আল-জামি` আল-কামিল
2788 - عن عبد الله بن مسعود قال: ما رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى صلاة لغير ميقاتها، إلَّا صلاتين، جمع بين المغرب والعشاء، وصلى الفجر قبل ميقاتها. وفي رواية: وذلك
بجمع - أي المزدلفة.
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1682)، ومسلم في الحج (1289) كلاهما من طريق الأعمش قال: حدثني عُمارة، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن عبد الله بن مسعود فذكره. والرواية الثانية ذكرها مسلم.
قال الشوكاني في"النيل" (2/ 491):"فنفى ابن مسعود مطلق الجمع، وحصره في جمع"المزدلفة" مع أنه ممن روى حديث الجمع بالمدينة كما تقدم، وهو يدل على أن الجمع الواقع بالمدينة صوري، ولو كان جمعًا حقيقيًّا لتعارض روايتان، والجمع ما أمكن المصير إليه هو الواجب".
قلت: فيه من الملاحظات: الأولى: حديث ابن مسعود ضعيف.
أخرجه الطبراني في"الأوسط""مجمع البحرين" (938) عن علي، ثنا الحسين بن ميسرة الرازي، ثنا عبد الله بن عبد القدوس، عن الأعمش، عن عبد الرحمن بن ثَروَان، عن زاذان، عن عبد الله بن مسعود قال: جمع رسول الله صلى الله عليه وسلم بين الأولى والعصر، والمغرب والعشاء، فقيل له في ذلك فقال:"صنعت هذا لكي لا تحرج أمتي".
قال الطبراني:"لم يرو عن الأعمش إلا عبد الله، ولا عنه إلا الحسين".
وتابعه أحمد بن حاتم، ومن طرقه أخرجه في"الكبير" (10/ 269) ثنا عبد الله بن عبد القدوس به فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 161):"وفيه عبد الله بن عبد القدوس ضعَّفه ابن معين والنسائي، وثَّقه ابن حبان، وقال البخاري: صدوق إلَّا أنَّه يروي عن أقوام ضعفاء، قلت: وقد روي هذا عن الأعمش، وهو ثقة" انتهى.
قلت: وضعَّفه أيضًا أبو داود والدارقطني. وقال عبد الله بن أحمد:"سألت ابن معين عنه فقال: ليس بشيء رافضي خبيث. فمثله لا يلتفت إلى حديثه وأما قول الحافظ في التقريب"صدوق رمي بالرفض وكان أيضًا يخطئ" من حقه أن يطلق عليه لفظ"ضعيف".
والثانية: ونفي ابن مسعود الجمع لا يدل على عدم ثبوته، وقد شهد بذلك أبو هريرة.
والثالثة: حمله على الجمع الصوري فيه حرج ومشقة، والنبي صلى الله عليه وسلم أراد رفع الحرج عن أُمَّته. والله تعالى أعلم.
وأما بقية الأحاديث في الصلاة بالمزدلفة فانظر في كتاب الحج.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর নির্ধারিত সময় ব্যতীত অন্য কোনো সময়ে সালাত আদায় করতে দেখিনি, তবে দুটি সালাত ছাড়া। (সেগুলো হলো) তিনি মাগরিব ও এশার সালাত একত্রে আদায় করেছিলেন এবং ফজর সালাত আদায় করেছিলেন তার নির্ধারিত সময়ের আগে। অন্য এক বর্ণনায় আছে: আর এটা ছিল জাম’ (অর্থাৎ মুযদালিফায়)।
2789 - عن أنس بن مالك يقول: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا نزل منزلًا لم يرتحل حتى يُصلي الظهر. فقال له رجل: وإن كان بنصف النهار؟ قال: وإن كان بنصف النهار.
حسن: رواه أبو داود (1205)، والنسائي (498) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن شعبة قال: حدثني حمزة العائذي قال: سمعت أنس بن مالك فذكره.
وإسناده حسن لأجل حمزة العائذي وهو: ابن عمرو الضَبّي البصري وثَّقه النسائي، وقال أبو حاتم: شيخ. وهو من رجال مسلم، وبقية رجاله ثقات.
وصححه ابن خزيمة (975)، ورواه الإمام أحمد (12204) كلاهما من حديث شعبة به مثله.
وجاء الحديث من وجه آخر عن أنس بن مالك قال: كنَّا إذا كنَّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في السفر فقلنا: زالت الشمس أو لم تزُل صلَّى الظهر ثم ارتحل.
رواه أبو داود (1204) عن مسدد، حدّثنا أبو معاوية عن المِسْحاج بن موسى، قال: قلت لأنس بن مالك: حدِّثنا ما سمعتَ مِن رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (1200) عن أبي معاوية به مثله.
وإسناده حسن لأجل المسحاج بن موسى وثَّقه ابن معين وأبو داود. وقال أبو زرعة: لا بأس به.
والحديث الأول يفسِّر معنى الحديث الثاني في قوله: زالت الشمس أو لم تزل، يعني به تعجيل الظهر عن وقتها المعتاد، بحيث إنَّ بعض الناس لم يظهر لهم زوال الشمس لا قبل وقتها كما فهم ابن حبان فحكم على الحديث بأنه منكر، وقال في مسحاج بن موسى: لا يجوز الاحتجاج به، وبناء عليه أدخله في"المجروحين"
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো স্থানে অবস্থান করতেন, তখন যুহরের সালাত আদায় না করা পর্যন্ত সেখান থেকে রওয়ানা হতেন না। এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করল: এমনকি যদি দিনের মধ্যভাগেও হয় (অর্থাৎ সূর্য ঠিক মাথার উপর থাকে)? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এমনকি দিনের মধ্যভাগেও যদি হয়।
2790 - عن عيسى بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب، عن أبيه، قال: صحبتُ ابن عمر في طريق مكة، قال: فصلَّى لنا الظهر ركعتين، ثم أَقبل وأَقبلنا معه حتى جاء رحلَه (أي منزلَه) وجلس وجلسنا معه. فحانت منه التِفاتةٌ نحوَ حيث صلَّى. فرأى ناسًا قيامًا. فقال: ما يصنع هؤلاء؟ قلت: يُسبِّحون. قال: لو كنتُ مسبِّحًا لأتممتُ صلاتي. يا ابن أخي! إني صَحِبتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم في السفر. فلم يزد على ركعتين حتَّى قبضه الله، وصَحِبتُ أبا بكر فلم يزد على ركعتين حتَّى قبضه الله، وصَحِبتُ عمر فلم يزد على ركعتين حتَّى قبضه الله. ثم صَحِبتُ عثمان فلم يزد على ركعتين حتَّى قبضه الله. وقد قال الله: {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} [سورة الأحزاب: 21].
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1102)، ومسلم في صلاة المسافرين (689) كلاهما من حديث عيسى بن حفص به، {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري مختصرًا ومجملًا.
