المغني" (2/ 330).

وقال شيخ الإسلام رحمه الله:"وبالجملة" فقد ثبت بالنّص والإجماع أنه ليس عليها في الصّلاة أن تلبس الجلباب الذي يسترها إذا كانت في بيتها، وإنما ذلك إذا خرجت، وحينئذ فتصلي في بيتها، وإن بدا وجهها ويداها وقدماها". مجموع الفتاوي (22/ 115).

وأمّا حديث أمِّ سلمة الذي في"السنن" بإسناد صحيح، قالت: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم: كم تجر المرأة من ذيلها؟ قال:"شبرًا". قلت: ينكشف عنها (أي سوقها) قال:"ذراع لا تزيد عليه". وسيأتي تخريجه في كتاب اللباس.

فقال شيخ الإسلام:"هذا إذا خرجن من البيوت ....".
وقال:"وكنّ نساء المسلمين يصلين في بيوتهنّ، وقد قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لا تمنعوا إماء الله مساجد الله، وبيوتهنّ خير لهن" ولم يؤمرن مع القمص إِلَّا الخُمُر، لم تؤمر بما يغطي رجليها، لا خف ولا جورب، ولا بما يغطي يديها لا بقفازين ولا غير ذلك. فدلّ على أنه لا يجب عليها في الصّلاة ستر ذلك إذا لم يكن عندها رجال أجانب" (ص 32).

وكانت عائشة تصلي في الدرع والخمار، وكذلك كانت ميمونة تصلي في الدرع والخمار، ليس عليها إزار، وعن هشام بن عروة، عن أبيه أن امرأة استفتته فقالت: إن المِنْطَق يَشق عليَّ. أفأصَلِّي في دِرع وخمار؟ فقال: نعم، إذا كان الدِرعُ سابغًا.

كل هذه الآثار أخرجها مالك في كتاب صلاة الجماعة.

المِنْطَق ما يُشد به الوسط.

قال ابن عبد البر: المِنْطَق والحقو والإزار والسراويل واحد، وقال أيضًا: أجمع العلماء على أنها لا تُصلي متنقِّبةً ولا متبرقعةً. انظر:"الاستذكار" (5/ 444).

وأمّا ما رُوِيَ عن محمد بن زيد بن قُنْفُذ، عن أمِّه، أنها سألت أم سلمة: ماذا تُصلي فيه المرأة من الثياب؟ فقالت:"تصلي في الخمار والدرع السابع الذي يُغَيّبُ ظهور قدميها"، فهو موقوف.

رواه مالك في صلاة الجماعة (36) عن محمد بن زيد بن قُنفذ به مثله. ورواه أبو داود (639) عن القعنبيّ، عن مالك.

وأم محمد لا تعُرف كما قال الذّهبيّ في"الميزان" كنيتُها"أم حرام" واسمها:"آمنة".

قال البيهقيّ (2/ 232): وكذلك رواه بكر بن منصور وحفص بن غياث وإسماعيل بن جعفر ومحمد بن إسحاق، عن محمد بن زيد، عن أمه، عن أم سلمة موقوفًا، وقال: ورواه عثمان بن عمر، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن محمد بن زيد مرفوعًا".

قلت: حديث عثمان بن عمر رواه أبو داود (640) عن مجاهد بن موسى، عنه، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار به.

وقال فيه: عن أم سلمة أنها سألتِ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم: أتُصلي المرأة في درع وخمار ليس عليها إزار؟ قال:"إذا كان الدرع سابغًا يُغَطِّي ظهور قدميها".

قال أبو داود:"روي هذا الحديث مالك بن أنس ويكر بن مضر وحفص بن غياث وإسماعيل بن جعفر وابن أبي ذئب وابن إسحاق، عن محمد بن زيد، عن أمه، عن أم سلمة. ولم يذكر أحد منهم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، قصروا به على أمِّ سلمة رضي الله عنها".

وفيه إشارة إلى أن عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار انفرد برفعه عن محمد بن زيد وعبد الرحمن بن عبد الله بن دينار وإن كان من رجال البخاريّ فقد قال فيه أبو حاتم:"فيه لين، يُكتب حديثه ولا يحتج به".
أي عند المخالفة. ولذا رجّح الحافظ في التلخيص الوقف وقال:"أعلّه عبد الحق بأن مالكًا وغيره رووه موقوفًا، وهو الصواب".

وأمّا الحاكم فرواه (1/ 250) من طريق مجاهد بن موسى مثل إسناد أبي داود إِلَّا أنه قال فيه:"عن أبيه، عن أم سلمة" وقال: صحيح على شرط البخاريّ، وفيه وهمان:

الأوّل: قوله:"عن أبيه" وكل من روى هذا الحديث قال فيه:"عن أمه" فلا ندري هل هذا الخطأ منه أم من النساخ.

والثاني: محمد بن زيد بن المهاجر بن قُنْفُذ ليس من رجال البخاريّ وإن كان هو ثقة من رجال مسلم، وكذلك أبوه وأمه ليسا من رجال البخاريّ.

وأهم من كل هذا فإن البخاريّ لا يخرج حديث رجل خالف جماعة فرفعه، ووقفه الآخرون، كون الراوي من رجاله لا يكفي للحكم عليه بأنه على شرطه حتَّى نعرف كيفية الرواية عنه.

قال ابن الجوزي في"التحقيق" (1/ 114) عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار ضعَّفه يحيى، وقال أبو حاتم:"لا يحتج به، والظاهر أنه غَلِط في رفع هذا الحديث".

