আল-জামি` আল-কামিল
2681 - عن مسروق قال: قلت لعائشة أي العمل كان أحبَّ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقالت: الدائم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1132)، ومسلم في صلاة المسافرين (741) كلاهما من طريق أبي الأحوص، عن الأشعث بن سُليم، عن أبيه، عن مسروق فذكر الحديث، انظر باب قيام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في أوقات مختلفة من الليل.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাসরূক বলেন: আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সবচেয়ে প্রিয় আমল কোনটি ছিল? তিনি বললেন: নিয়মিত আমল।
2682 - عن عائشة أنها قالت: سُئِل النَّبِيّ: أي الأعمال أحب إلى الله؟ قال: أدومها وإن قل" وقال:"اكْلَفُوا من الأعمال ما تُطِيقون".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6465)، ومسلم في صلاة المسافرين (782/ 216) كلاهما من حديث شعبة، عن سعد بن إبراهيم، أنه سمع أبا سلمة يحدث عن عائشة فذكرت الحديث واللّفظ للبخاريّ، ولم يذكر مسلم الجزء الثاني من الحديث.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: আল্লাহ্র নিকট কোন্ আমলটি সর্বাধিক প্রিয়? তিনি বললেন: যা নিয়মিত করা হয়, যদিও তা অল্প হয়। তিনি আরও বললেন: তোমরা ততটুকু আমলের দায়িত্ব নাও যতটুকু তোমরা বহন করতে সক্ষম।
2683 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يحتجر حصيرًا بالليل فيصلِّي، ويبسطه بالنهار فيجلس عليه، فجعل الناس يثوبونَ إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فيصلون بصلاته حتَّى كثروا فأقبل فقال:"يا أيها الناس! خذوا من الأعمال ما تطيقون، فإن الله لا يَملُّ حتَّى تملُّوا، وإن أحب الأعمال إلى الله ما دام وإن قلَّ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5861)، ومسلم في صلاة المسافرين (782) كلاهما من حديث عبد الله، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي سلمة، عن عائشة فذكرته. واللّفظ للبخاريّ،
ولفظ مسلم قريب منه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে একটি চাটাই দিয়ে বেড়া তৈরি করতেন এবং তার মধ্যে সালাত আদায় করতেন, আর দিনে তা বিছিয়ে দিতেন এবং তার উপর বসতেন। অতঃপর লোকেরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতে শুরু করল এবং তাঁর সালাতের সাথে (মুক্তাদী হয়ে) সালাত আদায় করতে লাগল, এমনকি তাদের সংখ্যা বেড়ে গেল। তখন তিনি তাদের দিকে মুখ করে বললেন: "হে লোক সকল! তোমরা ততটুকু আমলই গ্রহণ করো যা তোমরা করার সামর্থ্য রাখো। কেননা আল্লাহ্ (প্রতিদান দেওয়া থেকে) বিরত হন না, যতক্ষণ না তোমরা নিজেরা বিরক্ত হয়ে যাও। আর আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় আমল হলো যা নিয়মিত করা হয়, যদিও তা পরিমাণে কম হয়।"
2684 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أحب الأعمالِ إلى الله تعالى أدومُها وإن قلَّ" وكانت عائشة إذا عملت العملَ لزِمَتْه.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (783/ 218) من حديث سعد بن سعيد، أخبرني القاسم بن محمد، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় আমল হলো, যা নিয়মিত করা হয়, যদিও তা পরিমাণে কম হয়।" আর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন কোনো আমল করতেন, তখন তা নিয়মিত করতেন।
2685 - عن عائشة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم دخل عليها وعندها امرأة قال:"من هذه؟" قالت: فلانة، تذكر من صلاتها. قال:"مَهْ! عليكم بما تطيقون، فواللهِ! لا يملُّ اللهُ حتَّى تَمَلُّوا".
وكان أحبَّ الدينِ إليهِ ما دام عليه صاحبه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (43)، ومسلم في صلاة المسافرين (785/ 221) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد، عن هشام، قال: أخبرني أبي، عن عائشة فذكرت مثله واللّفظ للبخاريّ.
ورواه البخاريّ أيضًا في التهجد (1151) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كانت عندي امرأة من بني أسد، ثمّ ذكرت مثله، إِلَّا أن مالكًا لم يرو هذه الرواية في رواية يحيى الليثي المتداول عندنا، وإنما رواه في صلاة الليل (4) عن إسماعيل بن أبي حكيم، أنه بلغه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سمع امرأة من الليل تُصَلِّي فقال:"من هذه؟" فقيل له: هذه الحولاءُ بنتُ تُوَيْتِ لا تنامُ الليلَ. فكره ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى عُرفت الكراهية في وجهه ثمّ قال: فذكرت الحديث نحوه.
وهذا منقطع، والذي وصله البخاريّ لم يكن من هذا الطريق، بل رواه من طريق عبد الله بن مسلمة القعنبيّ، وهو تفرّد بروايته عن مالك في الموطأ دون بقية رواته، فإنهم اقتصروا منه على طرف مختصر. كذا قاله ابن عبد البر. انظر:"الفتح" (3/ 37).
قلت: ورواه مسلم (785) من طريق ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، قال: أخبرني عروةُ بن الزُّبير أن عائشة أخبرتْه أن الحولاءَ بنتَ تُوَيْتِ بن حبيب بن أسد بن عبد العُزَّى مرتْ بها، وعندها رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقلت: هذه الحولاءَ بنتَ تُوَيْتِ، وزعموا أنها لا تنام الليلَ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تنامُ الليل! خذوا من العمل ما تطيقون. فواللهِ لا يَسْأَمُ الله حتَّى تسْأَمُوا" ووقعت القصة مثل هذا لزينب كما في الذي بعده.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে এলেন, তখন তাঁর কাছে একজন মহিলা ছিলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "এ কে?" তিনি (আয়েশা) বললেন: "অমুক মহিলা," তার সালাত (ইবাদত) সম্পর্কে উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: "থামো! তোমাদের সামর্থ্য অনুযায়ী আমল করো। আল্লাহর শপথ! আল্লাহ তায়ালা ক্লান্ত হন না, যতক্ষণ না তোমরা নিজেরা ক্লান্ত হয়ে যাও।" আর তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের) কাছে দীনের সেই আমলটিই অধিক প্রিয় ছিল, যা এর আমলকারী নিয়মিতভাবে করে যায়।
2686 - عن أنس بن مالك قال: دخل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فإذا حبل ممدود بين الساريتين. فقال: ما هذا الحبل؟ قالوا: هذا حبل لزينب، فإذا فترتْ تعلقتْ، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لا، حُلوا ليُصلِّ أحدكم نشاطَه فإذا فتر فليقعُد".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1150)، ومسلم في صلاة المسافرين (784) كلاهما من
حديث عبد الوارث، عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس فذكره، واللّفظ للبخاريّ. ولفظ مسلم قريب منه إِلَّا أنه قال:"كَسِلَتْ أو فترتْ أمْسَكتْ به" فقال:"حُلُّوه ليصل أحدكم نشاطه فإذا كسِلَ أو فَتَر قعد" وفي رواية"فليقعُد".
وزينب هي: بنت جحش أم المؤمنين كذا ادعى أكثر الشراح، ولكن رُوي من وجوهٍ أخرى أنها: حمنة بنت جحش.
منها: ما رواه أبو داود (1312) عن زياد بن أيوب وهارون بن عباد الأزديّ، أن إسماعيل بن إبراهيم حدَّثهم، حَدَّثَنَا عبد العزيز عن أنس قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم المسجد، وحبل ممدود بين ساريتين، فقال:"ما هذا الحبل؟" فقيل: يا رسول الله! هذه حمنة بنت جحش تُصلي، فإذا أعيتْ تعلقتْ به. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لتُصل ما أطاقتْ، فإذا أعيتْ فلتجلس".
قال زياد: فقال: ما هذا؟" فقالوا: لزينب تُصلي، فإذا كسلتْ، أو فترتْ أمسكتْ به، فقال:"حُلُّوه"، فقال:"ليُصلِّي أحدكم نشاطَه، فإذا كسل، أو فتر فليقعد".
هارون بن عباد الأزدي أبو محمد الأنطاكي"مقبول" كما قال الحافظ، إِلَّا أنه لم يتابع على ذلك فهو لين الحديث.
وبقية رجاله ثقات رجال الشّيخين، إسماعيل بن إبراهيم هو: ابن مقسم المعروف بابن عليه.
وتابعه على ذلك مرسل، ومسند من وجه آخر عن أنس.
ومنها: ما رواه الإمام أحمد (12915، 13690) وأبو يعلى (3831) مرسلًا، كلاهما عن حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، قال: رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم حبلًا ممدودًا بين سارتين، فقال:"لمن هذا؟" فقالوا: لحمنة بنت جحش تُصلي فذكره، وإسناده صحيح غير أنه مرسل لأن عبد الرحمن بن أبي ليلى تابعي.
ومنها: ما رواه أحمد (12916، 13692) مسندًا عقب المرسل عن عبد الرحمن، حَدَّثَنَا حمّاد، عن حميد، عن أنس، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مثله.
أي مثل مرسل عبد الرحمن بن أبي ليلى. وهذا إسناد صحيح، إِلَّا أن حميدًا وهو الطّويل كان كثير التدليس عن أنس، وجعله الحافظ في المرتبة الثالثة، والمرسل يقوي المسند.
