হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2721)


2721 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي من الليل إحدى عشرة ركعة، يوتر منها بواحدة، فإذا فرغ اضطجع على شقه الأيمن.

صحيح: رواه مالك في صلاة الليل (8) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (736) عن يحيى بن يحيى، عن مالك به مثله وزاد في آخر الحديث:"حتى يأتيه المؤذِّن فيصلي ركعتين خفيفتين".

ورواه أيضًا من طريق عمرو بن الحارث، عن ابن شهاب به وفيه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي فيما بين أن يفرغ من صلاة العشاء إلى الفجر؛ إحدى عشر ركعة. يُسلم بين كل ركعتين، ويوتر بواحدةٍ …




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী ছিলেন, থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে এগারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। এর মধ্যে এক রাকাতে তিনি বিতর পড়তেন। যখন তিনি (সালাত) শেষ করতেন, তখন তিনি তাঁর ডান কাত হয়ে শুয়ে পড়তেন।

(সহীহ মুসলিমের একটি বর্ণনায় এর সাথে অতিরিক্ত রয়েছে যে) অবশেষে মুয়াজ্জিন তাঁর নিকট আসা পর্যন্ত (তিনি বিশ্রাম নিতেন), অতঃপর তিনি হালকা দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন।

(অপর একটি বর্ণনায় এসেছে): রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত শেষ করার পর থেকে ফজর পর্যন্ত এগারো রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি প্রতি দুই রাকাতের পর সালাম ফেরাতেন এবং এক রাকাতে বিতর পড়তেন...









আল-জামি` আল-কামিল (2722)


2722 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه سأل عائشة: كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضانَ؟ قالت: ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يزيد في رمضانَ، ولا في غيره على إحدى عشرة ركعةً، يُصلِّي أربعًا فلا تسأل عن حُسنِهن وطُولِهِن، ثم يُصلِّي أربعًا فلا تسأل عن حُسنِهنَّ وطُولِهِنَّ، ثمَّ يُصَلِّي ثلاثًا.

متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (9) عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف فذكره.

ورواه البخاري في التهجد (1147)، ومسلم في صلاة المسافرين (738) كلاهما من طريق مالك به.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে আবূ সালামাহ ইবনু আবদির রহমান জিজ্ঞেস করেছিলেন: রমযান মাসে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসে কিংবা অন্য মাসে এগারো রাকআতের বেশি সালাত আদায় করতেন না। তিনি চার রাকআত সালাত আদায় করতেন— তুমি সেগুলোর সৌন্দর্য ও দীর্ঘতা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করো না। এরপর তিনি আরও চার রাকআত সালাত আদায় করতেন— তুমি সেগুলোর সৌন্দর্য ও দীর্ঘতা সম্পর্কেও জিজ্ঞেস করো না। অতঃপর তিনি তিন রাকআত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2723)


2723 - عن أبي بن كعب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في الوتر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} وفي الركعة الثانية بـ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} وفي الثالثة بـ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} ولا يسلم إلا في آخرهن، ويقول: يعني بعد التسليم:"سبحان الملك القدوس ثلاثًا".
صحيح: رواه النسائي (1701) عن يحيى بن موسى قال: أنبأنا عبد العزيز بن خالد، قال: حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن عزْرة، عن سعيد بن عبد الرحمن بن أَبْزَى، عن أبيه، عن أبَيِّ بن كعب فذكره. وإسناده صحيح.




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিতরের সালাতে (প্রথম রাকাআতে) {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ‘লা}, দ্বিতীয় রাকাআতে {কুল ইয়া-আইয়ুহাল কা-ফিরূন} এবং তৃতীয় রাকাআতে {কুল হুওয়াল্লা-হু আহাদ} পাঠ করতেন। আর তিনি শেষেই কেবল সালাম ফিরাতেন। তিনি বলতেন—অর্থাৎ সালাম ফিরানোর পর: "সুবহা-নাল মালিকিল কুদ্দূস" (পবিত্র সত্তা, যিনি বাদশাহ এবং অতি পবিত্র)—তিনবার।









আল-জামি` আল-কামিল (2724)


2724 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلِّي من اللَّيل ثلاث عشرة ركعة، يُوتر من ذلك بخمس، ولا يجلس في شيء إلا في آخرها.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (737) من طرق عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وزاد الترمذي (459): فإذا أذن المؤذن قام فصلى ركعتين خفيفتين.

ورواه النسائي (1717) من وجه آخر عن هشام واختصر على قولها:"كان يوتر بخمس ولا يجلس إلا في آخرهن".

قال الترمذي: رأى بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم الوتر بخمس، وقالوا: لا يجلس في شيء مِنهنَّ إلَّا في آخرهِنَّ. وقال: وسألت أبا مصعب المديني عن هذا الحديث فقلت: كيف كان النبي صلى الله عليه وسلم يوتر بالتسع والسبع؟ قال: يُصلي مثنى مثنى، ويُسلم، ويوتر بواحدة" انتهى.