ورويا أيضًا من حديث عمر بن محمد، عن حفص بن عاصم قال: مرضتُ مرضًا. فجاء ابن عمر يعودُني. قال: وسأله عن السُبحة في السفر فقال: صَحِبتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فما رأيتُه يُسَبِّح، ولو كنتُ مسبحًا لأتممت. وقد قال الله تعالى: واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري مختصرًا.
وعمر بن محمد هو: ابن زيد بن عبد الله بن عمر.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাবী] বলেন: আমি মক্কা যাওয়ার পথে ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গী হয়েছিলাম। তিনি আমাদের সাথে যুহরের সালাত দুই রাকাত আদায় করলেন। এরপর তিনি ফিরে আসলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে ফিরে আসলাম। এমনকি তিনি তাঁর বিশ্রামের জায়গায় আসলেন এবং বসলেন, আমরাও তাঁর সাথে বসলাম। হঠাৎ তিনি যেদিকে সালাত আদায় করেছিলেন, সেদিকে তাকালেন এবং কিছু লোককে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: এরা কী করছে? আমি বললাম: তারা নফল সালাত (সুন্নাত) আদায় করছে। তিনি বললেন: আমি যদি নফল সালাত আদায়কারী হতাম, তবে আমার ফরয সালাতকে পূর্ণ (চার রাকাত) করে নিতাম। হে আমার ভাতিজা! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সফরে ছিলাম। আল্লাহ তাঁকে উঠিয়ে নেওয়ার (মৃত্যু দেওয়ার) আগ পর্যন্ত তিনি দুই রাকাতের বেশি আদায় করেননি। আমি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এরও সঙ্গী হয়েছিলাম, আল্লাহ তাঁকে উঠিয়ে নেওয়ার আগ পর্যন্ত তিনিও দুই রাকাতের বেশি আদায় করেননি। আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এরও সঙ্গী হয়েছিলাম, আল্লাহ তাঁকে উঠিয়ে নেওয়ার আগ পর্যন্ত তিনিও দুই রাকাতের বেশি আদায় করেননি। অতঃপর আমি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এরও সঙ্গী হয়েছিলাম, আল্লাহ তাঁকে উঠিয়ে নেওয়ার আগ পর্যন্ত তিনিও দুই রাকাতের বেশি আদায় করেননি। আর আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের জন্য আল্লাহর রাসূলের মধ্যে রয়েছে উত্তম আদর্শ।" [সূরা আল-আহযাব: ২১]
2791 - عن عثمان بن عبد الله بن سراقة قال: كنا في سفر، ومعنا ابن عمر فسألته فقال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يسبح في الصلاة في السفر قبل الصلاة ولا بعدها.
صحيح: رواه الإمام أحمد (5012) عن يزيد بن هارون قال: أخبرنا ابن أبي ذئب، عن عثمان بن عبد الله بن سراقة، فذكر الحديث، وإسناده صحيح.
ومراده بالتسبيح هنا السنة الراتبة، وإلَّا فقد صحَّ عنه أنَّه كان يُسبِّح على ظهر دابته حيث كان وجهه.
قال الشافعي: وقد ثبت عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يتنفل ليلا وهو يَقْصر.
وسئل الإمام أحمد عن التطوع في السفر فقال: أرجو أن لا يكون بالتطوع في السفر بأس.
وأمَّا ما روي عن البراء بن عازب الأنصاري قال: صَحِبتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمانية عشر سفرًا، فما رأيتُه ترك ركعتين إذا زاغتِ الشمس قبل الظهر.
فهو حديث ضعيف. رواه أبو داود (1222)، والترمذي (550) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن صفوان بن سُليم، عن أبي بُسرة الغفاري، عن البراء بن عازب فذكره.
قال الترمذي: هذا حديث غريب، قال: وسألت محمدًا - يعني البخاري - عنه فلم يعرفه إلا من حديث الليث بن سعد، ولم يعرف اسم أبي بُسرة، ورآه حسنًا".
قلت: أبو بُسرة - بضم الباء وسكون السين - لا يعرف كما قال الذّهبي.
ولم يوثقه غير ابن حبان فهو مجهول.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (উসমান ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু সুরাকাহ বলেন,) আমরা এক সফরে ছিলাম এবং ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও আমাদের সাথে ছিলেন। আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি সফরে (ফরয) সালাতের পূর্বে বা পরে কোনো নফল (সুন্নাত) সালাত আদায় করতেন না।
2792 - عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه قال: رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي على راحلته حيث توجهتْ به.
وفي رواية: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على راحلته يُسَبِّح، يومئْ برأسه قِبل أيِّ وجه توجَّه، ولم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع ذلك في الصلاة المكتوبة.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1093، 1097، 1104) واللفظ له، ومسلم في صلاة المسافرين (701) كلاهما من حديث الزّهريّ، عن عبد الله بن عامر بن ربيعه به.
আমির ইবন রাবী'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর সওয়ারীর উপর সালাত আদায় করতে দেখেছি, সওয়ারী তাঁকে যেদিকে নিয়ে যাচ্ছিল।
অন্য বর্ণনায় আছে: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর সওয়ারীর উপর তাসবীহ (নফল সালাত) আদায় করতে দেখেছি। তিনি যেদিকেই মুখ করে থাকতেন, সেদিকেই মাথা দ্বারা ইশারা করতেন। তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফরয সালাতের ক্ষেত্রে এরূপ করতেন না।
2793 - عن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُسَبِّح على الراحلة قبل أيِّ وجه توجه، ويُوتر عليها، غير أنَّه لا يُصلِّي عليها المكتوبة.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (700/ 39) من حديث ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه فذكره.
وعلَّقه البخاري في تقصير الصلاة (1089) فقال: وقال الليث، حدثني يونس به وفيه، قال سالم: كان عبد الله يُصلِّي على دابته من اللَّيل وهو مسافر، ما يُبالي حيث ما كان وجهه. قال عبد الله: فذكره.
فقول البخاري: وقال اللَّيث يحتمل أن يكون مُعلَّقًا، ويحتمل أن يكون عطفًا على ما سبق من الإسناد على يحيى بن بكير، قال: حدّثنا الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، عن عبد الله بن عامر بن ربيعة عن ربيعة الذي سبق في أوَّل الباب.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সওয়ারীর উপর বসে নফল সালাত আদায় করতেন, সওয়ারী যেদিকেই মুখ করে থাকুক না কেন। এবং তিনি এর উপরে বসে বিতরও পড়তেন। তবে তিনি এর উপরে ফরয (মাকতূবাহ) সালাত আদায় করতেন না।
2794 - عن جابر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي على راحلته حيث تَوجَّهَتْ، فإذا أراد الفريضة نزل فاستقبل القبلة.
