হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (2968)


2968 - عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم لا أنه قال:"إن خير ما رُكِبتْ إليه الرواحلُ مسجدي هذا، والبيت العتيق".

حسن: رواه الإمام أحمد (14782)، وأبو يعلى (2266)، والطبراني في الأوسط (744، 4427)، وصحّحه ابن حبان (1616) كلهم من طرق عن الليث بن سعد، عن أبي الزبير، عن جابر
فذكر الحديث. وإسناده صحيح.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই যে স্থানগুলোর উদ্দেশ্যে সওয়ারী চালনা করা হয়, সেগুলোর মধ্যে সর্বোত্তম হলো আমার এই মসজিদ (মসজিদে নববী) এবং বায়তুল আতিক (কা’বা ঘর বা মসজিদুল হারাম)।”









আল-জামি` আল-কামিল (2969)


2969 - عن حُميل بن بصرة بن وقاص بن حاجب بن غفار قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تضرب المطايا إلا إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، ومسجدي هذا، ومسجد إيلياء".

صحيح: رواه الطحاوي في"مشكل الآثار" (585) عن يحيى بن عثمان بن صالح، حدثنا سعيد ابن أبي مريم، أخبرنا أبو غسان محمد بن مطرف، عن زيد بن أسلم، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة، قال: أتيت الطور، فصليت فيه. فلقيت حُميل بن بصرة بن وقاص بن حاجب بن غفار فقال: من أين جئت؟ فأخبرته فقال: لو لقيتُك قبل أن تأتيه ما جئته، سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث. وإسناده صحيح.

ورواه مالك في الجمعة (16) في حديث طويل عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكر الحديث وفيه: فلقيت بصرة بن أبي بصرة الغِفاري.

ومن طريق مالك رواه الإمام أحمد (23848)، وابن حبان (2772)، والطحاوي في مشكله (590)، فجعل الحديث من مسند بصرة بن أبي بصرة، وإنما هو لابنه حُميل كما سبق. وجعله ابن عبد البر من مسند أبي بصرة وهو جدّ حُميل.

قلت: حُميل وأبوه بصرة، وجده وقاصي يكنى أبا بصرة ثلاثة لهم صحبة كما قال مصعب الزبيري، انظر: الإصابة (1/ 358) فإذا كان لثلاثة صحبة فمن الجائز أن يكون الحديث من مسند الحفيد، أو من مسند أبيه بصرة، ومن البعيد أن يكون لجده أبي بصرة، لأن الذي سكن البصرة هو حُميل وأبوه.

وحُميل أيضًا يكنى بأبي بصرة. فمن قال: أبو بصرة فالمراد منه حُميل -الحفيد- لا الجد وقاص الذي كان يكنى أيضًا بأبي بصرة. والله تعالى أعلم.




হুমাইল ইবনে বুসরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: সওয়ারী প্রস্তুত করে (বা সফর করে) যাবে না তবে তিনটি মসজিদের দিকে: মসজিদুল হারাম, আমার এই মসজিদ (মসজিদে নববী) এবং মাসজিদ ইলিয়া (বায়তুল মুকাদ্দাস)।









আল-জামি` আল-কামিল (2970)


2970 - عن أبي الجعد الضَمري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُشد الرِّحال إلا إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، ومسجدي هذا، والمسجد الأقصى".

حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (1074)، والطبراني في الكبير (22/ 366) كلاهما من طريق سعيد بن عمرو الأشعثي، قال: حدثنا عَبْثَر بن القاسم، حدثنا محمد بن عمرو بن علقمة، عن عبيدة بن سفيان، عن أبي الجعد به.

ورجاله رجال الصحيح غير أن محمد بن عمرو بن علقمة مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث وهو من رجال مسلم.

قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 4): رواه الطبراني في الكبير والأوسط، ورجاله رجال الصحيح، ورواه البزار أيضًا".
قلت: ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا كل من ابن قانع في معجم الصّحابة" (711)، وأبي نعيم في"معرفة الصحابة" (6725) ولكن الذي عند البزار: سعيد بن محمد، عن عبثر، وأظن أنه خطأ. وإنما هو سعيد بن عمرو الأشعثي وهو من رجال مسلم.

قال البزار: لا نعلم روى أبو الجعد إلا هذا، وآخر.

قلت: الحديث الآخر هو ما رواه أصحاب السنن وصحّحه ابن خزيمة وابن حبان وغيرهما وهو من الترهيب"من ترك صلاة الجمعة"، وسيأتي تخريجه، ولكن يُعكر هذا ما قاله البخاري كما في"الإصابة" (4/ 32) بأنه لا يعرف لأبي الجعد إلا الحديث المذكور أعني الترهيب من ترك الجمعة، فهل حديث الباب لم يقف عليه؟ أو يرى أنه لا يَصح. والله تعالى أعلم.

وأما أبو الجعد فإنه قد اختلف في اسمه، ولكن ثبتت صحبته.

قال البغوي: سكن المدينة، وكانت له دار في بني ضمرة.

وقال ابن البرقي: قتل مع عائشة في وقعة الجمل.

وفي معناه ما رُوي عن عبد الله بن عمر مرفوعا: لا تُشدّ الرحال إلا إلى ثلاثة مساجد: مسجد الحرام، ومسجد المدينة، ومسجد بيت المقدس.

رواه الطبراني في الكبير (12/ 337، 338)، وفي إسناده عبد الله بن عمر وهو ابن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب ضعيف عند جمهور أهل العلم.




আবু আল-জা'দ আদ-দামরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তিনটি মসজিদ ব্যতীত (পুণ্যের উদ্দেশ্যে) অন্য কোথাও সফর করা উচিত নয়: মসজিদুল হারাম, আমার এই মসজিদ এবং মসজিদুল আকসা।”









আল-জামি` আল-কামিল (2971)


2971 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة في مسجدي هذا خير من ألف صلاة فيما سِواه، إلا المسجد الحرام".

متفق عليه: رواه مالك في القبلة (9) عن زيد بن رباح وعبيد الله بن أبي عبد الله، عن أبي عبد الله سلْمان الأغرِّ، عن أبي هريرة فذكر مثله.

ورواه البخاري في كتاب فضل الصلاة في مسجد مكة والمدينة (1190) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به مثله.

ورواه مسلم في الحج (1394) من وجه آخر عن أبي سلمة بن عبد الرحمن وأبي عبد الله الأغرِّ أنهما سمعا أبا هريرة فذكر مثله وزاد في آخر الحديث:"وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم آخر الأنْبياء، وإن مسجده آخر المساجد" أي: آخر مساجد الأنبياء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মাসজিদুল হারাম ব্যতীত আমার এই মাসজিদে এক সালাত (নামাজ) অন্য যেকোনো মাসজিদে এক হাজার সালাত অপেক্ষা উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (2972)


2972 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة في مسجدي هذا أفضل من ألف صلاةٍ فيما سِواه إلا المسجد الحرام".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1395) من حديث عبيدالله قال: أخبرني نافع، عن ابن عمر
فذكر مثله.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "আমার এই মসজিদে এক ওয়াক্ত সালাত আদায় করা মসজিদুল হারাম ছাড়া অন্য যে কোনো মসজিদে এক হাজার সালাত আদায়ের চেয়েও উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (2973)


2973 - عن ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"صلاة فيه أفضل من ألْف صلاة فيما سواه من المساجد، إلا مسجد الكعبة".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1396) عن قتيبة بن سعيد، عن الليث بن سعد، عن نافع، عن إبراهيم بن معبد، عن ابن عباس أنه قال: إن امرأة اشتكت شكْوى فقالت: إن شفاني الله لأخرجنَّ فالأصلِّينَّ في بيت المقدس. فبرأَتْ، ثم تجهزتْ تريد الخروجَ. فجاءتْ ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم تُسَلِّم عليها. فأخبرتْها ذلك. فقالت: اجلسي فكلي ما صنعتِ، وصَلِّي في مسجد الرسول صلى الله عليه وسلم فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكرت الحديث.

قال النووي رحمه الله:"إن ميمونة أفتت امرأة نذرت الصلاة في بيت المقدس أن تصلي في مسجد النبي صلى الله عليه وسلم، واستدلت بالحديث. وهذه الدلالة ظاهرة، وهذا حجة لأصح الأقوال في مذهبنا في هذه المسألة".




মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তাঁর থেকে বর্ণিত। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, জনৈকা মহিলা অসুস্থ হয়ে পড়লে মানত করেছিল যে, "যদি আল্লাহ আমাকে আরোগ্য দান করেন, তবে আমি অবশ্যই বায়তুল মুকাদ্দাসে গিয়ে সালাত আদায় করব।" সে আরোগ্য লাভ করলে সফরের প্রস্তুতি নিতে শুরু করে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে সালাম দিতে এসে বিষয়টি জানতে পারেন। তিনি তাকে বললেন: তুমি বসে পড়ো এবং যা রান্না করেছো, তা খাও। আর তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদে সালাত আদায় করো। কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এই (মসজিদে নববীতে) এক ওয়াক্ত সালাত কাবাঘর ব্যতীত অন্য যে-কোনো মসজিদে এক হাজার সালাত আদায়ের চেয়েও উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (2974)


2974 - عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"صلاة في مسجدي أفضل من ألف صلاة فيما سِواه إلا المسجد الحرام، وصلاة في المسجد الحرام أفضل من مائة ألْف صلاةٍ فيما سواه".

صحيح: رواه ابن ماجه (1406) عن إسماعيل بن أسد، قال: حدثنا زكريا بن عدي، قال: أنبأنا عبيدالله بن عمرو، عن عبد الكريم، عن عطاء، عن جابر فذكره.

وإسناده صحيح، إسماعيل بن أسد هو: إسماعيل بن أبي الحارث أسد بن شاهين البغداديّ وثقه أبو حاتم والدّارقطني وابن حبان وغيرهم.

وتُكلِّم فيه بدون حجة، وتابعه الإمام أحمد (14694) فرواه من طريق حسين بن محمد وعبد الجبار بن محمد الخطابي، كلاهما عن عبيدالله بن عمر به مثله. وعبيدالله بن عمر هو: ابن أبي الوليد الرَّقِّي من رجال الجماعة.

وعبد الكريم هو: ابن مالك الجزري.

قال البوصيري في زوائد ابن ماجه: إسناده صحيح.

وقال الحافظ في الفتح (3/ 67):"رجال إسناده ثقات".

وسيأتي أيضًا من طريق عطاء بن أبي رباح، عن عبد الله بن الزبير، ومن الجائز أن يكون عند عطاء عنهما جميعًا.

قال الحافظ:"ويؤيد ذلك أن عطاء إمام واسع الرواية، معروف بالرواية عن جابر وابن الزبير".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমার এই মসজিদে (নববীতে) এক সালাত আদায় করা মাসজিদুল হারাম ব্যতীত অন্য যেকোনো মসজিদের এক হাজার সালাত আদায়ের চেয়েও উত্তম। আর মাসজিদুল হারামে এক সালাত আদায় করা অন্য সকল মসজিদের এক লক্ষ সালাত আদায়ের চেয়েও উত্তম।









আল-জামি` আল-কামিল (2975)


2975 - عن عبد الله بن الزبير قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة في مسجدي هذا أفضل من ألف صلاة فيما سواه من المساجد إلا المسجد الحرام، وصلاة في المسجد
الحرام أفضل من مائة صلاة في هذا".

حسن: رواه أحمد (16117) والبزار -كشف الأستار - (425) كلاهما من طريق حماد بن زيد قال: حدثنا حبيب المعلِّم، عن عطاء بن ابي رباح، عن عبد الله بن الزبير فذكر مثله، وصحّحه ابن حبان (1620) فرواه من هذا الوجه.

ورجاله ثقات غير حبيب المعلِّم فإنه وإن كان من رجال الجماعة إلا أنه مختلف فيه فقد وثقه جماعة، وتكلَّم فيه النسائي غير أنه حسن الحديث.

قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 4، 5):"رواه أحمد والبزار والطبراني في الكبير بنحو البزار، ورجال أحمد والبزار رجال الصحيحة".

وللحديث أسانيد أخرى والذي ذكرته هو أمثلها.

وقوله: وصلاة في المسجد الحرام تَفضلُ بمائة. قال عطاء:"فكأنه مائة ألف" رواه أبو داود الطيالسي (1364) من طريق الربيع بن صَبيح قال: سمعت عطاء بن أبي رباح يقول: بينما ابن الزبير يخطبنا إذ قال: فذكر الحديث.

وقال فيه: قلت: يا أبا محمد! هذا الفضلُ الذي تذكره في المسجد الحرام وحده، أو في الحرم؟ قال: لا، بل في الحرم، فإن الحرم كلَّه مسجد. انتهى.

والربيع بن صَبيح: بفتح المهملة اخُتِلف فيه، فضعَّفه ابن سعد، ومشّاه الآخرون منهم: أحمد وابن معين وأبو زرعة وأبو حاتم وابن عدي وغيرهم.




আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার এই মাসজিদে (মসজিদে নববীতে) এক ওয়াক্ত সালাত, মাসজিদুল হারাম ব্যতীত অন্য মাসজিদসমূহে এক হাজার সালাত আদায় করার চেয়েও উত্তম। আর মাসজিদুল হারামে এক ওয়াক্ত সালাত এই মাসজিদের (মসজিদে নববীর) একশ' সালাতের চেয়েও উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (2976)


2976 - عن سعد بن أبي وقاص أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"صلاة في مسجدي هذا خير من ألْفِ صلاةٍ فيما سِواه إلا المسجد الحرام".

حسن: رواه أحمد (1605) عن سليمان بن داود، أخبرنا عبد الرحمن -يعني ابن أبي الزناد-، عن موسى بن عُقبة، عن أبي عبد الله القراظ، عن سعد فذكر مثله، ولعلّ هذا الحديث سقط من مسند أبي داود المطبوع، وإلا فقد ذكره أيضًا البوصيري في"إتحاف المهرة" (1392) وعزاه إلى الإمام أحمد كما رواه أيضًا أبو يعلى (774) عن زهير، عن سليمان بن داود الهاشمي به مثله، وقوله:"الهاشمي" خطأ، لأنه فارسي الأصل. وإسناده حسن لأجل الكلام في عبد الرحمن بن أبي الزناد فقد تكلم فيه ابن معين وأحمد وابن مهدي، وأثنى عليه مالك. قال موسى بن سلمة: قدمت المدينة فأتيت مالك بن أنس فقلت له: إني قدمت إليك لأسمع العلم، وأسمع ممن تأمرني به، فقال: عليك بابن أبي الزناد، هذه شهادة مالك وهو أعلم الناس بأهل المدينة.

ولكن لما ذهب إلى بغداد أفسده البغداديون.

وسليمان بن داود الهاشمي الراوي عنه من البغداديين، إلا أن روايته عنه مقاربة كما قال علي ابن المديني.
والخلاصة فيه أنه لا بأس به في الشّواهد.

ورُوِيَ هذا الحديث بإسناد آخر وفيه موسى بن عُبيدة الرَّبَذي ضعَّفوه ولكن لم يُتهم بل قال فيه ابن سعد: كان ثقة كثير الحديث وليس بحجة، ومن طريقه رواه البزار كشف الأستار" (426) قال: حدثنا محمد بن المثنى، ثنا أبو داود، ثنا شعبةُ، عن موسى بن عبيدة أبي عبد العزيز الربذي، عن عمر بن الحكم، عن سعد فذكر مثله، وفات الهيثمي في"المجمع" (4/ 5) أن يتكلم على إسناد البزار مع العزو إليه، فقال:"رواه أحمد وأبو يعلى والبزار، وفيه عبد الرحمن بن أبي الزناد وهو ضعيف" وليس في إسناد البزار: عبد الرحمن بن أبي الزناد. فتنبه.



شرح الحديث:

يرى الطحاوي رحمه الله تعالى أن التفضيل بالصلاة في هذين المسجدين يختص بالفريضة فقط دون النوافل."شرح المعاني" (3/ 128).

وذهب الشافعية وكثير من المالكية إلى أنه يعم الفرض والنفل جميعًا لإطلاق الصلاة في الأحاديث الصّحيحة.

ولكن هل هذا التضعيف يجمع مع تضعيف الجماعة سبعًا وعشرين درجة أو لا؟ يقول الحافظ: محل بحث،"الفتح" (3/ 68).

وفي الباب عن جبير بن مطعم، رواه الإمام أحمد (16731)، والبزار"كشف الأستار" (234)، والطبراني في الكبير (1606) كلهم من طريق هُشيم، عن حُصين بن عبد الرحمن السلمي، عن محمد بن طلحة بن يزيد بن ركانة، عن جبير بن مطعم، ولفظه:"صلاة في مسجدي هذا أفضل من ألف صلاة فيما سواه إلا المسجد الحرام".

وفيه انقطاع بين جبير بن مطعم وبين محمد بن طلحة بن يزيد بن ركانة.

قال أبو حاتم الرازي: إن محمد بن طلحة روى عن جبير بن مطعم مرسلًا"الجرح والتعديل" (7/ 291).

