হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2641)


2641 - عن أنس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خرج إليهم في رمضان فخفَّف بهم، ثمّ دخل فأطال، ثمّ خرج فخفَّف بهم، ثمّ دخل فأطال، فلمّا أصبحنا قلنا: يا نبي الله! جلسنا الليلة فخرجتَ إلينا فخفَّفتَ، ثمّ دخلتَ فأطلتَ؟ قال:"من أجلكم فعلتُ".

حسن: رواه الإمام أحمد (12570) والحارث"بغية الباحث" (238) كلاهما عن أسود بن عامر، حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن ثُمامة، عن أنس فذكره.

وإسناده حسن لأجل ثُمامة وهو: ابن عبد الله بن أنس بن مالك الأنصاري البصريّ، روى عن جده أنس، قال ابن عدي: له أحاديث عن أنس، وأرجو أنه لا بأس به، وأحاديثه قريب من غيره، وهو صالح فيما يرويه عن أنس عندي. انتهى.

ووثَّقه أحمد والنسائي وغيرهما ولكن رُوي عن أبي يعلى أن ابن معين أشار إلى تضعيفه، ولكن اعتمد الشيخان توثيق من وثَّقه فأخرجا عنه، وهو حسن الحديث.

ورواه الإمام أحمد في مواضع أخرى (12918، 13213، 13821، 14102) من طرق عن حمّاد بن سلمة، به مثله.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (12005) والبزّار"كشف الأستار" (731) وأبو يعلى (3755)، وابن خزيمة (1627) من طرق عن حُميد بن أبي حُميد الطّويل، عن أنس قال: إن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي ذات ليلة في حجرته، فجاء أُناسُ فصلوا بصلاته، فخفَّف فدخل البيت، ثمّ خرج، فعاد مرارًا، كل ذلك يُصَلِّي، فلمّا أصبح قالوا: يا رسول الله صليتَ ونحن نُحب أن تمد في صلاتِك، قال:"قد
علمت بمكانكم، وعمدًا فعلتُ ذلك".

قال البوصيري في"إتحاف الخيرة" (2368):"إسناده صحيح".

قوله:"حجرته" قال السندي: الظاهر أن المراد بها ما اتخذه حجرة من الحصير في المسجد ليصلي فيه بالليل، لا حجرة البيت.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমজান মাসে তাদের নিকট (সালাতের জন্য) বের হলেন এবং সালাত সংক্ষিপ্ত করলেন। অতঃপর তিনি (ঘরে) প্রবেশ করলেন এবং (সালাত) দীর্ঘায়িত করলেন। এরপর আবার তিনি বের হলেন এবং তাদের নিয়ে সংক্ষিপ্ত করলেন। এরপর আবার প্রবেশ করলেন এবং (সালাত) দীর্ঘায়িত করলেন। যখন সকাল হলো, আমরা বললাম, হে আল্লাহর নবী! আমরা গত রাতে বসেছিলাম, আপনি আমাদের দিকে বের হয়ে সালাত সংক্ষিপ্ত করলেন, এরপর ভেতরে প্রবেশ করে দীর্ঘ করলেন? তিনি বললেন: "আমি তোমাদের জন্যই তা করেছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (2642)


2642 - عن كُريب مولى ابن عباس، أن عبد الله بن عباس أخبره أنه بات ليلةً عند ميمونة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهي خالته. قال: فاضطجعتُ في عرض الوسادة، واضطجع رسول الله صلى الله عليه وسلم وأهله في طولها. فنام رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى إذا انتصف الليلُ أو قبله بقليل، أو بعده بقليل، استيقظ رسول الله صلى الله عليه وسلم فجلس يمسح النوم عن وجهه بيده. ثمّ قرأ العشر الآيات الخواتم من سورة آل عمران، ثمّ قام إلى شَنٍّ معلَّقٍ فتوضَّأ منه، فأحسن وُضؤه، ثمَّ قام يُصَلِّي.

قال ابن عباس: فقمتُ فصنعتُ مثل ما صنع، ثمّ ذهبتُ فقمتُ إلى جنبه، فوضع رسول الله صلى الله عليه وسلم يده اليُمنى على رأسي، وأخذ بأُذُنِي اليُمنى يَفْتِلُها، فصلى ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ ركعتين، ثمّ أوتر، ثمّ اضطجع حتَّى أتاه المؤذن فصَلَّى ركعتين خفيفتين، ثمّ خرج فصَلَّى الصبح. انتهى.

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (11) عن مخرمة بن سليمان، عن كريب مولى ابن عباس به مثله.

رواه البخاريّ في الوضوء (183) عن إسماعيل وهو ابن أبي أويس، ومسلم في صلاة المسافرين (763/ 182) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله، يعني ثلاث عشرة ركعة. وهي من أصح الروايات عن ابن عباس، عن عدد صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم.

وهي موافقة لما رواه ابن وهب، حَدَّثَنَا عمرو، عن عبد ربه بن سعيد، عن مخرمة بن سليمان به وفيه: فصَلَّى في تلك الليلة ثلاث عشرة ركعة، ثمّ نام حتَّى نفخ، وكان إذا نام نفخ، ثمّ أتاه المؤذن فخرج فصَلَّى ولم يتوضأ. البخاريّ (698)، ومسلم (763/ 184).