قلت: هذا التفسير مُخالفٌ لما قالته عائشة: ولا يجلس في شيء إلا في آخرها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে তেরো রাকাত সালাত আদায় করতেন। এর মধ্যে তিনি পাঁচ রাকাতের মাধ্যমে বিতর আদায় করতেন, এবং এর মধ্যে তিনি শেষ রাকাতটি ছাড়া অন্য কোথাও বসতেন না।

সহীহ (সহিহ): মুসলিম (কিতাবুস সালাত আল-মুসাফিরীন, ৭৩৭) হিশাম ইবন উরওয়া, তাঁর পিতা, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে একাধিক সনদে এটি বর্ণনা করেছেন। ইমাম তিরমিযী (৪৫৯) অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: যখন মুয়াযযিন আযান দিতেন, তখন তিনি দাঁড়িয়ে দু’রাকাত সংক্ষিপ্ত সালাত আদায় করতেন।

নাসাঈও (১৭১৭) হিশামের সূত্রে ভিন্ন সনদে বর্ণনা করেছেন এবং তাঁর এই কথাটি উল্লেখ করে সংক্ষেপ করেছেন: “তিনি পাঁচ রাকাতের মাধ্যমে বিতর করতেন এবং শেষটি ছাড়া বসতেন না।”

ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবীসহ অন্যান্য আহলুল ইলম (আলেমগণ) পাঁচ রাকাত বিতরের পক্ষে মত দিয়েছেন এবং বলেছেন যে, এই রাকাতগুলোর মধ্যে শেষটি ছাড়া অন্য কোথাও বসা যাবে না। তিনি আরো বলেন: আমি আবূ মুস’আব আল-মাদীনীকে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম এবং বললাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিভাবে সাত ও নয় রাকাতের মাধ্যমে বিতর করতেন? তিনি বললেন: তিনি দুই-দুই রাকাত করে সালাত আদায় করতেন এবং সালাম ফিরাতেন, এরপর এক রাকাত দিয়ে বিতর করতেন। সমাপ্ত।

আমি (সংকলক) বলি: এই ব্যাখ্যাটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য: 'শেষটি ছাড়া অন্য কোথাও বসতেন না'—এর বিরোধী।









আল-জামি` আল-কামিল (2725)


2725 - عن عائشة كان النبي صلى الله عليه وسلم يُصلي ثمان ركعات لا يجلس فيهن إلا عند الثامنة، فيجلس ويذكر ربه عز وجل، ويدعو ويستغفر، ثم ينهض ولا يُسَلِّم، ثم يصلِّي التاسعة، فيقعد فيحمد ربَّه ويذكره ويدعوه، ثمَّ يُسلّم تسليمًا يُسمعنا.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (746) من حديث قتادة، عن زُرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام بن عامر، عن عائشة في حديث طويل سبق ذكره كاملًا في جامع صلاة النبي صلى الله عليه وسلم في الليل.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আট রাকাত সালাত আদায় করতেন। তিনি এর মধ্যে কেবল অষ্টম রাকাআতের সময় বসতেন। তখন তিনি বসে তাঁর রব আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল্লা-এর যিকির করতেন, দু'আ করতেন এবং ক্ষমা প্রার্থনা করতেন। এরপর তিনি দাঁড়িয়ে যেতেন এবং সালাম ফেরাতেন না। অতঃপর তিনি নবম রাকাআত আদায় করতেন। তখন তিনি বসে তাঁর রবের প্রশংসা করতেন, তাঁকে স্মরণ করতেন এবং তাঁর কাছে দু'আ করতেন। এরপর এমনভাবে সালাম ফেরাতেন যা আমরা শুনতে পেতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (2726)


2726 - عن أم سلمة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر بثلاث عشرة ركعة، فلما كبر وضعف أوتر بسبع.

حسن: رواه الترمذي (457)، والنسائي (1709) كلاهما من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، عن عمرو بن مُرَّة، عن يحيى بن الجزار، عن أمِّ سلمة فذكرته.

قال الترمذي:"حديث حسن".
قلت: وهو كذلك فإن يحيى بن الجزار العرني كما سبق"صدوق"، ورواه الحاكم (1/ 306) من هذا الوجه وقال: صحيح على شرط الشيخين.

وهذا وهم منه فإن يحيى بن الجزار روي له مسلم وحده وقد سبق قول الدارقطني بأن حديث عائشة أشبه بالصّواب من حديث أمِّ سلمة.

قلت: ولكن لا يمنع هذا من صحة الحديثين، وإن كان حديث عائشة أصح لأن أبا معاوية وهو: محمد بن خازم ثقة، حافظ، وأحفظ الناس لحديث الأعمش فلا يُضعف لمخالفة غيره.

ثم قال الترمذي:"وقد رُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم الوتر بثلاث عشرة، وإحدى عشرة، وتسع، وسبع، وخمس، وثلاث، وواحدة". ثم قال: قال إسحاق بن إبراهيم:"معني ما رُوي أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُوتر بثلاث عشرة قال: معناه أنه كان يصلي من الليل ثلاث عشرة ركعة مع الوتر، فنُسبت صلاة الليل إلى الوتر. واحتج بما رُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"أوتروا يا أهل القرآن" قال: إنما عني به قيام اللَّيل، يقول: إنما قِيام اللَّيل على أصحاب القرآن". انتهى

قلت: وليس قوله هذا يُحمل على الإطلاق فقد ثبت أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلى الوتر من واحدة إلى سبع بتسليم واحد، وقال محمد بن نصر في"كتاب الوتر": الأمر عندنا أنَّ الوتر بواحدة وبثلاث وخمس وسبع وتسع، كل ذلك جائز حسن على ما روينا من الأخبار عن النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه من بعده. وقال سفيان: إن شئت أوترت بخمس، وإن شئت أوترت بثلاث، وإن شئت أوترت بركعة، وقال محمد بن سيرين:"كانوا يوترون بخمس، وبثلاث، وبركعة، ويرون كل ذلك حسنًا". انتهى




উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তেরো রাকাত বিতর সালাত আদায় করতেন, কিন্তু যখন তিনি বৃদ্ধ হলেন এবং দুর্বল হয়ে পড়লেন, তখন তিনি সাত রাকাত বিতর আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2727)


2727 - عن عبد الله بن أبي قيس قال: قلتُ لعائشة: بكم كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر؟ قالت: كان يُوتر بأربع وثلاث، وست وثلاث، وثمان وثلاث، وعشر وثلاث، ولم يكن يُوتر بأنقص من سبع، ولا بأكثر من ثلاث عشرة.