وهذا الذي رجحه أيضًا الدارقطني وخطّأ من أدخل بينهما فقال:"عن أبيه".

وفي الباب أيضًا عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنا خاتم الأنبياء، ومسجدي خاتم مساجد الأنبياء، أحق المساجد أن يُزار، وتُشد إليه الرواحل: المسجد الحرام، ومسجدي، وصلاة في مسجدي أفضل من ألف صلاة فيما سواه من المساجد، إلا المسجد الحرام".

رواه البزار الكشف الأستار" (1193) وفيه موسى بن عبيدة ضعيف، قاله الهيثمي في"المجمع" (4/ 4).

قلت: وله طرق أخرى كلها ضعيفة.

وكذلك حديث أرقم أنه جاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فسلَّم عليه فقال:" أين تريد؟" قال: أردت يا رسولَ الله! هاهنا -وأومأ بيده إلى حيث بيت المقدس- قال:" ما يخرجك إليه؟ أتجارة؟" قال:
قلت: لا، ولكن أردتُ الصلاة فيه قال:"فالصلاة هاهنا" أومأ إلى مكة بيده"خير من ألف صلاة" وأوما بيده إلى الشّام.

وإسناده ضعيف مع الاضطراب، رواه الإمام أحمد (24009) عن عصام بن خالد، حدثنا العطَّاف ابن خالد، حدثنا يحيى بن عِمران، عن عبد الله بن عثمان بن الأرقم، عن جده الأرقم فذكر مثله.

وفيه يحيى بن عمران وهو ابن عثمان بن الأرقم المخزومي، وعمه عبد الله بن عثمان بن الأرقم مجهولان كما أن عطَّاف بن خالد المخزومي اضطرب في الإسناد.

وكذلك ما رُوي عن أبي سعيد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ودَّع رجلًا فقال له:"أين تريد؟" قال: أريد بيت المقدس، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة في مسجدي أفضل من مائة في غيره إلا المسجد الحرام" ضعيف.

رواه الإمام أحمد (11733)، وأبو يعلى (1165 - تحقيق حسين) والبزار"كشف الأستار" (429) عن إبراهيم، عن سهم بن منجاب، عن قزعة، عن أبي سعيد فذكر مثله واللفظ لأبي يعلى، ولم يذكر البزار القصة.

وذكره الإمام أحمد في حديث طويل وفيه:"لا صومَ يوم عيد، ولا تسافر امرأة ثلاثًا إلا مع ذي محرم، ولا تُشد الرحال إلا إلى ثلاثة مساجد: مسجد الحرام، ومسجد المدينة، والمسجد الأقصى" ثم قال أبو سعيد: ودَّع رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلا فذكر مثله إلا أن فيه: أفضل من ألف صلاة.

وإسناده ضعيف لأجل المغيرة وهو: ابن مِقسم الضبي تكلم فيه الإمام أحمد وغيره، فقال الإمام أحمد:"حديث المغيرة بن مِقسم مدخول، عامة ما روي عن إبراهيم إنما سمعه من حماد، ومن يزيد بن الوليد، والحارث الكلبي، وعبيدة وغيرهم، وجعل يُضعف حديثه عن إبراهيم وحده""الجرح والتعديل (8/ 229).

قلت: المغيرة بن مقسم من المدلسين في المرتبة الثالثة عند الحافظ ابن حجر، كما أن في متنه نكارة.



مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلى لله أربعين يوما في جماعة، يدرك التكبيرة الأولى كتبت له براءتان: براءة من النار، وبراءة من النفاق".

رواه الترمذي (241) عن عقبة بن مكرم ونصر بن علي الجهضمي، قالا: حدثنا أبو قتيبة سلم ابن قتيبة، عن طعمة بن عمرو، عن حبيب بن أبي ثابت به مثله. إلا أنه معلول أيضا.

قال الترمذي:"وقد روي هذا الحديث عن أنس موقوفا، ولا أعلم أحدا رفعه إلا ما روى سلم ابن قتيبة، عن طعمة بن عمرو، عن حبيب بن أبي ثابت، عن أنس، وإنما يروي هذا عن حيب بن أبي حيب البجلي، عن أنس بن مالك قوله"، (يعني موقوفا).

ثم رواه الترمذي عن هناد، قال حدثنا وكيع، عن خالد بن طهمان، عن حبيب بن أبي حبيب البجلي، عن أنس بن مالك قوله، ولم يرفعه.

ثم قال الترمذي:"وروى إسماعيل بن عياش هذا الحديث عن عمارة بن غزية، عن أنس بن مالك، عن عمر بن الخطاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو هذا. وهذا حديث غير محفوظ، وهو مرسل، عمارة بن غزية لم يدرك أنس بن مالك".

إلا أنه لم يسق لفظ الحديث، ولكن من ظاهر سياقه"أربعين يوما".

قلت: وفيه إسماعيل بن عياش ضعيف في غير الشاميين، وعمارة بن غزية من المدنيين، ثم هو خالف في لفظ الحديث أيضا؛ فقد وصله ابن ماجه (789) عن عثمان بن أبي شيبة، قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، عن عمارة بن غزية، عن أنس بن مالك، عن عمر بن الخطاب، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يقول:" من صلى في مسجد جماعة أربعين ليلة، لا تفوته الركعة الأولى من صلاة العشاء كتب الله له بها عتقا من النار" فقيد هذه الصلاة بصلاة العشاء دون غيرها من الصلوات، وهذا الاختلاف في الإسناد والمتن يجعل الحديث مضطربا، وللحديث طرق أخرى مع اختلاف في متن الحديث يزيده ضعفا على ضعف.

وكذلك لا يصح ما روي عن أبي كاهل قيس بن عائذ قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر حديثا طويلا، وجاء فيه:"اعلمن يا أبا كاهل أنه من صلى أربعين يوما وأربعين ليلة في جماعة يدرك التكبيرة الأولى كان حقا على الله أن يكتب له براءة من النار".

رواه الطبراني في الكبير (18/ 361، 362) عن الحسن بن علي المعمري، ثنا علي بن المديني، ثنا يونس بن محمد المؤدب، ثنا الفضل بن عطاء، عن الفضل بن شعيب، عن أبي منظور، عن أبي معاذ، عن أبي كاهل، قال: فذكره.

قال ابن عبد البر في ترجمته في الاستيعاب (310):"ذُكِرَ له حديث منكر طويل فلم أذكره" وقال الهيثمي في المجمع (4/ 219):"وفيه الفضل بن عطاء، ذكره الذهبي وقال: إسناده مظلم"، وذكره العقيلي في الضعفاء.
وبهذا يعلم أنه لا يصح في هذا الباب شيء.




সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "আমার এই মসজিদে এক ওয়াক্ত সালাত আদায় করা মাসজিদুল হারাম ছাড়া অন্য মসজিদে এক হাজার সালাত আদায়ের চেয়ে উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (2977)


2977 - عن عبد الله بن عمرو، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن سليمان بن داود صلى الله عليه وسلم لما بنى بيت المقْدِس سأل الله عز وجل خلالًا ثلاثةً: سأل الله عز وجل حكمًا يصادف حكمه فأوتيه، وسأل الله عز وجل مُلكًا لا ينبغي لأحد من بعده فأوتيه، وسأل عز وجل حين فرغ من بناء المسجد أن لا يأتيه أحد لا ينهزه إلا الصلاةُ فيه أن يخرجه من خطيئتَه كيوم ولدته أمه".

صحيح: رواه النسائي (693) عن عمرو بن منصور، قال: حدثنا أبو مسهر، قال: حدثنا سعيد ابن عبد العزيز، عن ربيعة بن يزيد، عن أبي إدريس الخولاني، عن ابن الديلمي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وإسناده صحيح، وابن الديلمي هو: عبد الله بن فيروز الديلمي أبو بُسر وثقه ابن معين والعجلي وابن حبان وغيرهم.

ورواه الأوزاعي عن ربيعة بن يزيد ولم يذكر بينه وبين ابن الديلمي"أبا إدريس الخولاني".

ومن طريقه روا الإمام أحمد (6644) في حديث طويل، وابن حبان (1633)، والحاكم في المستدرك (2/ 434) كلهم من طرق عن الأوزاعي، وقد جزم البخاري في"التاريخ الكبير" (3/ 288) بسماع ربيعة بن يزيد من عبد الله الديلمي، وفي رواية الحاكم التصريح بسماعه منه. ورواه الحاكم أبضًا (1/ 30) وقرن يحيى بن أبي عمرو الشيباني بربيعة بن يزيد كلاهما قالا: ثنا عبد الله بن فيروز الديلمي في حديث طويل وقال: هذا حديث صحيح، وقد تداوله الأئمة، وقد احتجا بجميع رواته، ثم لم يخرجاه، ولا أعلم له علة.

