হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2741)


2741 - عن محمد بن سيرين قال: حدَّثني من صلَّى مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم صلاة الغداة. فلمَّا رفع رأسه من الركعة الثانية قام هُنَيَّةً.

صحيح: رواه أبو داود (1446)، والنسائي (1073) كلاهما من طريق بشر بن مفضَّل، حدثنا يونس بن عبيد، عن محمد بن سيرين فذكره.

وإسناده صحيح، وجهالة الصحابي الذي صلَّى مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم لا تضرُّ.

وقوله: هُنيَّة - أي القدر اليسير من الوقت.

فقه البابِ:

وقد ثبت أن القنوت كان بعد الرفع من الركوع في حديث أبي هريرة كما مضى وكما سيأتي.

وعن العوام بن حمزة قال: سألت أبا عثمان النهدي عن القنوت في الصبح فقال: بعد الركوع.
قلت: عمَّن؟ قال: عن أبي بكر وعمر وعثمان وعن الحسن، وأنَّ أُبَيَّ بن كعب أمَّ الناسَ في خلافة عمر في رمضان فقنت بعد النصف بعد الركوع، انظر"كتاب الوتر" لمحمد بن نصر (ص 132).

وبه قال مالك والشافعي وأحمد وغيرهم كما ثبت ذلك في الأخبار الصحيحة.

وفي رواية عند الإمام أحمد: القنوت قبل الركوع وبعده جائز والمختار بعده.



القنوت قبل الركوع إلا أن النسائي أعلّه بالتفرّد، فلعلّ الخطأ من دون سفيان.

ثم روى البيهقي (3/ 41) من حديث ابن مسعود وابن عباس وضعّفهما.

ثم الصّحيح الثابت من حديث أنس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قنت بعد الركوع شهرًا يدعو على حي من أحياء العرب، ثم تركهـ. رواه البخاري (4089)، ومسلم (677).

ولكن روى عبد العزيز بن صهيب، عن أنس، أنه سئل عن القنوت بعد الركوع أو عند فراغٍ من القراءة؟ فقال:"لا، بل عند فراغٍ من القراءة". رواه البخاريّ (4088).

قال الأثرم: قلت لأحمد: يقول أحدٌ في حديث أنس:"أنّ النبي صلى الله عليه وسلم قنت قبل الركوع" غير عاصم الأحول؟ فقال: ما علمتُ أحدًا يقوله غيره. خالفهم كلّهم: هشام عن قتادة، والتيمي عن أبي مجلز، وأيوب عن ابن سيرين، وغير واحد عن حنظلة السدوسي كلهم عن أنس:"أن النبيّ صلى الله عليه وسلم قنت بعد الركوع".

قيل لأحمد بن حنبل: سائر الأحاديث أليس إنما هي بعد الركوع؟ قال: بلى؛ خفاف بن إيماء، وأبو هريرة. قلت: لأبي عبد الله: فلم ترخِّص إذًا في القنوت قبل الركوع، وإنما صحَّ بعده؟ فقال: القنوت في الفجر بعد الركوع، وفي الوتر يختار بعد الركوع، ومن قنت قبل الرّكوع فلا بأس لفعل الصحابة واختلافهم، فأمّا في الفجر فبعد الركوع" ذكره ابن الجوزي في"التحقيق" (2/ 451، 452).

وقال الحافظ ابن القيم في"زاد المعاد" (1/ 282):"أحاديث أنس كلّها صحاح يصدّق بعضها بعضًا، ولا تتناقض. والقنوت الذي ذكره قبل الركوع غير القنوت الذي ذكره بعده، والذي وقّته غير الذي أطلقه. فالذي ذكره قبل الركوع هو إطالة القيام للقراءة، وهو الذي قال فيه النبي صلى الله عليه وسلم:"أفضل الصلاة طول القنوت" [رواه مسلم (756)]، والذي ذكره بعده: هو إطالة القيام للدعاء، فعله شهرًا يدعو على قوم ويدعو لقوم".

فجعل القنوت قبل الركوع بمعنى إطالة القيام بالقراءة، وجعل القنوت بعد الركوع إطالة القيام بالدعاء، ثم استمر يطيل هذا الركن الدعاء والثناء إلى أن فارق الدنيا، وإليه أشار ثابت في قوله:"كان أنس يصنع شيئًا لم أركم تصنعونه، كان إذا رفع رأسه من الركوع قام حتى يقول القائل: قد نسي، وبين السجدتين حتى يقول القائل: قد نسي". رواه الشيخان: البخاري (821)، ومسلم (472).

ثم قال ابن القيم رحمه الله:"ولما صار القنوت في لسان الفقهاء وأكثر الناس هو هذا الدعاء المعروف"اللهم اهدني فمين هديت … إلى آخره" وسمعوا أنه لم يزل يقنت في الفجر حتى فارق الدنيا، وكذلك الخلفاء الراشدون وغيرهم من الصحابة، حملوا القنوت في لفظ الصحابة على القنوت في اصطلاحهم. ونشأ من لا يعرف غير ذلك، فلم يشك أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه كانوا مداومين عليه كلّ غداة. وهذا هو الذي نازعهم فيه جمهور العلماء وقالوا: لم يكن هذا من فعله الراتب، بل لا يثبت عنه أنه فعله" انتهى.




মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সঙ্গে ফজরের সালাত আদায় করেছিলেন, তিনি আমাকে বর্ণনা করেছেন যে, যখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দ্বিতীয় রাকাআত থেকে মাথা তুললেন, তখন তিনি সামান্য সময়ের জন্য দাঁড়িয়ে থাকলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2742)


2742 - عن سئل أنس بن مالك عن القنوت في صلاة الصبح فقال: كنا نقنتُ قبل الركوع وبعده.

صحيح: رواه ابن ماجه (1183) عن نصر بن علي الجهضميِّ قال: حدثنا سهل بن يوسف، قال: حدثنا حُميد، عن أنس بن مالك فذكره.

قال البوصيري:"إسناده صحيح ورجاله ثقات".

قلت: وهو كما قال: ورواه أيضًا عبد الرزاق (4966) عن أبي جعفر، حُميد به قال: قلت له: كيف كنتُم تقنتون؟ قال: كل ذلك، قبل الركوع وبعده.

وبه قال الإمام أحمد والمختار عنده بعد الركوع كما سبق.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে ফজরের সালাতে কুনুত পড়া সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: আমরা রুকুর পূর্বে ও পরে কুনুত পড়তাম।









আল-জামি` আল-কামিল (2743)


2743 - عن أُبّي بن كعب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا جلس في آخر صلاته في الوتر يقول: يعني بعد التسليم:"سبحان الملك القدُّوس" ثلاثًا.

صحيح: رواه النسائي (1699) من طريق سفيان، عن زُبيد، عن سعيد بن عبد الرحمن بن أَبزى، عن أبيه، عن أبي بن كعب فذكره في حديث سبق تخريجه في باب ما يقرأ به في الوتر.




উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর বিতর সালাতের শেষে বসতেন—অর্থাৎ সালাম ফিরানোর পর—তখন তিনি তিনবার 'সুবহানাল মালিকিল কুদ্দুস' বলতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2744)


2744 - عن أنس قال: بعث النبي صلى الله عليه وسلم سبعين رجلًا لحاجةٍ، يقال لهم القُرَّاء، فعرض لهم حيَّان من بني سُليم: رِعْلٌ وذَكْوان عند بئرٍ يُقال لها بئرُ مَعونة، فقال القومُ: والله! ما إيَّاكُم أردنا، إنَّما نحن مجتازون في حاجة للنبي صلى الله عليه وسلم فقتلوهم، فدعا النبي صلى الله عليه وسلم عليهم شهرًا في صلاة الغَداة، وذلك بَدْؤُ القُنوتِ وما كنا نَقنُتُ.

قال عبد العزيز: وسأل رجل أنسًا عن القنوت: أبعد الركوع، أو عند فَراغٍ من القراءة؟ قال: لا بل عند فَراغٍ من القراءةِ.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4088) عن أبي معمر، حدثنا عبد الوارث، حدثنا عبد العزيز، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি প্রয়োজনে সত্তর জন লোক পাঠালেন, যাদেরকে ক্বারী (কুররা) বলা হত। বনী সুলাইমের রিল ও যাকওয়ান নামক দুটি গোত্র মাঊনাহ কূপের কাছে তাদের সামনে এলো। ক্বারীগণ বলল: আল্লাহর কসম! আমরা তোমাদের উদ্দেশ্য করিনি, আমরা তো কেবল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি প্রয়োজনে এ পথ অতিক্রম করছি। কিন্তু তারা (গোত্রদ্বয়) তাদেরকে হত্যা করল। ফলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক মাস ধরে ফজর সালাতে তাদের (হত্যাকারীদের) বিরুদ্ধে বদদু'আ করলেন। আর এটাই ছিল কুনুতের শুরু, এর আগে আমরা কুনুত পড়তাম না। আবদুল আযীয বলেন, এক ব্যক্তি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কুনূত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল: তা কি রুকূর পরে, নাকি কিরাআত শেষ করার পর? তিনি বললেন: না, বরং কিরাআত শেষ করার পর।









আল-জামি` আল-কামিল (2745)


2745 - عن أنس بن مالك قال: دعا النبيُّ صلى الله عليه وسلم على الذين قَتَلوا - يعني - أصحابه ببئر مَعونة ثلاثين صباحًا، حين يدعو على رِعْلٍ ولَحيانَ وعُصيَّةَ عَصَتِ الله ورسولَه.
قال أنس: فأنزل الله تعالى لنبيِّه صلى الله عليه وسلم في الذين قُتِلوا أصحابِ ببئرِ مَعونة قرآنًا قرأناه حتَّى نُسخ بعدُ:"بَلِّغُوا قومَنا فقد لَقِينا ربَّنا، فرضي عنَّا، ورضينا عنه".

متفق عليه: رواه مالك عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك فذكره.

ورواه البخاري في المغازي (4095) عن يحيى بن بكير، ومسلم في المساجد (677) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك واللفظ للبخاري، وزاد مسلم"وذكوان" بعد"رِعْلٍ".

وفي رواية عند البخاريّ (4091) عن موسى بن إسماعيل، ثنا همَّام، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة عن أنس أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم بعث خالَهُ - أخٌ لأمِّ سُلَيم - في سبعينَ راكبًا، وكان رئيسَ المشركينَ عامرُ بن الطُّفَيل خَيَّرَ بينَ ثلاثِ خِصالٍ فقال: يكون لكَ أهلُ السهلِ ولي أهل المَدَر، أو أكونَ خَليفتَكَ، أو أغزوكَ بأهل غَطَفان بألفٍ وألف. فطُعِنَ عامرٌ في بيتِ أمِّ فلانٍ فقال: غُدَّةٌ كغدَّةِ البَكر، في بيتِ امرأةٍ من آلِ بني فلان. ائتوني بِفَرَسي، فمات على ظَهرِ فرَسِه، فانطلق حرامٌ أخو أمِّ سلَيم، وهو رجلٌ أعرج ورجل من بني فلان قال: كونا قريبًا حتى آتِيَهم، فإن آمَنوني كنتم، وإن قتلوني أتيتم أصحابَكم، فقال: أتُؤَمِّنوني أُبلِّغْ رسالةَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم؟ فجعل يُحدِّثُهم، وأومَئوا إلى رجل فأتاهُ من خلفهِ فطعَنَه، قال همَّامٌ أحسبُه حتى أنفَذَهُ بالرُّمح، قال: الله أكبرُ، فزتُ وربِّ الكعبة، فلُحِق الرجل فقُتلوا كلُّهم غير الأعرج كان في رأسِ جبل، فأنزَل الله علينا ثمَّ كان من المنسوخ"إنا قد لَقينا ربَّنا، فرضي عنّا وأرضانا" فدعا النبي صلى الله عليه وسلم عليهم ثلاثينَ صباحًا، على رِعل وذكوان وبني لَحيانَ وعُصيَّة الذين عَصَوا الله ورسوله صلى الله عليه وسلم".

فجمع النبيُّ صلى الله عليه وسلم في الدعاء على بني لَحيان وبني عُصَيَّة الذين غادروا بأصحاب عاصم بن ثَابت أمير سرية غزوة الرجيع، وعلى رِعْل وذكوان الذين غادروا بالقراء السبعين وقتلوهم عند بئر مَعونة، وذلك لقربهما في الوقوع، بل زعم الواقدي أن خبر بئر مَعونة وخبر أصحاب الرجيع جاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم في ليلة واحدة، ولذا جمع أنس بن مالك في الدعاء بين رِعْل وذكوان، وعُصَيَّة وبني لَحيان.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যারা তাঁর সাহাবীগণকে— অর্থাৎ বির মাঊনায় হত্যা করেছিল, তাদের বিরুদ্ধে ত্রিশ সকাল ধরে দু'আ (কুনুত) করেছিলেন, যখন তিনি রি'ল, লাহ্ইয়ান ও উসাইয়্যার বিরুদ্ধে দু'আ করেন, যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্যতা করেছিল।

আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর আল্লাহ তাআলা তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য বির মাঊনায় নিহত সাহাবীগণের সম্পর্কে একটি কুরআন নাযিল করেছিলেন, যা আমরা পাঠ করতাম, পরে তা মানসূখ (রহিত) হয়ে যায়। (তা হলো:) "আমাদের কওমের কাছে এই বার্তা পৌঁছাও যে, আমরা আমাদের রবের সাথে মিলিত হয়েছি। তিনি আমাদের প্রতি সন্তুষ্ট হয়েছেন এবং আমরাও তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট হয়েছি।"

(মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মালেক এটি ইসহাক ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আবি তালহার সূত্রে আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারী এটি মাগাযী অধ্যায়ে (৪০৯৫) ইয়াহইয়া ইবনে বুকাইর থেকে এবং ইমাম মুসলিম মাসাজিদ অধ্যায়ে (৬৭৭) ইয়াহইয়া ইবনে ইয়াহইয়া থেকে, তারা উভয়েই মালেকের সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। এটি বুখারীর শব্দাবলী, আর মুসলিম ‘রি'ল’ এর পর 'যাকওয়ান' শব্দটি বৃদ্ধি করেছেন।)

