হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2701)


2701 - عن عائشة قالت: مِن كُلِّ الليل قد أوتر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فانتهى وِتره إلى السَّحَر.

وفي رواية: من كلِّ اللَّيلِ قد أوتر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من أوَّلِ اللَّيل، وأوسطه، وآخره. فانتهى وِتْرُه إلى السَّحَر.

متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب الوتر (996)، ومسلم في صلاة المسافرين (745) كلاهما من حديث الأعمش قال: حَدَّثَنِي مسلم (وهو أبو الضُّحى) عن مسروق، عن عائشة فذكرته واللّفظ لهما.

والرّواية الثانية عند مسلم من طريق يحيى بن وَثَّاب، عن مسروق عنها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের প্রতিটি অংশেই বিতর আদায় করেছেন – রাতের প্রথম ভাগ, মধ্য ভাগ ও শেষ ভাগেও। তবে শেষ পর্যন্ত তাঁর বিতর শেষ রাতে (সাহার) গিয়ে স্থির হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (2702)


2702 - عن غُضَيف بن الحارث قال: قلت لعائشة: أرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يغتسل من الجنابة في أول الليل أو في آخره؟ قالت: ربما اغتسل في أول الليل، وربما اغتسل في آخره، قلت: الله أكبر الحمد لله الذي جعل في الأمر سعة، قلت: أرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يوتر أول الليل أم في آخره؟ قالت: ربما أوتر في أول الليل، وربما أوتر في آخره. قلت: الله أكبر الحمد لله الذي جعل في الأمر سعة.
حسن: رواه أبو داود (1/ 152، 153) (226) واللّفظ له، والنسائي (1/ 125) (222، 223) مقتصرًا على الجزء الأوّل كلاهما من طريق عُبادة بن نُسَيّ، عن غُضيف بن الحارث فذكر الحديث. وقد مضى الحديث في كتاب الغسل، باب الجُنُب يؤخِّر الغسلَ.

ورواه ابن خزيمة (1081) من وجه آخر عن معاوية بن صالح أن عبد الله بن أبي قيس حدَّثه أنه سأل عائشة كيف كان رسول الله صلى الله عليه وسلم بوتر آخر الليل أو أوَّلَه؟ قالت: كل ذلك كان يفعل، ربما أوتر أول الليل، وربما أوتر من آخره، فقلت: الحمد لله الذي جعل في الأمر سعةً.




গুদাইফ ইবনুল হারিস থেকে বর্ণিত, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আপনি কি দেখেছেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানাবাতের (নাপাকির) গোসল রাতের প্রথম ভাগে করতেন নাকি শেষ ভাগে? তিনি বললেন: কখনও কখনও তিনি রাতের প্রথম ভাগে গোসল করতেন এবং কখনও কখনও রাতের শেষ ভাগে গোসল করতেন। আমি বললাম: আল্লাহু আকবার! সকল প্রশংসা আল্লাহর যিনি এই বিষয়ে প্রশস্ততা (সুযোগ) রেখেছেন। আমি আবার বললাম: আপনি কি দেখেছেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিতর (সালাত) রাতের প্রথম ভাগে পড়তেন নাকি শেষ ভাগে? তিনি বললেন: কখনও কখনও তিনি রাতের প্রথম ভাগে বিতর পড়তেন এবং কখনও কখনও রাতের শেষ ভাগে বিতর পড়তেন। আমি বললাম: আল্লাহু আকবার! সকল প্রশংসা আল্লাহর যিনি এই বিষয়ে প্রশস্ততা (সুযোগ) রেখেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2703)


2703 - عن عليّ قال: مِن كُلِّ الليل قد أوتر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من أوله، وأوسطه وانتهى وِتره إلى السحر.

حسن: رواه ابن ماجة (1186) من حديث شعبة عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضَمْرة، عن عليّ بن أبي طالب فذكره.

وإسناده حسن لأجل عاصم وهو حسن الحديث.

وصحّحه ابن خزيمة (1080) ورواه من هذا الوجه.

وأمّا ما رُوي عن أبي مسعود عقبة بن عمرو الأنصاري قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر أول الليل وأوسطه وآخره فهو منقطع. رواه الإمام أحمد (17071)، والطَّبرانيّ في الكبير (17/ 679، 680)، والأوسط (6985)، والصغير (686) كلّهم من طرق عن إبراهيم بن يزيد النخعيّ، عن أبي عبد الله الجَدَليّ، عن أبي مسعود فذكره. قال شعبة: لم يسمع إبراهيم النخعي من أبي عبد الله الجدلي"جامع التحصيل" (ص 142).




