হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2808)


2808 - عن مروان بن الحكم، أنَّه سأل أبا هريرة: هل صلَّيت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة الخوف؟ قال أبو هريرة: نعم، قال مروان: متى؟ فقال أبو هريرة: عام غزوة نجد، قام رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى صلاة العصر، فقامت معه طائفة، وطائفة أخرى مقابل العدوِّ
وظهورهم إلى القبلة، فكبَّر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكبروا جميعًا، الذين معه، والذين مقابل العدوِّ، ثمَّ ركع رسول الله صلى الله عليه وسلم ركعة واحدة، وركعت الطائفة التي معه، ثم سجد فسجدت الطائفة التي تليه، والآخرون قيام مقابلي العدو، ثم قام رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقامت الطائفة التي معه، فذهبوا إلى العدو، فقابلوهم، وأقبلت الطائفة التي كانت مقابلي العدو، فركعوا وسجدوا، ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم كما هو، ثم قاموا فركع رسول الله صلى الله عليه وسلم ركعةً أخرى وركعوا معه وسجد وسجدوا معه، ثم أقبلت الطائفة التي كانت مقابلي العدو، فركعوا وسجدوا، ورسول الله صلى الله عليه وسلم قاعد وَمن [كان] معه، ثم كان السلام، فسلَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم وسلَّموا جميعًا، فكان لرسول الله صلى الله عليه وسلم ركعتان، ولكل رجل من الطائفتين ركعة واحدة.

صحيح: رواه أبو داود (1240)، والنسائي (1543) كلاهما من طريق عبد الله بن يزيد المُقري، حدثنا حيوة وابن لهيعة، قالا: أخبرنا أبو الأسود، أنَّه سمع عروة بن الزبير، يحدث عن مروان بن الحكم فذكره، واللفظ لأبي داود. وفي الإسناد ابن لهيعة وهو متكلم فيه إلَّا أنَّه مقرون، والنسائي لم يذكر اسمه وإنَّما قال: حيوة ورجل آخر. ورواه أيضًا البيهقي (3/ 264) من هذا الوجه إلَّا أنَّه قال:"فكان لرسول الله صلى الله عليه وسلم ركعتين، ولكل رجل من الطائفتين ركعة ركعة، كذا قال. والصواب: لكل واحد من الطائفتين ركعتين ركعتين" انتهى.

قلت: وهو كما قال وسيأتي أيضًا ما يبين ذلك ولكن قوله: ولكل رجل من الطائفتين ركعة ركعة

- قد يحمل على أن ذلك مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم كل واحد منهم صلَّى ركعة لنفسه.

وصحّحه ابن خزيمة (1361)، والحاكم (1/ 338) فروياه من هذا الطريق إلا أنَّهما لم يذكرا في الإسناد"ابن لهيعة".

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه".

قلت: مروان من رجال البخاري وحده، ولكنَّه ليس من رجال الإسناد وإنَّما ذُكر في الإسناد لأنه سائل عن صلاة الخوف، وإنَّما يرويه عروة عن أبي هريرة مباشرة، والدليل على ذلك ما رواه أبو داود (1241)، وابن خزيمة (1362) كلاهما من حديث محمد بن إسحاق، عن محمد بن جعفر بن الزبير ومحمد بن الأسود، عن عروة بن الزبير، عن أبي هريرة قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى نجد، حتى إذا كُنَّا بذات الرقاع من نخل لقي جمعًا من غطفان فذكر معناه، ولفظه على غير لفظ حيوة، وقال فيه: حين ركع بمن معه وسجد، قال: فلما قاموا مشوا القهقرى إلى مصافِّ أصحابهم، ولم يذكروا استدبار القبلة، هذا كله في أبي داود.

وأمَّا ابن خزيمة ففيه صرَّح محمد بن إسحاق بالتحديث عن محمد بن عبد الرحمن بن الأسود بن نوفل -وكان يتيمًا في حِجْر عروة بن الزبير- ولم يُقرنه بمحمد بن جعفر بن الزبير، وفيه يقول عروة
ابن الزبير: سمعت أبا هريرة، ومروان بن الحكم يسأله عن صلاة الخوف فذكر الحديث كما صرَّحَ أيضًا ابن إسحاق بالتحديث في رواية يونس بن بكير، رواه البيهقي (3/ 264) من طريقه عن محمد ابن إسحاق، حدثني محمد بن جعفر بن الزبير عن عروة، عن أبي هريرة قال: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم بالناس صلاة الخوف، فصدع الناس صدعين. فقامت طائفة خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم، وطائفة تجاه العدو، فصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بمن خلفه ركعة، وسجد بهم سجدتين، ثم قام، وقاموا معه، فلما استوى قائمًا رجع الذين خلفه وراءهم القهقرى، فقاموا وراء الذين بإزاء العدوِّ، وجاء الآخرون فقاموا خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلُّوا لأنفسهم ركعةً، ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم، ثمَّ قاموا فصلَّي بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم أُخرى، فكانت لهم ولرسول الله صلى الله عليه وسلم ركعتين، ثم جاء الذين بإزاء العدو، فصلوا لأنفسهم ركعة وسجدتين، ثم جلسوا خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم، فسلم بهم جميعًا.

وشاركت عائشة في رواية هذه القصة كما يأتي.

وقول أبي هريرة: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى نجد …

هذه الغزوة سُميِّت بأسماء منها:

- غزوة نجد. - وغزوة محارب. - وغزوة غَطَفَان. - وغزوة ذات الرِّقاع - ويوم القرد.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মারওয়ান ইবনু হাকাম তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিলেন: আপনি কি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাতুল খাওফ (ভয়ের সালাত) আদায় করেছেন? আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ। মারওয়ান জিজ্ঞেস করলেন: কবে? আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নজদ অভিযানের বছর। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসরের সালাতের জন্য দাঁড়ালেন। তখন তাঁর সাথে একদল দাঁড়াল এবং অন্য একদল শত্রুর সামনে দাঁড়াল, আর তাদের পিঠ ছিল কিবলার দিকে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকবীর বললেন, তখন তাঁর সাথে যারা ছিলেন এবং যারা শত্রুর মুখোমুখি ছিলেন, তারা সকলেই তাকবীর বললেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাকআত রুকু করলেন এবং তাঁর সাথে থাকা দলটি রুকু করল। এরপর তিনি সিজদা করলেন এবং তাঁর নিকটবর্তী দলটি সিজদা করল। আর অন্য দলটি শত্রুর মোকাবিলায় দাঁড়ানো রইল। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং তাঁর সাথে থাকা দলটি দাঁড়াল, অতঃপর তারা শত্রুদের কাছে গিয়ে তাদের মুখোমুখি দাঁড়াল। আর যে দলটি শত্রুর মুখোমুখি ছিল, তারা এগিয়ে এলো, অতঃপর তারা রুকু ও সিজদা করল, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেভাবে ছিলেন, সেভাবে দাঁড়িয়েই রইলেন। এরপর তারা (পরবর্তী রাকআতের জন্য) দাঁড়াল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের সাথে আরেকটি রাকআত রুকু করলেন, তারাও রুকু করল। তিনি সিজদা করলেন, তারাও সিজদা করল। এরপর শত্রুর মুখোমুখি থাকা প্রথম দলটি এগিয়ে এলো, অতঃপর তারা রুকু ও সিজদা করল, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথে যারা ছিলেন, তারা বসে রইলেন। এরপর সালাম ফিরানোর পালা এলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাম ফিরালেন এবং সকলে সালাম ফিরাল। সুতরাং, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ছিল দুটি রাকআত এবং দুই দলের প্রত্যেক ব্যক্তির জন্য ছিল একটি করে রাকআত।









আল-জামি` আল-কামিল (2809)


2809 - عن عائشة قالت: كبر رسول الله صلى الله عليه وسلم وكبرت الطائفة الذين صفوا معه، ثم ركع فركعوا، ثم سجد فسجدوا، ثم رفع فرفعوا، ثم مكث رسول الله صلى الله عليه وسلم جالسًا، ثم سجدوا هم أنفسهم الثانية، ثم قاموا فنكصوا على أعقابهم يمشون القهقرَى، حتى قاموا من ورائهم، وجاءت الطائفة الأخرى فقاموا فكبَّروا، ثم ركعوا لأنفسهم ثم سجد رسول الله صلى الله عليه وسلم فسجدوا معه، ثم قام رسول الله صلى الله عليه وسلم وسجدوا لأنفسهم الثانية، ثم قامت الطائفتان جميعًا فصلوا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فركع فركعوا، ثم سجد فسجدوا جميعًا، ثم عاد فسجد الثانية وسجدوا معه سريعًا كأسرع الإسراع جاهدًا لا يألون سراعًا، ثم سلَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم وسلَّموا فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقد شاركه الناس في الصلاة كلِّها.

حسن: رواه أبو داود (1242) قال: وأما عبيد الله بن سعد فحدثنا قال: حدثني عمي، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني محمد بن جعفر بن الزبير، أن عروة بن الزبير حدثه، أن عائشة حدثته بهذه القصة، فقالت: فذكرت الحديث. وإسناده حسن لأجل محمد بن إسحاق وهو صدوق وقد صرَّح بالتحديث.