ولفظ زياد بن أيوب أن القصة وقعت لزينب، وهي كما قال أكثر الشراح: زينب بنت جحش أم المؤمنين"، وتابعه على ذلك جماعة من الحفاظ عند مسلم، فالذي يترجح أن القصة وقعت لزينب كما في الصحيحين، ولا يمنع أن تقع مثل هذا لحمنة بنت جحش أيضًا، وجمع الحافظ بين القضيتين بصورة غريبة فانظرها إن شئت في"فتح الباري".
وأمّا ما رواه ابن خزيمة (1181) من حديث أبي حبيب مسلم بن يحيى مؤذن مسجد بني رفاعة، ثنا شعبة، عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس بن مالك أن ذلك كان لميمونة بنت الحارث، فقد
حكم عليه الحافظ بأنه شاذ.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে প্রবেশ করলেন। হঠাৎ তিনি দু’টি খুঁটির মাঝখানে একটি দড়ি ঝুলানো দেখতে পেলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “এই দড়ি কিসের?” লোকেরা বলল: এটা যায়নাবের জন্য। তিনি যখন দুর্বল বা ক্লান্ত হয়ে যান, তখন এটা ধরে থাকেন (নামাজ পড়ার সময়)। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “না, এটা খুলে ফেলো। তোমাদের প্রত্যেকে যেন ততটুকুই সালাত আদায় করে যতটুকু সে সতেজ থাকা অবস্থায় পারে। আর যখন সে ক্লান্ত বা দুর্বল হয়ে পড়বে, তখন যেন বসে যায়।”
2687 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألم أُخْبرَ أَنَّك تقومُ الليلَ وتصومُ النهارَ؟" قلت: إني أفعل ذلك. قال:"فإنَّك إن فعلت ذلك هَجَمَتْ عينُك، ونَفِهَتْ نفسك، وإنَّ لنفسِك حقًّا، ولأهلك حقًّا، فصُم وأفطِر، وقُم ونَمُ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التهجد (1153)، ومسلم في الصوم (1159/ 188) كلاهما عن سفيان، عن عمرو، عن أبي العباس، قال: سمعتُ عبد الله بن عمرو فذكره.
وعمرو هو: ابن دينار. وأبو العباس هو: السائب بن فروخ ويعرف بالشاعر.
قوله: هَجَمَتْ: ضَعُفَتْ لكثرة السهر.
وقوله: نَفِهتُ: أي كلَّت.
ولهذا الحديث قصة طويلة رواها الإمام أحمد (6477) عن هُشيم، عن حصين بن عبد الرحمن ومغيرة الضَّبِّي، عن مجاهد، عن عبد الله بن عمرو، قال: زوَّجني أبي امرةً من قريشٍ، فلمّا دَخَلَتْ عليَّ جَعَلْتُ لا أنحاشُ لها، ممَّا بي من القوّة على العبادة، من الصوم والصلاة، فجاء عمرو بن العاص إلى كَنَّتِه، حتَّى دخل عليها، فقال لها: كيف وَجَدْتِ بَعْلَكِ؟ قالت: خَيْرُ الرِّجال، أو كخير البُعُولَة، مِن رجل لم يُفَتِّشْ لنا كَنَفًا، ولم يَعْرفْ لنا فِرَاشًا! فَأَقْبَل عليَّ، فَعَذَمَني وعضَّني بلسانه، فقال: أنْكحْتُك امرأةً من قريش ذاتَ حَسَبٍ، فَعَضَلْتَها، وَفَعَلْتَ وَفَعَلْتَ! ثمّ انطلق إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فشكانيّ، فأرسل إليَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فأتيته، فقال لي:"أَتَصُومُ النَّهَارَ؟" قلتُ: نعم، قال:"وتَقُومُ اللَّيْلَ؟" قلتُ: نعم، قال:"لكنِّي أصومُ وأفْطِرُ، وأُصلِّي وأنامُ، وأمَسُّ النساءَ، فمن رَغِبَ عن سُنَّتِي، فليس مِنِّي"، قال:"اقْرَأِ القرآنَ في كل شهرٍ"، قلت: إني أجدُني أقْوَى من ذلك، قال:"فاقرأه في كل عشرةِ أيامٍ"، قل: إني أجدُني أقْوى من ذلك، قال أحدُهما: إما حُصَيْنٌ وإما مغيرة: قال:"فاقرأه في كلِّ ثلاثٍ"، قال: ثمّ قال:"صُمْ في كلِّ شهرٍ ثلاثةَ أيام"، قلت: إني أقوى من ذلك، قال: لم يَزَلْ يَرْفَعُنِي حتَّى قال:"صُمْ يومًا وأفْطِرْ يومًا، فإنه أفضلُ الصيامِ، وهو صيامُ أخي داود صلى الله عليه وسلم".
قال حُصين في حديثه: ثمّ قال صلى الله عليه وسلم:"فإنَّ لكل عابدٍ شِرَّةً، ولكل شِرَّةٍ فَتْرَة، فإمَّا إلى سُنَّة، وإما إلى بِدْعة، فمن كانت فَتْرَتُه إلى سُنَّةٍ، فقد اهتدى، ومن كانت فَتْرَتُه إلى غير ذلك، فقد هَلَكَ".
قال مجاهد: فكان عبد الله بن عمرو، حيثُ ضَعُف وكَبِير، يصومُ الأيامَ كذلك، يَصِلُ بعضَها إلى بعض، ليتقوَّى بذلك، ثمّ يُفطِرُ بِعَدِّ تلك الأيام، قال: وكان يقرأ في كُلٍّ حزبه كذلك، يزيدُ أحيانًا، ويَنْقُصُ أحيانًا، غير أنه يُوفي العَدَد، إما في سَبْعٍ، وإما في ثلاثٍ، قال: ثمّ كان يقولُ بعد ذلك: لأن أكونَ قَبْلُتُ رخصةَ رسول الله صلى الله عليه وسلم أحبُّ إليَّ مما عُدلَ به أو عَدَل، لكنِّي فارقتُه على أمرٍ أكرهُ أن
أًخَالِفَه إلى غيره، وإسناده صحيح.
ومن طريق مغيرة الضَّبِّي رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5052) إِلَّا أنه اختصره.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আমাকে কি এ কথা জানানো হয়নি যে তুমি সারা রাত জেগে ইবাদাত করো এবং সারা দিন রোযা রাখো?" আমি বললাম: "আমি তো তাই করি।" তিনি বললেন: "তুমি যদি এমনটি করো, তবে তোমার চোখ দুর্বল হয়ে যাবে, তোমার মন ক্লান্ত হয়ে পড়বে। আর তোমার ওপর তোমার নফসের হক রয়েছে, তোমার পরিবারেরও হক রয়েছে। অতএব, রোযা রাখো এবং রোযা ভাঙ্গো (বিরতি দাও), নামাজ পড়ো এবং ঘুমাও।"
(মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি ‘তাহাজ্জুদ’ (১১৫৩) অধ্যায়ে এবং মুসলিম ‘সওম’ (১১৫৯/১৮৮) অধ্যায়ে বর্ণনা করেছেন। উভয়ই সুফিয়ান থেকে, তিনি আমর থেকে, তিনি আবূ আল-আব্বাস থেকে, যিনি বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনু আমরকে বলতে শুনেছি, অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।)
[আমর হলেন ইবনু দীনার। আর আবূ আল-আব্বাস হলেন আস-সাইব ইবনু ফাররুখ, যিনি শাইর নামে পরিচিত।]
[তাঁর বাণী ‘হাজামাত’ (هَجَمَتْ)-এর অর্থ: বেশি রাত জাগার কারণে দুর্বল হয়ে যাওয়া। আর তাঁর বাণী ‘নাফিহাত’ (نَفِهَتْ)-এর অর্থ: ক্লান্ত হয়ে পড়া।]
এই হাদীসের একটি দীর্ঘ প্রেক্ষাপট (ঘটনা) রয়েছে, যা ইমাম আহমাদ (৬৪৭৭) হুশাইম থেকে, তিনি হুসাইন ইবনু আব্দুর রহমান ও মুগীরাহ আদ-দাব্বী থেকে, তাঁরা উভয়ে মুজাহিদ থেকে এবং তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার বাবা কুরাইশের এক নারীর সাথে আমার বিয়ে দিলেন। যখন সে আমার কাছে এলো, আমি ইবাদতের শক্তি—রোযা ও নামাযে মগ্ন থাকার কারণে তার প্রতি মনোযোগ দিলাম না। অতঃপর আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (আমার বাবা) তার পুত্রবধূর কাছে এলেন এবং তার কাছে প্রবেশ করে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি তোমার স্বামীকে কেমন পেয়েছো?" সে বলল: "সে সর্বশ্রেষ্ঠ পুরুষ অথবা শ্রেষ্ঠ স্বামীদের মধ্যে সে একজন; এমন পুরুষ যে আমাদের জন্য কোনো বিছানা স্পর্শ করেনি এবং আমাদের কোনো পার্শ্বও অনুসন্ধান করেনি!" অতঃপর তিনি আমার দিকে এগিয়ে এলেন, আমাকে ধমকালেন এবং জিহ্বা দিয়ে তিরস্কার করলেন (কঠোর ভাষায় ভর্ৎসনা করলেন)। তিনি বললেন: "আমি তোমার জন্য কুরাইশের উচ্চ বংশের এক নারীকে বিবাহ দিয়েছি, আর তুমি তাকে উপেক্ষা করেছ, তুমি এটা করেছ, ওটা করেছ!" এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন এবং আমার বিরুদ্ধে অভিযোগ করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে লোক পাঠালেন। আমি তাঁর কাছে এলাম। তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি দিনের বেলা রোযা রাখো?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "আর কি রাতে ইবাদত করো?