صحيح: رواه أبو داود (1362) عن أحمد بن صالح ومحمد بن سلمة المرادي، قالا: حدثنا ابن وهب، عن معاوية بن صالح، عن عبد الله بن أبي قيس فذكره.

قال أبو داود:"زاد أحمد بن صالح: ولم يكن يُوتر بركعتين قبل الفجر. قلت: ما يُوتر؟ قالت: لم يكن يدع ذلك. ولم يذكر أحمد (هو ابن صالح): و"ست وثلاث". انتهى

قلت: إسناده صحيح.

ورواه الإمام أحمد (25159) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن معاوية به، وفيه: وكان لا يدعُ ركعتين.

قال البيهقي:"وهذا يحتمل أن يريد به ثلاث لا يفصل بينهن بجلوس ولا تسليم، فيكون في معني رواية هشام بن عروة""السنن الكبرى" (3/ 28).

وهو يقصد به ما رواه مسلم من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: كان رسول الله
- صلى الله عليه وسلم يصلي ثلاث عشرة ركعة، يوتر منها بخمس، ولا يجلس في شيء منها حتى يجلس في آخرهن فيسلم. وسبق ذكره.

وقلت: ويحتمل أن تكون أرادت بثلاث مع أربع، وثلاث مع ست، وثلاث مع ثمان … الثلاث بتسليمتين الاثنتان خفيفتان، ثم ركعة، وما قبلها أربع، أو ست، أو ثمان طويلة لقولها: فلا تسأل عن حسنهن وطولهن.

وقد يكون المراد بالثلاث بالجلسة والتسليم في آخرهن، كما جاء في بعض طرق حديث سعد بن هشام بن عامر الطويل المذكور في باب جامع صلاة النبي صلى الله عليه وسلم في الليل بأنه صلى الله عليه وسلم ما كان يُسلم في ركعتي الوتر. إلا أني تتبعتُ طرق حديث سعد بن هشام بن عامر فلم أجد في حديثه أنه أوتر بثلاث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু আবী কায়স বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কত রাকাত বেজোড় (বিতর) সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: তিনি চার রাকাত ও তিন রাকাত, ছয় রাকাত ও তিন রাকাত, আট রাকাত ও তিন রাকাত এবং দশ রাকাত ও তিন রাকাতের মাধ্যমে বিতর পড়তেন। আর তিনি সাত রাকাতের কম এবং তেরো রাকাতের বেশি বিতর পড়তেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (2728)


2728 - عن ابن عمر قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يفصِلُ بين الوتر والشفع بتسليمة ويُسمعنا.

حسن: رواه الإمام أحمد (5461)، والطبراني في الأوسط (757) كلاهما من حديث عتَّاب بن زياد، حدثنا أبو حمزة - يعني السُّكَّري -، عن إبراهيم - يعني الصائغ -، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وصحّحه ابن حبان (2435) وأخرجه من طريق عتاب بن زياد به.

وعتَّاب بن زياد وثقه أبو حاتم وابن سعد، وهو"صدوق" من رجال ابن ماجه كما في التقريب. وأبو حمزة السكري اسمه: محمد بن ميمون وهو ثقة فاضل من رجال الجماعة.

وإبراهيم الصائغ هو: إبراهيم بن ميمون الصائغ المروزي وثقه ابن معين والنسائي وهو حسن الحديث روي له أبو داود والنسائي والبخاري معلقًا.

قال الحافظ الهيثمي في"المجمع" (2/ 243) بعد أن عزاه إلى الطبراني في الأوسط وحده:"وفيه إبراهيم بن سعيد وهو ضعيف".

قلت: ليس كما ظنَّ رحمه الله تعالى بل هو: إبراهيم بن ميمون الصائغ، وأما إبراهيم بن سعيد المدني فهو منكر الحديث كما قال صاحب الميزان، والملاحظة الثانية أن الحافظ الهيثمي قصَّر في العزو إلى الطبراني فقط، وفاته العزو إلى الإمام أحمد.

وهذا المرفوع يُقوّيه فعل ابن عمر راوي الحديث الذي كان من أشدِّ الناس اتِّباعًا فإنَّه كان يُسلم بين الركعة والركعتين في الوتر حتَّى يأمر ببعض حاجته. رواه مالك في صلاة الليل (20) ومن طريقه البخاري في الوتر (991) عن نافع، عنه.

وروي سعيد بن منصور بإسنادٍ صحيحٍ عن بَكْر بن عبد الله المزني، قال: صلَّى ابن عمر ركعتين، ثمَّ قال: يا غلام! . ارحل لنا، ثمَّ قام فأوتر بركعة. انظر:"الفتح" (2/ 482) وكذلك رواه أبو بكر
ابن أبي شيبة (2/ 292) من طريق بكر بن عبد الله المزني به مثله.

وأما ما رُوي عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يصلي في الحجرة، وأنا في البيت فيفصل بين الشفع والوتر بتسليم يُسمعناه فهو منقطع. رواه الإمام أحمد (24539) من طريق عمر بن عبد العزيز؛ عن عائشة، وعمر بن عبد العزيز لم يدرك عائشة، وكذلك قاله أيضًا الهيثمي في"المجمع" (2/ 242).




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিতর ও শাফ'কে (বিতরের আগের দুই রাকাত) এক সালামের মাধ্যমে পৃথক করতেন এবং আমাদের তা শোনাতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2729)


2729 - عن أبي أيوب الأنصاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الوتر حقٌّ على كلِّ مسلم، فمن أحبَّ أن يُوتِرَ بخمس فليفعل، ومن أحب أن يُوتِرَ بثلاث فليفعل، ومن أحب أن يُوتِرَ بواحدةٍ فليفعل".

صحيح: رواه أبو داود (1422) عن عبد الرحمن بن المبارك، حدَّثني قُريش بن حَيَّان العجلي، حدثنا بكر بن وائل، عن الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي أيوب الأنصاري فذكره.