وعمُّ عبيد الله بن سعد هو: يعقوب بن إبراهيم بن سعد والحديث رواه الإمام أحمد (26356) عن يعقوب بن إبراهيم، عن أبيه، عن محمد بن إسحاق، ومن هذا الطريق رواه ابن خزيمة (1363)
وعنه ابن حبان (2873)، ورواه أيضًا الحاكم (1/ 336) كلهم من طريق يعقوب بن إبراهيم به.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم، وهو أتمُّ حديث وأشفاه في صلاة الخوف".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকবীর বললেন এবং তাঁর সাথে সারিবদ্ধভাবে দাঁড়ানো দলটি তাকবীর বলল। অতঃপর তিনি রুকূ করলেন, তখন তারাও রুকূ করল; এরপর তিনি সিজদা করলেন, তখন তারাও সিজদা করল; এরপর তিনি (সিজদা থেকে) মাথা তুললেন, তখন তারাও মাথা তুলল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বসে রইলেন, তখন তারা (প্রথম দলটি) নিজেরা দ্বিতীয় সিজদা করল। এরপর তারা উঠে দাঁড়াল এবং পিছন দিকে চলতে চলতে পিছু হটে গিয়ে (পেছনের সারিতে) দাঁড়াল। আর অন্য দলটি এল এবং তারা দাঁড়িয়ে তাকবীর বলল। এরপর তারা নিজেরা রুকূ করল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সিজদা করলেন, তখন তারাও তাঁর সাথে সিজদা করল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উঠে দাঁড়ালেন, আর তারা (দ্বিতীয় দলটি) নিজেরা দ্বিতীয় সিজদা করল। এরপর উভয় দলই একসাথে দাঁড়াল এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে সালাত আদায় করল। যখন তিনি রুকূ করলেন, তখন তারাও রুকূ করল; এরপর তিনি সিজদা করলেন, তখন সকলেই সিজদা করল। এরপর তিনি ফিরে এসে দ্রুত দ্বিতীয় সিজদা করলেন এবং তারাও অত্যন্ত দ্রুততার সাথে তাঁর সাথে সিজদা করল—সর্বোচ্চ দ্রুততার সাথে, দ্রুততার জন্য প্রাণপণ চেষ্টা করে। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সালাম ফিরালেন এবং তারাও সালাম ফিরাল। তারপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উঠে দাঁড়ালেন। লোকেরা এভাবে সম্পূর্ণ সালাতে তাঁর সাথে শরীক হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (2810)


2810 - عن جابر، قال: أقبلنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، حتى إذا كُنَّا بذات الرقاع قال كُنَّا إذا أتينا على شجرةٍ ظليلةٍ تركناها لرسول الله صلى الله عليه وسلم. قال فجاء رَجُلٌ من المشركين وسيفُ رسول الله صلى الله عليه وسلم مُعَلَّقٌ بشجرةٍ، فأخذ سيف نبي الله صلى الله عليه وسلم فاخترطه، فقال لرسول الله صلى الله عليه وسلم أتخافُني؟ قال:"لا" قال: فمن يمنعك مني؟ قال:"الله يمنَعُني منك" قال فتهدَّدَهُ أصحابُ رسول الله صلى الله عليه وسلم: فأغْمَدَ السيفَ وعَلَّقه، قال: فنُودِيَ بالصلاة، فصلَّي بطائفة ركعتين، ثم تأخَّرُوا، وصَلَّى بالطائفة الأخرى ركعتين، قال فكانت لرسُول الله صلى الله عليه وسلم أربعُ ركعَاتٍ، ولِلْقوم ركعتان.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (843) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا عفَّان، حدثنا أبان بن يزيد، حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن جابر فذكره.

وعلَّقه البخاري في المغازي (4136) عن أبان بن يزيد به ثم قال: وقال مسدد، عن أبي عوانة، عن أبي بشر: اسم الرجل غَوْرَث بن الحارث، وقاتل فيها محارِبَ خصفةَ. انتهي.

يشير البخاري إلى ما رواه مسدد في مسنده، وعنه إبراهيم الحربي في كتابه"غريب الحديث" عن مسدد، عن أبي عوانة، عن أبي بشر، عن سليمان بن قيس، عن جابر قال: غزا رسول الله صلى الله عليه وسلم محارب خصفة بنخل، فرأوا من المسلمين غِرَّة، فجاء رجل منهم يقال له: غَوْرَث بن الحارث حتى قام على رسول الله صلى الله عليه وسلم له بالسيف، فذكره. وفيه: فقال الأعرابي: غير أني أعاهدك أن لا أقاتلك، ولا أكون مع قوم يقاتلونك. فخلَّى سبيله، فجاء إلى أصحابه فقال: جئتكم من عند خير الناس.

ومن هذا الطريق رواه أيضًا ابن حبان في صحيحه (2883)، ورواه أيضًا (2882) من طريق آخر عن قتادة، عن سليمان اليشكري -وهو ابن قيس- أنه سأل جابر بن عبد الله عن إقصار الصلاة في الخوف: أين أنزل، وأين هو؟ فقال: خرجنا نتلقَّى عِيرًا لقريش أتت من الشام، حتى إذا كنا بنخل جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وسيفه موضوع، فذكر الحديث نحوه.

وله أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحهما.

ولجابر أحاديث أخري سبق بعضها تدل على تعدد القصة.

ورُوي عن أبي بكرة قال: صلَّى النبي صلى الله عليه وسلم في خوفٍ الظهر، فصفَّ بعضهم خلفه، وبعضهم بإزاء العدوِّ، فصلي بهم ركعتين ثم سلَّم، فانطلق الذين صلوا معه، فوقفوا موقف أصحابهم، ثم جاء
أولئك فصلوا خلفه فصلي بهم ركعتين ثم سلَّم. فكانت لرسول الله صلى الله عليه وسلم أربعًا، ولأصحابه ركعتين ركعتين. وبذلك كان يُفتي الحسن.

رواه أبو داود (1248)، والنسائي (1551) كلاهما من طريق أشعث، عن الحسن، عن أبي بكرة فذكره. واللفظ لأبي داود. ولم يذكر النسائي فتوى الحسن.

وصحّحه ابن حبان (2881) فرواه من هذا الوجه.

وفي الإسناد الحسن وهو: البصري مدلس وقد عنعن، وبقية رجاله ثقات، وقد شعر أبو داود بعِلَّة هذا الحديث فقال: وكذلك رواه يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وكذلك قال سليمان اليشكري، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، انتهي.

قلت: إذًا حديث أبي بكرة يكون شاهدًا لحديث جابر، ولكن أعلَّه ابن القطان بأن أبا بكرة، أسلم بعد وقوع صلاة الخوف بمدة. قال الحافظ: وهذه ليست بعلة، فإنه قد يكون مرسل صحابي.

ثم قال أبو داود: وكذلك في صلاة المغرب: يكون للإمام ست ركعات، وللقوم ثلاث ثلاث.

قلت: وصله ابن خزيمة (1368) عن محمد بن معمر بن ربعي العتيبي، ثنا عمرو بن خليفة البكراوي، ثنا أشعث، عن الحسن، عن أبي بكرة، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى بالقوم صلاة المغرب ثلاث ركعات، ثم انصرف، وجاء الآخرون فصلَّي بهم ثلاث ركعات، فكانت للنبي صلى الله عليه وسلم ستّ ركعات، وللقوم ثلاث ثلاث، ومن طريق ابن خزيمة رواه الدارقطني (2/ 61)، قال الحاكم (1/ 337): سمعت أبا علي الحافظ يقول:"هذا حديث غريب، أشعث الحمراني لم يكتبه إلَّا بهذا الإسناد".

وقال الحاكم:"وإنه صحيح على شرط الشيخين".

وعمرو بن خليفة البكراوي كنيته أبو عثمان، ذكره ابن حبان في الثقات (7/ 229) وقال:"وربما كان في بعض رواياته مناكير" وترجمة الحافظ في"اللسان" ولم يخرج عنه الشيخان البتة، ولعل من مناكيره ذكر صلاة المغرب فإنه انفرد عما رواه الثقات عن أشعث.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যা’তুর রিক্বা’ নামক স্থানে ছিলাম। তিনি বলেন, আমরা যখন কোনো ছায়াযুক্ত গাছের কাছে আসতাম, তখন তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য রেখে দিতাম। তিনি বলেন, তখন মুশরিকদের (অংশীবাদী/অবিশ্বাসী) মধ্য হতে এক ব্যক্তি এলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তলোয়ার একটি গাছে ঝুলানো ছিল। লোকটি আল্লাহর নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তলোয়ারটি নিয়ে বের করল (কোষমুক্ত করল), এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল: আপনি কি আমাকে ভয় করেন? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: না। সে বলল: কে আপনাকে আমার থেকে রক্ষা করবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ্‌ আমাকে তোমার থেকে রক্ষা করবেন। তিনি বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ তাকে ধমকালেন। ফলে সে তলোয়ার কোষবদ্ধ করল এবং তা ঝুলিয়ে রাখল। তিনি বলেন, এরপর সালাতের জন্য ডাকা হলো। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদলকে নিয়ে দুই রাকআত সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তারা সরে গেলেন এবং তিনি অন্য দলটিকে নিয়ে দুই রাকআত সালাত আদায় করলেন। তিনি (জাবির) বলেন, এভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য হলো চার রাকআত, আর লোকগুলোর জন্য হলো দুই রাকআত করে।









আল-জামি` আল-কামিল (2811)


2811 - عن ابن عباس قال: فرضَ الله الصلاة على لسان نبيكم في الحضر أربعًا، وفي السفر ركعتين، وفي الخوف ركعة.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (687) من طرق عن مجاهد وغيره، عن ابن عباس فذكره.