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাতের প্রতিটি অংশেই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিতর সালাত আদায় করেছেন—রাতের প্রথম দিকে, মাঝের দিকে। আর তাঁর বিতর শেষ হতো সাহরী পর্যন্ত।









আল-জামি` আল-কামিল (2704)


2704 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من خاف أن لا يقوم من آخر الليل فليُوتِر أوَّلَه، ومن طمع أن يقوم آخره فليُوتِر آخر الليل، فإن صلاة آخر الليل مشهودة، وذلك أفضل".

وفي رواية:"أيكم خاف أن لا يقومَ من آخر الليل فليوتر، ثمّ ليرقُد، ومَن وثِق بقيام من الليل فليُوتِر من آخِره. فإن قراءة آخر الليل محضورة، وذلك أفضل".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (755) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا حفص وأبو معاوية، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.

والرّواية الثانية عند مسلم أيضًا من وجه آخر عن أبي الزُّبير، عن جابر فذكره.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ভয় করে যে সে রাতের শেষভাগে (জেগে) উঠতে পারবে না, সে যেন রাতের প্রথম অংশেই বিতর পড়ে নেয়। আর যে ব্যক্তি আশা রাখে যে সে রাতের শেষভাগে উঠতে পারবে, সে যেন রাতের শেষভাগে বিতর পড়ে। কারণ রাতের শেষভাগের সালাত (ফেরেশতাদের দ্বারা) উপস্থিত/সাক্ষ্য দেওয়া হয় এবং এটাই উত্তম।"

আরেক বর্ণনায় (তিনি বলেন): "তোমাদের মধ্যে যে কেউ যদি ভয় করে যে সে রাতের শেষভাগে উঠতে পারবে না, সে যেন বিতর পড়ে নেয়, এরপর যেন ঘুমিয়ে যায়। আর যে ব্যক্তি রাতের শেষভাগে জাগতে পারবে বলে বিশ্বাস রাখে, সে যেন তার শেষ অংশেই বিতর পড়ে। কারণ রাতের শেষভাগে কুরআন পাঠ (ফেরেশতাদের দ্বারা) উপস্থিত/হাজির করা হয় এবং এটাই উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (2705)


2705 - عن أبي قتادة أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لأبي بكر:"متي تُوتر؟" قال: أوتر من أول
الليل، وقال لعمر:"متى تُوتر؟" قال: آخر الليل. فقال لأبي بكر:"أخذ هذا بالحزم" وقال لِعُمَر:"أخذ هذا بالقوة".

صحيح: رواه أبو داود (1434) قال: حَدَّثَنَا محمد بن أحمد بن أبي خلف، حَدَّثَنَا أبو زكريا [يحيى بن إسحاق السَّيْلحيني] حَدَّثَنَا حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن عبد الله بن رباح، عن أبي قتادة فذكره.

أخرجه ابن خزيمة (1084)، وعنه الحاكم (1/ 301)، والبيهقي (3/ 35) عن بشر بن موسى، عن يحيى بن إسحاق السَّيْلَحيني به مثله. قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

ولكن قال ابن خزيمة:"هذا عند أصحابِنا عن حمّاد مرسل، ليس فيه أبو قتادة" كذا قال ولم يذكر سبب ذلك.




আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন: “আপনি কখন বিতর সালাত আদায় করেন?” তিনি বললেন: “আমি রাতের প্রথম প্রহরে বিতর আদায় করি।” তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন: “আপনি কখন বিতর সালাত আদায় করেন?” তিনি বললেন: “রাতের শেষ ভাগে।” অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে বললেন: “তিনি সতর্কতা অবলম্বন করেছেন।” আর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে বললেন: “তিনি দৃঢ়তা অবলম্বন করেছেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (2706)


2706 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي بكر:"أي حينٍ تُوتِر؟ قال: أول الليل بعد العتمة. قال:"فأنت يا عمر؟" فقال: آخر الليل. فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أما أنت يا أبا بكر فأخذت بالوُثْقى، وأمّا أنت يا عمر فأخذت بالقوة".

حسن: رواه ابن ماجة (1202) قال: حَدَّثَنَا أبو داود سليمان بن تَوْبة، قال: حَدَّثَنَا يحيى بن أبي بكر، قال: حَدَّثَنَا زائدة، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد الله فذكره.

وإسناده حسن لأجل الكلام في عبد الله بن محمد بن عقيل غير أنه حسن الحديث.

وزائدة هو: ابن قدامة. ومن طريقه رواه الإمام أحمد (14323)، وأبو داود الطيالسي (1776)، وأبو يعلى (1821) وغيرهم.