فإذا صحَّ هذا فيحمل كما هو معروف في علم الحديث أن ربيعة بن يزيد سمع هذا الحديث أوَّلًا من أبي إدريس الخولاني، عن عبد الله الديلمي، ثم تيسر له أن يسمع من عبد الله الديلمي فروى على وجهين.

وللحديث طرق أخرى والذي ذكرته هو أجودها، منها ما رواه ابن ماجه (1408)، وابن خزيمة (1334) كلاهما عن عبيدالله بن الجهم الأنْماطي، حدثنا أيوب بن سُويد، عن أبي زرعة الشيباني يحيى بن أبي عمرو، حدثنا ابن الديلمي، عن عبد الله بن عمرو فذكر مثله.

قال البوصيري:"هذا إسناد ضعيف أيوب بن سُويد متفق على تضعيفه، وعبيد الله بن الجهم لا يُعرف".




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই সুলাইমান ইবনে দাউদ (আলাইহিস সালাম) যখন বাইতুল মাকদিস নির্মাণ করলেন, তখন তিনি মহান আল্লাহর কাছে তিনটি বিষয় প্রার্থনা করেছিলেন: (১) তিনি আল্লাহর কাছে এমন শাসন ক্ষমতা চাইলেন যা তাঁর (আল্লাহর) সিদ্ধান্তের অনুরূপ হবে। আল্লাহ তাঁকে তা দান করলেন। (২) তিনি আল্লাহর কাছে এমন এক রাজত্ব চাইলেন যা তাঁর পরে আর কারো জন্য উপযুক্ত হবে না। আল্লাহ তাঁকে তা দান করলেন। এবং (৩) যখন তিনি মসজিদের নির্মাণ কাজ শেষ করলেন, তখন তিনি আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করলেন যে, যে ব্যক্তিই কেবল তাতে সালাত আদায়ের উদ্দেশ্যে আসবে, আল্লাহ যেন তাকে তার গুনাহ থেকে এমনভাবে বের করে দেন, যেমন তার মা তাকে জন্ম দিয়েছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (2978)


2978 - عن أبي ذر قال: تذاكرنا ونحن عند رسول الله صلى الله عليه وسلم: أيهما أفضل مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم أو مسجد بيت المقدس؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة في مسجدي هذا أفضل من أربع صلوات فيه، ولنعم المصلي، وليوشكن أن لا يكون للرجل مثل شطن فرسه من
الأرض حيث يرى منه بيت المقدس خير له من الدنيا جميعا" أو قال:"خير من الدنيا وما فيها".

حسن: رواه الحاكم (4/ 509) والطبراني في الأوسط (6979) كلاهما من حديث حفص بن عبد الله، حدثني إبراهيم بن طهمان، عن الحجاج بن الحجاج، عن قتادة، عن أبي الخليل، عن عبد الله بن الصامت، عن أبي ذر، فذكره. قال الحاكم: صحيح الإسناد".

قلت: إسناده حسن من أجل حفص بن عبد الله وهو ابن راشد السلمي، فإنه حسن الحديث وهو من رجال الصحيح.

والحجاج بن الحجاج هو الباهلي، وأبو الخليل هو صالح بن أبي مريم، وكلاهما من رجال الصحيح.

قوله:"شطن فرسه" أي حبله.

ورواه الطحاوي في مشكل الآثار (608) والبيهقي في شعب الإيمان (486/ 3) كلاهما من وجه آخر عن قتادة، عن عبد الله بن الصامت، عن أبي ذر، فذكر نحوه إلا قوله:"ولنعم المصلى"، فقال:"ولنعم المصلي في أرض المحشر وأرض المنشر" كذا عند الطحاوي، وزاد البيهقي بعده:"وليأتين على الناس زمان، ولقيد سوط -أو قال-: قوس الرجل حيث يرى منه بيت المقدس خير له أو أحب إليه من الدنيا جميعا".

قال الطحاوي: فكان ما في هذا الحديث يدل على أن الصلاة في مسجد النبي صلى الله عليه وسلم كمئتي صلاة وخمسين صلاة في المسجد الأقصى.

إلا أن قتادة لم يسمع من عبد الله بن الصامت، ولذا قال الدارقطني في علله (6/ 264):"وقول حجاج بن حجاج، عن قتادة، عن أبي الخليل أشبه بالصواب".

وأما ما رُوي عن أبي الدرداء مرفوعا:"فضل الصلاة في المسجد الحرام على غيره مائة ألف صلاة، وفي مسجدي ألف صلاة، وفي مسجد بيت المقدس خمسمائة صلاة" فهو ضعيف.

رواه البزار"كشف الأستار" (422) والطحاوي في مشكله (609) وابن عدي في الكامل (3/ 1234) والبيهقي في شعب الإيمان (3/ 485) كلهم من حديث سعيد بن سالم القداح، ثنا سعيد بن بشير، عن إسماعيل بن عبيد الله، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء، فذكره.

وسعيد بن بشير هو: الأزدي مولاهم، أبو عبد الرحمن الشامي ضعَّفه ابن معين وأبو داود والنسائي وغيرهم، ولذا أطلق عليه الحافظ في"التقريب" بأنه"ضعيف" والراوي عنه سعيد بن سالم القداح"صدوق يهم".

ثم هو مخالف لما ثبت من حديث أبي ذر:"مائتان وخمسون صلاة" ورجاله ثقات ضابطون.

وأما قول الهيثمي في المجمع (4/ 7):"رواه الطبراني في الكبير، ورجاله ثقات، وفي بعضهم كلام، وهو حديث حسن" ففيه نظر؛ فإن فيه مخالفة من سعيد بن بشير لما ثبت من حديث أبي ذر،
وإنْ كان بعض أهل العلم حسن الرأي فيه، قال شعبة: كان صدوق اللسان، ووثقه دحيم.

وكذلك لا يصح ما رواه أبو داود (457)، وابن ماجه (1407)، وأحمد (27626) كلهم من طريق زياد بن أبي سودة، عن أخيه عثمان بن أبي سودة، عن ميمونة مولاة النبي صلى الله عليه وسلم قالت: يا رسول الله! أفْتِنا في بيت المقدس قال:"أرض المحْشَرِ والمنْشَر، ائتُوه فصلوا فيه، فإن صلاةً فيه كألْف صلاةٍ في غيره" قلت: أرأيت إن لم أَستطع أن أتحمل إليه؟ قال:"فتهدي له زيتًا يسرجُ فيه، فمن فعل ذلك فهو كمن أتاه" فهو منكر.

قال الحافظ ابن رجب في فضائل الشام (331):"وإسناده قوي لأن رواته ثقات، لكن قد قيل: إن إسناده منقطع، وفي متنه غرابة".

قلت: وفي إسناده علل منها: زياد بن أبي سودة وإن قال فيه الحافظ:"ثقة" فقد تكلم فيه الذهبي في"الميزان" وأورد له هذا الحديث وقال: في النفس شيء من الاحتجاج به، وقال: هذا حديث منكر جدًّا ونقل عن عبد الحق: ليس هذا الحديث بقوي، وعن ابن القطان: زياد وعثمان ممن يجب التوقف في روايتهما.

ومنها: ميمونة لا يُدري من هي، ولا يعرف لعثمان سماع منها.

ومنها: الاختلاف في ذكر عثمان أبي سودة بين زياد وميمونة، فرواه ابن ماجه وأحمد كما مضى، ورواه أبو داود ولم يذكر عثمان بينهما.

ومنها: أن معنى الحديث لا يستقيم، فإن ألف صلاة خاصة لمسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم ثبت ذلك بالتواتر، ولم يثبت ذلك لأي مسجد آخر.

وكذلك لا يصح ما رواه البهقي في شعب الإيمان (3/ 486) من طريق إبراهيم بن أبي حية، عن عثمان بن الأسود، عن مجاهد، عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلاة في المسجد الحرام مائة ألف صلاة، وصلاة في مسجدي ألف صلاة، وفي بيت المقدس خمسمائة صلاة".

فإن فيه إبراهيم بن أبي حية ضعيف جدًّا. قال البخاري: منكر الحديث. وقال الدارقطني: متروك. وقال ابن حبان في المجروحين (13):"واسم أبي حية اليسع بن أسعد من أهل مكة، يروي عن جعفر بن محمد وهشام بن عروة مناكير وأوابد، يسبق إلى القلب أنه المتعمد لها".

تنبيه: وقع في النسخة المطبوعة للبيهقي:"ابن أبي يحيي" وهو خطأ.

