হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2521)


2521 - عن أنس بن ملك قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما بالُ أقوام يرفعون أبصارهم إلى السماء في صلاتهم؟" فاشتد قوله في ذلك حتَّى قال:"لينتهُنَّ عن ذلك، أو لتُخطفنَّ أبصارُهم".

صحيح: رواه البخاريّ في الأذان (750) عن عليّ بن عبد الله قال: أخبرنا يحيى بن سعيد، قال: حَدَّثَنَا ابن أبي عروبة، قال: حَدَّثَنَا قتادة، أن أنس بن مالك حدثهم فذكر مثله.

ورواه ابن ماجة (1044) من حديث عبد الأعلى بن عبد الأعلى، عن سعيد (بن أبي عروبة) وزاد في أوله: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يومًا بأصحابه، فلمّا قضى الصّلاة أقبل على القوم بوجهه فذكر مثله.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "লোকদের কী হলো যে তারা সালাতের মধ্যে তাদের চোখ আকাশের দিকে তুলে রাখে?" এই বিষয়ে তাঁর কথা কঠোর হলো, এমনকি তিনি বললেন: "তারা যেন অবশ্যই এ কাজ থেকে বিরত থাকে, নতুবা তাদের দৃষ্টিশক্তি ছিনিয়ে নেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2522)


2522 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لينتهِيَنَّ أقوام عن رفعهم أبصارَهم عند الدعاء في الصّلاة إلى السماء، أو لتُخطفنَّ أبصارُهم".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (429) من حديث ابن وهب، حَدَّثَنِي اللّيث بن سعد، عن جعفر بن ربيعة، عن عبد الرحمن بن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

عن جابر بن سمرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: لينتهِيَنَّ أقوام يرفعون أبصارهم إلى السماء في الصّلاة. أو لا ترجع إليهم".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (428) من رواية الأعمش، عن المسيب، عن تميم بن طرفة، عن جابر بن سمرة فذكر مثله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিছু লোক সালাতে দো‘আর সময় আসমানের দিকে তাদের চোখ তোলা থেকে অবশ্যই বিরত থাকবে, নতুবা তাদের দৃষ্টিশক্তি কেড়ে নেওয়া হবে।"

জাবির ইবনু সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিছু লোক অবশ্যই সালাতে আসমানের দিকে তাদের চোখ তোলা থেকে বিরত থাকবে, নতুবা তাদের চোখ তাদের কাছে ফিরে আসবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2523)


2523 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا ترفعوا أبصارَكم إلى السماء أن تُلْتَمَعَ" يعني في الصّلاة.

حسن: رواه ابن ماجة (1043) عن عثمان بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا طلحةُ بن يحيى، عن يونس بن يزيد الأيليّ، عن الزّهريّ، عن سالم، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن لأجل طلحة بن يحيى وهو: ابن النعمان بن أبي عَيَّاش الزُرقي. وثَّقه ابن معين، وقال أبو داود، لا بأس به. وذكره ابن حبان في الثّقات. وتكلّم فيه أبو حاتم فقال: ليس بقويٍّ ولم يبين سببه وقد وثَّقه أيضًا تلميذه عثمان بن أبي شيبة وهو أعلم به من غيره.

فالخلاصة أنه حسن الحديث.

وقد صرَّح هذا الإسناد البوصيري في زوائد ابن ماجة" فقال:"هذا إسناد صحيح رجاله ثقات".

قلت: وصحّحه أيضًا ابن حبان (2281) فرواه هو والطَّبرانيّ في"الكبير" (13139) من طريق
سليمان بن بلال، عن يونس بن يزيد الأيلي به مثله. وهي متابعة قوية لطلحة بن يحيى ووهم الهيثميّ فأورده في"مجمع الزوائد" (2/ 82) وقال:"رواه الطبرانيّ في"الكبير" ورجاله رجال الصَّحيح".

وقوله:"تُلْتَمع أي: تُختلس. يقال: التمعنا القومَ. أي: ذهبنا بهم. ومن هذا قيل: التمع لونُه إذا ذهب.

وفي الباب عن أبي سعيد الخدريّ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كان أحدكم يصلِّي فلا يرفع بصرَه إلى السماء، لا يَلْتمع" إسناده ضعيف، رواه الطبرانيّ في"الكبير" (5436) من طريق ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن ابن شهاب، عن عبد الله بن عبد الله بن عتبة، عن أبي سعيد فذكر مثله.

قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 82) فيه ابن لهيعة، وفيه ضعف. بعد أن عزاه إلى الطبرانيّ في"الأوسط" و"الكبير".

وعن كعب بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لينتهِيَنَّ أقوام عن رفعهم أبصارهم إلى السماء، أو لتُخطفنَّ أبصارُهم" قال الهيثميّ:"رواه الطبرانيّ في الكبير، وفيه عبد العزيز بن عبيد الله بن حمزة وهو ضعيف".



وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أنس بن مالك ولا يصح.