ويشهد له حديث ابن عمر أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لأبي بكر:"متى توتر؟" قال: أوتر ثمّ أنام. قال:"بالحزم أخذت"، وسأل عمر فقال: متى توتر؟" فقال: أنام ثمّ أقوم من الليل فأوتر قال:"فِعْلي فعلتَ".

وفي رواية:"فعلَ القويّ فعلت".

رواه ابن خزيمة (1985)، وابن حبَّان (2446)، والحاكم (1/ 301)، والبيهقي (3/ 36) كلّهم من طريق محمد بن عباد المكيّ، قال: حَدَّثَنَا يحيى بن سُليم، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكر الحديث.

ومن هذا الطريق رواه أيضًا ابن ماجة إثر رواية جابر بن عبد الله إِلَّا أنه لم يسق لفظه.

قال الحاكم: صحيح. وقال البوصيري في"مصباح الزجاجة":"هذا إسناد صحيح رجاله ثقات".

قلت: فيه يحيى بن سُلَيم الطائفي تكلم في حفظه، وخاصة من روايته عن عبيد الله بن عمر، قال البخاريّ: يروي أحاديث عن عبيد الله بهم فيها. وقال النسائيّ: ليس به بأسٌ، وهو منكر الحديث
عن عبيد الله بن عمر، ولذا تجنب الشيخان من روايته عنه.

والخلاصة فيه: أنه حسن الحديث فيما روي عن غير عبيد الله بن عمر.

وأمَّا أبو حاتم فقال:"شيخ صالح محله الصدق، لم يكن بالحافظ، يكتب حديثه ولا يحتج به".

وفي الباب عن أبي هريرة: رواه البزار"كشف الأستار" (736)، والطبراني في الأوسط (5059) وفيه سليمان بن داود اليمامي ضعيف.

قال البزار: سليمان بن داود لا يتابع على حديثه، وليس بالقوي، وأحاديثه تدل على ضعفه.

انتهى. وبه ضعَّفه الهيثمي في"مجمعه" (2/ 245).

وعن عقبة بن عامر: رواه الطبراني في"الكبير" (17/ 303) وفيه ابن لهيعة، وبه أعلّه الهيثميّ في"مجمعه" أيضًا.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি কোন সময় বিতর (সালাত) আদায় করো?" তিনি বললেন, ইশার (সালাতের) পর রাতের প্রথম ভাগে। এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আর তুমি, হে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)?" তিনি বললেন, রাতের শেষ ভাগে। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আবূ বকর! তুমি তো (আমলের ক্ষেত্রে) সুনিশ্চিত পন্থা (আল-উতস্কা) অবলম্বন করেছ। আর হে উমার! তুমি তো শক্তির (আল-কুওয়াহ) পথ অবলম্বন করেছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (2707)


2707 - عن أبي هريرة قال:"أوصاني خليلي بثلاثٍ. لا أدعهن حتَّى أموت، صوم ثلاثة أيام من كل شهر، وصلاة الضُّحى، ونومٌ على وترٍ".

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1178)، ومسلم في صلاة المسافرين (721) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا عباس الجُريري - وهو ابن فَرُّوخ - عن أبي عثمان النهدي، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার খলীল (অন্তরঙ্গ বন্ধু, অর্থাৎ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ে ওসিয়ত করেছেন, আমি মৃত্যু পর্যন্ত তা বর্জন করব না: প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখা, দু'আ (চাশতের) সালাত আদায় করা এবং বিতর সালাত আদায় করে ঘুমানো।









আল-জামি` আল-কামিল (2708)


2708 - عن أبي الدرداء قال:"أوصاني حبيبي بثلاث، لن أدعهن ما عشتُ: بصيام ثلاثة أيام من كل شهر، وصلاة الضُّحى، وأن لا أنام حتى أوتر".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (722) عن هارون بن عبد الله ومحمد بن رافع، قالا: حدثنا ابن أبي فُدَيك، عن الضحاك بن عثمان، عن إبراهيم بن عبد الله بن حُنين، عن أبي مُرَّة مولى أمِّ هانئ، عن أبي الدرداء فذكره.




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার বন্ধু (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি কাজের অসিয়ত (উপদেশ) করেছেন, আমি জীবিত থাকা পর্যন্ত সেগুলো কখনো ছাড়ব না: প্রতি মাসে তিন দিন সাওম পালন করা, চাশতের (দুহা) সালাত আদায় করা এবং বিতর সালাত আদায় না করা পর্যন্ত না ঘুমানো।









আল-জামি` আল-কামিল (2709)


2709 - عن أبي ذر قال:"أوصاني حبيبي صلى الله عليه وسلم بثلاثة لا أدعُهن إن شاء الله تعالى أبدًا. أوصاني بصلاة الضُّحى، وبالوتر قبل النوم، وبصيام ثلاثة أيام من كل شهر".