وفي معناه أحاديث أخرى، وكلها معلولة، والصحيح فيه حديث أبي ذر كما سبق، والله تعالى أعلم.



وَإِرْصَادًا لِمَنْ حَارَبَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ مِنْ قَبْلُ وَلَيَحْلِفُنَّ إِنْ أَرَدْنَا إِلَّا الْحُسْنَى وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ (107) لَا تَقُمْ فِيهِ أَبَدًا لَمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى التَّقْوَى مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ أَحَقُّ أَنْ تَقُومَ فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ}. [سورة التوبة: 107، 108].




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে আলোচনা করছিলাম যে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদ (মসজিদে নববী) নাকি বাইতুল মুকাদ্দাস (আল-আকসা মসজিদ)—এই দুটির মধ্যে কোনটি উত্তম? তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার এই মসজিদে এক সালাত (নামায) আদায় করা তাতে (বাইতুল মুকাদ্দাসে) চার সালাত আদায় করার চেয়ে উত্তম। আর মুসল্লি কতই না উত্তম! এবং শীঘ্রই এমন সময় আসবে যখন কোনো ব্যক্তির জন্য বাইতুল মুকাদ্দাস (আল-আকসা) যেখানে দেখা যায়, সেই স্থানের জমি যদি তার ঘোড়ার রশির সমপরিমাণও হয়, তবে তা তার জন্য গোটা দুনিয়া হতে উত্তম হবে।" অথবা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুনিয়া এবং তার মধ্যে যা কিছু আছে, তা হতে উত্তম হবে।"

[হাদীসের মান:] হাসান। এটি হাকিম (৪/৫০৯) এবং তাবরানি আল-আওসাতে (৬৯৭৯) উভয়ই হাফস ইবনে আবদুল্লাহর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি ইবরাহিম ইবনে তাহমান থেকে, তিনি হাজ্জাজ ইবনে হাজ্জাজ থেকে, তিনি কাতাদা থেকে, তিনি আবিল খলিল থেকে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনুস সামিত থেকে, তিনি আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। হাকিম বলেছেন: এর সনদ সহীহ।
আমি (আলবানি) বলি: এর সনদ হাসান; কারণ এতে হাফস ইবনে আবদুল্লাহ রয়েছেন, আর তিনি হলেন ইবনু রাশিদ আস-সুলামী, যিনি হাসানুল হাদীস এবং তিনি সহীহ (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবী। আর হাজ্জাজ ইবনে হাজ্জাজ হলেন আল-বাহিলী, এবং আবূল খলিল হলেন সালিহ ইবনে আবী মরিয়ম। এই দুইজনও সহীহ (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবী।
তাঁর উক্তি: "শতনু ফারাসিহি" (شطن فرسه) মানে হলো: তার ঘোড়ার রশি।
এটি তাহাবী তাঁর মুশকিলুল আসার (৬০৮) এবং বাইহাকী শুআবুল ঈমান (৩/৪৮৬) গ্রন্থে অন্য সূত্রে কাতাদা থেকে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনুস সামিত থেকে, তিনি আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। এতে "ওয়া লা নি'মাল মুসাল্লি" (ولنعم المصلى) অংশটি ব্যতীত বাকিটা একই রকম উল্লেখ করা হয়েছে। তাহাবীর নিকট এটি "ওয়া লা নি'মাল মুসাল্লি ফী আরদিল মাহশার ওয়া আরদিল মানশার" (ولنعم المصلي في أرض المحشر وأرض المنشر) রূপে বর্ণিত। আর বাইহাকী এর পরে অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: "শীঘ্রই মানুষের উপর এমন যুগ আসবে যখন তার চাবুকের বা ধনুকের রশির সমপরিমাণ জমি, যেখান থেকে সে বাইতুল মুকাদ্দাস দেখতে পায়, তা তার নিকট দুনিয়াতে যা কিছু আছে তার থেকে উত্তম হবে বা অধিক প্রিয় হবে।"
তাহাবী বলেছেন: এই হাদীসে যা আছে তা প্রমাণ করে যে, মসজিদে নববীতে সালাত আদায় করা মসজিদে আকসায় ২৫০ সালাতের সমান।
তবে কাতাদা আবদুল্লাহ ইবনুস সামিতের নিকট থেকে শোনেননি। এজন্য দারাকুতনী তাঁর ইলাল (৬/২৬৪) গ্রন্থে বলেছেন: "আর হাজ্জাজ ইবনে হাজ্জাজের বর্ণনা, যা কাতাদা, তিনি আবীল খলিল থেকে বর্ণনা করেছেন, তা অধিক বিশুদ্ধতার কাছাকাছি।"
আর আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে: "মসজিদে হারামে সালাত আদায়ের ফযীলত অন্য মসজিদের সালাত হতে এক লক্ষ গুণ, আর আমার মসজিদে এক হাজার গুণ, আর বাইতুল মুকাদ্দাস মসজিদে পাঁচশত গুণ"—এটি যঈফ (দুর্বল)।
এই বর্ণনাটি বাযযার (কাশফুল আস্তার ৪২২), তাহাবী (৬০৯), ইবনু আদী (৩/১২৩৪), এবং বাইহাকী (৩/৪৮৫) সকলেই সাঈদ ইবনে সালিম আল-কাদ্দাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি সাঈদ ইবনে বশীর থেকে, তিনি ইসমাইল ইবনে উবাইদুল্লাহ থেকে, তিনি উম্মু দারদা থেকে, তিনি আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
সাঈদ ইবনে বশীর হলেন আল-আযদী, যাঁকে ইবনু মাঈন, আবূ দাউদ, নাসাঈ ও অন্যান্যরা যঈফ বলেছেন। এজন্য হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁকে 'আত্তাক্বরীব'-এ 'যঈফ' বলে আখ্যা দিয়েছেন। আর তাঁর থেকে বর্ণনাকারী সাঈদ ইবনে সালিম আল-কাদ্দাহ হলেন 'সাদুক্বু ইয়াহুম' (সত্যবাদী তবে ভুল করেন)।
তাছাড়া এটি আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের বিপরীত, যেখানে 'আড়াইশো সালাত' প্রমাণিত। সেই হাদীসের রাবীগণ বিশ্বস্ত ও হাফিয (স্মৃতিশক্তি সম্পন্ন)।
আর হাইসামী 'আল-মাজমা' (৪/৭)-এ বলেছেন: "এটি তাবরানী 'আল-কাবীর'-এ বর্ণনা করেছেন এবং এর রাবীগণ বিশ্বস্ত, তবে কারও কারও বিষয়ে কথা রয়েছে, আর এটি হাদীসে হাসান।" এই মন্তব্যের উপর আপত্তি আছে; কারণ এতে সাঈদ ইবনে বশীর আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সহীহ হাদীসের বিরোধিতা করেছেন, যদিও কিছু আলিম তার ব্যাপারে ভালো ধারণা পোষণ করেন। শু'বা বলেন: সে সত্যভাষী ছিল। আর দুহাইম তাকে বিশ্বস্ত বলেছেন।
অনুরূপভাবে যা আবূ দাউদ (৪৫৭), ইবনু মাজাহ (১৪০৭) এবং আহমাদ (২৭৬২৬) যিয়াদ ইবনে আবী সাওদা, তিনি তার ভাই উসমান ইবনে আবী সাওদা থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত দাসী মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি বাইতুল মুকাদ্দাস সম্পর্কে ফাতওয়া দিন। তিনি বললেন: "এটি হাশরের এবং পুনরুত্থানের ভূমি। তোমরা সেখানে যাও এবং সালাত আদায় করো। কারণ সেখানে এক সালাত অন্যস্থানের এক হাজার সালাতের সমান।" আমি বললাম: যদি আমি সেখানে ভ্রমণ করার সামর্থ্য না রাখি? তিনি বললেন: "তবে তোমরা সেখানে বাতি জ্বালানোর জন্য তেল হাদিয়া দাও। যে ব্যক্তি এমনটি করবে সে যেন সেখানে গিয়েছে।" এটি মুনকার (অস্বীকৃত)।
হাফিয ইবনু রজব 'ফাদাইলুশ শাম' (৩৩বি)-এ বলেন: "এর সনদ শক্তিশালী, কারণ এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য, কিন্তু বলা হয়েছে যে, এর সনদ বিচ্ছিন্ন এবং এর মতন (মূল পাঠে) অদ্ভুততা আছে।"
আমি বলি: এর সনদে কিছু ত্রুটি আছে। তার মধ্যে একজন হলেন যিয়াদ ইবনে আবী সাওদা। যদিও হাফিয তাকে 'সিকাহ' (নির্ভরযোগ্য) বলেছেন, তবে যাহাবী 'আল-মিযান'-এ তার ব্যাপারে মন্তব্য করেছেন এবং এই হাদীসটি উল্লেখ করে বলেছেন: তার বর্ণনার উপর নির্ভর করার বিষয়ে মনে খটকা আছে। তিনি বলেছেন: এটি অত্যন্ত মুনকার হাদীস। তিনি আব্দুল হক্ব থেকে উদ্ধৃত করেছেন: এই হাদীস শক্তিশালী নয়। আর ইবনুল কাত্তান থেকে: যিয়াদ ও উসমান এমন ব্যক্তি যাদের বর্ণনা গ্রহণ করা উচিত নয়।
ত্রুটির মধ্যে আরও আছে: মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে তা জানা যায় না এবং উসমান যে তার নিকট থেকে শুনেছেন তারও প্রমাণ নেই।
আরও একটি ত্রুটি: যিয়াদ ও মায়মুনার মধ্যে উসমান ইবনে আবী সাওদার নাম উল্লেখ করার বিষয়ে ভিন্নতা রয়েছে। যেমনটি ইবনু মাজাহ ও আহমাদে বর্ণিত হয়েছে, আর আবূ দাউদে তাদের উভয়ের মাঝে উসমানের নাম উল্লেখ করা হয়নি।
আরও একটি ত্রুটি: হাদীসের অর্থ সামঞ্জস্যপূর্ণ নয়। কারণ এক হাজার সালাতের ফযীলত শুধুমাত্র আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদের জন্য মুতাওয়াতির সূত্রে প্রমাণিত, যা অন্য কোনো মসজিদের জন্য প্রমাণিত নয়।
অনুরূপভাবে যা বাইহাকী 'শুআবুল ঈমান' (৩/৪৮৬)-এ ইবরাহীম ইবনে আবী হাইয়্যাহ-এর সূত্রে, তিনি উসমান ইবনুল আসওয়াদ থেকে, তিনি মুজাহিদ থেকে, তিনি জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, যে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মসজিদে হারামে সালাত এক লক্ষ সালাতের সমান, আর আমার মসজিদে সালাত এক হাজার সালাতের সমান, আর বাইতুল মুকাদ্দাসে পাঁচশত সালাতের সমান।" এটিও সহীহ নয়।
কারণ এতে ইবরাহীম ইবনে আবী হাইয়্যাহ রয়েছেন, যিনি অত্যন্ত দুর্বল। বুখারী তাকে 'মুনকারুল হাদীস' বলেছেন। দারাকুতনী তাকে 'মাতরুক' (পরিত্যাজ্য) বলেছেন। ইবনু হিব্বান 'আল-মাজরূহীন' (১৩)-এ বলেছেন: "আবু হাইয়্যাহ-এর নাম আল-ইয়াসা' ইবনে আসআদ, তিনি মক্কার অধিবাসী। তিনি জা'ফর ইবনে মুহাম্মাদ এবং হিশাম ইবনে উরওয়াহ থেকে মুনকার ও বিরল বর্ণনা করেন। এমন ধারণা হয় যে তিনি ইচ্ছাকৃতভাবে এটি করেছেন।"
সতর্কতা: বাইহাকীর মুদ্রিত কপিতে 'ইবন আবী ইয়াহইয়া' আছে, যা ভুল।
এই অর্থে অন্যান্য হাদীসও রয়েছে, কিন্তু সবকয়টিতেই ত্রুটি রয়েছে। আর এ বিষয়ে সঠিক হলো আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস, যেমনটি পূর্বে আলোচনা করা হয়েছে। আল্লাহ তা'আলাই সর্বাধিক অবগত।