صحيح: رواه البخاري في كتاب الصلاة (400) عن مسلم بن إبراهيم، حدّثنا هشام (الدستوائي) قال: حدّثنا يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن، عن جابر فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সওয়ারীর উপর সালাত আদায় করতেন, সওয়ারী যেদিকেই মুখ করত সেদিকেই। তবে যখন তিনি ফরয সালাত আদায় করার ইচ্ছা করতেন, তখন (সওয়ারী থেকে) নেমে কিবলামুখী হতেন।
2795 - عن عطاء بن أبي رباح أنَّه سأل عائشة: هل رُخِّص للنساء أن يُصلين على الدواب؟ قالت: لم يُرخص له في ذلك في شِدَّة، ولا رخاء.
قال محمد (وهو ابن شعيب): هذا في المكتوبة
حسن: رواه أبو داود (1228) عن محمود بن خالد، حدّثنا محمد بن شُعيب، عن النعمان بن المنذر، عن عطاء بن أبي رباح، فذكره.
ورجاله ثقات غير النعمان بن المنذر وهو الغاني أبو الوزير الدمشقي، فقد تكلم فيه النسائي فقال: ليس بذاك القوى.
وذكره ابن حبان في الثقات (7/ 530) وقال ابن سعد: كان كثير الحديث.
ونقل المنذري في مختصر أبي داود عن الدارقطني قال: تفرد به النعمان بن المنذر، عن سليمان بن موسى، عن عطاء، هذا آخر كلامه. وقال هو: النعمان بن المنذر - هذا - غسَّاني دمشقي ثقة، كنيته أبو الوزير. انتهى.
والملاحَظُ أنه لا يوجد في سنن أبي داود سليمان بن موسى فتأكد من صحة كلام الدارقطني.
ورُوي عن عمرو بن عثمان بن علي بن مُرَّة، عن أبيه، عن جدِّه أنَّهم كانوا مع النبي صلى الله عليه وسلم في سيرٍ، فانتهَوْا إلى مضيق، وحضرتِ الصلاةُ فمُطِروا السماءُ من فوقهم، والبِلَّةُ من أسفَلَ مِنهم، فأذَّن رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على راحلته، وأقام، فتقدم على راحلته فصلَّى بهمُ يومئُ إيماءً. يجعل السجودَ أخْفضَ من الركوع.
رواه الترمذي (411) عن يحيى بن موسى، حدثنا شبابةُ بن سوَّار، حدّثنا عمر بن الرماح البلخي، عن كثير بن زياد، عن عمرو بن عثمان بن علي به فذكره.
قال الترمذي: غريب تفرَّد به عمر بن الرماح، وهو لا يُعرف إلَّا من حديثه. وقد روى عنه غير واحد من أهل العلم، وكذلك روي عن أنس بن مالك أنَّه صلَّى في ماء وطين على دابَّتِه. والعمل على هذا عند أهل العلم، وبه يقول أحمد وإسحاق" انتهى.
وهذا الحديث رواه أيضًا أحمد (17573)، والبيهقي (2/ 7) كلاهما من طريق عمر بن ميمون بن الرماح به مثله، وقال البيهقي:"في إسناده ضَعْف، ولم يثبت من عدالة بعض رواته ما يوجب قبول خبره، ويحتمل أن يكون ذلك في شدَّة الخوف" انتهى.
قلت: لعله يقصد عمرو بن عثمان وأبوه عثمان بن يعلى بن مُرَّة فإنَّهما لا يعرفان قال الحافظ في"التقريب":"عمرو بن عثمان بن يعلى بن مُرَّة الثقفي"مستور" وقال عن أبيه: عثمان بن يعلى بن مُرَّة"مجهول".
وما قاله الهيثمي في"المجمع" (2/ 161): رواه أبو داود من حديث يعلى بن مُرَّة … فهو سَبْقٌ قلمٍ، وإنَّما الذي رواه هو الترمذي، وهو القائل:"غريب تفرَّد به عمر بن الرماح".
ثم قوله: رجاله موثقون، أي وثَّقهم ابن حبان، وإلَّا ففيهم من المجاهيل كما سبق، وابن حبان عرف بتوثيق المجاهيل واعتمد عليه الهيثمي في توثيقهم.
وأما قول الترمذي: وكذلك رُوي عن أنس بن مالك أنَّه صلَّى في ماء وطين على دابَّته، فهو ممَّا رواه الطبراني في"الكبير" عن ابن سيرين قال: أقبلنا على أنس بن مالك من الكوفة حتَّى إذا كُنَّا بِأطيط أصبحنا والأرض طين وماء، فصلَّى المكتوبة على دابَّةٍ، ثمَّ قال: ما صلَّيت المكتوبة قط على دابَّتي قبل اليوم.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 162):"رجاله ثقات".
আতা ইবনু আবী রাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন: মহিলাদের জন্য কি আরোহী পশুর পিঠে সালাত আদায় করার অনুমতি আছে? তিনি বললেন: তীব্র কষ্ট বা স্বাচ্ছন্দ্য—কোন অবস্থাতেই তাদের জন্য এর অনুমতি দেওয়া হয়নি।
মুহাম্মদ (ইবনু শুআইব) বলেন: এটি ফরয (মাকতূবাহ) সালাতের ক্ষেত্রে প্রযোজ্য।
হাসান: আবূ দাঊদ (১২২৮) এটি মাহমুদ ইবনু খালিদ সূত্রে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু শুআইব থেকে, তিনি নু‘মান ইবনুল মুনযির থেকে, তিনি আতা ইবনু আবী রাবাহ থেকে বর্ণনা করেছেন।
এর বর্ণনাকারীগণ সবাই নির্ভরযোগ্য, নু‘মান ইবনুল মুনযির (যিনি আল-গাস্সানী আবুল ওয়াযীর আদ-দিমাশকী) ছাড়া। তার সম্পর্কে ইমাম নাসাঈ কথা বলেছেন এবং বলেছেন: তিনি তেমন শক্তিশালী নন। ইবনু হিব্বান তাকে সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী) গ্রন্থে (৭/৫৩০) উল্লেখ করেছেন এবং ইবনু সা'দ বলেছেন: তিনি অধিক হাদীস বর্ণনা করতেন। মুনযিরী আবূ দাঊদের মুখতাসার গ্রন্থে দারাকুতনী থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি (দারাকুতনী) বলেছেন: নু‘মান ইবনুল মুনযির এটি সুলাইমান ইবনু মূসা থেকে, তিনি আতা থেকে এককভাবে বর্ণনা করেছেন—এই পর্যন্ত দারাকুতনীর বক্তব্য শেষ। আর মুনযিরী নিজেই বলেছেন: এই নু‘মান ইবনুল মুনযির গাস্সানী দিমাশকী এবং সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য), তার কুনিয়াত হলো আবুল ওয়াযীর। শেষ হলো।
তবে লক্ষ্যণীয় যে, সুনান আবূ দাঊদ গ্রন্থে সুলাইমান ইবনু মূসা (নামক রাবী) নেই। সুতরাং দারাকুতনীর কথার যথার্থতা যাচাই করা দরকার।