صحيح: رواه النسائي (2404) عن علي بن حجر، قال: حدثنا إسماعيل، حدثنا محمد بن أبي حرملة، عن عطاء بن يسار، عن أبي ذرٍّ فذكره.

إسناده صحيح، وقد صحّحه أيضًا ابن خزيمة (1083)، فرواه عن علي بن حجر السعدي، والإمام أحمد (21518) عن سليمان بن داود الهاشمي، كلاهما عن إسماعيل به مثله.

وإسماعيل هو: ابن جعفر بن أبي كثير الأنصاري الزُّرَقي من رجال الجماعة.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার প্রিয়তম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ের জন্য উপদেশ দিয়েছেন, আল্লাহর ইচ্ছায় আমি সেগুলো কখনো ছাড়ব না। তিনি আমাকে সালাতুদ-দুহা (চাশতের নামাজ) আদায় করতে, ঘুমের পূর্বে বিতর সালাত আদায় করতে এবং প্রতি মাসে তিন দিন রোজা রাখতে উপদেশ দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2710)


2710 - عن أبي سعيد الخدري أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"مَن أدرك الصبحَ فلم يوتر فَلا وِتْر له".

صحيح: أخرجه ابن خزيمة (1092)، وابن حبان (2408)، والحاكم (1/ 301، 302) كلهم من طريق هشام، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد .. فذكره.

وصحّحه الحاكم على شرط مسلم.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সকাল করেছে, অথচ বিতর সালাত আদায় করেনি, তার বিতর সালাত নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (2711)


2711 - عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"بادروا الصُبح بالوتر".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (750) من طريق ابن أبي زائدة، أخبرني عاصم الأحول، عن عبد الله بن شقيق، عن ابن عمر فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ভোর হওয়ার আগেই বিতর সালাত আদায় করে নাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (2712)


2712 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا طلع الفجر، فقد ذهب كلُّ صلاة الليل والوتر، فأوتروا قبل طلوع الفجر".

حسن: رواه الترمذي (469) عن محمود بن غيلان، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، عن سليمان بن موسى، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

قال النووي في الخلاصة (1906):"رواه الترمذي بإسناد صحيح".

وقال الترمذي:"سليمان بن موسى قد تفرد به على هذا اللفظ، ورُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم:"لا وتر بعد صلاة الصبح".

قلت: سليمان بن موسى هو: الأموي مولاهم، الدمشقي الأشدق، وثَّقه الدارمي وابن سعد، وتكلم فيه البخاري والنسائي، والخلاصة فيه كما في التقريب:"صدوق فقيه، في حديثه بعض لين، وخلط قبل موته بقليل" فتصحيح النووي له فيه نظر، وأكثر أحواله أنه حسن لأجل سليمان بن موسى ولعل من تخليطه رواه مرَّةً مرفوعا، وأخرى موقوفًا.
فقد رواه الحاكم (1/ 302)، والبيهقي (2/ 478) كلاهما من طريق حجاج بن محمد قال: قال ابن جريج، أخبرني سليمان بن موسى، ثنا نافع أن ابن عمر كان يقول: من صلَّى من اللَّيل فليجعل آخر صلاته وِترًا، فإنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بذلك، فإذا كان الفجرُ فقد ذهب صلاةُ اللَّيلِ والوِترُ، لأنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أوتروا قبل الفجر".

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: وليس كما قال، فإنَّ ابن جريج وإن صرَّح بالإخبار، فانتفت عنه تُهمة التدليس. ولكن آفته سليمان بن موسى، فإمَّا أنه اختلط عليه، أو أنَّه سمع ابن عمر هكذا مرَّة يرويه مرفوعًا، وأخرى موقوفًا مستنبطًا من قول النبي صلى الله عليه وسلم فهو موافق لما رواه مسلم"وبادروا الصبح بالوتر".

وأما قول الترمذي وروي عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم:"لا وِتر بعد صلاة الصبح" فهو ضعيفٌ جدًّا، رواه ابن نصر في كتاب الوتر (69) وعبد الرزاق (4591) كلاهما من طريق أبي هارون العبدي، عن أبي سعيد الخدري قال: نادى منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا وتر بعد الفجر"، وأبو هارون العبدي هو: عُمارة بن جُوَين، أصحاب الحديث لا يحتجون بروايته، وهو ضعيف جدًّا، وقد رَموه بالكذب.

قال ابن نصر:"هذا حديثٌ لو ثبت لكان حجَّةً لا يجوز مخالفته غير أن أصحاب الحديث لا يحتجون برواية أبي هارون العبدي".