{এবং পূর্বে যারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের সাথে লড়াই করেছে তাদের জন্য ওঁত পেতে থাকার উদ্দেশ্যেও [তারা এ মসজিদ তৈরি করেছিল], আর তারা শপথ করে বলবে, 'আমরা কেবল কল্যাণই চেয়েছি।' কিন্তু আল্লাহ সাক্ষ্য দিচ্ছেন যে, তারা অবশ্যই মিথ্যাবাদী। (১০৭) তুমি সেখানে কখনো দাঁড়াবে না। যে মসজিদ প্রথম দিন থেকেই তাক্বওয়ার উপর প্রতিষ্ঠিত, সেটিই তোমার দাঁড়াবার অধিক যোগ্য। তাতে এমন লোক আছে, যারা পবিত্রতা অর্জন করতে ভালোবাসে। আর আল্লাহ পবিত্রতা অর্জনকারীদের ভালোবাসেন।} [সূরা আত-তাওবা: ১০৭, ১০৮]।









আল-জামি` আল-কামিল (2979)


2979 - عن ابن شهاب قال: أخبرني عروة بن الزبير في قصة هجرته … فلبث رسول الله صلى الله عليه وسلم في بني عمرو بن عوف بضع عشرة ليلة. وأسس المسجد الذي أسِّس على التقوي، وصلَّى فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم ركب راحلته، فسار يمشي معه الناس، حتي بركت عند مسجد رسول الله بالمدينة …

صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3906) عن يحيى بن بكير، حدثنا الليث، عن عُقيل قال: ابن شهاب فذكره.

قال الحافظ: صورته مرسل، لكنه وصله الحاكم (3/ 11) أيضًا من طريق معمر، عن الزهري قال: أخبرني عروة، أنه سمع الزبير به وقال أيضًا: والمسجد الذي أسس على التقوى هو مسجد قُباء قال: فهو أول مسجد بني بالمدينة، وهو في التحقيق أول مسجد صلى النبي صلى الله عليه وسلم فيه بأصحابه جماعة ظاهرًا، وأول مسجد بني لجماعة المسلمين عامة.

وقال: فالجمهور على أن المراد به مسجد قُباء، هذا هو الظاهر من الآية، ثم قال: والحق أن كلًّا منهما أُسِّس على التقوى وقوله تعالى: … { … فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا} يؤيد كون المراد مسجد قُباء، وعند أبي داود بإسناد صحيح عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: نزلت: { … فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا}. في أهل قُباء، وعلى هذا فالسر في جوابه بأن المسجد الذي أسس على التقوى مسجده، رفع توهم أن ذلك خاص بمسجد قُباء، قال الداودي وغيره: ليس هذا اختلافًا، لأن كلا منهما أسس على التقوى، وكذا قال السهيلي. وزاد غيره أن قوله تعالى: {مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ} يقتضي أنه مسجد قُباء، لأن تأسيسه كان في أول يوم حلَّ النبي صلى الله عليه وسلم بدار الهجرة"، انظر:"الفتح" (7/ 245).




উরওয়াহ ইবন আয-যুবাইর থেকে বর্ণিত, হিজরতের ঘটনা প্রসঙ্গে তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু আমর ইবনু আওফ-এর এলাকায় দশ-এর কিছু বেশি রাত্রি অবস্থান করলেন। আর তিনি সেই মসজিদের ভিত্তি স্থাপন করলেন, যা তাকওয়ার ওপর প্রতিষ্ঠিত হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি তাঁর উটের পিঠে আরোহণ করলেন। লোকেরা তাঁর সাথে হাঁটতে শুরু করল, অবশেষে উটটি মদীনার রাসূলুল্লাহর মসজিদের কাছে এসে বসে পড়ল।









আল-জামি` আল-কামিল (2980)


2980 - عن ابن عمر قال: كان رسول الله يأتي مسجد قُباء راكبًا وماشيًا، فيصلي فيه ركعتين.

متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1399/ 516) عن محمد بن عبد الله بن نمير، قال: حدثنا أبي، عن عبيدالله، عن نافع، عن ابن عمر فذكر مثله. والبخاري في كتاب فضل الصلاة في مسجد مكة والمدينة (1194) من طريق يحيي (بن سعيد القطان) عن عبيدالله به إلا أنه لم يذكر ركعتين.

قال البخاري:"زاد ابن نمير، حدثنا عبيد الله، عن نافع فيصلي فيه ركعتين" وهو موصول من طريق مسلم.

