হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2828)


2828 - عن بريدة يقول: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"في الإنسان ثلاثمائة وستون مفْصلًا، فعليه أن يتصدق عن كل مفْصلٍ منه بصدقةٍ" قالوا: ومن يُطيق ذلك يا نبي الله؟ قال:"النخاعة في المسجد تدفِنُها، والشيء تُنحّيه عن الطريق، فإن لم تجد فركعتا الضُّحي تُجزئك".

حسن: رواه أبو داود (5242) عن أحمد بن محمد المروزي، قال: حدثني علي بن حسين، قال: حدثني أبي، قال: حدثني عبد الله بن بريدة، قال: سمعتُ أبي بريدةَ فذكر الحديث.

وإسناده حسن للكلام في حين وهو: ابن واقد المروزيّ غير أنَّه حسن الحديث.

وقد أخرجه ابن خزيمة (1226)، وابن حبان (1642، 2540) كلاهما من طريق حسين بن واقد به مثله.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "মানুষের শরীরে তিনশত ষাটটি গ্রন্থি (বা জোড়) রয়েছে। অতএব, তার উচিত সেগুলোর প্রত্যেকটির পক্ষ থেকে একটি করে সাদাকা (দান) করা।" সাহাবাগণ বললেন, "হে আল্লাহর নবী, কে তা করার সামর্থ্য রাখে?" তিনি বললেন, "মসজিদে কফ পুঁতে দেওয়া এবং রাস্তা থেকে কোনো কষ্টদায়ক জিনিস সরিয়ে দেওয়াও (সাদাকা)। আর যদি তুমি তা না পাও, তাহলে দু'রাকাত সালাতুদ-দুহা তোমার জন্য যথেষ্ট হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2829)


2829 - عن عِتبان بن مالك: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى في بيته سُبْحةَ الضُّحي، فقاموا وراءه فصلّوا بصلاته.

صحيح: رواه الإمام أحمد (23773) عن عثمان بن عمر، حدثنا يونس، عن الزهري، عن محمود بن الربيع، عن عِتْبان بن مالك فذكره.

ورواه أيضًا (16479) عن يحي بن آدم، قال: حدثنا ابن المبارك، عن معمر، عن الزهري به ولفظه: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم ضُحّي، وسلَّمنا حين سلَّم، وأنه -يعني- صلَّى بهم في مسجدٍ عندهم، وصحّحه ابن خزيمة (1231) ورواه من طريق عثمان بن عمر به مثله.

وأصل حديث عِتبان عند مالك في قصر الصلاة (86) عن ابن شهاب، عن محمود بن الربيعلاالأنصاري أنَّ عِتبان بن مالك كان يؤُم قومه، وهو أعمى، وأنَّه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: إنَّها تكون الظُّلمةُ، والمطرُ، والسيلُ، وأنا رجلٌ ضريرُ البصرِ، فصَلِّ يا رسول الله! في بيتي مكانًا اتخذه مُصلًّى، فجاءه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أين تحبُّ أن أصلِّيَ؟ فأشار له إلى مكانٍ من البيت. فصلَّي فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم.

ورواه البخاري في الأذان (667) عن إسماعيل، قال: حدثني مالك به مثله. ورواه هو أيضًا في مواضع منها في الصلاة -المساجد في البيوت- (425) ومنها في الأذان (838، 840).
ومسلم في المساجد (33/ 263) من طرقٍ غير مالك، عن ابن شهاب به مختصرًا ومطوَّلًا.

ورواه البغوي في"شرح السنة" (4/ 136) من طريق عثمان بن عمر، نا يونس، عن الزهري، به ولفظه:"صلَّى في بيته سُبحة الضُّحى، فقاموا وراءه فصلَّوا". وقال:"متفق على صحته".

وفيه نظر، فإن الشيخين لم يخرجا اللفظ الذي ساقه البغوي وحديث يونس عن الزهري رواه البخاري في المغازي (4010) وليس فيه لفظ الضُحى، ولكن ذكره البخاري معلَّقًا وبوَّبه بقوله:

"صلاة الضُّحى في الحضر قاله عِتْبان بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم""الفتح" (3/ 56) وأشار الحافظ إلى رواية الإمام أحمد عن عثمان بن عمر، عن يونس به.




ইৎবান ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ঘরে চাশতের (দুহা’র) নফল সালাত আদায় করলেন। তখন সাহাবীগণ তাঁর পেছনে দাঁড়ালেন এবং তাঁর অনুসরণ করে সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2830)


2830 - عن أبي هريرة قال: أوصاني خليلي بثلاث، لا أدعهن حتى أموت: صوم ثلاثة أيام من كل شهر، وصلاة الضُّحى، ونوم على وتر.

متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1178)، ومسلم في صلاة المسافرين (721) كلاهما من طريق شُعبة، حدثنا عباس الجُريري -وهو ابن فروُّخ- عن أبي عثمان النهدي، عن أبي هريرة فذكره، واللفظ للبخاري.

وفي لفظ مسلم:"وركعتي الضُّحي".

وزاد أحمد (10559)، وابن خزيمة (1223) من طريق سليمان بن أبي سليمان، عن أبي هريرة بعد قوله: وصلاة الضُّحى-"فإنَّها صلاة الأوَّابين".

