আল-জামি` আল-কামিল
2861 - عن عُمير مولى آبي اللحم أنَّه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم يستسقي عند أحجار الزيت
قريبًا من الزوراء قائمًا يدعو يَستسقي رافعًا كفيه، لا يُجاوزُ بهما رأسَه مُقبل بباطن كفيه إلى وجهه.
صحيح: رواه الإمام أحمد (21944) عن هارون بن معروف، قال: قال ابن وهب: أخبرنا حيوة، عن ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن عمير فذكره. وإسناده صحيح.
وقد صححه ابن حبان (879) وأخرجه من طريق حرملة، عن ابن وهب بهذا الإسناد. وحيوة هو: ابن شريح المصري.
وابن الهاد هو: يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد الليثي.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (21945) عن هارون، عن ابن وهب، عن حيوة، عن عمر بن مالك، عن ابن الهاد. فأدخل بين حيوة وبين ابن الهاد"عمر بن مالك" وقد ثبت أن حيوة سمع من ابن الهاد، فيكون هذا الإسناد من المزيد في متصل الأسانيد.
وأمَّا ما رواه أبو داود (1168) من طريق ابن وهب، عن حيوة وعمر بن مالك، عن ابن الهاد فجعل عمر بن مالك قرينا لحيوة، فإن عمر بن مالك وهو الشرعبي قد شارك حيوة في روايته عن ابن الهاد، كما أن ابن وهب روى عنه. ذكره المزي في تهذيب الكمال فالإسناد صحيح من كلا الوجهين.
وللحديث إسناد آخر رواه الإمام أحمد (21943) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا الليث بن سعد، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن يزيد بن عبد الله، عن عمر مولي آبي اللحم، فذكره.
ولكن رواه الترمذي (557)، والنسائي (1514) عن قتيبة بن سعيد وزادا بعد عمير مولي آبي اللحم"عن آبي اللحم" وعلَّل الترمذي هذه الرواية بالشذوذ قائلًا:"كذا قال ابن قتيبة في هذا الحديث"عن آبي اللحم" ولا نعرف له عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا هذا الحديث الواحد، وعُمير مولي آبي اللحم قد روي عن النبي صلى الله عليه وسلم أحاديث، وله صحبة" انتهى.
فإما أن يكون قتيبة بن سعيد لم يضبِط هذا الحديث فمرة يروى عن عمير مولى آبي اللحم، وأخرى عن آبي اللحم، أو وقع خطأ في مسند الإمام أحمد فإن المحققين زادوا:"آبي اللحم" من"جامع المسانيد" لابن كثير،"وأطراف المسند" لابن حجر، وقالوا: لم ترد هذه الزيادة في نسخة"م" و"ر" و"ق" وكانت في نسخة"ظ" ثم رمجت.
قلت: والذي يظهر من مراجعة مسند الإمام أحمد أنه لم يكن فيه"آبي اللحم" فإن الإمام أحمد أخرج هذا الحديث تحت ترجمة"عمير مولى آبي اللحم" علاوة على ما ذكره المحققون بأنه لا توجد ذكر"آبي اللحم" في كثير من النسخ. والله أعلم بالصواب.
والحديث أخرجه الحاكم (1/ 327) من طريق يحيى بن بكير، عن الليث، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن يزيد بن عبد الله، عن عمير مرفوعًا، ولم يذكر فيه"آبي اللحم" وقال:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه، وعمير مولى آبي اللحم له صحبة".
قلت: هذا يشعر بأن الحديث من مسند عمير مولى آبي اللحم.
كذا صحّحه الحاكم، ولكن علته أن بين يزيد بن عبد الله بن الهاد وبين عمير مولى آبى اللحم"محمد بن إبراهيم التيمي" كذا في الإسناد السابق، وكذلك قال الحافظ في التهذيب في ترجمة"يزيد بن عبد الله بن الهاد الليثي فقال:"الصحيح بينهما محمد بن إبراهيم التيمي"، انتهى.
وهذا يعني أنَّ في إسناد الحاكم انقطاعًا.
وآبي اللحم: بمد الهمزة، اسم فاعل من أبي، اسمه الحُويرث بن عبد الله الغفاري، وقيل: عبد الله بن عبد الملك، وقيل: خلف بن عبد الله، قُتل يوم حُنين شهيدًا سنة ثمان من الهجرة، قيل له: آبى اللحم، لأنه كان لا يأكل اللحم، وقيل: كان لا يأكل ما ذُبح على النصب.
فإذا كان استشهد يوم حنين سنة ثمان من الهجرة فمن المستبعد أن يكون هو راوي حديث الاستسقاء.
وقوله:"أحجار الزيت" موضع بالمدينة من الحرة، سميت بذلك لسواد أحجارها، كأنها طليت بالزيت.
وقوله:"الزوراء" موضع كان معروفًا عند سوق المدينة، مرتفع كالمغارة قرب المسجد، وأصبح الآن غير معروف، ولعله الآن دخل في توسعة المسجد النبوي.
উমাইর মাওলা আবী লাহাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে 'আহজারুয-জাইত' নামক স্থানে বৃষ্টির জন্য সালাত (বা দু'আ) করতে দেখেছেন, যা 'আয-যাওরা'-এর কাছাকাছি একটি স্থান। তিনি দাঁড়িয়ে দু'আ করছিলেন, বৃষ্টির জন্য প্রার্থনা করছিলেন, তাঁর উভয় হাত উঠিয়েছিলেন যা তাঁর মাথা অতিক্রম করেনি, এবং তাঁর উভয় হাতের তালু তাঁর চেহারার দিকে ফিরানো ছিল।
2862 - عن أنس بن مالك قال: أتى رجل أعرابي من أهل البدو إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الجمعة فقال: يا رسول الله! هلكتِ الماشية، هلك العيالُ، هلك الناسُ، فرفع رسول الله صلى الله عليه وسلم يديه يدعو، ورفع الناس أيديهم معه يدعون. قال: فما خرجنا من المسجد حتى مُطِرنا، فما زلنا نُمطَر حتى كانت الجمعة الأُخرى، فأتى الرجل إلى نبي الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! بَشِق المسافرُ، ومُنع الطريق.
متفق عليه: رواه البخاري في الاستسقاء (1029) قال: قال أيوب بن سليمان، حدثني أبو بكر ابن أبي أويس، عن سليمان، عن بلال، قال يحيى بن سعيد: سمعت أنس بن مالك فذكره.
وقوله: قال أيوب بن سليمان ظاهره أنه معلق، والصحيح أنه متصل لأن أيوب بن سليمان من شيوخ البخاري كما هو رأي ابن الصلاح.
ورواه مسلم في الاستسقاء (897) من وجه آخر عن أنس نحوه.