رواه النسائي (1710، 1711) من طريق دُوَيد بن نافع والأوزاعي، وابن ماجه (1190) عن الأوزاعي وحده - كلاهما عن الزهري به مثله.

وإسناده صحيح، وقد اختلف على الزهري فرواه عنه بكر بن وائل والأوزاعي ودُوَيد بن نافع مرفوعًا، وتابعهم على رَفعِه سفيان بن حُسَين ويونس وسفيان بن عيينة، وغيرهم.

ورواه الحاكم (1/ 302) من وجه آخر عن الأوزاعي وقال:"صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه، وقد تابعه محمد بن الوليد الزبيدي وسفيان بن عيينة، وسفيان بن حسين ومعمر بن راشد، ومحمد بن إسحاق وبكر بن وائل على رفعه".

قلت: وخالف هؤلاء جماعة فأوقفوه على أبي أيوب، والحُكْمُ لِمَن رفع لأنَّهم أكثر عددًا، وإليه يشير الحاكم بقوله:"لست أشكُّ أنَّ الشيخين تركاهذا الحديث لتوقيف بعض أصحاب الزهري إياه، هذا مما لا يُعَلِّل مثل هذا الحديث".

وهذا الحديث مخرَّج في"المية الكبرى" (2/ 337، 338)، انظر للمزيد فيه.




আবু আইয়ুব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "প্রত্যেক মুসলমানের উপর বিতর (নামাজ) আবশ্যক। সুতরাং যে ব্যক্তি পাঁচ রাকাত বিতর পড়তে পছন্দ করে, সে তা করতে পারে; আর যে ব্যক্তি তিন রাকাত বিতর পড়তে পছন্দ করে, সে তা করতে পারে; আর যে ব্যক্তি এক রাকাত বিতর পড়তে পছন্দ করে, সেও তা করতে পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2730)


2730 - عن أبي أيُّوب الأنصاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أوتِر بخمس، فإن لم تستطِع فبثلاث، فإن لم تستطِع فبواحدة، فإن لم تستطِع فأومئ إيماءً".

حسن: رواه الإمام أحمد (23545) عن يزيد، حدثنا سفيان بن حسين عن الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي أيوب الأنصاري، فذكر الحديث.

ومن هذا الطريق رواه أبو داود الطيالسي (594)، والشاشي في مسنده (1111)، والحاكم (1/
303) وعنه البيهقي (3/ 24).

وقد تُكلم في رواية سفيان بن حسين عن الزهري؛ فأكثر الأئمَّة على أنَّه ضعيف فيه، وثقةٌ في غيره؛ لأنَّ صحيفة الزهري اختلطت عليه، ولكن تابعه على هذه الزيادة عبد الله بن بُديل الخُزاعي، عن الزهري به فرواه مثله.

وعبد الله بن بُدَيل فيه كلام يسير غير أنه يُقبلُ إذا توبع.




আবূ আইয়ূব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তুমি পাঁচ রাকাত বিতর সালাত আদায় করো। যদি সক্ষম না হও, তবে তিন রাকাত দ্বারা। আর যদি সক্ষম না হও, তবে এক রাকাত দ্বারা। আর যদি তুমি সক্ষম না হও, তবে ইশারা দ্বারা (সালাতের জন্য) ইঙ্গিত করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (2731)


2731 - عن وعن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تُوتروا بثلاث، أوتروا بخمس أو بسبع، ولا تُشبه بصلاة المغرب".

صحيح: رواه الدارقطني (2/ 24) والحاكم في المستدرك (1/ 304) كلاهما من طريق عبد الله بن سليمان بن الأشعث، ثنا أحمد بن صالح، ثنا عبد الله بن وهب، أخبرنا سليمان بن بلال، عن صالح بن كَيْسان، عن عبد الله بن الفضل، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن وعبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البيهقي (3/ 31) من وجه آخر عن أحمد بن صالح به مثله.

قال الدارقطني:"رواته كلهم ثقات" ورواه ابن حبان في صحيحه (2429) من طريق عبد الله بن وهب به مثله.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

ورواه محمد بن نصر في كتاب الوتر (45)، وعنه الحاكم في المستدرك من وجه آخر عن عِراك بن مالك، عن أبي هريرة ولفظه:"لا توتروا بثلاث تُشبهوا بالمغرب، ولكن أوتروا بخمس، أو بسبع، أو بتسع، أو بإحدى عشرة، أو أكثر من ذلك" وقد روى البعض حديث عِراك بن مالك، عن أبي هريرة موقوفًا. انظر"السنن الكبرى" (3/ 31، 32).

قال الحافظ ابن حجر في التلخيص (2/ 14) بعد أن عزاه إلى الدارقطني وابن حبان والحاكم:"رجاله كلهم ثقات، ولا يضره وقفُ من أَوقفه".

وقد جاء المنع في هذا الحديث بالثلاث خوفًا من التشيه بصلاة المغرب، مع أن الوتر بالثلاثِ جائز بدون خلاف؛ لما ثبت في الأحاديث الصحيحة، فحمل العلماء النهي عن الثلاثِ إذا كان بالجلستين وتسليمٍ، وأما إذا كان الثلاث بجلسة واحدة وتسليم، أو بتسليمين. ينتفي التشبيه بصلاة المغرب. والله أعلم.

وأما ما رُوي عن ابن مسعود مرفوعًا:"وتر الليل ثلاث كوتر النهار صلاة المغرب" ففي إسناده يحيى بن زكريا، يقال له ابن أبي الحواجب ضعيف، ولم يرو عن الأعمش مرفوعًا غيره، هكذا قال
الدارقطني (2/ 28) بعد أن رواه من طريق يحيى بن زكريا الكوفي، ثنا الأعمش، عن مالك بن الحارث، عن عبد الرحمن بن يزيد النخعي، عن عبد الله بن مسعود فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তিন রাকআত দ্বারা বিতর সালাত আদায় করো না, বরং তোমরা পাঁচ অথবা সাত রাকআত দ্বারা বিতর আদায় করো। আর এটাকে মাগরিবের সালাতের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (2732)


2732 - عن أُبَيِّ بن كعب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} و {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}.