وقال صاحب"التنقيح":"عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار روي له البخاريّ في صحيحه، ووثَّقه بعضُهم لكنه غَلِط في رفع هذا الحديث" انظر أيضًا:"نصب الراية" (1/ 299 - 300).

وأمّا فقهاء الإسلام فأجمعوا على أنه يجوز للمرأة كشف وجهها في الصّلاة، واختلفوا في كشف الكفين؛ فعند الإمام أحمد روايتان: إحداهما يجوز كشفها، وهو قول مالك والشافعي؛ لأن ابن عباس كان يقول في قوله تعالى: {وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا} [النور: 31] قال: الوجه والكفين.

وكذلك اختلفوا في تغطية القدمين، فقال أبو حنيفة: القدمان ليسا من العورة؛ لأنهما يظهران غالبًا. وقال أحمد: يجب تغطية القدمين؛ لما جاء في حديث ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من جر ثوبه خيلاء لم ينظر الله إليه يوم القيامة" فقالت أم سلمة: فكيف يصنعن النساء بذيولهن؟ قال:"يرخين شبرًا" فقالت: إذا تنكشف أقدامهن. قال:"فيرخينه ذراعًا لا يزدن عليه". رواه أصحاب السنن، وقال الترمذيّ (1731): حسن صحيح. وسيأتي تخريجه في كتاب اللباس، ولكن حمله شيخ الإسلام على الخروج من البيت كما مضى.

وقال في فتاواه (22/ 114، 115):"فكذلك القدم يجوز إبداؤه عند أبي حنيفة وهو الأقوى.

فإن عائشة جعلته من الزينة الظاهرة. قالت: {وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا} قالت:"الفتح" حلق من فضة تكون في أصابع الرجلين. رواه ابن أبي حاتم. فهذا دليل على أن النساء كن يظهرن أقدامهن أولا، كما يظهرن الوجه واليدين، كن يرخين ذيولهن فهي إذا مشت قد يظهر قدمها، ولم يكن يمشين في خفاف وأحذية، وتغطية هذا في الصّلاة فيه حرج عظيم. وأم سلمة
قالت:"تصلي المرأة في ثوب سابغ يغطي ظهر قدميها" فهي إذا سجدت قد يبدو باطن القدم.

وبالجملة: قد ثبت بالنص والإجماع أنه ليس عليها في الصّلاة أن تلبس الجلباب الذي يسترها إذا كانت في بيتها، وإنما ذلك إذا خرجت، وحينئذ فتصلي في بيتها وإن رئي وجهها ويداها وقدماها كما كن يمشين أولا قبل الأمر بإدناء الجلابيب عليهن، فليست العورة في الصّلاة مرتبطة بعورة النظر، لا طردًا ولا عكسًا". انتهى.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
“আল্লাহ্ তাআলা ঋতুমতী (অর্থাৎ সাবালিকা) নারীর সালাত কবুল করেন না ওড়না (খিমার) ছাড়া।”

সহীহ: এটি আবূ দাঊদ (৬৪১), তিরমিযী (৩৭৭) এবং ইবনু মাজাহ (৬৫৫) বর্ণনা করেছেন। তাঁরা সকলেই হাম্মাদ ইবনু সালামাহ, তিনি কাতাদাহ, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন, তিনি সাফিয়াহ বিনতুল হারিস, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বিভিন্ন সূত্রে হাদীসটি অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন।

তিরমিযী বলেছেন: এটি হাসান (উত্তম)। এর সনদ সহীহ। ইবনু খুযাইমাহ (৭৭৫) এটি সহীহ বলেছেন এবং তাঁর থেকে ইবনু হিব্বান (১৭১২) ও হাকিম (১/২৫১) বর্ণনা করেছেন। তাঁরা সকলেই হাম্মাদ ইবনু সালামাহ এর সূত্রে এটি অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন।

হাকিম বলেছেন: "এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ কিন্তু তাঁরা (বুখারী ও মুসলিম) এটি উদ্ধৃত করেননি। আমার ধারণা, কাতাদাহর উপর মতানৈক্য থাকার কারণেই (উদ্ধৃত করা হয়নি)।"

অতঃপর তিনি ইবনু আবী আরূবাহ্‌র রিওয়ায়াত উল্লেখ করেছেন, যা কাতাদাহ, তিনি হাসান, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপভাবে মুরসাল (সাহাবী ব্যতীত সরাসরি নবী থেকে) রূপে বর্ণনা করেছেন। সংযুক্ত (মুত্তাছিল) হাদীসটির পরে আবূ দাঊদ এদিকে ইঙ্গিত দিয়েছেন।

আমি (পর্যবেক্ষক) বলি: এটি কোনো ত্রুটি নয়। কারণ হাদীসের ত্রুটি (ইলল) জ্ঞানে যা সুপরিচিত, দুর্বল দ্বারা সহীহকে ত্রুটিযুক্ত করা যায় না। যদি ইবনু আবী আরূবাহ্‌ কাতাদাহ থেকে মুরসাল রূপে বর্ণনা করেন এবং হাম্মাদ ইবনু সালামাহ মুত্তাছিল (সংযুক্ত) রূপে বর্ণনা করেন, তবে যিনি বৃদ্ধি করেছেন (অর্থাৎ সংযুক্ত রূপে বর্ণনা করেছেন), তাঁর কথাই প্রাধান্য পাবে। বিশেষত হাম্মাদ ইবনু সালামাহ যখন নির্ভরযোগ্য। হাম্মাদ ইবনু যায়দও তাঁর অনুসরণ করেছেন এবং কাতাদাহ থেকে মুত্তাছিল রূপে বর্ণনা করেছেন (ইবনু হাযম ‘আল-মুহাল্লা’ গ্রন্থে ৩/২১৯)। দারাকুতনী আরেকটি ত্রুটি উল্লেখ করেছেন, তা হলো শু‘বাহ ও সাঈদ ইবনু বাশীর এটি কাতাদাহ থেকে মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি রূপে) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আমি বলি: যিনি বৃদ্ধি করেছেন, তাঁর কথাই প্রাধান্য পাবে।

