হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2761)


2761 - عن ابن عباس قال: فرض الله الصلاةَ على لسان نبيكم في الحضر أربعًا وفي السفر ركعتين، وفي الخوف ركعة.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (687) من طرق عن مجاهد وغيره عن ابن عباس، وعن موسى بن سلمة الهُذَلي قال: سألت ابن عباس: كيف أُصَلِّي إذا كنتُ بمكة، إذا لم أُصَلِّ مع الإمام. فقال: ركعتين. سنة أبي القاسم صلى الله عليه وسلم.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জবানে সালাত (নামাজ) নির্ধারণ করেছেন—মুকিম অবস্থায় চার রাকাত, সফরে দুই রাকাত এবং ভয়ের (বিপদসংকুল) অবস্থায় এক রাকাত।

মূসা ইবনে সালামাহ আল-হুযালী (রহ.) বলেন, আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আমি যখন মক্কায় থাকি এবং ইমামের সাথে সালাত আদায় না করি, তখন কীভাবে সালাত আদায় করব? তিনি বললেন: দুই রাকাত। এটা আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত।









আল-জামি` আল-কামিল (2762)


2762 - عن عمر قال: صلاة السفر ركعتان، وصلاة الجمعة ركعتان، والفطر والأضحى ركعتان، تمام غير قَصْرٍ على لسان محمد صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه ابن ماجة (1064) من طريق يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن زبيد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عُجرة، عن عمر فذكره.

وإسناده حسن لأجل يزيد بن زياد بن أبي الجعد الأشجعي فإنه"صدوق".

ومن هذا الوجه رواه ابن خزيمة في صحيحه (1425)، والبيهقي (3/ 199).

وخالفه سفيان الثوري فرواه عن زبيد ولم يذكر كعب بن عُجْرة بين ابن أبي ليلى وعمر. ومن هذا الوجه رواه النسائي (1566)، والإمام أحمد (257)، وابن حبان (2783)، وسفيان أحفظ من يزيد بن زياد بن أبي الجعد، ولذا رجَّح أبو حاتم رواية الثوري. انظر:"العلل" (1/ 138).

قلت: تابعه على ذلك شعبة عند النسائي (1440) وشريك بن عبد الله عند ابن ماجة (1963) فروياه عن زبيد ولم يذكرا"كعب بن عُجْرة" بين عبد الرحمن بن أبي ليلى وعمر بن الخطاب.

واختلف أهل العلم في سماع عبد الرحمن بن أبي ليلى من عمر بن الخطاب فقال النسائي وغيره:"إنه لم يسمع منه". وأثبته مسلم في مقدمة صحيحه قائلًا:"وأسند عبد الرحمن بن أبي ليلى، وحفظ عن عمر بن الخطاب … وصحب عليًّا، وروى عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم حديثًا".

فمرة روايته عن كعب بن عُجرة، عن عمر بن الخطاب، وأخرى عنه مباشرة فيُحكم على الأوَّل بأنّه: المزيد في متصل الأسانيد، أو كان أولًا سمع من كعب بن عجرة، ثم تيسر له السماع من عمر بن الخطاب فروى زبيد على وجهين وتلاميذه كل منهم روى على وجه واحد. والله أعلم بالصواب.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সফরের সালাত দুই রাকাত, জুমু'আর সালাত দুই রাকাত, এবং ঈদুল ফিতর ও ঈদুল আযহার সালাত দুই রাকাত; যা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জবানীতে পূর্ণ সালাত, কসর (হ্রাসকৃত) নয়।









আল-জামি` আল-কামিল (2763)


2763 - عن أُمَيَّة بن عبد الله بن خالد بن أَسِيد أنَّه قال لعبد الله بن عمر: إنَّا نَجِد صلاة الحضر وصلاة الخوف في القرآن. ولا نجد صلاة السفر في القرآن. فقال له عبد الله بن عمر: يا ابن أخي! إنَّ الله عز وجل بعث إلينا محمدًا صلى الله عليه وسلم، ولا نعلم شيئًا، وإنَّما نفعل كما رأينا محمدًا صلى الله عليه وسلم يفعل.

حسن: رواه ابن ماجة (1066)، والنسائي (1434) وصحّحه ابن خزيمة (946)، وابن حبان (1451)، والحاكم (1/ 258) كلهم من طريق الليث بن سعد، قال: حدثني ابن شهاب، عن عبد الله بن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أمية بن عبد الله بن خالد فذكره.

وقال الحاكم: هذا حديث رواته مدنيون ثقات.

ورجاله ثقات غير عبد الله بن أبي بكر بن عبد الرحمن فإنَّه لم يوثّقه إلَّا ابن عبد الرحيم البرقي كما في التهذيب، مع إخراج ابن خزيمة وابن حبان والحاكم له، ولذا قال الحافظ في التقريب:"صدوق" وأظنه كذلك، وقد روى عنه جمع إلَّا أنَّ البخاري قال فيه:"لا يصح حديثه" قلت: وهذا لا يمنع من تحسينه. والله تعالى أعلم.