وهو كذلك فإن أبا هارون العبدي ضعيف جدًّا. ولكن ثبت من حديث أبي سعيد الخدري أنه"من أدركه الصبح ولم يوتر فلا وتر له" وهو حديث صحيح، فيحمل هذا على من تعمد ترك الوتر حتى أدركه الصبح.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন ফজর উদিত হয়, তখন রাতের সকল সালাত ও বিতর আদায়ের সময় শেষ হয়ে যায়। অতএব, তোমরা ফজর উদিত হওয়ার আগেই বিতর আদায় করে নাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (2713)


2713 - عن وعن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من نام عن وتره، أو نسيه فليصله إذا أصبح أو ذكره".

صحيح: رواه أبو داود (1431) عن محمد بن عوف، حدثنا عثمان بن سعيد، عن أبي غسان محمد بن مطرف المدني، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد فذكره. وإسناده صحيح.

وأخرجه الحاكم (1/ 302)، وعنه البيهقي (2/ 480) من وجه آخر عن عثمان بن سعيد (بن كثير بن دينار) عن أبي غسان به مثله.

قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين".

قلت: هذا الإسناد أصح ما روي به هذا الحديث.

وله أسانيد أخرى ضعيفة منها ما رواه الترمذي (465)، وابن ماجه (1188) كلاهما من حديث
عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه، به مثله.

وعبد الرحمن بن زيد ضعيف، أهل الحديث لا يحتجون به.

إلى هذا أشار محمد بن يحيى، ولكن لا تعارض بين الحديثين فحديث أبي سعيد الأول"أوتروا قبل أن تصبحوا" يدل على أن وقت صلاة الوتر ينتهي بطلوع الفجر، فمن تعمد، ولم يوتر قبل طلوع الفجر فلا وتر له، والحديث الثاني يدل على أنَّ من نام عن وتره، أو نسيه فليصلها إذا ذكرها، أي: قضاءً؛ لأنَّ وقته قد خرج وعليه يحمل حديث ابن عمر السابق وإذا كان عبد الرحمن بن زيد بن أسلم واه، فله إسناد آخر صحيح كما سبق.

قال محمد بن نصر بعد أن روى حديث أبي سعيد:"والذي ذهب إليه جماعة من أصحابنا أن من طلع عليه الفجر، ولم يوتر، فإنه يوتر ما لم يُصلِّ الغداةَ اتِّباعًا للأخبار التي رُوِيت عن أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أنَّهم أوتروا بعد الصبح، وقد رُويَ عن النبي صلى الله عليه وسلم أيضًا أنه أوتَرَ بعد ما أصبح، فإذا صلَّى الغداةَ. فإن جماعة من أصحابنا قالوا: لا يقضي الوتر بعد ذلك، وقد رُويَ ذلك عن جماعة من المتقدِّمين أيضًا إلى هذا ذهب الشافعي وأحمد وإسحاق وغيرهم من أصحابنا"."كتاب الوتر" (ص 156).

وقال أيضًا:"والذي أقول به أنه يُصلي الوتر ما لم يُصل الغداة. فإذا صلَّى الغداة فليس عليه أن يقضيه بعد ذلك، وإن قضاه على ما يقضي التطوع فحسن. قد صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم الركعتين قبل الفجر بعد طلوع الشمس في الليلة التي نام فيها عن صلاة الغداة حتى طلعت الشمس، وقضى الركعتين اللتين كان يُصليهما بعد الظهر بعد العصر في اليوم الذي شُغل فيه عنهما. وقد كانوا يقضون صلاة الليل - إذا فاتتهم بالليل - نهارًا فذلك حسن، وليس بواجب"،"كتاب الوتر" (164).

وأما ما رُوي عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصبح فيوتر، ففيه أبو نَهيك مختلف في توثيقه فجهله ابن عبد البر ووثقه غيره، كما أن فيه انقطاعا فإنه لم يثبت سماعه عن عائشة.

رواه الإمام أحمد (26058)، والطبراني في"الأوسط" (2153)، والبيهقي (2/ 479) كلهم من طريق ابن جريج قال: أخبرني زياد (وهو ابن سعد الخراساني) أن أبا نَهيك أخبره أن أبا الدرداء كان يخطب الناسَ أن لا وتر لمنْ أدرك الصبحَ فانطلق رجال من المؤمنين إلى عائشة، فأخبروها، فقالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصبح فيوتر. انتهى.

ورواه البيهقي أيضًا من حديث حاتم بن سالم البصري، ثنا عبد الوارث بن سعيد، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء قال: ربما رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم يُوتر، وقد قام الناس لصلاة الصبح.

