আল-জামি` আল-কামিল
2961 - عن أنس قال: قَدِم النبي صلى الله عليه وسلم في المدينةَ فنزلَ أعلى المدينة في حيٍّ يقال لهم بنو عمرو بن عوف، فأقام النبي صلى الله عليه وسلم فيهم أربع عشرة ليلة، ثم أرسل إلى بني النجّار فجاءوا مُتَقلِّدى السيوف، كأني أنظرُ إلى النبي صلى الله عليه وسلم على راحلتِه وأبو بكر ردْفُه وملأ بني النجار حولَه، حتى ألقي بفِناء أبي أيوب، وكان يحبُّ أن يُصلي حيثُ أدركَتْه الصّلاةُ ويُصلِّي في مَرابض الغَنمِ، وأنَّه أَمَرَ ببناء المسجد، فأرسل إلى ملإ من بني النجار فقال: يا بني النجار! ثامنوني بحائطِكم هذا. قالوا: لا والله! لا نطلبُ ثمَنَه إلا إلى الله. فقال أنسٌ: فكان فيه ما أقول لكم: قبورُ المشركين، وفيه خربٌ، وفيه نخلٌ، فأمرَ النبي صلى الله عليه وسلم بقبورِ المشركين فنُبِشَتْ، ثم بالخرِبِ فسُويت، وبالنخل فقُطِعَ فصَفُّوا النخل قبلة المسجد، وجعلوا عِضَادَتَيه الحجارة، وجعلوا ينقلون الصخْر وهم يرتجزون، والنبي صلى الله عليه وسلم معهم وهو يقول:
اللهم لا خيرَ إلا خيرُ الآخرهْ … فاغفِرْ للأنصارِ والمُهاجِرَهْ
متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (428)، ومسلم في المساجد (524) كلاهما من حديث عبد الوارث، عن أبي التياح الضُبعي، عن أنس فذكره. ولفظهما سواء.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনায় আগমন করলেন এবং মদিনার উঁচু অংশে বনু আমর ইবনু আওফ নামক এক গোত্রের কাছে অবতরণ করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মধ্যে চৌদ্দ রাত অবস্থান করলেন। এরপর তিনি বনু নাজ্জারের কাছে লোক পাঠালেন। তারা তরবারি ঝুলিয়ে উপস্থিত হলেন। আমি যেন তখনও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর সওয়ারীর উপর দেখছি, আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পেছনে বসে আছেন এবং বনু নাজ্জারের নেতারা তাঁকে ঘিরে আছেন, যতক্ষণ না তিনি আবূ আইয়ুবের বাড়ির উঠানে অবতরণ করলেন। (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অভ্যাস ছিল) যখনই সালাতের ওয়াক্ত হতো, তিনি সেখানেই সালাত আদায় করে নিতেন এবং তিনি ছাগলের খোঁয়াড়েও সালাত আদায় করতেন। অতঃপর তিনি মসজিদ নির্মাণের আদেশ দিলেন এবং বনু নাজ্জারের নেতাদের কাছে লোক পাঠালেন। তিনি বললেন: “হে বনু নাজ্জার! তোমরা আমার কাছে তোমাদের এই দেয়াল ঘেরা বাগানটি বিক্রি করো।” তারা বললেন: “আল্লাহর কসম! আমরা এর মূল্য আল্লাহর কাছে ছাড়া আর কারও কাছে চাই না।” আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সেখানে যা যা ছিল, আমি তোমাদেরকে বলছি: সেখানে মুশরিকদের কবর ছিল, সেখানে ধ্বংসাবশেষ (বা পরিত্যক্ত জায়গা) ছিল এবং সেখানে খেজুর গাছ ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুশরিকদের কবরগুলো উপড়ে ফেলার আদেশ দিলেন, অতঃপর ধ্বংসাবশেষগুলো সমান করে দেওয়া হলো এবং খেজুর গাছগুলো কেটে ফেলা হলো। মসজিদের কিবলার দিকে খেজুর গাছগুলো সারি করে রাখা হলো এবং এর দু'পাশের দরজা (বা খুঁটি) পাথর দিয়ে তৈরি করা হলো। তারা কবিতা আবৃত্তি করতে করতে পাথর বহন করতে লাগলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের সাথে ছিলেন। তিনি তখন বলছিলেন:
"হে আল্লাহ! আখিরাতের কল্যাণ ছাড়া আর কোনো কল্যাণ নেই। সুতরাং আনসার ও মুহাজিরগণকে ক্ষমা করে দিন।"
2962 - عن عكرمة قال: قال لي ابن عباس ولابنه علي: انطلِقا إلى أبي سعيد فاسمعا من حديثه. فانطلقنا فإذا هو في حائط يُصْلِحه، فأخذ رداءه فاحتبي. ثم أنشأ يُحدثنا حتى أتي على ذكر بناء المسجد فقال: كنا نحمل لَبِنَةً لَبِنَةً وعمارٌ لَبِنَتَين بين فرآه النبي صلى الله عليه وسلم فينفُضُ الترابُ عنه. ويقول:"ويحَ عمارٍ تقتلُه الفِئةُ البَاغيةُ يدعوهم إلى الجنة، ويدعونه إلى النار". قال: يقول عمار: أعوذ بالله من الفتن.
صحيح: رواه البخاري في الصلاة (447) عن مسدد، عن عبد العزيز بن مختار قال: حدثنا خالد الحذاء، عن عكرمة فذكر مثله، ورواه أيضًا في الجهاد والسير (2812)، عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا عبد الوهاب، حدثنا خالد به وفيه:"وكان مسح عن رأسه الغُبار، وقال: ويح عمار
تقتلُه الفئة الباغِية، عمار يدعوهم إلى الله، ويدعونه إلى النار".
ولكن رواه مسلم في الفتن (2915) من وجه آخر عن أبي نضرة، يحدث عن أبي سعيد الخدري وفيه قال لعمار، حين جعل يحفِر الخندق، وجعل يمسح رأسه ويقول:"بُؤْسَ ابنِ سُميةَ تقتلك فئةٌ باغيةٌ".
فجعل البيهقي في"الدلائل" (2/ 549) ذكر الخندق في رواية أبي نضرة وهما، أو كان قالها عند بناء المسجد، وقالها يوم الخندق.
قلت: يأتي تفصيل ذلك في كتاب فضائل الصحابة، ولا يمنع أن يكون القول الثاني هو الصحيح فقد ثبت عن عدد من الصّحابة أنه قاله أيضًا يوم الخندق.
والمستشهد هنا وهو التعاون على بناء مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم. فكان عمار رضي الله عنه ممن ضعَّف جهدَه في بناء مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم فكان ينقل لَبِنتين لَبِنتين. وغيره كان ينتقل لبنةً لبنةً.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইকরিমা বলেন, ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে ও তাঁর পুত্র আলীকে বললেন: তোমরা আবু সাঈদের কাছে যাও এবং তার হাদীস শোনো। আমরা সেখানে গেলাম, দেখলাম তিনি একটি বাগানে আছেন এবং সেটি মেরামত করছেন। তিনি তাঁর চাদর নিয়ে ইহতিবা (দুই হাঁটু উপরে তুলে বসা) করলেন। এরপর তিনি আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করতে শুরু করলেন। একপর্যায়ে তিনি মসজিদের নির্মাণকাজ প্রসঙ্গে আলোচনা করলেন। তিনি (আবু সাঈদ) বললেন: আমরা একটি একটি করে ইট বহন করছিলাম, আর আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দুটি করে ইট বহন করছিলেন। নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে দেখে তাঁর শরীর থেকে মাটি ঝেড়ে দিলেন এবং বললেন: “আফসোস আম্মারের জন্য! বিদ্রোহী দল তাকে হত্যা করবে। সে তাদেরকে জান্নাতের দিকে আহ্বান করে, আর তারা তাকে জাহান্নামের দিকে আহ্বান করে।” বর্ণনাকারী বলেন, আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: আমি ফিতনা থেকে আল্লাহর নিকট আশ্রয় চাই।
2963 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن قال: مر بي عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري قال: قلت له: كيف سمعتَ أباك يذكر في المسجد الذي أسِّس على التقوى؟ قال: قال أبي: دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيت بعض نسائه. فقلت: يا رسول الله! أي المسجدين الذي أسِّس على التقوى؟ قال: فأخذ كفًّا من حَصْباءَ فضرب به الأرضَ. ثم قال: هو"مسجدكم هذا" لمسجد المدينة. قال: فقلت: أشهد أني سمعتُ أباك هكذا يذكره.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1398) عن محمد بن حاتم، حدثنا يحيى بن سعيد، عن حُميد الخرَّاط، قال: سمعت أبا سلمة بن عبد الرحمن فذكره.