وقرَّر البيهقي (3/ 136) هذا الإسناد، وانتقد جماعةً رووا عن ابن شهاب فلم يقيموا إسناده.

قلت: ومن هؤلاء الإمام مالك، فإنه رواه عن ابن شهاب، عن رجل من آل خالد بن أسيد، أنه سأل عبد الله بن عمر فذكره. قصر الصلاة (7).

قال ابن عبد البر: هكذا يَروِي مالكٌ هذا الحديثَ عن ابن شهاب، وسائر أصحاب ابن شهاب يروونه عن ابن شهاب، عن عبد الله بن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أمية بن عبد الله بن خالد بن أسيد، عن ابن عمر. انتهى.

فأسقط مالك رجلًا كما أنه لم يسم الرجل من آل خالد بن أسيد.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমাইয়া ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে খালিদ ইবনে আসীদ তাকে বললেন: আমরা কুরআনে মুকিম অবস্থার সালাত এবং ভয়কালীন সালাত খুঁজে পাই, কিন্তু আমরা কুরআনে সফরের সালাত খুঁজে পাই না। তখন আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: হে আমার ভাতিজা! নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা আমাদের নিকট মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রেরণ করেছেন, আর (তাঁকে প্রেরণের পূর্বে) আমরা কিছুই জানতাম না। আমরা কেবল তাই করি যা আমরা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে করতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (2764)


2764 - عن يعلى بن أُمَيَّةَ قال: قلت لعمر بن الخطاب: {فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَنْ تَقْصُرُوا مِنَ الصَّلَاةِ إِنْ خِفْتُمْ أَنْ يَفْتِنَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا} [النساء: 101] فقد أمِن الناس. فقال: عجبتُ مما عجبتَ منه. فسألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك فقال:"صدقة تصدق الله بها عليكم فاقبلوا صدقته".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (686) من طرق عن عبد الله بن إدريس، عن ابن جريج، عن ابن أبي عمار، عن عبد الله بن بابَيْهِ، عن يعلى بن أمية فذكره.

ورواه عبد الرزاق عن ابن جريج، قال: سمعت عبد الرحمن بن عبد الله بن أبي عمار، يحدث عن
عبد الله بن باباه به ومن هذا الطريق رواه الترمذي (3034)، وأبو داود (1199).

وأما النسائي (3/ 116)، وابن ماجة (1065) فروياه من طريق عبد الله بن إدريس مثل مسلم.

قال الشافعي:"فدلَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على أن القصر في السفر بلا خوف صدقة من الله، والصدقة رخصة لا حتم من الله أن يقصروا".

وقالت عائشة: كل ذلك فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم أتمَّ في سفره، وقصر.




ইয়া'লা ইবনু উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম, "তোমাদের উপর কোনো পাপ নেই যদি তোমরা সালাত সংক্ষেপ করো, যদি তোমরা আশঙ্কা করো যে, কাফিররা তোমাদেরকে পরীক্ষায় ফেলবে।" [সূরা নিসা: ১০১] অথচ এখন তো মানুষ নিরাপদ। তিনি (উমার) বললেন: তুমি যে বিষয়ে আশ্চর্য হয়েছ, আমিও সেই বিষয়ে আশ্চর্য হয়েছিলাম। অতঃপর আমি এ ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "এটা এমন এক দান (উপহার) যা আল্লাহ তোমাদের উপর সদাকাহ (দান) করেছেন। সুতরাং তোমরা তাঁর সদাকাহ গ্রহণ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2765)


2765 - عن عدي بن ثابت قال: سمعتُ البراء يُحدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّه كان في سفر فصلَّى العشاء الآخِرة. فقرأ في إحدى الركعتين: {وَالتِّينِ وَالزَّيْتُونِ}.

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (767)، ومسلم في الصلاة (464) كلاهما من حديث شعبة، عن عدي بن ثابت فذكره.

وقال البراء في رواية:"فَمَا سَمِعتُ أحدًا أحسنَ صوتًا منه".




বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সফরে ছিলেন। তিনি এশার শেষ সালাত (নামাজ) আদায় করলেন এবং দুই রাকাআতের মধ্যে এক রাকাআতে সূরা "ওয়াত-তীন ওয়ায-যায়তূন" পাঠ করলেন।

বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অন্য এক বর্ণনায় বলেন: "আমি তাঁর (রাসূলুল্লাহর) চেয়ে বেশি সুন্দর কণ্ঠস্বর আর কারো শুনিনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (2766)


2766 - عن ابن عبَّاس أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج من المدينة إلى مكة، لا يخاف إلا الله رب العالمين، فصلَّى ركعتين.