ولكن سليمان بن أبي سليمان قال فيه الدارقطني: مجهول، ولم يوثقه غير ابن حبان وسيأتي حديث زيد بن أرقم:"صلاة الأوَّابين حين ترمض الفِصال" وهي صلاةُ الضُّحى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার বন্ধু (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তিনটি বিষয়ে অসিয়ত করেছেন, যা আমি মৃত্যু পর্যন্ত ছাড়ব না: প্রতি মাসে তিন দিন সওম (রোযা) পালন করা, চাশ্‌তের (দুহা) সালাত (নামায) আদায় করা এবং বিতর নামায পড়ে ঘুমানো।









আল-জামি` আল-কামিল (2831)


2831 - عن أبي هريرة قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثًا، فأعظَموا الغنيمةَ وأسرعوا الكرَّة، فقال رجل: يا رسول الله! ما رأينا بعثًا قط أسرع كرَّةٌ، ولا أعظم منه غنيمةً من هذا البعث؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا أخبركم بأسرع كرَّةً منه، وأعظم غنيمةً! رجل توضأ في بيته فأحسن وضوءَه، ثم عمد إلى المسجد فصلَّي فيه الغداةَ، ثم عقَّب بصلاة الضَّحْوةِ، فقد أسرع الكرَّة وأعظم الغنيمة".

حسن: رواه أبو يعلي (6528) عن أبي (وهو ابن أبي شيبة) حدثنا حاتم (ابن إسماعيل) عن حُميد بن صَخْرٍ، عن المقبري، عن أبي هريرة فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 235): رجاله رجال الصحيح.

قلت: وهو كما قال إلَّا أنَّ حميد بن صخر وإن كان من رجال مسلم وهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
أبي بكر بن أبي شيبة به مثله.

وأورده المنذري في"الترغيب والترهيب" (1/ 463) وقال كما قال الهيثمي وزاد: والبزار وابن حبان في صحيحه، وبين البزار في روايته أن الرجل أبو بكر رضي الله عنه. انتهى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সামরিক বাহিনী প্রেরণ করলেন। তারা প্রচুর গণীমত অর্জন করল এবং দ্রুত ফিরে এল। তখন এক ব্যক্তি বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমরা এই অভিযানের চেয়ে দ্রুত প্রত্যাবর্তনকারী বা এর চেয়ে অধিক গণীমত অর্জনকারী কোনো বাহিনী দেখিনি।’ তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আমি কি তোমাদেরকে এর চেয়েও দ্রুত প্রত্যাবর্তনকারী এবং অধিক গণীমত অর্জনকারী বিষয়ে অবহিত করব না? সে হলো এমন ব্যক্তি, যে তার ঘরে উত্তমরূপে উযু করল, অতঃপর মসজিদের দিকে গেল এবং সেখানে ফজরের সালাত আদায় করল, অতঃপর (সূর্যোদয়ের পর) দুহা (চাশত)-এর সালাত আদায় করল। সে-ই দ্রুত প্রত্যাবর্তন করল এবং প্রচুর গণীমত অর্জন করল।”









আল-জামি` আল-কামিল (2832)


2832 - عن نُعيم بن هَمَّار، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يقول الله عز وجل: يا ابنَ آدم لا تُعجزني من أربعِ ركعاتٍ في أوَّل نهارك، أَكْفِك آخره".

حسن: رواه أبو داود (1289) عن داود بن رُشيد، ثنا الوليد، عن سعيد بن عبد العزيز، عن مكحول، عن كثير بن مُرَّة، عن نُعيم بن هَمَّار فذكره.

إسناده صحيح ورجاله ثقات غير أن الوليد بن مسلم كان يدلس تدليس التسوية، وقد صرَّح بالتحديث في رواية الإمام أحمد (22470) فإنه رواه عن الوليد بن مسلم قال: حدثنا سعيد، يعني ابن عبد العزيز إلَّا أنَّه سقط من السند"كثير بن مُرَّة" بين مكحول ونُعيم بن هَمَّار.

ولم أجد من نَصَّ على سماع مكحول من نُعَيم بن هَمَّار، وقد ثبت ذكر كثير بن مُرَّة في الأسانيد الأخرى، منها ما رواه الإمام أحمد (22475) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، حدثنا محمد بن راشد الدمشقي، حدثنا مكحول، عن كثير بن مرة الحضرمي، عن نعيم بن هَمَّار فذكر الحديث. وهذا الإسناد رجاله ثقات غير محمد بن راشد الدمشقي فهو صدوق.

كما رواه أيضًا الإمام أحمد بأسانيد أخرى بذكر كثير بن مُرَّة، وكذا رواه أيضًا ابن حبان (2533) من وجه آخر عن سليمان بن موسى، عن مكحول، عن كثير بن مُرَّة، عن قيس الجُذامي، عن نُعَيم بن همَّار، فأدخل بين كثير بن مُرَّة ونُعَيم"قيس الجذامي".

ورواه أيضًا ابن حبان (2534) من وجه آخر عن الوليد بن مسلم، ثنا الوليد بن سليمان بن أبي السائب، عن بسر بن عبيد الله، عن أبي إدريس الخولاني، عن نعيم بن همار الغطفاني فذكره. وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات، وقد صرَّح الوليد بن مسلم بالتحديث.

وأمَّا ما رواه أحمد (22473) عن أبي مُرَّة الطائفي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مثله فجعل بعض أهل العلم اعتمادًا على هذه الرواية بأنَّ أبا مُرَّة من الصحابة، ولذا افرده الهيثمي في"المجمع" (2/ 236) وقال: رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح، ولم يجزم بصحبته الحافظ في"التقريب" فقال في ترجمة"أبي مرة" شيخ لمكحول، يقال: له صحبة، وقيل: الصواب: أنه كثير بن مُرَّة. انتهى.

قلت: هذا الأخير هو أقرب إلى الصّواب.