وقوله:"بَشِق" بفتح الباء وكسر الشين وبعدها قاف أي: ملَّ.
وقال الخطابي: وإنما هو"لَثق" بلام، يقال: لثق الطريق أي صار ذا وحل، ولثق الثوب إذا أصابه ندى المطر.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক জুমু'আর দিন এক বেদুইন গ্রাম্য ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! গবাদি পশু ধ্বংস হয়ে গেছে, পরিবার-পরিজন ধ্বংস হয়ে গেছে, মানুষ ধ্বংস হয়ে গেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'হাত তুলে দু'আ করলেন এবং উপস্থিত লোকেরাও তাঁর সাথে হাত তুলে দু'আ করল। (আনাস) বললেন, আমরা মসজিদ থেকে বের হওয়ার আগেই বৃষ্টিতে সিক্ত হলাম। আমরা অবিরাম বৃষ্টিতে ভিজতে থাকলাম, এমনকি পরের জুমু'আ পর্যন্ত। (পরের জুমু'আয়) লোকটি আবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! মুসাফির ক্লান্ত হয়ে পড়েছে এবং রাস্তা বন্ধ হয়ে গেছে।
2863 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم استسقي، فأشار بظهر كفيه إلى السماء.
صحيح: رواه مسلم في الاستسقاء (896) عن عبد بن حميد، حدثنا الحسن بن موسى، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس فذكره.
قال النووي في شرح مسلم:"قال جماعة من أصحابنا وغيرهم: السنة في كل دعاء لرفع بلاء كالقحط ونحوه أن يرفع يديه، ويجعل ظهر كفيه إلى السماء، وإذا دعا لسؤال شيء وتحصيله جعل باطن كفيه إلى السماء واحتجوا بهذا الحديث".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বৃষ্টির জন্য দুআ (ইস্তিসকা) করলেন, তখন তিনি তাঁর দু’হাতের পিঠ আসমানের দিকে ইশারা করলেন।
2864 - عن أنس بن مالك أنَّه قال: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! هلكتِ المواشي، تقطعتِ السبُلُ فادع الله، فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم، فمُطِرنا من الجمعة إلى الجمعة، قال: فجاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! تهدَّمتِ البيوت، وانقطعتِ السّبُلُ، وهلكتِ المواشي، فقال رسول الله:"اللهم ظهورَ الجبال والآكام، وبطونَ الأودية، ومنابتَ الشجر".
قال: فانجابتْ عن المدينة انجياب الثوب.
وفي رواية: عن أنس أن رجلًا دخل المسجد يوم جمعةٍ من بابٍ كان نحو باب دار القضاء، ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم يخطب. فاستقبل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قائمًا ثم قال: يا رسول الله! هلكتِ الأموالُ، وانقطعتِ السبُلُ، فادعُ الله يُغيثُنا. فرفع رسول الله صلى الله عليه وسلم يديه ثم قال:"اللهم أَغِثنا، اللهم أَغِثنا، اللهم أَغِثنا".
قال أنس: ولا والله! ما نرى في السماء من سحاب ولا قَزَعةً، ما بَيننا وبين سَلْعٍ من بيتٍ ولا دارٍ. قال: فطلعتْ من ورائه سحابةٌ مثلُ التُرسِ، فلما توسطتِ السماءَ انتشرتْ، ثم أمطرتْ، فلا والله ما رأينا الشمسَ سِتًّا، ثم دخل رجل من ذلك الباب في الجمعة -ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم يخطب- فاستقبله قائمًا فقال: يا رسول الله! هلكتِ الأموال، وانقطعتِ السبُلُ فادعُ الله يُمْسِكها عنا. قال: فرفع رسول الله صلى الله عليه وسلم يديه ثمَّ قال:"اللهمَّ حوالينا ولا علينا ........".
متفق عليه: الرواية الأولى رواها مالك في الاستسقاء (3) عن شريك بن عبد الله بن أبي نَمِر، عن أنس بن مالك فذكره.
ورواه البخاري في الاستسقاء (1016) من طريق مالك به مثله.
والرواية الثانية رواها البخاري في الاستسقاء (1014)، ومسلم في الاستسقاء (897) كلاهما عن قيتبة بن سعيد، قال: حدثنا إسماعيل بن جعفر، عن شريك بن عبد الله بن أبي نمر، عن أنس بن مالك فذكره. ولفظهما سواء.
قال شريك: فسألت أنس بن مالك: أهو الرجل الأول، قال: لا أدري.
قوله:"دار القضاء" هي دار عمر بن الخطاب، سميت دار القضاء لأنها بيعتْ في قضاء دين كان عليه، فكان يقال لها: دار قضاء دين عمر، ثم طال ذلك فقيل لها: دار القضاء، ومن فسر بأنها دار الإمارة فإنه لم يُصب.
وقوله:"ستًّا" أي: لم نَرَ الشمس ستةَ أيام، ولكن في أكثر الروايات"سبتًا" باسم أحد الأيام - أي: لم نَرَ الشمس أسبوعًا.
وقال النووي: قطعة من الزمان، لأنَّ أصل السبت: القطع.
وقوله:"اللَّهم حوالينا" المراد به صرف المطر عن الأبنية والدور.
وقوله:"اللَّهم على الآكام" من الإكام: بكسر الهمزة، وقد تُفتح وتُمد، جمع أكمة بفتحات.
قال الخطابي: هي الهضبة الضخمة، وقيل: الجبل الصغير، وقيل غير ذلك وهو المراد من قوله:"حوالينا".
وفي الحديث دليل لمن يقول: بأن الاستسقاء لا تُشرع فيه الصلاة.