والخلاصة أنه لم يثبت في هذا الباب شيء بعتمد عليه، والشواهد التي ذكرها البيهقيّ وغيره لا يصح منها شيء؛ ولذا اختلف العلماء في هذا الموضوع، فذهب أبو حنيفة والشافعي إلى أن المصلي يستحب له أن ينظر إلى موضع سجوده، وهو الصَّحيح كما يدل عليه المراسيل وآثار الصّحابة والتابعين ومن بعدهم.

وكان محمد بن سيرين يحب أن لا يجاوز بصره مصلاه.

وقال غيرهم: له أن ينظر إلى الإمام إذا كان خلفه، ومن خلفه ينظر إلى من أمامه.

وقال الآخرون: المنع هو رفع البصر إلى السماء فقط، وما عدا ذلك فهو على البراءة الأصلية، فللمصلي أن ينظر إلى جهة القبلة حيث يشاء.

وأمّا غمض العينين في الصّلاة فلم يرد عن السلف، ولذا كرهه بعض أهل العلم، منهم مجاهد وقتادة. قال البيهقيّ: وروي فيه حديث مسند وليس بشيء.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের চোখ আকাশের দিকে তুলবে না, পাছে তা ছিনিয়ে নেওয়া হয়।" (অর্থাৎ, সালাতের মধ্যে)।









আল-জামি` আল-কামিল (2524)


2524 - عن ابن عباس أنه رأى عبد الله بن الحارث يُصَلِّي ورأسُه معقوص من ورائِه. فقام فجعل يحلُّه. فلمّا انصرف أقبل إلى ابن عباس. فقال: مالك ورأسي؟ فقال: إني سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن ما مثلُ هذا مثلُ الذي يُصَلِّي وهو مكتوف".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (492) عن عمرو بن سوَّاد العامِريّ، أخبرنا عبد الله بن وهب، أخبرنا عمرو بن الحارث، أن بُكيرًا حثه، أن كُرَيبًا مولى ابن عباس حدَّثه عن عبد الله بن عباس فذكره.

وقوله: معقوص وهو بمعنى مكتوف كما سبق وهو جمع الشعر وسط الرأس، وفيه أيضًا تشبُّهٌ بفعل النساء. والنهي عن كف الشعر والثوب وقد سبق.

وقال ابن الأثير في"النهاية" (3/ 275) معنى حديث ابن عباس: أراد أنه إذا كان شعره منشورًا سقط على الأرض عند السجود، فيُعطى صاحبه ثواب السجود به، وإذا كان معقوصًا صار في معنى ما لم يسجد، وشبهه بالمكتوف، وهو المشدود اليدين، لأنهما لا يقعان على الأرض في السجود".




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবদুল্লাহ ইবনুল হারিসকে সালাত আদায় করতে দেখলেন এমতাবস্থায় যে, তার মাথার চুল পেছন দিকে খোঁপা করা বা বাঁধা ছিল। তখন তিনি (ইবনে আব্বাস) উঠে দাঁড়ালেন এবং তা খুলতে লাগলেন। যখন তিনি (আবদুল্লাহ ইবনুল হারিস) সালাত শেষ করলেন, তখন ইবনে আব্বাসের দিকে এগিয়ে এসে বললেন: আমার চুল নিয়ে আপনার কী সমস্যা? তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই এর (চুল বেঁধে সালাত আদায় করার) উদাহরণ সেই ব্যক্তির মতো, যে হাত বাঁধা অবস্থায় সালাত আদায় করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2525)


2525 - عن أبي سعيد المقبري أنه رأى أبا رافع مولى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مر بحسن بن عليّ وهو يُصلِّي قائمًا، وقد غرز ضفره في قفاه. فحلَّها أبو رافع. فالتفت حسن إليه مغضبًا فقال أبو رافع: أقبل على صلاتك ولا تغضب؛ فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ذلك كفْل الشّيطان" يعني مقعد الشّيطان يعني: مغرز ضفره.

حسن: رواه أبو داود (646)، والتِّرمذيّ (384) كلاهما من طريق عبد الرزّاق، وهو في مصنفه (2991) عن ابن جريج، قال: حَدَّثَنِي عمران بن موسى، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبيه
فذكره. قال الترمذيّ: حسن.

قلت: وهو كما قال، فإن عمران بن موسى وهو: بن عمرو بن سعيد بن العاص الأموي رُوي عنه ابن جريج وإسماعيل ابن علية. ولم يوثقه غير ابن حبان. ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، وقد توبع كما سيأتي. ومن هذا الطريق رواه أيضًا ابن خزيمة (911) وعنه ابن حبان (2279) في صحيحيهما.

ورواه ابن ماجة (1042)، والدارمي (1386) من وجه آخر من حديث شعبة قال: أخبرني مخوَّل، قال: سمعتُ أبا سعدٍ رجلًا من أهل المدينة يقول: رأيتُ أبا رافع مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم رأي الحسن بن عليّ وهو يُصلِّي فذكر مثله مختصرًا واللّفظ لابن ماجة.

وأبو سعد المدني هو: شرحبيل بن سعد تكلم فيه النسائيّ، ومشاه الآخرون قال الحافظ في التقريب:"صدوق اختلط بآخره" ومثله يُحسَّن حديثه إذا توبع. ومخوَّل هو: ابن راشد الحناط من رجال الجماعة. وهذه المتابعة تُقَوِّي ما سبق.