ورواه الترمذي (3099)، والنسائي (697) من وجه آخر عن عمران بن أبي أنس، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد، عن أبي سعيد الخدري أنه قال: تمارى رجلان في المسجد الذي أسِّس على التقوى من أول يوم. فقال رجل: هو مسجد قُباء، وقال الآخر: هو مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم"فهو مسجدي هذا".
قال الترمذي: حسن صحيح غريب من حديث عمران بن أبي أنس. وقد روي هذا عن أبي سعيد من غير هذا الوجه، ورواه أنيس بن أبي يحيى، عن أبيه، عن أبي سعيد".
قلت: حديث أنيس بن أبي يحى رواه الترمذي (323) عن قتيبة، حدثنا حاتم بن إسماعيل، عن أنيس بن أبي يحيى به وفيه: امترى رجل من بني خُدْرة، ورجل من بني عمرو بن عوف في المسجد الذي أسس على التقوى، فقال الخدريُّ: هو مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال الآخر: هو مسجد قباء: فأتيا رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك فقال:" هو هذا، يعني مسجده، وفي ذلك خير كثير".
قال الترمذي: حسن صحيح.
وقد رجَّح الحافظ ابن حجر في"الفتح" (7/ 245) أن كلا منهما أسِّس على التقوى، وسيأتي ذكره مفصلا في كتاب التفسير.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবু সালামা ইবনু আবদির রহমান বলেন: একবার আবদুর রহমান ইবনু আবী সাঈদ আল-খুদরী আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম, 'যে মসজিদটি তাকওয়ার উপর প্রতিষ্ঠিত হয়েছিল, সে সম্পর্কে আপনি আপনার পিতাকে কী বলতে শুনেছেন?' তিনি বললেন, 'আমার পিতা বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কোনো এক স্ত্রীর ঘরে প্রবেশ করলাম। আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এই দুটি মসজিদের মধ্যে কোনটি তাকওয়ার উপর প্রতিষ্ঠিত হয়েছিল?' তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক মুঠো ছোট নুড়িপাথর তুলে নিলেন এবং তা দিয়ে মাটিতে আঘাত করলেন। এরপর বললেন: 'এটি হলো 'তোমাদের এই মসজিদটি'।' (তিনি মদীনার মসজিদকে বোঝালেন)। (আবু সালামা বলেন,) আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আমি আপনার পিতাকে এভাবেই বর্ণনা করতে শুনেছি।
2964 - عن سهل بن سعد قال: اختلف رجلان على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد الذي أسِّس على التقوى، فقال أحدهما: هو مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال الآخر: هو مسجد قُباء، فأتيا النبي صلى الله عليه وسلم فسألاه فقال:"هو مسجدي هذا".
حسن: رواه الإمام أحمد (22805)، والطبراني في"الكبير" (6025) كلاهما عن وكيع، حدثنا ربيعة بن عثمان التيمي، عن عمران بن أبي أنس، عن سهل بن سعد فذكره.
وإسناده حسن لأجل الكلام في ربيعة بن عثمان التيمي تكلم فيه أبو زرعة وأبو حاتم، وقال النسائي: ليس به بأس، وذكره ابن حبان في الثقات، وروى له مسلم في صحيحه حديثًا واحدًا، والخلاصة فيه أنه حسن الحديث. وقد توبع.
وصحّحه ابن حبان (1604، 1605) فرواه أيضًا من هذا الوجه، قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 10) بعد أن نسبه لأحمد والطبراني:"رجالهما رجال الصحيح".
وأما المتابعة فهي ما رواه الإمام أحمد باختصار (22838) عن عبد الله بن الحارث، حدثني الأسلمي، يعني عبد الله بن عامر، عن عمران بن أبي أنس، عن سهل بن سعد قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا سُئِل عن المسجد الذي أسس على التقوى قال:"هو مسجدي".
وعبد الله بن عامر الأسلمي ضعيف، وأشار إليه الهيثمي في"المجمع" (4/ 10) فقال:"رواه أحمد، وفيه عبد الله بن عامر الأسلمي وهو ضعيف".
قلت: وهو كما قال، فكان من تخبطه مرة روى هكذا، وأخرى زاد بعد سهل بن سعد -أبي بن كعب-. كما رواه أحمد (21107) عن أبي نعيم، حدثنا عبد الله بن عامر الأسلمي، عن عمران بن أبي أنس، عن سهل بن سعد، عن أبي بن كعب أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المسجد الذي أسس على التقوى مسجدي هذا" وصحّحه الحاكم (2/ 334).
فالصّحيح أن هذا الحديث لا يصح فيه ذكر أبي بن كعب.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে 'আল-মাসজিদুল্লাযী উসসিয়া আলাত তাক্বওয়া' (যে মসজিদটি তাকওয়ার উপর প্রতিষ্ঠিত) সম্পর্কে দুইজন লোকের মধ্যে মতভেদ হলো। তাদের একজন বললেন: এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মসজিদ, আর অপরজন বললেন: এটি কুবা মসজিদ। অতঃপর তারা উভয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি বললেন: "এটা আমার এই মসজিদ।"
2965 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تُشَدُّ الرِّحالُ إلا إلى ثلاثة مساجد. مسجدي هذا، والمسجد الحرام، والمسجد الأقصى".
متفق عليه: رواه البخاري في كتاب فضل الصلاة في مسجد مكة والمدينة (1189)، ومسلم في الحج (1397) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي
هريرة فذكر مثله.
ورواه مسلم من وجه آخر عن سلمان الأغَرِّ أنه سمع أبا هريرة يُخبر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنما يُسَافَر إلى ثلاثة مساجد: مسجد الكعبة، ومسجدي، ومسجد إيلياء". ومسجد إيلياء هو: بيت المقدس.
وسيأتي لأبي هريرة طريق وهو حُميل بن بصرة بن وقاص.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: 'তিনটি মসজিদ ছাড়া অন্য কোনো স্থানের উদ্দেশে (বিশেষ ফযীলতের জন্য) সফর করা উচিত নয়। আমার এই মসজিদ (মসজিদে নববী), মসজিদুল হারাম এবং মসজিদুল আকসা।'
(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: 'কেবলমাত্র তিনটি মসজিদের দিকেই সফর করা হয়: কা'বার মসজিদ, আমার মসজিদ এবং আইলিয়ার মসজিদ।' আর আইলিয়ার মসজিদ হলো: বাইতুল মাকদিস।)
2966 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تشدوا الرِحال إلَّا إلى ثلاثةِ مساجد: مسجدي هذا، والمسجد الحرام، والمسجد الأقصى".
متفق عليه: رواه البخاري في فضل الصلاة (1197)، ومسلم في الحج (827/ 415 و 416) كلاهما من حديث شعبة، عن عبد الملك بن عمير، عن قزعة، عن أبي سعيد فذكر الحديث، واللفظ لمسلم.
وفي البخاري قال قزعة مولى زياد: سمعتُ أبا سعيد الخدري يحدث بأربع عن النبي صلى الله عليه وسلم فأعجني وآنقنني. قال:"لا تسافر المرأة يومين إلا ومعها زوجها أو ذو محرم، ولا صوم في يومين: الفطر والأضحى، ولا صلاة بعد صلاتين: بعد الصبح حتى تطلع الشمس، وبعد العصر حتى تغرب، ولا تشد الرحال إلا إلى ثلاثة مساجد: مسجد الحرام، ومسجد الأقصى، ومسجدي" وهذه كلها تذكر في مواضعها.
وقوله: آنقنني -بالمد ثم نون مفتوحة، ثم قاف ساكنة بعدها نونان- يقال: آنقه إذا أعجبه، وشيء مونق أي معجب.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিনটি মসজিদ ব্যতীত অন্য কোনো স্থানের উদ্দেশ্যে (সাওয়াবের নিয়তে) সফর করা উচিত নয়: আমার এই মসজিদ (মসজিদে নববী), মসজিদুল হারাম এবং মসজিদুল আকসা।"
2967 - عن أبي سعيد وعبد الله بن عمرو بن العاص أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تُشد الرحال إلا إلى ثلاثة مساجد: إلى المسجد الحرام، وإلى المسجد الأقصى، وإلى مسجدي هذا".
حسن: رواه ابن ماجه (1410) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا محمد بن شُعيب، قال: حدثنا يزيد بن أبي مريم، عن قَزَعة، عن أبي سعيد وعبد الله بن عمرو فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل يزيد بن أبي مريم، فإنه مختلف فيه. وثَّقه جماعة وتكلم فيه الدارقطني، غير أنه حسن الحديث. وهو من رجال الصحيح.
وقال الدارقطني في"العلل": الصحيح قول من قال: عن قزعة، عن أبي سعيد.