صحيح: رواه الترمذي (547)، والنسائي (1435) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا هُشيم، عن منصور بن زاذان، عن ابن سيرين، عن ابن عباس فذكره.

قال الترمذي:"حسن صحيح".

ورواه الإمام أحمد (1852) عن هُشيم به وزاد في آخر الحديث:"حتى رجع".

وهُشيم هو: ابن بَشِير السلمي من رجال الجماعة إلَّا أنَّه كان يدلِّس، وقد ثبت التَّصريح بالتحديث في رواية الطبراني (12863) فانتفت عنه تهمة التدليس ثمَّ له متابعة فقد رواه النسائي أيضًا من وجه آخر عن محمد بن سيرين به مثله.

تنبيه: لقد وقع انقلابٌ في المتن في سنن النسائي في الموضع الأوّل فقال:"خرج من مكة إلى المدينة" والعكس هو الصّحيح.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনা থেকে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলেন, আল্লাহ রাব্বুল আলামীন ব্যতীত অন্য কাউকেও ভয় না করে, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2767)


2767 - عن عبد الله بن مسعود يقول: صلَّيت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في السفر ركعتين، ومع أبي بكر ركعتين، ومع عمرَ ركعتين.

صحيح: رواه النسائي (1439) عن محمد بن علي بن الحسن بن شقيق، قال: أخبرني أبي، أخبرنا أبو حمزة - وهو السُّكَّري - عن منصور، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله فذكره.

وإسناده صحيح. ويبدو أنَّه اختصار لما رواه الشيخان عنه كما سيأتي في قَصْر الصلاةِ في مِنًى.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সফরে দু'রাক'আত সালাত আদায় করেছি, আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও দু'রাক'আত, এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও দু'রাক'আত।









আল-জামি` আল-কামিল (2768)


2768 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله يُحِبُّ أن تُؤتَى رُخَصُه، كما
يكره أن تُؤْتَى معصيتُه".

حسن: رواه الإمام أحمد (5873)، والبزار"كشف الأستار" (988) كلاهما من حديث عبد العزيز بن محمد (وهو الدراوردي) عن عُمارة بن عَزِيَّة، عن حرب بن قيس، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن لأجل حرب بن قيس فإنَّه لم يوثِّقه غير ابن حبان، وروى عنه جمع، وقال عنه راويه عمارة بن غزيَّة: كان حرب رِضًا. وهو من رجال التعجيل.

وصحّحه ابن حبان (2742) فرواه من طريق قتيبة بن سعيد، حدثنا الدراوردي به مثله، ورواه الإمام أحمد (5866) عن قتيبة بن سعيد إلَّا أنَّه لم يذكر"حرب بن قيس" بين عُمارة ونافع، فالذي يظهر أنَّه سقط خطأً. لأنَّ ابنَ حبَّان رواه عن قتيبة وأثبته وقد تابع يحيى بن أيوب - وهو الغافقي - الدراوردي في ذكر حرب بن قيس بين عمارة ونافع، ومن طريقه رواه ابن خزيمة (950) إلَّا أنَّه تحرَّف فيه"يحيى بن أيُّوب" إلى"يحيى بن زياد".




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ পছন্দ করেন যে তাঁর সহজ বিধানগুলো (রুখসত) গ্রহণ করা হোক, যেমন তিনি অপছন্দ করেন যে তাঁর অবাধ্যতা করা হোক।"









আল-জামি` আল-কামিল (2769)


2769 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله عز وجل يحب أن يؤتى رُخَصُهُ كما يُحِبُّ أن يؤتى عزائمه".

حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 323)، والبزار"كشف الأستار" (990) كلاهما من طريق حسين بن محمد الذارع، ثنا حصين بن نمير، ثنا هشام بن حسان، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن لأجل حسين بن محمد الذارع، وثَّقه النسائي، وقال أبو حاتم:"صدوق"، وذكره ابن حبان في الثقات، وأخرج الحديث في صحيحه (354) من هذا الطريق.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 162):"رجال البزار ثقات وكذلك رجال الطبراني".

قلت: وللحديث أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته أصحها.

ورُوي هذا الحديث عن الصحابة الآخرين أيضًا ولكن لم يصح منها إلَّا ما ذكرته.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা’আলা পছন্দ করেন যে তাঁর সহজ বিধানগুলো (রুখসত বা সুযোগ-সুবিধা) পালন করা হোক, যেমন তিনি পছন্দ করেন যে তাঁর কঠোর বিধানগুলো (আযাইম বা অবশ্যপালনীয় ফরযসমূহ) পালন করা হোক।"









আল-জামি` আল-কামিল (2770)


2770 - عن حفصٍ، عن أنس بن مالك أنَّه قال: انطلق بنا إلى الشام إلى عبد الملك، ونحن أربعون رجلًا من الأنصار ليفْرِضَ لنا. فلما رجع وكنا بفجِّ الناقة صلى بنا الظهر ركعتين، ثم سلَّم، ودخل فُسْطَاطَه، وقام القوم يُضيفون إلى ركعتيه ركعتين أخْريين. قال: فقال: قبَّح الله الوجوه، فوالله! ما أصابتِ السنةَ، ولا قَبِلتِ الرخصةَ، فأشهد لسمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن أَقوامًا يتعمقون في الدين، يمرُقُون كما يمرُقُ السهمُ من الرمية".