وأجيب بأن المقصود هنا مجرد الدعاء، وأما صلاة الاستسقاء فثبتت بالأحاديث الأخرى.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! পশুসম্পদ ধ্বংস হয়ে গেছে এবং রাস্তাঘাট বিচ্ছিন্ন হয়ে গেছে। অতএব আপনি আল্লাহর কাছে দু'আ করুন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দু'আ করলেন। ফলে আমরা এক জুমু'আ থেকে পরের জুমু'আ পর্যন্ত বৃষ্টি পেলাম। তিনি বলেন: এরপর এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ঘরবাড়ি ভেঙে পড়ছে, রাস্তাঘাট বিচ্ছিন্ন হয়ে গেছে এবং পশুসম্পদ ধ্বংস হয়ে গেছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! (বৃষ্টিকে) পাহাড় ও টিলাসমূহের উপরিভাগে, উপত্যকাসমূহের অভ্যন্তরে এবং বৃক্ষরাজির উৎপত্তিস্থলে (ফিরিয়ে দাও)।" তিনি বলেন: তখন মদীনা থেকে মেঘ এমনভাবে সরে গেল, যেমন কাপড় খুলে নেওয়া হয়।
অন্য এক বর্ণনায় আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি জুমু'আর দিন দারুল কাযা (বিচারালয়)-এর দরজার দিকে থাকা একটি দরজা দিয়ে মসজিদে প্রবেশ করল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়িয়ে খুতবা দিচ্ছিলেন। সে দাঁড়িয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দিকে মুখ করে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সম্পদ ধ্বংস হয়ে গেছে, রাস্তাঘাট বিচ্ছিন্ন হয়ে গেছে। অতএব, আপনি আল্লাহর কাছে দু'আ করুন, যেন তিনি আমাদের উপর বৃষ্টি দেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর হাতদ্বয় উত্তোলন করে বললেন: "হে আল্লাহ! আমাদের উপর বৃষ্টি দাও! হে আল্লাহ! আমাদের উপর বৃষ্টি দাও! হে আল্লাহ! আমাদের উপর বৃষ্টি দাও!" আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর শপথ! আমরা আসমানে কোনো মেঘ কিংবা মেঘের সামান্য টুকরাও দেখতে পাচ্ছিলাম না। আমাদের এবং সাল্আ (পাহাড়)-এর মাঝে কোনো বাড়িঘরও ছিল না। তিনি বলেন: তখন তার পিছন দিক থেকে ঢালের মতো একটি মেঘ দেখা দিল। যখন এটি আসমানের মাঝখানে পৌঁছল, তখন তা প্রসারিত হলো এবং বৃষ্টি বর্ষণ শুরু হলো। আল্লাহর শপথ! আমরা ছয় দিন (অথবা এক সপ্তাহ) সূর্য দেখতে পাইনি। এরপর পরের জুমু'আর দিন সেই একই দরজা দিয়ে এক ব্যক্তি প্রবেশ করল, আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়িয়ে খুতবা দিচ্ছিলেন। সে দাঁড়িয়ে তাঁর দিকে মুখ করে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সম্পদ ধ্বংস হয়ে গেছে, রাস্তাঘাট বিচ্ছিন্ন হয়ে গেছে। অতএব, আপনি আল্লাহর কাছে দু'আ করুন, যেন তিনি বৃষ্টি আমাদের থেকে থামিয়ে দেন। তিনি বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর হাতদ্বয় উত্তোলন করে বললেন: "হে আল্লাহ! আমাদের আশেপাশে (বৃষ্টি দাও), আমাদের উপর নয় (বরং পাহাড় ও টিলাসমূহের উপরিভাগে, উপত্যকাসমূহের অভ্যন্তরে এবং বৃক্ষরাজির উৎপত্তিস্থলে দাও)।"
2865 - عن أنس قال: أصاب الناسَ سَنَهٌ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبيْنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب على المنبر يوم الجمعة، قام أعرابي فقال: يا رسول الله! هلك المالُ، وجاعَ العِيَالُ، فادْعُ الله لنا أنْ يَسْقينا، قال: فرفع رسُولُ الله صلى الله عليه وسلم يَدَيه، وما في السماء قزَعَةٌ، قال: فثار سحابٌ أمثالُ الجِبال، ثم لم يَنْزِلْ عن مِنْبَرِه حتَّى رأيتُ المَطَرَ يتحادَرُ على لِحَيَتِه، قال: فمُطرْنا يومَنا ذلك، وفي الغَد، ومن بعدِ الغدِ، والذي يليه إلى الجمعةِ الأخرى، فقام ذلك الأعرابي، أو رَجُلٌ غَيرُه، فقال: يا رسولَ الله! تَهَدَّمَ البناء، وغَرقَ المال، فادْعُ الله لنا، فرفع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَدَيْه وقال:"اللَّهمَّ حَوَالَيْنَا ولا علينا" فما جعل يُشيرُ بيده إلى ناحيةٍ من السماء إلا تفرَّجتْ، حتى صارتِ المدينةُ في مثل الجَوْبة، حتى سالَ الوَادي -وادي قناةَ- شهرًا قال: فلم يجئْ أحد من ناحيةٍ إلا حدَّث بالجَود.
متفق عليه: رواه البخاري في الاستسقاء (1033)، ومسلم في الاستسقاء (897/ 9) كلاهما من طريق الأوزاعي قال: حدثنا إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة الأنصاري، قال: حدثني أنس بن
مالك فذكره واللفظ للبخاري.
ولفظ مسلم نحوه. وفي رواية عند مسلم من وجه آخر عن ثابت البناني، عن أنس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يخطب يوم الجمعة، فقام إليه الناس فصاحوا، وقالوا: يا نبي الله! قحط المطرُ، واحمرَّ الشجِرُ، وهلكتِ البهائمُ، وساق الحديث. وفيه أيضًا: فَتَقَشَّعَتْ عن المدينة، فجعلتُ تُمطر حوالَيها، وما تُمطر بالمدينة قطرةٌ، فنظرتُ إلى المدينة، وإنها لفي مِثْل الإكليل.
وفي رواية أخرى: رأيت السحاب يتمزَّق كأنه الملاءُ حين تُطْوى.
وفي رواية: فحسر رسول الله صلى الله عليه وسلم ثوبه، حتى أصابه من المطر. فقلنا: يا رسول الله! لم صنعت هذا؟ قال:"لأنه حديث عهد بربه تعالي".
قوله:"قزعة" بفتح القاف والزاي، أي سحاب متفرق.
وقوله:"حتى رأينا المطر يتحادر على لحيته" هذا يدل على أن السقف كان من جريد النخل.
وقوله:"مثل الجوبة" بفتح الجيم، وهي الحفر المستديرة الواسعة، المراد بها هنا: الفرجة في السحاب.
وقال الخطابي: المراد بالجّوبة هنا الترس.
وقال النووي: هي الفجوة ومعناه: تقطع السحاب عن المدينة، وصار مستديرًا حولها، وهي خالية منه.
وقوله:"وادي قَناة" بفتح القاف، أرض ذات مزارع بناحية أحد، وواديها أحد أودية المدينة المشهورة، كذا في الفتح.
وقال النووي: وادي قناة: اسم لواد من أودية المدينة، وعليه زروع لهم، فأضافه إلى نفسه، وفي رواية البخاري: سال الوادي -وادي قناة- على البدل.
وقوله:"إلَّا حدَّث بالجَود"-بفتح الجيم- المطر الغزير.
وقوله:"احمَّر الشجر" كناية عن يُبس ورقها، وظهور عودها.
وقوله:"تقشَّعتْ" أي زالت.