لأن الإمام أحمد رواه عن يحيى بن إسحاق، قال: أخبرني سعيد بن عبد العزيز، عن مكحول، عن أبي مرة الطائفي قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث. وسبق أن رواه عن الوليد بن مسلم، حدثنا سعيد -يعني ابن عبد العزيز- حدثنا مكحول، عن نعيم بن همار (22470).

قال المزي في"التحفة" (9/ 288) بعد أن عزا حديث أبي مُرَّة إلى النسائي في الكبري:
المحفوظ حديث سعيد بن عبد العزيز، عن مكحول، عن كثير بن مرة، عن نعيم بن همار، وقيل: عن مكحول، عن كثير بن مرة، عن قيس الجذامي، عن نعيم بن همار" انتهى.

وكثير بن مُرَّة الحضرميّ الحمصيّ من الثانية، قال الحافظ في التقريب: ووهم من عدّه من الصحابة. وهو ثقة. انتهى.




নুআইম ইবনু হাম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল বলেন, 'হে আদম সন্তান! দিনের শুরুতে (পূর্বাহ্নে) আমার জন্য তুমি চার রাকাত নামায আদায় করতে অপারগ হয়ো না, [যদি তা করো] তাহলে আমি তোমার দিনের শেষভাগ পর্যন্ত সকল কাজের জন্য যথেষ্ট হয়ে যাবো।'"









আল-জামি` আল-কামিল (2833)


2833 - عن عقبة بن عامر الجُهني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الله يقول: يا ابن آدم! اكفني أوَّل النهار بأربع ركعاتٍ، أكفِك بهنَّ آخرَ يومِك".

صحيح: رواه الإمام أحمد (17390)، وأبو يعلى (1757) كلاهما من طريق يزيد بن هارون، حدثنا أبان بن يزيد العَطَّار، عن قتادة، عن نُعيم بن هَمَّار، عن عقبة بن عامر فذكره.

وإسناده صحيح، وقتادة وإن كان مدلَّسًا فقد صرَّح بالتحديث عند الإمام أحمد في رواية أخرى (17794) رواه عن عفَّان، قال: أخبرنا أبان، قال: حدثنا قتادة، قال: حدثنا نعيم بن همار به مثله.

ونعيم بن همار وعقبة بن عامر كلاهما صحابيان فصحَّ الحديث من وجهين، ولا يُعل أحدُهما الآخر.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 235):"رواه أحمد وأبو يعلى ورجاله رجال ثقات".




উকবাহ ইবনু আমির আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা বলেন: হে আদম সন্তান! দিনের শুরুতে আমার জন্য চারটি রাকআত যথেষ্ট করো (আদায় করো); এর বিনিময়ে আমি তোমার দিনের শেষভাগ পর্যন্ত তোমার জন্য যথেষ্ট হয়ে যাব।"









আল-জামি` আল-কামিল (2834)


2834 - عن النوَّاس بن سمعان قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"قال الله عز وجل: ابن آدم، لا تعجزنَّ من أربع ركعات في أوَّل النهار، أكْفِك آخِرَه".

صحيح: قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 236): رواه الطبراني في الكبير ورجاله ثقات". إلا أني لم أقف على إسناده، وهذا الحكم مبني على قول الهيثمي، ثم وقفت على كلام العيني في عمدة القاري (7/ 147) فقال: حديث النواس بن سمعان عند الطبراني في الكبير من رواية أبي إدريس الخولاني، قال: سمعت النواس بن سمعان، فذكر الحديث، وقال:"إسناده صحيح".




নাওয়াস বিন সামআন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: “আল্লাহ তাআলা বলেন: হে আদম সন্তান, তুমি দিনের শুরুতে চার রাকাত (নামায) আদায়ে অলসতা করো না, আমি তোমার দিনের শেষভাগ পর্যন্ত তোমার জন্য যথেষ্ট হয়ে যাবো।”









আল-জামি` আল-কামিল (2835)


2835 - عن أبي أمامة قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من خرج من بيته متطهَّرًا إلى صلاة مكتوبة فأجره كأجر الحاج المحرم، ومن خرج إلى تسبيح الضُّحى لا ينصبه إلَّا إيَّاه فأجره كأجر المعتمر، وصلاة إِثرَ صلاة لا لغو بينهما كتاب في عليَّين".

حسن: رواه أبو داود (558) وأحمد (22304) كلاهما من طريق يحيى بن الحارث، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة فذكره. واللفظ لأبي داود.

وإسناده حسن لأجل الكلام في القاسم وهو: ابن عبد الرحمن الشامي الدمشقي مختلف فيه، وثقه ابن معين والعجلي والترمذي وغيرهم، وضعَّفه البعض بأنَّ عِنده مناكير، وقد قيل: إنَّ المناكير عمَّن رواه عنه من الضعفاء، وأما الثقات فلا، والخلاصة فيه أنَّه حسن الإسناد إذا لم يرو ما يُنْكَر عليه.




আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো ফরয সালাতের জন্য নিজ ঘর থেকে পবিত্রতা অর্জন করে বের হয়, তার সওয়াব মুহরিম হাজী ব্যক্তির সওয়াবের মতো। আর যে ব্যক্তি কেবল সালাতুদ-দুহা (চাশতের সালাত) আদায়ের উদ্দেশ্যে বের হয় এবং অন্য কোনো উদ্দেশ্য তাকে প্রেরণা না যোগায়, তার সওয়াব উমরাহকারীর সওয়াবের মতো। আর এক সালাতের পর আরেক সালাত—যার মাঝে কোনো অনর্থক কথা নেই—তা 'ইল্লিয়্যীনে' লিপিবদ্ধ হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2836)


2836 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: بعث رسولُ الله صلى الله عليه وسلم سَريَّةً، فغَنِموا، وأسْرَعوا الرجْعَة، فتحدَّث الناس بقُرْبِ مغْزاهم، وكثرة غَنيمتِهم، وسرعة رَجْعتِهم،
فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا أدلُّكم على أقرب منه مغزىّ، وأكثرَ غَنيمةً، وأوشك رجْعَةً؟ من توضَّأ ثمَّ غدا إلى المسجد لسُبحةِ الضُّحى، فهو أقربُ مغرّى، وأكثرُ غَنيمَةً، وأوشك رَجْعَةً".