حسن: رواه الإمام أحمد (12615) عن حسين بن محمد، حدثنا خلف، عن حفص، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن لأجل خلف وهو: ابن خليفة بن صاعد وثقه ابن سعد والعجلي، وقال ابن معين والنسائي: لا بأس به، وقال أبو حاتم:"صدوق".

قلت: ومثله بحسن حديثه، وهو من رجال مسلم.

وحفص هو: ابن أخي أنس بن مالك، واسم أبيه عمر، وسماه البخاري"عبد الله" وترجم له في التاريخ الكبير (2/ 360) فقال: حفص بن عبد الله بن أبي طلحة، ابن أخي أنس الأنصاري، سمع منه خلف بن خليفة. وروى النضر بن محمد، عن عكرمة بن عمار قال: حدثني حفص بن عمر بن أبي طلحة: صبحت أنس بن مالك إلى الشام، فرأى قومًا يتطوعون في السفر، فتردد البخاري في اسم أبيه، ولكن ترجمته باسم حفص بن عبد الله يشير إلى ترجيح أن اسم أبيه"عبد الله"، ورجَّح الحافظ في التهذيب أن اسمه:"عمر" والله أعلم بالصواب، وهو صدوق، وثَّقه الدارقطني، وقال أبو حاتم:"صالح الحديث". وذكره ابن حبان في الثقات.

والمرفوع منه أخرجه البزار وغيره، وسيذكر في الموضع المناسب.

تنبيه: تحرف في"المجمع" (2941): خلف عن حفص إلى"خلف بن حفص" فقال الحافظ الهيثمي:"رواه أحمد، وخلف بن حفص لم أجد من ترجمه" فلعله كان هكذا في نسخة أحمد عنده.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমরা আনসারদের চল্লিশজন লোক আমাদের ভাতা নির্ধারণের জন্য আব্দুল মালিকের কাছে শামের (সিরিয়ার) দিকে গেলাম। এরপর যখন আমরা ফিরলাম এবং আমরা ফাজ্জুন-নাক্বাহ নামক স্থানে ছিলাম, তখন তিনি আমাদের নিয়ে যুহরের সালাত দুই রাকাত পড়লেন। অতঃপর সালাম ফিরিয়ে তার তাবুতে প্রবেশ করলেন। তখন লোকেরা দাঁড়িয়ে তার (আব্দুল মালিকের) দুই রাকাতের সাথে আরও দুই রাকাত যোগ করে নিল। (আনাস ইবনে মালিক) বললেন, তখন তিনি বললেন: আল্লাহ্ এই মুখগুলিকে অপমানিত করুন! আল্লাহর কসম, তারা সুন্নাহ অনুসরণ করেনি এবং তারা রুখসতও (ছাড়) গ্রহণ করেনি। অতএব, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই এমন কিছু লোক আছে, যারা দ্বীনের ব্যাপারে বাড়াবাড়ি করে (গভীরতা অন্বেষণ করে), তারা শিকার ভেদ করে তীর যেমন বেরিয়ে যায়, তেমনিভাবে (দ্বীন থেকে) বেরিয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2771)


2771 - عن أنس يقول: صلَّيتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الظهر بالمدينة أربعًا، وصلَّيتُ معه العصر بذي الحُليفة ركعتين.

متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1089)، ومسلم في صلاة المسافرين (690) كلاهما من حديث سفيان، حدثنا محمد بن المنكدر وإبراهيم بن ميسرة سمعا أنس بن مالك يقول: فذكره. وله أسانيد أخرى في الصّحيحين.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মদীনায় যোহরের সালাত চার রাকাত পড়েছি এবং তাঁর সাথে যুল-হুলাইফায় আসরের সালাত দুই রাকাত পড়েছি।









আল-জামি` আল-কামিল (2772)


2772 - عن جُبَير بن نفير قال: خرجت مع شُرحبيل بن السِّمْط إلى قرية على رأس سبعة عشر، أو ثمانية عشر ميلًا. فصلى ركعتين فقلت له. فقال: رأيت عمر صلى بذي الحليفة ركعتين، فقلت له. فقال: إنَّما أفعل كما رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعل. صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (692) من طرق عن عبد الرحمن بن مهدي، ثنا شعبة، عن يزيد بن خُمير، عن حبيب بن عبيد، عن جبير بن نفير فذكره.