وقوله:"مثل الإكليل" وهو بكسر الهمزة، هي العصابة. وتطلق على كل محيط بالشيء، كذا في شرح النووي. ويسمى التاج إكليلًا لإحاطته بالرأس.
وقوله:"كأنه المُلاء حين تطوي" المُلاء: بضم الميم، وبالمدِّ، والواحدة ملاءة -بالضم والمد. وهي الريطة كالملحفة، كذا في شرح النووي، وهي كالملحفة التي تلتحف بها المرأة، ومعناه: تشبيه انقطاع السحاب وتجليلهِ بالملاءة المنشورة إذا طويت.
وقوله:"حسر رسول الله صلى الله عليه وسلم ثوبه" معني حسر: كشف، أي: كشف بعض بدنه ليصيبه المطر.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে একবার মানুষের উপর দুর্ভিক্ষ নেমে এসেছিল। এক জুম্মার দিনে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন মিম্বরে দাঁড়িয়ে খুৎবা দিচ্ছিলেন, তখন এক বেদুঈন দাঁড়িয়ে বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! সম্পদ ধ্বংস হয়ে গেছে এবং পরিবার-পরিজন ক্ষুধার্ত রয়েছে। আপনি আল্লাহর কাছে আমাদের জন্য বৃষ্টি চাওয়ার দু'আ করুন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর দু'হাত তুললেন, অথচ আকাশে এক টুকরা মেঘও ছিল না। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর পাহাড়ের মতো বড় বড় মেঘ দ্রুত জমা হতে শুরু করল। অতঃপর তিনি মিম্বর থেকে নামার পূর্বেই আমি দেখলাম যে, বৃষ্টির পানি তাঁর দাড়ি বেয়ে ঝরছে। বর্ণনাকারী বলেন, সেদিন, তার পরের দিন, তার পরের দিন এবং তার পরের জুম্মা পর্যন্ত আমরা বৃষ্টিতে সিক্ত হলাম। এরপর সেই বেদুঈন অথবা অন্য একজন লোক দাঁড়াল এবং বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! ইমারত ভেঙে পড়ছে এবং সম্পদ ডুবে যাচ্ছে। আপনি আল্লাহর কাছে আমাদের (বৃষ্টি বন্ধের) জন্য দু'আ করুন।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর দু'হাত তুললেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! আমাদের আশেপাশে (বৃষ্টি দাও), আমাদের উপর নয়।" অতঃপর তিনি যে দিকেই হাত দিয়ে ইঙ্গিত করলেন, সে দিকেরই আকাশ পরিষ্কার হয়ে গেল। এমনকি মদীনা শহরটি যেন একটি কূপের মতো ফাঁকা হয়ে গেল। কানাত উপত্যকার (Wadi Qanat) নালা এক মাস ধরে প্রবাহিত হয়েছিল। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর যে কোনো দিক থেকে লোক আসতো, তারা কেবল (অবিরাম) প্রচুর বৃষ্টির কথাই বলতো।
2866 - عن عَبَّاد بن تميم، عن عمِّه قال: خرج النبي صلى الله عليه وسلم إلى المصلي يستسقي، واستقبل القبلة، فصلى ركعتين، وقَلَبَ رداءه.
قال سفيان: فأخبرني المسعودي، عن أبي بكر قال: جعل اليمين على الشمال.
متفق عليه: رواه البخاري في الاستسقاء (1027)، ومسلم في الاستسقاء (894/ 2) كلاهما من طريق سفيان، عن عبد الله بن أبي بكر، سمع عباد بن تميم عن عمه فذكره واللفظ للبخاري.
আবদুল্লাহ ইবনে যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বৃষ্টি প্রার্থনার জন্য সালাতের স্থানে (মুসাল্লায়) গেলেন এবং কিবলামুখী হলেন। অতঃপর তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন এবং তাঁর চাদর উল্টে দিলেন।
সুফিয়ান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমাকে মাসঊদী, আবু বকর (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে অবহিত করেছেন যে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাদরের ডান দিককে বাম দিকে স্থাপন করলেন।
2867 - عن عبد الله بن زيد بن عاصم -وكان أحد رَهْطه- وكان عبد الله بن زيد من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم قد شهد معه أُحُدًا، قال: قد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم حين استسقي لنا أطال الدّعاء، وأكثر المسألة، قال: ثم تحوَّل إلى القبلة، وحوّل رداءه فقلبه ظهرًا لبطن، وتحوّل النّاس معه.
حسن: رواه الإمام أحمد (16465) عن يعقوب، قال: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن عباد بن تميم الأنصاري، ثم المازني، عن عبد الله بن زيد بن عاصم، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، فإنه حسن الحديث إذا صرَّح.
وعبد الله بن زيد بن عاصم هو ابن كعب الأنصاريّ المازني -مازن الأنصار- الخزرجي الصحابي المشهور، روي صفة وضوء النبيّ صلى الله عليه وسلم وغيره.
وهو عمّ عبد الله بن تميم بن غزية الأنصاري، وعبد الله بن زيد بن عاصم هو أخو أبيه لأمه.
وهو غير عبد الله بن زيد بن عبد ربه الأنصاري الخزرجي فإنهما اتفقا في الاسم، واسم الأب والنسبة إلى الأنصار، ثم إلى الخزرج، وافترقا في اسم الجدّ والبطن الذي من الخزرج.
وفي الحديث دليل للجمهور بأن المأمومين يحولون رداءهم إذا حوّل الإمام رداءه. وبه قال مالك والشافعي وأحمد كما سبق.
واستثني ابن الماجشون النساء، فقال: لا يستحب في حقهنّ.
وقال الليث وأبو يوسف: يحول الإمام وحده. انظر:"الفتح" (2/ 498).
আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ ইবনে আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন এবং উহুদের যুদ্ধে তাঁর সাথে অংশগ্রহণ করেছিলেন) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যখন তিনি আমাদের জন্য বৃষ্টি প্রার্থনা করছিলেন, তিনি দীর্ঘ সময় ধরে দু'আ করছিলেন এবং প্রচুর আরজি পেশ করছিলেন। তিনি বলেন: এরপর তিনি ক্বিবলার দিকে ফিরলেন এবং তাঁর চাদর উল্টে দিলেন—পিঠের দিক ভেতরের দিকে করে দিলেন। আর লোকেরাও তাঁর সাথে নিজেদের চাদর উল্টে দিল।
2868 - عن عباد بن تميم، عن عمه قال: حوَّل رسول الله صلى الله عليه وسلم رداءه، فجعل عِطافه الأيمن على عاتقه الأيسر، وجعل عِطافه الأيسر على عاتقه الأيمن، ثم دعا الله عز وجل.