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "কিন্তু আমি রোযা রাখি ও রোযা ভাঙি, আমি নামায পড়ি ও ঘুমাই এবং আমি নারীদের কাছেও যাই (সহবাস করি)। যে আমার সুন্নাত থেকে বিমুখ হবে, সে আমার দলভুক্ত নয়।" তিনি বললেন: "প্রতি মাসে একবার পূর্ণ কুরআন পড়ো।" আমি বললাম: "আমি এর চেয়েও বেশি শক্তি অনুভব করি।" তিনি বললেন: "তাহলে দশ দিনে একবার পড়ো।" আমি বললাম: "আমি এর চেয়েও বেশি শক্তি অনুভব করি।" বর্ণনাকারীদের মধ্যে একজন (হয় হুসাইন অথবা মুগীরাহ) বললেন, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তিন দিনে একবার পড়ো।" বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর তিনি বললেন: "প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখো।" আমি বললাম: "আমি এর চেয়েও বেশি শক্তি রাখি।" তিনি ক্রমাগত আমাকে কমাতে থাকলেন, যতক্ষণ না তিনি বললেন: "একদিন রোযা রাখো এবং একদিন ইফতার (ভাঙো)। এটিই সর্বোত্তম সিয়াম। আর এটি হলো আমার ভাই দাউদ (আলাইহিস সালাম)-এর রোযা।" হুসাইন তাঁর বর্ণনায় অতিরিক্ত বললেন: অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "প্রত্যেক ইবাদতকারীর একটি উদ্যম থাকে এবং প্রত্যেক উদ্যমের পরে একটি ক্লান্তি আসে। অতএব, হয় তা সুন্নাতের দিকে যাবে, নয়তো বিদ’আতের দিকে। সুতরাং যার ক্লান্তি সুন্নাতের দিকে ধাবিত হয়, সে হেদায়েত লাভ করল। আর যার ক্লান্তি এর ভিন্ন দিকে ধাবিত হয়, সে ধ্বংস হলো।" মুজাহিদ বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন দুর্বল ও বৃদ্ধ হয়ে গেলেন, তিনি সেই দিনগুলোতে রোযা রাখতেন, কখনো কখনো পরস্পর যুক্ত করে রাখতেন, যেন এর মাধ্যমে শক্তি সঞ্চয় করতে পারেন। অতঃপর সেই দিনের হিসাব অনুযায়ী ইফতার করতেন। তিনি বলেন: আর তিনি তাঁর নির্ধারিত অংশ (হিজব) সেভাবেই পড়তেন, কখনো কখনো বাড়াতেন, কখনো কমাতেন, তবে সংখ্যা পূর্ণ করতেন—হয় সাত দিনে, নয়তো তিন দিনে। তিনি বলেন: এরপর তিনি বলতেন: "যদি আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দেওয়া সহজ অনুমতি (রুখসাত) গ্রহণ করতাম, তবে তা আমার কাছে সেই জিনিসের চেয়ে বেশি প্রিয় ছিল, যার সমান বা ভালো কিছু করা যেত। কিন্তু আমি তাঁকে যে অবস্থায় ত্যাগ করে এসেছিলাম, তার বিপরীত কোনো কিছুর দিকে যেতে ঘৃণা বোধ করি।" এর সনদ (ইসনদ) সহীহ। মুগীরাহ আদ-দাব্বী-এর সূত্রে বুখারী এটিকে ‘কুরআনের ফযীলত’ (৫০৫২) অধ্যায়ে সংক্ষিপ্ত আকারে বর্ণনা করেছেন।
2688 - عن مجاهد قال: دخلت أنا ويحيى بن جعدة على رجل من الأنصار من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: ذكروا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم مولاة لبني عبد المطلب، فقال: إنها تقومُ الليلَ وتصومُ النهارَ. قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لكني أنا أنام وأُصلِّي، وأصوم وأُفطِر، فمن اقتدي بي فهو منِّي، ومن رَغِبَ عن سُنَّتِي فليس مِنِّي، إنَّ لكل عملٍ شِرَّةً ثمّ فترةً، فمن كانت فترتُه إلى بدعةٍ فقد ضلَّ، ومن كانت فترتُه إلى سنةٍ فقد اهتدى".
صحيح: رواه الإمام أحمد (23474) عن يحيى بن سعيد، حَدَّثَنَا جرير، عن منصور، عن مجاهد قال فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 193):"رواه أحمد، ورجاله رجال الصَّحيح".
ولكن رواه الطبرانيّ في الكبير (2/ 320) والطحاوي في مشكله (1238) من طريق يحيى، عن سفيان، عن منصور، عن مجاهد، عن جعدة بن هبيرة قال: ذُكِر للنبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث مثله.
فجعل الحديث من مسند جعدة بن هبيرة وهو القرشي المخزوميّ، أمه أم هانئ بنت أبي طالب، مختلف في صحبته فقال البخاريّ وأبو حاتم وابن حبان:"إنه من التابعين" وجزم المزي والبغوي بأنه له صحبة، إِلَّا أنهم نفوا الرواية عنه وقالوا: له رؤية وليس له رواية، وعلى هذا فما رُوي عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يكون مرسلًا، وهذا المرسل يقوي ما رواه مجاهد عن رجل من الأنصار، لأنه غير هذا، فكأن لمجاهد شيخين أحدهما الأنصاري والثاني القرشي.
وللحديث إسناد آخر رواه البزّار"كشف الأستار" (724) من طريق جرير، عن مسلم، عن مجاهد، عن ابن عباس قال: كانت مولاة للنبي صلى الله عليه وسلم تصوم النهار وتقوم الليل فذكر نحوه.
قال البزّار:"لا نعلم إِلَّا عن ابن عباس، وليس له عنه إِلَّا هذا الطريق بهذا اللّفظ، تفرّد به مسلم".
قلت: مسلم هو الأعور - هكذا نسبه الطحاويّ في مشكله (1241) بعد أن رواه من طريق محمد بن خازم، عن مسلم الأعور به مثله. والأعور هذا هو: مسلم بن كيسان الضَبِّي وهو ضعيف باتفاق أهل العلم، روى له الترمذيّ وابن ماجة. وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع"، (2/ 258) رواه البزّار ورجاله رجال الصَّحيح، فهو ظن منه بأنَّ مسلمًا هذا هو: ابن عمران البطين وهو من رجال الجماعة.
والشرة: بالكسرة - الحدَّة والنشاط.
মুজাহিদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ও ইয়াহইয়া ইবনু জা'দা আনসারদের এক ব্যক্তির কাছে প্রবেশ করলাম, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী ছিলেন। তিনি বলেন, বনু আবদুল মুত্তালিবের এক আযাদকৃত দাসীর কথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আলোচনা করা হলো। তখন বলা হলো: সে রাতে সালাত আদায় করে এবং দিনে রোযা রাখে। বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিন্তু আমি ঘুমাই এবং সালাতও আদায় করি; আমি রোযা রাখি এবং (মাঝে মাঝে) রোযা ছেড়েও দিই। অতএব, যে আমার অনুসরণ করে, সে আমার অন্তর্ভুক্ত। আর যে আমার সুন্নাত (পন্থা) থেকে বিমুখ হয়, সে আমার কেউ নয়। নিশ্চয়ই প্রত্যেক আমলের একটি আগ্রহের সময় (তীব্রতা) আসে, তারপর আসে নিস্তেজতা। যার নিস্তেজতা কোনো বিদ'আতের দিকে ধাবিত হয়, সে পথভ্রষ্ট হয়ে যায়। আর যার নিস্তেজতা কোনো সুন্নাতের দিকে ধাবিত হয়, সে হেদায়েত প্রাপ্ত হয়।"
2689 - عن عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قالت: دخلت عليَّ خويلةُ بنت حكيم بن أمية بن حارثة بن الأوقص السُلمية - وكانت عند عثمان بن مظعون - قالت: فرأى رسول الله
- صلى الله عليه وسلم بذاذة هيئتِها، فقال لي:"يا عائشه! ما أبذَّ هيئة خُوَيْلةَ؟" قالت: فقلتُ: يا رسول الله! امرأةُ لا زَوْجَ لها يَصُوم النَّهار ويقوم الليل فهي كَمَنْ لا زوجَ لها، فتركت نفسها وأضاعتها، قالت: فبعث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلى عثمان بن مظعون فجاءه، فقال:"يا عثمانُ! أَرَغْبَةٌ عن سُنَّتِي؟" قال: فقال: لا والله يا رسول الله! ولكن سُنَّتك أطْلُبُ، قال:"فإنِّي أنامُ وأصَلِّي، وأصُومُ وأفْطِرُ، وأَنْكِحُ النِّساء، فاتَّق الله يا عُثمانُ! فإِنَّ لأهْلك عليك حقًّا، وإن لضَيْفِك عليك حقًّا، وإنَّ لنَفْسك عليكَ حقًّا، فصُم وأفطِر، وصلِّ ونَمْ".
حسن: رواه الإمام أحمد (26308) عن يعقوب (بن إبراهيم بن سعد الزهري) قال: حَدَّثَنَا أبيّ، عن ابن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
وإسناده حسن لأجل محمد بن إسحاق وهو صدوق مدلِّس، ولكنه صرَّح بالتحديث فانتفت عنه تهمة التدليس.