وأمّا الدَّارميّ فرواه من حديث شعبة، عن مخول، عن أبي سعيد، عن أبي رافع قال: رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا ساجدٌ وقد عَقَصْتُ شعري - أو قال: عقدث - فأطلقه. انتهى. والله أعلم.




আবু রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সাঈদ আল-মাকবুরী তাকে (আবু রাফি’কে) দেখেছেন যে, তিনি হাসান ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে অতিক্রম করছিলেন যখন হাসান দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন। তিনি তার মাথার বেণী ঘাড়ের পেছনে গুঁজে রেখেছিলেন। তখন আবু রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেটি খুলে দিলেন। হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত হয়ে তাঁর দিকে তাকালে আবু রাফি’ বললেন: আপনি আপনার সালাতের প্রতি মনোযোগ দিন এবং রাগ করবেন না। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “এটা শয়তানের আঁটি বা গাঁট (শয়তানের স্থান)। [এর দ্বারা] তিনি তার মাথার বেণী গুঁজে রাখার স্থানকে বুঝিয়েছেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (2526)


2526 - عن أبي سلمة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نهى أن يُصلِّي الرّجلُ ورأسه معقوص.

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير" (23/ 252) عن عليّ بن عبد العزيز، ثنا أبو حذيفة، ثنا سفيان، عن مخول بن راشد، عن سعيد المقبريّ، عن أبي رافع، عن أم سلمة فذكرته.

وإسناده حسن للكلام في أبي حذيفة وهو: موسى بن مسعود النهدي - بفتح النون - البصري تكلم فيه الترمذيّ وأبو أحمد الحاكم، ووثَّقه العجلي وذكره ابن حبان في الثّقات، وقال أبو حاتم: صدوق معروف، ووثَّقه ابن سعد، فمثلهُ يحسن حديثه إذا كان له شواهد صحيحة.

وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (2/ 86): رجاله رجال الصَّحيح فهو كما قال، إِلَّا أن أبا حذيفة أخرج له البخاريّ في المتابعات، والهيثمي لا يفرق بين الأصول والمتابعات.




আবূ সালামাহ থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যে, কোনো পুরুষ যেন তার মাথার চুল খোঁপা করা অবস্থায় সালাত (নামায) আদায় না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (2527)


2527 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى بصاقًا في جدار القبلة، فحكَّه ثمّ أقبل على الناس فقال:"إذا كان أحدكم يُصلِّي فلا يبصق قِبَلَ وجهه، فإن الله تبارك وتعالى قِبَل وجهه إذا صَلَّى".

متفق عليه: رواه مالك في القبلة (4) عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله.

ورواه البخاريّ في الصّلاة (406) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في المساجد (547) عن يحيى بن يحيى التميميّ، كلاهما عن مالك به مثله.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার ক্বিবলার দেয়ালে থুথু দেখলেন। অতঃপর তিনি তা ঘষে পরিষ্কার করে দিলেন, এরপর লোকদের দিকে ফিরে বললেন: "যখন তোমাদের কেউ সালাত আদায় করে, তখন সে যেন তার চেহারার সামনে (ক্বিবলার দিকে) থুথু না ফেলে। কারণ, যখন সে সালাত আদায় করে, তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তার চেহারার সামনেই থাকেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2528)


2528 - عن عبد الله بن عمرو قال: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلًا يصلِّي بالناس صلاة الظهر، فتفل في القبلة وهو يُصلِّي للناس. فلمَّا كانت صلاة العصر، أرسل إلى آخر، فأشفق الرّجلُ الأوّل، فجاء إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! أَنَزَل فيَّ؟ قال:"لا، ولكنَّك تفلت بين يديك، وأنت تؤمُّ الناس فآذيت الله وملائكته".

حسن: رواه الطبرانيّ في"الكبير" (13/ 80، 81) وبقي بن مخلد كما في"بيان الوهم والإيهام" (5/ 282) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، حَدَّثَنِي حيي بن عبد الله، عن أبي عبد الرحمن (واسمه: عبد الله بن يزيد المعافري)، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.

وإسناده حسن من أجل حيي بن عبد الله المعافريّ، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث؛ فقد قال ابن عدي:"أرجو أنه لا بأس به إذا روى عنه ثقة" وهذا الحديث من رواية عبد الله بن وهب المصري عنه، وهو ثقة إمام. وذكره الهيثميّ في"المجمع" (2/ 20) وقال:"ورواه الطبرانيّ في الكبير ورجاله ثقات".

وفي الباب مارُوي عن أبي سهلة السائب بن خلَّاد أن رجلًا أم قومًا فبصق في القبلة ورسول الله صلى الله عليه وسلم ينظر فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم حين فرغ:"لا يصلي لكم" فأراد بعد ذلك أن يصلِّي لهم، فمنعوه وأخبروه بقول رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"نعم"، وحسبت أنه قال:"إنك آذيت الله ورسوله".

رواه أبو داود (481) والإمام أحمد (16561) كلاهما من طريق بكر بن سوادة الجذاميّ، عن صالح بن خيوان، عن أبي سهلة السائب بن خلَّاد، فذكره واللّفظ لأبي داود.