وهي موافقة أيضًا لما رواه سفيان، عن سلمة بن كُهيل، عن كريب به بأن صلى من الليل ثلاث عشرة ركعة. البخاريّ (6316)، ومسلم (763/ 181) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان به وكان من دعائه:"اللَّهُمَّ اجعل في قلبي نورًا، وفي بصري نورًا، وفي سمعي نورًا، وعن يميني نورًا، وعن يساري نورًا، وفوقي نورًا، وتحتي نورًا، وأمامي نورًا، وخلفي نورًا،
وأعظِم لي نورًا". قال كُرَيب: وسبعًا في التابوت.

فلقيتُ بعض وَلَدِ العباس فحدَّثني بهن. فذكر:"عَصَبِي ولحمي ودمي وشعري وبشري"، وذكر خصلتين.

قوله:"وسبعًا في التابوت" أي ذكر في الدعاء سبعًا، أي سبع كلمات نسيتُها، قالوا: المراد بالتابوت: الأضلاع وما يحويه من القلب وغيره تشبيهًا بالتابوت الذي كالصندوق يحرز فيه المتاع، أي: وسبعًا في قلبي، ولكن نسيتها.

وقوله:"فلقيت بعض ولد العباس" القائل هو: سلمة بن كُهيل.

وصرَّح في رواية بأن دعاء رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلتئذ تسع عشرة كلمة. قال كريبُ: فحفظت منها ثتي عشرة، ونسيت ما بقي.

واثنتا عشرة هي:"اللَّهُمَّ اجعل لي في قلبي نورًا، وفي لساني نورًا، وفي سمعي نورًا، وفي بصري نورًا، ومن فوقي نورًا، ومن تحتي نورًا، وعن يميني نورًا، وعن شمالي نورًا، ومن بين يديَّ نورًا، ومن خلفي نورًا، واجعل في نفسي نورًا، وأعظم لي نورًا".

ورواه سعيد بن جبير، عن ابن عباس وفيه: ثمّ جاء فصلي أربع ركعات، ثمّ نام ثمّ قام، فجئت فقمت عن يساره فجعلني عن يمينه فصلي خمس ركعات، ثمّ صلى ركعتين، ثمّ نام حتَّى سمعتُ غطيطه، ثمّ خرج إلى الصّلاة.

رواه البخاريّ (697) عن سليمان بن حرب، قال: حَدَّثَنَا شعبة عن الحكم، قال: سمعت سعيد بن جبير فذكر مثله.

وهي موافقة كما رواه الضَّحَّاك عن مخرمة بن سليمان، عن كريب به وفيه: فصَلَّى إحدى عشرة ركعة. فلمّا تبين له الفجر صلى ركعتين خفيفتين. رواه مسلم (763/ 185)، فالذي قال: ثلاث عشرة ضم إليها ركعتي الفجر.

وانفرد مسلم (763/ 191) في رواية حُصَين بن عبد الرحمن، عن حبيب بن أبي ثابت، عن محمد بن عليّ بن عبد الله بن عباس، عن أبيه، عن عبد الله بن عباس بذكره، ثمّ قام فصلى ركعتين، فأطال فيهما القيامَ والركوعَ والسجودَ، ثمّ انصرف فنام حتَّى نفخ، ثمّ فعل ذلك ثلاث مرات ست ركعات، ثمّ أوتر بثلاث.

قال النوويّ رحمه الله في"شرح مسلم":"هذه الرواية فيها مخالفة لباقي الروايات في تخليل النوم بين الركعات، وفي عدد الركعات فإنه لم يذكر في باقي الروايات تخلل النوم، وذكر الركعات ثلاث عشرة. قال القاضي عياض: هذه الرواية، وهي رواية حُصَين، عن حبيب بن أبي ثابت، مما استدركه الدَّارقطنيّ على مسلم لاضطرابها، واختلاف الرواة، قال الدَّارقطنيّ ورُوي عنه على سبعة أوجه، وخالف فيه الجمهور، قلت: ولا يقدح هذا في مسلم، فإنه لم يذكر هذه الرواية متأصلة
مستقلة، إنّما ذكرها متابعة. والمتابعات يحتمل فيها ما لا يحتمل في الأصول، كما سبق بيانه في مواضع، قال القاضي: ويحتمل أنه لم يعد في هذه الصّلاة الركعتين الأوّليين الخفيفتين اللتين كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يستفتح صلاة الليل بهما، كما صرحت الأحاديث بها في مسلم وغيره، ولهذا قال: صلى ركعتين فأطال فيهما، فدل على أنهما بعد الخفيفتين فتكون الخفيفتان، ثمّ الطويلتان، ثمّ الست المذكورات، ثمّ ثلاث بعدها كما ذكر فصارت الجملة ثلاث عشرة كما في باقي الروايات. والله أعلم". انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (কুরাইবকে) জানিয়েছেন যে, তিনি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এক রাতে অবস্থান করেন। তিনি (মায়মূনা) ছিলেন তাঁর (ইবনু আব্বাসের) খালা। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বালিশের আড়াআড়িভাবে শুয়ে পড়লাম, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর পরিবার লম্বালম্বিভাবে শুয়ে পড়লেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমালেন, অতঃপর যখন মধ্যরাত হলো অথবা তার সামান্য আগে বা সামান্য পরে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জাগ্রত হলেন। তিনি বসে গেলেন এবং নিজের হাত দিয়ে মুখমণ্ডল থেকে ঘুমের ঘোর মুছলেন। এরপর তিনি সূরাহ আলে ইমরানের শেষ দশটি আয়াত তিলাওয়াত করলেন। এরপর তিনি একটি ঝুলন্ত মশকের কাছে উঠে গেলেন এবং তা থেকে সুন্দরভাবে উযু (ওযু) করলেন। অতঃপর তিনি সালাত আদায় করতে দাঁড়ালেন।