এখানে 'আল-হায়েয' (ঋতুমতী) বলতে সেই নারীকে বোঝানো হয়েছে যে ঋতুর বয়সে পৌঁছেছে (সাবালিকা), সেই নারীকে নয় যে তার ঋতুর দিনগুলিতে রয়েছে; কারণ ঋতুকালীন নারী কোনো অবস্থাতেই সালাত আদায় করে না।

সালাতের জন্য নারীর পোশাকের ক্ষেত্রে যা নিয়ে কোনো মতপার্থক্য নেই, তা হলো: লম্বা কামিজ (দির‘) এবং ওড়না (খিমার)। কারণ কামিজের মতো যে দির‘ তা তার পায়ের উপরিভাগ আবৃত করে এবং খিমার তার মাথা ও ঘাড় আবৃত করে। যখন সে সিজদা করে, তখন তার পায়ের তলা দেখা যেতে পারে, যেমন শায়খুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়্যাহ তাঁর ‘নারীর হিজাব ও সালাতের পোশাক’ (পৃষ্ঠা ২৬) গ্রন্থে বলেছেন।

মাইমূনা ও উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, তাঁরা লম্বা কামিজ (দির‘) ও ওড়না (খিমার) পরে সালাত আদায় করতেন, তাঁদের ওপর ইযার (লুঙ্গি বা চাদর) থাকত না। এটি মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-মুওয়াত্ত্বা’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। এজন্যই ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "অধিকাংশ (সাহাবী) দির‘ ও খিমারের ওপর একমত হয়েছেন।" (আল-মুগনী ২/৩৩০)।

শায়খুল ইসলাম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "মোটকথা, কুরআন ও ইজমার মাধ্যমে প্রমাণিত হয়েছে যে, নারী যখন নিজ গৃহে থাকে, তখন সালাতে তার ওপর এমন জিলবাব (বড় চাদর) পরিধান করা আবশ্যক নয় যা তাকে ঢেকে রাখে। বরং এটি তখনই প্রয়োজন, যখন সে বাইরে যায়। এমতাবস্থায় সে নিজ ঘরে সালাত আদায় করতে পারে, যদিও তার মুখমণ্ডল, দুই হাত ও দুই পা দেখা যায়।" (মাজমূ‘উল ফাতাওয়া ২২/১১৫)।

আর উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সেই হাদীস যা সহীহ সনদে ‘আস-সুনান’ গ্রন্থে রয়েছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হলো: নারী তার কাপড়ের আঁচল কতটুকু ঝোলাবে? তিনি বললেন: "এক বিঘত।" আমি বললাম: তাহলে তো তার পায়ের গোছা দেখা যাবে। তিনি বললেন: "এক হাত, এর চেয়ে বেশি নয়।" পোশাক পরিচ্ছেদ (কিতাবুল লিবাস) অধ্যায়ে এর তাখরীজ আসবে।

শায়খুল ইসলাম বলেছেন: "এটি তখন প্রযোজ্য, যখন তারা ঘর থেকে বের হয়..."।

তিনি আরো বলেন: "মুসলিম নারীরা তাদের ঘরে সালাত আদায় করতেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'তোমরা আল্লাহর বান্দীদেরকে আল্লাহর মসজিদ থেকে বারণ করো না। তবে তাদের ঘরই তাদের জন্য উত্তম।' আর কামিজের সাথে ওড়না ছাড়া অন্য কিছুর আদেশ তাদের দেওয়া হয়নি। তাদের পা আবৃত করার আদেশ দেওয়া হয়নি, না মোজা বা অন্য কিছু দ্বারা। আর তাদের হাত আবৃত করারও আদেশ দেওয়া হয়নি, না গ্লাভস বা অন্য কিছু দ্বারা। এটি প্রমাণ করে যে, যদি তাদের কাছে কোনো বেগানা পুরুষ না থাকে, তবে সালাতে এগুলো আবৃত করা তাদের জন্য ওয়াজিব নয়।" (পৃষ্ঠা ৩২)।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লম্বা কামিজ (দির‘) ও ওড়না (খিমার) পরে সালাত আদায় করতেন। অনুরূপভাবে মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও দির‘ ও খিমার পরে সালাত আদায় করতেন, তাঁর উপর ইযার থাকত না। হিশাম ইবনু উরওয়াহ্‌, তিনি তার পিতা থেকে বর্ণনা করেন যে, এক নারী তাকে জিজ্ঞাসা করে বললেন: মিনতাক (কোমরে বাঁধা বেল্ট) আমার জন্য কষ্টকর। আমি কি দির‘ ও খিমার পরে সালাত আদায় করতে পারি? তিনি বললেন: হ্যাঁ, যদি দির‘ প্রশস্ত ও লম্বা হয়। এই সবগুলো আসার (সাহাবীর উক্তি) মালিক তাঁর ‘কিতাবু সালাতিল জামা‘আহ’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন।