وصالح بن خيوان لم يوثقة غير العجلي وابن حبان ولم يرو عنه سوى بكر بن سوادة الجذاميّ، فهو مقبول إذا وجد له متابع ولم أقف عليه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে লোকদের নিয়ে যোহরের সালাত আদায় করার নির্দেশ দিলেন। সে লোকজনের সাথে সালাত আদায় করার সময় ক্বিবলার দিকে থুথু ফেলল। যখন আসরের সালাতের সময় হলো, তখন তিনি অন্য একজনের কাছে (নামায পড়ানোর জন্য) পাঠালেন। এতে প্রথম লোকটি ভীত হলো, তাই সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার ব্যাপারে কি (আল্লাহর পক্ষ থেকে) কোনো আয়াত নাযিল হয়েছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, কিন্তু তুমি যখন লোকদের ইমামতি করছিলে, তখন তুমি তোমার সামনে (ক্বিবলার দিকে) থুথু ফেলেছ। এর মাধ্যমে তুমি আল্লাহ ও তাঁর ফেরেশতাদের কষ্ট দিয়েছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (2529)


2529 - عن أبي هريرة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُغَطِّيَ الرّجل فاه في الصّلاة.

حسن: رواه ابن ماجة (966) عن أبي سعيد سفيان بن زياد المؤدِّب، قال: حَدَّثَنَا محمد بن راشد، عن الحسن بن ذكوان، عن عطاء، عن أبي هريرة فذكره.

والحسن بن ذكوان مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

ورواه أبو داود (642) عن محمد بن العلاء وإبراهيم بن موسى، عن ابن المبارك، عن الحسن بن ذكوان، عن سليمان الأحول، عن عطاء، قال إبراهيم عن أبي هريرة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"نهى عن السدْلِ في الصّلاة، وأن يُغَطِّيَ الرّجل فاه".

انظر تخريجه كاملًا في النهي عن السدل في الصّلاة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাতের মধ্যে পুরুষকে তার মুখ ঢাকতে (বা বাঁধতে) নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2530)


2530 - عن أنس قال: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصلِّي قبل أن يبنى المسجد في مَرابِض الغنم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الوضوء (234) وفي الصّلاة (429)، ومسلم في المساجد (10/ 524) كلاهما من حديث شعبة، حَدَّثَنِي أبو التيَّاح، عن أنس فذكره.

ومرابض جمع مَرْبِض، وهو موضع الريوض. وهو للغنم بمنزلة الاضطجاع للإنسان، والبروك للإبل، والجثوم للطير. أفاده النوويّ.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মসজিদ নির্মাণের পূর্বে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভেড়ার আস্তাবলসমূহে (বিশ্রামের স্থানে) সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2531)


2531 - عن جابر بن سمرة أن رجلًا سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: أصَلِّي في مرابض الغنم؟ فقال:"نعم" قال: أصَلِّي في مبارك الإبل؟ قال:"لا".

صحيح: رواه مسلم في الوضوء (360) عن أبي كامل فُضيل بن حسين، الجحدريّ، حَدَّثَنَا أبو عوانة، عن عثمان بن عبد الله بن موْهَب، عن جعفر بن أبي ثور، عن جابر بن سمرة في حديث سبق تخريجه في الطهارة، باب نقض الوضوء من لحوم الإبل.




জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল: আমি কি বকরির খোঁয়াড়ে সালাত আদায় করতে পারি? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" সে (আবার) বলল: আমি কি উটের বসার স্থানে সালাত আদায় করতে পারি? তিনি বললেন: "না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2532)


2532 - عن البراء بن عازب قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الصّلاة في مبارك الابل فقال:"لا تصلّوا في مبارك الإبل، فإنَّها من الشياطين" وسئل عن الصّلاة في مرابِضِ الغنم فقال:"صلُّوا فيها فإنها بركة".

وفي لفظ:"لا تصلوا في عطن الإبل فإنها من الشّيطان".

حسن: رواه أبو داود (184، 493)، والتِّرمذيّ (81)، وابن ماجة (494) كلّهم من حديث أبي معاوية، ثنا الأعمش، عن عبد الله بن عبد الله الرازيّ، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن البراء إِلَّا أن ابن ماجة لم يذكر قصة الصّلاة في مرابض الغنم والإبل. وإسناده حسن لأجل الكلام في عبد الله بن عبد الله الرَّازي غير أنه حسن الحديث. وسبق تخريجه في الطهارة، باب نقض الوضوء من لحوم الإبل. وصحّحه ابن خزيمة (32)، وقال: ولم نر خلافًا بين علماء أهل الحديث أن هذا الخبر أيضًا صحيح من جهة النقل لعدالة ناقليه. وصحّحه أيضًا ابن حبان (1128) فروياه من طريق الأعمش به وذكرا نقض الوضوء من لحوم الإبل.

ونقل البيهقيّ (1/ 159) تصحيحه عن أحمد وإسحاق بن راهويه.