এবং আমর ইবনু উসমান ইবনু আলী ইবনু মুররাহ থেকে বর্ণিত, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি তার দাদা থেকে বর্ণনা করেন যে, তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলেন। তারা একটি সংকীর্ণ স্থানে এসে পৌঁছলেন এবং সালাতের সময় উপস্থিত হলো। তাদের ওপর থেকে আকাশ বৃষ্টি বর্ষণ করছিল এবং নীচের অংশে ছিল কাদা। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সওয়ারীর পিঠে থাকা অবস্থাতেই আযান দিলেন এবং ইক্বামত দিলেন। এরপর তিনি সওয়ারীর পিঠে থাকা অবস্থাতেই এগিয়ে গেলেন এবং ইশারা করে তাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। তিনি সিজদাকে রুকূর চেয়ে নিচু করতেন।
তিরমিযী (৪১১) এটি ইয়াহ্ইয়া ইবনু মূসা সূত্রে, তিনি শাবাবাহ ইবনু সাওয়্যার থেকে, তিনি উমার ইবনু রুম্মাহ আল-বালখী থেকে, তিনি কাসীর ইবনু যিয়াদ থেকে, তিনি আমর ইবনু উসমান ইবনু আলী থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
ইমাম তিরমিযী বলেন: এটি গরীব (বিরল) হাদীস। উমার ইবনু রুম্মাহ এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন এবং তার থেকে ব্যতীত এই হাদীসটি পরিচিত নয়। তবে তার থেকে আহলে ইলমের একাধিক ব্যক্তি বর্ণনা করেছেন। অনুরূপভাবে, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত আছে যে, তিনি কাদা ও পানির মধ্যে তার আরোহী পশুর পিঠে সালাত আদায় করেছেন। আহলে ইলমদের নিকট এই হাদীসটির উপরই আমল রয়েছে। আহমাদ ও ইসহাক (রাহিমাহুল্লাহ) এই মতই পোষণ করেন।
এই হাদীসটি আহমাদ (১৭৫৭৩) এবং বায়হাক্বীও (২/৭) বর্ণনা করেছেন। তারা উভয়েই উমার ইবনু মাইমূন ইবনু রুম্মাহ-এর সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। বায়হাক্বী বলেন: "এর ইসনাদে দুর্বলতা রয়েছে এবং এর কিছু রাবীর ন্যায়পরায়ণতা প্রমাণিত হয়নি যা তাদের খবর গ্রহণের জন্য আবশ্যক করে তোলে। এটি প্রবল ভয়ের মুহূর্তে (শাফাখাওফ) হতে পারে।" শেষ হলো।
আমি (গ্রন্থকার) বলি: সম্ভবত তিনি আমর ইবনু উসমান এবং তার পিতা উসমান ইবনু ইয়া'লা ইবনু মুররাহ-কে উদ্দেশ্য করেছেন। কেননা তারা অপরিচিত। হাফিয ইবনু হাজার তাক্বরীব গ্রন্থে আমর ইবনু উসমান ইবনু ইয়া'লা ইবনু মুররাহ আস-সাক্বাফীকে ‘মাস্তূর’ (যার অবস্থা অজ্ঞাত) বলেছেন এবং তার পিতা উসমান ইবনু ইয়া'লা ইবনু মুররাহ সম্পর্কে বলেছেন, তিনি ‘মাজহূল’ (অপরিচিত)।
হাইসামী মাজমা‘ (২/১৬১)-এ যা বলেছেন যে, আবূ দাঊদ এটি ইয়া'লা ইবনু মুররাহ-এর হাদীস হিসেবে বর্ণনা করেছেন... তা মূলত কলমের ভুল (সাবক্বে ক্বালাম)। কারণ এটি মূলত তিরমিযী বর্ণনা করেছেন, এবং তিনিই বলেছেন: "এটি গরীব (বিরল) হাদীস, যা উমার ইবনু রুম্মাহ এককভাবে বর্ণনা করেছেন।"
এরপর তার (হাইসামীর) বক্তব্য যে, এর বর্ণনাকারীগণ মুওয়াসসাক্ব (নির্ভরযোগ্য), অর্থাৎ ইবনু হিব্বান তাদের নির্ভরযোগ্য বলেছেন। অন্যথায়, এতে এমন রাবীও আছেন যারা মাজহূল (অপরিচিত), যেমনটি আগে উল্লেখ করা হয়েছে। আর ইবনু হিব্বান মাজহূল রাবীদের নির্ভরযোগ্য বলার জন্য পরিচিত, এবং হাইসামী তাদের নির্ভরযোগ্যতা প্রমাণের জন্য তার উপর নির্ভর করেছেন।
আর তিরমিযীর বক্তব্য: "অনুরূপভাবে, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত আছে যে, তিনি কাদা ও পানির মধ্যে তার আরোহী পশুর পিঠে সালাত আদায় করেছেন"—এটি তা, যা তাবারানী আল-কাবীর গ্রন্থে ইবনু সীরীন থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমরা কূফা থেকে আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে যাচ্ছিলাম। যখন আমরা আত্বীত্ব নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন ভোর হলো এবং জমিন কাদা ও পানিতে ভর্তি ছিল। তিনি তার সওয়ারীর পিঠে ফরয সালাত আদায় করলেন, এরপর বললেন: আজকের দিনের আগে আমি কখনো সওয়ারীর পিঠে ফরয সালাত আদায় করিনি।
হাইসামী মাজমা‘ (২/১৬২)-এ বলেছেন: "এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য।"
2796 - عن عبد الله بن دينار قال: كان عبد الله بن عمر يُصَلِّي في السفر على راحلته أينما توجَّهت يومئُ، وذكر عبد الله أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يفعله.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1096) عن موسى بن إسماعيل، عن عبد العزيز بن مسلم، قال: حدّثنا عبد الله بن دينار فذكره.
ورواه مالك في قصر الصلاة (26) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلِّي على راحلته في السفر حيث توجهتْ به.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (700/ 27) عن يحيى بن يحيى قال: قرأتُ على مالك بن أنس فذكره، فلم يذكر مالك في حديثه الإيماء فهل هما حديثان، أو حديث واحد إلا أن عبد الله بن دينار مرة ذكر الاسماء، ومرة أخرى لم يذكره، فكل روى بما سمع منه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি সফরে তাঁর বাহনের উপর সওয়ার থাকা অবস্থায় সালাত আদায় করতেন, বাহন যেদিকেই মুখ করত, তিনি ইঙ্গিতে (রুকু ও সিজদা) করতেন। এবং আব্দুল্লাহ (ইবনে উমর) উল্লেখ করেন যে, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামও এরূপ করতেন।
2797 - عن عبد الله بن عمر أنَّه قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي وهو على حمار، وهو متوجِّه إلى خيبر.
صحيح: رواه مالك في قصر الصلاة (25) عن عمرو بن يحيى المازني، عن أبي الحُباب سعيد بن يسار، عن عبد الله بن عمر فذكره.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (700/ 35) عن يحيى بن يحيى النيسابوري، قال: قرات على مالك به مثله.