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আমি উঠলাম এবং তিনি যা যা করলেন, আমিও ঠিক তাই তাই করলাম। এরপর আমি গিয়ে তাঁর পাশে দাঁড়ালাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ডান হাত আমার মাথার উপর রাখলেন এবং আমার ডান কান ধরে তা মুচড়াতে (মলে দিতে) লাগলেন। অতঃপর তিনি দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত, তারপর দু’রাকাত সালাত আদায় করলেন, এরপর বিতর (সালাত) আদায় করলেন। এরপর তিনি শুয়ে পড়লেন, অবশেষে মুয়াযযিন এসে তাঁকে খবর দিলেন। তখন তিনি হালকাভাবে দু’রাকাত সালাত আদায় করলেন, এরপর বেরিয়ে গেলেন এবং ফজরের সালাত আদায় করলেন।

আর তাঁর দু‘আর মধ্যে ছিল: "হে আল্লাহ! আমার অন্তরে নূর দাও, আমার দৃষ্টিতে নূর দাও, আমার শ্রবণে নূর দাও, আমার ডান দিকে নূর দাও, আমার বাম দিকে নূর দাও, আমার উপরে নূর দাও, আমার নিচে নূর দাও, আমার সামনে নূর দাও, আমার পিছনে নূর দাও, এবং আমার জন্য নূরকে বৃহৎ করো।"

কুরাইব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আর সাতটি (বিষয়) সিন্দুকের মধ্যে (স্মরণ করা হয়েছিল)। এরপর আমি আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সন্তানদের একজনের সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তিনি আমাকে সেগুলোর কথা জানালেন। তিনি উল্লেখ করলেন: "আমার পেশিতে, আমার মাংসে, আমার রক্তে, আমার চুলে এবং আমার চামড়ায় (নূর দাও)," আর তিনি আরও দুটি বৈশিষ্ট্য উল্লেখ করেছিলেন।

তাঁর (কুরাইব) বক্তব্য "আর সাতটি (বিষয়) সিন্দুকের মধ্যে" এর উদ্দেশ্য হলো: দু‘আর মধ্যে সাতটি শব্দ (বা প্রার্থনা) উল্লেখ করা হয়েছিল যা তিনি ভুলে গেছেন। তারা (উলামায়ে কেরাম) বলেছেন: ‘তাবূত’ (সিন্দুক) বলতে পাঁজরের হাড় এবং তার অভ্যন্তরে যা কিছু রয়েছে, যেমন অন্তর ইত্যাদিকে বোঝানো হয়েছে, যার মাধ্যমে মালামাল সুরক্ষিত রাখা হয়—এমন সিন্দুকের সাথে সাদৃশ্য করে। অর্থাৎ, "আর সাতটি (বিষয়) আমার অন্তরে (ছিল), কিন্তু আমি তা ভুলে গেছি।"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই রাতের দু‘আ ছিল ঊনিশটি শব্দে—এমনটিও একটি বর্ণনায় সুস্পষ্টভাবে এসেছে। কুরাইব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি তার মধ্য থেকে বারোটি মুখস্থ করেছিলাম, বাকিগুলো ভুলে গেছি। সেই বারোটি শব্দ হলো: "হে আল্লাহ! আমার অন্তরে নূর দাও, আমার জিহ্বায় নূর দাও, আমার শ্রবণে নূর দাও, আমার দৃষ্টিতে নূর দাও, আমার উপরের দিকে নূর দাও, আমার নিচের দিকে নূর দাও, আমার ডান দিকে নূর দাও, আমার বাম দিকে নূর দাও, আমার সামনের দিকে নূর দাও, আমার পিছনের দিকে নূর দাও, আমার সত্তায় নূর দাও, এবং আমার জন্য নূরকে বৃহৎ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2643)


2643 - عن ابن عباس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلِّي من الليل ثلاث عشر ركعة.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1138)، ومسلم في صلاة المسافرين (764) كلاهما من حديث شعبة، قال: حَدَّثَنِي أبو جَمْرة، عن ابن عباس فذكره.

وأبو جمرة: بالجيم والراء هو: الضُبَعِي واسمه: نصر بن عمران بن عصام الضُبَعِي، مشهور بكنيته.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের বেলা তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2644)


2644 - عن عائشة قالت: كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم من الليل عشر ركعات. يوتر بسجدة، ويركع ركعتي الفجر. فتلك ثلاث عشر ركعة.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1140)، ومسلم في صلاة المسافرين (738/ 128) كلاهما من حديث حنظلة، عن القاسم بن محمد قال: سمعت عائشة تقول فذكرت مثله واللّفظ لمسلم.