حسن: رواه أبو داود (1163) عن محمد بن عوف، قال: قرأت في كتاب عمرو بن الحارث -يعني الحمصي- عن عبد الله بن سالم، عن الزبيدي، عن محمد بن مسلم (ثم أحال أبو داود على الإسناد السابق وقال:"ولم يذكر الصلاة" يعني عباد بن تميم المازني، عن عمه) فذكره.
وهذا إسناد حسن، لأن عمرو بن الحارث الحمصي لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ"مقبول".
قلت: وهو كما قال، لأنه توبع في أصل تحويل الرداء، ولم ينفرد به كما في الحديث الذي مضي، والذي سيأتي.
وقوله:"العطاف" قال الخطابي: أصل العطاف الرداء، وإنما أضاف العطاف إلى الرداء هاهنا، لأنه أراد أحد شقّي العطافي الذي عن يمينه، وعن شماله.
আবদুল্লাহ ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চাদর ঘুরিয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি চাদরের ডান প্রান্ত বাম কাঁধের উপর এবং বাম প্রান্ত ডান কাঁধের উপর রাখলেন, এরপর তিনি মহান আল্লাহ্র কাছে দু‘আ করলেন।
2869 - عن عبد الله بن زيد قال: استسقى رسول الله صلى الله عليه وسلم وعليه خميصة سوداء، فأراد أن يأخذ بأسفلها فيجعله أعلاها، فلما ثقُلتْ قَلَبَها على عاتقه.
حسن: رواه أبو داود (1164)، والنسائي (1507) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا عبد العزيز، عن عُمارة بن غَزِيَّة، عن عباد بن تميم، عن عبد الله بن زيد فذكره.
وإسناده حسن من أجل عُمارة بن غَزِيَّة فهو حسن الحديث.
وصححه ابن خزيمة (1415)، وعنه ابن حبان (2867)، ورواه أيضًا الحاكم (1/ 327) كلهم من طريق عبد العزيز -وهو ابن محمد الدراوردي- به مثله. وقال الحاكم: صحيح على شرط مسلم".
আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বৃষ্টির জন্য সালাত (ইসতিসকা) আদায় করলেন, আর তাঁর পরিধানে ছিল একটি কালো চাদর (খামীসা)। তিনি চাদরটির নিচের দিক ধরে সেটি উপরের দিক করতে চাইলেন (উল্টাতে চাইলেন), কিন্তু যখন তা কঠিন/ভারী মনে হলো, তখন তিনি সেটিকে তাঁর কাঁধের উপর উল্টে দিলেন।
2870 - عن أنس أنَّ عمر بن الخطاب كان إذا قَحَطُوا استسقى بالعباس بن عبد المطلب فقال: اللهم إنا كنا نتوسَّل إليك بنبينا فتسقينا، وإنا نتوسل إليك بعم نبينا فاسقنا. قال: فيسقون.
صحيح: رواه البخاري في الاستسقاء (1010) عن الحسن بن محمد، حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري، قال: حدثني أبي عبد الله بن المشي، عن ثمامة بن عبد الله بن أنس، عن أنس فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সময় যখন দুর্ভিক্ষ হতো, তখন তিনি আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের মাধ্যমে বৃষ্টির জন্য দু‘আ (ইস্তিস্কা) করতেন এবং বলতেন: হে আল্লাহ! আমরা আপনার কাছে আপনার নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাধ্যমে ওয়াসীলা (তওসসূল) গ্রহণ করতাম, আর আপনি আমাদের বৃষ্টি দিতেন। এখন আমরা আপনার নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাচার মাধ্যমে ওয়াসীলা গ্রহণ করছি, সুতরাং আমাদের বৃষ্টি দিন। তিনি (আনাস) বলেন, এরপর বৃষ্টি হতো।
2871 - عن ابن مسعود قال: إن قريشًا لما استعصوا على النبي صلى الله عليه وسلم دعا عليهم بسنين كَسِنيِّ يوسف، فأصابهم قحطٌ وجَهْدٌ حتى أكلوا العظام، فجعل الرجل ينظُر إلى السماء فيرى ما بينه وبينها كهيئة الدخان من الجَهْد، فأنزل الله تعالى: {فَارْتَقِبْ يَوْمَ تَأْتِي السَّمَاءُ بِدُخَانٍ مُبِينٍ (10) يَغْشَى النَّاسَ هَذَا عَذَابٌ أَلِيمٌ} [سورة الدخان: 10، 11] قال: فأُتي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فقيل: يا رسول الله! اسْتسْقِ الله لِمْضَرَ، فإنها قد هلكتْ، قال:"لِمُضَرَ؟ إنك لجريءٌ" فاستسقى فسُقوا. فنزلت: {إِنَّكُمْ عَائِدُونَ} فلما أصابتهم الرفاهية عادوا إلى حالهم حين أصابتهم الرفاهيةُ، فأنزل الله عز وجل: {يَوْمَ نَبْطِشُ
الْبَطْشَةَ الْكُبْرَى إِنَّا مُنْتَقِمُونَ} قال: يعني يوم بدر.
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4821)، ومسلم في صفات المنافقين (2798/ 40) كلاهما من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، عن مسلم بن صُبيح، عن مسروق، عن ابن مسعود فذكره واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه باختلاف يسير.
وفي الروايات الصّحيحة الأخرى أنَّ الذي طلب من النبي صلى الله عليه وسلم كشف الجهْد هو أبو سفيان.
وأما ما جاء في صحيح البخاري (1020) تحت الباب المذكور من قول البخاري، وزاد أَسباط عن منصور: فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فسُقُوا الغيثَ، فأطبقتْ عليهم سبْعًا، وشكا الناس كثرة المطر فقال:"اللهم حوالينا ولا علينا" فانحدرت السحابة عن رأسه فسُقوا الناسَ حولهم، فهو جزء من حديث أنس بن مالك المذكور في باب الاستسقاء في خطبة الجمعة من غير استقبال القبلة وهذه القصة وقعت في المدينة، والظاهر أن هذا وهم من أسباط بن نصر فإنه قد وُصف بكثرةِ الخطإِ وهو مع ذلك صاحب غرائب …
وإليه يشير الشيخ ولي الله الدهلوي في جزء شرح تراجم أبواب صحيح البخاري" (ص 107) معلقًا على حديث عبد الله بن مسعود الذي ذكره البخاري تحت هذا الباب:"كأنه وقع وهم وخلط في هذا الطريق".
ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন কুরাইশরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের অবাধ্যতা করলো, তখন তিনি তাদের বিরুদ্ধে ইউসুফ (আঃ)-এর সময়ের বছরগুলোর (অনুরূপ দুর্ভিক্ষের) জন্য বদদো‘আ করলেন। ফলে তাদের উপর এমন দুর্ভিক্ষ ও কষ্ট নেমে এলো যে তারা (ক্ষুধার জ্বালায়) হাড় খেতে লাগলো। কষ্টের তীব্রতার কারণে যখন কোনো ব্যক্তি আকাশের দিকে তাকাতো, তখন সে তার ও আকাশের মধ্যবর্তী স্থানে ধোঁয়ার মতো কিছু দেখতে পেত। তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন: “অতএব তুমি অপেক্ষা করো সেই দিনের, যেদিন আকাশ সুস্পষ্ট ধোঁয়া নিয়ে আসবে— যা মানুষকে ঢেকে ফেলবে। এটি হবে এক যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি।” [সূরা দুখান: ১০-১১] তিনি (ইবনে মাসঊদ) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এসে বলা হলো, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আল্লাহ্র কাছে মুদার গোত্রের জন্য বৃষ্টি চান, কেননা তারা ধ্বংস হয়ে গেছে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মুদার গোত্রের জন্য? তুমি তো বেশ সাহস দেখাচ্ছো!" অতঃপর তিনি বৃষ্টির জন্য দু‘আ করলেন এবং তারা সিক্ত হলো (বৃষ্টি পেল)। তখন এই আয়াত নাযিল হলো: "নিশ্চয়ই তোমরা প্রত্যাবর্তনকারী (অর্থাৎ আবার কুফরির দিকে ফিরে যাবে)।" যখন তারা সুখ ও প্রাচুর্য লাভ করলো, তখন তারা তাদের পূর্বের অবস্থায় ফিরে গেল। তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল নাযিল করলেন: "যেদিন আমি বড় ধরনের পাকড়াও করব, সেদিন আমি প্রতিশোধ নেব।" তিনি (ইবনে মাসঊদ) বলেন: এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো বদরের দিন।
2872 - عن * *
২৮৭২ - ... থেকে ... থেকে
2873 - عن أبي مسعود البدري قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الشمس والقمر لا ينكسفان لموت أحد من الناس، ولكنهما آيتان من آيات الله عز وجل، فإذا رأيتموهما فقوموا فصلوا".
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1041، 1057) وفي بدء الخلق (3204)، ومسلم في الكسوف (911) من طرق عن إسماعيل (هو ابن أبي خالد) عن قيس (هو ابن أبي حازم) عن أبي مسعود الأنصاري فذكره.
وزاد مسلم من وجه آخر عن سفيان ووكيع عن إسماعيل بهذا الإسناد وفيه: انكسفت الشمسُ يوم مات إبراهيم، فقال الناس: انكسفتْ لموت إبراهيم.
আবু মাসউদ আল-বদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় সূর্য ও চন্দ্র কোনো মানুষের মৃত্যুর কারণে গ্রহণগ্রস্ত হয় না। বরং এ দুটি মহান আল্লাহ তা'আলার নিদর্শনসমূহের মধ্য থেকে দুটি নিদর্শন। সুতরাং যখন তোমরা এ দুটিকে (গ্রহণগ্রস্ত অবস্থায়) দেখবে, তখন তোমরা দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করো।"
2874 - عن المغيرة بن شعبة يقول: انكسفَتِ الشمس يوم مات إبراهيم، فقال الناس: انكسفَتْ لموت إبراهيم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الشمس والقمر آيتان من آيات الله، لا ينكسفان لموت أحد ولا لحياته، فإذا رأيتموها فادعوا الله، وصلوا حتى ينجلي".
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1060) وفي الأدب (6199) مختصرًا، ومسلم في الكسوف (915) كلاهما من طريق زائدة قال: حدثنا زياد بن علاقة، قال: سمعتُ المغيرة بن شعبة فذكر الحديث واللفظ للبخاري.
ورواه أيضًا (1043) من وجه آخر عن زياد بن عِلاقة بإسناده مثله.
ولم يذكر مسلم فقال الناس: انكسفتُ لموت إبراهيم"
قلت: ذكر أكثر أهل السيرة أن موت إبراهيم بن محمد رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في السنة العاشرة من الهجرة، وقيل قبل ذلك. والنبي صلى الله عليه وسلم شهد موته وذرفتْ عيناه.
মুগীরা ইবনু শু'বা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যেদিন ইবরাহীম (নবীজির পুত্র) ইন্তেকাল করেন, সেদিন সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন লোকেরা বলল: ইবরাহীমের মৃত্যুর কারণেই সূর্যগ্রহণ হয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় সূর্য ও চন্দ্র আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। এগুলো কারও মৃত্যু কিংবা জন্মের কারণে গ্রহণ হয় না। সুতরাং তোমরা যখন তা (গ্রহণ) দেখবে, তখন আল্লাহর কাছে দু'আ করো এবং তা সম্পূর্ণ আলোকিত না হওয়া পর্যন্ত সালাত আদায় করো।"
2875 - عن ابن عمر أنه كان يُخبِر عن النبي صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الشمس والقمر لا يَخسفان الموت أحد ولا لحياته، ولكنهما آيتان من آيات الله، فإذا رأيتموهما فصلوا".
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1042)، ومسلم في الكسوف (914) كلاهما من طريق ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، أن عبد الرحمن بن القاسم حدَّثه عن أبيه القاسم ابن محمد بن أبي بكر الصديق، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث، ولفظهما سواء.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করতেন: “নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র কারো মৃত্যু বা জীবনের কারণে গ্রহণ হয় না, বরং তারা আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্যে দুটি নিদর্শন। সুতরাং তোমরা যখন সে দুটি দেখতে পাও, তখন সালাত আদায় কর।”
2876 - عن أبي موسى الأشعري قال: خسفتِ الشمس في زمان رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقام
فزِعًا يخشى أن تكون الساعةُ، حتى أتي المسجد، فقام يُصلِّي بأطول قيامٍ وركوعٍ وسجود، ما رأيتُه يفعله في صلاةٍ قطُّ، ثم قال:"إن هذه الآيات التي يُرسلَها الله، لا تكون لموت أحد ولا لحياته، ولكن الله عز وجل يرسلها يُخَوِّف بها عبادَه، فإذا رأيتم منها شيئًا فافزعوا إلى ذكره ودعائه واستغفاره".
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1059)، ومسلم في الكسوف (921) كلاهما عن محمد بن العلاء، قال: حدثنا أبو أسامة، عن بُريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره ولفظهما سواء.