هذا الحديث مما ذكره الدارقطني في التتبع (ص 390) وقال بعد أن ذكر حديث مسلم من طريق عمرو بن يحيى المازني:"وخالفه أبو بكر بن عمر، عن أبي الحباب، فقال: على البعير، وكذلك قال جابر وغيره عن النبي صلى الله عليه وسلم وأخرجهما، ولم يخرج البخاري حديث عمرو بن يحيى، وأخرج الآخر، ومن روى أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى على حمارٍ فهو وهم، والصواب من فعل أنس" انتهى.
وكذلك قال النسائي وغيره: بأن عمرو بن يحيى المازني وهم في ذكر الحمار في هذا الحديث، الأن سفر خيبر طويل ولا يتصور قطع هذه المسافات على الحمار.
وقال غيره:"عمرو بن يحيى المازني ثقة، وثقه أبو حاتم، والنسائي، وقال ابن عدي، عمرو بن يحيى المازني روى عنه الأئمة، وهم: أيوب، وعبيد الله، والثوري، وشعبة، ومالك، وابن عيينة، وغيرهم، وهو لا بأس برواية هؤلاء الأئمة عنه".
وهذا الحديث مما روى مالك عنه، وإخراج مسلم له في صحيحه دليل على أنه لم يهم فيه، فإن الركوب على الحمار وقع في سفر النبي صلى الله عليه وسلم إلى خيبر، وركوب الراحلة في حديث أبي بكر بن عمر وقع في سفره إلى مكة، فلا منافاة بين الأمرين.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে তিনি গাধার উপর আরোহণরত অবস্থায় সালাত আদায় করছিলেন, আর তিনি খায়বারের দিকে যাচ্ছিলেন।
2798 - عن وعن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي وهو مقبل من مكة إلى المدينة على راحلته حيث كان وجههُ، قال: وفيه نزلت: {فَأَيْنَمَا تُوَلُّوا فَثَمَّ وَجْهُ اللَّهِ} [سورة البقرة: 115].
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (700/ 33) من حديث عبد الملك بن أبي سليمان، قال: حدثنا سعيد بن جبير، عن ابن عمر فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা থেকে মদীনার দিকে আসার সময় তাঁর বাহনের ওপর সালাত আদায় করতেন, তাঁর বাহন যেদিকে মুখ করে থাকত সেদিকেই। তিনি বলেন: আর এই প্রেক্ষাপটেই এই আয়াতটি নাযিল হয়েছিল: "অতএব তোমরা যেদিকেই মুখ ফেরাও, সেদিকেই আল্লাহর চেহারা (কিবলা)।" (সূরা বাকারা: ১১৫)।
2799 - عن أنس بن سيرين قال: استقبلنا أنسًا حين قَدِم من الشام، فتلقيناه بعين التمر، فرأيتُه يُصَلِّي على حمار ووجهه من ذا الجانب - يعني عن يسار القبلة - فقلت: رأيتك تُصَلِّي لغير القبلة، فقال: لولا أني رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فعله لم أفعله.
متفق عليه: رواه البخاري في تقصير الصلاة (1100)، ومسلم في صلاة المسافرين (702) كلاهما من حديث همام، حدّثنا أنس بن سيرين فذكره واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم سواء إلَّا أنَّه
قال فيه:"حين قدم الشامَ".
قال النووي:"هكذا هو في جميع نسخ مسلم، وكذا نقله القاضي عياض عن جميع الروايات لصحيح مسلم. قال: وقيل إنه وهم، وصوابه: قدم من الشام كما جاء في صحيح البخاري، لأنهم خرجوا من البصرة للقائه حين قدم من الشام.
وقال: رواية مسلم صحيحة، ومعناه: تلقيناه في رجوعه حين قدم الشام، وإنَّما حذف ذكر رجوعه للعلم به. انتهى.
لم يبيِّن في هذه الرواية كيفية صلاة أنس، وذكره مالك في قصر الصلاة (26) عن يحيى بن سعيد قال: رأيتُ أنس بن مالك في السفر وهو يُصَلِّي على حمار، وهو متوجِّه إلى غير القبلة، يركع ويسجد إيماءً من غير أن يضع وجْهَه على شيء.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনাস ইবনু সীরীন বলেন: আমরা আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে সাক্ষাৎ করলাম যখন তিনি শাম (সিরিয়া) থেকে ফিরলেন। আমরা আইনুত-তামর নামক স্থানে তাঁর সঙ্গে মিলিত হলাম। আমি তাঁকে একটি গাধার পিঠে সালাত আদায় করতে দেখলাম এবং তাঁর মুখ ছিল ঐ দিকে—অর্থাৎ ক্বিবলার বাম দিকে। আমি বললাম: আমি আপনাকে ক্বিবলা ব্যতীত অন্য দিকে মুখ করে সালাত আদায় করতে দেখলাম। জবাবে তিনি বললেন: যদি আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এটি করতে না দেখতাম, তবে আমি তা করতাম না।
2800 - عن أنس بن مالك أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا سافر، فأراد أن يتطوع استقبل بناقته القبلة فكَّبر، ثم صلَّى حيث وجَّهه رِكابُه.
حسن: رواه أبو داود (1225) عن مسدَّد، حدثنا رِبْعيُّ بن عبد الله بن الجارود، حدثني عمرو بن أبي الحجاج، حدثني الجارود بن أبي سبرة، حدثني أنس بن مالك فذكره.
قال المنذري: إسناده حسن.
قلت: وهو كما قال فإنَّ رِبعي بن عبد الله بن الجارود، وشيخُ شيخه (جده الجارود بن أبي سبرة) صدوقان.
وأخرجه أيضًا الإمام أحمد (13109) عن يزيد بن هارون، قال: أخبرنا ربعي بن الجارود بن أبي سبرة التميمي به مثله.
فنسب رِبعي إلى جده، وهو: ابن عبد الله. إلَّا أنَّ هذا الحديث يخالف سائر الأحاديث السابقة، إذ أنَّه قيد باستقبال ناقته القبلة عند التكبير، والأحاديث السابقة أطلقت أنَّه كان يصلِّي عليها قِبَلَ أيِّ جهة توجَّهت به.
وهذا الاعتراض أبداه أيضًا الحافظ ابن القيم رحمه الله تعالى في"زاد المعاد" (1/ 476).
ويجاب على هذا بأنَّ المرَّات التي لمَّا كبَّر النبي صلى الله عليه وسلم كان متوجهًا إلى القبلة لأجل السفر، لا لأجل الصلاة. فظن أنس أنه لم يكبِّر حتَّى استقبل بناقته القبلة، ولما كبَّر في مرَّات أخرى قِبل أي جهة توجَّهت به ناقُته لم يكن أنس موجودًا في تلك الأسفار. - والله تعالى أعلم -.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সফর করতেন এবং নফল (ঐচ্ছিক) সালাত আদায় করতে চাইতেন, তখন তিনি তাঁর উটনীকে নিয়ে কিবলার দিকে মুখ করতেন এবং তাকবীর (তাকবীরে তাহরীমা) বলতেন। অতঃপর তাঁর সওয়ারী তাঁকে যেদিকে পরিচালিত করত, তিনি সেদিকেই সালাত আদায় করতেন।
2801 - عن جابر بن عبد الله قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم في حاجة، قال: فجئتُ وهو
يُصَلِّي على راحلته نحو المشرق، والسجود أخفضُ من الركوع.