ورواه أبو داود (1369) عن عبيد الله بن سعد، قال: حَدَّثَنَا عمي، حَدَّثَنَا أبي، عن ابن إسحاق به مختصرًا، وفيه ابن إسحاق لم يصرح بالتحديث.
وعم عبيد الله بن سعد هو: يعقوب بن إبراهيم بن سعد.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খুওয়াইলা বিনত হাকিম বিন উমাইয়া বিন হারিসা বিন আল-আওকাস আস-সুলামিয়্যাহ—যিনি উসমান বিন মাযঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন—আমার কাছে এলেন। তিনি (আয়েশা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (খুওয়াইলার) পোশাকের জীর্ণতা ও মলিনতা লক্ষ্য করে আমাকে জিজ্ঞেস করলেন, "হে আয়েশা! খুওয়াইলার বেশভূষা এমন জীর্ণ কেন?"
তিনি বলেন: আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! তিনি এমন একজন মহিলা যার স্বামী (উসমান বিন মাযঊন) দিবাভাগে রোযা রাখেন এবং রাত জেগে ইবাদত করেন। তিনি এমন স্ত্রীর মতো যার কোনো স্বামী নেই। তাই তিনি নিজের প্রতি মনোযোগ দেওয়া বন্ধ করে দিয়েছেন এবং নিজেকে অবহেলা করছেন।"
তিনি বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসমান ইবনু মাযঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠালেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলে তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "হে উসমান! তুমি কি আমার সুন্নাত থেকে বিমুখ হয়ে গেছো?"
উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আল্লাহর শপথ, না, হে আল্লাহর রাসূল! বরং আমি আপনার সুন্নাতেরই অনুসরণ করতে চাই।"
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কিন্তু আমি ঘুমাই এবং সালাত আদায় করি; আমি রোযা রাখি এবং রোযা থেকে বিরতও থাকি; আর আমি নারীদের (স্ত্রীদের) সাথে সহবাস করি। অতএব, হে উসমান! তুমি আল্লাহকে ভয় করো। কারণ তোমার উপর তোমার পরিবারের হক রয়েছে, তোমার উপর তোমার মেহমানের হক রয়েছে এবং তোমার উপর তোমার নিজের নফসেরও হক রয়েছে। সুতরাং রোযা রাখো এবং রোযা ভঙ্গ করো, সালাত আদায় করো এবং ঘুমাও।"
2690 - عن سعد بن أبي وقَّاص قال: لما كان من أمر عثمان بن مظعون الذي كان ممن ترك النساء بعث إليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال:"يا عثمان! إني لم أُومَر بالرهبانيّة، أَرَغِبْتَ عن سنّتي؟ قال: لا يا رسول الله! قال:"إنَّ من سنَّتِي أن أصلِّي وأنام، وأصوم وأطعم، وأنكح وأطلق، فمن رغب عن سنَّتي فليس منِّي، يا عثمان! إنَّ لأهلك عليك حقًّا، ولنفسك عليك حقًّا" قال سعد: فوالله! لقد كان أجمع رجالٌ من المسلمين على أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم إن هو أقرَّ عثمان على ما هو عليه أن نختصي فنتبتَّلَ.
حسن: رواه الدَّارميّ (2173) عن محمد بن يزيد الحزاميّ، ثنا يونس بن بكير، قال: حَدَّثَنِي ابن إسحاق، حَدَّثَنِي الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن سعد بن أبي وقَّاص فذكره.
وإسناده حسن لأجل الكلام في يونس بن بكير فقد تكلم فيه النسائيّ، ومشاه غيره. وهو لا بأس به في الشواهد.
والحديث مخرج في الصحيحين البخاريّ (8074)، ومسلم (1402) من طريق ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن سعد بن أبي وقَّاص باختصار بلفظ:"رد رسول الله صلى الله عليه وسلم على عثمان بن مظعون التبتل، لو أذن له لاختصينا" وسيأتي في كتاب النكاح وللحديث شاهد من حديث أبي موسى قال: دخلت امرأة عثمان بن مظعون على نساء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فرأَيْنَها سَيِّئَةَ الهيْئَةِ، فقُلن: ما لَكِ،
مَا فِي قُرَيْشٍ رَجُلٌ أَغْنَى مِنْ بَعْلِكِ، قَالَتْ مَا لَنَا مِنْهُ شَيْءٌ؟ أَمَّا نَهَارُهُ فَصَائِمٌ وَأَمَّا لَيْلُهُ فَقَائِمٌ، قَالَ: فَدَخَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرْنَ ذَلِكَ لَهُ، فَلَقِيَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فقَالَ:"يَا عُثْمَانُ أَمَا لَكَ فِيَّ أُسْوَةٍ قَالَ: وَمَا ذَاكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ فِدَاكَ أَبِي وَأُمِّي؟ قَالَ:"أَمَّا أَنْتَ فَتَقُومُ اللَّيْلَ وَتَصُومُ النَّهَارَ وَإِنَّ لِأَهْلِكَ عَلَيْكَ حَقًّا، وَإِنَّ لِجَسَدِكَ عَلَيْكَ حَقًّا، صَلِّ وَنَمْ، وَصُمْ وَأَفْطِرْ" قَالَ: فَأَتَتْهُمُ الْمَرْأَةُ بَعْدَ ذَلِكَ عَطِرَةً كَأَنَّهَا عَرُوسٌ، فَقُلْنَ لَهَا: مَهْ، قَالَتْ: أَصَابَنَا مَا أَصَابَ النَّاسَ.
رواه ابن حبان (316) عن أحمد بن عليّ بن المثنى، حَدَّثَنَا محمد بن الخطّاب البلدي الزاهد، حَدَّثَنَا أبو جابر محمد بن عبد الملك، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره.
وفيه محمد بن الخطّاب البلدي الزاهد قال فيه أبو حاتم:"ليس بقوي"،"الجرح والتعديل" (8/ 5).
وقال الهيثميّ في"المجمع" (4/ 301، 302): رواه أبو يعلى والطَّبرانيّ بأسانيد، وبعض أسانيد الطبرانيّ رجالها ثقات".
وسيأتي في كتاب النكاح حديث أنس بن مالك المخرج في الصحيحين البخاريّ (5063)، ومسلم (1401) وفيه:"أنتم الذين قلتم كذا وكذا. أما والله! إني لأخشاكم الله، وأتقاكم له، لكني أصوم وأفطر، وأصلي وأرقد، وأتزوج النساء، فمن رغب عن سنتي فليس مني". واللّفظ للبخاريّ.
وله شاهد آخر عن أبي أمامة قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم من بيت عثمان بن مظعون فوقف على الباب فقال:"ما لك يا كحيلة متبذلةً؟ أليس عثمان شاهدًا" قالت: بلى، وما اضْطَجَعَ على فراشٍ منذ كذا وكذا، يصوم النهار فلا يُفطر، فقال:"مُرِيه أن يَأتيني"، فلمّا جاء، قالت له: فانطلق إليه، فوجده في المسجد، فجلس إليه فأعرض عنه، فبكى، ثمّ قال: قد علمت أنه قد بلغك عني أمر، قال:"أنت الذي تصُومُ النهار، وتقومُ الليل، لا يَقَعُ جَنْبُك على فِراش، قال عثمان: قد فعلت ذلك ألتمس الخبر، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لِعَيْنِك حَظٌّ، ولِجِسدِكَ حَظٌّ، ولزوجِكَ حَظٌّ، فصُم وأفطر، ونَمْ وقُم، وأْتِ زوجكَ، فإني أنا أصوم وأفطرُ، وأنام وأصلي، وآتِي النساء، فمن أخذ بسُنَّتِي فقد اهْتَدى، وَمَنْ تَرَكَهَا ضَلَّ، وإنَّ لِكُلِّ عَمل شِرَّةً، ولكل شِرَّةٍ فَتْرَةٌ، فإذا كانتِ الفَتْرَةُ إلى الغَفْلَة، فهِيَ الهَلَكَةُ، وإذا كانتِ الفَتْرَةُ إلى الفَريضة، فلا يَضُر صِاحبَها شيئًا، فخُذْ منَ العَمَل ما تُطِيقُ، فإني إنَّما بُعِثْتُ بالحنيفيَّة السَّمْحَة، فلا تُثْقِل عليكَ عبادَة رَبِّكَ لا تدري ما طُولُ عُمْرِك؟".
قال الهيثميّ في"المجمع" (3569):"رواه الطبرانيّ في الكبير، وفيه عليّ بن زيد وهو ضعيف.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উসমান ইবনু মায‘ঊনের ব্যাপারটি জানা গেল—যিনি নারীদের (ভোগ) ত্যাগকারী ছিলেন—তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: "হে উসমান! আমাকে বৈরাগ্যবাদ (রহবানিয়াহ) পালনের নির্দেশ দেওয়া হয়নি। তুমি কি আমার সুন্নাহ থেকে বিমুখ হয়ে গেলে?" তিনি বললেন: "না, হে আল্লাহর রাসূল!" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আমার সুন্নাহ হলো আমি সালাত আদায় করি ও ঘুমাই, আমি সওম রাখি ও (খাবার) খাই, আমি বিবাহ করি ও (প্রয়োজনে) তালাক দেই। সুতরাং যে ব্যক্তি আমার সুন্নাহ থেকে বিমুখ হবে, সে আমার দলভুক্ত নয়। হে উসমান! তোমার পরিবারের তোমার উপর হক রয়েছে এবং তোমার নিজেরও তোমার উপর হক রয়েছে।" সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! মুসলিমদের একদল পুরুষ দৃঢ় সংকল্প করেছিল যে, যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসমানকে তার অবস্থার উপর থাকতে দিতেন, তবে আমরা খাসি হয়ে যেতাম এবং বৈরাগ্য অবলম্বন করতাম।
2691 - عن وعن أبي هريرة قال: جاء رجل إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إن فُلانًا يُصَلِّي بالليل، فإذا أصبح سرق، قال: إنه سينهاه ما تقول".