আবূ সাঈদ ও আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: তিনটি মসজিদ ছাড়া (অন্য কোনো স্থানের উদ্দেশে) সফর করা যাবে না (বা সওয়ারের বাঁধন শক্ত করা যাবে না): মসজিদুল হারাম, মসজিদুল আকসা এবং আমার এই মসজিদ।
2968 - عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم لا أنه قال:"إن خير ما رُكِبتْ إليه الرواحلُ مسجدي هذا، والبيت العتيق".
حسن: رواه الإمام أحمد (14782)، وأبو يعلى (2266)، والطبراني في الأوسط (744، 4427)، وصحّحه ابن حبان (1616) كلهم من طرق عن الليث بن سعد، عن أبي الزبير، عن جابر
فذكر الحديث. وإسناده صحيح.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই যে স্থানগুলোর উদ্দেশ্যে সওয়ারী চালনা করা হয়, সেগুলোর মধ্যে সর্বোত্তম হলো আমার এই মসজিদ (মসজিদে নববী) এবং বায়তুল আতিক (কা’বা ঘর বা মসজিদুল হারাম)।”
2969 - عن حُميل بن بصرة بن وقاص بن حاجب بن غفار قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تضرب المطايا إلا إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، ومسجدي هذا، ومسجد إيلياء".
صحيح: رواه الطحاوي في"مشكل الآثار" (585) عن يحيى بن عثمان بن صالح، حدثنا سعيد ابن أبي مريم، أخبرنا أبو غسان محمد بن مطرف، عن زيد بن أسلم، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة، قال: أتيت الطور، فصليت فيه. فلقيت حُميل بن بصرة بن وقاص بن حاجب بن غفار فقال: من أين جئت؟ فأخبرته فقال: لو لقيتُك قبل أن تأتيه ما جئته، سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث. وإسناده صحيح.
ورواه مالك في الجمعة (16) في حديث طويل عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر الحديث وفيه: فلقيت بصرة بن أبي بصرة الغِفاري.
ومن طريق مالك رواه الإمام أحمد (23848)، وابن حبان (2772)، والطحاوي في مشكله (590)، فجعل الحديث من مسند بصرة بن أبي بصرة، وإنما هو لابنه حُميل كما سبق. وجعله ابن عبد البر من مسند أبي بصرة وهو جدّ حُميل.
قلت: حُميل وأبوه بصرة، وجده وقاصي يكنى أبا بصرة ثلاثة لهم صحبة كما قال مصعب الزبيري، انظر: الإصابة (1/ 358) فإذا كان لثلاثة صحبة فمن الجائز أن يكون الحديث من مسند الحفيد، أو من مسند أبيه بصرة، ومن البعيد أن يكون لجده أبي بصرة، لأن الذي سكن البصرة هو حُميل وأبوه.
وحُميل أيضًا يكنى بأبي بصرة. فمن قال: أبو بصرة فالمراد منه حُميل -الحفيد- لا الجد وقاص الذي كان يكنى أيضًا بأبي بصرة. والله تعالى أعلم.
হুমাইল ইবনে বুসরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: সওয়ারী প্রস্তুত করে (বা সফর করে) যাবে না তবে তিনটি মসজিদের দিকে: মসজিদুল হারাম, আমার এই মসজিদ (মসজিদে নববী) এবং মাসজিদ ইলিয়া (বায়তুল মুকাদ্দাস)।
2970 - عن أبي الجعد الضَمري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُشد الرِّحال إلا إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، ومسجدي هذا، والمسجد الأقصى".
حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (1074)، والطبراني في الكبير (22/ 366) كلاهما من طريق سعيد بن عمرو الأشعثي، قال: حدثنا عَبْثَر بن القاسم، حدثنا محمد بن عمرو بن علقمة، عن عبيدة بن سفيان، عن أبي الجعد به.
ورجاله رجال الصحيح غير أن محمد بن عمرو بن علقمة مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث وهو من رجال مسلم.
قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 4): رواه الطبراني في الكبير والأوسط، ورجاله رجال الصحيح، ورواه البزار أيضًا".
قلت: ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا كل من ابن قانع في معجم الصّحابة" (711)، وأبي نعيم في"معرفة الصحابة" (6725) ولكن الذي عند البزار: سعيد بن محمد، عن عبثر، وأظن أنه خطأ. وإنما هو سعيد بن عمرو الأشعثي وهو من رجال مسلم.
قال البزار: لا نعلم روى أبو الجعد إلا هذا، وآخر.
قلت: الحديث الآخر هو ما رواه أصحاب السنن وصحّحه ابن خزيمة وابن حبان وغيرهما وهو من الترهيب"من ترك صلاة الجمعة"، وسيأتي تخريجه، ولكن يُعكر هذا ما قاله البخاري كما في"الإصابة" (4/ 32) بأنه لا يعرف لأبي الجعد إلا الحديث المذكور أعني الترهيب من ترك الجمعة، فهل حديث الباب لم يقف عليه؟ أو يرى أنه لا يَصح. والله تعالى أعلم.
وأما أبو الجعد فإنه قد اختلف في اسمه، ولكن ثبتت صحبته.
قال البغوي: سكن المدينة، وكانت له دار في بني ضمرة.
وقال ابن البرقي: قتل مع عائشة في وقعة الجمل.
وفي معناه ما رُوي عن عبد الله بن عمر مرفوعا: لا تُشدّ الرحال إلا إلى ثلاثة مساجد: مسجد الحرام، ومسجد المدينة، ومسجد بيت المقدس.
رواه الطبراني في الكبير (12/ 337، 338)، وفي إسناده عبد الله بن عمر وهو ابن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب ضعيف عند جمهور أهل العلم.
আবু আল-জা'দ আদ-দামরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তিনটি মসজিদ ব্যতীত (পুণ্যের উদ্দেশ্যে) অন্য কোথাও সফর করা উচিত নয়: মসজিদুল হারাম, আমার এই মসজিদ এবং মসজিদুল আকসা।”
2971 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة في مسجدي هذا خير من ألف صلاة فيما سِواه، إلا المسجد الحرام".
متفق عليه: رواه مالك في القبلة (9) عن زيد بن رباح وعبيد الله بن أبي عبد الله، عن أبي عبد الله سلْمان الأغرِّ، عن أبي هريرة فذكر مثله.
ورواه البخاري في كتاب فضل الصلاة في مسجد مكة والمدينة (1190) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به مثله.
ورواه مسلم في الحج (1394) من وجه آخر عن أبي سلمة بن عبد الرحمن وأبي عبد الله الأغرِّ أنهما سمعا أبا هريرة فذكر مثله وزاد في آخر الحديث:"وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم آخر الأنْبياء، وإن مسجده آخر المساجد" أي: آخر مساجد الأنبياء.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মাসজিদুল হারাম ব্যতীত আমার এই মাসজিদে এক সালাত (নামাজ) অন্য যেকোনো মাসজিদে এক হাজার সালাত অপেক্ষা উত্তম।"
2972 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة في مسجدي هذا أفضل من ألف صلاةٍ فيما سِواه إلا المسجد الحرام".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1395) من حديث عبيدالله قال: أخبرني نافع، عن ابن عمر
فذكر مثله.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "আমার এই মসজিদে এক ওয়াক্ত সালাত আদায় করা মসজিদুল হারাম ছাড়া অন্য যে কোনো মসজিদে এক হাজার সালাত আদায়ের চেয়েও উত্তম।"
2973 - عن ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"صلاة فيه أفضل من ألْف صلاة فيما سواه من المساجد، إلا مسجد الكعبة".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1396) عن قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، عن نافع، عن إبراهيم بن معبد، عن ابن عباس أنه قال: إن امرأة اشتكت شكْوى فقالت: إن شفاني الله لأخرجنَّ فالأصلِّينَّ في بيت المقدس. فبرأَتْ، ثم تجهزتْ تريد الخروجَ. فجاءتْ ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم تُسَلِّم عليها. فأخبرتْها ذلك. فقالت: اجلسي فكلي ما صنعتِ، وصَلِّي في مسجد الرسول صلى الله عليه وسلم فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكرت الحديث.
قال النووي رحمه الله:"إن ميمونة أفتت امرأة نذرت الصلاة في بيت المقدس أن تصلي في مسجد النبي صلى الله عليه وسلم، واستدلت بالحديث. وهذه الدلالة ظاهرة، وهذا حجة لأصح الأقوال في مذهبنا في هذه المسألة".
মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তাঁর থেকে বর্ণিত। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, জনৈকা মহিলা অসুস্থ হয়ে পড়লে মানত করেছিল যে, "যদি আল্লাহ আমাকে আরোগ্য দান করেন, তবে আমি অবশ্যই বায়তুল মুকাদ্দাসে গিয়ে সালাত আদায় করব।" সে আরোগ্য লাভ করলে সফরের প্রস্তুতি নিতে শুরু করে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে সালাম দিতে এসে বিষয়টি জানতে পারেন। তিনি তাকে বললেন: তুমি বসে পড়ো এবং যা রান্না করেছো, তা খাও। আর তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদে সালাত আদায় করো। কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এই (মসজিদে নববীতে) এক ওয়াক্ত সালাত কাবাঘর ব্যতীত অন্য যে-কোনো মসজিদে এক হাজার সালাত আদায়ের চেয়েও উত্তম।"
2974 - عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة في مسجدي أفضل من ألف صلاة فيما سِواه إلا المسجد الحرام، وصلاة في المسجد الحرام أفضل من مائة ألْف صلاةٍ فيما سواه".
صحيح: رواه ابن ماجه (1406) عن إسماعيل بن أسد، قال: حدثنا زكريا بن عدي، قال: أنبأنا عبيدالله بن عمرو، عن عبد الكريم، عن عطاء، عن جابر فذكره.
وإسناده صحيح، إسماعيل بن أسد هو: إسماعيل بن أبي الحارث أسد بن شاهين البغداديّ وثقه أبو حاتم والدّارقطني وابن حبان وغيرهم.
وتُكلِّم فيه بدون حجة، وتابعه الإمام أحمد (14694) فرواه من طريق حسين بن محمد وعبد الجبار بن محمد الخطابي، كلاهما عن عبيدالله بن عمر به مثله. وعبيدالله بن عمر هو: ابن أبي الوليد الرَّقِّي من رجال الجماعة.
وعبد الكريم هو: ابن مالك الجزري.
قال البوصيري في زوائد ابن ماجه: إسناده صحيح.
وقال الحافظ في الفتح (3/ 67):"رجال إسناده ثقات".
وسيأتي أيضًا من طريق عطاء بن أبي رباح، عن عبد الله بن الزبير، ومن الجائز أن يكون عند عطاء عنهما جميعًا.
قال الحافظ:"ويؤيد ذلك أن عطاء إمام واسع الرواية، معروف بالرواية عن جابر وابن الزبير".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার এই মসজিদে (নববীতে) এক সালাত আদায় করা মাসজিদুল হারাম ব্যতীত অন্য যেকোনো মসজিদের এক হাজার সালাত আদায়ের চেয়েও উত্তম। আর মাসজিদুল হারামে এক সালাত আদায় করা অন্য সকল মসজিদের এক লক্ষ সালাত আদায়ের চেয়েও উত্তম।
2975 - عن عبد الله بن الزبير قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة في مسجدي هذا أفضل من ألف صلاة فيما سواه من المساجد إلا المسجد الحرام، وصلاة في المسجد
الحرام أفضل من مائة صلاة في هذا".
حسن: رواه أحمد (16117) والبزار -كشف الأستار - (425) كلاهما من طريق حماد بن زيد قال: حدثنا حبيب المعلِّم، عن عطاء بن ابي رباح، عن عبد الله بن الزبير فذكر مثله، وصحّحه ابن حبان (1620) فرواه من هذا الوجه.
ورجاله ثقات غير حبيب المعلِّم فإنه وإن كان من رجال الجماعة إلا أنه مختلف فيه فقد وثقه جماعة، وتكلَّم فيه النسائي غير أنه حسن الحديث.
قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 4، 5):"رواه أحمد والبزار والطبراني في الكبير بنحو البزار، ورجال أحمد والبزار رجال الصحيحة".
وللحديث أسانيد أخرى والذي ذكرته هو أمثلها.
وقوله: وصلاة في المسجد الحرام تَفضلُ بمائة. قال عطاء:"فكأنه مائة ألف" رواه أبو داود الطيالسي (1364) من طريق الربيع بن صَبيح قال: سمعت عطاء بن أبي رباح يقول: بينما ابن الزبير يخطبنا إذ قال: فذكر الحديث.
وقال فيه: قلت: يا أبا محمد! هذا الفضلُ الذي تذكره في المسجد الحرام وحده، أو في الحرم؟ قال: لا، بل في الحرم، فإن الحرم كلَّه مسجد. انتهى.
والربيع بن صَبيح: بفتح المهملة اخُتِلف فيه، فضعَّفه ابن سعد، ومشّاه الآخرون منهم: أحمد وابن معين وأبو زرعة وأبو حاتم وابن عدي وغيرهم.
আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার এই মাসজিদে (মসজিদে নববীতে) এক ওয়াক্ত সালাত, মাসজিদুল হারাম ব্যতীত অন্য মাসজিদসমূহে এক হাজার সালাত আদায় করার চেয়েও উত্তম। আর মাসজিদুল হারামে এক ওয়াক্ত সালাত এই মাসজিদের (মসজিদে নববীর) একশ' সালাতের চেয়েও উত্তম।"
2976 - عن سعد بن أبي وقاص أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"صلاة في مسجدي هذا خير من ألْفِ صلاةٍ فيما سِواه إلا المسجد الحرام".
حسن: رواه أحمد (1605) عن سليمان بن داود، أخبرنا عبد الرحمن -يعني ابن أبي الزناد-، عن موسى بن عُقبة، عن أبي عبد الله القراظ، عن سعد فذكر مثله، ولعلّ هذا الحديث سقط من مسند أبي داود المطبوع، وإلا فقد ذكره أيضًا البوصيري في"إتحاف المهرة" (1392) وعزاه إلى الإمام أحمد كما رواه أيضًا أبو يعلى (774) عن زهير، عن سليمان بن داود الهاشمي به مثله، وقوله:"الهاشمي" خطأ، لأنه فارسي الأصل. وإسناده حسن لأجل الكلام في عبد الرحمن بن أبي الزناد فقد تكلم فيه ابن معين وأحمد وابن مهدي، وأثنى عليه مالك. قال موسى بن سلمة: قدمت المدينة فأتيت مالك بن أنس فقلت له: إني قدمت إليك لأسمع العلم، وأسمع ممن تأمرني به، فقال: عليك بابن أبي الزناد، هذه شهادة مالك وهو أعلم الناس بأهل المدينة.
ولكن لما ذهب إلى بغداد أفسده البغداديون.
وسليمان بن داود الهاشمي الراوي عنه من البغداديين، إلا أن روايته عنه مقاربة كما قال علي ابن المديني.
والخلاصة فيه أنه لا بأس به في الشّواهد.
ورُوِيَ هذا الحديث بإسناد آخر وفيه موسى بن عُبيدة الرَّبَذي ضعَّفوه ولكن لم يُتهم بل قال فيه ابن سعد: كان ثقة كثير الحديث وليس بحجة، ومن طريقه رواه البزار كشف الأستار" (426) قال: حدثنا محمد بن المثنى، ثنا أبو داود، ثنا شعبةُ، عن موسى بن عبيدة أبي عبد العزيز الربذي، عن عمر بن الحكم، عن سعد فذكر مثله، وفات الهيثمي في"المجمع" (4/ 5) أن يتكلم على إسناد البزار مع العزو إليه، فقال:"رواه أحمد وأبو يعلى والبزار، وفيه عبد الرحمن بن أبي الزناد وهو ضعيف" وليس في إسناد البزار: عبد الرحمن بن أبي الزناد. فتنبه.
شرح الحديث:
يرى الطحاوي رحمه الله تعالى أن التفضيل بالصلاة في هذين المسجدين يختص بالفريضة فقط دون النوافل."شرح المعاني" (3/ 128).
وذهب الشافعية وكثير من المالكية إلى أنه يعم الفرض والنفل جميعًا لإطلاق الصلاة في الأحاديث الصّحيحة.
ولكن هل هذا التضعيف يجمع مع تضعيف الجماعة سبعًا وعشرين درجة أو لا؟ يقول الحافظ: محل بحث،"الفتح" (3/ 68).
وفي الباب عن جبير بن مطعم، رواه الإمام أحمد (16731)، والبزار"كشف الأستار" (234)، والطبراني في الكبير (1606) كلهم من طريق هُشيم، عن حُصين بن عبد الرحمن السلمي، عن محمد بن طلحة بن يزيد بن ركانة، عن جبير بن مطعم، ولفظه:"صلاة في مسجدي هذا أفضل من ألف صلاة فيما سواه إلا المسجد الحرام".
وفيه انقطاع بين جبير بن مطعم وبين محمد بن طلحة بن يزيد بن ركانة.
قال أبو حاتم الرازي: إن محمد بن طلحة روى عن جبير بن مطعم مرسلًا"الجرح والتعديل" (7/ 291).
وهذا الذي رجحه أيضًا الدارقطني وخطّأ من أدخل بينهما فقال:"عن أبيه".