حسن: رواه أبو داود (1227)، والترمذي (351) كلاهما من حديث وكيع، عن سفيان، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
ورواه ابن خزيمة (1270) وعنه ابن حبان (2523) من حديث ابن جريج قال: أخبرنا أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل أبي الزبير وهو محمد بن مسلم بن تدرس الأسدي المكي حسن الحديث.
জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে একটি প্রয়োজনে পাঠালেন। অতঃপর আমি এসে দেখলাম যে, তিনি তাঁর সওয়ারীর উপর পূর্ব দিকে মুখ করে সালাত আদায় করছেন। আর সিজদা রুকূর চেয়েও নিচু ছিল।
2802 - عن * *
২৮০২ - থেকে * *
2803 - عن الزهري قال: أخبرني سالم أنَّ عبد الله بن عمر قال: غزوت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم قِبل نجدٍ، فوازينا العدوَّ فصافَفْنا لهم، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي لنا، فقامت طائفة معه يُصلِّي، وأقبلت طائفة على العدوِّ، وركع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بمن معه، وسجد سجدتين، ثم انصرفوا مكان الطَّائفة التي لم تصلِّ، فَجَاؤا فركع رسُولُ الله صلى الله عليه وسلم بهم ركعةً، وسجَدَ سَجْدتَينِ ثم سلَّم، فقام كل واحد منهم فركع لنفسه ركعةً، وسجد سجدتين.
متفق عليه: رواه البخاري في الخوف (942) وفي المغازي (4133)، ومسلم في صلاة
المسافرين (839) كلاهما من حديث الزهري واللفظ للبخاري. ولم يذكر مسلم أنَّ ذلك كان في غزوةٍ قبل نجدٍ.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে নজদের দিকে এক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলাম। আমরা শত্রুদের মুখোমুখি হলাম এবং তাদের জন্য কাতারবন্দী হলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নিয়ে সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। তখন একদল তাঁর সাথে সালাতে দাঁড়াল এবং আরেক দল শত্রুর দিকে মুখ করে রইল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে থাকা দলটিকে নিয়ে রুকূ’ করলেন এবং দুটি সিজদা করলেন। এরপর তারা (সালাত শেষ করে) সেই দলের জায়গায় চলে গেল, যারা সালাত আদায় করেনি। অতঃপর তারা আসল (এবং সালাতে দাঁড়াল)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নিয়ে এক রাক‘আত রুকূ’ করলেন এবং দুটি সিজদা করে সালাম ফিরালেন। এরপর তাদের প্রত্যেকেই দাঁড়িয়ে নিজেদের জন্য একটি রুকূ’ (অর্থাৎ এক রাক‘আত) করল এবং দুটি সিজদা করল।
2804 - عن صالح بن خوَّات، عمَّن صلَّى مع النبي صلى الله عليه وسلم يوم ذات الرِّقاع، صلاة الخوفِ، أنَّ طائفة صفَّت معه، وطائفةٌ وُجاهَ العدو، فصلَّى بالذين معه ركعةً، ثمَّ ثبت قائمًا وأتمُّوا لأنفسهم، ثمَّ انصرفوا فصفُّوا وُجاهَ العَدُوِّ، وجاءَت الطائفة الأخرى فصَلَّي بهمُ الركعة التي بقيت، ثم ثبت جالسًا، وأتمُّوا لأَنفُسِهِمْ، ثمَّ سَلَّمَ بهم.
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الخوف (1) عن يزيد بن رومان، عن صالح بن خوَّات، عمَّن صلَّي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورواه البخاري في المغازي (4129) عن قتيبة بن سعيد، ومسلم في صلاة المسافرين (842) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.
وقوله:"عَمَّن صلَّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم" هو سهل بن أبي حثمة كما في رواية أخرى عند البخاري في المغازي (4131)، ومسلم في صلاة المسافرين (841) كلاهما من طريق شعبة عن عبد الرحمن ابن القاسم، عن أبيه، عن صالح بن خوّات بن جبير عن سهل بن أبي حَثْمة فذكره.
ورواه مالك في صلاة الخوف (2) عن يحيى بن سعيد، عن القاسم بن محمد، عن صالح بن خوَّات، أنَّ سهلَ بنَ أبي حَثْمة حدَّثه، أنَّ صلاة الخوف أن يقوم الإمام ومعه طائفة من أصحابه، وطائفة مواجهة العدوِّ، فيركع الإمام ركعة، ويسجد بالذين معه، ثم يقوم، فإذا استوى قائمًا ثبت، وأتموا لأنفسهم الركعة الباقية، ثمَّ يُسلمون وينصرفون والإمام قائم، فيكونون وجاه العدوّ، ثم يُقبل الآخرون الذين لم يُصلوا فيكبِّرون وراء الإمام، فيركع بهم الركعة ويسجد، ثم يُسلِّم، فيقومون فيركعون لأنفسهم الركعة الباقية، ثم يسلِّمون. انتهى. إلا أنه موقوف.
قال الترمذي:"لم يرفعه يحيى بن سعيد الأنصاري عن القاسم بن محمد، وهكذا روي أصحاب يحيى بن سعيد الأنصاري موقوفًا، ورفعه شعبة عن عبد الرحمن بن القاسم بن محمد".
ونقل الترمذي عن الإمام أحمد قال:"قد رُوي عن النبي صلى الله عليه وسلم صلاة الخوف على أوجه، وما أعلم في هذا الباب إلا حديثًا صحيحًا، واختار حديث سهل بن أبي حثمة" (2/ 454).
وقال مالك:"وحديث القاسم بن محمد، عن صالح بن خَوَّات أحبُّ ما سمعتُ إليَّ في صلاة الخوف".
وقال ابن عبد البر: الحديث سهل في الموطأ موقوف عند جماعة من الرواة عن مالك، ومثله لا يقال من جهة الرأي، وقد رُوي مرفوعًا مسندًا".
قلت: وهو كما قال، فإنَّه جاء في الصحيحين وغيرهما مسندًا مرفوعًا.