ورواه أيضًا من طريق محمد بن جعفر، حدثنا شعبة بهذا الإسناد وقال: عن ابن السِّمْط. ولم يُسمِّ شُرحبيلَ، وقال: إنه أتى أرضًا يقال لها: دُومين من حِمص، على رأس ثمانية عشر ميلًا.




জুবাইর ইবনু নুফাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি শুরাহবীল ইবনুস সিমত (এর) সাথে সতেরো কিংবা আঠারো মাইল দূরত্বের একটি গ্রামের দিকে বের হলাম। সেখানে তিনি দু'রাক'আত সালাত আদায় করলেন। আমি তাকে (এর কারণ) জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যুল-হুলাইফায় দু'রাক'আত সালাত আদায় করতে দেখেছি। আমি তাঁকেও (উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে) জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেছিলেন: আমি তো কেবল তাই করছি যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে করতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (2773)


2773 - عن يحيى بن يزيد الهُنَّائي قال: سألت أنس بن مالك: عن قصر الصلاة فقال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا خرج مسيرة ثلاثة أميالٍ، أو ثلاثة فراسخ - شعبةُ الشَّاكُ -
صلَّى ركعتين.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (691) عن أبي بكر بن أبي شيبة وغيره، عن غُندَر (وهو محمد بن جعفر) عن شعبة، عن يحيى بن يزيد الهُنَائي فذكره، وهو في"المصنف" (2/ 332 تحقيق اللحام).

ورواه الإمام أحمد (12313) عن محمد بن جعفر به وقال في أول الحديث: سألت أنس بن مالك عن قصر الصلاة، قال: كنتُ أخرج إلى الكوفة، فأصلي ركعتين حتى أرجع. وقال أنس: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.

ورواه أبو داود (1201) نحو لفظ مسلم، ورواه البيهقي (3/ 146) عن أبي داود والحاكم من طريق محمد بن جعفر به وفيه يقول يحيى بن يزيد الهُنَائي: وكنت أخرج إلى الكوفة فأصلي ركعتين حتى أرجع. فقال أنس: فذكره. فظهر منه أن الذي يخرج هو يحيى بن يزيد الهُنَائي.

قوله:"إذا خرج مسيرة ثلاثة أميالٍ، أو مسيرة ثلاثة فراسخَ".

معناه: بداية القصر للمسافرِ، لا غاية السفرِ، وإلى هذا أشار القرطبي رحمه الله في المفهم (2/ 332).

ونقل الحافظ في"الفتح" (2/ 567) عن النووي: أن أهل الظاهر ذهبوا إلى أن أقل مسافة القصر ثلاثة أميال. وكأنهم احتجوا في ذلك بما رواه مسلم وأبو داود من حديث أنس … وقال الحافظ:"وهو أصح حديث ورد في بيان ذلك وأصرحُهُ. وقد حمله من خالفه على أنَّ المراد به المسافة التي يبتدأ منها القصر، لا غاية السفر، ولا يخفى بعد هذا الحمل، مع أن البيهقي ذكر في روايته من هذا الوجه أن يحيى بن يزيد راويه عن أنس قال: سألت أنسًا عن قصر الصلاة، وكنت أخرج إلى الكوفة - يعني من البصرة - فأصلي ركعتين ركعتين حتى أرجع فقال أنس: فذكر الحديث، فظهر أنه سأله عن جواز القصر في السفر، لا عن الموضع الذي يبدأ القصر منه" انتهى.

ولكن الظاهر أن المسافة المقدرة في حديث أنس هي بداية القصر.

وأما تحديد مسافة السفر فالصحيح ما قاله شيخ الإسلام ابن تيمية، ورجحه تلميذه الحافظ ابن القيم قائلًا: بأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يحدَّ لأمته مسافةً محدودةً للقصر والفطر. بل أطلق لهم ذلك في مطلق السفر والضرب في الأرض، كما أطلق لهم التيمم في كل سفر، وأما ما يُروى عنه من التحديد باليوم، أو اليومين، أو الثلاثة، فلم يصح عنه منها شيء البتة" انتهى. انظر:"زاد المعاد" (1/ 481).

وأما كلام الفقهاء في تحديد مسافة القصر فانظره في"المنة الكبرى" (2/ 131).




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইয়াহইয়া ইবনে ইয়াযীদ আল-হুনাই বলেন: আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সালাত কসর (সংক্ষেপ) করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন তিন মাইল কিংবা তিন ফারসাখের দূরত্বের পথে বের হতেন—(বর্ণনাকারী) শু’বা এ বিষয়ে সন্দেহ প্রকাশ করেছেন—তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2774)


2774 - عن أنس يقول: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم من المدينة إلى مكة، فكان يُصلي ركعتين
ركعتين حتى رجعنا إلى المدينة. قلت: كم أقام بمكة؟ قال: عشرًا.

متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1081)، ومسلم في صلاة المسافرين (693) كلاهما من حديث يحيى بن أبي إسحاق، قال سمعتُ أنسًا يقول: فذكره.

وفي رواية عند مسلم يقول: خرجنا من المدينة إلى الحج، ثم ذكر مثله.

فأنس يشير إلى قيام النبي صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع، لأنه دخل مكة صبح رابعة من ذي الحجة، وهو يوم الأحد، وبات بالمحصب ليلة الأربعاء. وفي تلك الليلة أعمرت عائشة من التنعيم، ثم طاف عليه السلام طواف الوداع سحرًا قبل صلاة الصبح من يوم الأربعاء، وخرج صبيحته، وهو الرابع عشر. قاله المندري. انظر"نصب الراية" (2/ 184) وحديث ابن عباس الآتي يختص بفتح مكة.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মদীনা থেকে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলাম। অতঃপর তিনি দুই রাক‘আত, দুই রাক‘আত (কসর) সালাত আদায় করছিলেন, যতক্ষণ না আমরা মদীনায় ফিরে এলাম। (বর্ণনাকারী) আমি জিজ্ঞাসা করলাম, তিনি মক্কায় কতদিন অবস্থান করেছিলেন? তিনি বললেন, দশ দিন।









আল-জামি` আল-কামিল (2775)


2775 - عن ابن عباس قال: أقام النبي صلى الله عليه وسلم تسعة عشر يَقْصُر، فنحن إذا سافرنا تسعة عشر قصرنا، وإن زدنا أتممنا.

صحيح: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1080) من طريق أبي عوانة عن عاصم وحُصَين، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

ورواه أبو داود وغيره وفيه"سبع عشرة".

قال البيهقي (3/ 151):"اختلفت هذه الروايات في"تسع عشرة" و"سبع عشرة" وأصحهما عندي رواية من روى"تسع عشرة" وهي الرواية التي أودعها محمد بن إسماعيل البخاري في الجامع الصحيح. فأخذ من رواها، ولم يختلف عليه على عبد الله بن المبارك، وهو أحفظ من رواه عن عاصم الأحول" انتهى.

وهو يشير إلى ما رواه البخاري في المغازي (4298) عن عبدان، عن عبد الله (ابن المبارك) أخبرنا عاصم، عن عكرمة، عن ابن عباس أقام النبي صلى الله عليه وسلم بمكة تسعة عشر يومًا يصلِّي ركعتين. انتهى.

قلت: وتابعه أبو عوانة كما تراه وأبو شهاب، البخاري (4299) كلاهما عن عاصم مثل رواية عبد الله بن المبارك.

انظر: لمزيد من التفصيل:"المنة الكبرى" (2/ 138).

وقول ابن عباس:"وإن زدنا أتممنا" هو مذهبه، وإلا فقد ثبت عن غير واحِدٍ من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم والتابعين أنَّهم كانوا يقصرون الصلاة بدون تحديد المدة، وهو اختيار شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى:"وتُقصر الصلاة في كل ما يسمى سفرًا، سواء قلَّ أو كثر. ولا يتقدر بمدَّة. وهو مذهب الظاهرية، ونصره صاحب المغني فيه، وسواء كان مباحًا أو محرَّمًا. ونصره ابن عقيل في موضع، وقال بعض المتأخرين من أصحاب أحمد والشافعي: وسواء نوى إقامة أكثر من أربعة أيام أولا، وروي هذا عن جماعة من الصحابة"."الاختبارات الفقهية لشيخ الإسلام" (ص 69).

قلت: أقام أنس بن مالك بالشام شهرين يصلِّي ركعتين.
وأقام ابن عمر باذربيجان ستة أشهر يقصر الصلاة.

ووفد سعد بن أبي وقاص إلى معاوية فأقام عنده شهرًا يقصر الصلاة، أو شهر رمضان فيفطر.

وعن الحسن قال: كُنَّا مع عبد الرحمن بن سمرة ببعض بلاد فارس سنتين فكان لا يجمع، ولا يزيد على ركعتين.

وعن الحسن أيضًا أنه أقام مع أنس بن مالك بنيسابور سنتين فكان يصلي ركعتين ركعتين. انظر تخاريج هذه الآثار في"نصب الراية" (2/ 185).




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উনিশ দিন অবস্থান করেছিলেন এবং সালাত কসর করেছিলেন। সুতরাং আমরা যখন উনিশ দিনের জন্য সফর করি, তখন কসর করি। আর যদি এর চেয়ে বেশি হয়, তবে পূর্ণ সালাত আদায় করি।









আল-জামি` আল-কামিল (2776)


2776 - عن جابر بن عبد الله قال: أقام رسول الله صلى الله عليه وسلم بتبوك عشرين يومًا يقصُر الصلاة. صحيح: رواه أبو داود (1235) عن الإمام أحمد، وهو في مسنده (14139) عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن جابر فذكره.