صحيح: رواه أبو داود (1423)، وابن ماجه (1171)، وأحمد (21141) كلهم من حديث عثمان بن أبي شيبة، حدثنا أبو حفص الأبَّار، قال: حدَّثنا الأعمش، عن طلحة وزُبيد، عن سعيد بن عبد الرحمن بن أبْزي، عن أبيه، عن أبَيِّ بن كعب فذكره، وزاد ابن ماجه بين طلحة وزبيد"ذر" وهو: ابن عبد الله المرهبي ثقة من رجال الجماعة.

وهذا إسناد صحيح، وقد صحّحه النووي في الخلاصة (1886)، كما صحّحه أيضًا ابن حبَّان (2436)، والحاكم (2/ 257) كلاهما من حديث أبي حفص الأبّار، به، مثله.




উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিতর (সালাত) আদায় করার সময় {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ‘লা} (সূরা আল-আ‘লা), {ক্বুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন} (সূরা আল-কাফিরুন) এবং {ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ} (সূরা আল-ইখলাস) দ্বারা কিরাআত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2733)


2733 - عن ابن عبد الرحمن بن أبْزى، عن أبيه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُوتر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} و {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}. وكان يقول إذا سلَّم: سبحان الملك القدوس ثلاثًا ويرفع صوتَه بالثالثة.

صحيح: رواه النسائي (1732) عن عمرو بن يزيد، قال: حدثنا بهز بن أسد، قال: حدثنا شُعبة، عن سلمة وزُبيد، عن ذر، عن ابن عبد الرحمن بن أبْزى فذكره.

وذر هو: ابن عبد الله المُرهي الهمداني، وابن عبد الرحمن بن أبزى اسمه: سعيد وهو ثقة.

وأخرجه أيضًا النسائي من عِدَّة طرق عن ذَرٍّ، كما رواه أيضًا عبد الرزاق (4697)، والإمام أحمد (15354) كلاهما من طريق ذَرٍّ به مثله.

وإسناده صحيح، ورجاله ثقات، وعبد الرحمن بن أبزى الخزاعي مولاهم له صحبة، وقال أبو حاتم: أدرك النبي صلى الله عليه وسلم وصلى خلفه.

قال البغوي: ابن أبزي هو: سعيد بن عبد الرحمن بن أبزى، يروي عن أبيه عبد الرحمن. ويُروى هذا عن عبد الرحمن بن أبزى، عن أبي بن كعب، عن النبي،"شرح السنة (4/ 98).

قلت: يظهر منه أن عبد الرحمن بن أبزى أوَّلًا كان يروي عن أُبَيِّ بن كعب، ثم تيسر له العلم بالحديث مباشرة من فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم لأنه صحابي كما أكَّد به البخاري والترمذي وأبو حاتم وغيرهم فبدأ يروي بدون ذكر أبي بن كعب، فالحديث من مسنده، ومن مسند أبي بن كعب، ولا حاجة إلى تخطئة أحد الطريقين.




আব্দুর রহমান ইবনে আবযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিতর সালাতে {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ‘লা}, {কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরূন} এবং {কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ} দিয়ে কিরাআত পড়তেন। আর যখন তিনি সালাম ফিরাতেন, তখন তিনবার ‘সুবহানাল মালিকিল কুদ্দুস’ বলতেন এবং তৃতীয়বারে কণ্ঠস্বর উঁচু করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2734)


2734 - عن ابن عباس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر بثلاث، يقرأ في الأولى: بـ {سَبِّحِ اسْمَ
رَبِّكَ الْأَعْلَى} وفي الثانية بـ {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} وفي الثالثة بـ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}.

صحيح: رواه النسائي (1702)، والدارمي (1596) كلاهما من طريق أَبِي أُسَامة، حدَّثنا زكريا بن أبي زائدة، عن أبي إسحاق، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره، هذا إسناد صحيح.

وتابعه يونس عند ابن ماجه (1172) وإسرائيل عند أحمد (2726) والدارمي (1632)، وشريك عند الترمذي (462) كلهم عن أبي إسحاق به مثله. إلا أن بعض هؤلاء تأخر سماعُهم من أبي إسحاق مثل يونس بن أبي إسحاق، فإنه سمع من أبيه بعد ما اختلط.

قال النووي في الخلاصة (1885):"رواه الترمذي والنسائي وابن ماجه بإسناد صحيح".

وأما ما رواه زهير بن معاوية، عن أبي إسحاق موقوفًا على ابن عباس كما رواه النسائي فالحجة لمن وصله.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন রাকআত বিতর পড়তেন। তিনি প্রথমটিতে {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ’লা}, দ্বিতীয়টিতে {কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন} এবং তৃতীয়টিতে {কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ} পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2735)


2735 - عن عمران بن حصين أن النبي صلى الله عليه وسلم أوتر بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى}.

صحيح: رواه النسائي (1743) عن بشر بن خالد، قال حدثنا شَبابهُ، عن شعبة، عن قتادة، عن زُرارة بن أوفى، عن عمران بن حصين فذكره.

قال أبو عبد الرحمن النسائي: لا أعلم أحدًا تابع شَبابة على هذا الحديث، خالفه يحيى بن سعيد. انتهى.