قال به بعض أهل العلم في شدة الخوف منهم: عطاء وطاوس والحسن ومجاهد والحكم وحماد وقتادة وغيرهم كلهم جميعًا قالوا: في شدة الخوف ركعة واحدة يومئ بها إيماءً".

وقال إسحاق بن راهويه:"أمَّا عند الشدَّة فتُجزِيك ركعة واحدة، تومئ بها إيماءً، فإن لم تقدر فسجدة واحدة، فإن لم تقدر فتكبيرة، لأنَّها ذكر الله".
وأمَّا سائر أهل العلم فقالوا: إنَّ صلاة شدَّة الخوف لا ينقص منها من العدد شيئًا، ولكن يصلِّي على حسب الإمكان ركعتين، أي وجه يوجهون إليه، رجالًا ورُكبانًا، يومئون إيماءً، وبه قال أصحاب الرأي ومالك والشافعي، وقال الإمام أحمد: كل حديث رُويَ في أبواب صلاة الخوف فالعمل به جائز، وقال: ستَّة أوجه، أو سبعة أوجه تُروي فيه كلُّها جائز. انظر"معالم الخطابي".

وما قال به الإمام أحمد هو من أعدل الأقوال تجنُّبًا من التأويل أو التضعيف كما سيأتي من كلام البيهقي رحمه الله تعالي.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহ তা'আলা তোমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাধ্যমে নামায ফরয করেছেন, মুকিম (নিজ বাড়ীতে অবস্থানকারী) অবস্থায় চার রাকাত, সফরে দুই রাকাত এবং চরম ভীতির (সালাতুল খাওফ) অবস্থায় এক রাকাত।

সহীহ: এটি মুসলিম তার সহীহ গ্রন্থে ‘সালাতুল মুসাফিরীন’ অধ্যায়ে (৬৮৭) মুজাহিদ এবং অন্যান্যদের মাধ্যমে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বিভিন্ন সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

চরম ভয়ের (শাদ্দাতুল খাওফ) সময় এই মতটি গ্রহণ করেছেন কতিপয় ফিকাহবিদ। তাদের মধ্যে রয়েছেন: আতা, তাউস, হাসান, মুজাহিদ, হাকাম, হাম্মাদ, কাতাদা ও অন্যান্যরা। তারা সকলেই ঐক্যবদ্ধভাবে বলেছেন যে, চরম ভয়ের সময় নামায এক রাকাত হবে এবং তারা ইশারা বা ইঙ্গিত দ্বারা তা আদায় করবে।

ইসহাক ইবনে রাহাওয়াইহ বলেছেন: “চরম কষ্টের সময় এক রাকাতই যথেষ্ট হবে, যা তুমি ইশারা বা ইঙ্গিত দ্বারা আদায় করবে। যদি তুমি তাতেও সক্ষম না হও, তবে একবার সিজদা করবে। যদি তাতেও সক্ষম না হও, তবে একটি তাকবীর দেবে, কেননা তা আল্লাহর যিকির।”

আর অন্যান্য ফিকাহবিদগণ বলেছেন, সালাতুল খাওফের সংখ্যা থেকে কিছুতেই হ্রাস করা যাবে না। তবে সামর্থ্য অনুযায়ী দুই রাকাত নামায আদায় করবে—যেদিকেই তারা মুখ ফিরাক না কেন, পদাতিক বা আরোহী অবস্থায়, ইঙ্গিত দ্বারা ইশারা করে। এই মতটি গ্রহণ করেছেন আসহাবে রা’ঈ (যুক্তিবাদী আলেমগণ), ইমাম মালিক ও ইমাম শাফিঈ। ইমাম আহমদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: সালাতুল খাওফ (ভয়ের নামায) সংক্রান্ত অধ্যায়ে বর্ণিত সকল হাদীস অনুযায়ী আমল করা জায়েয। তিনি আরও বলেন: এই ব্যাপারে ছয়টি বা সাতটি পদ্ধতি বর্ণিত হয়েছে, সবগুলোই জায়েয। (দেখুন: মা'আলিমুল খাত্তাবী)।

ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) যা বলেছেন, তা ব্যাখ্যার জটিলতা বা দুর্বলতা থেকে মুক্ত থাকার জন্য সবচেয়ে ভারসাম্যপূর্ণ মত, যেমনটি ইমাম বায়হাকী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বক্তব্যে আসবে।









আল-জামি` আল-কামিল (2812)


2812 - عن ابن عباسٍ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى بذي قَرَدٍ، وصفَّ الناس خلفه صفَّين، صفًّا خلفه، وصفًّا موازي العدوِّ، فصلى بالذي خلفه ركعة، ثم انصرف هؤلاء إلى مكان هؤلاء، وجاء أولئك فصلَّي بهم ركعة، ولم يقضوا.

صحيح: رواه النسائي (1535) عن محمد بن بشار، قال: حدثنا يحيى بن سعيد، عن سفيان، قال: حدثنا أبو بكر بن أبي الجهم، عن عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (1384)، وابن حبان (2871)، والحاكم (1/ 335) والحديث في مسند الإمام أحمد (2063) كلهم من طريق سفيان به مثله.

ولم يذكر لفظه ابن خزيمة وإنما أحاله على لفظ حديث حذيفة الآتي بعده وقال في آخره: ولم يقضوا.

ثم روي عَقِبه حديث ابن عباس كما مضى في أوَّل صلاة السفر وفيه: وفي"الخوف ركعة".

ورواه أيضًا البيهقي (3/ 262) من طريق سفيان به مثله.

ثم قال: قال سفيان: فكان للنبي صلى الله عليه وسلم ركعتين، ولكل طائفة ركعة.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه بهذه الألفاظ.

قلت: وهذا وهم منه فإن أبا بكر بن أبي الجهم -واسمه عبد الله وهو العدويّ، وقد ينسب إلى جده- ليس من رجال البخاري، وإنَّما أخرج له مسلم وحده، غير أنَّه ثقة.

ولكن نقل البيهقي (3/ 262) عن الشافعي أنَّه ترك هذا الحديث بحجَّة أنَّ جميع الأحاديث في صلاة الخوف مجتمعة على أنَّ على المأمومين من عدد الصّلاة ما على الإمام، وكذلك أصل الفرض في الصلاة على الناس واحد في العدد، ولأنَّه لا يثبت عندنا مثله لشيء في بعض إسناده.

قال البيهقي: هذا حديث لم يخرجه البخاري ولا مسلم في كتابيهما وأبو بكر بن أبي الجهم يتفرد بذلك هكذا عن عبيد الله بن عبد الله، وقد يحتمل أن يكون مثل صلاته بعُسفان، فإنَّ قوله: ثم ذهب هؤلاء إلى مصافِّ أولئك، وجاء أولئك أراد به تقدُّم الصف المؤخَّر، وتأخُّر الصفِّ المقدَّم.

وقد روى الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس ما دلَّ على ذلك مع اختلاف فيه عن الزهري وقت حراسة أحد الصفين".

هكذا يؤول البيهقي حديث أبي بكر بن أبي الجهم أو يُضعِّفه لأنه لم يخرجه الشيخان ولذا تعقبه
ابن التركماني قائلًا:"أخرجه النسائي ولم يُعلِّله بشيء، وعدم تخريجهما له ليس بعلَّةٍ كما ذكرنا مرارًا، وابن أبي الجهم ثقة أخرج له مسلم فلا يضره تفرده. كيف وقد جاء له شواهد ذكرها البيهقي" انتهي.

وقوله:"صلَّي بذي قَرَد": بقافٍ مثناةٍ مفتوحةٍ وراءٍ مهملة مفتوحةٍ، وآخره دالٌ -جبل يبعد عن المدينة شمالًا شرقيًّا خمسة وثلاثين كيلًا تقريبًا .. معجم الأمكنة الوارد ذكرها في صحيح البخاري (252).




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যি-কারদ (Dhi Qard) নামক স্থানে সালাত আদায় করেন, এবং তিনি তাঁর পিছনে মানুষদেরকে দু’টি কাতারে দাঁড় করালেন: একটি কাতার তাঁর পিছনে, এবং অন্য কাতারটি শত্রুদের মুখোমুখি। অতঃপর তিনি তাঁর পিছনের কাতারের সাথে এক রাকআত সালাত আদায় করলেন, অতঃপর এই লোকেরা (প্রথম কাতার) সেই লোকেদের (দ্বিতীয় কাতার) স্থানে চলে গেল, এবং তারা (দ্বিতীয় কাতার) এসে গেল। অতঃপর তিনি তাদের সাথে এক রাকআত সালাত আদায় করলেন, আর তারা (প্রথম ও দ্বিতীয় উভয় কাতার) সালাত পূর্ণ করেনি।









আল-জামি` আল-কামিল (2813)


2813 - عن ثعلبة بن زَهدم قال: كنا مع سعيد بن العاص بطبرستان فقال: أيُّكم صلَّي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة الخوف؟ فقال حذيفة: أنا. فصلَّي بهؤلاء ركعةً، وبهؤلاء ركعة، ولم يقضوا.

صحيح: رواه أبو داود (1246)، والنسائي (1531) كلاهما من طريق يحيى، قال: حدثنا سفيان، قال: حدثني أشعث بن سُليم، عن الأسود بن هلال، عن ثعلبة بن زهدم فذكره.

ورجاله ثقات، إنَّما الخلاف في ثعلبة بن زهدم في صحبته، والراجح أنَّه من الطبقة الأولى من التابعين.