সালিহ ইবনু খাওওয়াত থেকে বর্ণিত, তিনি এমন একজনের থেকে বর্ণনা করেছেন যিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সঙ্গে যাতুর-রিকা’ নামক দিনে 'সালাতুল খাওফ' (ভয়ের সময়ের সালাত) আদায় করেছিলেন। একদল তাঁর সাথে কাতারবদ্ধ হলো এবং অন্য দল শত্রুর দিকে মুখ করে রইল। তিনি তাদের সাথে এক রাকাত সালাত আদায় করলেন, অতঃপর তিনি দাঁড়িয়ে রইলেন এবং তারা তাদের নিজেদের (বাকি সালাত) পূর্ণ করল। এরপর তারা ফিরে গেল এবং শত্রুর দিকে মুখ করে দাঁড়ালো। অতঃপর অন্য দলটি আসলো এবং তিনি তাদের সাথে বাকি থাকা এক রাকাত সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি বসে থাকলেন এবং তারা তাদের নিজেদের (বাকি সালাত) পূর্ণ করল, অতঃপর তিনি তাদের সাথে সালাম ফিরালেন।
2805 - عن جابر غزونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم قومًا من جُهينة، فقاتلونا قتالًا شديدًا، فلما صلينا الظهر قال المشركون: لو مِلْنا عليهم ميلةً لاقتطعناهم، فأخبر جبريل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ذلك، فذكر ذلك لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم قال وقالوا: إنَّه ستأتيهم صلاةٌ هي أحبُّ إليهم من الأولاد، فلمَّا حضرت العصر، قال: صَفَّنا صَفَّين، والمشركون بيننا وبين القبلة، قال فكَبَّرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم وكَبَّرنا، وركع فركعنا، ثُمَّ سَجَدَ وسَجَدَ معه الصَّفُّ الأول، فلما قاموا سجد الصَّف الثاني، ثم تأخَّر الصف الأول وتقدم الصف الثاني، فقاموا مقام الأول، فكبر رسول الله صلى الله عليه وسلم وكَبَّرْنا، وركع فركعنا، ثم سَجَدَ وسَجَد معه الصف الأوَّلُ، وقام الثاني، فَلَمَّا سَجَدَ الصف الثاني، ثم جلسُوا جميعًا، سَلَّم عَلَيهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم.
قال أبو الزبير: ثُمَّ خَصَّ جابرٌ أن قال: كما يُصَلِّي أمَرَاؤُكم هؤلاء.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (840/ 308) عن أحمد بن عبد الله بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا أبو الزبير، عن جابر فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জুহায়না গোত্রের বিরুদ্ধে এক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করি। তারা আমাদের সাথে কঠিনভাবে যুদ্ধ করল। যখন আমরা যুহরের সালাত আদায় করলাম, তখন মুশরিকরা বলল: যদি আমরা তাদের ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ি, তবে তাদের টুকরো টুকরো করে ফেলব। তখন জিবরীল (আঃ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে অবগত করালেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এ কথা জানালেন এবং বললেন যে মুশরিকরা বলেছে, তাদের সামনে আরও একটি সালাত আসছে, যা তাদের কাছে তাদের সন্তান-সন্ততিদের চেয়েও অধিক প্রিয়। যখন আসরের সময় হলো, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা দু’টি কাতারে সারিবদ্ধ হও। মুশরিকরা আমাদের এবং কিবলার মাঝখানে ছিল।
তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকবীর দিলেন এবং আমরাও তাকবীর দিলাম। তিনি রুকূ' করলেন এবং আমরাও রুকূ' করলাম। অতঃপর তিনি সাজদাহ করলেন এবং তাঁর সাথে প্রথম কাতারও সাজদাহ করল। যখন তারা (প্রথম কাতার) উঠে দাঁড়াল, তখন দ্বিতীয় কাতার সাজদাহ করল। এরপর প্রথম কাতার পিছিয়ে গেল এবং দ্বিতীয় কাতার এগিয়ে এসে প্রথম কাতারের স্থানে দাঁড়াল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পুনরায় তাকবীর দিলেন এবং আমরাও তাকবীর দিলাম। তিনি রুকূ' করলেন এবং আমরাও রুকূ' করলাম। অতঃপর তিনি সাজদাহ করলেন এবং তাঁর সাথে প্রথম কাতারও সাজদাহ করল। দ্বিতীয় কাতার দাঁড়িয়ে রইল। এরপর যখন দ্বিতীয় কাতার সাজদাহ করল, তখন সবাই একত্রে বসে গেল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রতি সালাম ফিরালেন।
আবূ যুবাইর বলেন, এরপর জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নির্দিষ্ট করে বললেন: তোমাদের এই আমীররা যেমন সালাত আদায় করেন (তেমনিভাবে)।
2806 - عن جابر بن عبد الله، قال: شَهِدْتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ الخوف، فصَفَّنا صَفَّين: صَفٌّ خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم والعدُوُّ بيننا وبين القبلة، فكَبَّرَ النبي صلى الله عليه وسلم وكَبَّرْنا جميعًا، ثُمَّ ركع وركعنا جميعًا، ثم رفع رأسَهُ من الركوع ورفعنا جَميعًا، ثُمَّ انْحدَرَ بالسجود والصف الذي يليه، وقام الصف المُؤَخَّرُ في نحر العَدُوِّ، فلما قضى النبي صلى الله عليه وسلم السجود، وقام الصف الذي يليه، انحدَرَ الصف المؤُخَّر بالسجود، وقاموا، ثم تقدَّم الصف المُؤَخَّر، وتأخَّر الصف المُقَدَّمُ، ثم ركع النبي صلى الله عليه وسلم وركعنا جميعًا، ثم رفع رأسَهُ من الركوع ورفعنا جميعًا، ثم انحدر بالسجود والصف الذي يليه الذي كان مُؤَخَّرا في الركعة الأولى، وقام الصف المُؤَخَّر في نحور العَدُوِّ، فلما قضى النبي صلى الله عليه وسلم السُجُودَ والصف الذي يليه، انحَدَرَ الصَّفُّ الْمُؤَخَّرُ بالسجود، فسجدوا، ثم سلَّم النبي صلى الله عليه وسلم وسلَّمنا جميعًا.
قال جابر: كما يصنع حرسُكم هؤلاء بأمرائهم.