قلت: شَبابَه ثقة حافظ، فلا يضر تفرده، وعدم متابعة له، وأما حديث يحيى بن سعيد فهو حديث آخر مع اتحاد الإسناد فمثل هذه المخالفة لا تضر، وسبق ذكر حديث يحيى بن سعيد عن شعبة، عن قتادة، عن زُرارة، عن عمران بن حصين أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى الظهر، فجاء رجل فقرأ خلفه: بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} فلما فرغ قال:"أيكم قرأ؟" فقال رجل: أنا. قال:"قد عرفتُ أن بعضكم خالجنيها" وهو مخرج في صحيح مسلم (398).




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিতর সালাতে {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ’লা} (সূরা) পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2736)


2736 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في الركعتين التي يُوتر بعدهما: بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} و {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} ويقرأ في الوتر بـ {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} و {قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ} و {قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ}.

حسن: رواه الدارقطني (2/ 34، 35)، والحاكم (1/ 305) وعنه البيهقي (3/ 37) عن الحسين بن إسماعيل، ثنا أبو حاتم الرازي، ثنا سعيد بن عفير، ثنا يحيى بن أيوب، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

وإسناده حسن، لأن يحيى بن أيوب الغافقي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وثقه البخاري وأبو داود وغيرهما، وتكلم فيه النسائي وابن سعد، واستشهد به البخاري، واحتج به مسلم.
وصحّحه ابن حبان (2432) ورواه من وجه آخر عن سعيد بن عفير به مثله.

والظاهر من قولها:"التي يوتر بعدهما" أنه يصلي ركعة منفصلة عن الثنتين. ولكن رواه الدارقطني والحاكم والبيهقي من وجه آخر عن سعيد بن أبي مريم، عن يحيى بن أيوب به وفيه:"وكان يقرأ في الثالثة …" فذكر بقية الحديث.

قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه، وسعيد بن عفير إمام أهل مصر بلا مدافعة، وقد أتى بالحديث مفسرًا مُصَلَّحًا دالًا على أنَّ الركعة التي هي الوتر في الثانية، غير الركعتين اللتين قبلها".

قلت: لا يحتاج إلى تخطئة أحدٍ، فإنه صلى الله عليه وسلم لعله صلَّى مرَّةً منفَصِلًا، وأخرى متَّصِلًا كما ثبت في الأحاديث الصحيحة.

وهذا الإسناد هو أصح ما رُوي به حديث عائشة، وأشار إليه الترمذي بعد ما روي من طريق خُصَيف هو (463)، وأبو داود (1424)، وابن ماجه (1173)، وأحمد (25906)، والحاكم (2/ 520، 521) كلّهم من طريق خُصيف، عن عبد العزيز بن جُريج، قال: سألت عائشة أم المؤمنين بأيِّ شيءٍ كان يوتر رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقالت: فذكر مثل حديث أُبَيِّ بن كعب، وزاد في الثالثة بعد قوله: {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} والمعوذتين.

قال الترمذي:"حسن غريب".

وقال الحاكم: إسناده صحيح.

قلت: بل إسناده ضعيف لضعف عبد العزيز بن جريج المكي والد عبد الملك قال البخاري: لا يتابع في حديثه. وقال العجلي: لم يسمع من عائشة، وأخطأ خُصَيف فصرَّح بسماعه منها. وقال الدارقطني: مجهول.

قال الحافظ في"نتائج الأفكار" (ص 512) لعل تحسينه بالطريق المتقدمة؛ لأن الحافظ حَسَّن طريق يحيى بن أيوب الغافقي. كما أنَّ النووي أقرَّ بتحسين الترمذي في"الخُلاصة" (1883).

والإسنادان يقوي بعضهما بعضًا، فلا نكارة في قراءة المعوذتين في الوتر.

وقد سئل الإمام أحمد عن قراءة المعوذتين في الوتر فقال:"ولم لا يقرأ" ولكن الذي نختار أن يقرأ في الوتر بـ {سَبِّحِ} و {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} و {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}.

وكذلك سئل مالك عن القراءة في الوتر فقال:"ما زال الناس يقرؤون بالمعوذات في الوتر، وأنا أقرأ بها في الوتر".

وفي الباب ما روي عن أبي موسى أنه صلى باصحابه، وهو مرتحل من مكة إلى المدينة، فصلي العشاء ركعتين، وسلم. ثم قام فقرأ مائة آية من سورة النساء في ركعة، فأنكر ذلك عليه، فقال:"ما ألوت أن أضع قدمي حيث وضع رسول الله صلى الله عليه وسلم قدمه، وأن أصنع مثل ما صنع رسول الله صلى الله عليه وسلم.
رواه النسائي (1728)، وأبو داود الطيالسيّ (514)، وأحمد (19760)، والبيهقي (3/ 25) كلّهم من طريق عاصم بن سليمان الأحول، عن أبي مجلز قال: صلى أبو موسى بأصحابه، فذكره. وفيه انقطاع بين أبي مجلز وهو لاحق بن حميد فإنه لم يدرك أبا موسى المتوفي سنة (50 هـ) لأن علي بن المديني قال:"لم يلحق سمرة (المتوفى سنة 58 هـ) ولا عمران (المتوفي سنة 52 هـ") انتهى قوله.

وقال يحيى بن معين:"لم يسمع من حذيفة".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে দুই রাকাতের পরে তিনি বিতর পড়তেন, সেই দুই রাকাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) {সাব্বিহিসমা রব্বিকাল আ'লা} এবং {কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন} পড়তেন। আর বিতর নামাযে তিনি {কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ}, {কুল আ'ঊযু বিরাব্বিল ফালাক} এবং {কুল আ'ঊযু বিরাব্বিন নাস} পড়তেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2737)


2737 - عن علي بن أبي طالب أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول في آخر الوتر:"اللهم إني أعوذ برضاك من سَخَطِك، وأعوذ بمعافاتك من عقوبتك، وأعوذ بك منك، لا أُحصِي ثناءً عليك أنت كما أَثْنَيتَ على نفسك".