حسن: رواه الإمام أحمد (6638) عن حسن، حدثنا ابن لهيعة، حُدثني حُييُّ بن عبد الله، أن أبا عبد الرحمن الحُبُلي حدَّثه، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وإسناده حسن فإنَّ حييَّ بن عبد الله مختلف فيه، وخلاصة القول فيه كما قال ابن عدي: أرجو أنَّه لا بأس به إذا روى عنه ثقة.

وابن لهيعة فيه كلام معروف، إلَّا أنَّه توبع؛ فقد رواه الطبراني في"الكبير" (100 - قطعة من الجزء 13 - 14) من وجه آخر عن ابن وهب، حدّثني حيي، بإسناده مثله.

وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 235):"رواه أحمد والطبراني في الكبير، وفيه ابن لهيعة وفيه كلام، ورجال الطبراني ثقات، لأنه جعل بدل ابن لهيعة ابن وهب".

وقال المنذري في"الترغيب والترهيب" (1/ 463):"رواه أحمد من رواية ابن لهيعة، والطبراني بإسناد جيد".




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি ছোট সামরিক দল (সারিয়্যাহ) প্রেরণ করলেন। তারা গণীমত লাভ করল এবং দ্রুত প্রত্যাবর্তন করল। তখন লোকেরা তাদের অভিযানের নৈকট্য, গণীমতের প্রাচুর্য এবং দ্রুত প্রত্যাবর্তনের বিষয়ে আলোচনা করতে লাগল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি তোমাদেরকে এমন একটি অভিযানের সন্ধান দেব না যা এর চেয়েও বেশি নিকটে, অধিক গণীমতপূর্ণ এবং দ্রুত প্রত্যাবর্তনের অধিকারী? যে ব্যক্তি উযু করে, অতঃপর সালাতুদ্-দুহার (চাশতের) সালাত আদায়ের জন্য মসজিদের দিকে যায়, তবে এটি হলো সবচেয়ে নিকটে অভিযান, অধিক গণীমতপূর্ণ এবং দ্রুত প্রত্যাবর্তনের অধিকারী।"









আল-জামি` আল-কামিল (2837)


2837 - عن علي قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصَلَّي من الضَّحى.

حسن: رواه الإمام أحمد (682) عن سليمان بن داود، أخبرنا شعبةُ، عن أبي إسحاق، سمع عاصم بن ضمْرة، عن علي فذكره.

وسليمان بن داود هو: ابن الجارود أبو داود الطيالسي صاحب المسند (ت 204) والحديث في مسنده (129) من هذا الوجه وعنه رواه النسائي في الكبري (471).

ورواه ابن خزيمة في صحيحه (1232) عن محمد بن عبد الله المخرَّمي، ثنا أبو عامر، عن شعبة به مثله. قال المخرَّمي: هكذا حدثنا به مختصرًا.

قلت: هذا حديث مختصر من حديث طويل، انظر: تطوع النبي صلى الله عليه وسلم في النهار، جموع أبواب النوافل التابعة للفرائض وفيه: إذا كان الشمس من هاهنا كهيئتها من هاهنا عند العصر صلى ركعتين. فهذه صلاة الضُّحى قاله ابن خزيمة.

وإسناده حسن لأجل عاصم بن ضمْرة.

وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 235):"رجال أحمد ثقات".

وأما ما رُوي عن أبي أمامة، وعتبة بن عبد الله السلمي حدثاه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من صلى صلاة الصبح في جماعة، ثم ثبت في المسجد يسبح الله سبحة الضُّحى كان له كأجر حاج ومعتمر، تامًّا له حجته وعمرته" فهو ضعيف.
رواه الطبراني في الكبير (8/ 174، 180، 181) (17/ 129) من طرق عن الأحوص بن حكيم، عن عبد الله بن عامر، عن أبي أمامة وعتبة، وفي بعض طرقه عن أبي أمامة وحده.

قال الهيثمي في"المجمع" (10/ 104): وفيه الأحوص بن حكيم وثقه العجلي وغيره، وضعَّفه جماعة، وبقية رجاله ثقات. وفي بعضهم خلاف".

وقال المنذري في"الترغيب والترهيب" (1/ 296):"رواه الطبراني وإسناده جيد".

قلت: ليس إسناده بجيد، فإنَّ الأحوصّ بنَ حكيم تكلَّم فيه أهل العلم، فقال ابن معين: ليس بشيء، وقال السعدي: ليس بالقوي في الحديث، وقال النسائي: ضعيف.

وفي التقريب: أطلق الحافظ عليه كلمة:"ضعيف الحفظ".

وكذلك ما رُوي عن معاذ بن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من قعد في مصلاه حين ينصرف من صلاة الصبح حتى يُسبّح ركعتي الضُّحى، لا يقول إلَّا خيرًا، غُفِر له خطاياه، وإن كانت أكثر من زبد البحر".

رواه أبو داود (1287) عن محمد بن سلمة المرادي، حدثنا ابن وهب، عن يحيى بن أيوب، عن زبَّان بن فائد، عن سهل بن معاذ بن أنس الجهني، عن أبيه فذكر الحديث.