وفي الباب أيضًا عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنا خاتم الأنبياء، ومسجدي خاتم مساجد الأنبياء، أحق المساجد أن يُزار، وتُشد إليه الرواحل: المسجد الحرام، ومسجدي، وصلاة في مسجدي أفضل من ألف صلاة فيما سواه من المساجد، إلا المسجد الحرام".
رواه البزار الكشف الأستار" (1193) وفيه موسى بن عبيدة ضعيف، قاله الهيثمي في"المجمع" (4/ 4).
قلت: وله طرق أخرى كلها ضعيفة.
وكذلك حديث أرقم أنه جاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلَّم عليه فقال:" أين تريد؟" قال: أردت يا رسولَ الله! هاهنا -وأومأ بيده إلى حيث بيت المقدس- قال:" ما يخرجك إليه؟ أتجارة؟" قال:
قلت: لا، ولكن أردتُ الصلاة فيه قال:"فالصلاة هاهنا" أومأ إلى مكة بيده"خير من ألف صلاة" وأوما بيده إلى الشّام.
وإسناده ضعيف مع الاضطراب، رواه الإمام أحمد (24009) عن عصام بن خالد، حدثنا العطَّاف ابن خالد، حدثنا يحيى بن عِمران، عن عبد الله بن عثمان بن الأرقم، عن جده الأرقم فذكر مثله.
وفيه يحيى بن عمران وهو ابن عثمان بن الأرقم المخزومي، وعمه عبد الله بن عثمان بن الأرقم مجهولان كما أن عطَّاف بن خالد المخزومي اضطرب في الإسناد.
وكذلك ما رُوي عن أبي سعيد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ودَّع رجلًا فقال له:"أين تريد؟" قال: أريد بيت المقدس، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة في مسجدي أفضل من مائة في غيره إلا المسجد الحرام" ضعيف.
رواه الإمام أحمد (11733)، وأبو يعلى (1165 - تحقيق حسين) والبزار"كشف الأستار" (429) عن إبراهيم، عن سهم بن منجاب، عن قزعة، عن أبي سعيد فذكر مثله واللفظ لأبي يعلى، ولم يذكر البزار القصة.
وذكره الإمام أحمد في حديث طويل وفيه:"لا صومَ يوم عيد، ولا تسافر امرأة ثلاثًا إلا مع ذي محرم، ولا تُشد الرحال إلا إلى ثلاثة مساجد: مسجد الحرام، ومسجد المدينة، والمسجد الأقصى" ثم قال أبو سعيد: ودَّع رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلا فذكر مثله إلا أن فيه: أفضل من ألف صلاة.
وإسناده ضعيف لأجل المغيرة وهو: ابن مِقسم الضبي تكلم فيه الإمام أحمد وغيره، فقال الإمام أحمد:"حديث المغيرة بن مِقسم مدخول، عامة ما روي عن إبراهيم إنما سمعه من حماد، ومن يزيد بن الوليد، والحارث الكلبي، وعبيدة وغيرهم، وجعل يُضعف حديثه عن إبراهيم وحده""الجرح والتعديل (8/ 229).
قلت: المغيرة بن مقسم من المدلسين في المرتبة الثالثة عند الحافظ ابن حجر، كما أن في متنه نكارة.
مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلى لله أربعين يوما في جماعة، يدرك التكبيرة الأولى كتبت له براءتان: براءة من النار، وبراءة من النفاق".
رواه الترمذي (241) عن عقبة بن مكرم ونصر بن علي الجهضمي، قالا: حدثنا أبو قتيبة سلم ابن قتيبة، عن طعمة بن عمرو، عن حبيب بن أبي ثابت به مثله. إلا أنه معلول أيضا.
قال الترمذي:"وقد روي هذا الحديث عن أنس موقوفا، ولا أعلم أحدا رفعه إلا ما روى سلم ابن قتيبة، عن طعمة بن عمرو، عن حبيب بن أبي ثابت، عن أنس، وإنما يروي هذا عن حيب بن أبي حيب البجلي، عن أنس بن مالك قوله"، (يعني موقوفا).
ثم رواه الترمذي عن هناد، قال حدثنا وكيع، عن خالد بن طهمان، عن حبيب بن أبي حبيب البجلي، عن أنس بن مالك قوله، ولم يرفعه.
ثم قال الترمذي:"وروى إسماعيل بن عياش هذا الحديث عن عمارة بن غزية، عن أنس بن مالك، عن عمر بن الخطاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو هذا. وهذا حديث غير محفوظ، وهو مرسل، عمارة بن غزية لم يدرك أنس بن مالك".
إلا أنه لم يسق لفظ الحديث، ولكن من ظاهر سياقه"أربعين يوما".
قلت: وفيه إسماعيل بن عياش ضعيف في غير الشاميين، وعمارة بن غزية من المدنيين، ثم هو خالف في لفظ الحديث أيضا؛ فقد وصله ابن ماجه (789) عن عثمان بن أبي شيبة، قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، عن عمارة بن غزية، عن أنس بن مالك، عن عمر بن الخطاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يقول:" من صلى في مسجد جماعة أربعين ليلة، لا تفوته الركعة الأولى من صلاة العشاء كتب الله له بها عتقا من النار" فقيد هذه الصلاة بصلاة العشاء دون غيرها من الصلوات، وهذا الاختلاف في الإسناد والمتن يجعل الحديث مضطربا، وللحديث طرق أخرى مع اختلاف في متن الحديث يزيده ضعفا على ضعف.
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي كاهل قيس بن عائذ قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر حديثا طويلا، وجاء فيه:"اعلمن يا أبا كاهل أنه من صلى أربعين يوما وأربعين ليلة في جماعة يدرك التكبيرة الأولى كان حقا على الله أن يكتب له براءة من النار".
رواه الطبراني في الكبير (18/ 361، 362) عن الحسن بن علي المعمري، ثنا علي بن المديني، ثنا يونس بن محمد المؤدب، ثنا الفضل بن عطاء، عن الفضل بن شعيب، عن أبي منظور، عن أبي معاذ، عن أبي كاهل، قال: فذكره.
قال ابن عبد البر في ترجمته في الاستيعاب (310):"ذُكِرَ له حديث منكر طويل فلم أذكره" وقال الهيثمي في المجمع (4/ 219):"وفيه الفضل بن عطاء، ذكره الذهبي وقال: إسناده مظلم"، وذكره العقيلي في الضعفاء.
وبهذا يعلم أنه لا يصح في هذا الباب شيء.
সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "আমার এই মসজিদে এক ওয়াক্ত সালাত আদায় করা মাসজিদুল হারাম ছাড়া অন্য মসজিদে এক হাজার সালাত আদায়ের চেয়ে উত্তম।"
2977 - عن عبد الله بن عمرو، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن سليمان بن داود صلى الله عليه وسلم لما بنى بيت المقْدِس سأل الله عز وجل خلالًا ثلاثةً: سأل الله عز وجل حكمًا يصادف حكمه فأوتيه، وسأل الله عز وجل مُلكًا لا ينبغي لأحد من بعده فأوتيه، وسأل عز وجل حين فرغ من بناء المسجد أن لا يأتيه أحد لا ينهزه إلا الصلاةُ فيه أن يخرجه من خطيئتَه كيوم ولدته أمه".
صحيح: رواه النسائي (693) عن عمرو بن منصور، قال: حدثنا أبو مسهر، قال: حدثنا سعيد ابن عبد العزيز، عن ربيعة بن يزيد، عن أبي إدريس الخولاني، عن ابن الديلمي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.
وإسناده صحيح، وابن الديلمي هو: عبد الله بن فيروز الديلمي أبو بُسر وثقه ابن معين والعجلي وابن حبان وغيرهم.
ورواه الأوزاعي عن ربيعة بن يزيد ولم يذكر بينه وبين ابن الديلمي"أبا إدريس الخولاني".
ومن طريقه روا الإمام أحمد (6644) في حديث طويل، وابن حبان (1633)، والحاكم في المستدرك (2/ 434) كلهم من طرق عن الأوزاعي، وقد جزم البخاري في"التاريخ الكبير" (3/ 288) بسماع ربيعة بن يزيد من عبد الله الديلمي، وفي رواية الحاكم التصريح بسماعه منه. ورواه الحاكم أبضًا (1/ 30) وقرن يحيى بن أبي عمرو الشيباني بربيعة بن يزيد كلاهما قالا: ثنا عبد الله بن فيروز الديلمي في حديث طويل وقال: هذا حديث صحيح، وقد تداوله الأئمة، وقد احتجا بجميع رواته، ثم لم يخرجاه، ولا أعلم له علة.
فإذا صحَّ هذا فيحمل كما هو معروف في علم الحديث أن ربيعة بن يزيد سمع هذا الحديث أوَّلًا من أبي إدريس الخولاني، عن عبد الله الديلمي، ثم تيسر له أن يسمع من عبد الله الديلمي فروى على وجهين.