قال البيهقي: تفرد به حاتم بن سالم البصري، ويقال له الأعرجي، وحديث ابن جريج أصح من ذلك.
ورواه أيضًا بإسناده عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم أصبح فأوتر. قال: كذا وجدتُه في الفوائد الكبير.

ثم رواه عن أبي مجلز قال: أصبح ابن عمر، ولم يوتر، أو كان يُصبح ثم أوتر. وهذا أشبه. انتهى. يعني الموقوف أصح.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার বিতর সালাত আদায় না করে ঘুমিয়ে গেল অথবা ভুলে গেল, সে যেন সকালে উঠে অথবা যখন তার মনে পড়ে তখন তা আদায় করে নেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2714)


2714 - عن أبي سلمة قال: سألت عائشة عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت:"كان يُصلي ثلاث عشرة ركعة. يُصلي ثمان ركعات، ثم يُوتر، ثم يصلي ركعتين وهو جالس، فإذا أراد أن يركع قام فركع".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (738/ 126) عن محمد بن المثنى، حدثنا ابن أبي عدي، حدثنا هشام، عن يحيى، عن أبي سلمة فذكره.

وأما ما روي عن أم سلمة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يصلي بعد الوتر ركعتين وهو جالس. فالصّواب فيه أنه من فعل أم سلمة نفسها، كما قال العقيلي في الضعفاء.

والحديث رواه الترمذي (471)، وابن ماجه (1195) كلاهما عن محمد بن بشار، حدثنا حماد بن مسعدة، قال: حدثنا ميمون بن موسى المرئي، عن الحسن، عن أمه، عن أم سلمة فذكرته.

وميمون بن موسى تكلم فيه النسائي وأبو أحمد الحاكم، وقال الساجي: كان يدلس وقال ابن حبان: منكر الحديث يروي عن الثقات ما لا يشبه حديث الإثبات، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد.

ومشّاه أبو حاتم وأبو داود.

كما أن فيه الحسن وهو مدلس وقد عنعن، وأمه اسمها:"خيرة" وهي مولاة أم سلمة. ذكرها ابن حبان في الثقات ووثَّقها ابن حزم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত সম্পর্কে তাঁকে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি বললেন: তিনি তেরো রাকআত সালাত আদায় করতেন। তিনি আট রাকআত সালাত আদায় করতেন, তারপর বিতর পড়তেন। এরপর তিনি বসে দু’রাকআত সালাত আদায় করতেন। যখন তিনি রুকু করতে চাইতেন, তখন তিনি উঠে দাঁড়াতেন এবং রুকু করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2715)


2715 - عن أبي أمامة كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُوتر بِتِسع حتَّى إذا بَدُن وكَثُر لحمُه أوتر بسبعٍ، وصلَّى ركعتين وهو جالس، يقرأ فيهما: {إِذَا زُلْزِلَتِ} و {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ}.

حسن: رواه أحمد (22313)، والطبراني في الكبير (8/ 332)، والبيهقي (3/ 33)، ومحمد بن نصر في كتاب الوتر (55) كلهم من طريق عُمارة بن زاذان، ثنا أبو غالب، عن أبي أمامة فذكره.

ورواه الإمام أحمد (22246)، والطبراني، والبيهقي (8/ 332) كلهم من طريق عبد الصمد، يعني ابن عبد الوارث، ثنا أبي، عن عبد العزيز بن صُهَيب، عن أبي غالب، عن أبي أُمامة فذكرهُ مختصرًا وهو قوله:"كان يُصلِّي ركعتين بعد الوتر، وهو جالس يقرأ فيهما ....".

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 241):"رواه أحمد والطبراني، ورجال أحمد ثقات".

قلت: وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي غالب غير أنه حسن الحديث.

وعمارة بن زاذان فيه كلام يسير إلا أنه توبع؛ ولذا قد يكون وهم في رواية هذا الحديث عن ثابت،
عن أنس، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يوتر بتسع ركعات، فلما أسنَّ وثقل أوتر بسبع، وصلى ركعتين وهو جالس يقرأ فيهنّ بالرحمن والواقعة. قال أنس: ونحن نقرأ بالسور القصار {إِذَا زُلْزِلَتِ} [الزلزلة: 1]، و {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} [الكافرون: 1] ونحوهما.

رواه ابن خزيمة (1079) من طريقين عن عمارة بن زاذان، عن ثابت، به. فإنه لم يتابع على هذه الرواية.

ولذا قال البيهقي (3/ 33):"وخالف عمارة بن زاذان في قراءة النبي صلى الله عليه وسلم فيهما سائر الرواة" ونقل عن البخاري أنه قال: عمارة بن زاذان ربما يضطرب في حديثه.