وصححه ابن خزيمة (1343) من طريق محمد بن بشار وهو بندار، وأبي موسى محمد بن المثنى كلاهما عن يحيى بن سعيد به مثله وقال: ولم يقضوا هذا لفظ حديث أبي موسى.

وقال بندار: عن أشعث بن أبي الشعثاء ولم يقل:"ولم يقضوا". وأشعث بن أبي الشعثاء هو: ابن سُليم.

ثم روى عن محمد بن أبي موسى قالا: حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا سفيان، حدثني أبو بكر ابن أبي الجهم، عن عبيد الله بن عبد الله، عن عبد الله بن عباس أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى بذي قَرَدٍ، قال أبو موسى: مثل حديث حذيفة.

وذكر بندار الحديث مثل حديث حذيفة. وقال في آخره:"ولم يقضوا". انتهى.

فبين ابن خزيمة الخلاف بين حديثي ابن عباس وحذيفة ففي حديث حذيفة. قال أبو موسي:"لم يقضوا". ولم يقل ذلك بندار.

وفي حديث ابن عباس قال بندار: ولم يقضوا.

والظاهر منه أن أبا موسى لم يقل في حديث ابن عباس: لم يقضوا.

وحديث حذيفة رواه أيضًا الإمام أحمد (23268)، والحاكم (1/ 335) كلاهما من طريق سفيان إلَّا أنَّ الإمام أحمد أحال لفظ الحديث على حديث ابن عبَّاس، وزيد بن ثابت.

وقال الحاكم: صحيح الإسناد ولم يخرجاه. وجعل حديث ابن عباس شاهدًا لحديث حُذيفة.

ولحديث حذيفة طرق أخرى عند الإمام أحمد إلَّا أنَّها ضعيفة.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ছা'লাবা ইবনু যাহদাম বলেন: আমরা সাঈদ ইবনুল আস-এর সাথে তাবারিস্তানে ছিলাম। তখন তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তোমাদের মধ্যে এমন কে আছে, যে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাতুল খাওফ (ভয়ের সালাত) আদায় করেছে? তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি। অতঃপর তিনি (হুযাইফা) এই দলকে এক রাকাআত এবং ওই দলকে এক রাকাআত সালাত পড়ালেন, এবং তারা কাজা করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (2814)


2814 - عن القاسم بن حسان قال: أتيت زيد بن ثابت فسألتُه عن صلاة الخوف فقال: صلَّي رسول الله صلى الله عليه وسلم وصفٌّ خلْفه، وصفٌّ بإزاء العدوُ، فصلَّى بهم ركعةً، ثمَّ ذهبوا إلى مصافٍّ إخوانهم، وجاء الآخرون، فصلَّى بهم ركعة، ثمَّ سلَّم، فكان للنبي صلى الله عليه وسلم ركعتان ولكل طائفة ركعةٌ.

حسن: رواه النسائي (1531)، والإمام أحمد (21593)، وابن خزيمة (1345)، وابن حبان (2870)، والبيهقي (3/ 262) كلهم من طريق سفيان، عن الرُّكَين الفزاري، عن القاسم بن حسان فذكره، واللفظ لابن حبان، وأمَّا النسائي فأحال على حديث حذيفة، والإمام أحمد أحال على حديث ابن عباس، وابن خزيمة أحال على حديث حذيفة، وإسناده حسن فإنَّ القاسم بن حسَّان وهو العامري الكوفي روى عنه اثنان ووثقه أحمد بن صالح كما ذكره ابن شاهين في"ثقاته" (1094) وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 305) واعتمده ابن خزيمة وابن حِبَّان فأخرجا الحديث في صحيحيهما.

وأمَّا ما قاله ابن القطَّان: لا يُعْرف حاله. فقد عَرفتَ من علم حاله فوثَّقه.

وقال الذهبي في الكاشف:"وُثق" ونقل عن البخاري في الميزان أنه قال: حديثه منكر، رولا يُعرف، ثم ذكر له شيئًا.

وأورد له من حديثه عن ابن مسعود فلعله يقصد به هذا الحديث بعينه، وأمَّا في التاريخ الكبير فلم يذكر فيه شيئًا، وذكره أيضًا ابن أبي حاتم ولم يذكر فيه شيئًا. والله أعلم.

وبقية رجال الإسناد من رجال الصحيح.




যায়িদ ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি তাকে সালাতুল খাওফ (ভয়ের সময়ের সালাত) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাত আদায় করলেন। এক কাতার তাঁর পেছনে ছিল এবং অন্য কাতার শত্রুদের মুখোমুখি ছিল। অতঃপর তিনি তাদের নিয়ে এক রাকাত সালাত আদায় করলেন। এরপর তারা তাদের ভাইদের (শত্রুর মুখোমুখি) কাতারে চলে গেল এবং অন্য দলটি এলো। অতঃপর তিনি তাদের নিয়ে এক রাকাত সালাত আদায় করলেন এবং সালাম ফিরালেন। ফলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য হলো দুই রাকাত এবং প্রতিটি দলের জন্য হলো এক রাকাত।









আল-জামি` আল-কামিল (2815)


2815 - عن جابر بن عبد الله أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى بهم صلاة الخوف، فقام صفٌّ بين يديه، وصف خلفه، صلَّى بالذين خلفه ركعة وسجدتين، ثم تقدم هؤلاء حتى قاموا في مقام أصحابهم، وجاء أولئك فقاموا مقام هؤلاء، وصلَّى بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم ركعةً وسجدتين، ثم سلَّم، فكانت للنبي صلى الله عليه وسلم ركعتان، ولهم ركعة.

صحيح: رواه النسائي (1545) عن إبراهيم بن الحسن، عن حجاج بن محمد، عن شعبة، عن الحكم، عن يزيد الفقير، عن جابر بن عبد الله فذكره.

ورواه الإمام أحمد (14180) وصحّحه ابن خزيمة (1347)، وابن حبان (2869) كلهم من حديث شعبة به مثله. وإسناده صحيح.

ورواه النسائي من وجه آخر عن عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي قال: أنبأني يريد الفقير وفيه: ثم سلَّم النبي صلى الله عليه وسلم، فسلَّم الذين خلفه، وسلَّم أولئك. أخرجه عن أحمد بن المقدام، حدثنا يزيد بن زُريع، قال: حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي به مثله هكذا مختصرًا.
ولكن رواه ابن خزيمة (1364) عن أحمد بن المقدام العجلي، عن يزيد بن زُريع، وأبو داود الطيالسي (1898) عن المسعودي مطولًا ومفصلًا وهذا لفظ أبي داود:

عن يزيد بن صُهَيب الفقير، قال: سألتُ جابر بن عبد الله عن الركعتين في السفر، أَقَصْرٌ هما؟ قال جابر: إنَّ الركعتين في السفر ليسَتَا بقَصْر، إنما القصرُ ركعةٌ عند القِتال. قال: ثُمَّ أنشأ يُحدِّثُ أنه كان مع رسول الله صلى الله عليه وسلم عند القتال، إذْ حضرت الصلاةُ، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم، فصَفَّ طائفةً خلفَه، وقامت طائفةٌ وجُوهُها قِبَلَ وُجُوه العدُوِّ، فصَلَّي بهم ركعةً، وسجد بهم سجدتين، ثمَّ إن الذين صلَّوا خلْفَهُ انطلقُوا فقامُوا مقامَ أولئِكَ، فجاءَ أولئكَ فَصَفُّوا خلْفَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فصلَّي بهم ركعةً، وسجد بهم سجدتَين، ثمَّ إنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم جلس، فسلَّم وسلَّمَ الذين خَلْفَه، وسَلَّمُوا أولئكَ، فكانتْ لرسول الله صلى الله عليه وسلم ركعتين، وللقوم ركعة ركعة، ثم قرأ يزيد: {وَإِذَا كُنْتَ فِيهِمْ فَأَقَمْتَ لَهُمُ الصَّلَاةَ} [سورة النساء: 102] والمسعودي مختلط إلَّا أنَّه توبع كما سبق.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াযিদ ইবনু সুহায়ব আল-ফাকীর বলেন, আমি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সফরে দু’রাক’আত সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, এ কি ক্বসর (সংক্ষেপণ)? জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, সফরের দু’রাক’আত ক্বসর নয়। ক্বসর কেবল যুদ্ধের সময় এক রাক’আত। এরপর তিনি আলোচনা শুরু করলেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যুদ্ধের সময় উপস্থিত ছিলেন। যখন সালাতের সময় উপস্থিত হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন। তিনি একটি দলকে তাঁর পিছনে কাতারবদ্ধ করলেন এবং আরেকটি দল তাদের মুখমণ্ডল শত্রুর দিকে করে দাঁড়ালো। তিনি পিছনের দলকে নিয়ে এক রাক’আত এবং দু’টি সিজদা আদায় করলেন। এরপর যারা তাঁর পিছনে সালাত আদায় করেছিল, তারা সামনে চলে গেল এবং শত্রুর মোকাবিলায় দাঁড়ানো দলটির জায়গায় দাঁড়াল। আর শত্রুর মোকাবিলায় দাঁড়ানো দলটি আসলো এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে কাতারবদ্ধ হলো। অতঃপর তিনি তাদেরকে নিয়ে এক রাক’আত এবং দু’টি সিজদা আদায় করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসলেন, অতঃপর তিনি সালাম ফিরালেন। যারা তাঁর পিছনে ছিল তারাও সালাম ফিরাল এবং পূর্বের দলটিও (শত্রুর মোকাবিলায় যারা ছিল) সালাম ফিরাল। ফলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য হল দু’রাক’আত, আর দলের (প্রতিটি অংশের) জন্য হল এক রাক’আত করে। এরপর ইয়াযিদ (সূরা নিসা, আয়াত ১০২) তিলাওয়াত করলেন: "আর তুমি যখন তাদের মধ্যে অবস্থান কর এবং তাদের জন্য সালাত কায়েম কর..."