وإسناده ضعيف فإن زبان بن فائد -بالفاء- البصري قال فيه ابن معين: شيخ ضعيف، وقال الإمام أحمد: أحاديثه مناكير، وقال ابن حبان: منكر الحديث جدَّا. وأطلق عليه حافظ كلمة"ضيف الحديث".

وكذلك ما رُوي عن أبي أمامة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لأن أذكر الله تعالى من طلوع الشمس أكبِّر وأهللُ وأسبح، أحبُّ إلي من أن أُعتق أربعًا من ولد إسماعيل، ولأن أذكر الله من صلاة العصر إلى أن تغيب الشمسُ أحبُّ إلي من أن أعتق كذا وكذا من وَلَد إسماعيل".

رواه أحمد (22185)، والطبراني في"الكبير" (8028) وفي"الدعاء" (1882) في الجميع من طريق سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أبي طالب الضُبعي، عن أبي أمامة فذكره.

وعلي بن زيد - هو ابن جدعان ضعيف.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম চাশতের (দুহা) সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2838)


2838 - عن عائشة أنها قالت: ما رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي سُبحةَ الضُّحى قط، وإني لأُسَبِّحُها، وإن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليدعُ العملَ، وهو يُحبُّ أن يعملَه خشية أن يعمل به الناسُ فيُفرضَ عليهم.
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (29) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة

فذكرت مثله.

رواه البخاري في التهجد (1128) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في صلاة المسافرين (718) عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالك به مثله.

ثم روى مالك عن زيد بن أسلم، عن عائشة: أنها كانت تُصلي الضُّحي ثماني ركعات، ثم تقول: لو نُشر لي أبوايَّ ما تركتُهن.

وفيه انقطاع، لأن زيد بن أسلم لم يسمع من عائشة.

ورواه النسائي في"الكبرى" (484) بشيء من التفصيل من طريق عاصم بن عمر بن قتادة، عن جدته رُميثة قالت: أصبحتُ عند عائشة، فلمَّا أصبحنا، قامت فاغتسلت، ثم دخلت بيتًا لها، فأجافتِ البابَ، قلت: يا أم المؤمنين! ما أصبحتُ عندكِ إلَّا لهذه الساعة، قالت: فادخلي، قالت: فدخلتُ. فقامت، فصلَّتْ ثماني ركعات، لا أدري أقيامهنَّ أطولُ أم ركوعهنَّ، أم سجودهنَّ؟ ثم التفَتتْ إلىَّ فضربتْ فخذيّ، فقالت: يا رْميثةُ! رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصليها، ولو نُشر لي أبوايَّ على تركها ما تركتُها.

ورواه الإمام أحمد (25078) مختصرًا عن وكيع، حدثنا أبي، عن سعيد بن مسروق، عن أبان ابن صالح، عن أم حكيم، عن عائشة فذكرت باختصار.

وأم حكيم هي: رميثة الصحابية جدة عاصم بن عمر. قال المزي: قيل: إنها رميثة بنت حكيم.

قلت: وقيل غير ذلك.

وفي إسناد الإمام أحمد والد وكيع وهو: الجراح بن مُليح مختلف فيه.

قال الحافظ في التقريب:"صدوق يهم".

وقول عائشة:"ما رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يُصلى سبحة الضُّحى قط" لعلها قصدت عدم مداومته، وإلا فقد ثبت في الأحاديث الصحيحة أنه صلى الله عليه وسلم صلَّاها إلَّا انَّه لم يُداوم عليها خشيةَ أن تُفرضَ.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কখনও দুহার (চাশতের) সালাত আদায় করতে দেখিনি। কিন্তু আমি অবশ্যই তা আদায় করি। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো আমলকে পছন্দ করা সত্ত্বেও তা ছেড়ে দিতেন, এই আশঙ্কায় যে, লোকেরা যদি তা নিয়মিত করে, তবে তা তাদের উপর ফরয হয়ে যাবে।









আল-জামি` আল-কামিল (2839)


2839 - عن أبي هريرة قال: ما رأيتُ النبي صلى الله عليه وسلم صلى الضُّحي قط إلَّا مرةً واحدةً.

حسن: رواه الإمام أحمد (9758) عن وكيع، والبزار"كشف الأستار" (696) من طريق قبيصة كلاهما عن سفيان، عن عاصم بن كليب، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن للكلام في عاصم وأبيه غير أنهما صدوقان.

قال البزّار: لا نعلم رواه عن عاصم إلا سفيان، ورواه عن سفيان قبيصةُ ووكيع.

قلت: وهو كما قال، ورواه أيضًا النسائي في"الكبرى" (479) من طريق وكيع، إلَّا أنَّه لم يذكر المستثني، وهو قول أبي هريرة:"إلَّا مَرَّة واحدة"، والبزّار من طريق قبيصة، عن سفيان به.

ونفي أبي هريرة محمول على علمه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কখনো সালাতুদ-দুহা (চাশতের সালাত) আদায় করতে দেখিনি, কেবল একবার ছাড়া।









আল-জামি` আল-কামিল (2840)


2840 - عن عبد الله بن شقيق قال: قلتُ لعائشة: أكان النبي صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي الضُّحى؟ قالت: لا، إلا أن يجيء من مَغِيبِه.

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (717) عن يحيى بن يحيى، أخبرنا يزيد بن زُريع، عن سعيد الجُريري، عن عبد الله بن شقيق به مثله.