বারা ইবন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উটের বসার স্থানে সালাত আদায় করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "তোমরা উটের বসার স্থানে সালাত আদায় করো না, কারণ সেগুলো শয়তানদের (প্রভাবের স্থান) থেকে।" আর তাঁকে ছাগল-ভেড়ার খোঁয়াড়ে সালাত আদায় করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "তোমরা সেগুলোতে সালাত আদায় করো, কারণ তা বরকতপূর্ণ।"

অপর এক বর্ণনায় রয়েছে: "তোমরা উটের আস্তাবলে সালাত আদায় করো না, কারণ তা শয়তান থেকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2533)


2533 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن لم تجدوا إِلَّا مرابض الغنم وأعطانَ الإبل، فصلوا في مرابض الغنم، ولا تُصلوا في أعطانِ الإبل".

صحيح: رواه الترمذيّ (348)، وابن ماجة (768) كلاهما من طريق هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة. واللّفظ لابن ماجة.

وصحّحه ابن خزيمة (795)، وابن حبان (1384) فروياه أيضًا من طرق عن هشام به مثله.
واختصره الترمذي فقال:"صلوا في مرابض الغنم، ولا تصلوا في أعطان الإبل".

وقال:"حسن صحيح. وعليه العمل عند أصحابنا، وبه يقول أحمد وإسحاق" ثم أبدى غرابته لأنه رواه أبو حَصِين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة مرفوعًا وموقوفًا فأما المرفوع فرواه أبو بكر بن عياش، عن أبي حَصِين به، وأما الموقوف فرواه إسرائيل عن أبي حَصِين به.

قلت: لا غرابة فيه فإنه صحَّ مرفوعًا وموقوفًا. والحكم لمن زاد واعتمده أيضًا ابن خزيمة (796) فرواه من طريق يحيى بن آدم، عن أبي بكر بن عياش، عن أبي حَصِين به مرفوعًا. إلا أنه سقط"أبو حَصِين" من الإسناد.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমরা ছাগলের খোঁয়াড় এবং উটের আস্তাবল ছাড়া অন্য কিছু না পাও, তাহলে ছাগলের খোঁয়াড়ে সালাত আদায় করো, কিন্তু উটের আস্তাবলে সালাত আদায় করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2534)


2534 - عن سبرة بن معبد الجهني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يُصَلَّى في أعطان الإبل، ويُصلَّى في مُراح الغنم".

حسن: رواه ابن ماجه (70) عن أبي بكر بن أبي شيبة وهو في مصنفه (1/ 385) عن زيد بن الحُباب، قال: حدثنا عبد الملك بن ربيع بن سَبْرَة بن معبد الجهني، عن أبيه، عن جده فذكره.

وأخرجه الإمام أحمد (15341) عن زيد بن الحباب به مثله.

وإسناده حسن فإن عبد الملك بن الربيع حسن الحديث وإن كان ابن معين ضعَّفه فقد وثقه العجلي وقال الذهبي: صدوق، إن شاء الله، وأخرج له مسلم متابعة.

وفي الباب عن عبد الله بن مغفل المزني قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلوا في مرابض الغنم، ولا تصلوا في أعطان الإبل، فإنها خُلِقتْ من الشياطين".

رواه ابن ماجه (769) واللفظ له، والنسائي (735) مختصرًا كلاهما من حديث الحسن، عن عبد الله بن مغفل المزني، وفيه الحسن وهو مدلس وقد عنعن ومن طريقه أخرجه أحمد (20571)، والبيهقي (2/ 449)، والبغوي (504)، وابن حبان (1702) وغيرهم. ولكن مثله لا بأس به في الشواهد.

وقوله:"عَطَنُ الإبل" أي: مَبْركُ الإبل يقال: عطنتِ الإبلُ عُطونًا. بركت عند الماء بعد شربها.

قال ابن الأثير في"جامع الأصول" (5/ 470):"أعْطانُ الإبل: مبارِكُها حول الماء لتشرب عَلَلًا بعد نهَلٍ، ووجه النهي عن الصلاة في أعطانِ الإبل ليس من جهة النجاسة، فإنها موجودة في مرابض الغنم، وإنما هو لأن الإبل تزدهمُ في المنهل ذودًا ذودًا، حتى إذا شرِبتْ رفعتْ رأسها، فلا يؤمنُ تفرقُها ونِفارُها في ذلك الموضع، فتُؤذي المصلي عندها" انتهى.

والمُراح: المكان الذي تبيتُ فيه.

وقال البغوي:"والنهي عن الصلاة في أعطان الإبل لما فيها من النِفار، فلا يُؤمن أن تنفر فتشغلَ قلبَ المُصلي، أو تُفسد عليه صلاتَه. فلو صلَّى والمكان طاهر تَصح عند أكثر أهل العلم".

ثم قال:"وذهب مالك وأحمد وإسحاق وأبو ثور إلى أن صلاته في أعطان الإبل لا تصح قولًا واحدًا لظاهر الحديث"."شرح السنة" (2/ 404، 405).