(বুখারীর অন্য এক বর্ণনায় (৪০৯১) মুসা ইবনে ইসমাঈল, তিনি হাম্মাম, তিনি ইসহাক ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে আবি তালহা, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মামাকে— যিনি উম্মে সুলাইমের ভাই ছিলেন— সত্তর জন আরোহীর সাথে প্রেরণ করেন। মুশরিকদের নেতা ছিল আমের ইবনুত তুফাইল। সে তিনটি প্রস্তাবের মধ্যে একটি বেছে নেওয়ার সুযোগ দিয়েছিল এবং বলেছিল: "সমতল ভূমির অধিবাসী তোমার হোক আর কঠিন মাটির অধিবাসী আমার হোক, অথবা আমি তোমার খলীফা হব, নতুবা আমি গাতফান গোত্রের লোকদের নিয়ে হাজার হাজার সৈন্য দিয়ে তোমাকে আক্রমণ করব।" তখন আমেরকে উম্মে ফুলানের ঘরে বর্শা দিয়ে আঘাত করা হয়। সে বলল: "অমুক গোত্রের এক মহিলার ঘরে উটের গুটিকার মতো গুটিকা (ফোড়া)। আমার ঘোড়া আমার কাছে আনো।" অতঃপর সে ঘোড়ার পিঠেই মারা যায়। এরপর উম্মে সুলাইমের ভাই হারাম, যিনি ছিলেন একজন খোঁড়া ব্যক্তি, এবং বনী ফুলান গোত্রের একজন লোক রওনা হলেন। হারাম বললেন: "তোমরা কাছাকাছি থেকো, যতক্ষণ না আমি তাদের কাছে পৌঁছাই। যদি তারা আমাকে নিরাপত্তা দেয়, তবে তোমরা আসবে। আর যদি আমাকে হত্যা করে, তবে তোমরা তোমাদের সাথীদের কাছে ফিরে যাবে।" হারাম গিয়ে বললেন: "তোমরা কি আমাকে নিরাপত্তা দেবে? আমি তোমাদের কাছে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বার্তা পৌঁছাতে চাই।" অতঃপর তিনি তাদের সাথে কথা বলতে শুরু করলেন। তারা একজন লোকের দিকে ইশারা করল। সে পিছন দিক থেকে এসে তাঁকে বর্শা দিয়ে আঘাত করল। হাম্মাম বলেন— আমার ধারণা, সে বর্শা তাঁর দেহ ভেদ করে দিল। হারাম বললেন: "আল্লাহু আকবার! কাবার রবের কসম, আমি সফলকাম হয়েছি।" এরপর তারা ওই লোকটির (খোঁড়া ব্যক্তিটি) পিছনে ধাওয়া করল এবং তাদের সকলকে হত্যা করল— কেবল সেই খোঁড়া লোকটি ছাড়া, যে একটি পাহাড়ের চূড়ায় ছিল। তখন আল্লাহ তাআলা আমাদের উপর নাযিল করেছিলেন, যা পরে মানসূখের অন্তর্ভুক্ত হয়: "আমরা আমাদের রবের সাথে মিলিত হয়েছি। তিনি আমাদের প্রতি সন্তুষ্ট হয়েছেন এবং আমাদেরকেও সন্তুষ্ট করেছেন।" অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ত্রিশ সকাল ধরে তাদের বিরুদ্ধে বদ-দু'আ করেছিলেন— রি'ল, যাকওয়ান, বনী লাহ্ইয়ান ও উসাইয়্যার বিরুদ্ধে, যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্যতা করেছিল।

(নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'আর মধ্যে বনী লাহ্ইয়ান ও বনী উসাইয়্যাকে একত্রিত করেছেন, যারা রজী’ অভিযানে আসিম ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দলনেতৃত্বাধীন সাথীদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করেছিল এবং রি'ল ও যাকওয়ানকে একত্রিত করেছেন, যারা বির মাঊনায় সত্তরজন কারীকে ধোঁকা দিয়ে হত্যা করেছিল। এটি এই কারণে যে ঘটনাগুলো ঘটার সময় কাছাকাছি ছিল। বরং ওয়াকিদী ধারণা করেন যে, বির মাঊনাহ ও রজী’র সাথীদের খবর একই রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসেছিল। একারণেই আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর দু'আয় রি'ল, যাকওয়ান, উসাইয়্যা এবং বনী লাহ্ইয়ানকে একত্রিত করেছেন।)









আল-জামি` আল-কামিল (2746)


2746 - عن أنس بن مالك أنَّ رِعْلًا وذكوانَ وعُصَيَّةَ وبني لَحيانَ استمدوا رسول الله صلى الله عليه وسلم على عدوٍّ فأمدَّهم بسبعين من الأنصار، كنَّا نُسمِّيهم القُراءَ في زمانهم كانوا يحتطبون بالنهار، ويُصلُّون بالليل، حتَّى كانوا ببئر مَعونة، قتلوهم وغدروا بهم، فبلغ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقنت شهرًا يدعو في الصبح على أحياء من أحياءِ العرب: على رِعْلٍ وذكوان وعُصَيَّةَ وبني لَحْيانَ.

قال أنس: فقرأنا فيهم قرآنًا، ثم إنَّ ذلك رُفِع:"بَلِّغوا عَنَّا قومنا أنَّا لقينا ربَّنا فرضي عنا وأرضانا".

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4090) عن عبد الأعلى بن حماد، حدثنا يزيد بن
زُريع، حدثنا سعيد، عن قتادة، عن أنس فذكره واللفظ له.

ورواه مسلم في المساجد (677/ 303، 304) من وجه آخر عن قتادة، عن أنس مختصرًا.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রি‘ল, যাকওয়ান, উসাইয়াহ ও বনু লাহয়ানের লোকেরা তাদের শত্রুর বিরুদ্ধে সাহায্য চেয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে আবেদন করল। তখন তিনি তাদের সত্তরজন আনসার সাহাবী দ্বারা সাহায্য করলেন। আমরা তাদেরকে আমাদের সময়ে ‘কুররা’ (কুরআন পাঠক) নামে অভিহিত করতাম। তারা দিনে লাকড়ি সংগ্রহ করত এবং রাতে সালাত আদায় করত। যখন তারা বি’র মা‘ঊনা নামক স্থানে পৌঁছল, তখন ওই লোকেরা তাদেরকে হত্যা করল এবং তাদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করল। এ খবর যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে পৌঁছল, তখন তিনি এক মাস ধরে ফজরের সালাতে আরবের কিছু গোত্রের বিরুদ্ধে কুনূত পাঠ করলেন—যারা হলো রি‘ল, যাকওয়ান, উসাইয়াহ ও বনু লাহয়ানের গোত্র।

আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা তাদের সম্পর্কে কুরআনের কিছু আয়াত পাঠ করতাম, পরে তা তুলে নেওয়া হয়: "আমাদের পক্ষ থেকে আমাদের কওমকে জানিয়ে দাও যে, আমরা আমাদের রবের সাথে মিলিত হয়েছি। তিনি আমাদের প্রতি সন্তুষ্ট হয়েছেন এবং আমাদেরকেও সন্তুষ্ট করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2747)


2747 - عن أَبِي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول حين يَفْرُغُ مِن صلاة الفجر من القراءة، ويكبِّر، ويرفع رأسه"سمع الله لمن حمده، ربنا ولك الحمد" ثم يقول وهو قائم:"اللهم أنْجِ الوليد بن الوليد، وسلمة بن هشام، وعياش بن أبي ربيعة، والمستضعفين من المؤمنين، اللهم اشدُدْ وَطْأتك على مُضَرَ، واجعلها عليهم كَسِنِيِّ يوسفَ. اللهم العَنْ لَحْيانَ ورِعْلًا وذَكوانَ وعُصَيَّة عصتِ الله ورسولَه" ثم بلغنا أنه ترك ذلك لما أُنزل: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ} [سورة آل عمران: 128].