ويحمل عليه حديث عائشة رواه ابن حبان في صحيحه (2531) قالت: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم بيتي فصلي الضُّحى ثمان ركعات. وفيه المطلب بن عبد الله بن حنطب يروي عن عائشة، وفي سماعه منها اختلاف وأكثر الأئمة على أنه لم يسمع منها. قال أبو حاتم: لم يدرك عائشة، وعامة حديثه مراسيل. وقال أبو زرعة: أرجو أن يكون سمع منها.

وقد ثبت في صحيح مسلم أنها قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يُصلِّي الضُّحى أربع ركعات ويزيد ما شاء، ولعلها تقصد من الزيادة هذه الثمانية.

ولأهل العلم عدة أقوال في الجمع بين أقوال عائشة، انظر:"الفتح" (3/ 56)، وأشهرها ما قاله ابن حبان في صحيحه (6/ 271): إثبات عائشة صلاة الضُّحى للمصطفى صلى الله عليه وسلم أرادت به في البيت دون مسجد الجماعة، لأنه صلى الله عليه وسلم قال:"أفضل صلاتكم في بيوتكم إلا المكتوبة" انتهى.

قال الحافظ بعد أن عزا هذا الجمع إلى المحب الطبري وبأنه أخذه من كلام ابن حبان:"ويُعكِّر عليه حديث الباب -وهو قولها: ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم سبَّح سُبحةَ الضُّحي، وإني لأسبِّحها- قال: ويجاب عنه بأن المنفي صفة مخصوصة" انتهى.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আব্দুল্লাহ ইবনে শাকীক) বলেন, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি চাশতের (দুহা’র) সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: না, তবে যখন তিনি কোনো সফর বা অনুপস্থিতি থেকে ফিরে আসতেন (তখন আদায় করতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (2841)


2841 - عن ابن عمر قال: إنَّ النبي صلى الله عليه وسلم لم يكن يصلي الضَّحى إلا أن يقدم من غَيبةٍ.

حسن: رواه ابن خزيمة (1229) عن إسحاق بن إبراهيم الصّواف، نا سالم بن نوح العطار، أخبرنا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

رواه أيضًا ابن حبان في صحيحه (2528) عن أبي عروبة، قال: حدثنا إسحاق بن إبراهيم الصواف به مثله.

وإسناده حسن لأجل الكلام في سالم بن نوح العطار تكلم فيه ابن معين والنسائي. وقال الإمام أحمد: ما بحديثه بأس.

والراوي عنه الصواف هو: إسحاق بن إبراهيم بن محمد الصواف الباهلي أبو يعقوب البصري من شيوخ البخاري.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম চাশতের সালাত (দু'হা) আদায় করতেন না, তবে যখন তিনি কোনো অনুপস্থিতি বা সফর থেকে প্রত্যাবর্তন করতেন (তখন আদায় করতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (2842)


2842 - عن أنس بن مالك قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر صلي سُبحة الضُّحى ثمان ركعات، فلما انصرف قال:"إنِّي صلَّيتُ صلاة رغبةٍ ورَهْبةٍ، سألت ربِّي ثلاثًا.
فأعطاني ثنتين ومنعني واحدة. سألتُه أن لا يبتلي أمتي بالسنين، ففعل، وسألتُه أن لا يُظهر عليهم عدوَّهم، ففعل، وسألته أن لا يلبِسَهم شيعًا فأبى عليَّ".

حسن: رواه الإمام أحمد (12486)، والنسائي في"السنن الكبرى" (489) كلاهما من طريق عمرو ابن الحارث، عن بكير بن الأشج، أن الضحاك بن عبد الله القرشي حدَّثه، عن أنس بن مالك فذكره. وصححه ابن خزيمة (1228)، والحاكم (1/ 314).

ولكن قال البخاري في"تاريخه" (4/ 334):"الضحاك بن عبد الله القرشي، عن أنس، روي عنه بكير بن الأشج، إن لم يكن ابن خالد فلا أعرفه".

قلت: الظاهر هو: الضحاك بن عثمان بن عبد الله بن خالد الأسدي الحزامي من رجال مسلم والسنن وهذا الذي ترجمه المزي في تهذيب الكمال، والحافظ في فروعه وقال فيه:"صدوق يهم" وقال فيه أبو حاتم:"يكتب حديثه ولا يحتج به".

وأما الضحاك بن عبد الله بن خالد فلا يوجد في كتب الحديث، والغالب أن الرواة حذفوا اسم أبيه، ونسبوه إلى جده فوقع الالتباس في اسمه، وهو أمر شائع في كتب الرجال.

فالخلاصة: أنه رجل واحد لا اثنان، ولذا نفي البخاري معرفته للثاني.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এক সফরে সালাতুদ-দুহা (চাশতের সালাত) আট রাকাত আদায় করতে দেখেছি। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: "নিশ্চয় আমি আগ্রহ ও ভয় নিয়ে সালাত আদায় করেছি। আমি আমার রবের কাছে তিনটি জিনিস চেয়েছিলাম। তিনি আমাকে দু'টি দান করেছেন এবং একটি থেকে বিরত রেখেছেন। আমি তাঁর কাছে চেয়েছিলাম যেন তিনি আমার উম্মাতকে দুর্ভিক্ষের মাধ্যমে পরীক্ষা না করেন, তিনি তা মঞ্জুর করেছেন। আমি চেয়েছিলাম যেন তিনি তাদের উপর তাদের শত্রুকে জয়ী না করেন, তিনি তাও মঞ্জুর করেছেন। আর আমি চেয়েছিলাম যেন তিনি তাদের মাঝে দলাদলি বা বিভেদ সৃষ্টি না করেন, কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (2843)


2843 - عن مورق قال: قلت لابن عمر أتصلِّي الضُّحي؟ قال: لا، قلت: فعمر؟ قال: لا، قلت: فأبو بكر؟ قال: لا، قلت: فالنبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: لا إخاله.