ولفظ البخاريّ: كان يُصَلِّي من الليل ثلاث عشرة ركعة، منها الوتر وركعتا الفجر.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রাতের সালাত ছিল দশ রাকাত। তিনি এক সিজদা দ্বারা বিতর আদায় করতেন এবং ফজরের দুই রাকাত (সুন্নত) সালাত পড়তেন। ফলে তা তেরো রাকাত হতো।









আল-জামি` আল-কামিল (2645)


2645 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه أَخْبَرَ: أنه سأل عائشة رضي الله عنها: كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان؟ فقالت: ما كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يزيدُ في رمضان ولا في غيره على إحدى عشرة ركعة. يُصَلِّي أربعًا فلا تسأل عن حسنهن وطولهن، ثمّ يُصَلِّي أربعًا فلا تسأل عن حسنهن وطولهن، ثمّ يُصَلِّي ثلاثًا، قالت عائشة: فقلتُ يا رسول الله! أتنامُ قبل أن تُوتِر؟ فقال:"يا عائشة! إن عينيَّ تنامان، ولا ينام قلبي".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (9) عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف أنه سأل عائشة كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبرته بذلك.

ورواه البخاريّ في التهجد (1147)، ومسلم في صلاة المسافرين (738) من طريق مالك بن أنس، به مثله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে আবু সালামা ইবনু আবদির রহমান জিজ্ঞেস করেছিলেন: রমাদান মাসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদান মাসে এবং রমাদান মাস ছাড়া অন্য সময়ে এগারো রাকাতের বেশি আদায় করতেন না। তিনি চার রাকাত সালাত আদায় করতেন—তুমি এর সৌন্দর্য ও দৈর্ঘ্যের কথা জিজ্ঞেস করো না। অতঃপর তিনি আবার চার রাকাত সালাত আদায় করতেন—তুমি এর সৌন্দর্য ও দৈর্ঘ্যের কথা জিজ্ঞেস করো না। অতঃপর তিনি তিন রাকাত সালাত আদায় করতেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি বিতর আদায়ের আগে ঘুমিয়ে যান? তিনি বললেন: "হে আয়িশা! আমার চোখ দুটি ঘুমায়, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2646)


2646 - عن أبي سلمة قال: سألت عائشة عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: كان يُصلِّي ثلاث عشرة ركعة يُصَلِّي ثمان ركعات، ثمّ يوتر، ثمّ يُصلِّي ركعتين وهو جالس، فإذا
أراد أن يركع قام فركع، ثمّ يُصَلِّي ركعتين بين النداء والإقامة من صلاة الصبح.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (738/ 126) عن محمد بن المثنى، حَدَّثَنَا ابن أبي عديّ، حَدَّثَنَا هشام، عن يحيى، عن أبي سلمة فذكره.

ورواه أيضًا (137) عن عمرو الناقد، حَدَّثَنَا سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي لبيد، سمع أبا سلمة قال: أتيت عائشة فقلت: أَي أُمَّهْ! أَخبِرِيني عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: كانت صلاته في شهر رمضان وغيره ثلاث عشرة ركعة بالليل، منها ركعتا الفجر.

وهشام هو: أبن حسان الأزدي. ويحيى هو: ابن أبي كثير.

التوفيق بين الروايتين أن أبا سلمة يروي مرة من قولها ثلاث عشرة مع الركعتين قبل الصبح، وأخرى إحدى عشرة أي بدون ركعتي الفجر.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সালামাহ (রহ.) বলেন, আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: তিনি তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি আট রাকাত সালাত আদায় করতেন, এরপর বিতর পড়তেন, এরপর তিনি বসে বসে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন। যখন তিনি রুকু’ করতে ইচ্ছা করতেন, তখন দাঁড়িয়ে রুকু’ করতেন। এরপর তিনি ফজরের সালাতের আযান ও ইকামতের মধ্যবর্তী সময়ে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2647)


2647 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي إحدى عشرة ركعة. كانت تلك صلاتَه - تعني بالليل - فيسجد السجدة من ذلك قدر ما يقرأ أحدكم خمسين آية قبل أن يرفع رأسه. ويركع ركعتين قبل صلاة الفجر، ثمّ يضطجع على شِقِّه الأيمن حتَّى يأتيه المؤذِّن للصّلاة.

صحيح: رواه البخاريّ في الوتر (994) ومسلم في صلاة المسافرين (736) كلاهما من طريق الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة فذكرته، واللّفظ للبخاريّ.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এগারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। এটাই ছিল তাঁর সালাত—অর্থাৎ রাতের সালাত (তাহাজ্জুদ)। তিনি এর মধ্যে এমন পরিমাণ দীর্ঘ সিজদা করতেন যে তোমাদের কেউ মাথা তোলার আগে পঞ্চাশ আয়াত তিলাওয়াত করতে পারে। আর তিনি ফজরের সালাতের আগে দুই রাকাত (সুন্নাত) পড়তেন, এরপর তিনি তাঁর ডান কাত হয়ে শুয়ে থাকতেন, যতক্ষণ না মুয়াযযিন তাঁকে সালাতের জন্য ডাকতে আসতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2648)


2648 - عن مسروق قال: سألت عائشة عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بالليل فقالت: سبع وتسع وإحدى عشرة سوى ركعتي الفجر.

صحيح: رواه البخاريّ في التهجد (1139) عن إسحاق قال: حَدَّثَنَا عبيد الله، قال: أخبرنا إسرائيل، عن أبي حصين، عن يحيى بن وثَّاب، عن مسروق فذكره.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাসরূক বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রাতের সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: তা সাত, নয় বা এগারো রাকাত ছিল, ফজরের দুই রাকাত সুন্নাত ছাড়া।









আল-জামি` আল-কামিল (2649)


2649 - عن عائشة قالت:"صلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم العشاء، ثمّ صلى ثمان ركعات، وركعتين جالسًا، وركعتين بين النداءين، ولم يكن يدعُهما أبدًا".