আল-জামি` আল-কামিল (2816)


2816 - عن ابن عمر قال: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاةَ الخوف في بعض أيَّامِه، فقامت طائفة معه، وطائفة بإزاء العدوِّ، فصلَّى بالذين معه ركعة، ثم ذهبوا، وجاء الآخرون فصلَّي بهم ركعة، ثم قضت الطائفتان ركعة ركعة.

قال ابن عمر: فإذا كان خوف أكثر من ذلك فصلِّ راكبًا أو قائمًا، تومئُ إيماءً.

متفق عليه: رواه البخاري في الخوف (943)، ومسلم في صلاة المسافرين (830/ 306) كلاهما من حديث موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر فذكره، واللفظ لمسلم واختصره البخاري وجعل قول ابن عمر:"إن كانوا أكثر من ذلك فليصلوا قيامًا وركبانًا" مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم، ورجح الحافظ رفعه بعد أن استقصى جميع طرق حديث ابن عمر.

ورواه مالك في صلاة الخوف (3) عن نافع، أن عبد الله بن عمر كان إذا سُئلُ عن صلاة الخوف قال: يتقدم الإمام وطائفة من الناس، فيُصلي بهم الإمام ركعة، وتكون طائفة منهم بينه وبين العدو لم يُصلُّوا فإذا صلي الذين معه ركعة استأخرُوا مكان الذين لم يُصلوا، ولا يُسلِّمون. ويتقدم الذين لم يُصلَّوا فيُصلون معه ركعة، ثم ينصرفُ الإمامُ، وقد صلَّى ركعتين، فتقوم كلُّ واحدة من الطائفتين فيصلون لأنفسهم ركعة ركعة، بعد أن ينصرف الإمامُ، فيكون كلُّ واحدةٍ من الطائفتين قد صلوا ركعتين، فإن كان خوفًا هو أشدّ من ذلك صلَّوا رجالًا قيامًا على أقدامِهم، أو رُكْبانًا مُسْتَقْبلي القبلة أو غير مُستقْبِليها.

قال مالك: قال نافع لا أرى عبد الله بن عمر حدثه إلا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.

ورواه البخاري في كتاب التفسير (535) من طريق مالك به مثله.
وأمَّا ما رواه سماك الحنفي عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"إنَّه صلَّى بهؤلاء ركعة وهؤلاء ركعة، في صلاة الخوف" ولم يذكر قضاءَهم ركعة أخرى، فقد قال البيهقي:"وقد رُوينا عن سالم ونافع عن ابن عمر، أن كلّ واحدة من الطائفتين قضَوا ركعتهم، والحكم للإثبات في مثل هذا". انتهى."السنن الكبرى" (3/ 2




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কোন এক সফরে সলাতুল খাওফ (ভয়কালীন সালাত) আদায় করলেন। একদল তাঁর সাথে দাঁড়াল এবং আরেক দল শত্রুর মুখোমুখি থাকল। তিনি তাঁর সাথে যারা ছিল তাদেরকে নিয়ে এক রাকআত সলাত আদায় করলেন। তারপর তারা চলে গেল এবং অন্য দল আসল। তিনি তাদেরকে নিয়ে এক রাকআত সলাত আদায় করলেন। অতঃপর উভয় দল এক এক রাকআত করে পূর্ণ করে নিল।

ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি ভয় এর চেয়েও বেশি হয়, তবে সওয়ারীর উপর আরোহণ অবস্থায় অথবা দাঁড়ানো অবস্থায় ইশারার মাধ্যমে সলাত আদায় করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (2817)


2817 - عن ابن عبَّاسٍ قال: قام النبي صلى الله عليه وسلم، وقام الناس معه فكبَّر وكبَّروا معه، وركع وركع ناس منهم، ثم سجد وسجدوا معه، ثم قام للثانية فقام الذين سجلوا وحرسوا لإخوانهم، وأتتِ الطائفة الأخرى فركعوا وسجدوا معه، والناس كلهم في صلاة، ولكن يحرس بعضهم بعضًا.

صحيح: رواه البخاري في الخوف (944) عن حيوة بن شريح، قال: حدثنا محمد بن حرب، عن الزبيدي، عن الزهري، عن عبد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়ালেন এবং লোকেরা তাঁর সাথে দাঁড়ালো। তিনি তাকবীর দিলেন এবং লোকেরাও তাঁর সাথে তাকবীর দিল। তিনি রুকু করলেন এবং তাদের একদল তাঁর সাথে রুকু করল। অতঃপর তিনি সিজদা করলেন এবং তারা তাঁর সাথে সিজদা করল। এরপর যখন তিনি দ্বিতীয় রাকাতে দাঁড়ালেন, তখন যারা সিজদা করেছিল, তারা দাঁড়িয়ে গেল এবং তাদের ভাইদের জন্য পাহারায় নিযুক্ত হলো। আর অন্য দলটি এসে তাঁর সাথে রুকু ও সিজদা করল। সকলেই সালাতের মধ্যে ছিল, তবে তারা একে অপরের পাহারা দিচ্ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (2818)


2818 - عن ابن عبَّاسٍ قال: ما كانت صلاة الخوف إلا سجدتين كصلاة أحراسكم هؤلاء اليوم خلف أئمتكم هؤلاء إلا أنَّها كانت عُقَبًا، قامت طائفة منهم وهم جميعًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وسجدتْ معه طائفة منهم، ثم قام رسول الله صلى الله عليه وسلم وقاموا معه جميعًا، ثم ركع وركعوا معه جميعًا، ثم سجد فسجد معه الذين كانوا قيامًا أوَّل مَرَّة، فلمَّا جلس رسول الله صلى الله عليه وسلم والذين سجدوا معه في آخر صلاتهم سجد الذين كانوا قيامًا لأنفسهم، ثم جلسوا فجمعهم رسول الله صلى الله عليه وسلم بالتسليم.

حسن: رواه النسائي (1535) عن عبد الله بن سعد بن إبراهيم، قال: حدثني عمي، قال: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وعم عبيدالله هو: يعقوب بن إبراهيم بن سعد، وعنه رواه الإمام أحمد (2382)، والبيهقي (3/ 258) وإسناده حسن لأجل محمد بن إسحاق، فإنَّه صدوق إذا صرَّح بالتحديث.

وقوله: أنّها كانت عُقَبًا، أي تُصلِّي طائفة بعد طائفة، فهم يتعاقبونها تعاقب الغُزَاةِ.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ভয়ের সালাত (সালাতুল খাওফ) তোমাদের আজকের এসব প্রহরীদের তাদের ইমামদের পেছনে সালাতের মতোই দুই সেজদা-বিশিষ্ট ছিল, তবে তা ছিল পালাক্রমে। তাদের মধ্য হতে একটি দল দাঁড়ালো, আর তারা সকলেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন। তাদের মধ্য হতে একদল তাঁর সাথে সিজদা করলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং তাদের সকলে তাঁর সাথে দাঁড়ালো। অতঃপর তিনি রুকূ’ করলেন এবং তারা সকলে তাঁর সাথে রুকূ’ করলো। অতঃপর তিনি সিজদা করলেন। ফলে প্রথমবারে যারা দাঁড়িয়েছিল, তারা তাঁর সাথে সিজদা করলো। এরপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং যারা তাঁর সাথে তাদের সালাতের শেষদিকে সিজদা করেছিল, তারা বসলেন, তখন যারা দাঁড়ানো ছিল তারা তাদের নিজেদের জন্য সিজদা করলো। অতঃপর তারা বসলো এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালামের মাধ্যমে তাদের সকলকে একত্র করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2819)


2819 - عن ابن عمر قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم لمَّا رجع من الأحزاب:"لا يُصَلِّيَنَّ أحدٌ العصرَ إلَّا في بني قُريظة" فأدرك بعضَهم العصرُ في الطريق، فقال بعضُهم: لا نُصلِّي حتَّى تأتيها، وقال بعضُهم: بل نُصلِّي، ولم يُرِد مِنَّا ذلك، فذُكِر للنبي صلى الله عليه وسلم فلم يُعنِّف واحدًا منهم.
متفق عليه: رواه البخاري في صلاة الخوف (946) وفي المغازي (4119)، ومسلم في الجهاد والسير (1770) كلاهما عن عبد الله بن محمد ابن أسماء الضُّبعي، حدثنا جويرية بن أسماء، عن نافع، عن عبد الله فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم: نادي فينا رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم انصرف عن الأحزاب:"أن لا يُصَلِّينَّ أحد الظهرَ إلَّا في بني قريظة" فتخوَّف ناسٌ فوتَ الوقت فصلّوْا دون بني قُريظة، وقال آخرون: لا نُصَلِّي إلَّا حيث أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم وإن فاتنا الوقت. قال: فما عَنَّفَ واحدًا من الفريقين" انتهى.