ورواه البخاري أيضًا (1191) من طريق أيوب، عن نافع، عن ابن عمر أنه كان لا يُصلي من
الضحى إلا في يومين: يوم يقدم مكة، فإنه كان يقدمها ضُحى فيطوف بالبيت، ثم يُصلي ركعتين خلف المقام، ويوم يأتي مسجد قُباء، فإنه يأتيه كل سبت، فإذا دخل المسجد كره أن يخرج منه حتى يُصلي فيه وكان يُحدِّث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يزوره راكبًا وماشيًا.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে এবং হেঁটে কুবাহ মসজিদে আসতেন, অতঃপর তিনি সেখানে দু'রাকআত সালাত আদায় করতেন।

তিনি আরো বলেন, তিনি (ইবনে উমর) চাশতের (দুহা) সালাত দু’দিন ছাড়া আদায় করতেন না: এক. যেদিন তিনি মক্কা আগমন করতেন, কেননা তিনি চাশতের সময় মক্কায় পৌঁছাতেন এবং বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করতেন, অতঃপর মাকামে ইব্রাহীমের পেছনে দু'রাকআত সালাত আদায় করতেন। দুই. যেদিন তিনি কুবাহ মসজিদে আসতেন, কেননা তিনি প্রতি শনিবার সেখানে আসতেন। তিনি মসজিদে প্রবেশ করলে, সালাত আদায় না করা পর্যন্ত সেখান থেকে বের হয়ে আসতে অপছন্দ করতেন। তিনি আরো বর্ণনা করতেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে এবং হেঁটে এই (মসজিদে কুবাহ) যিয়ারত করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2981)


2981 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأتي قُباء راكبًا وماشيًا.

متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (71) عن نافع، عن ابن عمر، وفي رواية أبي مصعب، عن مالك، عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر فذكر مثله. شرح السنة" (458).

ورواه مسلم في الحج (1399/ 518) عن يحيى بن يحيى، قال: قرأت على مالك، عن عبد الله ابن دينار به مثله، هكذا رواه مسلم عن يحيى، ولم أجد في رواية يحيى طريق عبد الله بن دينار، وإنما فيه طريق نافع كما مضى.

ورواه البخاري في كتاب فضل الصلاة في مسجد مكة والمدينة (1194) عن مسدد، عن يحيي (بن سعيد القطان) عن عبد الله، عن نافع به مثله.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরোহী অবস্থায় এবং হেঁটে কুবায় আসতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2982)


2982 - عن عبد الله بن عمر قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يأتي قُباء كلَّ سبتٍ ماشيًا وراكبًا، وكان عبد الله يفعله.

متفق عليه: رواه البخاري في كتاب فضل الصلاة في مسجد مكة والمدينة (1193)، ومسلم في الحج (1399/ 520) كلاهما من حديث عبد الله بن دينار، عن ابن عمر فذكر الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি শনিবার কুবায় আসতেন, পদব্রজে এবং বাহনে (আরোহণ করে)। আর আব্দুল্লাহ (ইবন উমর)ও এটি করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2983)


2983 - عن سهل بن حُنَيف قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من خرج حتى يأتي هذا المسجد مسجد قُباء، فصلى فيه كان له عدلَ عمرةٍ".




সাহল ইবনু হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি বের হলো এই মসজিদে অর্থাৎ মাসজিদ কুবায় আগমন করার উদ্দেশ্যে, অতঃপর তাতে সালাত আদায় করলো, তার জন্য একটি উমরার সমান সাওয়াব হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (2984)


2984 - عن حسن: رواه النسائي (699) عن قتيبة، قال: حدثنا مجمع بن يعقوب، عن محمد بن سليمان الكرماني، قال: سمعتُ أبا أمامة بن سهل بن حُنيف قال: قال أبي، فذكره.

ورواه ابن ماجه (1412) من وجه آخر عن محمد بن سليمان الكرماني به ولفظه:"من تطهَّر في بيِتِه، ثم أتي مسجد قُباء فصلَّى فيه صلاة، كان له كأجر عمرةٍ"، وإسناده حسن لأجل محمد بن سليمان الكرماني القباني ذكره ابن حبان في ثقاته (7/ 372) وروى عنه عدد كبير وإن لم أجد من وثَّقه. ورواية العدد الكثير ترفع عنه جهالةَ العين، والنفس تطمئنُّ بقبول روايته، لأنه لم يأت بخبر منكر وقال فيه الذهبي: وُثِّق، وتابعه عبيد بن محصن الأزدي وعقبة بن ميسرة أبو إسماعيل وغيرهما وله أسانيد أُخرى والذي ذكرته أمثلها.

ولذا قال الحاكم في المستدرك" (3/ 12):"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه".

وفي الموضوع أحاديث عن أسيد بن ظُهير الأنصاري، وابن عمر، وكعب بن عُجرة، وظهير بن رافع الحارثي الأوسي، وأنس بن مالك، وعمر بن الخطاب، وسعد بن أبي وقاص وغيرهم إلا أنَّها لا تخلو من ضعيف أو مجهول، وموقوف وإرسال، وإن البعض منها يُستشهد به عند بعض أهل العلم.




সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, "যে ব্যক্তি তার ঘরে পবিত্রতা অর্জন করে, অতঃপর কুবায় মসজিদে এসে তাতে সালাত আদায় করে, তার জন্য উমরার সওয়াবের মতো সওয়াব হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (2985)


2985 - عن محمود بن الربيع الأنصاري أن عتبان بن مالك وهو من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم ممن شهد بدرًا من الأنصار أنه أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسولَ الله! قد أَنكرتُ بَصَرِي وأنا أصلِّي بقومي، فإذا كانت الأمطار سال الوادي الذي بيني وبينهم لم أستطع أن آتي مسجدهم فأصلِّي بهم، وودِدْتُ يا رسول الله! أنَّك تأتيني فتصلِّي في بيتي فأتخذه مصلًّى، قال فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: سأفعل إن شاء الله، قال عِتبان: فغدا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وأبو بكر حين ارتفعَ النهارُ فاستأذَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فأذِنتُ له، فلم يجلسْ حتى دَخلَ البيتَ ثم قال: أينَ تُحِبُّ أن أصلِّيَ من بيتِكَ؟ قال فأشرتُ له إلى ناحية من البيت، فقام رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فكبَّرَ، فقمنا فصفَفْنا فصلَّى ركعتين ثم سلَّمَ، قال وحبسناه على خزيرة صَنْعناها له، قال فثاب في البيت رجالٌ من أهل الدار ذوو عَدَدٍ فاجتمعوا.

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (425)، ومسلم في المساجد (263) كلاهما من طريق ابن شهاب، قال: أخبرني محمود بن الربيع فذكر مثله في حديث طويل مضى في كتاب الإيمان واللفظ للبخاري.

وقوله: خزيرة -بخاء معجمة مفتوحة بعدها زاي مكسورة ثم ياء، ثم راء-، وهو نوع من الأطعمة قال ابن قتيبة: تصنع من لحم يقطع صغارًا، ثم يُصب عليه ماء كثير، فإذا نُضج ذُرّ عليه الدقيق، فإذا لم يكن فيها لحم فهي عَصيدة.

وحكى الأزهري عن أبي الهيثم أن الخزيرة من النُخالة، وكذا نقله البخاري في كتاب الأطعمة عن النضر بن شميل.

وقوله: سمع به أهل الدار، يريد أهل المحلة كما قال:"خير دور الأنصار بنو النجار" أي محلتهم، والمراد أهلها. انظر"الفتح".




ইতবান ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী এবং আনসারদের মধ্যে যারা বদরে অংশ নিয়েছিলেন, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার দৃষ্টিশক্তি কমে গেছে এবং আমি আমার কওমের লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করি। যখন বৃষ্টি হয়, তখন আমার ও তাদের মাঝের উপত্যকা দিয়ে পানি প্রবাহিত হয়, ফলে তাদের মসজিদে গিয়ে তাদের সাথে সালাত আদায় করা আমার পক্ষে সম্ভব হয় না। হে আল্লাহর রাসূল! আমি চাই যে আপনি আমার কাছে আসেন এবং আমার ঘরে সালাত আদায় করেন, যেন আমি সে স্থানটিকে সালাতের স্থান (মুসাল্লা) হিসেবে গ্রহণ করতে পারি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: ইনশাআল্লাহ, আমি তা করব।

ইতবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: পরদিন দিনের আলো ভালোভাবে প্রকাশ পাওয়ার পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুমতি চাইলেন, আমি তাঁকে অনুমতি দিলাম। তিনি বসার আগেই ঘরের ভেতরে প্রবেশ করলেন, এরপর বললেন: তোমার ঘরের কোন স্থানে আমি সালাত আদায় করি, তা তুমি পছন্দ করো? তিনি বলেন: আমি তাঁকে ঘরের একদিকের দিকে ইঙ্গিত করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে তাকবীর দিলেন। আমরাও দাঁড়ালাম এবং কাতার বাঁধলাম। তিনি দু’রাকাআত সালাত আদায় করলেন, এরপর সালাম ফিরালেন। তিনি বলেন: আমরা তাঁর জন্য তৈরি করা 'খাজীরা' (এক প্রকার খাবার) দ্বারা তাঁকে আপ্যায়ন করলাম। তিনি আরও বলেন: এরপর সেই ঘরের আশেপাশে থেকে বহু সংখ্যক লোক ভিড় করে সেই ঘরে এসে সমবেত হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (2986)


2986 - عن عائشة قالت: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم ببناء المساجد في الدور، وأن تُنَظَّفَ وتُطيب.