وقد رُوي أيضًا عن أنس بن مالك، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يصلي ركعتين بعد الوتر وهو جالس ويقرأ في الركعة الأولى بأمّ القرآن، و {إِذَا زُلْزِلَتِ}، وفي الثانية: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ}. رواه البيهقي (3/ 33) وغيره عن بقية بن الوليد، عن عتبة بن أبي حكيم، عن قتادة، عن أنس، فذكره.

وبقية بن الوليد مدلّس وقد عنعن، وعتبة بن أبي حكيم ضعيف. وأعلّه البيهقيّ بعتبة بن أبي حكيم، وأبي غالب الذي في حديث أبي أمامة.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নয় রাকাত দ্বারা বিতর পড়তেন। অবশেষে যখন তিনি স্থূল হয়ে গেলেন এবং তাঁর গোশত বৃদ্ধি পেল, তখন তিনি সাত রাকাত দ্বারা বিতর পড়লেন। আর তিনি বসে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন এবং তাতে তিনি {ইযা যুলযিলাত} ও {কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন} সূরাদ্বয় পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2716)


2716 - عن ثوبان قال: كُنَّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر فقال:"إن هذا السفر جهد وثقل، فإذا أوتر أحدكم فليركع ركعتين، فإن استيقظ وإلّا كانتا له".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (2/ 87)، والبزار"كشف الأستار" (692) كلاهما من حديث عبد الله بن صالح، حدثني معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جبير، عن أبيه، عن ثوبان فذكره.

وعزاه الهيثمي في"المجمع" (2/ 163) إلى البزار وحده، وهو تقصير منه، ثم عزاه مرَّةً أخرى (2/ 246) إلى الكبر والأوسط ولم يعز إلى البزار وفيه تقصير أيضًا، وقال في الموضعين:"فيه عبد الله بن صالح كاتب الليث، واختلف في الاحتجاج به"، وقال في الموضع الثاني:"وفيه كلام".

قلت: وهو كما قال، ولكنه توبع، فقد رواه الدارمي (1601)، وابن خزيمة (1106)، وابن حبان (2577) كلهم من طريق عبد الله بن وهب، عن معاوية بن صالح، عن شريح بن عيد، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، به مثله.

ولكن سقط في صحيح ابن حبان"عن أبيه" بين عبد الرحمن بن جبر وين ثوبان، وهو لابد منه كما في المصادر الأخرى.

وكذلك اختلف لفظ الدارمي من قوله:"هذا السفر" إلى"هذا السهر" وأَعتقد أنه أيضًا خطأ.

وبهذه المتابعة ارتفع الحديث إلى درجةِ الصحيح لغيره.

وفي الحديث دليل على أن أداء الركعتين بعد الوتر لا كراهية فيه.

قال ابن خُزيمة:"إن الصلاة بعد الوتر مباحة لجميع من يريد الصلاة بعده، وأن الركعتين اللتين كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصليهما بعد الوتر لم يكونا خاصة للنبي صلى الله عليه وسلم دون أمته؛ إذ النبي صلى الله عليه وسلم قد أمرنا
بالركعتين بعد الوتر، أمر ندب وفضيلة، لا أمر إيجاب وفريضة". انتهى.

وقيَّده ابن حبان للمسافر الذي يخاف أن لا يستيقظ للتهجد، ولكن هل هذا كان من دأب رسول الله صلى الله عليه وسلم فيرى النووي رحمه الله تعالى أنه لم يكن من دأبه صلى الله عليه وسلم أداء الركعتين بعد الوتر، وإنما فعل مرة أو مرتين لبيان الجواز للأحاديث المشهورة:"اجعلوا آخر صلاتكم وترًا".

ويرى محمد بن نصر أن قوله:"اجعلوا آخر صلاتكم وترًا" اختيارًا لا إيجابًا، لأن ابن عمر هو الراوي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اجعلوا آخر صلاتكم وترًا" وهو الذي كان يشفع وتره. وروي عنه أنه سئل عمن قام من الليل وقد أوتر قبل أن ينام فصلَّى مثنى مثنى، ولم يشفع وتره. فقال: ذلك حسن جميل، فدل فتياه أنه رأى قوله:"اجعلوا آخر صلاتكم وترًا" اختيارًا لا إيجابًا.




সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে এক সফরে ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয় এই সফর কষ্ট ও শ্রমসাধ্য। সুতরাং যখন তোমাদের কেউ বিতর সালাত আদায় করে, তখন সে যেন দুই রাকাত সালাত আদায় করে নেয়। যদি সে (রাতে তাহাজ্জুদের জন্য) জেগে ওঠে (তবে সে আরও সালাত আদায় করতে পারে), অন্যথায় এই দুই রাকাতই তার জন্য (আমলে যুক্ত হবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (2717)


2717 - عن أنس بن سيرين قال: سألت ابن عمر؛ قلت: أرأيت الركعتين قبل صلاة الغداة أطيل فيهما القراءة؟ فقال:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي من الليل مثنى مثنى، ويوتر بركعةٍ، ويُصلي الركعتين قبل صلاة الغداة. وكأن الأذانَ بأُذُنَيه".