সাবরাহ ইবনে মা'বাদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা উটের বিশ্রামস্থলে (আ'তান) সালাত আদায় করবে না, তবে ছাগল-ভেড়ার বিশ্রামস্থলে (মুরাহ) সালাত আদায় করতে পারো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2535)


2535 - عن أبي مرثد الغنوي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تصلوا إلى القبور، ولا تجلسوا عليها".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (972) من طريق واثلة بن الأَسْقع، عن أبي مرثد فذكر مثله. قال أهل العلم: الصلاة تكره إلى القبور، وعلى القبور، وبين القبور.




আবু মারছাদ আল-গানাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমরা কবরের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করো না, এবং সেগুলোর (কবরগুলোর) উপর বসো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2536)


2536 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الأرض كلها مسجد إلا الحمامَ والمقبرة".

صحيح: رواه أبو داود (492)، وابن ماجه (745) كلاهما من طريق حماد بن سلمة، عن عمرو بن يحيى بن عمارة، عن أبيه، عن أبي سعيد الخدري فذكر الحديث.

وكذلك رواه أيضًا أحمد (11788) من حماد بن سلمة موصولًا.

وتابعه على وصله عبد الواحد بن زياد فرواه عن عمرو بن يحيى به مثله.

رواه أبو داود (492)، وابن خزيمة (791)، وابن حبان (1199) في صحيحيهما، والحاكم (1/ 251)، والبيهقي (2/ 435)، وأحمد (11919).

وتابعهما على وصله أيضًا عبد العزيز بن محمد الدراوردي فرواه عن عمرو بن يحيى به مثله.

رواه الترمذي (317)، وابن خزيمة (791)، والحاكم (1/ 251)، والدارمي (1396).

وتابعهم جميعًا محمد بن إسحاق فرواه عن عمرو بن يحيى به مثله.

رواه أحمد (11684) إلا أن محمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ولكنه توبع كما مضى.

وللحديث طريق آخر رواه الحاكم وعنه البيهقي من طريق عمارة بن غزية، عن يحيى بن عمارة الأنصاري، عن أبي سعيد الخدري به مثله.

قال الحاكم: هذه الأسانيد كلها صحيحة على شرط البخاري ومسلم. وذلك بعد أن رواه بهذه الطريق، ومن طريق عبد الواحد والدراوردي.

وبهذه الأسانيد صحّ هذا الحديث، ولا يُعَلُّ برواية سفيان الثوري مرسلًا كما قال الترمذي:"روى سفيان الثوري، عن عمرو بن يحيى، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسل". ثم ذكر رواية حماد بن سلمة، ومحمد بن إسحاق ثم قال:"وكأن رواية الثوري، عن عمرو بن يحيى، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم أثبتُ وأصح".

هكذا قال الترمذي رحمه الله تعالى، وتبعه البيهقي فقال:"حديث الثوري مرسل، وقد رُوِي موصولًا وليس بشيء".

قلت: وفي قوله نظر؛ فإن زيادة الثقة مقبولة عند عامة أهل الحديث. وكون سفيان الثوري يرويه
مرسلًا لا يضر من رواه موصولًا، قال ابن دقيق العيد في"الإمام":"حاصل ما أعِلَّ به الإرسال، وإذا كان الرافع ثقة فهو مقبول""نصب الراية" (2/ 324).

وصحّحه أيضًا شيخ الإسلام ابن تيمية وقال:"من تكلم فيه فما استوفى طرقه""اقتضاء الصراط المستقيم" (2/ 672)، وقال أيضًا:"وقد صحّحه من صحّحه من الحفاظ، وبينوا أن رواية من أرسله لا تنافي الرواية المسندة الثابتة""مجموع الفتاوى" (21/ 320) انظر للمزيد:"شيخ الإسلام ابن تيمية وجهوده في الحديث وعلومه" (3/ 357).




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “গোসলখানা এবং কবরস্থান ব্যতীত গোটা পৃথিবীই সালাত আদায়ের স্থান (মসজিদ)।”









আল-জামি` আল-কামিল (2537)


2537 - عن أنس بن مالك قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُصلَّى بين القبور.

صحيح: رواه ابن حبان (1698، 2315، 2318)، وأبو يعلى (2888) والبزار"كشف الأستار" (442)، عن حفص بن غياث، عن أشعث، عن الحسن، عن أنس فذكره.

وفيه الحسن البصري، وهو مدلس، وقد عنعن إلا أن رواية ابن حبان له يطمئن به القلب؛ لأنه قال في مقدمة كتابه الصحيح (1/ 161):"فإذا صح عندي خبر من رواية مدلس أنه بين السماع فيه لا أبالي أن أذكره من غير بيان السماع في خبره بعد صحته عندي من طريق آخر".

ثم إنه لم ينفرد به بل توبع عليه، فإن الحديث له أسانيد أخرى ذكرها البزار منها: من طريق عبد الله بن الأجلح، عن عاصم، عن أنس فذكر مثله، ومنها عن أبي معاوية، عن أبي سفيان يعني السعدي، عن ثُمامة، عن أنس فذكر مثله، وهذه المتابعات تقوي رواية الحسن.

وفي الباب ما روي عن ابن عمر: أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُصَلَّى في سبع مواطن: في المزبلة، والمجزرة، والمقبرة، وقارعة الطريق، وفي الحمام، وفي معاطن الإبل، وفوق ظهر بيت الله.