وفي رواية: قنت بعد الركعة في صلاةٍ شهرًا.

وفي رواية قال أبو هريرة: والله! لأُقَرِّبَنَّ بكم صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكان أبو هريرة يقنت في الظهر، والعِشاء الآخرة، وصلاة الصبح، ويدعو للمؤمنين، ويلعَنُ الكفار.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4560)، ومسلم في المساجد (675) كلاهما من طريق ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر الحديث واللفظ لمسلم، وأمَّا البخاري فاختصره ولم يُسمِّ في رواياته"لَحْيان ورِعل وذكوان وعُصَيَّة" وإنَّما قال:"اللهم الْعَنْ فلانًا وفلانًا" لأحياء من العرب حتَّى أنزل الله فذكر الآية. إلَّا أنَّ مُسلمًا جعل نزول الآية منقطعًا فإنه رواه من طريق يونس بن يزيد عن الزهري به مثله، ثم قال:"ثم بلغنا أنه ترك لما أنْزِل فذكر الآية" فلم يبين الزهري عمَّن بلغه ولكن رواه البخاري من طريق إبراهيم بن سعد، عن الزهري موصولًا، ولم يقل فيه: بلغنا. فلا يُعَلُّ رواية الزهري برواية مسلم عن يونس بن يزيد.

وزاد أحمد في روايته عن يزيد بن هارون، عن محمد، عن أبي سلمة ثم قال:"الله أكبر وخرَّ ساجدًا".

وفي رواية عند مسلم قال أبو هريرة: ثم رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ترك الدعاء بعد. فقلت: أُرى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قد ترك الدعاء لهم، قال: فقيل: وما تراهم قد قدِموا؟

والآية نزلت في غزوة أحد كما ثبت في صحيح مسلم (1791) عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم كسِرتْ رُباعيتُه يومَ أحد، وشُجَّ في رأسه فجعل يَسْلُتُ الدمَ عنه ويقول:"كيف يُفْلح قوم شجوا نبيَّهم، وكسروا رُباعيتَه، وهو يدعوهم إلى الله" فأنزل الله عز وجل: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ} [سورة آل عمران: 128].

وهو قول ابن عباس والحسن وقتادة والربيع.

ولكن قصة رِعْل وذكوان كانت بعد أحد في غزوة بئر مَعونة قال الحافظ في"الفتح" (7/ 366):
"وهذا إن كان محفوظًا احتمل أن يكون نزول الآية تراخَى عن قِصَّة أحد، لأنَّ قِصَّة رِعْلٍ وذكوان كانت بعدها. ثمَّ قال: وفيه بُعْدٌ. والصواب أنَّها نزلت في شأن الذين دعا عليهم بسبب قِصَّة أُحُد. ويُؤيِّد ذلك ظاهر قوله في صدر الآية: {لِيَقْطَعَ طَرَفًا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا} أي يقتلهم {أَوْ يَكْبِتَهُمْ} أي يخزيهم، ثم قال: {أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ} أي: فَيُسلِموا {أَوْ يُعَذِّبَهُمْ} أي: إن ماتوا كُفَّارًا". انتهى.

قلت: لنا أن نفرق بين الدُّعاء على الكُفَّار، وبين القنوت. فلعل النبيَّ صلى الله عليه وسلم دعا على الكفار يوم أحد بالهلاك في غير القنوت.

وأما القنوت فكان بدؤه كما قال أنس بعد بئر مَعونة فإنه قال:"وذلك بدؤ القنوت، وما كُنَّا نقنتُ" ولعل الآية نزلت مرتين.

وقوله:"كَسِنِي يوسف" أي اجعلها سِنين شِدادًا ذوات قَحط وغلاء. والسَّنَة - كما ذكره أصحاب اللغة: الجدب يقال: أخذتهم السَّنة، إذا أجدبوا وأقحطوا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন ফজর সালাতে কিরাআত শেষ করে তাকবীর দিয়ে মাথা তুলতেন এবং বলতেন: “সামি’আল্ল-হু লিমান হামিদা, রব্বানা ওয়া লাকাল হামদ” (আল্লাহ তার প্রশংসা শ্রবণ করেন, যিনি তার প্রশংসা করেছেন। হে আমাদের প্রতিপালক, আপনার জন্যই সকল প্রশংসা)। এরপর তিনি দাঁড়ানো অবস্থায় বলতেন: “হে আল্লাহ! ওয়ালীদ ইবনুল ওয়ালীদ, সালামা ইবনু হিশাম, আইয়াশ ইবনু আবী রাবী’আহ এবং দুর্বল মুমিনদেরকে (শত্রুদের হাত থেকে) মুক্তি দাও। হে আল্লাহ! তুমি মুদার গোত্রের উপর তোমার শাস্তি কঠোর করো এবং ইউসুফ (আঃ)-এর বছরের মতো তাদের উপর দুর্ভিক্ষ দাও। হে আল্লাহ! লিহয়ান, রি’ল, যাকওয়ান এবং উসাইয়াহ গোত্রের উপর অভিশাপ বর্ষণ করো, যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্যতা করেছে।”

অতঃপর আমাদের কাছে খবর পৌঁছল যে, যখন এই আয়াত নাযিল হলো: “আপনার করার কিছুই নেই, তিনি তাদের ক্ষমা করবেন অথবা তাদের শাস্তি দেবেন, কারণ তারা জালিম।” [সূরা আলে ইমরান: ১২৮] তখন তিনি তা (সেই দু'আ/কুনুত) ছেড়ে দেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি এক মাস ধরে সালাতে রুকূ’র পরে কুনূত পাঠ করেছিলেন।

আরেক বর্ণনায় আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের জন্য রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সালাতের নিকটতম সালাত আদায় করব। (বর্ণনাকারী বলেন) আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যুহর, এশার শেষ এবং ফজরের সালাতে কুনূত পড়তেন এবং মুমিনদের জন্য দু’আ করতেন ও কাফিরদেরকে অভিশাপ দিতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2748)


2748 - عن خُفَاف بنِ إيماء الغِفاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة:"اللهم العَنْ بني لَحيان ورِعْلًا وذكوانَ، وعُصَيَّةَ عَصَوا الله ورسوله. غِفار غَفَر الله لها، وأسلم سالمها الله".

صحيح: رواه مسلم في المساجد (679) من حديث ابن وهب، عن الليث، عن عِمران بن أبي أَنَس، عن حنظلة بن علي، عن خُفاف بن إيماء فذكره.