متفق عليه: رواه البخاري في صلاة الوتر (995)، ومسلم في صلاة المسافرين (749/ 157) كلاهما من حديث حماد بن زيد، قال: حدثنا أنس بن سيرين فذكره، واللفظ للبخاري، وسبق لفظ مسلم وهو قريب منه مع بعض الزيادات.

وقوله:"كأن الأذان بأُذُنَيه" قال حماد: أي بسرعة.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনাস ইবনু সীরীন (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আমি বললাম: ফাজরের (ভোরের) সালাতের আগের দু’রাকাআত সম্পর্কে আপনার কী ধারণা? আমি কি তাতে কিরাআত দীর্ঘায়িত করব? তখন তিনি বললেন: "নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) রাতে দু’ দু’ রাকাআত করে সালাত আদায় করতেন, আর এক রাকাআত দ্বারা বিতর পড়তেন, আর তিনি ফাজরের সালাতের আগের দু’রাকাআত সালাত আদায় করতেন। আর যেন আযান তাঁর কানে ছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (2718)


2718 - عن ابن عمر أن رجلًا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صلاة الليل فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة الليل مثنى مثنى. فإذا خشي أحدكم الصبح فصلى ركعة واحدة توتر له ما قد صلَّى".

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (13) عن نافع وعبد الله بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.

ورواه البخاري في الوتر (990) ومسلم في صلاة المسافرين (749) كلاهما من طريق مالك به.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাতের সালাত (নামাজ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “রাতের সালাত হলো দু’দু’রাকাত করে (আদায় করা)। এরপর তোমাদের কেউ যদি সকাল (ফজরের ওয়াক্ত) হয়ে যাওয়ার ভয় করে, তবে সে যেন এক রাকাত সালাত আদায় করে নেয়, যা তার ইতোপূর্বে আদায়কৃত সালাতকে বেজোড় (বিতর) করে দেবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (2719)


2719 - عن عبد الله بن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الوتر ركعة من آخر الليل".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (752) عن شيبان بن فَرُّوخ، حدثنا عبد الوارث، عن أبي التيَّاح، قال: حدثني أبو مِجْلَز، عن ابن عمر فذكره.

ورواه أيضًا شعبة، عن قتادة، عن أبي مِجْلَز به مثله.

وأوتر معاوية بعد العشاء بركعة، وعنده مولى لابنِ عباسٍ. فأتى ابن عباس فقال: دعه فإنه صحب رسول الله صلى الله عليه وسلم.

وفي رواية: قيل لابن عباس: هل لك في أمير المؤمنين معاوية، فإنه ما أوتر إلا بواحدة. قال:
إنه فقيه.

رواه البخاري في فضائل أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم (3764، 3765) من طريقين عن ابن أبي مليكة، قال: أوتر معاوية فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিতর হলো রাতের শেষভাগে এক রাকাত।"

আর মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইশার পর এক রাকাত বিতর আদায় করলেন, যখন তাঁর নিকট ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযাদকৃত গোলাম উপস্থিত ছিল। সে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে (এ বিষয়ে) বলল। তিনি বললেন: তাকে (তার মতো) থাকতে দাও, কেননা তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছেন।

অন্য এক বর্ণনায় (ইবনু আব্বাসকে) জিজ্ঞেস করা হলো: আমীরুল মু'মিনীন মু'আবিয়া সম্পর্কে আপনার কী অভিমত? তিনি তো কেবল এক রাকাতই বিতর আদায় করেন। তিনি বললেন: তিনি একজন ফকীহ (ইসলামী আইনজ্ঞ)।









আল-জামি` আল-কামিল (2720)


2720 - عن أبي مِجْلَز قال: سألت ابن عباس عن الوتر، فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ركعةٌ من آخر اللَّيل" وسألت ابن عمر فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ركعة من آخر الليل".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (753) عن زهير بن حرب، حدثنا عبد الصمد، حدثنا همام، حدثنا قتادة، عن أبي مِجْلَز فذكره.




আবূ মিজলায থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বিতর সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিলাম। তখন তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "রাতের শেষাংশে এক রাকাত।" আর আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও জিজ্ঞেস করেছিলাম। তিনিও বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "রাতের শেষাংশে এক রাকাত।"