صحيح: رواه البخاريّ في التهجد (1159) عن عبد الله بن يزيد، حَدَّثَنَا سعيد - وهو ابن أبي أيوب - قال: حَدَّثَنِي جعفر بن ربيعة، عن عِراك بن مالك، عن أبي سلمة، عن عائشة فذكرت مثله.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এশার সালাত আদায় করলেন, অতঃপর তিনি আট রাকাত (তাহাজ্জুদ) সালাত আদায় করলেন, আর বসে দুই রাকাত (বিতর/তাহাজ্জুদের অংশ) সালাত আদায় করলেন, এবং (ফজরের) দুই আযানের মাঝে (অর্থাৎ ফরযের পূর্বে) দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন। আর তিনি কখনো এই দুই রাকাত (ফজরের সুন্নাত) ছাড়তেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (2650)


2650 - عن عائشة أنها أخبرت أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصلِّي ثلاث عشرة ركعة بركعتي الفجر.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (737/ 124) عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا ليث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عراك بن مالك، عن عروة، أن عائشة أخبرته.

كأن لعراك بن مالك شيخين. أحدهما أبو سلمة الذي أخبر بما سبق، والثاني: عروة بن الزُّبير فأخبر بما هنا. ولا تعارض بين الروايتين فإنه إذا أضيفت ركعة الوتر في حديث أبي سلمة فيكون
العدد كما ذكره عروة. وأمّا صلاة العشاء فلم تحسبْ في أية الروايتين.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফজরের দুই রাকাতসহ মোট তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2651)


2651 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي بالليل ثلاث عشرة ركعة، ثمّ يُصلِّي إذا سمع النداء بالصبحِ ركعتين خفيفتين.

صحيح: رواه البخاريّ في التهجد (1170) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته، ولم أجده في الموطأ في رواية يحيى الليثي ولا في رواية أبي مصعب الزُّبيري ولا في رواية محمد بن الحسن الشيبانيّ، فلعله من زيادات عبد الله بن يوسف أبي محمد التنيسي، فإنه سمع الموطأ قبل وفاة مالكٍ بتسع سنين، فوقعت له زيادات لم تقع لمن سمع متأخرًا.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন, এরপর যখন তিনি ফজরের আযান শুনতেন, তখন তিনি হালকাভাবে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2652)


2652 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي من الليل ثلاث عشرة ركعة، يوتر من ذلك بخمس، لا يجلس في شيء إِلَّا في آخرها.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (737) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرت مثله.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি এর মধ্যে পাঁচ রাকাত বিতর পড়তেন এবং (এই পাঁচ রাকাআতের) শেষ রাকাআত ব্যতীত অন্য কোথাও বসতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (2653)


2653 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي من الليل إحدى عشرة ركعة، يوتر منها بواحدة، فإذا فرغ اضطجع على شِقِّه الأيمن.

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (8) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزُّبير، عن عائشة فذكرته.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (736) من طريق مالك، فذكره.

ورواه أيضًا من طريق عمرو بن الحارث، عن ابن شهاب به وفيه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي فيما بين أن يفرغ من صلاة العشاء إلى الفجر: إحدى عشرة ركعة. يُسَلِّم بين كل ركعتين، ويُوتر بواحدة، فإذا سكت المؤذن من صلاة الفجر، وتبين له الفجر، وجاءه المؤذِّن قام فركع ركعتين خفيفتين، ثمّ اضطجع على شِقِّه الأيمن حتَّى يأتيه المؤذن للإقامة.

ورواه البخاريّ في التهجد (1123) من طريق شُعيب، عن الزّهريّ، وقال فيه: كان يُصلِّي إحدى عشرة ركعة، كانت تلك صلاته، يسجد السجدة من ذلك قدر ما يقرأ أحدكم خمسين آية قبل أن يرفع رأسه، ويركع ركعتين قبل صلاة الفجر، ثمّ يضطع على شِقِّه الأيمن حتَّى يأتيه المنادي للصلاة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এশার সালাত শেষ করার পর থেকে ফজর পর্যন্ত এগারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি প্রতি দুই রাকাআত শেষে সালাম ফিরাতেন এবং এক রাকাআত দ্বারা বিতর করতেন। যখন ফজরের সালাতের মুয়াজ্জিন নীরব হয়ে যেতেন এবং ফজর তাঁর কাছে স্পষ্ট হয়ে উঠত, তখন তিনি উঠে হালকাভাবে দুই রাকাআত সালাত আদায় করতেন। এরপর তিনি ডান কাতে শুয়ে পড়তেন, যতক্ষণ না ইক্বামাতের জন্য মুয়াজ্জিন তাঁর কাছে আসতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2654)