وللحديث طرق أخرى والذي ذكرته هو أجودها، منها ما رواه ابن ماجه (1408)، وابن خزيمة (1334) كلاهما عن عبيدالله بن الجهم الأنْماطي، حدثنا أيوب بن سُويد، عن أبي زرعة الشيباني يحيى بن أبي عمرو، حدثنا ابن الديلمي، عن عبد الله بن عمرو فذكر مثله.
قال البوصيري:"هذا إسناد ضعيف أيوب بن سُويد متفق على تضعيفه، وعبيد الله بن الجهم لا يُعرف".
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই সুলাইমান ইবনে দাউদ (আলাইহিস সালাম) যখন বাইতুল মাকদিস নির্মাণ করলেন, তখন তিনি মহান আল্লাহর কাছে তিনটি বিষয় প্রার্থনা করেছিলেন: (১) তিনি আল্লাহর কাছে এমন শাসন ক্ষমতা চাইলেন যা তাঁর (আল্লাহর) সিদ্ধান্তের অনুরূপ হবে। আল্লাহ তাঁকে তা দান করলেন। (২) তিনি আল্লাহর কাছে এমন এক রাজত্ব চাইলেন যা তাঁর পরে আর কারো জন্য উপযুক্ত হবে না। আল্লাহ তাঁকে তা দান করলেন। এবং (৩) যখন তিনি মসজিদের নির্মাণ কাজ শেষ করলেন, তখন তিনি আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করলেন যে, যে ব্যক্তিই কেবল তাতে সালাত আদায়ের উদ্দেশ্যে আসবে, আল্লাহ যেন তাকে তার গুনাহ থেকে এমনভাবে বের করে দেন, যেমন তার মা তাকে জন্ম দিয়েছিল।"
2978 - عن أبي ذر قال: تذاكرنا ونحن عند رسول الله صلى الله عليه وسلم: أيهما أفضل مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم أو مسجد بيت المقدس؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة في مسجدي هذا أفضل من أربع صلوات فيه، ولنعم المصلي، وليوشكن أن لا يكون للرجل مثل شطن فرسه من
الأرض حيث يرى منه بيت المقدس خير له من الدنيا جميعا" أو قال:"خير من الدنيا وما فيها".
حسن: رواه الحاكم (4/ 509) والطبراني في الأوسط (6979) كلاهما من حديث حفص بن عبد الله، حدثني إبراهيم بن طهمان، عن الحجاج بن الحجاج، عن قتادة، عن أبي الخليل، عن عبد الله بن الصامت، عن أبي ذر، فذكره. قال الحاكم: صحيح الإسناد".
قلت: إسناده حسن من أجل حفص بن عبد الله وهو ابن راشد السلمي، فإنه حسن الحديث وهو من رجال الصحيح.
والحجاج بن الحجاج هو الباهلي، وأبو الخليل هو صالح بن أبي مريم، وكلاهما من رجال الصحيح.
قوله:"شطن فرسه" أي حبله.
ورواه الطحاوي في مشكل الآثار (608) والبيهقي في شعب الإيمان (486/ 3) كلاهما من وجه آخر عن قتادة، عن عبد الله بن الصامت، عن أبي ذر، فذكر نحوه إلا قوله:"ولنعم المصلى"، فقال:"ولنعم المصلي في أرض المحشر وأرض المنشر" كذا عند الطحاوي، وزاد البيهقي بعده:"وليأتين على الناس زمان، ولقيد سوط -أو قال-: قوس الرجل حيث يرى منه بيت المقدس خير له أو أحب إليه من الدنيا جميعا".
قال الطحاوي: فكان ما في هذا الحديث يدل على أن الصلاة في مسجد النبي صلى الله عليه وسلم كمئتي صلاة وخمسين صلاة في المسجد الأقصى.
إلا أن قتادة لم يسمع من عبد الله بن الصامت، ولذا قال الدارقطني في علله (6/ 264):"وقول حجاج بن حجاج، عن قتادة، عن أبي الخليل أشبه بالصواب".
وأما ما رُوي عن أبي الدرداء مرفوعا:"فضل الصلاة في المسجد الحرام على غيره مائة ألف صلاة، وفي مسجدي ألف صلاة، وفي مسجد بيت المقدس خمسمائة صلاة" فهو ضعيف.
رواه البزار"كشف الأستار" (422) والطحاوي في مشكله (609) وابن عدي في الكامل (3/ 1234) والبيهقي في شعب الإيمان (3/ 485) كلهم من حديث سعيد بن سالم القداح، ثنا سعيد بن بشير، عن إسماعيل بن عبيد الله، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء، فذكره.
وسعيد بن بشير هو: الأزدي مولاهم، أبو عبد الرحمن الشامي ضعَّفه ابن معين وأبو داود والنسائي وغيرهم، ولذا أطلق عليه الحافظ في"التقريب" بأنه"ضعيف" والراوي عنه سعيد بن سالم القداح"صدوق يهم".
ثم هو مخالف لما ثبت من حديث أبي ذر:"مائتان وخمسون صلاة" ورجاله ثقات ضابطون.
وأما قول الهيثمي في المجمع (4/ 7):"رواه الطبراني في الكبير، ورجاله ثقات، وفي بعضهم كلام، وهو حديث حسن" ففيه نظر؛ فإن فيه مخالفة من سعيد بن بشير لما ثبت من حديث أبي ذر،
وإنْ كان بعض أهل العلم حسن الرأي فيه، قال شعبة: كان صدوق اللسان، ووثقه دحيم.
وكذلك لا يصح ما رواه أبو داود (457)، وابن ماجه (1407)، وأحمد (27626) كلهم من طريق زياد بن أبي سودة، عن أخيه عثمان بن أبي سودة، عن ميمونة مولاة النبي صلى الله عليه وسلم قالت: يا رسول الله! أفْتِنا في بيت المقدس قال:"أرض المحْشَرِ والمنْشَر، ائتُوه فصلوا فيه، فإن صلاةً فيه كألْف صلاةٍ في غيره" قلت: أرأيت إن لم أَستطع أن أتحمل إليه؟ قال:"فتهدي له زيتًا يسرجُ فيه، فمن فعل ذلك فهو كمن أتاه" فهو منكر.
قال الحافظ ابن رجب في فضائل الشام (331):"وإسناده قوي لأن رواته ثقات، لكن قد قيل: إن إسناده منقطع، وفي متنه غرابة".
قلت: وفي إسناده علل منها: زياد بن أبي سودة وإن قال فيه الحافظ:"ثقة" فقد تكلم فيه الذهبي في"الميزان" وأورد له هذا الحديث وقال: في النفس شيء من الاحتجاج به، وقال: هذا حديث منكر جدًّا ونقل عن عبد الحق: ليس هذا الحديث بقوي، وعن ابن القطان: زياد وعثمان ممن يجب التوقف في روايتهما.
ومنها: ميمونة لا يُدري من هي، ولا يعرف لعثمان سماع منها.
ومنها: الاختلاف في ذكر عثمان أبي سودة بين زياد وميمونة، فرواه ابن ماجه وأحمد كما مضى، ورواه أبو داود ولم يذكر عثمان بينهما.
ومنها: أن معنى الحديث لا يستقيم، فإن ألف صلاة خاصة لمسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم ثبت ذلك بالتواتر، ولم يثبت ذلك لأي مسجد آخر.
وكذلك لا يصح ما رواه البهقي في شعب الإيمان (3/ 486) من طريق إبراهيم بن أبي حية، عن عثمان بن الأسود، عن مجاهد، عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة في المسجد الحرام مائة ألف صلاة، وصلاة في مسجدي ألف صلاة، وفي بيت المقدس خمسمائة صلاة".
فإن فيه إبراهيم بن أبي حية ضعيف جدًّا. قال البخاري: منكر الحديث. وقال الدارقطني: متروك. وقال ابن حبان في المجروحين (13):"واسم أبي حية اليسع بن أسعد من أهل مكة، يروي عن جعفر بن محمد وهشام بن عروة مناكير وأوابد، يسبق إلى القلب أنه المتعمد لها".
تنبيه: وقع في النسخة المطبوعة للبيهقي:"ابن أبي يحيي" وهو خطأ.
وفي معناه أحاديث أخرى، وكلها معلولة، والصحيح فيه حديث أبي ذر كما سبق، والله تعالى أعلم.
وَإِرْصَادًا لِمَنْ حَارَبَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ مِنْ قَبْلُ وَلَيَحْلِفُنَّ إِنْ أَرَدْنَا إِلَّا الْحُسْنَى وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ (107) لَا تَقُمْ فِيهِ أَبَدًا لَمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى التَّقْوَى مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ أَحَقُّ أَنْ تَقُومَ فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ}. [سورة التوبة: 107، 108].