صحيح: رواه الإمام أحمد (9778) حَدَّثَنَا وكيع، حَدَّثَنَا الأعمش، قال: أُرَي أبا صالح، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده صحيح، والشك من الأعمش في صحابي الحديث، هل هو أبو هريرة أم جابر كما في حديث البزّار، وهذا الشك لا يضر في صحة الحديث. وحديث أبي هريرة رواه البزّار"كشف الأستار" (720) من طريق محاضر بن المورع، وابن حبان (2560) من طريق عيسى بن يونس، كلاهما عن الأعمش به بدون شك.
قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 258):"رواه أحمد والبزّار ورجاله رجال الصَّحيح" قلت: وهو كما قال إِلَّا أن محاضر بن المورع وإن كان من رجال مسلم ولكنه اختلف فيه، قال الإمام أحمد:"سمعت منه أحاديث لم يكن من أصحاب الحديث كان مُغَفَّلًا جدًّا" وقال أبو حاتم:"ليس بالمتين" وقال النسائيّ:"ليس به بأس".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বলল: "অমুক ব্যক্তি রাতে সালাত আদায় করে, কিন্তু সকালে সে চুরি করে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই তার এই সালাত তাকে (একদিন) নিবৃত্ত করবে।"
2692 - عن جابر قال: قال رجلٌ للنَّبيّ صلى الله عليه وسلم:"إنَّ فلانًا يصلي، فإذا أصبح سرق، قال:"سينهاه ما تقول".
حسن: رواه البزّار"كشف الأستار" (722) عن محمد بن موسى الحرشيّ، ثنا زياد بن عبد الله، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن جابر، فذكره.
ورواه أيضًا (721) عن يوسف بن موسى، ثنا جرير بن عبد الحميد، عن الأعمش، عن أبي صالح، قال: أُراه عن جابر، فذكره.
"قال البزّار:"وهذا اختلف فيه كما ترى".
قلت: لم يختلف في الإسناد الأوّل، وزياد بن عبد الله هو الطفل البكائيّ العامريّ من رجال الشّيخين، ولم يشك فيه الأعمش بأن هذا الحديث من مسند جابر، وكذلك رواه قيس بن الربيع، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، بدون شك.
رواه ابن أبي الدُّنيا في"التهجّد" (382) عن عليّ بن الجعد، أخبرنا قيس بن الربيع، بإسناده.
ولكن قيس بن الرّبيع تغيّر لما كبر، وأدخل عليه ابنُه ما ليس من حديثه فحدَّث به، ولعل الاختلاف الذي وقع في شيخ الأعمش يعود إليه ولكن من حيث الجملة أنه تابع في جعل الحديث من مسند جابر بدون شك، ولا بعد أن يكون للأعمش فيه شيخان، كما لا يبعد أن يكون لأبي صالح فيه شيخان من الصّحابة، وهما أبو هريرة وجابر، والله تعالى أعلم.
قوله:"سينهاه ما تقول" قال ابن حبان:"إنَّ العرب تضيفُ الفعل إلى نفسه، كما تضيف إلى الفاعل، أراد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن الصّلاة إذا كانت على الحقيقة في الابتداء والانتهاء يكون المصلي مجانبًا للمحظورات معها، كقوله تعالى: {إِنَّ الصَّلَاةَ تَنْهَى عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنْكَرِ}. انتهى.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: "অমুক ব্যক্তি (রাতে) সালাত আদায় করে, কিন্তু সকালে সে চুরি করে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি যা বলছো, শীঘ্রই তার সালাত তাকে তা থেকে বিরত রাখবে।"
2693 - عن أبي مُحيريز أنَّ رجلًا من بني كِنانة يُدعى المُخْدَجِيَّ سمع رجلًا بالشام يكنَّى أبا محمد يقول: إن الوتر واجب. فقال المُخْدَجِيَّ: فَرُحتُ إلى عبادة بن الصَّامت، فاعترضتُ له وهو رائع إلى المسجد. فأخبرته بالذي قال أبو محمد، فقال عبادةُ: كذب أبو محمد، سمعتُ رسولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يقول:"خمسُ صلواتٍ كتبهنَّ الله عز وجل على العباد، فمن جاء بهن لم يُضيّعْ مِنه شيئًا استخفافًا بحقهنّ كان له عند الله عهد أن يدخله الجنّة. ومن لم يأت بهِنَّ فليس له عند الله عهد. إن شاء عذَّبه، وإن شاء أدْخَلَه الجنّة".
صحيح: رواه مالك في صلاة الليل (14) عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حَبَّان، عن ابن محيريز فذكره.
ورواه أبو داود (1420)، والنسائي (461) كلاهما من طريق مالك به مثله. ورواه ابن ماجة (1401) من طريق محمد بن يحيى بن حبَّان به مثله.
قال المنذري:"قال أبو عمر النَّمْري":"لم يُخْتَلَف عن مالك في إستاد هذا الحديث وهو حديث صحيح ثابت".
وصحّحه ابن حبَّان (1732) ورواه من طريق يحيى بن سعيد به مثله.
إِلَّا أنه قال: جاء رجل إلى عُبادة بن الصَّامت ولم يسمه. ورواه أيضًا من طرق عن محمد بن يحيى بن حبَّان به مثله وسمي الرّجل المُخْدَجِيّ - وهو - أبو رفيع (1731، 2471).
وأبو محمد: رجل من الأنصار له صحبة.
وقوله: كذب بمعنى أخطأ، لم يرد به تعمدَ الكذبِ الذي هو ضِدُّ الصدقِ، لأنَّ الكذب إنّما يجري في الأخبار، وأبو محمد هذا إنّما أفتى فتيا، ورأي رأيًا فأخطأ فيما أفتي به، أفاده الخطّابي.
والمُخْدَجِيّ هو: أبو رافع، وقيل: رُفَيع، تفرّد بالرواية عنه عبد الله بن مُحَيريز، ولم يُؤثَر توثيقه عن غير ابن حبَّان ورواية مالك عنه توثيق عند بعض أهل العلم، لأنَّه لا يروي إِلَّا عن ثقات. إِلَّا أنَّه لم ينفرد به بل تابعه عبد الله الصُّنابحي وسبق تخريجه في أوائل كتاب الصّلاة، باب في تأكيد الصلوات والمحافظة عليها. كما تابعه أيضًا أبو إدريس الخولاني عند أبي داود الطيالسي (574)
فرواه عن زمعة، عن الزّهريّ، عن أبي إدريس الخولاني قال: كنت في مجلسٍ من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فيهم عُبادة بن الصَّامت فذكروا الوتر. فقال بعضهم: واجب، وقال بعضهم: سنة، فقال عبادة بن الصَّامت فذكر نحوه إِلَّا أنَّ فيه: قال جبريل: يا محمد! إن الله عز وجل يقول: إنِّي قد فرضت على أمَّتك خَمسَ صلوات إلخ. فجعل الحديث قدسيًّا، وزمعة هو: ابن صالح الجَنَدي ضعيف وحديثه عند مسلم مقرون. فلعلَّ هذا التصرُّف منه. فجعل فرضية الصلوات الخمس منسوبة إلى الله على الأصل الثابت، وإن كان في حديث عُبادة بن الصَّامت ليس من الحديث القدسي.
উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ মুহাইরিয (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেন যে, বানী কিনানা গোত্রের আল-মাখদাজী নামক জনৈক ব্যক্তি সিরিয়ায় (শামে) আবূ মুহাম্মাদ কুনিয়াতধারী এক ব্যক্তিকে বলতে শুনলেন যে, বিতর (সালাত) ওয়াজিব। আল-মাখদাজী বললেন: আমি তখন উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম। তিনি মসজিদের দিকে দ্রুত যাচ্ছিলেন। আমি তাঁকে আবূ মুহাম্মাদের বক্তব্য জানালাম। উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আবূ মুহাম্মাদ ভুল বলেছে। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ তা‘আলা তাঁর বান্দাদের উপর পাঁচ ওয়াক্ত সালাত ফরয করেছেন। যে ব্যক্তি সে সালাতগুলো নিয়ে আসবে এবং তার হককে তুচ্ছ জ্ঞান করে এর থেকে কোন কিছু নষ্ট করবে না, তার জন্য আল্লাহর কাছে প্রতিশ্রুতি রয়েছে যে তিনি তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন। আর যে ব্যক্তি তা নিয়ে আসবে না, তার জন্য আল্লাহর কাছে কোনো প্রতিশ্রুতি নেই। তিনি চাইলে তাকে শাস্তি দিতে পারেন অথবা তিনি চাইলে তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাতে পারেন।"
2694 - عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الله وِتر يحبُّ الوتر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الدعوات (6410)، ومسلم في الذكر (2677) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وأول الحديث:"لله تسعةٌ وتسعون اسمًا من حفظها دخل الجنّة".