صحيح: رواه أبو داود (1427)، والترمذي (3561)، والنسائي (1748)، وابن ماجه (1179) كلهم من طريق حماد بن سلمة، قال: حدثني هشام بن عمرو الفزاري، عن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام المخزومي، عن علي بن أبي طالب فذكره.

وأخرجه أيضًا الحاكم (1/ 306) من هذا الوجه وقال:"صحيح الإسناد".

قلت: وهو كما قال فإسناده صحيح. ورجاله ثقات. هشام بن عمرو الفزازي ثقة، وثَّقه أحمد وابن معين وأبو حاتم وغيرهم، وما قاله الحافظ في التقريب عنه:"مقبول" فيبدو أنه سبق قلم منه.

قال أبو داود: هشام أقدم شيخ لحماد، وبلغني عن يحيى بن معين أنه قال: لم يرو عنه غير حماد بن سلمة.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বিতর সালাতের শেষে বলতেন: "হে আল্লাহ! আমি আপনার সন্তুষ্টির মাধ্যমে আপনার অসন্তুষ্টি থেকে আশ্রয় চাই, আপনার ক্ষমার মাধ্যমে আপনার শাস্তি থেকে আশ্রয় চাই, এবং আপনার নিকট আপনার (গজব) থেকে আশ্রয় চাই। আমি আপনার প্রশংসা গুনে শেষ করতে পারি না; আপনি সেরূপ, যেরূপ আপনি নিজের প্রশংসা করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2738)


2738 - عن الحسن بن علي قال: علَّمني رسول الله صلى الله عليه وسلم كَلِمَاتٍ أقولُهنَّ في الوتر:"اللَّهُمَّ اهدني فيمن هديتَ، وعافِني فيمن عافيتَ، وتولَّني فيمن تولَّيتَ، وبارك لي فيما أعطيتَ، وقِنِي شرَّ ما قضيتَ، إنَّك تقضي ولا يُقضى عليك، وإنَّه لا يَذِلُّ من واليتَ، ولا يَعِزُّ من عاديتَ، تباركتَ ربَّنا وتعاليتَ".

صحيح: رواه أبو داود (1435)، والترمذي (464)، والنسائي (1745)، وابن ماجه (1178) كلهم من طريق أبي إسحاق، عن بُريد بن أبي مريم السلولي، عن أبي الحوراء، عن الحسن بن علي فذكره.

ورواه الإمام أحمد (1718) عن وكيع، عن يونس بن أبي إسحاق عن بُريد بن أبي مريم السلولي به،"علَّمني رسول الله صلى الله عليه وسلم كلمات أقولهن في قنوت الوتر" ثم ذكر الكلمات مثله.

وكذا رواه الطبراني (2712) وابن نصر في كتاب الوتر (62) من طريق وكيع به. وصحّحه ابن خزيمة (1095) ورواه من هذا الطريق.
ولكن رواه شعبة عن بُريد بن أبي مريم به ولم يذكر القنوت ولا الوتر، رواه ابن خزيمة (1096)، وابن حبان (722، 945) كلاهما من طريق شعبة، عن بُريد بن أبي مريم، عن أبي الحوراء قال: سَأَلتُ الحسن بن علي علام تذكر من رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: كان يُعلمنا هذا الدعاء … فذكر مثلَ حديث وكيع.

قال ابن خزيمة:"وشعبة أحفظ من عدد مثل يونس بن أبي إسحاق، وأبو إسحاق لا يُعلَمُ أَسَمِع هذا الخبرَ من بُرَيد، أو دلَّسه عنه. اللَّهمَّ إلَّا أن يكون كما يدَّعِي بعضُ علمائِنا أنَّ كلَّ ما رواه يونس، عمَّن روى عنه أبوه أبو إسحاق هو ما سمعه يونس مع أبيه ممَّن روى عنه. ولو ثبت الخبر عن النَّبي صلى الله عليه وسلم أنَّه أمر بالقنوت في الوتر، أو قنت في الوتر لم يَجُز عندي مخالفة خبر النَّبيِّ صلى الله عليه وسلم.

ولستُ أعلمه ثابتًا. وقد روى الزهري، عن سعيد بن المسيِّب وأبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم لم يكن يقنتُ إلَّا أن يدعو لقوم على قوم.

فإذا أراد أن يدعو على قوم، أو لقوم قنت حين يرفع رأسه من الركعة الثانية من صلاة الفجر" انتهى.

وأيَّد الحافظ في التلخيص (1/ 247) ما قاله ابن خزيمة وابن حبَّان أنَّ قول أبي إسحاق وابنه في ذكر القنوتِ والوتر، تفرُّدٌ بأنَّ الدولابي رواه في"الذرية الطاهرة" له، والطبراني في الكبير من طريق الحسن بن عبيد الله، عن بُريد بن أبي مريم، عن أبي الحوراء به وفيه: وكلمات علمنيهن فذكرهن. قال بُريد: فدخلت على محمد بن علي في الشعب فحدثتُه فقال: صدق أبو الحوراء هنَّ كلمات علَّمناهنَّ، نقولهنَّ في القنوت. وقد رواه البيهقي من طرقٍ قال في بعضها قال بُريد بن أبي مريم: فذكرت ذلك لابن الحنفية فقال: إنَّه للدُّعاء الذي كان أبي يدعو به في صلاة الفجر" انتهى ملخَّصًا.

وقد ثبت عن عدد من الصحابة أنَّهم ما كانوا يقنتون في الوتر إلا في النصف الآخر من رمضان منهم علي وأُبيُّ بنُ كعبٍ وابن عمر وغيرهم، بل روي أبو الشعثاء قال: سألت ابن عمر عن القنوت فقال: ما رأيتُ أحدًا يفعله، وعن أبي المهزم: صحبت أبا هريرة عشر سنين. فما رأيتهُ يقنت في وتره.