মিনতাক হলো যা দিয়ে কোমর শক্ত করে বাঁধা হয়। ইবনু আবদিল বার্র বলেন: মিনতাক, হাক্কু, ইযার এবং সারাবীল (পাজামা) এক। তিনি আরো বলেন: উলামাগণ ইজমা করেছেন যে, নারী নেকাব বা বোরকা পরে সালাত আদায় করবে না। (দ্রষ্টব্য: আল-ইসতিযকার ৫/৪৪৪)।

আর মুহাম্মাদ ইবনু যায়দ ইবনু কুনফুয, তার মা থেকে, তিনি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি জিজ্ঞাসা করেছিলেন: নারী কোন ধরনের পোশাকে সালাত আদায় করবে? তিনি বললেন: "ওড়না (খিমার) এবং এমন লম্বা কামিজ (দির‘ সাবিগ) পরে সালাত আদায় করবে যা তার পায়ের উপরিভাগ ঢেকে রাখে।" এটি মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি)। এটি মালিক ‘সালাতুল জামা‘আহ’ (৩৬) গ্রন্থে মুহাম্মাদ ইবনু যায়দ ইবনু কুনফুয থেকে অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন। আবূ দাঊদও (৬৩৯) এটি আল-কা‘নাবী, তিনি মালিক থেকে বর্ণনা করেছেন।

আর মুহাম্মাদের মা পরিচিত নন, যেমনটি যাহাবী ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে বলেছেন। তাঁর কুনিয়াত হলো উম্মু হারাম এবং তাঁর নাম হলো আমিনা।

বায়হাকী (২/২৩২) বলেন: অনুরূপভাবে বকর ইবনু মানসূর, হাফ্‌স ইবনু গিয়াস, ইসমাঈল ইবনু জা‘ফার এবং মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাকও এটি মুহাম্মাদ ইবনু যায়দ, তিনি তার মা, তিনি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: উসমান ইবনু উমার এটি আবদুর রহমান ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু দীনার, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু যায়দ থেকে মারফূ‘ (নবীর উক্তি রূপে) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি বলি: উসমান ইবনু উমারের হাদীসটি আবূ দাঊদ (৬৪০) মুজাহিদ ইবনু মূসা, তিনি উসমান ইবনু উমার, তিনি আবদুর রহমান ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু দীনার থেকে বর্ণনা করেছেন।

তাতে বলা হয়েছে: উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন: নারী কি দির‘ ও খিমার পরে সালাত আদায় করতে পারে, যখন তার উপর ইযার (চাদর বা লুঙ্গি) থাকবে না? তিনি বললেন: "যদি দির‘ প্রশস্ত ও লম্বা হয় এবং তার পায়ের উপরিভাগ আবৃত করে।"

আবূ দাঊদ বলেন: "এই হাদীসটি মালিক ইবনু আনাস, বকর ইবনু মুদার, হাফ্‌স ইবনু গিয়াস, ইসমাঈল ইবনু জা‘ফার, ইবনু আবী যি’ব ও ইবনু ইসহাক, মুহাম্মাদ ইবনু যায়দ, তিনি তার মা, তিনি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তাদের কেউই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা উল্লেখ করেননি, তাঁরা এটিকে উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি হিসেবে সীমিত রেখেছেন।"

এতে ইঙ্গিত রয়েছে যে, আবদুর রহমান ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু দীনার একাই মুহাম্মাদ ইবনু যায়দ থেকে এটিকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করার ক্ষেত্রে একক হয়ে গেছেন। যদিও আবদুর রহমান ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু দীনার বুখারীর রিজাল (বর্ণনাকারী) এর অন্তর্ভুক্ত, তবুও আবূ হাতিম তাঁর সম্পর্কে বলেছেন: "তাঁর মধ্যে কিছুটা দুর্বলতা রয়েছে। তাঁর হাদীস লেখা যায়, কিন্তু দলীল হিসেবে ব্যবহার করা যায় না।" অর্থাৎ যখন তিনি অন্যদের বিরোধিতা করেন। এ কারণেই হাফিয ইবন হাজার ‘আত-তালখীস’ গ্রন্থে মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি) মতটিকে প্রাধান্য দিয়ে বলেছেন: "আবদুল হক এর ত্রুটি উল্লেখ করেছেন যে, মালিক ও অন্যান্যরা এটিকে মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন, আর এটাই সঠিক।"

তবে ইসলামি ফুকাহাগণ এই বিষয়ে ইজমা (ঐকমত্য) করেছেন যে, সালাতে নারীর জন্য তার মুখমণ্ডল খোলা রাখা বৈধ। আর দুই হাতের তালু খোলা রাখার বিষয়ে মতভেদ করেছেন; ইমাম আহমাদের নিকট দুটি অভিমত রয়েছে: একটি হলো তা খোলা রাখা বৈধ, আর এটাই ইমাম মালিক ও শাফিঈর অভিমত। কারণ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহ তাআলার বাণী: {وَلا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلا مَا ظَهَرَ مِنْهَا} [সূরা নূর: ৩১] এর ব্যাখ্যায় বলেছেন: "তা হলো মুখমণ্ডল ও দুই হাতের তালু।"