صحيح: رواه أبو داود (455)، وابن ماجه (759) كلاهما من طريق زائدة بن قُدامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

وهذا إسناد صحيح.

ورواه أيضًا ابن ماجه (758) من وجه آخر عن مالك بن سُعير، قال: أنبأنا هشام بن عروة به نحوه.

ولا يُعل بما رواه الترمذي (594) من طريق عامر بن صالح الزبيري عن هشام بن عروة مرفوعًا به مثله، ثم رواه من طريق عبدة ووكيع، عن هشام به مرسلًا وقال: هذا أصح من الحديث الأول
وتابعه سفيان بن عيينة عن هشام على إرساله، فإن قصد الترمذي ترجيح رواية عبدة ووكيع وسفيان على عامر بن صالح فهو صحيح لأن عامر بن صالح الزبيري متروك كما في التقريب، وإن أراد ترجع الإرسال مطلقًا فهذا ليس بصحيح فإن زائدة بن قدامة ومالك بن سعير نقان وتابعهما أيضًا عامر بن صالح فيجب قبول زيادتهم، ومن المعلوم أن الراوي قد يرسله وقد يوصله، فكل روي بما سمع، ومن علم حجة على من لم يعلم، ولذا اعتمده ابن خزيمة فأخرجه من طريق مالك بن سعير (1294) وابن حبان فأخرجه من طريق زائدة (1634) في صحيحهما.

ورواه الإمام أحمد (23146) من وجه آخر عن يعقوب (وهو ابن إبراهيم بن سعد بن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف) عن أبيه، عن ابن إسحاق قال: حدثني عمر بن عبد الله بن عروة، عن جده عروة، عمن حدثه من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمرنا أن نصنع المساجدَ في دورنا، وأن تصلح صنعتَها ونطهرها.

وإسناده حسن لأجل ابن إسحاق وصرَّح بالتحديث، وعمر بن عبد الله بن عروة بن الزبير بن العوام الأسدي قال فيه الحافظ:"مقبول" أي حيث يتابع وقد توبع في الإسناد السابق، ولعل المبهم من الصحابي هو عائشة رضي الله عنها كما في الإسناد الأول، وإن كان غيرها فيكون شاهدًا لها.

وفي الباب حديث سمرة بن جندب أنه كتب إلى ابنه:"أما بعد فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمرنا بالمساجد أن نصنعها في ديارنا، ونُصلح صنعتها، ونطهرها".

رواه أبو داود (456)، وأحمد (20184) وفي الإسناد رجال ضعفاء ومجاهيل مع الانقطاع، وَوَهِمَ من عزاه إلى الترمذي.

وقوله:"في الدور" قال البغوي في شرح السنة (2/ 397):"يريد المحال التي فيها الدور، ومنه قوله تعالى: {سَأُرِيكُمْ دَارَ الْفَاسِقِينَ} [سورة الأعراف: 145] يقولون: سمع به أهل الدار، يريدون: أهل المحلة، ومنه كما جاء:"خير دور الأنصار بنو النجار".

وقال سفيان: تُبنى المساجد في الدور، يعني القبائل. انتهى بالتصرف.

وحمل بعض أهل العلم على أن المراد بالمسجد المُصلَّى لأداء النوافل في البيوت لورود النهي عن جعل البيوت مثل المقابر، وأما الفرائض فتُؤَدَّى في مسجد الجماعة.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মহল্লাসমূহে (বা ঘরসমূহের সন্নিকটে) মসজিদ নির্মাণ করার এবং সেগুলোকে পরিষ্কার-পরিচ্ছন্ন ও সুগন্ধিযুক্ত রাখার নির্দেশ দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (2987)


2987 - عن طلق بن علي قال: خرجنا وفدًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم فبايعناه، وصلَّينا معه، وأخبرناه أنَّ بأرضِنا بيعةً لنا فاستوهبناه من فضْل طهوره، فدعا بماء فتوضأ، وتمضمض ثم صبَّه في إداوةٍ، وأمرنا فقال: اخرجوا فإذا أتيتُم أرضكم فاكسروا بيعتكم وانضحوا مكانَها بهذا الماء واتخذوها مسجدًا، قلت: إن البلد بعيد، والحر
شديد، والماء ينشفُ فقال:"مُدُّوه من الماء، فإنه لا يزيده إلا طيبًا" فخرجنا حتى قدمنا بلدنا فكسرنا بيعتنا، ثم نضحنا مكانها، واتخذناها مسجدًا قنادينا فيه بالأذان. قال والراهب رجل من طيّء فلما سمع الأذان قال: دعوة حق، ثم استقبل تلعةً من تلاعِنا فلم نره بعد.

صحيح: رواه النسائي (701) عن هناد بن السري، عن ملازم قال: حدثني عبد الله بن بدر، عن قيس بن طلق، عن أبيه طلق بن علي فذكر مثله.

وإسناده صحيح، ملازم هو: ابن عمرو بن عبد الله بن بدر اليمامي الحنفي، لقبه لزيم وثقه أبو حاتم وابن معين وقال أحمد: من الثقات. والحديث أخرجه أيضًا ابن حبان في صحيحه (1123، 1602) حديث مسدَّد، عن ملازم بن عمرو به مثله.

وللحديث إسناد آخر والذي ذكرته أجوده، منه ما ذكره الإمام أحمد (16293) عن موسي بن داود، حدثنا محمد بن جابر، عن عبد الله بن بدر، عن طلق بن علي فذكر نحوه مختصرًا، ومحمد ابن جابر هو: ابن سيار الحنفي اليمامي قال أبو زرعة: ساقط الحديث. وقال البخاري: ليس بالقوي يتكلمون فيه. وقال أبو داود: ليس بشيء وتكلم فيه العجلي وابن حبان وأحمد وغيرهم.

وفي الإسناد أيضًا عبد الله بن بدر الحنفي، لم يسمع من طلق بن علي، بينهما ابنه قيس بن طلق كما مضى.

وقوله: بيعة -بكسر الباء- معبد النصارى أو اليهود.

وتَلْعَة: بفتح التاء وسكون اللام - مسيل الماء من أعلى الوادي، وأيضًا يقال ما انحدر من الأرض.




তলক ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা একটি প্রতিনিধি দল হিসেবে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। আমরা তাঁর হাতে বায়আত গ্রহণ করলাম এবং তাঁর সাথে সালাত আদায় করলাম।

আমরা তাঁকে জানালাম যে, আমাদের এলাকায় আমাদের একটি উপাসনালয় (গির্জা বা সিনাগগ) রয়েছে। তাই আমরা তাঁর নিকট তাঁর ওযুর অবশিষ্ট পানি চেয়ে নিলাম। তিনি পানি চাইলেন, অতঃপর ওযু করলেন এবং কুলি করলেন। এরপর তা একটি ছোট চামড়ার পাত্রে ঢেলে দিলেন। তিনি আমাদের নির্দেশ দিয়ে বললেন: "তোমরা যাও। যখন তোমাদের এলাকায় পৌঁছবে, তখন তোমাদের উপাসনালয়টি ভেঙে ফেলবে এবং এর স্থানটিতে এই পানি ছিটিয়ে দেবে এবং এটিকে মাসজিদে পরিণত করবে।"

আমি বললাম: এলাকাটি অনেক দূরে, এবং গরম খুব তীব্র, ফলে পানি শুকিয়ে যাবে। তিনি বললেন: "এর সাথে (সাধারণ) পানি মিশিয়ে দাও, কারণ এতে এর পবিত্রতা ও বরকত বৃদ্ধি পাবে বৈ কমবে না।"

অতঃপর আমরা রওয়ানা হলাম এবং আমাদের এলাকায় এসে পৌঁছলাম। আমরা আমাদের উপাসনালয়টি ভেঙে ফেললাম, তারপর জায়গাটিতে পানি ছিটিয়ে দিলাম এবং এটিকে মাসজিদ বানালাম। আমরা সেখানে আযান দিয়েছিলাম।

তিনি (তলক ইবনু আলী) বলেন, সেখানকার একজন পাদ্রী (রাহিব) ছিলেন তাইয়্যি গোত্রের একজন লোক। যখন সে আযান শুনল, সে বলল: "এটি সত্যের আহ্বান।" অতঃপর সে আমাদের এলাকার একটি উঁচু পথ ধরে চলে গেল। এরপর আমরা আর তাকে দেখিনি।