والحديث في"مصنف" عبد الرزاق (4335) ومن طريقه أخرجه بن حبان في صحيحه (2752)، والبيهقي (3/ 152).

ورجال إسناده ثقات، إلا أن أبا داود أعلَّه قائلًا:"غير معمر يُرسله لا يسنده".

وقال البيهقي:"تفرَّد معمر بروايته مسندًا، ورواه علي بن المبارك وغيره عن يحيى عن ابن ثوبان، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا".

قلت: حديث علي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان قال: أقام النبي صلى الله عليه وسلم بتبوك عشرين ليلة يُصلي صلاة المسافر ركعتين، رواه ابن أبي شيبة (2/ 454) من طريقه.

قلت: والحديث روي من وجهين: أحدهما مسندًا. رواه معمر كما سبق.

والثاني: مرسلًا. رواه علي بن المبارك وغيره.

والحكم في هذه الحال لمن زاد حسب القواعد الحديثية. وقد نصّ البخاري وغيره أنّ زيادة الثقة مقبولة.

فليس كلّ تفرد يُعلّ به الحديث، فإن ذكر التفرد قد يكون من الإخبار دون الإعلال. مثل بيان الاختلاف على الراوي كما يفعله كثيرًا النسائي في كتابه"الكبرى"، و"المجتبى"، والدارقطني في"العلل" لأنّ أغلب السنن رويت من أوجه كثيرة، ودور المحدّث الفقيه هو اختيار ما صح منها كما فعل الإمام البخاري انتقى صحيحه من ستمائة ألف حديث وجلس فيه أكثر من خمس عشرة سنة، فليس كلُّ ما اختاره في"صحيحه" يعلّ بالأسانيد التي تركها.

وذكره النوويُّ فقال:"الحديث صحيح الإسناد على شرط البخاري ومسلم، ولا يقدح فيه تفرُّد معمر، فإنَّه ثقة حافظ، فزيادته مقبولة". انظر:"الخلاصة" (2567، 2568).

قلت: وأقرَّه الزيلعيّ بعد أن نقل قوله هذا. انظر:"نصب الراية" (2/ 186).
وأما ما رُوي عن عمران بن حُصين قال: غزوتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وشهدتُ معه الفتح، فأقام بمكة ثماني عشرة ليلة لا يصلي إلا ركعتين، ويقول:"يا أهل البلد! صلوا أربعًا، فإنا قوم سَفْرٌ" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (1229)، والترمذي (545) كلاهما من طريق علي بن زيد بن جُدْعان، عن أبي نضرة، عن عمران بن حصين فذكره واللفظ لأبي داود. ولفظ الترمذي: سئل عمران بن حُصين عن صلاة المسافر. فقال: حججتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلَّى ركعتين، وحججت مع أبي بكر فصلَّى ركعتين، ومع عمر فصلَّى ركعتين، ومع عثمان ست سنين من خلافته، أو ثماني سنين فصلَّى ركعتين. قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: بل هو ضعيف، لأنَّ فيه علي بن زيد بن جُدْعان تكلَّم فيه أحمد وأبو زرعة، وأبو حاتم والنسائي والجوزجاني وغيرهم.

قال المنذري في مختصر أبي داود:"في إسناده علي بن زيد بن جُدْعان، وقد تكلم فيه جماعة من الأئمَّة. وقال بعضهم: هو حديث لا تقوم به حجة لكثرة اضطرابه".

قلت: ورواه الإمام أحمد (19865) من الطريق نفسه وزاد فيه:"إلا المغرب"، كما أنَّ سياقه أطول من هذا، فإنَّه جمع فيه بين الغزوة والحج والعمرة.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবূকে বিশ দিন অবস্থান করেছিলেন এবং তিনি সালাত ক্বসর (সংক্ষেপ) করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2777)


2777 - عن موسى بن سلمةَ الهُذَليِّ قال: سألت ابن عبَّاسٍ: كيف أصلِّي إذا كنت بمكة إذا لم أصلِّ مع الإمام؟ فقال: ركعتين سنة أبي القاسم صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (688) من طرق عن محمد بن جعفر، قال: حدثنا شعبة قال: سمعتُ قتادة يحدِّث عن موسى بن سلمة الهُذَلي فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মূসা ইবনু সালামাহ আল-হুযালী বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আমি মক্কায় থাকলে যদি ইমামের সাথে সালাত আদায় না করি, তবে কীভাবে সালাত আদায় করব? তিনি বললেন: দুই রাকাআত। এটাই আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত।









আল-জামি` আল-কামিল (2778)


2778 - عن عبد الرحمن بن يزيد يقول: صلَّى بنا عثمان بمنىً أربع ركعات، فقيل ذلك لعبد الله بن مسعود فاسترجع ثم قال: صليت مع رسول الله - صلى الله عليه - وسلم بمنًى ركعتين، وصليت مع أبي بكر بمنًى ركعتين، وصليت مع عمر بمنًى ركعتين، فليت حَظِّي من أربع ركعات ركعتان متقبَّلتان.

متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1084)، ومسلم في صلاة المسافرين (695) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا عبد الواحد، عن الأعمش، قال: حدَّثنا إبراهيم، قال: سمعت عبد الرحمن بن يزيد فذكره.

انظر تأويلات عثمان في إتمام الصلاة في مِنًى في أول جموع صلاة المسافر.




আব্দুর রহমান ইবনে ইয়াযীদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিনায় আমাদের নিয়ে চার রাকাত সালাত আদায় করলেন। এরপর বিষয়টি আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জানানো হলে তিনি 'ইন্না লিল্লাহ' পড়লেন (আক্ষেপ করলেন)। এরপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনায় দু’রাকাত সালাত আদায় করেছি, এবং আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মিনায় দু’রাকাত সালাত আদায় করেছি, আর আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও মিনায় দু’রাকাত সালাত আদায় করেছি। সুতরাং চার রাকাতের মধ্যে যদি আমার দু’রাকাত (সালাত) কবুল হয়, তবে সেটাই আমার জন্য যথেষ্ট।









আল-জামি` আল-কামিল (2779)


2779 - عن وعن ابن عمر قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنًى ركعتين. وأبو بكر بعده. وعمر بعد أبي بكر، وعثمان صدرًا من خلافته، ثم إنَّ عثمان صلى بعدُ أربعًا. فكان ابن عمر إذا صلَّى مع الإمام صلَّى أربعًا، وإذا صلَّاها وحده صلَّى ركعتين.

متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1082)، ومسلم في صلاة المسافرين (694/ 17) كلاهما من حديث عبد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكر الحديث، واللفظ لمسلم، وفي رواية عند مسلم من طريق حفص بن عاصم، عن ابن عمر، قال: صلَّى النبي صلى الله عليه وسلم بمنًى صلاة المسافر، وأبو بكر وعمر، وعثمان ثماني سنين، أو قال: ست سنين.

قال حفص:"وكان ابن عمر يُصلِّي بمنًى ركعتين، ثم يأتي فراشه. فقلت: أي عَمِّ! لو صلَّيت بعدها ركعتين. قال: لو فعلت لأتممتُ.

قال مسلم: حارثة بن وهب الخزاعي، هو: أخو عبيد الله بن عمر بن الخطاب لأمه.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মিনায় দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। তাঁর পরে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর খিলাফতের প্রথম দিকেও (দুই রাকাত) সালাত আদায় করেন। এরপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (মিনায়) চার রাকাত সালাত আদায় করেন। (এই কারণে) ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ইমামের সাথে সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি চার রাকাত সালাত আদায় করতেন, আর যখন তিনি একাকী সালাত আদায় করতেন, তখন দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।

(এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। হাদীসটি বুখারী ‘সালাত কসর’ অধ্যায়ে (১০৮২) এবং মুসলিম ‘মুসাফিরদের সালাত’ অধ্যায়ে (৬৯৪/১৭) নাফি’ হতে, তিনি ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। আর হাদীসের শব্দগুলো মুসলিমের।)

মুসলিমের এক বর্ণনায় হাফস ইবনু আসিম, ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মিনায় মুসাফিরের সালাত (কসর) আদায় করেছেন। আর আবূ বাকর, উমর ও উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও আট বছর—অথবা তিনি বলেছেন: ছয় বছর—(কসর সালাত আদায় করেছেন)।

হাফস বলেন: ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিনায় দুই রাকাত সালাত আদায় করে নিজের বিছানায় চলে যেতেন। আমি বললাম: হে চাচা! আপনি যদি এর পরে আরও দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন (তাহলে ভালো হতো)। তিনি বললেন: যদি আমি তা করতাম, তবে আমি (সালাত) পূর্ণ করে ফেলতাম।

মুসলিম বলেন: হারিসাহ ইবনু ওয়াহব আল-খুযা’ঈ হলেন উবায়দুল্লাহ ইবনু উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বৈমাত্রেয় ভাই।









আল-জামি` আল-কামিল (2780)


2780 - عن أبي إسحاق قال: سمعتُ حارثة بن وهب يقول: صلى بنا النبي صلى الله عليه وسلم آمَنَ مَا كَان - بِمِنًى ركعتين.

متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1083) من حديث شعبة، أنبأنا أبو إسحاق، قال سمعت حارثة بن وهب فذكره.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (696) من حديث أبي الأحوص، عن أبي إسحاق به ولفظه:"صلَّيتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنى - آمنَ ما كان الناسُ وأكَثَره - ركعتين".




হারিছা ইবনু ওয়াহব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে মিনায় দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন, যখন আমরা সর্বাধিক নিরাপদে ছিলাম।