ثمّ قال:"إنَّ الله وتر يحب الوتر" واللّفظ لمسلم، وزاد البخاريّ:"مائة إِلَّا واحدًا"، وهذه الزيادة ذكرها أيضًا مسلم ولكن من وجه آخر عن عبد الرزّاق، عن معمر، عن أيوب، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ বেজোড় (একক), আর তিনি বেজোড়কে ভালোবাসেন।"
2695 - عن عليّ بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أهل القرآن! أوتروا، فإن الله وتر يحب الوتر".
حسن: رواه أبو داود (1416) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا عيسى، عن زكريا، عن أبي إسحاق، عن عاصم، عن عليّ بن أبي طالب فذكره.
هذا إسناد حسن فإن عاصمًا هو: ابن ضمرة السلولي قد اختُلف فيه فضعَّفه ابن حبَّان وابن عديّ، ووثَّقه ابن المديني وابن معين وأحمد وغيرهم والخُلاصة فيه أنَّه حسن الحديث.
ورواه الترمذيّ (453)، والنسائي (1675)، وابن ماجة (1169)، والإمام أحمد (1262) كلّهم من طريق أبي بكر بن عَيَّاش، عن أبي إسحاق به وزادوا في أول الحديث من قول عليّ بن أبي طالب"الوتر ليس بحتم كصلاتكم المكتوبة، ولكن سنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم"كما عند الترمذيّ، وأوتر رسول الله صلى الله عليه وسلم عندهما، ثمّ قال:"يا أهل القرآن … إلخ" الحديث.
قال الترمذيّ:"حديث حسن".
ثمّ قال الترمذيّ: روي سفيان الثوري وغيره عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، عن عليّ قال:"الوتر ليس بحتم كهيئة الصّلاة المكتوبة، ولكن سنةٌ سنَّها رسول الله صلى الله عليه وسلم"حَدَّثَنَا بذلك محمد بن بشار، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن مهديّ، عن سفيان، عن أبي إسحاق به. أي موقوفًا.
وقال: وهذا أصح من حديث أبي بكر بن عَيَّاش، وقد رواه منصور بن المعتمر عن أبي إسحاق نحو رواية أبي بكر بن عَيَّاش. انتهى.
قلت: وهو كما قال فإنَّ سفيان الثوري كان سماعه من أبي إسحاق الذي اختلط قديمًا ومن طريقه رواه أيضًا الإمام أحمد (652، 761، 927).
وكذلك رواه شعبة عنه. رواه الإمام أحمد (842).
وكذلك رواه شريك عنه، رواه الإمام أحمد (1220) فكل هؤلاء رووا عن أبي إسحاق موقوفًا على عليّ بن أبي طالب.
ورواه زكريا بن أبي زائدة وأبو بكر بن عَيَّاش عن أبي إسحاق مرفوعًا، وتابعهما منصور بن المعتمر كما قال الترمذيّ.
قلت: وكذلك جرير، ومن طريقهما رواه ابن نصر في"جزء صلاة الوتر" (1).
وصحّحه ابن خزيمة (1067)، والحاكم (1/ 300) بعد أن روياه من طريق أبي بكر بن عَيَّاش.
قلت: ويشهد له حديث المُخْدَجِيّ الذي سبق.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে কুরআনের অনুসারীরা! তোমরা বিতর সালাত আদায় করো, কেননা আল্লাহ একক, এবং তিনি বিতরকে (বেজোড়কে) ভালোবাসেন।"
2696 - عن أبي تميم الجيشانيّ، أن عمرو بن العاص خطب الناس يوم جُمعةٍ فقال: إن أبا بَصْرة حَدَّثَنِي أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الله زادكم صلاةً، وهي الوتر، فصلوها فيما بين صلاة العِشاء إلى صلاة الفجر".
صحيح: رواه الإمام أحمد (23851)، والطَّبرانيّ في الكبير (2/ 313) (2168) كلاهما من حديث عبد الله بن المبارك، أخبرنا سعيد بن يزيد، حَدَّثَنِي ابن هُبَيرة، عن أبي تميم الجيشاني فذكره.
وزاد أحمد: قال أبو تميم: فأخذ بيدي أبو ذرٍّ فسار في المسجد إلى أبي بَصْرَةَ، فقال له: أنت سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول ما قال عمرو؟ قال أبو بَصْرَةَ: أنا سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وإسناده صحيح. وابن هُبَيْرة هو: عبد الله بن هُبَيْرة السَّبائي المِصري ثقة من رجال مسلم.
وسعيد بن يزيد هو: الحميري القِتْباني ثقة من رجال مسلم أيضًا. وتابعه عبد الله بن لهيعة فرواه أيضًا عن عبد الله بن هُبَيْرة. قال: سمعت أبا تميم الجيشاني يقول: سمعت عمرَو بنْ العاص يقول: أخبرني رجلٌ من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الله عز وجل زادكم صلاةً فصلوها فيما بين صلاة العشاء إلى صلاة الصُّبح. الوترَ الوترَ" ألا وإنَّه أبو بَصْرَة الغِفاري. قال أبو تميم: فكنت أنا وأبو ذرّ قاعدَين. قال: فأخذ بيدي أبو ذرّ، فانطلقنا إلى أبي بَصْرَة، فوجدناه عند الباب الذي يلي دارَ عمرِو بن العاص، فقال أبو ذرّ: يا أبا بصرة! أنت سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الله عز وجل زادكم صلاة، فصلوها فيما بين صلاة العِشاء إلى صلاة الصبح، الوترَ الوترَ؟"، قال: نعم، قال: أنت سمعتَه؟ قال: نعم، قال: أنت سمعتَه؟ قال: نعم". انتهى.
رواه الإمام أحمد (27229) عن يحيى بن إسحاق، والطَّبرانيّ في الكبير عن أسد بن موسى، كلاهما عن ابن لهيعة به مثله واللّفظ لأحمد، ولفظ الطبرانيّ نحوه.
وابن لهيعة اختلط بعد أن احترقتْ كتبه، ولكن سمع منه يحيى بن إسحاق قبل احتراقها، ورواه أيضًا الطّحاويّ في مشكله (4491) من طريق أبي عبد الرحمن المقري، وهو عبد الله بن يزيد قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن لهيعة به فذكره، وأبو عبد الرحمن المقري أيضًا ممن سمع منه قبل احتراق كتبه.
قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 239):"رواه أحمد والطَّبرانيّ في الكير، وله إسنادان عند أحمد، أحدهما رجاله رجال الصَّحيح، خلا عليّ بن إسحاق السلمي شيخ أحمد وهو ثقة". انتهى.
وأمّا ما رُوِي عن عبد الله بن بريدة، عن أيه قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"الوتر حق فمن لم يوتر فليس مِنَّا، الوتر حق فمن لم يوتر فليس مِنَّا، الوتر حق فمن لم يوتر فليس مِنَّا".
فهو ضعيف: رواه أبو داود (1419)، وأحمد (23019)، والحاكم (1/ 305)، والبيهقي (2/ 470) كلّهم من طرق عن عبيد الله بن عبد الله العتكيّ، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح، والعتكي أبو المنيب مروزي ثقة".
وتعقبه الذّهبيّ فقال:"قال البخاريّ: عنده مناكير".
انظر أيضًا: التاريخ الكبير (5/ 388).
وقال العقيلي:"لا يتابع على حديثه".
وقال البيهقيّ:"لا يُحتجُّ به".
وأورد النوويّ هذا الحديث في"الخُلاصة" (1864) في فصلِ الضعيفِ.
وكذلك ما رواه أبو هُريرة مرفوعًا:"من لم يوتر فليس مِنَّا"، رواه أحمد (2/ 443)، وابن أبي شيبة في مصنفه (2/ 297) قالا: حَدَّثَنَا وكيع، ثنا الخليل بن مُرَّة، عن معاوية بن قُرَّة، عن أبي هُريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.
وفي الإسناد علتان.
الأوّلى: الخليل بن مُرَّة البصري؛ قال فيه أبو حاتم: ليس بالقويّ، وقال البخاريّ: منكر الحديث، وقال في موضع آخر: لا يصح حديثه، وقال في"التاريخ الكبير" (3/ 199):"فيه نظر". والمعروف أنه إذا قال في شخص:"فيه نظر" فهو في أردأ المنازل.
العلة الثانية: الانقطاع؛ فإن معاوية بن قُرَّة لم يسمع من أبي هريرة ولم يَلْقَه، كما نص على ذلك الإمام أحمد وغيره.
وكذلك لا يصح ما رواه أبو عُبَيدة عن أبيه عبد الله بن مسعود مرفوعًا:"إنَّ الله وترٌ يحب الوترَ، أوتروا يا أهل القرآن" فقال له أعرابي: ما يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال:"ليس لك ولا لأصحابك".
رواه أبو داود (1417)، وابن ماجة (1170) كلاهما عن عثمان بن أبي شيبة، قال: حَدَّثَنَا أبو حفص الأبَّار، عن الأعمش، عن عمرو بن مُرَّة، عن أبي عبيدة، عن أبيه فذكره، واللّفظ لابن ماجة، وأمّا أبو داود فأحال على لفظ عليّ بن أبي طالب.
وإسناده ضعيف لأجل الانقطاع، لأن أبا عيدة على الراجح لم يسمع من أبيه.
وكذلك لا يصح ما رُوِي عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن الله وتر يحب الوتر" قال نافع:"وكان ابن عمر لا يصنع شيئًا إِلَّا وترًا".