2654 - عن سعد بن هشام بن عامر عن عائشة في حديث طويل وفيه قالت عائشة: يُصلِّي تسع ركعات، لا يجلس فيها إِلَّا في الثامنة فيذكر الله، ويحمده ويدعوه. ثمّ ينهضُ ولا يُسلم. ثمّ يقوم فيصلِّي التاسعة. ثمّ يقعدُ فيذكر الله وبحمده ويدعوه. ثمّ يُسلم تسليمًا يُسْمِعُنا. ثمّ يُصَلِّي ركعتين بعد ما يُسَلِّم وهو قاعد. فتلك إحدى عشرة ركعة يا بُنيَّ. فلمّا أسَنَّ نبي الله صلى الله عليه وسلم، وأخذه اللحم، أوتر بسبع. وصنع في الركعتين مثل صنيعه الأوّل، فتلك تسعٌ يا بُنيَّ.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) عن محمد بن المثنى العنزيّ، حَدَّثَنَا محمد بن أبي عديّ، عن سعيد، عن قتادة، عن زرارة، عن سعد بن هشام بن عامر فذكره في حديث طويل سبق ذكره في باب جامع صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في الليل.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আয়িশা) বললেন: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নয় রাকাত সালাত আদায় করতেন। এর মধ্যে তিনি অষ্টম রাকাত ছাড়া অন্য কোথাও বসতেন না। অষ্টম রাকাতে তিনি আল্লাহকে স্মরণ করতেন, তাঁর প্রশংসা করতেন এবং তাঁর কাছে দু‘আ করতেন। অতঃপর তিনি উঠে যেতেন এবং সালাম ফেরাতেন না। তারপর তিনি দাঁড়িয়ে নবম রাকাত আদায় করতেন। এরপর তিনি বসতেন এবং আল্লাহকে স্মরণ করতেন, তাঁর প্রশংসা করতেন এবং তাঁর কাছে দু‘আ করতেন। এরপর এমনভাবে সালাম ফেরাতেন যে আমরা তা শুনতে পেতাম। সালাম ফেরানোর পর তিনি বসে বসে আরো দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন। হে বৎস, এ হলো এগারো রাকাত। কিন্তু যখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বয়স বেড়ে গেল এবং তাঁর শরীর মোটা হয়ে গেল, তখন তিনি সাত রাকাতে বেজোর সালাত (বিতর) আদায় করতেন। আর সালামের পর দু’রাকাত সালাতের ক্ষেত্রে তিনি প্রথমবারের মতোই করতেন। হে বৎস, এ হলো নয় রাকাত।









আল-জামি` আল-কামিল (2655)


2655 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي من الليل تِسعًا، فلمّا أسَنَّ وثقل صلَّى سبعًا.

حسن: رواه النسائيّ (1710) عن أحمد بن سليمان، قال: حَدَّثَنَا حسين، عن زائدة، عن سليمان (الأعمش) عن عُمارة بن عُمَير، عن يحيى بن الجزَّار، عن عائشة فذكرت مثله.

ورواه الإمام أحمد (24042) عن محمد بن فُضيل، عن الأعمش به مثله.

وخالفهم أبو معاوية كما سيأتي في موضعين فجعله عمرو بن مُرَّة بدلًا من عُمارة بن عمير، كما جعل الحديث من مسند أم سلمة بدلًا من عائشة.

قال الدَّارقطنيّ في"العلل" (5/ 86): قول ابن فُضيل أشبه بالصواب.

وإسناده حسن لأجل يحيى بن الجزَّار العُرنيّ، وَثَّقه أبو زرعة وأبو حاتم والنسائي والعجلي وذكره ابن حبَّان في الثّقات إِلَّا أنه تُكُلِّم في عقيدته فقال ابن سعد: كان يغلو في التشيع وكان ثقة، وله أحاديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে নয় রাকাত সালাত আদায় করতেন। কিন্তু যখন তিনি বৃদ্ধ হলেন এবং ভারি হলেন (শারীরিকভাবে দুর্বল হলেন), তখন তিনি সাত রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2656)


2656 - عن زيد بن خالد الجُهني أنه قال: لأرمُقَنَّ الليلةَ صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فتوسدتُ عَتَبَتَه، أو فُسْطاطَه. فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلى ركعتين طويلتين طويلتين طويلتين، ثمّ صلَّى ركعتين، وهما دون اللتين قبلهما، ثمّ صلَّى ركعتين وهما دون اللتين قبلهما، ثمّ صلَّى ركعتين وهما دون اللتين قبلهما، ثمّ صلَّى ركعتين وهما دون اللتين قبلهما، ثمّ صلَّى ركعتين وهما دون اللتين قبلهما. ثمّ أوتر. فتلك ثلاث عشرة ركعة.

صحيح: رواه مالك في صلاة الليل (12) عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه، أن عبد الله بن قيس بن مخرمة أخبره، عن زيد بن خالد الجُهني فذكره.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (765) عن قُتَيبة بن سعيد، عن مالك به مثله إِلَّا أنه قال في أول الحديث:"فصلَّى ركعتين خفيفتين …" قال ابن عبد البر في"الاستذكار" (5/ 250):"إنَّ يحيى بن يحيى وَهِم، فأسقط ذكر الركعتين الخفيفتين، لأن المحفوظ في هذا الحديث وفي غيره أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يفتتح صلاةَ الليل بركعتين خفيفتين" انتهى.