قال الحافظ في الفتح (7/ 408) أكثر المخرجين ذكروا لفظ"الظهر" كما ذكره مسلم إلَّا أنَّ بعض أصحاب السِّيَرِ ذكروا لفظَ العصر، ثمَّ حاول الجمع بين اللفظين ثم رجح لفظ مسلم، وقال عن البخاري: لعله كتبه من حفظه، ولم يُراعِ اللَّفظ كما عُرِف من مذهبه في تجويز ذلك، بخلاف مسلم فإنَّه يحافظ على اللَّفظ كثيرًا، وإنَّما لم أُجوِّز عكسَه لموافقةِ من وافق مسلمًا على لفظِهِ بخلاف البخاري" انتهى.

ومن التأويلات التي ذكرها قوله: وقد جمع بعض العلماء بين الروايتين باحتمال أن يكون بعضهم قبل الأمر كان صلَّى الظهر، وبعضهم لم يُصلِّها، فقيل لمن لم يُصَلِّها: لا يُصلِّينَّ أحد الظهرَ، ولمن صلَّاها لا يُصلِّين أحدٌ العصر. وجمع بعضهم باحتمال أن تكون طائفة منهم راحت بعد طائفة، فقيل للطائفة الأولى: الظهر، وقيل للطائفة التي بعدها العصر. ثم قال الحافظ: وكلاهما جمع لا بأس به. انتهي.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খন্দক যুদ্ধ (আহযাব) থেকে ফিরলেন, তখন তিনি বললেন: "কেউ যেন আসরের সালাত বনু কুরায়যার স্থান ব্যতীত অন্য কোথাও আদায় না করে।"

তখন পথে তাদের কারো কারো আসরের সময় হয়ে গেল। তাদের কেউ কেউ বলল, আমরা বনু কুরায়যা না পৌঁছা পর্যন্ত সালাত আদায় করব না। আর কেউ কেউ বলল, বরং আমরা সালাত আদায় করে নিব, আর তিনি (নবী) আমাদের থেকে এটা উদ্দেশ্য করেননি। অতঃপর বিষয়টি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করা হলে, তিনি তাদের কাউকেই তিরস্কার করলেন না।

[মুসলিমের বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খন্দক যুদ্ধ থেকে ফেরার দিন আমাদের মাঝে ঘোষণা দিলেন: "কেউ যেন যোহরের সালাত বনু কুরায়যা ব্যতীত অন্য কোথাও আদায় না করে।" তখন কিছু লোক সময় চলে যাওয়ার ভয় করল, ফলে তারা বনু কুরায়যার আগেই সালাত আদায় করে নিল। আর অন্যেরা বলল, আমরা সালাত আদায় করব না, তবে যেখানে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের আদেশ করেছেন সেখানেই করব, যদিও সময় চলে যায়। বর্ণনাকারী বলেন: তিনি উভয় দলের কাউকেই তিরস্কার করেননি।]









আল-জামি` আল-কামিল (2820)


2820 - عن ابن عبد الله بن أُنَيس، عن أبيه قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى خالد بن سفيان الهُذَلي، وكان نحو عُرَنَة وعرفات. فقال: اذهب فاقتله، قال: فرأيتُه وحضرت صلاةُ العصر، فقلت: إنِّي لأخاف أن يكون بيني وبينه ما إن أؤخِّر الصلاة. فانطلقت أمشي، وأنا أصلِّي أومئ إيماءً نحوه. فلما دنُوت منه قال لي: من أنت؟ قلت: رجل من العرب، بلغني أنك تَجمع لهذا الرجل، فجئتك في ذاك، قال: إني لفي ذاك، فمشيتُ معه ساعةً حتى إذا أمكنني علوتُه بسيفي حتى برد.

وزاد رزين: وكان ساكنا بعُرنة، وكان يجمع لقتال رسول الله صلى الله عليه وسلم وفيه: قلتُ: إني لا أعرفه. قال:"إنه ثائر الرأس، كأنه شيطان، إذا رأيته لم يخفَ عليك؟" قال: فجئتُه فرأيتُه وعرفتُه.

حسن: رواه أبو داود (1249) عن أبي معمر عبد الله بن عمرو، حدثنا عبد الوارث، حدثنا محمد بن إسحاق، عن محمد بن جعفر، عن ابن عبد الله بن أُنَيس، عن أبيه فذكره.

ومن هذا الوجه رواه ابن خزيمة (982) وحسَّن إسنادَه الحافظ في"الفتح" (2/ 437).
قلت: وفيه علَّتان: إحداهما محمد بن إسحاق فإنه مدلس وقد عنعن. والثانية: ابن عبد الله بن أُنَيس، يقال هو: عبد الله بن عبد الله ترجمه البخاري وابن أبي حاتم ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا. وذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 37).

فأما العلة الأولى وهي تدليس ابن إسحاق فقد صرَّح به في مسند الإمام أحمد (16047)، وابن خزيمة (983)، وابن حبان (7160) كلهم من طريق يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن ابن إسحاق قال: حدثني محمد بن جعفر بن الزبير به في حديث طويل وهذا نصُّ الإمام أحمد:

قال: دعاني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إنَّه قد بلغني أنَّ خالد بن سفيان بن نُبَيح الهُذَلي، يجمَعُ لي الناس ليغزُوَني وهو بعُرَنة، فأتِهِ فاقتُلْه" قال: قلتُ: يا رسول الله! انعتْهُ لي حتَّى أعرفَه، قال:"إذا رَأَيْتَهُ وَجَدْتَ لهُ إقْشَعْريرةً". قال: فخرجتُ متوشِّحًا بسيفي حتَّى وقعتُ عليه، وهو بعُرَنَة مع ظُعُنٍ يرتادُ لهن منزلًا، وحين كان وقتُ العصر، فلما رأيتُه وجدتُ ما وصَفَ لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من الإقشعريرة، فأقبلتُ نحوه، وخشيتُ أن يكون بيني وبينه محاولةٌ تشغلُني عن الصلاة، فصليتُ وأنا أمشي نحوه أومئ برأسي الركوع والسجود، فلمَّا انتهيتُ إليه، قال: من الرجل؟ قلتُ: رجلٌ من العرب سمع بك وبجمعك لهذا الرجل، فجاءك لهذا. قال: أجل أنا في ذلك. قال: فمشيتُ معه شيئًا، حتَّى إذا أمكَنَني حَمَلْتُ عليه السيف حتَّي قتلتُه، ثم خرجتُ، وتركت ظعائنَه مُكِبّاتٍ عليه، فلمَّا قدِمتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم فرآني، فقال:"أَفْلَحَ الوَجْهُ"، قال: قلتُ: قتلتُه يا رسول الله! قال:"صدَقْتَ" قال: ثم قام معي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فدخل بي بيته، فأعطاني عصًا، فقال:"أمْسِكْ هذِهِ عِنْدَكَ، يا عبد الله بن أُنَيْس"، قال: فخرجتُ بها على الناس، فقالوا: ما هذا العصا؟ قال: قلتُ: أعطانيها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وأمرني أن أُمسكها، قالوا: أوَ لا ترجِعُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فتسألَه عن ذلك؟ قال: فرجعتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلتُ: يا رسولَ الله! لم أعطَيْتَني هذه العصا؟ قال:"آيَةُ بيني وبَيْنَكَ يومَ القِيَامَةِ، إنَّ أقْلَّ النَّاس المُتَخَصِّرُونَ يومئذٍ" قال: فقَرَنها عبد الله بسيفه، فلم تزل معه حتى إذا مات أمر بها فصُبَّتْ معه في كفنه، ثم دُفنا جميعًا. واللفظ لأحمد ومثله عند ابن حبان، وأما ابن خزيمة، فأحال على لفظ عبد الوارث.

وأما العلة الثانية وهي جهالة ابن عبد الله بن أُنَيس فهو لم ينفرد به في أصل القصة، بل تابعه أكثر من واحد، كما أن له إسنادًا آخر عند البيهقي في"الدلائل" (4/ 40، 41) وبهذه المتابعات والطرق يصل الإسناد إلى الحسن، إن شاء الله تعالي.

وقولي: زاد رزين: ذكره ابن الأثير في"جامع الأصول" (5/ 750).




আব্দুল্লাহ ইবনে উনায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ডাকলেন এবং বললেন, "আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে, খালিদ ইবনু সুফিয়ান ইবনু নুবাইহ আল-হুযালী আমার বিরুদ্ধে যুদ্ধ করার জন্য লোক জমা করছে, আর সে 'উরনাহ নামক স্থানে আছে। তুমি তার কাছে যাও এবং তাকে হত্যা করো।"

তিনি বলেন, আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! তাকে এমনভাবে বর্ণনা করুন যাতে আমি তাকে চিনতে পারি।" তিনি বললেন, "যখন তুমি তাকে দেখবে, তখন তোমার শরীরে কাঁপুনি অনুভব হবে (অর্থাৎ তুমি তাকে দেখেই ভয়মিশ্রিত অনুভূতি পাবে)।"

তিনি বলেন, অতঃপর আমি আমার তরবারি আড়াল করে বেরিয়ে পড়লাম, অবশেষে আমি তার কাছে পৌঁছলাম। সে তখন 'উরনাহ নামক স্থানে কিছু মহিলার (যাত্রীদল বা পরিবারের) সাথে ছিল এবং তাদের জন্য থাকার জায়গা খুঁজছিল। তখন আসরের সময় হয়ে গেল। যখন আমি তাকে দেখলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে যে কাঁপুনি (অনুভূতি) বর্ণনা করেছিলেন, আমি ঠিক তা-ই অনুভব করলাম। আমি তার দিকে অগ্রসর হলাম এবং ভয় পেলাম যে, তার সাথে আমার এমন কোনো কাজ বা সংঘর্ষ হতে পারে যা আমাকে সালাত থেকে বিরত রাখবে। তাই আমি তার দিকে হেঁটে যেতে যেতে সালাত আদায় করলাম, মাথা দিয়ে রুকু ও সিজদার ইশারা করছিলাম। যখন আমি তার কাছে পৌঁছলাম, সে বলল, "কে তুমি?"