অনুরূপভাবে পায়ের পাতা আবৃত করা নিয়েও মতভেদ করেছেন। আবূ হানীফা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: পায়ের পাতা সতরের অন্তর্ভুক্ত নয়, কারণ এগুলো সাধারণত প্রকাশ হয়ে থাকে। আর ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: পায়ের পাতা আবৃত করা আবশ্যক। কারণ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর হাদীসে এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি অহংকারবশত তার কাপড় ঝুলিয়ে দেবে, কিয়ামতের দিন আল্লাহ্ তার দিকে তাকাবেন না।" তখন উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নারীরা তাদের আঁচল দিয়ে কী করবে? তিনি বললেন: "তারা এক বিঘত ঝুলিয়ে দেবে।" তিনি বললেন: তাহলে তো তাদের পা উন্মুক্ত হয়ে যাবে। তিনি বললেন: "তাহলে এক হাত ঝুলিয়ে দেবে, এর বেশি নয়।" এটি সুনান গ্রন্থসমূহের রচয়িতাগণ বর্ণনা করেছেন এবং তিরমিযী (১৭১) একে ‘হাসান সহীহ’ বলেছেন। পোশাক পরিচ্ছেদ (কিতাবুল লিবাস) অধ্যায়ে এর তাখরীজ আসবে। কিন্তু শায়খুল ইসলাম পূর্বোক্ত আলোচনার মতো একে ঘর থেকে বের হওয়ার জন্য প্রযোজ্য বলে মত দিয়েছেন।

তিনি তাঁর ফাতাওয়া গ্রন্থে (২২/১১৪, ১১৫) বলেছেন: "তেমনিভাবে পা প্রকাশ করাও আবূ হানীফার নিকট বৈধ, আর এটাই অধিক শক্তিশালী মত। কারণ আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একে প্রকাশ্য সৌন্দর্যের অন্তর্ভুক্ত করেছেন। তিনি বলেন: {وَলা يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلا مَا ظَهَرَ مِنْهَا} এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেছেন: 'আল-ফাতাহ' হলো রূপার আংটা যা পায়ের আঙ্গুলে পরা হয়। এটি ইবনু আবী হাতিম বর্ণনা করেছেন। এটি প্রমাণ করে যে, নারীরা প্রথমে তাদের মুখমণ্ডল ও হাতদ্বয় প্রকাশের মতোই তাদের পা প্রকাশ করত। তারা তাদের কাপড়ের আঁচল ঝুলিয়ে দিত, ফলে তারা যখন হাঁটত, তাদের পা দেখা যেত। তারা মোজা বা জুতা পরে হাঁটত না। সালাতে এটি আবৃত করার ক্ষেত্রে অনেক কষ্ট (হারাজ) রয়েছে। আর উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: 'নারী এমন লম্বা পোশাকে সালাত আদায় করবে যা তার পায়ের উপরিভাগ আবৃত করে।' সুতরাং সিজদা করলে তার পায়ের তলা দেখা যেতে পারে। মোটকথা: কুরআন ও ইজমার মাধ্যমে প্রমাণিত হয়েছে যে, নারী যখন নিজ গৃহে থাকে, তখন সালাতে তার ওপর জিলবাব (বড় চাদর) পরা আবশ্যক নয়। বরং এটি তখনই প্রয়োজন, যখন সে বাইরে যায়। এমতাবস্থায় সে নিজ ঘরে সালাত আদায় করতে পারে, যদিও তার মুখমণ্ডল, দুই হাত ও দুই পা দেখা যায়, যেমনটি তারা প্রথমে করতো যখন তাদের উপর জিলবাব নিচে নামানোর আদেশ আসেনি। সুতরাং সালাতের সতর (আবরণীয় অংশ) দেখার সতর (বেগানা পুরুষ থেকে আড়াল) এর সাথে সম্পর্কিত নয়, না সরাসরি, না বিপরীতভাবে।" [সমাপ্ত।]









আল-জামি` আল-কামিল (2503)


2503 - عن * *




২৫০৩ - * * থেকে।









আল-জামি` আল-কামিল (2504)


2504 - عن زيد بن أرقم قال: كنا لنتكلمُ في الصّلاة على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، يكلم أحدُنا صاحبَه بحاجته حتَّى نزلت: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ} [سورة البقرة: 238] فأُمرنا بالسّكوت.

متفق عليه: رواه البخاريّ في العمل في الصّلاة (1200) وفي التفسير (4534)، ومسلم في المساجد (539) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن الحارث بن شُبَيل، عن أبي عمرو الشيبانيّ، عن زيد بن أرقم فذكره.

1070 عن أبي هريرة قال: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة وقُمنا معه، فقال أعرابي وهو في الصّلاة: اللَّهُمَّ! ارحمني ومحمدًا ولا ترحمْ معنا أحدًا. فلمّا سلَّم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال للأَعْرابي:"لقد حجَّرت واسعًا" يريد رحمة الله.

صحيح: رواه البخاريّ في الآداب (6010) عن أبي اليمان، أخبرنا شُعيب، عن الزّهريّ، قال: أخبرني أبو سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة قال فذكره.

وسبق تخريجه بالتفصيل في الطهارة؛ لأنه هو الأعرابي نفسه الذي بال في المسجد.

أما قوله:"اللَّهُمَّ! ارحمني ومحمدًا ولا ترحم معنا أحدًا". فيقول السيوطيّ في شرحه للنسائي:"ليس هذا من كلام الناس، نعم هو دعاء بما لا يليق، كأنه لهذا ذُكِر ههنا".

قلت: جعله النسائيّ من الكلام في الصّلاة. وبوَّب به إِلَّا أنه يرى أن ذلك نسخ، لأنه ذكر في الباب نفسه حديث زيد بن أرقم، وفيه التصريح بالنسخ.