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে আলোচনা করছিলাম যে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদ (মসজিদে নববী) নাকি বাইতুল মুকাদ্দাস (আল-আকসা মসজিদ)—এই দুটির মধ্যে কোনটি উত্তম? তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার এই মসজিদে এক সালাত (নামায) আদায় করা তাতে (বাইতুল মুকাদ্দাসে) চার সালাত আদায় করার চেয়ে উত্তম। আর মুসল্লি কতই না উত্তম! এবং শীঘ্রই এমন সময় আসবে যখন কোনো ব্যক্তির জন্য বাইতুল মুকাদ্দাস (আল-আকসা) যেখানে দেখা যায়, সেই স্থানের জমি যদি তার ঘোড়ার রশির সমপরিমাণও হয়, তবে তা তার জন্য গোটা দুনিয়া হতে উত্তম হবে।" অথবা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুনিয়া এবং তার মধ্যে যা কিছু আছে, তা হতে উত্তম হবে।"
[হাদীসের মান:] হাসান। এটি হাকিম (৪/৫০৯) এবং তাবরানি আল-আওসাতে (৬৯৭৯) উভয়ই হাফস ইবনে আবদুল্লাহর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি ইবরাহিম ইবনে তাহমান থেকে, তিনি হাজ্জাজ ইবনে হাজ্জাজ থেকে, তিনি কাতাদা থেকে, তিনি আবিল খলিল থেকে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনুস সামিত থেকে, তিনি আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। হাকিম বলেছেন: এর সনদ সহীহ।
আমি (আলবানি) বলি: এর সনদ হাসান; কারণ এতে হাফস ইবনে আবদুল্লাহ রয়েছেন, আর তিনি হলেন ইবনু রাশিদ আস-সুলামী, যিনি হাসানুল হাদীস এবং তিনি সহীহ (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবী। আর হাজ্জাজ ইবনে হাজ্জাজ হলেন আল-বাহিলী, এবং আবূল খলিল হলেন সালিহ ইবনে আবী মরিয়ম। এই দুইজনও সহীহ (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবী।
তাঁর উক্তি: "শতনু ফারাসিহি" (شطن فرسه) মানে হলো: তার ঘোড়ার রশি।
এটি তাহাবী তাঁর মুশকিলুল আসার (৬০৮) এবং বাইহাকী শুআবুল ঈমান (৩/৪৮৬) গ্রন্থে অন্য সূত্রে কাতাদা থেকে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনুস সামিত থেকে, তিনি আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। এতে "ওয়া লা নি'মাল মুসাল্লি" (ولنعم المصلى) অংশটি ব্যতীত বাকিটা একই রকম উল্লেখ করা হয়েছে। তাহাবীর নিকট এটি "ওয়া লা নি'মাল মুসাল্লি ফী আরদিল মাহশার ওয়া আরদিল মানশার" (ولنعم المصلي في أرض المحشر وأرض المنشر) রূপে বর্ণিত। আর বাইহাকী এর পরে অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: "শীঘ্রই মানুষের উপর এমন যুগ আসবে যখন তার চাবুকের বা ধনুকের রশির সমপরিমাণ জমি, যেখান থেকে সে বাইতুল মুকাদ্দাস দেখতে পায়, তা তার নিকট দুনিয়াতে যা কিছু আছে তার থেকে উত্তম হবে বা অধিক প্রিয় হবে।"
তাহাবী বলেছেন: এই হাদীসে যা আছে তা প্রমাণ করে যে, মসজিদে নববীতে সালাত আদায় করা মসজিদে আকসায় ২৫০ সালাতের সমান।
তবে কাতাদা আবদুল্লাহ ইবনুস সামিতের নিকট থেকে শোনেননি। এজন্য দারাকুতনী তাঁর ইলাল (৬/২৬৪) গ্রন্থে বলেছেন: "আর হাজ্জাজ ইবনে হাজ্জাজের বর্ণনা, যা কাতাদা, তিনি আবীল খলিল থেকে বর্ণনা করেছেন, তা অধিক বিশুদ্ধতার কাছাকাছি।"
আর আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে: "মসজিদে হারামে সালাত আদায়ের ফযীলত অন্য মসজিদের সালাত হতে এক লক্ষ গুণ, আর আমার মসজিদে এক হাজার গুণ, আর বাইতুল মুকাদ্দাস মসজিদে পাঁচশত গুণ"—এটি যঈফ (দুর্বল)।
এই বর্ণনাটি বাযযার (কাশফুল আস্তার ৪২২), তাহাবী (৬০৯), ইবনু আদী (৩/১২৩৪), এবং বাইহাকী (৩/৪৮৫) সকলেই সাঈদ ইবনে সালিম আল-কাদ্দাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি সাঈদ ইবনে বশীর থেকে, তিনি ইসমাইল ইবনে উবাইদুল্লাহ থেকে, তিনি উম্মু দারদা থেকে, তিনি আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
সাঈদ ইবনে বশীর হলেন আল-আযদী, যাঁকে ইবনু মাঈন, আবূ দাউদ, নাসাঈ ও অন্যান্যরা যঈফ বলেছেন। এজন্য হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁকে 'আত্তাক্বরীব'-এ 'যঈফ' বলে আখ্যা দিয়েছেন। আর তাঁর থেকে বর্ণনাকারী সাঈদ ইবনে সালিম আল-কাদ্দাহ হলেন 'সাদুক্বু ইয়াহুম' (সত্যবাদী তবে ভুল করেন)।
তাছাড়া এটি আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের বিপরীত, যেখানে 'আড়াইশো সালাত' প্রমাণিত। সেই হাদীসের রাবীগণ বিশ্বস্ত ও হাফিয (স্মৃতিশক্তি সম্পন্ন)।
আর হাইসামী 'আল-মাজমা' (৪/৭)-এ বলেছেন: "এটি তাবরানী 'আল-কাবীর'-এ বর্ণনা করেছেন এবং এর রাবীগণ বিশ্বস্ত, তবে কারও কারও বিষয়ে কথা রয়েছে, আর এটি হাদীসে হাসান।" এই মন্তব্যের উপর আপত্তি আছে; কারণ এতে সাঈদ ইবনে বশীর আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সহীহ হাদীসের বিরোধিতা করেছেন, যদিও কিছু আলিম তার ব্যাপারে ভালো ধারণা পোষণ করেন। শু'বা বলেন: সে সত্যভাষী ছিল। আর দুহাইম তাকে বিশ্বস্ত বলেছেন।
অনুরূপভাবে যা আবূ দাউদ (৪৫৭), ইবনু মাজাহ (১৪০৭) এবং আহমাদ (২৭৬২৬) যিয়াদ ইবনে আবী সাওদা, তিনি তার ভাই উসমান ইবনে আবী সাওদা থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত দাসী মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি বাইতুল মুকাদ্দাস সম্পর্কে ফাতওয়া দিন। তিনি বললেন: "এটি হাশরের এবং পুনরুত্থানের ভূমি। তোমরা সেখানে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ সেখানে এক সালাত অন্যস্থানের এক হাজার সালাতের সমান।" আমি বললাম: যদি আমি সেখানে ভ্রমণ করার সামর্থ্য না রাখি? তিনি বললেন: "তবে তোমরা সেখানে বাতি জ্বালানোর জন্য তেল হাদিয়া দাও। যে ব্যক্তি এমনটি করবে সে যেন সেখানে গিয়েছে।" এটি মুনকার (অস্বীকৃত)।
হাফিয ইবনু রজব 'ফাদাইলুশ শাম' (৩৩বি)-এ বলেন: "এর সনদ শক্তিশালী, কারণ এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য, কিন্তু বলা হয়েছে যে, এর সনদ বিচ্ছিন্ন এবং এর মতন (মূল পাঠে) অদ্ভুততা আছে।"
আমি বলি: এর সনদে কিছু ত্রুটি আছে। তার মধ্যে একজন হলেন যিয়াদ ইবনে আবী সাওদা। যদিও হাফিয তাকে 'সিকাহ' (নির্ভরযোগ্য) বলেছেন, তবে যাহাবী 'আল-মিযান'-এ তার ব্যাপারে মন্তব্য করেছেন এবং এই হাদীসটি উল্লেখ করে বলেছেন: তার বর্ণনার উপর নির্ভর করার বিষয়ে মনে খটকা আছে। তিনি বলেছেন: এটি অত্যন্ত মুনকার হাদীস। তিনি আব্দুল হক্ব থেকে উদ্ধৃত করেছেন: এই হাদীস শক্তিশালী নয়। আর ইবনুল কাত্তান থেকে: যিয়াদ ও উসমান এমন ব্যক্তি যাদের বর্ণনা গ্রহণ করা উচিত নয়।
ত্রুটির মধ্যে আরও আছে: মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে তা জানা যায় না এবং উসমান যে তার নিকট থেকে শুনেছেন তারও প্রমাণ নেই।