رواه الترمذي (346)، وابن ماجه (746) كلاهما من طريق عبد الله بن يزيد المقرئ، نا يحيى بن أيوب، عن زيد بن جبيرة، عن داود بن حصين، عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله.

قال الترمذي:"ليس إسناده بذلك القوي، وقد تُكلِّم في زيد بن جبيرة من قبل حفظه". انتهى.

قلت: ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا البيهقي (2/ 329) وقال: تفرد به زيد بن جَبيرة. انتهى.

وزيد بن جبيرة هذا قال فيه البخاري:"منكر الحديث". وقال أبو حاتم:"ضعيف الحديث، منكر الحديث جدًّا متروك الحديث، لا يكتب حديثه"، وقال الساجي:"حدَّث عن داود بن الحصين بحديث منكر جدًّا" يعني هذا الحديث.

ثم قال الترمذي:"وقد روى الليث بن سعد هذا الحديث عن عبد الله بن عمر العمري، عن نافع، عن ابن عمر، عن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم مثله.

وقال: حديث داود عن نافع، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم أشبه، وأصح من حديث الليث بن سعد. وعبد الله بن عمر العمري ضعَّفه بعض أهل الحديث من قِبل حفظه، منهم يحيى بن سعيد القطان" انتهى.
قلت: حديث الليث رواه ابن ماجه (747) عن علي بن داود ومحمد بن أبي الحسين، قالا: حدثنا أبو صالح، قال: حدثني الليث به وقال فيه:"محجة الطريق" بدل"قارعة الطريق" والباقي مثله.

وفي الإسناد علتان:

الأولى: عبد الله بن صالح أبو صالح الجُهني المصري كاتب الليث بن سعد قال فيه النسائي: ليس بثقة، وقال الحاكم: ذاهب الحديث.

والثانية: عبد الله بن عمر العمري ضعيف جدًّا.

فقول الترمذي: حديث داود عن نافع، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم أشبه وأصح من حديث الليث بن سعد - والله أعلم لأن في حديث الليث بن سعد علتان، وفي حديث داود علة واحدة.

وفي كل الأحوال فالحديث من الطريقين ضعيف.

و"المزبَلَة" هو موضع طرح الزِبْل والقذر.

و"المجْزرة" موضع الذبائح، وطرح أوراثها.

و"قارعة الطريق" أعلاه. وقارعة الدار: ساحتها.

وعن علي أيضًا أنه كان يمر ببابل وهو يسير، فجاءه المؤذِّن يؤذنه بصلاة العصر، فلما برز منها أمر المؤذِّن فأقام الصلاة، فلما فرغ قال: إن حبيبي صلى الله عليه وسلم نهاني أن أُصلِّي في المقبرة. ونهاني أن أصَلِّي في أرض بابل فإنها ملعونة.

رواه أبو داود (490) قال: حدثنا سليمان بن داود، أخبرنا ابن وهب، قال: حدثني ابن لهيعة ويحيى بن أزهر، عن عمار بن سعد المُرادي، عن أبي صالح الغفاري، أن عليًّا قال فذكر مثله.

قال الخطابي:"في إسناد هذا الحديث مقال".

قلت: فيه انقطاع، فإن أبا صالح الغفاري واسمه: سعيد بن عبد الرحمن روايته عن علي بن أبي طالب مرسلة كما قال ابن يونس وقال: وما أظنه سمع منه، ورواه البيهقي (2/ 451) من طريق أبي داود.

وقال: وهذا النَّهي عن الصلاة فيها إن ثبت مرفوعًا ليس لمعنى يرجع إلى الصلاة، فلو صلى فيها لم يُعِد، وإنما هو ...... كما في حديث ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تدخلوا على هؤلاء القوم" يعني أصحاب ثمود"إلا أن تكونوا باكين، فإن لم تكونوا باكين فإني أخاف أن يصيبكم مثل الذي أصابهم".




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবরের মধ্যখানে (বা কবরের দিকে) সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন।

এই প্রসঙ্গে আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাতটি স্থানে সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন: আবর্জনা ফেলার স্থানে, যেখানে পশু জবাই করা হয়, কবরস্থানে, রাস্তার মাঝে, গোসলখানায় (হাম্মাম), উটের আস্তাবলে এবং বাইতুল্লাহর (কাবার) ছাদের উপরে।

আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত, তিনি চলার পথে বাবেলের (Babel) পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। মুয়াজ্জিন এসে তাঁকে আসরের সালাতের জন্য আহ্বান করলেন। যখন তিনি ঐ স্থানটি পার হয়ে গেলেন, তখন মুয়াজ্জিনকে সালাতের ইকামত দিতে বললেন। সালাত শেষ করে তিনি বললেন: "আমার প্রিয়তম (নবী) (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে কবরস্থানে সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন। তিনি আরও নিষেধ করেছেন বাবেল ভূমিতে সালাত আদায় করতে, কারণ এটি অভিশপ্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2538)


2538 - عن * *




২৫৩৮ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (2539)


2539 - عن أبي قتادة الأنصاري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصلي وهو حاملٌ أُمامةَ بنت زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولأبي العاص بن ربيعة بن عبد شمس: فإذا سجد وضعها، وإذا قام حملها.