আমি বললাম, "আমি একজন আরব ব্যক্তি। আমি তোমার সম্পর্কে এবং এই ব্যক্তির (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) বিরুদ্ধে তোমার লোক জমানোর খবর শুনেছি, তাই এই উদ্দেশ্যেই আমি তোমার কাছে এসেছি।" সে বলল, "হ্যাঁ, আমি সেই কাজই করছি।"

তিনি বলেন, অতঃপর আমি তার সাথে কিছুদূর হাঁটলাম, যখনই সুযোগ পেলাম, তার উপর তরবারি চালালাম এবং তাকে হত্যা করলাম। এরপর আমি চলে এলাম এবং তার মহিলাদেরকে (পরিবার বা সাথীদের) তার ওপর পড়ে ক্রন্দনরত অবস্থায় রেখে এলাম। যখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলাম, তিনি আমাকে দেখে বললেন, "তোমার মুখমণ্ডল সফল হয়েছে (তুমি সফলতা অর্জন করেছ)।"

তিনি বলেন, আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তাকে হত্যা করেছি।" তিনি বললেন, "তুমি সত্য বলেছ।"

তিনি বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে উঠে দাঁড়ালেন এবং আমাকে সাথে নিয়ে তাঁর ঘরে গেলেন। অতঃপর আমাকে একটি লাঠি দিলেন এবং বললেন, "হে আব্দুল্লাহ ইবনে উনায়স! এই লাঠিটি তোমার কাছে রাখো।"

তিনি বলেন, আমি সেটি নিয়ে লোকজনের কাছে গেলাম। তারা বলল, "এই লাঠি কীসের?" আমি বললাম, "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এটি দিয়েছেন এবং এটি কাছে রাখতে আদেশ করেছেন।" তারা বলল, "তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে গিয়ে এই সম্পর্কে জিজ্ঞেস করবে না?"

তিনি বলেন, অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে গেলাম এবং বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আমাকে এই লাঠি কেন দিলেন?" তিনি বললেন, "কিয়ামতের দিন এটি আমার ও তোমার মাঝে নিদর্শন হবে। কেননা, সেই দিন যারা লাঠি হাতে থাকবে, তারা হবে সবচেয়ে কম লোক।"

আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই লাঠিটিকে তার তরবারির সাথে বেঁধে রাখলেন। তাঁর মৃত্যুর আগ পর্যন্ত এটি তার সাথেই ছিল। যখন তিনি ইন্তেকাল করলেন, তিনি আদেশ করলেন যেন লাঠিটি তাঁর কাফনের সাথে দেওয়া হয় এবং অতঃপর দুটোই (আব্দুল্লাহ ও লাঠি) একসাথে দাফন করা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (2821)


2821 - عن عبد الرحمن بن أبي ليلى يقول: ما حدثنا أحدٌ رأى النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الضُّحى غير أمِّ هانئ، فإنَّها قالت: إنَّ النبي صلى الله عليه وسلم دخل بيتها يوم فتح مكة، فاغتسل، وصلَّى ثماني ركعات، فلم أر صلاة قط أخفَّ منها، غير أنَّه يُتم الركوع والسجود.

متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب التهجد (1176)، ومسلم في صلاة المسافرين (336/ 80) كلاهما من طريق شعبة، حدثنا عمرو بن مُرَّة، قال: سمعت عبد الرحمن بن أبي ليلى فذكره.

ورواه مالك في كتاب قصر الصلاة (28) عن أبي النضر مولي عمر بن عبيد الله، أنَّ أبا مُرَّة مولي عقيل بن أبي طالب أخبره، أنَّه سمع أمَّ هانئ بنت أبي طالب تقول: ذهبتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الفتح، فوجدتُه يغتسل، وفاطمة ابنتُه تستره بثوبٍ، قالت: فسلمتُ عليه. فقال:"من هذه؟" فقلتُ: أم هانئ بنت أبي طالب. فقال: مرحبا بأمِّ هانيء" فلمَّا فرغ من غسله، قام فصلَّى ثماني ركعات، ملتحفًا في ثوب واحد، ثم انصرف. فقلت: يا رسول الله! زعم ابنُ أمِّي عليٌّ أنَّه قاتلٌ رجلًا أجرتُه: فلانُ بن هُبَيرة. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد أجَرْنا من أجَرْتِ يا أمَّ هانئ" قالت أم هانيء: وذلك ضُحىً.

ورواه البخاري في كتاب الصلاة (357)، ومسلم في صلاة المسافرين (336/ 82) كلاهما من طريق مالك به مثله.

ورواه أبو داود (1290) من وجه آخر عن أمِّ هانئ أنِّ النبي صلى الله عليه وسلم يوم الفتح صلَّي سُبْحةَ الضُّحي ثمان ركعات يُسلِّم من كلِّ ركعتين. وإسناده صحيح.

وقولها:"ذهبت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم" أي إلى بيتها؛ فإن النبي صلى الله عليه وسلم دخل بيتها وهي خارجة منه، فدخلت والنبي صلى الله عليه وسلم يغتسل، وفاطمة تستره.

وهذه صلاة الفتح، ولذا لم يُر أن النبي صلى الله عليه وسلم صلاها بعد ذلك، ولكنْ صادف أنه صلاها في وقت الضحى فاشتهرت بصلاة الضحى.

وقد ثبت عن بعض الصحابة أن النبي صلى الله عليه وسلم لم يصلّ صلاة الضحى قط كما سيأتي في باب من لم ير سنية صلاة الضحى أصلا.




উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুল রহমান ইবনু আবি লায়লা বলেন: উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত অন্য কেউ আমাদেরকে এমন কোনো হাদীস বর্ণনা করেননি যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাতুদ-দুহা (চাশতের সালাত) আদায় করতে দেখেছেন। কারণ তিনি বলেছেন: মক্কা বিজয়ের দিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (উম্মে হানির) ঘরে প্রবেশ করলেন, অতঃপর গোসল করলেন এবং আট রাকআত সালাত আদায় করলেন। আমি এর চেয়ে হালকা সালাত আর কখনও দেখিনি, তবে তিনি পূর্ণাঙ্গভাবে রুকূ ও সিজদা সম্পন্ন করেছিলেন।

অন্য বর্ণনায় উম্মে হানি বিনত আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি মক্কা বিজয়ের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। আমি তাঁকে দেখলাম যে তিনি গোসল করছেন এবং তাঁর কন্যা ফাতেমা তাঁকে একটি কাপড় দিয়ে আড়াল করে রেখেছেন। তিনি বলেন: আমি তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: "এ কে?" আমি বললাম: আমি উম্মে হানি বিনত আবি তালিব। তিনি বললেন: "উম্মে হানি! তোমাকে স্বাগতম।" যখন তিনি গোসল শেষ করলেন, তখন উঠে দাঁড়ালেন এবং একটি মাত্র কাপড়ে আবৃত অবস্থায় আট রাকআত সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার আপন ভাই আলী ধারণা করে যে, আমি যাকে আশ্রয় দিয়েছি, সে হচ্ছে হুবাইরার পুত্র অমুক—তাকে সে হত্যা করবে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উম্মে হানি! তুমি যাকে আশ্রয় দিয়েছ, আমরাও তাকে আশ্রয় দিলাম।" উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আর এটা ছিল চাশতের সময় (দুহার ওয়াক্ত)।

(অন্য এক সূত্রে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিজয়ের দিন দুহার সালাত আট রাকআত আদায় করলেন এবং তিনি প্রতি দুই রাকআত পরপর সালাম ফিরাতেন।)









আল-জামি` আল-কামিল (2822)


2822 - عن أنس بن سيرين قال: سمعتُ أنسًا يقول: قال رجل من الأنصار: إنِّي لا أستطيع الصلاة معك -وكان رجلًا ضخمًا- فصنع للنبي صلى الله عليه وسلم طعامًا فدعاه إلى
منزله، فبسط له حصيرًا، ونَضَحَ طرف الحصير فصلَّي عليه ركعتين. فقال رجل من آل الجارود لأنس: أكان النبي صلى الله عليه وسلم يصلِّي الضُحى؟ قال: ما رأيتُه صلَّاها إلا يوَمئِذٍ.

صحيح: رواه البخاري في الأذان (670) عن آدم، وفي التهجد (1179) عن علي بن الجعد، كلاهما عن شعبة قال: حدثنا أنس بن سيرين، فذكره.

ورواه ابن ماجة (756)، وابن حبان (5295) فأدخلا بين أنس بن سيرين وأنس بن مالك:"عبد الحميد بن المنذر بن الجارود".

فقال الحافظ في"الفتح" (2/ 158):"اقتضى ذلك أن في رواية البخاري انقطاعًا، وهو مندفع بتصريح أنس بن سيرين بسماعه عن أنس، فحينئذ رواية ابن ماجة إما من المزيد في متَّصِلِ الأسانيد، وإمَّا أن يكون فيها وهم لكون ابن الجارود كان حاضرًا عند أنس لما حدَّث بهذا الحديث، وسأله عما سأله من ذلك، فظنَّ بعض الرواة أنَّ له فيه رواية" انتهى.