وفي رواية: ركع رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم رفع رأسه فقال:"غِفار غفر الله لها، وأسلم سالمها الله، وعُصَيَّة عصى الله ورسولَه. اللهم العَنْ بني لَحيان. والعَنْ رِعْلًا وذكوان" ثم وقع ساجدًا، قال خُفاف: فَجُعِلتْ لعنةُ الكفرة من أجل ذلك.




খুফাফ ইবনে ঈমা আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতে (দাঁড়িয়ে) বললেন: "হে আল্লাহ! বনী লাহ্‌ইয়ান, রি'ল এবং যাকওয়ান গোত্রকে লানত (অভিসম্পাত) করুন। আর উসাইয়্যা গোত্র আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্য হয়েছে। গিফার গোত্রকে আল্লাহ ক্ষমা করুন। আর আসলাম গোত্রকে আল্লাহ নিরাপদে রাখুন।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রুকু করলেন, অতঃপর মাথা তুলে বললেন: "গিফার গোত্রকে আল্লাহ ক্ষমা করুন, আর আসলাম গোত্রকে আল্লাহ নিরাপদে রাখুন, আর উসাইয়্যা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের অবাধ্য হয়েছে। হে আল্লাহ! বনী লাহ্‌ইয়ানকে লানত করুন, আর রি'ল ও যাকওয়ানকে লানত করুন।" এরপর তিনি সিজদায় গেলেন। খুফাফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এ কারণেই কাফিরদের প্রতি অভিশাপ (কুনুতে নাযিলায়) চালু হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (2749)


2749 - عن ابن عمر أنه سمع رسولَ الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع رأسه من الركوع من الركعة الآخرة من الفجر يقول:"اللهم العَن فلانًا وفلانًا وفلانًا" بعد ما يقول:"سمع الله لمن حمِده، ربنا ولك الحمد" فأنزل الله: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ} [سورة آل عمران: 128].

صحيح: رواه البخاري في المغازي (4069) عن يحيى بن عبد الله السلمي، أخبرنا عبد الله (وهو ابن المبارك) أخبرنا معمر، عن الزهري، حدثني سالم، عن أبيه فذكره.

ثم قال: وعن حنظلة بن أبي سفيان، سمعتُ سالم بن عبد الله يقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعو على صفوان بن أمية، وسُهيل بن عمرو، والحارث بن هشام. فنزلت: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ}.

قوله: وعن حنظلة - هو عطف على معمر، والراوي عنه هو عبد الله بن المبارك، إلا أنه مرسل،
فإن سالم بن عبد الله بن عمر لم يدرك النبي صلى الله عليه وسلم، والثلاثة الذين سماهم قد أسلموا يوم الفتح، ولعل هذا هو السر في نزول قوله تعالى: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ} انظر: الفتح.

ووصله الترمذي (3004) بذكر"عن أبيه" وذكر فيه"أبا سفيان" بدلًا من"سهيل بن عمرو" ولكن في إسناده عمر بن حمزة الراوي عن سالم، وهو: عمر بن حمزة بن عبد الله بن عمر بن الخطاب ضعَّفه النسائي وقال: أحمد: أحاديثه مناكير، والخُلاصة كما في التقريب:"ضعيف".

قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب يُستغرب من حديث عمر بن حمزة، عن سالم، عن أبيه.

وقد رواه الزهري عن سالم، عن أبيه، لم يعرفه محمد بن إسماعيل من حديث عمر بن حمزة، وعرفه من حديث الزهري". انتهى.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফজরের শেষ রাকাআতে রুকু থেকে মাথা তোলার সময় ‘সামি‘আল্লাহু লিমান হামিদাহ, রাব্বানা ওয়া লাকাল হামদ’ বলার পর বলতে শুনেছেন: "হে আল্লাহ! অমুককে, অমুককে এবং অমুককে অভিশাপ দিন।" তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {এ বিষয়ে তোমার করণীয় কিছুই নেই— তিনি চাইলে তাদের ক্ষমা করতে পারেন অথবা তাদের শাস্তি দিতে পারেন, কারণ তারা জালিম (সূরা আল ইমরান: ১২৮)}।

আর হানযালা ইবনু আবী সুফিয়ান থেকে বর্ণিত, তিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহকে বলতে শুনেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফওয়ান ইবনু উমাইয়া, সুহাইল ইবনু আমর এবং হারিস ইবনু হিশামের বিরুদ্ধে দু‘আ করতেন। তখন নাযিল হলো: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ}।









আল-জামি` আল-কামিল (2750)


2750 - عن ابن عمر أنه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم حين رفع رأسه من صلاة الصبح من الركعة الأخيرة قال:"اللهمَّ العَنْ فُلانًا وفُلانًا" يدعو على أُناس من المنافقين. فأنزل الله عز وجل: {لَيْسَ لَكَ مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَالِمُونَ} [سورة آل عمران: 128].

صحيح: رواه النسائي (1078) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: أنبأنا عبد الرزاق، قال: حدثنا معمر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه فذكره.

وإسناده صحيح، والحديث في مصنف عبد الرزاق (4027) وعنه رواه الإمام أحمد (6349)، وابن خزيمة (622)، وابن حبان (1987).

فقه الباب:

لا خلاف بين أهل العلم بأنَّه إذا نزلت بالمسلمين نازلةٌ يستحب لها القنوت في جميع الصلوات. ويُترك عند عدمها إلَّا الشافعي فإنَّه يرى استمرار القنوت في صلاة الصبح دائمًا، وتأوَّل الجمهور قوله:"ثمَّ تركه، أي: ترك اللَّعن والدعاء على أولئك القبائل المذكورة في الحديث. وتأوَّل الشافعيُّ ومن وافقه بأنَّه تركه في الصلوات الأربع، ولم يتركه في صلاة الصبح لما رُويَ عن أنسٍ في حديثٍ ضعيفٍ:"ما زال رسول الله صلى الله عليه وسلم يقنُتُ في صلاة الصبح حتَّى فارق الدنيا" كما سيأتي في باب ترك القنوت.

قال الإمام أحمد: لا يقنت في صلاة الفجر إلَّا عند نازلةٍ تنزِلُ بالمسلمين، فيدعو الإمام لجيوش المسلمين.

وقال سفيان: إن قنت في الصبح فحسنٌ، وأختار ترك القنوت فيها.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ফজরের সালাতের শেষ রাকাআত থেকে মাথা উঠানোর সময় শুনতে পেলেন, তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! অমুক অমুককে লা'নত (অভিশাপ) করুন।" তিনি মুনাফিকদের একদল লোকের বিরুদ্ধে দু'আ করছিলেন। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: "সিদ্ধান্ত গ্রহণের কোনো ক্ষমতা তোমার নেই; আল্লাহ চাইলে তাদেরকে ক্ষমা করবেন, কিংবা শাস্তি দেবেন। কারণ তারা তো যালিম।" (সূরা আলে ইমরান: ১২৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (2751)


2751 - عن البراء بن عازب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقنتُ في الصبح والمغرب.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (678) من حديث شعبة، عن عمرو بن مُرَّةَ، قال: سمعتُ. ابن أبي ليلى، قال: حدثنا البراء بن عازب فذكره.




বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজর (সুবহ) এবং মাগরিবের সালাতে কুনূত পড়তেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2752)


2752 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قنت شهرًا يدعو على أحياء من أحياء العرب، ثم تركهـ.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4089)، ومسلم في المساجد (677/ 304) من حديث هشام، عن قتادة، عن أنس فذكره، واللفظ لمسلمٍ ولفظ البخاري:"قنت رسول الله صلى الله عليه وسلم شهرًا بعد الركوع يدعو على أحياء مِن العربِ".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক মাস যাবৎ কুনূত পাঠ করেছেন, আরবের কিছু গোত্রের বিরুদ্ধে বদ-দোয়া করেছেন, অতঃপর তা ছেড়ে দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2753)


2753 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قنت بعد الركعة في صلاته شهرًا إذا قال:"سمع الله لمن حمده" يقول في قنوته:"اللهمَّ أَنج الوليد بن الوليد، اللهمَّ نَجِّ سلمة بن هشام، اللهمَّ نَجِّ عيَّاش بن أبي ربيعة، اللهمَّ نَجِّ المستضعفين من المسلمين، اللهمَّ اشدد وطأتك على مُضَرَ. اللهمَّ اجعلها عليهم سنين كَسِنِي يوسف"، قال أبو هريرة: ثمَّ رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ترك الدعاء بَعدُ. فقلتُ: أُرى رسول الله صلى الله عليه وسلم قد ترك الدعاء لهم، قال: فقيل: وما تراهم قد قدموا؟ .

صحيح: رواه مسلم في المساجد (675/ 295) من طريق الوليد بن مسلم قال: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره وقد سبق.

قوله: قدموا: أي كان ذلك الدعاء لهم لأجل تخليصهم من أيدي الكَفَرة وقد خلصوا منهم، وجاؤوا للمدينة، فما بقى حاجة بالدعاء لهم بذلك وأما دعاؤه على الكفرة فمنهم من أسلم، ومنهم من مات، فما بقي حاجة كذلك.

قال ابن حبان (5/ 324) بعد أن رواه من طريق الوليد بن مسلم به:"في هذا الخبر بيان واضح أن القنوت إنَّما يُقنَتُ في الصلوات عند حدوث حادثة … فإذا عُدِم مثل هذه الأحوال لم يُقْنَت حينئذٍ. إذا المصطفى صلى الله عليه وسلم كان يقنتُ على المشركين، ويدعو للمسلمين بالنجاة. فلما أصبح يومًا من الأيام ترك القنوت. فذكر ذلك أبو هريرة فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أما تراهم قد قدموا".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সালাতে রুকূ’র পর এক মাস ধরে কুনূত (দোয়া) পাঠ করেছিলেন। যখন তিনি বলতেন: "সামি'আল্লাহু লিমান হামিদাহ", তখন তিনি তাঁর কুনূতের মধ্যে বলতেন: "হে আল্লাহ! ওয়ালীদ ইবনে ওয়ালীদকে মুক্তি দাও। হে আল্লাহ! সালামাহ ইবনে হিশামকে রক্ষা করো। হে আল্লাহ! আইয়াশ ইবনে আবী রাবী'আহকে রক্ষা করো। হে আল্লাহ! দুর্বল (অত্যাচারিত) মুসলিমদের রক্ষা করো। হে আল্লাহ! মুদার গোত্রের উপর তোমার শাস্তি কঠোর করো। হে আল্লাহ! ইউসুফ (আঃ)-এর বছরের মতো তাদের উপর দুর্ভিক্ষপূর্ণ বছর চাপিয়ে দাও।" আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি দেখলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য দোয়া করা ছেড়ে দিয়েছেন। আমি বললাম: আমি দেখছি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য দোয়া করা ছেড়ে দিয়েছেন। তখন (তাকে) জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি দেখেননি যে তারা এসে পড়েছে?









আল-জামি` আল-কামিল (2754)


2754 - عن أبي مالك الأشجعي قال: قلت لأبي:"يا أبتِ إنَّك قد صليتَ خلْفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر وعثمان وعلي بن أبي طالب ههنا بالكوفة نحوًا من خمس سنين، أكانوا يَقْنُتُون؟ قال: أي بُنيَّ محدَثٌ".

صحيح: رواه الترمذي (402)، وابن ماجه (1241)، والإمام أحمد (15879) كلُّهم من طريق يزيد بن هارون، قال: أخبرنا أبو مالك قال: فذكر الحديث. وإسناده صحيح.

قال الترمذي: حسن صحيح، والعمل عليه عند أكثر أهل العلم.
وأبو مالك اسمه: سعد بن طارق بن أَشْيَم. انتهى.

قلت: طارق بن أَشْيم بوزن أحَمر، صحابي له أحاديث، ذكره البخاري في"التاريخ الكبير" (4/ 352) وقال:"له صحبة"، وكذا ذكره ابن سعد في الطبقات (6/ 37) فلا يجوز أن يشكك في صحبته.

قال مسلم: لم يرو عنه غير ابنه. كذا في التقريب.

وهذا الحديث رواه أيضًا النسائي (1080) عن قتيبة بن سعيد عن خلف بن خليفة، عن أبي مالك الأشجعي به مثله.

وصحّحه ابن حبان (1989) ورواه عن الحسن بن سفيان، حدثنا قتيبة بن سعيد به مثله.

ورواه الإمام أحمد (27209) عن حسين بن محمد، حدثنا خلف به، وفيه: كان أبي قد صلَّى خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو ابن ست عشرة سنة … فذكر بقية الحديث مثله.

ومثله رواه أيضًا (27210) عن يزيد بن هارون، عن أبي مالك.

وخلف بن خليفة، هو ابن صاعد الأشجعي مولاهم، وإن كان قد اختلط بآخره، ولكن تابعه عليه غيره.

وقوله: أي بُنيَّ محدثٌ، يعني استمرار القنوت في صلاة الصبح لغير نازلة، وإلَّا فقد ثبت أنه صلى الله عليه وسلم قنت في الصيح وغيرها من الصلوات عند النوازل.

وأما ما رُوي عن أنس بن مالكٍ قال:"ما زال رسول الله صلى الله عليه وسلم يقنُت في صلاة الصبح حتى فارق الدنيا" فهو ضعيف.

رواه عبد الرزاق في مصنفه (4964) وعنه الإمام أحمد (12657)، ومن طريقه الدارقطني (2/ 39) قال عبد الرزاق: عن أبي جعفر - يعني الرازي -، عن الربيع بن أنس، عن أنس بن مالك فذكره.

ورواه البيهقي (2/ 2001) عن الحاكم من وجه آخر، عن أبي جعفر الرازي به مثله. قال الحاكم:"إسناده صحيحٌ سنده، ثقةٌ رواته"، تعقبه التركماني فقال: كيف يكون سنده صحيحًا، وراويه عن الربيع أبو جعفر عيسى بن ماهان الرازي متكلم فيه. قال ابن حنبل والنسائي: ليس بالقوي، وقال أبو زرعة: يهم كثيرًا وقال الفلاس: سيء الحفظ، وقال ابن حبان: يُحدِّث بالمناكير عن المشاهير". انتهى.