যায়েদ ইবন খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি বলেন: আমি অবশ্যই আজ রাতে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত পর্যবেক্ষণ করব। তিনি বলেন: অতঃপর আমি তাঁর চৌকাঠের নিচে অথবা তাঁর তাঁবুর নিচে মাথা রাখলাম। এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে গেলেন এবং দুটি দীর্ঘ, দীর্ঘ, দীর্ঘ রাকআত সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি দু'রাকআত সালাত আদায় করলেন, যা তার আগের দু'রাকআতের চেয়ে সংক্ষিপ্ত ছিল। এরপর তিনি দু'রাকআত সালাত আদায় করলেন, যা তার আগের দু'রাকআতের চেয়ে সংক্ষিপ্ত ছিল। এরপর তিনি দু'রাকআত সালাত আদায় করলেন, যা তার আগের দু'রাকআতের চেয়ে সংক্ষিপ্ত ছিল। এরপর তিনি দু'রাকআত সালাত আদায় করলেন, যা তার আগের দু'রাকআতের চেয়ে সংক্ষিপ্ত ছিল। এরপর তিনি দু'রাকআত সালাত আদায় করলেন, যা তার আগের দু'রাকআতের চেয়ে সংক্ষিপ্ত ছিল। এরপর তিনি বিতর (সালাত) আদায় করলেন। এভাবে মোট তেরো রাকআত হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (2657)


2657 - عن ابن عمر أن رجلًا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صلاة الليل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الليل مثنى مثنى، فإذا خَشِي أحدكم الصبحَ صلَّى ركعةً واحدةً تُوتِر له
ما قد صَلَّى".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (13) عن نافع وعبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث.

ورواه البخاريّ في كتاب الوتر (990) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في صلاة المسافرين (749) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.

ورواه مسلم أيضًا من وجه آخر من حديث أيوب وبُديل، كلاهما عن عبد الله بن شقيق، عن عبد الله بن عمر أن رجلًا سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وأنا بينه وبين السائل. فقال: يا رسول الله! كيف صلاةُ الليل؟ قال: مثنى مثنى. فإذا خَشيت الصبحَ فصَلِّ ركعةً. واجعل آخر صلاتك وترًا".

ثمّ سأله رجل على رأس الحول، وأنا بذلك المكان من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلا أدري هو ذلك الرّجل، أو رجل آخر، فقال له مثلَ ذلك.

وأمّا ما رواه أبو داود (1295)، والتِّرمذيّ (597)، والنسائي (1666)، وابن ماجة (1322) كلّهم من طريق شعبة، عن يعلى بن عطاء، عن عليّ البارقيّ، عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقال فيه:"صلاة الليل والنهار مثنى مثنى" فزاد فيه"النهار". فهي شاذة.

قال الترمذيّ:"اختلف أصحاب شعبة في حديث ابن عمر، فرفعه بعضهم وأوقفه بعضهم، ورُوي عن عبد الله العمريّ، عن نافع، عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نحو هذا. والصحيح عن ابن عمر أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة الليل مَثْنى مَثْنى، وروى الثّقات عن عبد الله بن عمر، عن النَّبِيّ، صلى الله عليه وسلم، ولم يذكروا فيه صلاة النهار، وقد رُويَ عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر أنه كان يُصَلِّي بالليل مثنى مثنى وبالنهار أربعًا". انتهى.

تفرّد بها عليّ الأزديّ، فقد أعلّه ابن معين وأحمد والنسائي والدارقطني وغيرهم بأن أصحاب ابن عمر الحفاظ رووه كلّهم عنه، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صلاة الليل مَثْنى مَثْنى" من غير ذكر النهار.

قال ابن رجب: هم أكثر من خمس عشرة نفسًا. فتح الباري له (6/ 192). وقال أيضًا: وأعله الإمام أحمد وغيره بأنه رُوي عن ابن عمر أنه كان يُصَلِّي بالنهار أربعًا، فلو كان عنده نص عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لم يخالفه.

ولكن الأفضل في تطوع النهار أن يكون مَثْنى مَثْنى، وبه قال مالك والشافعي وأحمد وغيره، وإن تطوع في النهار بأربع فلا بأس به لفعل ابن عمر. وكان إسحاق يقول: صلاة النهار أختار أربعًا، وإن صلى ركعتين جاز. انظر:"المغني" (2/ 537، 538).




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে রাতের সালাত (নামাজ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "রাতের সালাত দু' দু' রাকাত করে। তোমাদের মধ্যে যখন কেউ সকাল হয়ে যাওয়ার আশঙ্কা করে, তখন সে এক রাকাত সালাত আদায় করবে, যা তার পূর্বের সালাতকে বেজোড় (বিতর) করে দেবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2658)


2658 - عن أنس بن سيرين قال: سألت ابن عمر، قلت: أرأيتَ الركعتين قبل صلاة الغداة أأُطيل فيهما القراءة؟ قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي من الليل مَثْنى مَثْنى، ويوتر بركعة.
قال: قلت: إني لست عن هذا أسألك.

قال: إنك لضخمٌ. ألا تدعُني استقرئُ لك الحديث؟ كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي من الليل مَثْنى مَثْنى، ويوتر بركعة، ويُصَلِّي ركعتين قبل الغداة. كأنَّ الأذان بأُذُنَيه.

وفي رواية: فقال: بَهْ بَهْ إنك لضخمٌ.