আবু মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন তিনি ভীত-সন্ত্রস্ত অবস্থায় দাঁড়িয়ে গেলেন, যেন তিনি কিয়ামত হওয়ার ভয় করছিলেন। তিনি মসজিদে আসলেন। অতঃপর তিনি এমন দীর্ঘ কিয়াম, রুকু ও সিজদার সাথে সালাতে দাঁড়ালেন যা আমি এর আগে আর কোনো সালাতে তাঁকে করতে দেখিনি। এরপর তিনি বললেন: "আল্লাহ তাআলা যে সকল নিদর্শন প্রেরণ করেন, তা কারো মৃত্যু কিংবা কারো জন্মের কারণে হয় না। বরং আল্লাহ তাআলা এগুলো তাঁর বান্দাদেরকে ভয় দেখানোর জন্য প্রেরণ করেন। যখন তোমরা এর কোনো কিছু দেখতে পাও, তখন তাঁর যিকির, দুআ ও ইস্তেগফারের দিকে দ্রুত ধাবিত হও।"
2877 - عن عبد الله بن عمرو قال: لما كُسِفتِ الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم نُودِيَ: إنَّ الصلاةَ جامعةٌ. فركع النبي صلى الله عليه وسلم ركعتين في سجدةٍ، ثم قام فركع ركعتين في سجدة، ثم جلس، ثم جُلِّي عن الشمس.
قال: وقالت عائشة: ما سجدتُ سجودًا قط كان أطول منها، كذا في البخاري، وفي مسلم: ما ركعت ركوعًا قط ولا سجدتُ سجودًا قط كان أطول منه.
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1051)، ومسلم في الكسوف (910) كلاهما من طريق أبي معاوية (وهو شيبان النحوي) عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن عبد الله بن عمرو فذكره.
ورواه أيضًا الشيخان: البخاري (1045)، ومسلم كلاهما من طريق معاوية بن سلام، عن يحيى بن أبي كثير إلَّا أنَّ البخاريَّ اقتصر على قوله:"لما كسفتِ الشمس على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم نُودِي: إنَّ الصلاة جامعة".
والحديث عبد الله بن عمرو أسانيد أخرى خرجتها في باب ما جاء في النفخ في الصلاة.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হলো, তখন ঘোষণা করা হলো: সালাত শুরু হতে যাচ্ছে (বা, সালাতের জন্য সমবেত হও)। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক সিজদার মধ্যে দু’টি রুকূ’ করলেন, এরপর দাঁড়ালেন এবং এক সিজদার মধ্যে দু’টি রুকূ’ করলেন, তারপর বসলেন। এরপর সূর্য আলোকিত হয়ে গেল (গ্রহণমুক্ত হলো)।
তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে আমর) বলেন: আর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি এর চেয়ে দীর্ঘ সিজদাহ আর কখনো করিনি। অনুরূপ বুখারীতে আছে। আর মুসলিমের বর্ণনায় আছে: আমি এর চেয়ে দীর্ঘ রুকূ’ও কখনো করিনি এবং এর চেয়ে দীর্ঘ সিজদাহও কখনো করিনি।
2878 - عن عائشة قالت: خسفتِ الشمسُ في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلَّي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بالناس، فقامَ فأطال القيام، ثم ركع، فأطال الركوعَ، ثم قام، فأطال القيام، وهو دون القيام الأول، ثم ركع، فأطال الركوع، وهو دون الركوع الأول. ثم رفع فسجد، ثم فعل في الركعة الآخِرة مثل ذلك، ثم انصرف وقد تجلَّتِ الشمس. فخطب الناس، فحمد الله وأثنى عليه ثم قال: إنَّ الشمسَ والقمرَ آيتان من آيات الله، لا يخسفان لموت أحد، ولا لحياته، فإذا رأيتُم ذلك فادعوا الله، وكِّبروا وتصدَّقوا، ثم قال:"يا أمة محمد! والله! ما من أحد أغْير من الله أن يزني عبدُه، أو
تزني أمتُه، يا أمة محمد! والله! لو تعلمون ما أعلم لضحكتُم قليلًا ولبكيتُم كثيرًا".
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الكسوف (1) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
ورواه البخاري في الكسوف (1044) عن عبد الله بن مسلمة، ومسلم في الكسوف (901) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن مالك.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে একবার সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। তিনি দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘক্ষণ দাঁড়িয়ে থাকলেন। অতঃপর রুকূ করলেন এবং দীর্ঘক্ষণ রুকূতে থাকলেন। অতঃপর দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘক্ষণ দাঁড়িয়ে থাকলেন, তবে তা প্রথম দাঁড়ানোর চেয়ে কম ছিল। অতঃপর রুকূ করলেন এবং দীর্ঘক্ষণ রুকূতে থাকলেন, তবে তা প্রথম রুকূর চেয়ে কম ছিল। অতঃপর মাথা উঠিয়ে সিজদা করলেন। অতঃপর শেষ রাকাআতেও অনুরূপ করলেন। অতঃপর সালাত শেষ করলেন যখন সূর্য পরিষ্কার হয়ে গিয়েছিল। অতঃপর তিনি লোকদের সামনে ভাষণ দিলেন, আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও গুণগান করলেন, তারপর বললেন: "নিশ্চয়ই সূর্য ও চাঁদ আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্য থেকে দুটি নিদর্শন। কারো মৃত্যুর জন্য অথবা কারো জন্ম-জীবনের জন্য এগুলোর গ্রহণ হয় না। সুতরাং যখন তোমরা তা দেখবে, তখন তোমরা আল্লাহর নিকট দু'আ করো, তাকবীর বলো এবং সাদকা করো।" অতঃপর তিনি বললেন: "হে মুহাম্মাদের উম্মত! আল্লাহর কসম! আল্লাহর চেয়ে বেশি আত্মমর্যাদাবোধ (غيرة) আর কারো নেই যে, তাঁর কোনো বান্দা যিনা করবে অথবা তাঁর কোনো বাঁদি যিনা করবে। হে মুহাম্মাদের উম্মত! আল্লাহর কসম! আমি যা জানি তোমরা যদি তা জানতে, তবে তোমরা অল্প হাসতে এবং বেশি কাঁদতে।"
2879 - عن عبد الله بن عباس قال: انخسَفتِ الشمسُ على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فصلَّي رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام قيامًا طويلًا نحوا من قراءة سورة البقرة، ثم ركع ركوعًا طويلًا، ثم رفع فقام قيامًا طويلًا وهو دون القيام الأول، ثم ركع ركوعًا طويلًا وهو دون الركوع الأول، ثم سجد، ثم قام قيامًا طويلًا، وهو دون القيام الأول، ثم ركع ركوعًا طويلًا، وهو دون الركوع الأول، ثم رفع فقام قيامًا طويلًا وهو دون القيام الأول، ثم ركع ركوعًا طويلًا وهو دون الركوع الأول، ثم سجد. ثم انصرف وقد تجلت الشمس فقال:"إنَّ الشمسَ والقمرَ آيتان من آيات الله لا يخسفان لموت أحدٍ، ولا لحياته، فإذا رأيتُم ذلك فاذكروا الله، قالوا: يا رسول الله! رأيناك تناولتَ شيئًا في مقامك، ثم رأيناك كَعْكَعْتَ، قال صلى الله عليه وسلم:"إنِّي رأيتُ الجنة، فتناولت عنقودًا، ولو أصبتُه لأكلتُم منه ما بَقِيَتِ الدنيا، وأُرِيتُ النار، فلم أَرَ منظرًا كاليوم قط أفظعَ، ورأيتُ أكثر أهلها النساء" قالوا: لِمَ يا رسول الله؟ قال:"لكُفرِهنَّ" قيل: يكفرن بالله؟ قال:"يكفُرنَ العَشيرَ، ويكفُرنَ الإحسانَ ولو أحسنت إلى إحداهنَّ الدهرَ كلَّه، ثم رأتْ منك شيئًا قالت: ما رأيت منك خيرًا قط".