قال الزعفراني عن الشافعي: أحبُّ إليَّ أن يقنتوا في الوتر في النصف الآخر، ولا يقنتْ في سائر السنة، ولا في رمضان، إلا في النصف الآخر. وروى غيره عن الشافعي أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقنت به في الصُّبْحِ.

وقال أبو داود: قلت لأحمد: القنوت في الوتر السَّنِة كلِّها؟ قال: إن شاء.

قلت: فما تختار؟ قال: أما أنا فلا أقنت إلَّا في النصف الباقي، إلَّا أن أُصلِّي خلف إمام يقنت فأقنت معه. انظر كتاب الوتر، لمحمد بن نصر (ص 123، 124).

وأما ما رواه النسائي (1746) من زيادة في آخر الدعاء:"وصلَّى الله على النَّبيِّ محمد" مِن طريق ابن وهبٍ، عن يحيى بن عبد الله بن سالم، عن موسى بن عقبة، عن عبد الله بن علي، عن الحسن بن علي قال: علَّمني رسول الله صلى الله عليه وسلم هؤلاء الكلمات … ثم ذكر الدعاء، وزاد في آخره:
الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم ففيه انقطاع، فإنَّ عبد الله بن علي وهو: ابن الحسين بن علي لم يلق الحسن بن علي بن أبي طالب، وأمَّا الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم في آخر أدعية القنوت عامة فقد ثبتت ذلك في إمامة أُبَيٍّ بن كعب الذي كان يصلي بالناس في عهد عمر بن الخطاب فكان بعد أن يدعو على الكفرة ويلعنهم:"ثم يُصلي على النبي صلى الله عليه وسلم ويدعو للمسلمين بما استطاع من خير .. ، رواه ابن خزيمة (1100).




হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে কিছু বাক্য শিখিয়েছেন যা আমি বিতর সালাতে বলি:
"হে আল্লাহ! তুমি যাদেরকে হেদায়েত দিয়েছো, আমাকেও তাদের মাঝে হেদায়েত দাও; আর তুমি যাদেরকে সুস্থতা দিয়েছো, আমাকেও তাদের মাঝে সুস্থতা দাও; আর তুমি যাদের অভিভাবকত্ব গ্রহণ করেছো, আমাকেও তাদের মাঝে তোমার অভিভাবকত্বে রাখো; আর তুমি আমাকে যা কিছু দিয়েছো, তাতে বরকত দাও; আর তুমি যা ফায়সালা করেছো তার মন্দ থেকে আমাকে রক্ষা করো। নিশ্চয় তুমি ফায়সালাকারী, আর তোমার ওপর কেউ ফায়সালাকারী নেই। আর তুমি যার সাথে বন্ধুত্ব রাখো, সে কখনো লাঞ্ছিত হয় না; আর তুমি যার সাথে শত্রুতা রাখো, সে কখনো সম্মানিত হয় না। হে আমাদের প্রতিপালক! তুমি কল্যাণময় এবং তুমি মহান।"









আল-জামি` আল-কামিল (2739)


2739 - عن محمد بن سيرين، قلت لأنس: هل قنت رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصبح؟ قال: نعم، بعد الركوع يسيرًا.

متفق عليه: رواه البخاري في الوتر (1001)، ومسلم في المساجد (677/ 298) كلاهما من حديث أيوب، عن محمد بن سيرين به مثله.

قوله:"يسيرًا" أي أيامًا، كما بين ذلك عاصم في روايته الآتية.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন বলেন,) আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি ফজরের (সুবহ) নামাযে কুনুত পাঠ করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, রুকূ'র পর অল্প সময়ের জন্য।









আল-জামি` আল-কামিল (2740)


2740 - عن عاصم بن سليمان الأحول قال: سألت أنس بن مالك عن القنوت، فقال: قد كان القنوتُ. قلت: قبل الركوع أو بعده، قال: قبله .. قال: فإن فلانًا أخبرني عنك قلت: بعد الركوع، فقال: كذَب، إنما قنت رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد الركوع شهرًا، أراه بعث قومًا يقال لهم: القُرَّاء زُهاء سبعين رجلًا إلى قوم من المشركين دون أولئك. وكان بينهم وبين رسول الله صلى الله عليه وسلم عهد:"فقنت رسول الله صلى الله عليه وسلم شهرًا يدعو عليهم".

متفق عليه: رواه البخاري في الوتر (1002)، ومسلم في المساجد (677/ 301) كلاهما من طريق عاصم به واللفظ للبخاري.

وقوله: كذب بمعنى أخطأ




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসিম ইবনু সুলাইমান আল-আহওয়াল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কুনূত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন, কুনূত ছিল (অর্থাৎ কুনূত পাঠ করা হতো)। আমি বললাম, রুকূ'র আগে না পরে? তিনি বললেন, রুকূ'র আগে। (আসিম বলেন) আমি বললাম, অমুক ব্যক্তি তো আপনার বরাতে আমাকে বলেছিলেন যে, আপনি বলেছেন রুকূ'র পরে। তিনি বললেন, সে ভুল করেছে (অথবা সে মিথ্যা বলেনি, বরং ভুল করেছে)। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মাত্র এক মাস রুকূ'র পরে কুনূত পাঠ করেছিলেন। আমার ধারণা, তিনি সত্তর জনের মতো লোক পাঠিয়েছিলেন, যাদেরকে 'কুররা' (কুরআন পাঠকগণ) বলা হতো, যারা একদল মুশরিকদের কাছে গিয়েছিল—যারা অপেক্ষাকৃত নিচে ছিল। তাদের এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর মাঝে চুক্তি বিদ্যমান ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই এক মাস তাদের (যারা চুক্তি ভঙ্গ করেছিল) বিরুদ্ধে দু'আ করে কুনূত পাঠ করেছিলেন।