صحيح: رواه البخاري في التهجد (1175) عن مسدد، قال: حدثنا يحيى، عن شعبة، عن توبة، عن مورُّق به مثله.




মাওরাক থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আপনি কি সালাতুদ-দুহা (চাশতের সালাত) আদায় করেন? তিনি বললেন: না। আমি বললাম: তাহলে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)? তিনি বললেন: না। আমি বললাম: তাহলে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)? তিনি বললেন: না। আমি বললাম: তাহলে কি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)? তিনি বললেন: আমার ধারণা হয় না (যে তিনি তা আদায় করতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (2844)


2844 - عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، أن أباه رأى أناسًا يصلون صلاة الضُّحى فقال: أما إنَّهم يصلون صلاة ما صلاها رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا عامَّة أصحابه.

حسن: رواه الدارمي (1463)، والنسائي في الكبري (480) كلاهما من حديث معاذ بن معاذ، قال: حدثني شعية، عن فُضيل بن فضالة، قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي بكرة فذكره.

وفُضيل بن فَضالة هو: القيسي البصري. قال علي بن المدني: لا نعرف أحدًا روي عن هذا الشيخ غير شعبة، ووثقه ابن معين وابن شاهين وغيرهما. وهو حسن الحديث.




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পুত্র আবদুর রহমান বর্ণনা করেন যে, তিনি কিছু লোককে সালাতুদ-দুহা (চাশতের নামাজ) আদায় করতে দেখলেন। তখন তিনি বললেন: নিশ্চয়ই তারা এমন সালাত আদায় করছে যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আদায় করেননি এবং তাঁর সাধারণ সাহাবীগণও আদায় করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (2845)


2845 - عن زيد بن أرقم أنَّه رأى قومًا يصلون من الضُّحي فقال: أما لقد علموا أنَّ الصلاة في غير هذه الساعة أفضلُ، إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة الأوَّابين حين
تَوْمَضُ الفصال".

وفي رواية: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم على أهل قباء، وهم يُصلُّون. فقال:"صلاة الأوابين إذا رَمِضَت الفصالُ".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (748) الرواية الأولى من طريق إسماعيل ابن علية، عن أيوب، عن القاسم الشيباني، عن زيد بن أرقم فذكره، والرواية الثانية من طريق يحيى بن سعيد، عن هشام بن أبي عبد الله قال: حدثنا القاسم به فذكره. والقاسم هو: ابن عوف الشيباني، قال فيه أبو حاتم:"مضطرب الحديث ومحله عندي الصدق". ورآه شعبة وتركه ولم يَروِ عنه.

قلت: إلَاّ أنَّ مسلمّا انتقي من حديثه ما أصاب فيه.

وقد رواه أيوب السختياني عنه، عن ابن أبي أوفى مثله. أخرجه عبد بن حميد (527) عن أبي نعيم، ثنا ابن عيينة، عن أيوب به مثله. فلا أدري هل هذا من اضطرابه؟ أم له فيه شيخان.

قوله: الأوَّاب - وهو المطيع، وقيل: الراجع إلى الطاعة.

وقوله: تَرْمَضُ: كعَلِم يَعْلَم -والرمضاء الرمل الذي اشتدت حرارته.

والفِصال جمع فصيل. وهو من أولاد الإبل إذا فُصِل عن أمِّه، واستغني عن الرضاع.

بالشمس، أي: حين تحترق أخفاف الفصال، وهي الصغار من أولاد الإبل، جمع فصيل، وذلك من شدة حر الرمل.

واستدلوا به على أنَّ تأخير الضُّحى إلى اشتداد الحر أفضل.




যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একদল লোককে চাশতের (দুহ্বার) সময় সালাত আদায় করতে দেখলেন। তিনি বললেন: "তারা অবশ্যই জানে যে, সালাত এর থেকে ভিন্ন সময়ে আদায় করা উত্তম। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: 'আওওয়াবীনদের সালাত তখন, যখন উষ্ট্রশাবকদের পা উত্তপ্ত বালিতে ঝলসে যায়।'"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ক্বুবা-বাসীদের কাছে গেলেন যখন তারা (চাশতের) সালাত আদায় করছিল। তিনি বললেন: 'আওওয়াবীনদের সালাত তখন, যখন উষ্ট্রশাবকদের পা উত্তপ্ত বালিতে উত্তপ্ত হয়ে ওঠে।'"









আল-জামি` আল-কামিল (2846)


2846 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يحافظ على صلاة الضُّحى إلا أوَّاب" قال:"وهي صلاة الأوَّابين".

حسن: رواه ابن خزيمة (1224) عن محمد بن يحيى، نا إسماعيل بن عبد الله بن زرارة الرقي ببغداد، ثنا خالد بن عبد الله، وحدثني محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

ورواه أيضًا الحاكم في"المستدرك" (1/ 314) من طريق إسماعيل بن عبد الله بن زرارة به مثله. وقال:"صحيح على شرط مسلم".

وهو وهم منه فإن إسماعيل بن عبد الله بن زرارة الرقي ليس من رجال الستة أصلاً، إنما هو من رجال التميز كما قال الحافظ في التقريب، وهي إشارة إلى أنه ذكر ليتميز عن غيره. غير أنه"صدوق".

قال الذهبي في"الكاشف" في ترجمة إسماعيل بن عبد الله بن خالد العبدري الرقي السكري قاضي دمشق، وهو من رجال ابن ماجه.