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة في السفر (81) عن عامر بن عبد الله بن الزبير، عن عمرو بن سُلَيم الزرقيّ، عن أبي قتادة الأنصاري فذكره.

ورواه البخاري في الصلاة (516) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم عن طرق، كلهم عن مالك به مثله.

ورواه البخاري أيضًا (5996)، ومسلم من حديث سعيد المقبري، عن عمرو بن سُليم به وفيه: خرج علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأُمامةُ بنت أبي العاص على عاتقه، فصلى، فإذا ركع وضع، وإذا رفع رفعها، وفيه إشارة إلى أن ذلك في صلاة الجماعة.

ووقع التصريح في رواية عثمان بن أبي سليمان وابن عجلان أنهما سمعا عامر بن عبد الله بن الزبير به قال أبو قتادة: رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم يؤُم الناسَ وأمامة بنت أبي العاص على عاتقه. وكذلك وقع التصريح في رواية مخرمة، عن أبيه، عن عمرو بن سُلَيم. وهذه كلها عند مسلم.

ولكن قال أبو داود (1/ 565):"ولم يسمع مخرمة من أبيه إلا حديثًا واحدًا".

قلت: وكذلك قال ابن المديني أنه لم يسمع من أبيه إلا قليلًا.

ولكن ثبت أنه كان يروي عن أبيه وجادة كما قال الحافظ في التقريب:"روايتُه عن أبيه وجادة من كتابه، قاله أحمد وابن معين وغيرهما".

والوجادة نوع من تحمل الحديث وهي صحيحة متصلة عند المحدثين واعتمده الشيخان في مواضع كثيرة في صحيحيهما. واعتمد مسلم. رواية مخرمة عن أبيه في صحيحه.




আবু কাতাদা আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমামা বিনত যায়নাব বিনত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং আবুল আ'স ইবনে রাবিয়াহ ইবনে আব্দ শামসের কন্যাকে বহন করা অবস্থায় সালাত আদায় করতেন। যখন তিনি সিজদা করতেন, তখন তাকে নামিয়ে রাখতেন এবং যখন দাঁড়াতেন, তখন তাকে আবার তুলে নিতেন (বা বহন করতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (2540)


2540 - عن عبد الله بن شداد، عن أبيه قال: خرج علينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في إحدى صلاتي العشاء، وهو حامل حسنًا أو حسينًا، فتقدم النبي صلى الله عليه وسلم فوضعه، ثم كبَّر للصلاة فصلَّى، فسجد بين ظهراني صلاته سجدة أطالها، قال أبي: فرفعت رأسي، وإذا الصبي على ظهر رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو ساجد، فرجعت إلى سجودي، فلما قضى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الصلاة، قال الناس: يا رسول الله! إنك سجدت بين ظهراني
صلاتك سجدة أطلتها حتى ظننا أنه قد حدث أمر، أو أنه يُوحى إليك؟ قال:"فكل ذلك لم يكن، ولكن ابني ارتَحَلَني، فكرهتُ أن أعِجِله حتى يَقْضي حاجته".

صحيح: رواه النسائي (1141) قال: أخبرنا عبد الرحمن بن محمد بن سلام، قال: حدثنا يزيد بن هارون قال: حدثنا جرير بن حازم، قال: حدثنا محمد بن أبي يعقوب البصري، عن عبد الله بن شداد، عن أبيه فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، وقد صحّحه أيضًا الحاكم (3/ 165، 166) بعد أن رواه من طريق جرير بن حازم، قال: صحيح على شرط الشيخين.




শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার দুই সালাতের (মাগরিব বা ইশা) কোনো একটিতে আমাদের কাছে এলেন, তখন তিনি হাসান অথবা হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বহন করছিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে এগিয়ে গেলেন এবং শিশুটিকে নামিয়ে রাখলেন। অতঃপর তিনি সালাতের জন্য তাকবীর দিলেন এবং সালাত আদায় করলেন। তিনি তাঁর সালাতের মাঝখানে একটি সিজদা করলেন যা তিনি দীর্ঘায়িত করলেন। আমার পিতা (শাদ্দাদ) বলেন: আমি মাথা তুললাম এবং দেখলাম যে শিশুটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিঠের উপর রয়েছে, যখন তিনি সিজদায় ছিলেন। আমি আমার সিজদায় ফিরে গেলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সালাত শেষ করলেন, লোকেরা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আপনার সালাতের মধ্যখানে এমন একটি সিজদা করলেন যা এত দীর্ঘায়িত হলো যে আমরা মনে করেছিলাম হয়তো কোনো নতুন বিষয় ঘটেছে, অথবা আপনার উপর ওহী নাযিল হচ্ছে? তিনি বললেন: "এর কিছুই ঘটেনি, বরং আমার এই সন্তান আমাকে সওয়ারি হিসেবে ব্যবহার করছিল (আমার পিঠে চড়েছিল), আর আমি তার প্রয়োজন পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত তাকে তাড়াহুড়ো করে ওঠাতে অপছন্দ করলাম।"