যায়দ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সালাতের মধ্যে কথা বলতাম। আমাদের কেউ কেউ তার প্রয়োজনে তার সঙ্গীর সাথে কথা বলত, যতক্ষণ না এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তোমরা সালাতসমূহের প্রতি যত্নবান হও" [সূরা আল-বাকারা: ২৩৮]। অতঃপর আমাদের নীরব থাকার নির্দেশ দেওয়া হলো।

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের জন্য দাঁড়ালেন এবং আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। তখন এক বেদুঈন সালাতের মধ্যেই বলল: "হে আল্লাহ! আমাকে ও মুহাম্মাদকে দয়া করো, আর আমাদের সাথে অন্য কাউকে দয়া করো না।" যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাম ফেরালেন, তখন তিনি বেদুঈনটিকে বললেন: "তুমি তো বিশাল (ব্যাপারকে) সংকীর্ণ করে দিলে।" (তিনি) আল্লাহর রহমতকে উদ্দেশ্য করে একথা বলেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2505)


2505 - عن عبد الله بن مسعود قال: كنا نسَلِّم على رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في الصّلاة فيردُّ علينا. فلمّا رجعنا من عِنْدِ النجاشي سلَّمنا عليه فلم يرد علينا وقال:"إن في الصّلاة شُغلا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في العمل في الصّلاة (1199)، ومسلم في المساجد (538) كلاهما عن ابن نُمَيرٍ، حَدَّثَنَا ابن فُضَيْل، حَدَّثَنَا الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله فذكر مثله.

وأخرجه أبو داود (924)، والنسائي (1221)، وصحّحه ابن حبان (2243) كلّهم من طرق عن عاصم، عن أبي وائل، عن عبد الله قال: كنا نُسلم في الصّلاة، ونأمر بحاجتنا. فقدمتُ على
رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلَّمتُ عليه فلم يرد عليَّ السّلام. فأخذني ما قَدُم وما حدث. فلمّا قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم الصّلاة قال:"إن الله يُحدث من أمره ما يشاء، وإن الله جلّ وعزّ قد أحدث من أمره أن لا تكلَّموا في الصّلاة" فرَّد علَيَّ السّلامَ.

وإسناده حسن من أجل عاصم وهو: ابن أبي النجود: بنون وجيم، الأسدي مولاهم، أبو بكر المقرئ"صدوق له أوهام حجة في القراءة، وحديثه في الصَّحيحين مقرون".

وأبو وائل هو: شقيق بن سلمة الأسدي.

عَلَّقَه البخاريّ بصيغة الجزم عن ابن مسعود"الفتح" (13/ 496).

وأخرجه النسائيّ (1220) بإسناد آخر من طريق سفيان، عن الزُّبير بن عديّ، عن كلثوم، عن عبد الله وزاد فيه:"أن لا تكلموا إِلَّا بذكر الله، وما ينبغي لكم، وأن تقوموا لله قانتين".

وإسناده صحيح. وكلثوم هو: ابن علقمة بن ناجية بن المصطلق وهو ثقة. وله إسناد آخر وفيه من لم يوثق.

وقوله:"ما قَدُم وما حدث" معناه الحزن والكآبة، يريد أنه قد عاوده قديم الأحزان، واتصل بحديثها. كذا قال الخطّابي.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সালাতরত অবস্থায় তাঁকে সালাম দিতাম, আর তিনি আমাদের সালামের উত্তর দিতেন। অতঃপর যখন আমরা নাজ্জাশীর নিকট থেকে ফিরে এলাম, তখন তাঁকে সালাম দিলাম, কিন্তু তিনি আমাদের সালামের উত্তর দিলেন না। এবং বললেন: "নিশ্চয়ই সালাতের মধ্যে মনোযোগ (ব্যস্ততা) রয়েছে।"

(এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। হাদীসটি বুখারী ও মুসলিম বর্ণনা করেছেন।)

আবু ওয়াইল থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: আমরা সালাতের মধ্যে সালাম দিতাম এবং আমাদের প্রয়োজন পূরণের নির্দেশ দিতাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে আগমন করলাম এবং তাঁকে সালাম দিলাম। কিন্তু তিনি আমার সালামের উত্তর দিলেন না। ফলে আমার মধ্যে যা পুরাতন ও নতুন ছিল (দুশ্চিন্তা) তা আমাকে পেয়ে বসলো। অতঃপর যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাঁর নির্দেশে যা চান তা ঘটান। আর মহান আল্লাহ তাআলা তাঁর নির্দেশে এই নতুন বিধান দিয়েছেন যে, তোমরা সালাতের মধ্যে কথা বলবে না।" এরপর তিনি আমার সালামের উত্তর দিলেন।

আর একটি বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "তোমরা কেবল আল্লাহর যিকির এবং তোমাদের জন্য যা উপযোগী তা ছাড়া কথা বলবে না, এবং তোমরা আল্লাহর জন্য বিনয়ী হয়ে দাঁড়াবে।"

(বর্ণনাকারী কর্তৃক ব্যবহৃত) "মা ক্বাদুম ও মা হাদ্ছ" (যা পুরাতন ও যা নতুন) এর অর্থ হলো: দুঃখ ও বিষণ্নতা। তিনি বুঝাতে চেয়েছেন যে পুরাতন দুঃখগুলো তাকে পুনরায় ঘিরে ধরেছিল এবং নতুনগুলোর সাথে যুক্ত হয়েছিল। খাত্তাবী এই ব্যাখ্যা দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2506)


2506 - عن جابر بن عبد الله قال: بعثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حاجة له، فانطلقتُ، ثمّ رجعتُ وقد قَضيتُها. فأتيتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فسلَّمتُ عليه فلم يردَّ عليَّ. فوقع في قلبي ما الله أعلم به، فقلت في نفسي: لعلَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وجد عليَّ أنِّي أبطأتُ عليه. ثمّ سلَّمتُ عليه فلم يرد عليَّ، فوقع في قلبي أشدُّ من المرَّة الأوّلى. ثمّ سلَّمتُ عليه فردَّ عليَّ فقال:"إنما منعني أن أردَّ عليك أنِّي كنتُ أصَلِّي" وكان على راحلته متوجهًا إلى غير القبلة.