قال: ووهم ابن عساكر فذكر بدله: إسماعيل بن عبد الله بن زرارة الرقي وذا قديم الموت. انتهى ولكن أعل ابن خزيمة الحديث بقوله:"لم يتابع هذا الشيخ إسماعيل بن عبد الله على إيصال هذا
الخبر. رواه الدراوردي عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة مرسلًا، ورواه حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة قوله".

وما قاله فيه نظر؛ فإن إسماعيل بن عبد الله لم ينفرد بإيصال هذا الحديث فقد رواه ابن عدي (6/ 2205) من وجه آخر عن قيس بن حفص، ثنا محمد بن دينار، ثنا محمد بن عمرو بن علقمة به مثله.

ومحمد بن دينار الطاحي بصري، قال فيه ابن عدي: هو مع هذا حسن الحديث، وعامة حديثه ينفرد به".

قلت: إلا أنه لم ينفرد في هذا الحديث كما علمت.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সালাতুদ-দুহা (চাশতের নামায) শুধুমাত্র 'আওওয়াব' (আল্লাহর দিকে প্রত্যাবর্তনকারী) ব্যক্তিই নিয়মিত আদায় করে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আর এটিই হলো আওওয়াবদের নামায।









আল-জামি` আল-কামিল (2847)


2847 - عن عمرو بن عَبَسَة السلمي قال: يا نبي الله أخبرني عما علَّمك الله وأجهلُه، أخبرني عن الصلاة؟ قال:"صَلِّ صلاة الصبح، ثم أقصر عن الصلاة حتى تطلع الشمس، حتى ترتفع، فإنها تطلع حين تطلع بين قرنّي شيطان وحينئذ يسجد لها الكفار، ثم صَلِّ، فإن الصلاة مشهودة محضورة".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (832) في قصة إسلام عمرو بن عبسة، وقد تقدَّم في كتاب الطهارة، باب ثواب الوضوء.

وقوله: مشهودة ومحضورة: أي يشهدها الملائكة، ويحضرها أهل الطاعات.

وقوله: حتى ترتفع -يُشبه أن تكون صلاة الضُّحى؛ وقد أكّد الشيخ ابن باز رحمه الله تعالي بأنّ صلاة الإشراق هي صلاة الضُّحى في أول وقتها، والأفضل فعلها عند ارتفاع الضُّحي. مجموع فتاوي (11/ 401).

لأن صلاة الإشراق من قال باستحبابه نُصلَّى بعد الإشراف مباشرة كما رُوي عن أنس في حديث ضعيف وهو الآتي.

وأما ما رُوي عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى الغداة في جماعة، ثم قعد يذكر الله حتى تطلع الشمس، ثم يُصلي ركعتين، كانت له كأجر حجة وعمرة" وقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تامة تامة تامة" فهو ضعيف. رواه الترمذي (586) عن عبد الله بن معاوية الجمحي، حدثنا عبد العزيز بن مسلم، حدثنا أبو ظلال، عن أنس بن مالك فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب".

قلت: في إسناده أبو ظلال وهو: هلال بن أبي هلال، ويقال ابن أبي مالك، واسم أبيه: ميمون، ويقال: سويد، ويقال: بريدة.
قال ابن معين: أبو ظلال اسمه هلال ليس بشيء، وقال البخاري: مقارب الحديث، وغمزه أبو داود وضعفه النسائي وغيره.

وذكر ابن حبان في الضعفاء: أبا ظلال فقال: شيخ مغفل لا يجوز الاحتجاجُ به بحال، يَروي عن أنس ما ليس من حديثه. وذكر في الثقات: هلال بن أبي هلال وهو أيضًا يروى عن أنس، وعنه يحيي بن المتوكل.

وكلام المزي يقتضي أنهما واحد فلذلك ذكر يحيي بن المتوكل في الرواة عن أبي ظلال. وضعَّفه أيضًا الأزدي وأبو أحمد الحاكم وغيرهما.

والخلاصة أنه"ضعيف". انظر للمزيد:"تهذيب التهذيب" (11/ 84).

وكذلك ما رُوي عن عبد الله بن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"من صلى الصبح، ثم جلس في مجلسه حتى تمكنه الصلاة كان بمنزلة عمرة، وحجة متقبلتين".

رواه الطبراني في"الأوسط" (5602) وفيه الفضل بن الموفق، وفيه ضعف.

وكذلك ما رُوي عن الحسن بن علي قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صلّى الغداة، ثم ذكر الله عز وجل حتى تطلع الشمس، ثم صلى ركعتين، أو أربع ركعات، لم تمسَّ جلدَه النارُ".

أورده المنذريّ في الترغيب والترهيب، وعزاه إلى البيهقيّ وإسناده واهٍ.

وفي الباب أحاديث أخرى انظر"الترغيب والترهيب" (1/ 294).




আমর ইবনু আবাসা আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: হে আল্লাহর নবী! আল্লাহ আপনাকে যা শিখিয়েছেন, আর আমি যা জানি না, সে সম্পর্কে আমাকে জানান। আমাকে সালাত (নামায) সম্পর্কে অবহিত করুন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি ফজরের সালাত আদায় করো, তারপর সূর্য না ওঠা পর্যন্ত এবং উপরে না ওঠা পর্যন্ত সালাত (নফল) আদায় করা থেকে বিরত থাকো। কেননা সূর্য যখন উদিত হয়, তখন তা শয়তানের দুই শিংয়ের মাঝখান দিয়ে উদিত হয় এবং এই সময় কাফেররা এর প্রতি সিজদা করে। অতঃপর তুমি সালাত আদায় করো, কারণ এই সালাত হল সাক্ষ্যযুক্ত ও উপস্থিতিকৃত।"