আরও একটি ত্রুটি: যিয়াদ ও মায়মুনার মধ্যে উসমান ইবনে আবী সাওদার নাম উল্লেখ করার বিষয়ে ভিন্নতা রয়েছে। যেমনটি ইবনু মাজাহ ও আহমাদে বর্ণিত হয়েছে, আর আবূ দাউদে তাদের উভয়ের মাঝে উসমানের নাম উল্লেখ করা হয়নি।
আরও একটি ত্রুটি: হাদীসের অর্থ সামঞ্জস্যপূর্ণ নয়। কারণ এক হাজার সালাতের ফযীলত শুধুমাত্র আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদের জন্য মুতাওয়াতির সূত্রে প্রমাণিত, যা অন্য কোনো মসজিদের জন্য প্রমাণিত নয়।
অনুরূপভাবে যা বাইহাকী 'শুআবুল ঈমান' (৩/৪৮৬)-এ ইবরাহীম ইবনে আবী হাইয়্যাহ-এর সূত্রে, তিনি উসমান ইবনুল আসওয়াদ থেকে, তিনি মুজাহিদ থেকে, তিনি জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, যে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মসজিদে হারামে সালাত এক লক্ষ সালাতের সমান, আর আমার মসজিদে সালাত এক হাজার সালাতের সমান, আর বাইতুল মুকাদ্দাসে পাঁচশত সালাতের সমান।" এটিও সহীহ নয়।
কারণ এতে ইবরাহীম ইবনে আবী হাইয়্যাহ রয়েছেন, যিনি অত্যন্ত দুর্বল। বুখারী তাকে 'মুনকারুল হাদীস' বলেছেন। দারাকুতনী তাকে 'মাতরুক' (পরিত্যাজ্য) বলেছেন। ইবনু হিব্বান 'আল-মাজরূহীন' (১৩)-এ বলেছেন: "আবু হাইয়্যাহ-এর নাম আল-ইয়াসা' ইবনে আসআদ, তিনি মক্কার অধিবাসী। তিনি জা'ফর ইবনে মুহাম্মাদ এবং হিশাম ইবনে উরওয়াহ থেকে মুনকার ও বিরল বর্ণনা করেন। এমন ধারণা হয় যে তিনি ইচ্ছাকৃতভাবে এটি করেছেন।"
সতর্কতা: বাইহাকীর মুদ্রিত কপিতে 'ইবন আবী ইয়াহইয়া' আছে, যা ভুল।
এই অর্থে অন্যান্য হাদীসও রয়েছে, কিন্তু সবকয়টিতেই ত্রুটি রয়েছে। আর এ বিষয়ে সঠিক হলো আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস, যেমনটি পূর্বে আলোচনা করা হয়েছে। আল্লাহ তা'আলাই সর্বাধিক অবগত।
{এবং পূর্বে যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের সাথে লড়াই করেছে তাদের জন্য ওঁত পেতে থাকার উদ্দেশ্যেও [তারা এ মসজিদ তৈরি করেছিল], আর তারা শপথ করে বলবে, 'আমরা কেবল কল্যাণই চেয়েছি।' কিন্তু আল্লাহ সাক্ষ্য দিচ্ছেন যে, তারা অবশ্যই মিথ্যাবাদী। (১০৭) তুমি সেখানে কখনো দাঁড়াবে না। যে মসজিদ প্রথম দিন থেকেই তাক্বওয়ার উপর প্রতিষ্ঠিত, সেটিই তোমার দাঁড়াবার অধিক যোগ্য। তাতে এমন লোক আছে, যারা পবিত্রতা অর্জন করতে ভালোবাসে। আর আল্লাহ পবিত্রতা অর্জনকারীদের ভালোবাসেন।} [সূরা আত-তাওবা: ১০৭, ১০৮]।
2979 - عن ابن شهاب قال: أخبرني عروة بن الزبير في قصة هجرته … فلبث رسول الله صلى الله عليه وسلم في بني عمرو بن عوف بضع عشرة ليلة. وأسس المسجد الذي أسِّس على التقوي، وصلَّى فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم ركب راحلته، فسار يمشي معه الناس، حتي بركت عند مسجد رسول الله بالمدينة …
صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3906) عن يحيى بن بكير، حدثنا الليث، عن عُقيل قال: ابن شهاب فذكره.
قال الحافظ: صورته مرسل، لكنه وصله الحاكم (3/ 11) أيضًا من طريق معمر، عن الزهري قال: أخبرني عروة، أنه سمع الزبير به وقال أيضًا: والمسجد الذي أسس على التقوى هو مسجد قُباء قال: فهو أول مسجد بني بالمدينة، وهو في التحقيق أول مسجد صلى النبي صلى الله عليه وسلم فيه بأصحابه جماعة ظاهرًا، وأول مسجد بني لجماعة المسلمين عامة.
وقال: فالجمهور على أن المراد به مسجد قُباء، هذا هو الظاهر من الآية، ثم قال: والحق أن كلًّا منهما أُسِّس على التقوى وقوله تعالى: … { … فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا} يؤيد كون المراد مسجد قُباء، وعند أبي داود بإسناد صحيح عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: نزلت: { … فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا}. في أهل قُباء، وعلى هذا فالسر في جوابه بأن المسجد الذي أسس على التقوى مسجده، رفع توهم أن ذلك خاص بمسجد قُباء، قال الداودي وغيره: ليس هذا اختلافًا، لأن كلا منهما أسس على التقوى، وكذا قال السهيلي. وزاد غيره أن قوله تعالى: {مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ} يقتضي أنه مسجد قُباء، لأن تأسيسه كان في أول يوم حلَّ النبي صلى الله عليه وسلم بدار الهجرة"، انظر:"الفتح" (7/ 245).
উরওয়াহ ইবন আয-যুবাইর থেকে বর্ণিত, হিজরতের ঘটনা প্রসঙ্গে তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু আমর ইবনু আওফ-এর এলাকায় দশ-এর কিছু বেশি রাত্রি অবস্থান করলেন। আর তিনি সেই মসজিদের ভিত্তি স্থাপন করলেন, যা তাকওয়ার ওপর প্রতিষ্ঠিত হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি তাঁর উটের পিঠে আরোহণ করলেন। লোকেরা তাঁর সাথে হাঁটতে শুরু করল, অবশেষে উটটি মদীনার রাসূলুল্লাহর মসজিদের কাছে এসে বসে পড়ল।
2980 - عن ابن عمر قال: كان رسول الله يأتي مسجد قُباء راكبًا وماشيًا، فيصلي فيه ركعتين.
متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1399/ 516) عن محمد بن عبد الله بن نمير، قال: حدثنا أبي، عن عبيدالله، عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله. والبخاري في كتاب فضل الصلاة في مسجد مكة والمدينة (1194) من طريق يحيي (بن سعيد القطان) عن عبيدالله به إلا أنه لم يذكر ركعتين.
قال البخاري:"زاد ابن نمير، حدثنا عبيد الله، عن نافع فيصلي فيه ركعتين" وهو موصول من طريق مسلم.
ورواه البخاري أيضًا (1191) من طريق أيوب، عن نافع، عن ابن عمر أنه كان لا يُصلي من
الضحى إلا في يومين: يوم يقدم مكة، فإنه كان يقدمها ضُحى فيطوف بالبيت، ثم يُصلي ركعتين خلف المقام، ويوم يأتي مسجد قُباء، فإنه يأتيه كل سبت، فإذا دخل المسجد كره أن يخرج منه حتى يُصلي فيه وكان يُحدِّث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يزوره راكبًا وماشيًا.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে এবং হেঁটে কুবাহ মসজিদে আসতেন, অতঃপর তিনি সেখানে দু'রাকআত সালাত আদায় করতেন।
তিনি আরো বলেন, তিনি (ইবনে উমর) চাশতের (দুহা) সালাত দু’দিন ছাড়া আদায় করতেন না: এক. যেদিন তিনি মক্কা আগমন করতেন, কেননা তিনি চাশতের সময় মক্কায় পৌঁছাতেন এবং বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করতেন, অতঃপর মাকামে ইব্রাহীমের পেছনে দু'রাকআত সালাত আদায় করতেন। দুই. যেদিন তিনি কুবাহ মসজিদে আসতেন, কেননা তিনি প্রতি শনিবার সেখানে আসতেন। তিনি মসজিদে প্রবেশ করলে, সালাত আদায় না করা পর্যন্ত সেখান থেকে বের হয়ে আসতে অপছন্দ করতেন। তিনি আরো বর্ণনা করতেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে এবং হেঁটে এই (মসজিদে কুবাহ) যিয়ারত করতেন।