رواه الإمام أحمد (5880) عن هارون، أخبرنا ابن وهب، سمعت عبد الله بن عمر، يُحدِّث عن نافع، عن عبد الله بن عمر فذكره.
وعبد الله بن عمر هو العُمَري ضعيف، ضعَّفه النسائيّ وغيره.
قال ابن حِبَّان: كان ممن غلب عليه الصلاح حتَّى غفل عن الضبط.
ورواه البزَّار"كشف الأستار" (743) من وجه آخر عن عدي بن الفضل، ثنا أيوب، عن نافع به، ولم يذكر قول نافع، وعدي بن الفضل هو التيمي أبو حاتم البصري ضعيف جدًّا تركَ أبو زرعةَ حديثَه وضعَّفه النسائيّ وغيره، وله حديث واحدٌ في الكتب الستة رواه ابن ماجة في النهي عن البول قائمًا، وسبق تخريجه في كتاب الطهارة، فلا تغترْ بقول الهيثميّ في"المجمع" (2/ 240):"رواه أحمد والبزّار، ورجاله موثَّقون".
وكذلك لا يصح حديث ابن عباس قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج إليهم يُرَى البِشْرُ والسرورُ في وجهِهِ فقال:"إنَّ الله أمدَّكم بصلاة وهي الوتر".
رواه الدَّارقطنيّ (2/ 30) وقال: فيه النضر أبو عمر الخزاز، ضعيف.
ورواه الطبرانيّ أيضًا في معجمه عن نضر أبي عمر، قال الزيلعي: قال الدَّارقطنيّ: النضر أبو عمر الخزاز ضعيف. انتهى من نصب الراية (2/ 110). وذكره الهيثميّ عن ابن مسعود، وعزاه إلى البزّار والطَّبرانيّ في الكبير وقال: وفيه النضر أبو عمر؛ ضعيف، انظر"مجمع الزوائد" (2/ 240).
وقال ابن الجوزي: قال النسائيّ: النضر أبو عمر متروك، وقال أحمد: ليس بشيء، ولا يحلُّ لأحدٍ أن يَروِي عنه. انظر"العلل المتناهية" (1/ 452).
وكذلك حديث عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله زادكم صلاة، وهي الوتر" لا يصح.
رواه أحمد من طريقين:
الأوّل: قال: حَدَّثَنَا يزيد بن هارون، أخبرنا الحجاج بن أرطأة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده،"مسند أحمد" (6693).
والثاني: قال: حَدَّثَنَا محمد بن سواء أبو الخطّاب الدوسيّ، قال: سألت المثنى بن الصَّبَّاح، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الله زادكم صلاة، فحافظوا عليها، وهي الوتر". فكان عمرو بن شعيب يرى أن يعاد الوتر ولو بعد شهر،"مسند أحمد". (6919).
الطريق الأوّل: فيه حجَّاج بن أرطاة؛ ضعيف وهو معروف بالتدليس.
قال ابن أبي خيثمة، عن يحيى: ابن أرطاة ومحمد بن إسحاق عندي سواء، وتركت الحجاج عمدًا ولم أكتب عنه حديثًا قط. وقال أبو زرعة: صدوق يدلس.
وقال أبو حاتم: صدوق يدلس عن الضعفاء، يكتب حديثه، وأمّا إذا قال:"حدثنا" فهو صالح لا يُرتاب في صدقه وحفظه، وإذا لم يبيِّن السماع لا يُحتج بحديثه، انظر"التهذيب" (2/ 196).
والطريق الثاني: فيه المثنى بن الصَّبَّاح، ضعيف.
وإلى هذا الطريق أشار الهيثميّ وضعّفه. انظر"مجمع الزوائد" (2/ 240).
وعند أحمد رواية أخرى بلفظ:"إنَّ الله حرَّم على أمَّتي الخمر والميسر، وزادني صلاةَ الوترِ".
وفيه إبراهيم بن عبد الرحمن بن رافع، وهو مجهول قاله الهيثميّ.
ورواه الدَّارقطنيّ (2/ 13) بإسناد آخر عن محمد بن عبيد الله العرزميّ، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال:"مكثنا زمانًا لا نزيد على الصلوات الخمس، فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم فاجتمعنا، فحَمِد الله وأثنى عليه ثمّ قال:"إنَّ الله قد زادكم صلاة" فأمرنا بالوتر.
قال الدَّارقطنيّ: محمد بن عبيد الله ضعيف"، انتهى.
ونقل ابن الجوزي عن النسائيّ وأحمد والفلاس: أنه متروك الحديث. انظر"العلل المتناهية" (1/ 252).
وكذلك لا يصح حديث خارجة بن حُذافة العدوى مرفوعًا:"إنَّ الله قد أمدكم بصلاة هي خير لكم من حمر النعم، وهي الوتر، فجعلها لكم فيما بين العشاء إلى طلوع الفجر".
رواه أبو داود (1418)، والتِّرمذيّ (452)، وابن ماجة (1168)، كلّهم من طرق عن يزيد بن أبي حَبيبٍ، عن عبد الله بن راشد الزَّوْفيِّ، عن عبد الله بن أبي مُرَّة الزَّوْفيِّ، عن خارجة بن حُذافة فذكر الحديث.
وفيه الزوفيان مجهولان، عبد الله بن مُرَّة. ويقال له عبد الله بن أبي مُرَّة أيضًا، وأشار البخاريّ إلى أن روايته عن خارجة منقطعة، وقال الذّهبيّ في"الضعفاء" (2306) تابعي مجهولٌ. ولكن جعله الحافظ ابن حجر في التقريب في مرتبة"صدوق".
فلعل ذلك لتوثيق العجليّ، وذكر ابن حبَّان له في الثّقات، وكان حقه أن يجعله في درجة"مقبول" وهذا الذي نقله محقق كتاب تهذيب الكمال في الحاشية، إِلَّا أن نسخ التقريب الخمس التي لدي كلّها متفقة على قوله:"صدوق"، ولعلّ هذا سبق قلم من المحقق حفظه الله. والله أعلم.
وقال الترمذيّ: هذا حديث غريبٌ لا نَعرِفه إِلَّا من حديث يزيد بن أبي حبيبٍ.
وقال الحاكم: صحيح الإسنادِ.
قال الذّهبيّ في ترجمة عبد الله بن راشد، قال: رواه عنه يزيد بن أبي حبيب، وخالد بن يزيد،
قيل: لا يعرف سماعه من ابن أبي مُرَّة، وقال: ولا هو بالمعروف، وذكره ابن حبَّان في الثقات". انتهى. انظر"ميزان الاعتدال" (3/ 420).
ثمّ قال في ترجمة عبد الله بن أبي مُرَّة: له عن خارجة في الوتر لم يصح. انظر"الميزان" (2/ 501).
وقال ابن الجوزي: قال البخاريّ: لا يُعرف سماع عبد الله بن راشد من ابن أبي مُرَّة."العلل المتناهية" (1/ 453).
وقال البيهقيّ بعد نقل الحديث: قال البخاريّ: لا يُعرف سماع بعضِهِم من بعض.
وقال الحافظ في"التلخيص" (1/ 16):"ضعَّفه البخاي وقال ابن حبَّان: إسنادٌ منقطعٌ ومتنٌ باطلٌ"، وقال في الثّقات (7/ 35) - في ترجمة عبد الله بن راشد:"يروي عن عبد الله بن أبي مُرَّة، إن كان سمع منه، روى عنه يزيد بن أبي حبيب:"إنَّ الله زادكم صلاة وهي الوتر" من اعتمده فقد اعتمد إسنادًا مشوِّشًا". انتهى.
وأمّا خارجة بن حذافة فهو قرشيٌّ عدويّ، وله حديث الوتر فقط، ذكره العلماء في كُتُبِ الآحاد والمثاني ابن أبي عاصم. انظر"الاستيعاب" (2/ 71).
وفي الباب أحاديث أخرى لا تصح. انظر المزيد منها في"المنة الكبرى"
আবূ বাসরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (অন্যান্য বর্ণনায় এসেছে যে,) আবূ তামিম আল-জাইশানী থেকে বর্ণিত, এক জুমুআর দিনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের উদ্দেশ্যে খুৎবা দিলেন এবং বললেন: নিশ্চয় আবূ বাসরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বলেছেন যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের জন্য অতিরিক্ত একটি সালাত বৃদ্ধি করেছেন, আর তা হলো বিতর। সুতরাং তোমরা তা ইশার সালাত ও ফজরের সালাতের মধ্যবর্তী সময়ে আদায় করো।"
ইমাম আহমাদ অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: আবূ তামিম বলেন: এরপর আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার হাত ধরলেন এবং মসজিদে আবূ বাসরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন। আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঠিক তেমনই বলতে শুনেছেন যা আমর (ইবনুল আস) বলেছেন? আবূ বাসরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছি।
2697 - عن سعيد بن يسار قال: كنت أسير مع عبد الله بن عمر بطريق مكة قال سعيد: فلمّا خشيتُ الصبح، نزلتُ فأوترتُ، ثمّ أدركتُه، فقال لي عبد الله بن عمر: أين كنتَ؟ فقلت له: خشيتُ الصبحَ، فنزلتُ فأوترتُ، فقال عبد الله: أليس لك في رسول الله أُسوَةٌ؟ فقلت: بلى. والله! فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُوتر على البعير.
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (15) عن أبي بكر بن عمر، عن سعيد بن يسار به مثله.
ورواه البخاريّ في الوتر (999) عن إسماعيل بن أبي أويس، ومسلم في صلاة المسافرين (700/ 36) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.