قلت: وهو كما قال، وقد قال ابن المديني: كان يُخلِّط، وقال يحيي: كان يخطئ، وأعتقد أن هذا الحديث مما أخطأ فيه أبو جعفر الرازي، فإن الروايات الصحيحة عن أنسٍ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قنت شهرًا ثمَّ تركهـ.




আবূ মালিক আল-আশজাঈ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার পিতাকে বললাম: "হে আব্বা, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে, আর আবূ বকর, উমার, উসমান এবং আলী ইবনু আবূ তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিছনে এখানে কূফায় প্রায় পাঁচ বছর ধরে সালাত আদায় করেছেন। তাঁরা কি (সালাতে) কুনূত পড়তেন?" তিনি বললেন: "হে আমার প্রিয় বৎস, এটি (পরবর্তীকালে) প্রবর্তন করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2755)


2755 - عن أبي هريرة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان لا يقنت إلا أن يدعو الأحد، أو يدعو على
أحد، وكان إذا قال:"سمع الله لمن حمده" قال:"ربّنا ولك الحمد، اللهم انج" فذكر الحديث.

صحيح: رواه ابن خزيمة (619) عن محمد بن يحيى، نا أبو داود، حدثنا إبراهيم بن سعد، عن الزهري، عن سعيد وأبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.

وأصله في صحيح البخاري (4560) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا إبراهيم بن سعد بإسناده، فذكره كما مضى.

وعزاه ابن الجوزي في"التحقيق" (2/ 431) إلى ابن حبان (ولم أجده في النسخ المطبوعة) وقال صاحب"التنقيح":"رواته ثقات". وقال الحافظ ابن حجر في"الدراية" (1/ 195) معلقًا عليه:"وعند ابن خزيمة مثله، وإسناد كل منهما صحيح".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুনূত পড়তেন না, তবে যখন কারো জন্য দোয়া করতেন অথবা কারো বিরুদ্ধে দোয়া করতেন (তখন পড়তেন)। আর যখন তিনি বলতেন: "সামিআল্লাহু লিমান হামিদা", তখন বলতেন: "রাব্বানা ওয়া লাকাল হামদ। আল্লাহুম্মা আনজি [মুক্তি দাও]..."— এরপর তিনি (বর্ণনাকারী) অবশিষ্ট হাদীসটি উল্লেখ করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2756)


2756 - عن أنس بن مالك:"أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان لا يقنت إلا إذا دعا لقوم، أو على قوم".

صحيح: رواه ابن خزيمة (620) عن محمد بن محمد بن مرزوق الباهلي، حدّثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك، فذكره.

وأخرجه الخطيب في كتاب"القنوت" له: أخبرني عبيد الله بن أبي الفتح، ثنا المعافى بن زكريا، ثنا محمد بن مرزوق، ثنا محمد بن عبد الله الأنصاريّ، بإسناده، مثله. ذكره ابن الجوزي في"التحقيق" (2/ 431) وقال صاحب"التنقيح":"هذا إسناد صحيح، والحديث نصٌّ في أنّ القنوت مختص بالنازل".




আনাস ইবন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুনূত পাঠ করতেন না, তবে যখন তিনি কোনো গোত্রের (কল্যাণের জন্য) দু‘আ করতেন অথবা কোনো গোত্রের (বিরুদ্ধে) বদদু‘আ করতেন (তখন করতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (2757)


2757 - عن ابن عباس قال: قنت رسول الله صلى الله عليه وسلم شهرًا متتابِعًا في الظهر والعصر والمغرب والعشاء وصلاة الصبح في دبر كلِّ صلاة إذا قال:"سمع الله لمن حمده" من الركعة الآخرة. يدعو على أحياء من بني سُليم، على رِعْلٍ وذكوَانَ وعُصيَّة. ويُؤَمِّنُ مَن خَلفَه.

حسن: رواه أبو داود (1443) عن عبد الله بن معاوية الجُمحي، حدَّثنا ثابت بن يزيد، عن هلال بن خَبَّاب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسنٌ لأجل هِلال بن خبَّاب فإنه مختلف فيه غير أنَّه صدوق يُحسَّن حديثه، وقد تغير بآخره.

وصحّحه ابن خزيمة (618) ورواه من طريق ثابت بن يزيد أبو زيد الأحول، ورواه الإمام أحمد (2746) عن عبد الصمد وعفان، قالا: حدثنا ثابت به، وزادا بعد قوله:"يؤمِّن مَن خَلفَه""وأرسل إليهم يدعوهم إلى الإسلام فقتلوهم".

قال عكرمة:"هذا مفتاح القنوت".
ووهمَ الحاكم (1/ 225، 226) فقال: على شرط البخاري، والصواب أنه ليس على شرط البخاري؛ لأن هلالًا ليس من رجاله وإنما هو من رجال السنن.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একাধারে এক মাস যুহর, আসর, মাগরিব, ইশা এবং ফজরের সালাতে কুনূত পাঠ করেছেন—প্রতি সালাতের শেষ রাকা'আতে 'সামিআল্লাহু লিমান হামিদাহ' বলার পর। তিনি বনু সুলাইম গোত্রের কিছু শাখা, যেমন – রি'ল, যাকওয়ান ও উসাইয়ার উপর বদদোয়া করছিলেন। আর তাঁর পেছনের লোকেরা 'আমিন' বলছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (2758)


2758 - عن أنس بن مالك في قصة القرّاء وقتلهم، قال: فقال لي أنس: لقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم كلّما صلّى الغداة رفع يديه يدعو عليهم، يعني على الذين قتلوهم.

حسن: رواه البيهقي (2/ 211) عن علي بن صقر بن نصر السّكري بغداد في سويقة غالب من كتابه، ثنا عفان بن مسلم، ثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس، فذكره.

قال النووي في"شرح المهذب" (3/ 500):"إسناده صحيح أو حسن".

قال البيهقي: إنّ عددًا من الصحابة رفعوا أيديهم في القنوت، وقال: عن أبي رافع قال: صليت خلف عمر بن الخطاب فقنت بعد الركوع، ورفع يديه وجهر بالدّعاء. وقال: وهذا عن عمر صحيح.

وأمّا مسح الوجه باليدين بعد الفراغ من الدّعاء، فقال النووي في"شرح المهذب" (3/ 500):"فإن قلنا لا يرفع اليدين لم يشرع المسح بلا خلاف، وإن قلنا: يرفع، فوجهان: أشهرهما أنه يستحبّ، والثاني: لا يمسح. وهذا هو الصحيح، صحّحه البيهقيّ.

قال البيهقي: لستُ أحفظ في مسح الوجه هنا عن أحد من السّلف شيئًا، وإن كان يُروى عن بعضهم في الدّعاء خارج الصلاة، فأما في الصلاة فهو عمل لم يثبت فيه خبر، ولا أثر، ولا قياس، فالأولى أن لا يفعله، ويقتصر على ما نقله السلف عنهم رفع اليدين دون مسحهما بالوجه في الصلاة"."السنن الكبرى" (2/ 212).