تنبيه: وقع في كلام الحافظ في قوله قبل هذا: وذلك أن البخاري أخرج هذا الحديث من رواية شعبة (كما سبق) وأخرجه في موضع آخر من رواية خالد الحذاء (وهو في كتاب الأدب 6080) كلاهما عن أنس بن سيرين،"عن عبد الحميد بن المنذر بن الجارود، عن أنس".

فقوله:"عن عبد الحميد بن المنذر" خطأ من الناسخ؛ لأنه لو ثبت في رواية البخاري الثانية ذكر"عبد الحميد بن المنذر" لما كان للحافظ التعقب عليه، ثم بعد الرجوع إلى رواية خالد الحذاء تبين أنه لا يوجد فيه ذكر"عبد الحميد بن المنذر" في الإسناد، فتنبه.

وقوله: رجل من الأنصار هو: عتبان بن مالك الأنصاري، لأن قصته شبيهة بقصته كما مضتْ.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক আনসারী ব্যক্তি বললেন, আমি আপনার সাথে (জামাতে) সালাত আদায় করতে পারি না -আর তিনি ছিলেন একজন স্থূলকায় মানুষ-। তাই তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য খাবার তৈরি করলেন এবং তাঁকে তাঁর বাড়িতে দাওয়াত করলেন। এরপর তাঁর জন্য একটি মাদুর বিছিয়ে দিলেন এবং মাদুরের এক প্রান্তে পানি ছিটিয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে দু’রাকাআত সালাত আদায় করলেন। এরপর আল-জারূদ গোত্রের একজন লোক আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করল: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি চাশতের (দুহার) সালাত আদায় করতেন? তিনি (আনাস) বললেন: আমি তাঁকে সেদিন ছাড়া আর কখনো তা আদায় করতে দেখিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (2823)


2823 - عن معاذة أنَّها سألت عائشة: كم كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي صلاة الضُّحى؟ قالت: أربع ركعات ويزيد ما شاء.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (719) عن شيان بن فروُّخ، حدّثنا عبد الوارث،

حدثنا يزيد (يعني الرِشْك) حدثتني معاذةُ فذكرت الحديث.

وسيأتي منها قولُها: ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصلي الضحى قط. كما سياتي أنه يُصلي الضُّحي

إذا جاء من مغيبه فالنفي يحمل على عدم المواظبة، والإثبات يحمل على مجيئه من السفر. لأن هذه

الأحاديث كلها صحيحة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুআ'যাহ তাকে জিজ্ঞেস করেছিলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাশতের সালাত (সালাতুদ-দুহা) কত রাকাত পড়তেন? তিনি (আয়িশা) বললেন: চার রাকাত, আর তিনি যা ইচ্ছা বৃদ্ধি করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2824)


2824 - عن أبي ذرٍّ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يُصبح على كلِّ سُلامَى من أحدكم صدقةٌ، فكلُّ تسبيحةٍ صدقة، وكلُّ تحميدة صدقةٌ، وكلُّ تهليلةٍ صدقةٌ، وكلُّ تكبيرةٍ صدقةٌ، وأمرٌ بالمعروف صدقة، ونهيٌ عن المنكر صدقةٌ، ويُجزِئُ من ذلك ركعتان يركعهما من الضُّحى".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (720) عن عبد الله بن محمد بن أسماء الضُبَعي، حدثنا مهدي (وهو ابن ميمون) حدثنا واصل مولى أبي عيينة، عن يحيى بن عقيل، عن يحيى بن يُعْمَر، عن أبي الأسود الدُولي، عن أبي ذر فذكره.

ورواه أبو داود (5243) عن أحمد بن منيع، عن عباد بن عباد عن واصل به وفيه من الزيادة:"تسليمُه على من لقي صدقةٌ، وإماطتُة الأذى عن الطريق صدقةٌ، وبُضْعتُه أهلَه صدقة" قالوا: يا رسول الله يأتي شهوةً وتكون له صدقةٌ؟ قال:"أرأيت لو وَضَعها في غير حقها أكان يأثم" قال:"ويُجزئ من ذلك كله ركعتان من الضُّحي" غير أنه لم يذكر بين يحيي بن يعمر وأبي ذر"أبا الأسود الدُولي" وثبت سماع يحيى من أبي ذر وغيره من الصحابة فالظاهر أنه روى الحديث على وجهين.

وقوله:"بالسُّلامَى" أراد به كل عظم ومفصل يعتمد عليه في الحركة. وأصل السلامي: عظم في فِرسن البَعير، ويجمع: السلاميات."شرح السنة" (4/ 142).




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের প্রত্যেকের শরীরের প্রতিটি জোড়ার উপর প্রতিদিন সকালে সাদকা আবশ্যক। প্রতিটি তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ) বলা সাদকা, প্রতিটি তাহমীদ (আলহামদুলিল্লাহ) বলা সাদকা, প্রতিটি তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) বলা সাদকা, প্রতিটি তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বলা সাদকা, সৎ কাজের আদেশ করা সাদকা এবং অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করা সাদকা। আর এই সবকিছুর জন্য যথেষ্ট হবে দু’রাকাত সালাত, যা সে চাশতের (দুহা) সময় আদায় করে।"

(অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত রয়েছে): "কারও সঙ্গে সাক্ষাৎ হলে তাঁকে সালাম দেওয়াও সাদকা, রাস্তা থেকে কষ্টদায়ক বস্তু সরানো সাদকা এবং তার স্ত্রীর সাথে সহবাস করাও সাদকা।" সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সে তো তার কামনা চরিতার্থ করে, তা কি তার জন্য সাদকা হবে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কি মনে করো না যে, যদি সে তা হারাম/অন্যায় পথে ব্যয় করত, তবে কি তার গুনাহ হতো? আর এই সবকিছুর জন্য যথেষ্ট হবে চাশতের দু'রাকাত সালাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (2825)


2825 - عن أبي ذر قال: أوصاني حبيبي صلى الله عليه وسلم بثلاثة لا أدعُهن إن شاء الله تعالى أبدًا.

أوصاني بصلاة الضُّحى، وبالوتر قبل النوم، وبصيام ثلاثة أيام من كل شهر.

صحيح: رواه النسائي (2404) عن علي بن حجر، قال: حدثنا إسماعيل، حدثنا محمد بن أبي حرملة، عن عطاء بن يسار، عن أبي ذرٍّ فذكره.

إسناده صحيحٌ، وقد صحّحه أيضًا ابن خزيمة (1083) فرواه عن علي بن حجر السعدي، والإمام أحمد (21518) عن سليمان بن داود الهاشمي، كلاهما عن إسماعيل به مثله.

وإسماعيل هو: ابن جعفر بن أبي كثير الأنصاري الزُّرَقي من رجال الجماعة.




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার প্রিয়তম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ের উপদেশ দিয়েছেন, যা আমি আল্লাহ্‌র ইচ্ছায় কখনো ছাড়ব না। তিনি আমাকে চাশতের (দুহা) সালাতের, ঘুমানোর পূর্বে বিতর সালাতের এবং প্রতি মাসে তিন দিন সওম (রোযা) পালনের উপদেশ দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2826)


2826 - عن أبي الدرداء وأبي ذر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الله عز وجل أنَّه قال:"ابن آدم اركع لي من أوَّل النهار أربع ركعات أكفِك آخِرَه".

حسن: رواه الترمذي (475) عن أبي جعفر السمناني، حدثنا أبو مُسْهِر، حدثنا إسماعيل بن عياش، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن جبير بن نفير، عن أبي الدرداء وأبي ذر فذكراه.

وإسناده حسن لأجل إسماعيل بن عياش فإنه صدوق في روايته عن أهل بلده، ويحبر بن سعد من بلده الحمص الشامي، وبقية رجاله ثقات.

قال الترمذي:"حسن غريب".

ورواه الإمام أحمد (27480) من وجه آخر عن أبي المغيرة، قال: حدثنا صفوان، قال: حدثني شُريح بن عبيد الحضرمي وغيره عن أبي الدرداء نحوه.

قال الهيثمي (3410) رواه أحمد ورجاله ثقات.

قلت: وهو كما قال إلَّا أنَّ فيه انقطاعًا، فإن شريح بن عبيد لم يسمع من أبي الدّرداء.




আবূ দারদা ও আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর পক্ষ থেকে বর্ণনা করেন যে, আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "হে আদম সন্তান! তুমি দিনের প্রথমভাগে আমার জন্য চার রাকাত সালাত আদায় করো, আমি তোমার দিনের শেষভাগের জন্য যথেষ্ট হয়ে যাবো।"









আল-জামি` আল-কামিল (2827)


2827 - عن أبي الدرداء قال: أوصاني حبيبي بثلاث، لن أدعَهن ما عِشتُ: بصيام ثلاثة أيام من كل شهر، وصلاةِ الضُّحى، وبأن لا أنامَ حتى أوتر.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (722) عن هارون بن عبد الله ومحمد بن رافع، قالا: حدثنا ابن أبي فُديك، عن الضّحاك بن عثمان، عن إبراهيم بن عبد الله بن حُنين، عن أبي مُرة مولى أم هانيء، عن أبي الدرداء فذكره.




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমার প্রিয় বন্ধু (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ে উপদেশ দিয়েছেন, আমি যতদিন জীবিত থাকব, ততদিন এগুলো ত্যাগ করব না: প্রতি মাসে তিন দিন সাওম পালন করা, চাশতের (দুহা) সালাত আদায় করা এবং বিতর সালাত আদায় না করে না ঘুমানো।