وفي رواية: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الليل مَثْنى مَثْنى. فإذا رأيتَ أن الصبحَ يُدِركُك فأوتر بواحدةٍ"، فقيل لابن عمر: ما مَثْنى مَثْنى؟ قال: أن يُسلم في كل ركعتين.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الوتر (995)، ومسلم في صلاة المسافرين (749/ 157) كلاهما من حديث حمّاد بن زيد، قال: حَدَّثَنَا أنس بن سيرين، عن ابن عمر فذكر الحديث. واللّفظ لمسلم، وأمّا البخاريّ فلم يذكر توبيخ ابن عمر لأن بن سيرين من قوله:"إنَّك لضخم …" ولكن زاد من تفسير حمّاد بن زيد تقوله:"كأن الأذان بأُذُنَيه" أي بسرعة.

والرّواية الثانية رواه مسلم من حديث شعبة، عن أنس بن سيرين، والرّواية الثالثة رواها من حديث عقبة بن حريث، عن ابن عمر.

وقوله: إنك لضخم: إشارة إلى الغباوة والبلادة، وقلة الأدب. قالوا: لأن هذا الوصف يكون للضخم غالبًا. وإنما قال ذلك لأنه قطع عليه الكلام قبل تمام حديثه.

وقوله:"بَهْ بَهْ" بموحدة مفتوحة وهاء ساكنة مكررة. وقيل: معناه: مه مه زجر وكف.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনাস ইবনু সীরীন (রাহ.) বলেন, আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আমি বললাম: আপনি ফাজরের (ফরয) সালাতের আগের দু’ রাক‘আত (সুন্নাত) সম্পর্কে কী বলেন? আমি কি সে দু’ রাক‘আতে ক্বিরাআত দীর্ঘায়িত করব?

তিনি (ইবনু উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতের সালাত দু’ দু’ রাক‘আত করে আদায় করতেন এবং এক রাক‘আত দিয়ে বিতর করতেন।

আনাস ইবনু সীরীন বলেন, আমি বললাম: আমি তো আপনাকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করিনি।

তিনি বললেন: তুমি তো মোটা বুদ্ধি সম্পন্ন লোক (অথবা: তুমি তো দেখতে বিশালকায়)। তুমি কি আমাকে হাদীসটি সঠিকভাবে তোমার কাছে বর্ণনা করতে দেবে না? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতে দু’ দু’ রাক‘আত করে সালাত আদায় করতেন এবং এক রাক‘আত দ্বারা বিতর করতেন। আর তিনি ফাজরের (ফরয) পূর্বে দু’ রাক‘আত সালাত এমনভাবে আদায় করতেন যেন আযান তাঁর কানে দেওয়া হচ্ছে (অর্থাৎ খুব দ্রুত)।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: অতঃপর তিনি বললেন, বাহ বাহ! তুমি তো মোটা বুদ্ধি সম্পন্ন লোক।

আরেক বর্ণনায় রয়েছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, ‘‘রাতের সালাত দু’ দু’ রাক‘আত করে।’’ যখন তোমার মনে হয় যে ভোর তোমাকে ধরে ফেলবে, তখন তুমি এক রাক‘আত দ্বারা বিতর করে নাও। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করা হলো: ‘দু’ দু’ রাক‘আত’ মানে কী? তিনি বললেন: প্রতি দু’ রাক‘আত পর সালাম ফিরানো।









আল-জামি` আল-কামিল (2659)


2659 - عن ابن عمر أن رجلًا نادي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في المسجد، فقال: يا رسول الله! كيف أوتر صلاة الليل؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى فليصَلِّ مَثْنى مَثْنى، فإن أحسَّ أن يُصبح سجد سجدةً فأوترتْ له ما صلى".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (749) من حديث أبي أسامة، عن الوليد بن كثير، قال: حَدَّثَنِي عبد الله بن عبد الله بن عمر، أن ابن عمر حدَّثهم، فذكره.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ব্যক্তি মসজিদে অবস্থানকালে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ডেকে বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! রাতের সালাতে আমি কীভাবে বিতর পড়ব?" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যে ব্যক্তি (রাতে) সালাত আদায় করে, সে যেন দুই দুই রাকাত করে আদায় করে। অতঃপর যখন সে ফজর হয়ে যাওয়ার আশঙ্কা করবে, তখন যেন এক রাকাত পড়ে নেয়। ফলে তার পূর্বের সালাত বিতর হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2660)


2660 - عن حفصة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: ما رأيتُ رسول الله صلى في سُبحته قاعدًا قطُّ. حتَّى كان قبل وفاته بعام، فكان يُصَلِّي في سُبحتِه قاعدًا. ويقرأ بالسورة فيرتِّلُها، حتَّى تكون أطولَ من أطول منها.

صحيح: رواه مالك في صلاة الجماعة (21) عن ابن شهاب، عن السائب بن يزيد، عن المطَّلِب بن أبي وداعة، السهميّ، عن حفصة فذكرته.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (733) من طريق مالك به مثله.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর নফল সালাত কখনো বসে আদায় করতে দেখিনি। এমনকি তাঁর ওফাতের এক বছর আগ পর্যন্ত (দেখিনি)। এরপর তিনি তাঁর নফল সালাত বসে আদায় করতেন। আর তিনি (সালাতে) একটি সূরা পাঠ করতেন এবং তার তারতীলের সাথে তিলাওয়াত করতেন, যার ফলে তা (ঐ সূরার তিলাওয়াত) অন্য কোনো দীর্ঘ সূরা থেকেও দীর্ঘ হয়ে যেত।