متفق عليه: رواه البخاريّ في العمل في الصّلاة (1217)، ومسلم في المساجد (540/ 38) كلاهما من طريق عبد الوارث بن سعيد، حَدَّثَنَا كثير بن شِنْظير، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر بن عبد الله فذكره.

واللّفظ للبخاريّ. وفي رواية عند مسلم عن زهير قال: حَدَّثَنِي أبو الزُّبير، عن جابر قال: أرسلني رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو منطلق إلى بني المصطلق. فأتيتُه وهو يُصَلِّي على بعيره. فكلمتُه. فقال لي بيده هكذا. (وأومأَ زُهير بيده) ثمّ كلمتُه فقال لي هكذا (فأومأَ زُهير أيضًا بيده نحو الأرض) وأنا أسمعه يقرأ، يومئُ برأسه. فلمّا فرغ قال:"ما فعلتَ في الذي أرسلتك له؟ فإنه لم يمنعني أن أكلِّمك إِلَّا أنِّي كنتُ أصَلِّي".




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাঁর একটি প্রয়োজনে পাঠালেন। আমি রওয়ানা হলাম, তারপর কাজটি সম্পন্ন করে ফিরে এলাম। আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে সালাম দিলাম, কিন্তু তিনি আমার সালামের উত্তর দিলেন না। আমার অন্তরে এমন কিছু জাগল যা আল্লাহই ভালো জানেন। আমি মনে মনে বললাম, সম্ভবত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার উপর অসন্তুষ্ট হয়েছেন কারণ আমি তাঁর কাছে আসতে দেরি করেছি। তারপর আমি আবার তাঁকে সালাম দিলাম, এবারও তিনি উত্তর দিলেন না। ফলে আমার অন্তরে প্রথম বারের চেয়েও বেশি কষ্ট হলো। তারপর আমি আবার তাঁকে সালাম দিলাম, তখন তিনি আমার সালামের উত্তর দিলেন এবং বললেন: "তোমাকে জবাব দেওয়া থেকে আমাকে কেবল সালাতই বিরত রেখেছিল।" তিনি তাঁর বাহনের উপর ছিলেন এবং কিবলা ছাড়া অন্য দিকে মুখ করে সালাত আদায় করছিলেন।

মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বনু মুসতালিকের দিকে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি আমাকে একটি কাজে পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে এলাম, তখন তিনি তাঁর উটের উপর সালাত আদায় করছিলেন। আমি তাঁর সাথে কথা বললাম। তিনি আমাকে এভাবে হাত দিয়ে ইঙ্গিত করলেন। (বর্ণনাকারী যুহাইর তাঁর হাত দ্বারা ইঙ্গিত দেখালেন)। এরপর আমি আবার তাঁর সাথে কথা বললাম। তখন তিনি আমাকে এভাবে (মাটির দিকে) ইঙ্গিত করলেন। (যুহাইর আবার মাটির দিকে হাত দিয়ে ইঙ্গিত দেখালেন)। আমি তাঁকে কিরাআত পড়তে শুনছিলাম, আর তিনি মাথা দিয়ে ইশারা করছিলেন। সালাত শেষ করার পর তিনি বললেন: "যে কাজের জন্য তোমাকে পাঠিয়েছিলাম, তা কী করলে? আমি সালাত আদায় করছিলাম বলেই তোমার সাথে কথা বলতে পারিনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (2507)


2507 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا غِرارَ في صلاة ولا تسليم".
قال أحمد: يعني فيما أرى أن لا تُسَلِّم ولا يُسَلَّم عليك. ويغرر الرّجل بصلاته فينصرف وهو فيها شاك.

صحيح: رواه أبو داود (928) عن أحمد بن حنبل، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن مهديّ، عن سفيان، عن أبي مالك الأشجعيّ، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره.

هذا إسناد صحيح. رواه الإمام أحمد في مسنده (9936) ومن طريقه رواه أيضًا الحاكم (1/ 264) وقال: صحيح على شرط مسلم.

قلت: وهو كذلك فإن أبا مالك الأشجعي اسمه سعد بن طارق من رجال مسلم.

ولكن أبدى أبو داود علّةً، فقال: ورواه ابن فُضيل على لفظ ابن مهديّ، ولم يرفعه.

قلت: ابن فُضيل هو: محمد بن فُضيل بن غزوان تكلَّم فيه البعض فقال: لا يحتج به، غير أنه صدوق، وعبد الرحمن بن مهدي أثبت منه وأحفظ، فلا تضرّ مخالفته، فإن زيادة الثقة مقبولةٌ.

وكذلك لا يُعَلُّ الحديث بالشّك الذي أبداه معاوية بن هشام فرواه عن سفيان، عن أبي مالك، عن أبي حازم، عن أبي هريرة قال: أراه رفعه فذكر الحديث.