وأبو بكر بن عمر هو: ابن عبد الرحمن بن عبد الله بن عمر بن الخطّاب. وفي رواية: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُسبّح على الرّاحلة قِبَل أي وجه توجَّه ويُوتر عليها غير أنه لا يصلِّي عليها المكتوبة.
رواه البخاريّ (1098) قال: وقال اللَّيثُ:"وهو عطف على السابق" قال: حَدَّثَنِي يونس، عن ابن شهاب، قال: قال سالم: كان عبد الله يُصلي على دابته من اللّيل وهو مسافر، ما يبالي حيث ما كان وجهه. قال ابن عمر: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُسبح على الراحلة فذكره واللّفظ للبخاريّ. ورواه مسلم (39) عن ابن وهب، عن يونس ولم يذكر فيه فعلَ ابنِ عمرَ.
ورواه أيضًا البخاريّ (1000) من وجه آخر عن جُوَيرِية بن أسماء، عن نافع، عن ابن عمر
قال: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصلِّي في السفر على راحلته، حيث توجهتْ به يومئُ إيماء صلاةَ الليل إِلَّا الفرائض، ويُوتر على راحلته.
وقوله:"يوتر على راحلته" دليل للجمهور على أن الوتر ليس بواجب ولذا جاز أداؤه على الراحلة.
قال الطحاويّ:"ذُكر عن الكوفين أن الوتر لا يُصلَّى على الراحلة، وهو خلاف السنة الثابتة واستدل بعضهم برواية مجاهد أنه رأي ابن عمر نزل فأوتر. وليس ذلك بمعارض لكونه أوتر على الراحلة؛ لأنه لا نزاع أن الصّلاة على الأرض أفضل. وروى عبد الرزّاق من وجه آخر أن ابن عمر كان يوتر على راحلته. وربما نزل فأوتر" انتهى. انظر:"الفتح" (2/ 488، 489).
قلت: وعليه يُحمَل حديث جابر بن عبد الله مع ضعف فيه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلِّي في السفر حيث توجهتْ به راحلتُه، فإذا أراد المكتوبة أو الوتر أناخ فصلَّى بالأرض. رواه ابن خزيمة (1263) عن يعقوب الدورقيّ، نا محمد بن مصعب، نا الأوزاعيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن جابر بن عبد الله فذكره.
وإسناده ضعيف: محمد بن مصعب القُرقُسائي - بقافين قال فيه النسائيّ: ضعيف، وقال الخطيب: كان كثير الغلط لتحديثه من حفظه، وقال ابن حبَّان: ساء حفظه، وعلى صحة إسناده يقال فيه: من الجائز أن بنيخ راحلته فيوتر على الأرض، فإن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فعل الفعلين، وهذا من الاختلاف المباح مع أن أخبار ابن عمر في وتر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على الراحلة أكثر أسانيد وأثبت وأصح من خبر جابر كما قال ابن خزيمة.
وفي معناه ما رُوي عن ابن عباس أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يوتر على راحلته، رواه ابن ماجة (1201) عن محمد بن يزيد الأَسْفاطيّ، قال: حَدَّثَنَا أبو داود، قال: حَدَّثَنَا عبَّاد بن منصور، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وفيه عبَّاد بن منصور أكثر الأئمة على تضعيفه مع اتهامه بالتدليس.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। সাঈদ ইবনে ইয়াসার বলেন, আমি আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মক্কার পথে যাচ্ছিলাম। সাঈদ বলেন: যখন আমার ফজরের সময় হয়ে যাওয়ার ভয় হলো, তখন আমি (সাওয়ারী থেকে) অবতরণ করে বিতর সালাত আদায় করলাম, অতঃপর আমি তাঁর সাথে মিলিত হলাম। আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি কোথায় ছিলে? আমি তাঁকে বললাম: আমার ফজরের সময় হয়ে যাওয়ার ভয় হয়েছিল, তাই আমি নেমে বিতর সালাত আদায় করেছি। তখন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমার জন্য কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মধ্যে কোনো আদর্শ নেই? আমি বললাম: অবশ্যই আছে, আল্লাহর শপথ! তিনি বললেন: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উটের পিঠের উপর বিতর সালাত আদায় করতেন।
2698 - عن عائشة قالت: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي وأنا راقدةٌ معترضةً على فراشه، فإذا أراد أن يُوتر أَيقظني فأَوترتُ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الوتر (997) عن مسدد، قال: حَدَّثَنَا يحيى، قال: حَدَّثَنَا هشام، قال: حَدَّثَنِي أبيّ، عن عائشة فذكرته.
ورواه مسلم في المسافرين (744) من وجه آخر عن تميم بن سلمة، عن عروة بن الزُّبير، عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي من الليل، فإذا أوتر قال:"قومي فأوتري يا عائشة".
وفي رواية من وجه آخر من حديث القاسم بن محمد عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي
صلاته بالليل، وهي معترضةٌ بين يديه، فإذا بقي الوتر أيقظها فأوترتْ.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করতেন, আর আমি তাঁর বিছানায় তাঁর সামনে আড়াআড়িভাবে শুয়ে থাকতাম। যখন তিনি বিতর (সালাত) আদায় করতে চাইতেন, তখন আমাকে জাগিয়ে দিতেন, ফলে আমি বিতর আদায় করতাম।
(মুসলিম-এর অপর এক বর্ণনায় এসেছে,) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে সালাত আদায় করতেন। অতঃপর যখন বিতর পড়তে চাইতেন, তখন বলতেন: "হে আয়িশা, ওঠো এবং বিতর আদায় করো।"
অন্য এক সূত্রে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে সালাত আদায় করতেন, আর তিনি (আয়িশা) তাঁর সামনে আড়াআড়িভাবে শুয়ে থাকতেন। যখন বিতর বাকি থাকত, তখন তিনি তাঁকে জাগিয়ে দিতেন এবং তিনি বিতর আদায় করতেন।
2699 - عن عبد الله بن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"اجعلوا آخر صلاتكم بالليل وترًا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الوتر (998)، ومسلم في صلاة المسافرين (751/ 151) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكر الحديث.
ورواه مسلم من طريق ابن جريج قال: أخبرني نافع أن ابن عمر كان يقول: من صلَّى من الليل فليجعل آخر صلاته وِتْرًا قبل الصبح، كذلك كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمرهم. انتهى.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের রাতের শেষ সালাতকে বিতর (বেজোড়) করো।"
2700 - عن قيس بن طلق قال: زارنا طلق بن عليّ في يوم من رمضان، وأمسى عندنا وأفطر، ثمّ قام بنا الليلة وأوتر بنا، ثمّ انحدر إلى مسجده فصلى بأصحابه، حتَّى إذا بقي الوتر قدَّم رجلًا فقال: أوتر بأصحابك، فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا وتران في ليلة".
حسن: رواه أبو داود (1439)، والتِّرمذيّ (470)، والنسائي (1679) كلّهم من طريق ملازم بن عمرو، حَدَّثَنَا عبد الله بن بدر، عن قيس بن طلق فذكره، واللّفظ لأبي داود، وعندهما مثله غير
أنهما لم يذكرا القصة.
قال الترمذيّ: حسن غريب.
قلت: إسناده حسن لأجل قيس بن عمرو فإنه صدوق وقد سبق في كتاب الوضوء، باب ترك الوضوء من مس الذكر، تحسين هذا الإسناد.
وصحّحه ابن خزيمة (1101)، وابن حبَّان (2449) وروياه من هذا الطّريق.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (16296) من حديث ملازم بن عمرو السُحيميّ، حَدَّثَنَا جدّي عبد الله بن بدر قال: وحدّثني سراج بن عقبة أن قيس بن طلْقٍ حدَّثهما أن أباه طلق بن علي أتانا في رمضان فذكر بقية الحديث مثله. فسراج بن عُقبة متابع لعبد الله بن بدر، وهذا الحديث دليل لمن قال بعدم نقض الوتر. فقد رُويَ عن أبي بكر الصديق أنه كان يوتر قبل النوم، ثمّ يقوم يصلِّي ركعتين ركعتين، ولا يُعيد الوتر.
وكانت عائشة أم المؤمين تقول: أوتران في ليلة؟ إنكارًا منها لنقض الوتر.
وبه قال عمر بن الخطّاب، وسعد، وعمار بن ياسر، وابن عباس، وأبو هريرة وغيرهم من الصّحابة، وهو قول مالك وأحمد والشافعيّ، وأهل الكوفة.
قال الترمذيّ: وهذا أصح، لأنَّه قد رُوِيَ من غير وجه أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم صلَّى بعد الوتر"، أي ولم يوتر بعده.
তলক ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [কায়েস ইবনে তলক বলেন:] রমযান মাসের এক দিন তলক ইবনে আলী আমাদের কাছে এলেন, তিনি আমাদের কাছে সন্ধ্যা পর্যন্ত রইলেন এবং ইফতার করলেন। এরপর তিনি আমাদের নিয়ে রাতে সালাতে দাঁড়ালেন এবং আমাদের নিয়ে বিতর আদায় করলেন। এরপর তিনি তার নিজ মসজিদে চলে গেলেন এবং তার সাথীদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। এমনকি যখন বিতরের সালাত বাকি রইল, তখন তিনি এক ব্যক্তিকে এগিয়ে দিলেন এবং বললেন: তোমার সাথীদের নিয়ে বিতর আদায় করো, কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "এক রাতে দুটি বিতর নেই।"