متفق عليه: رواه مالك في الكسوف (2) عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
ورواه البخاري في الكسوف (1052) من طريق عن مالك، به.
ورواه مسلم في الكسوف (907) من وجه آخر عن زيد بن أسلم به، ورواه أيضًا عن محمد بن
رافع، حدثنا إسحاق (يعني ابن عيسي) أخبرنا مالك بإسناده مثله ولم يسق لفظه وإنما أحال على
الإسناد السابق.
وقوله:"كعكعت" من تكعكع وهو إذا توقف وأحجم.
ورواه مسلم من وجه آخر مختصرا عن كثير بن عباس، عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه صلي أربع ركعات في ركعتين. وأربع سجدات يوم كسفتِ الشمس بمثل حديث عروة، عن عائشة.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তখন সালাত আদায় করলেন। তিনি এত দীর্ঘ কিয়াম (দাঁড়িয়ে থাকা) করলেন যে, তা সূরাহ আল-বাক্বারাহ পাঠ করার কাছাকাছি ছিল। এরপর তিনি দীর্ঘ রুকূ’ করলেন। তারপর (রুকূ’ থেকে) উঠে দীর্ঘ কিয়াম করলেন, তবে তা প্রথম কিয়াম অপেক্ষা কম ছিল। এরপর তিনি দীর্ঘ রুকূ’ করলেন, তবে তা প্রথম রুকূ’ অপেক্ষা কম ছিল। তারপর সাজদাহ করলেন। এরপর তিনি (দ্বিতীয় রাকাআতের জন্য) দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘ কিয়াম করলেন, তবে তা (প্রথম রাকাআতের) প্রথম কিয়াম অপেক্ষা কম ছিল। এরপর তিনি দীর্ঘ রুকূ’ করলেন, তবে তা প্রথম রুকূ’ অপেক্ষা কম ছিল। তারপর (রুকূ’ থেকে) উঠে দীর্ঘ কিয়াম করলেন, তবে তা প্রথম কিয়াম অপেক্ষা কম ছিল। এরপর তিনি দীর্ঘ রুকূ’ করলেন, তবে তা প্রথম রুকূ’ অপেক্ষা কম ছিল। তারপর সাজদাহ করলেন। এরপর তিনি (সালাত শেষে) ফিরলেন, ততক্ষণে সূর্য উজ্জ্বল হয়ে উঠেছে। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সূর্য ও চন্দ্র আল্লাহর নিদর্শনসমূহের মধ্য হতে দুটি নিদর্শন। এগুলো কারও মৃত্যু বা জন্মের কারণে গ্রহণ হয় না। যখন তোমরা তা (গ্রহণ) দেখবে, তখন তোমরা আল্লাহর স্মরণ করো।" সাহাবীগণ বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনাকে সালাতে দাঁড়ানো অবস্থায় কিছু নিতে দেখলাম, আবার দেখলাম আপনি পেছনের দিকে সরে এলেন ('কা’কা’আতা')।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন: "আমি জান্নাত দেখেছিলাম, তাই একটি থোকা ধরার জন্য হাত বাড়িয়েছিলাম। যদি আমি তা পেতাম, তবে তোমরা দুনিয়া বিদ্যমান থাকা পর্যন্ত তা খেতে পারতে। আর আমাকে জাহান্নাম দেখানো হয়েছিল। আজকের মতো ভয়াবহ দৃশ্য আমি আর কখনও দেখিনি। আর আমি দেখলাম, তার (জাহান্নামের) অধিকাংশ অধিবাসী নারী।" তাঁরা জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কী কারণে?" তিনি বললেন: "তাদের কুফরীর (অকৃতজ্ঞতার) কারণে।" জিজ্ঞেস করা হলো: "তারা কি আল্লাহকে অস্বীকার করে?" তিনি বললেন: "তারা স্বামী (আশিয়ার) ও ইহসানের (উপকারের) নাশুকরি (অকৃতজ্ঞতা) করে। যদি তুমি তাদের কারও প্রতি সারা জীবনও ইহসান (দয়া) করো, এরপরও সে তোমার কাছে কোনো ত্রুটি দেখলে বলে ওঠে: 'আমি তোমার কাছে কখনও কোনো কল্যাণ দেখিনি।'"
2880 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: لما كشفت الشمس على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم نُودي: إن الصلاة جامعة فركع النبي صلى الله عليه وسلم ركعتين في سجدة، ثم قام فركع ركعتين
في سجدة، ثم جلس حتى جُلِّي عن الشمس.
متفق عليه: رواه البخاري في الكسوف (1051)، ومسلم في الكسوف (910) كلاهما من طريق أبي معاوية عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره، وسبق تخريجه.
قوله: ركعتين في سجدة -أي في كل ركعة ركعتان- وهو المَعْني بأربع ركعات في ركعتين.
وأما ما رواه أصحاب السنن من الاختصار على الركوع الواحد في كل ركعة فهو شاذ لأنَّ الذي رُوِي عن عبد الله بن عمرو حفظ منه طول السجود ولم يحفظ ركعتين في ركعة، وأبو سلمة حفظ ركعتين في ركعة وحفظ طول السجود. كما قال البيهقي (3/ 324).
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে সূর্যগ্রহণ হলো, তখন ঘোষণা করা হলো: 'আস-সালাতু জামিআহ' (নামাজের জন্য সমবেত হও)। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক সিজদায় দুইবার রুকু করলেন, অতঃপর তিনি দাঁড়ালেন এবং এক সিজদায় দুইবার রুকু করলেন, এরপর তিনি বসে রইলেন, যতক্ষণ না সূর্যগ্রহণ কেটে গেল।