رواه أبو داود (929) عن محمد بن العلاء، عن معاوية بن هشام به؛ فإن اليقين لا يزول بالشك.

وأمّا معنى قوله: لا غِرار في الصّلاة فهو على وجهين: أحدهما أن لا يُتِمَّ ركوعه ولا سجوده.

والآخر أن يشكَّ هل صلَّى ثلاثًا أو أربعًا فيأخذ بالأكثر، ويترك اليقين وينصرف بالشك.

وقد جاءت السنة في رواية أبي سعيد الخدريّ أنه يطرح الشك ويبني على اليقين، ويصلي ركعة حتَّى يعلم أنه قد أكملها أربعًا. كذا قاله الخطّابي.

وأمّا قوله: ولا تسليم فمعناه كما قال الإمام أحمد: لا تسلِّم ولا يُسلَّم عليك. أي لا يجوز الكلام في الصّلاة بغير كلامها.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "সালাতে এবং সালামে কোনো প্রতারণা বা ধোঁকা নেই।"

ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমার মতে এর অর্থ হলো, তুমি সালাম দেবে না এবং তোমার প্রতিও কেউ সালাম দেবে না। আর ব্যক্তি তার সালাতে ধোঁকা দেয় (ত্রুটি করে) যখন সে সালাতের মধ্যে সন্দেহ থাকা অবস্থায় ফিরে যায় (সালাত শেষ করে)।

সহীহ: এটি আবূ দাঊদ (৯২৮) আহমাদ ইবন হান্বাল সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবদুর রাহমান ইবনু মাহদী, তিনি সুফিয়ান থেকে, তিনি আবূ মালিক আল-আশজা‘ঈ থেকে, তিনি আবূ হাযিম থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।

এই ইসনাদ (বর্ণনাসূত্র) সহীহ। ইমাম আহমাদ তাঁর মুসনাদে (৯৯৩৬) এটি বর্ণনা করেছেন এবং তার সূত্রেই হাকেমও (১/২৬৪) এটি বর্ণনা করেছেন। হাকেম বলেন: এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।

আমি (পর্যালোচক) বলি: এটি তেমনই। কেননা আবূ মালিক আল-আশজা‘ঈ যার নাম সা‘দ ইবনু তারিক, তিনি মুসলিমের রাবী।

তবে আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) একটি ত্রুটির কথা উল্লেখ করেছেন। তিনি বলেন: ইবনু ফুযাইল এটি ইবনু মাহদীর শব্দে বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তিনি মারফূ’ (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) করেননি।

আমি (পর্যালোচক) বলি: ইবনু ফুযাইল হলেন মুহাম্মাদ ইবনু ফুযাইল ইবনু গাযওয়ান। কেউ কেউ তাঁর সম্পর্কে সমালোচনা করেছেন এবং বলেছেন যে, তাঁকে দিয়ে দলীল দেওয়া যায় না, তবে তিনি সত্যবাদী। কিন্তু আবদুর রাহমান ইবনু মাহদী তাঁর চেয়ে অধিক নির্ভরযোগ্য এবং অধিক স্মৃতিধর। সুতরাং তাঁর বিরোধিতা ক্ষতি করে না, কারণ নির্ভরযোগ্য রাবীর অতিরিক্ত বর্ণনা গ্রহণযোগ্য।

অনুরূপভাবে, মুআবিয়া ইবনু হিশাম যে সন্দেহের কথা প্রকাশ করেছেন, তা দিয়ে হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত করা যায় না। তিনি সুফিয়ান থেকে, তিনি আবূ মালিক থেকে, তিনি আবূ হাযিম থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি (মুআবিয়া) বলেন: আমার মনে হয়, তিনি এটিকে মারফূ’ করেছেন এবং হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।

আবূ দাঊদ (৯২৯) মুহাম্মাদ ইবনু আল-‘আলা’ থেকে, তিনি মুআবিয়া ইবনু হিশাম থেকে এটি বর্ণনা করেছেন; কেননা নিশ্চিত জ্ঞান সন্দেহের দ্বারা দূরীভূত হয় না।

আর তাঁর উক্তি ‘সালাতে কোনো প্রতারণা নেই’ এর অর্থ দু'রকম হতে পারে: প্রথমত, সে যেন তার রুকূ এবং সিজদা পূর্ণাঙ্গভাবে আদায় না করে। দ্বিতীয়ত, সে যেন সন্দেহ করে যে তিন রাকাত পড়ল নাকি চার রাকাত, আর সে যেন বেশির দিকটা গ্রহণ করে নিশ্চিত দিকটি ছেড়ে দেয় এবং সন্দেহের সাথে ফিরে যায় (সালাত শেষ করে)।

অথচ আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনায় সুন্নাত এসেছে যে, সে সন্দেহকে পরিত্যাগ করবে এবং নিশ্চিত বিষয়ের ওপর ভিত্তি করবে এবং এক রাকাত সালাত আদায় করবে, যতক্ষণ না সে নিশ্চিত হয় যে সে চার রাকাত পূর্ণ করেছে। খাত্তাবী (রাহিমাহুল্লাহ) এমনটিই বলেছেন।

আর তাঁর উক্তি ‘আর সালামে নেই’ এর অর্থ হলো যেমন ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: তুমি সালাম দেবে না এবং তোমার প্রতিও কেউ সালাম দেবে না। অর্থাৎ সালাতের বাইরের কোনো কথা সালাতে বলা বৈধ নয়।