وأما ما رُوي عن ابن عباس في مسح الرجل وجهه بيديه بعد فراغه من الدعاء فهو ضعيف، رواه ابن ماجه (1181) عن أبي كريب ومحمد بن الصباح قالا: حدَّثنا عائذ بن حبيب، عن صالح بن حسَّان الأنصاري، عن محمد بن كعب القُرظي، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دعوت الله فادعُ بباطن كفيك، ولا تدعُ بظهورهما، فإذا فرغْتَ فامسحْ بهما وجهَك".

وإسناده ضعيف جدًّا. فإن صالح بن حسّان منكر الحديث كما قال البخاري، وقال النسائي: متروك الحديث.

ورواه الحاكم في المستدرك (1/ 536) من طريقه بصيغة التمريض.

وتابعه عيسى بن ميمون عن محمد بن كعب به ولفظه:"إذا سألتم الله فاسألوه ببطون أكفكم، ثم لا تردُّوها حتَّى تمسحوا بها وجوهَكم".

وفي رواية:"فإنَّ الله جاعل فيها بركة".

وعيسى بن ميمون هذا قال فيه ابن حبان: يروي أحاديث كلها موضوعات. وقال النسائي: ليس بثقة،
وقال البخاري: صاحب مناكير عن محمد بن كعب. وضعَّفه أيضًا ابن معين والفلاس وغيرهما.

قال أبو داود: سمعت أحمد وسئل عن الرجل يمسح وجهه بيديه إذا فرغ في الوتر فقال: لم أسمع فيه بشيء، وقال: وعيسى بن ميمون الذي روى حديث ابن عباس ليس هو ممن يحتج بحديثه، وكذلك صالح بن حسان.

وكذلك لا يصح ما روي عن عمر بن الخطاب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رفع يديه في الدعاء لم يحطهما حتى يمسح بهما وجهه.

رواه الترمذي في جامعه (3386)، وعبد بن حميد (39)، والحاكم في المستدرك (1/ 536) كلهم من طريق حماد بن عيسى الجهني، عن حنظلة بن أبي سفيان الجمحي، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، عن عمر بن الخطاب فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث حماد بن عيسى وقد تفرد به، وهو قليل الحديث، وقد حدث عنه الناس، وحنظلة بن أبي سفيان هو ثقة، وثّقه يحيى بن سعيد القطان".

قلت: حماد بن عيسى بن عبيدة الجهني ضعيف، ضعّفه أبو داود، وأبو حاتم، وابن حبان وغيرهم.

وسئل أبو زرعة عن هذا الحديث فقال:"هو حديث منكر، أخاف ألا يكون له أصل"."العلل" (2106).




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে কুররাদের (ক্বারীদের) হত্যার ঘটনা প্রসঙ্গে বর্ণিত। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখেছি, যখনই তিনি ফজর (সুবহের) সালাত আদায় করতেন, তখনই তিনি তাদের—অর্থাৎ যারা তাদের হত্যা করেছিল—বিরুদ্ধে দু'আ করার জন্য তাঁর উভয় হাত উঠাতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2759)


2759 - عن * *




২৭৫৯ - ... থেকে বর্ণিত।









আল-জামি` আল-কামিল (2760)


2760 - عن عائشةَ زوجِ النبيِّ صلى الله عليه وسلم أنَّها قالت: فُرضت الصلاةُ ركعتين ركعتين في الحضر والسفر، فأُقِرَّتْ صلاةُ السفر، وزيد في صلاة الحضر.

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة في السفر (8) عن صالح بن كيسان، عن عروة بن الزبير، عن عائشة فذكرته.

رواه البخاري في الصلاة (350) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في صلاة المسافرين (685) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.

ورواهما أيضًا من حديث سفيان، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة قالت: الصلاة أوّلُ ما فُرضتْ ركعتين. فأُقِرَّتْ صلاة السفر، وأُتِمَّت صلاة الحضر.

قال الزهري: فقلت لعروة: ما بال عائشة تُتِم؟ قال: تأولتْ ما تأوَّل عثمان. البخاري (1090).

ورواه ابن خزيمة (944)، وابن حبان (2738) كلاهما من طريق محبوب بن الحسن، عن داود ابن أبي هند، عن الشعبيّ، عن مسروق، عن عائشة وزادا فيه:"وتركت صلاة الفجر لطول القراءة، وصلاة المغرب لأنها وتر النهار".

وإسناده حسن لأجل محبوب بن الحسن وهو: محمد بن الحسن بن هلال ابن أبي زينب، أبو جعفر أو أبو الحسن، لقبه: محبوب، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. أخرج له البخاري مقرونًا.

ومعنى قول عروة: تأوَّلَتْ ما تأول عثمان: قال الجمهور: معنى تأويلهما أنَّهما رأيا القَصْرَ جائزًا لا واجبًا، وقيل غير ذلك. قاله النووي في"الخلاصة" (2/ 725).

وأما ما رُويَ عن عثمانَ مرفوعًا:"من تأهَّل في بلد فليصلِّ صلاة المقيم" فهو حديث ضعيف.

رواه الإمام أحمد (443) عن أبي سعيد، يعني مولى بني هاشم، حدثنا عكرمة بن إبراهيم الباهلي، حدثنا عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي ذُباب، عن أبيه، أن عثمان بن عفان صلَّى بِمِنىَ أربع ركعاتٍ، فأنكره الناس عليه، فقال: يا أيُّها الناس! إنِّي تأهَّلت بمكة منذ قَدِمتُ، وإنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.

فيه عكرمة بن إبراهيم الباهلي نقل الحافظ في"التعجيل" عن الحسيني أنه قال:"ليس بالمشهور".

وقال أبو زرعة:"لا أعرف حاله" ولكن تعقبه الحافظ بأنه:"مشهور وحاله معروفه" ظنًّا منه أنه عكرمة بن إبراهيم الأزدي، ثم نقل كلام أهل العلم في تضعيف الأزدي، وقال: ينظر فيمن نسبه باهِلِيًّا.
قلت: وفي كلا الحالين سواء كان باهِلِيًّا أو أزديًّا فالإسناد ضعيف.

وفي الإسناد أيضًا عبد الرحمن بن أبي ذُباب لم يوثقه غير ابن حبان فهو في مرتبة"مقبول" عند الحافظ.

ومن تأويلات عثمان ما بيَّنه هو نفسه: إنما يقصر الصلاة من حمل الزاد والمزاد، وحل وارتحل. ذكره الطحاوي في"شرحه" (1/ 426) وذكره فيه تأويلات أخرى أيضًا. انظر للمزيد"أحكام السفر والإقامة" (49) لشيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى. وخلاصته ما قاله النووي بأنَّ عثمان كان يرى القصر جائزًا لا واجبًا.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী ছিলেন, তিনি বলেন: সালাত (নামায) যখন ফরয করা হয়েছিল, তখন সফর ও গৃহে অবস্থান—উভয় অবস্থাতেই দুই দুই রাকাত করে ফরয করা হয়েছিল। অতঃপর সফরের সালাতকে (দুই রাকাতের উপর) বহাল রাখা হয় এবং গৃহে অবস্থানের সালাতে রাকাত বৃদ্ধি করা হয়।