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (840) عن محمد بن عبد الله بن نُمير، حدثنا أبي، حدثنا عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن جابر فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে সালাতুল খাওফ (ভয়ের সময়ের সালাত) আদায় করেছি। তিনি আমাদেরকে দুটি কাতারে দাঁড় করালেন: একটি কাতার আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের পিছনে এবং শত্রু আমাদের ও কিবলার মাঝখানে ছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকবীর দিলেন এবং আমরাও সকলে তাকবীর দিলাম। অতঃপর তিনি রুকূ' করলেন এবং আমরাও সকলে রুকূ' করলাম। তারপর তিনি রুকূ' থেকে মাথা উঠালেন এবং আমরাও সকলে মাথা উঠালাম। এরপর তিনি সিজদাহ করার জন্য গেলেন এবং তাঁর সাথে সাথে পেছনের কাতারটিও সিজদাহ করল। আর একদম পেছনের কাতারটি শত্রুর মোকাবিলায় দাঁড়িয়ে রইল। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সিজদাহ সম্পন্ন করলেন এবং তাঁর পেছনের কাতারটি উঠে দাঁড়াল, তখন পেছনের কাতারটিও সিজদাহ করার জন্য গেল এবং তারা উঠে দাঁড়াল। অতঃপর পেছনের কাতারটি সামনে চলে এলো এবং সামনের কাতারটি পিছনে চলে গেল। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম রুকূ' করলেন এবং আমরা সকলে রুকূ' করলাম। তারপর তিনি রুকূ' থেকে মাথা উঠালেন এবং আমরা সকলে মাথা উঠালাম। তারপর তিনি সিজদাহ করার জন্য গেলেন এবং তাঁর সাথে সাথে সেই কাতারটিও গেল যেটি প্রথম রাক'আতে পেছনে ছিল। আর একদম পেছনের কাতারটি শত্রুদের মোকাবিলায় দাঁড়িয়ে রইল। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ও তাঁর পেছনের কাতারটি সিজদাহ সম্পন্ন করলেন, তখন একদম পেছনের কাতারটি সিজদাহ করার জন্য গেল এবং তারা সিজদাহ করল। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সালাম ফিরালেন এবং আমরাও সকলে সালাম ফিরালাম।
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমাদের এই রক্ষীরা যেমন তাদের আমীরদের (নেতাদের) সাথে করে থাকে।
2807 - عن أبي عيَّاش الزُّرَقي، قال: كُنَّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بِعُسفان، وعلى المشركين خالد بن الوليد، فصلَّينا الظهر، فقال المشركون: لقد أصبنا غِرَّة، لقد أصبنا غَفْلة، لو كُنَّا حملنا عليهم وهم في الصلاة، فنزلت آية القَصْر بين الظهر والعصر، فلمَّا حضرتِ العصر قام رسول الله صلى الله عليه وسلم مستقبل القبلة، والمشركون أمامه، فصفَّ خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم صفٌّ، وصفّ بعد ذلك الصفِّ صفٌّ آخر فركع رسول الله صلى الله عليه وسلم وركعوا جميعًا، ثم سجد وسجد الصف الذين يلونه، وقام الآخرون يحرسونهم، فلمَّا صلَّى هؤلاء السجدتين وقاموا سجد الآخرون الذين كانوا خلفهم، ثم تأخر الصفُّ الذي يليه إلى مقام الآخرين، وتقدم الصفُّ الأخير إلى مقام الصفِّ الأوَّل، ثمَّ ركع رسول الله صلى الله عليه وسلم وركعوا جميعًا، ثم سجد وسجد الصفُّ الذي يليه، وقام الآخرون يحرسونهم، فلما جلس رسول الله صلى الله عليه وسلم والصفُّ الذي يليه سجد الآخرون، ثم جلسوا جميعًا، فسلَّم عليهم جميعًا، فصلَّاها بعُسفان، وصلَّاها يوم بني سُلَيم.
صحيح: رواه أبو داود (1236) عن سعيد بن منصور، حدثنا جرير بن عبد الحميد، عن منصور، عن مجاهد، عن أبي عيَّاشٍ الزُّرَقي فذكره.
قال المنذري:"وقال البيهقي: هذا إسناد صحيح، إلّا أنَّ بعض أهل العلم بالحديث يشك في سماع مجاهد من أبي عيَّاش، ثم ذكر الحديث بإسنادٍ جيِّد عن مجاهدٍ، قال: حدَّثنا أبو عيَّاش، وقال: بيّن فيه سماع مجاهد من أبي عيَّاش. هذا آخر كلامه، وسماعه منه متوجِّه؛ فإنَّه ذكر ما يدلُّ على أنَّ مولد مجاهد سنة عشرين، وعاش أبو عياش إلى بعد الأربعين، وقيل: إلى بعد الخمسين". انتهى كلام المنذري.
قلت: وصرَّح مجاهد بالتحديث في رواية شعبة، عن منصور، قال: سمعت مجاهدًا يحدِّث، عن أبي عياش الزُّرَقي، رواه الإمام أحمد (16581) عن محمد بن جعفر قال: حدثنا شعبة، ورواه النسائي (1550) من طريقين، عن محمد بن جعفر به مثله.
وصحّحه أيضًا ابن حبان (2876)، والحاكم (1/ 337، 338) فروياه من طريق منصور، عن مجاهد، قال في صحيح ابن حبان: حدثنا أبو عياش الزرقي فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وصحّحه أيضًا الدارقطني (2/ 60)، والبيهقي (3/ 254، 255) كما مضى.
আবু আইয়াশ আয-যুরাকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা উসফানে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ছিলাম। মুশরিকদের ওপর (তখনো ইসলাম গ্রহণ করেননি) খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দায়িত্ব ছিল। আমরা যোহরের সালাত আদায় করলাম। তখন মুশরিকরা বলল: আমরা তাদের উদাসীনতার সুযোগ পেয়েছি, আমরা তাদের অসতর্কতার সুযোগ পেয়েছি। তারা সালাতরত অবস্থায় যদি আমরা তাদের ওপর আক্রমণ করতাম! (মুশরিকদের এই মন্তব্যের প্রেক্ষিতে) যোহর ও আসরের মধ্যবর্তী সময়ে ক্বসর (সালাত সংক্ষিপ্তকরণ)-এর আয়াত নাযিল হলো।
অতঃপর যখন আসরের সময় হলো, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ক্বিবলামুখী হয়ে দাঁড়ালেন। মুশরিকরা তাঁর সামনে ছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পেছনে এক কাতার এবং এর পেছনে আরেকটি কাতার তৈরি হলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রুকু করলেন এবং সকলেই একত্রে রুকু করলো। এরপর তিনি সাজদাহ করলেন এবং তাঁর নিকটবর্তী কাতারটি সাজদাহ করলো। আর অন্য কাতারটি তাদের পাহারায় দাঁড়ালো।
যখন এই কাতারটি দুটি সাজদাহ পূর্ণ করে দাঁড়ালো, তখন তাদের পেছনে যারা ছিল তারা সাজদাহ করলো। অতঃপর প্রথম কাতারটি পিছিয়ে গিয়ে শেষ কাতারের স্থানে এলো এবং শেষ কাতারটি এগিয়ে প্রথম কাতারের স্থানে চলে এলো।
এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রুকু করলেন এবং সকলেই একত্রে রুকু করলো। অতঃপর তিনি সাজদাহ করলেন এবং তাঁর নিকটবর্তী কাতারটি সাজদাহ করলো। অন্য কাতারটি তাদের পাহারায় দাঁড়ালো। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং তাঁর নিকটবর্তী কাতারটি বসলেন (শেষ তাশাহহুদের জন্য), তখন অন্য কাতারটি সাজদাহ করলো। এরপর তারা সকলে একত্রে বসলেন এবং তিনি সকলের সাথে সালাম ফিরালেন। তিনি উসফানে এভাবেই সালাত আদায় করেন এবং বনী সুলাইম-এর যুদ্ধের দিনেও এভাবেই সালাত আদায় করেন।
