আল-জামি` আল-কামিল
3128 - عن أوس بن أوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إنَّ من أفضل أيامكم يوم الجمعة، فيه خلق آدم، وفيه قبض، وفيه النفخة، وفيه الصعقة، فأكثروا عليَّ من الصلاة فيه، فإنَّ صلاتكم معروضة عليَّ". قال: قالوا: يا رسول الله! كيف تُعرض صلاتنا عليك وقد أَرِمتَ؟ يقولون: بَليتَ؟ فقال:"إنَّ الله عز وجل حرَّمَ على الأرض أجسادَ الأنبياء".
صحيح: رواه أبو داود (1047) والنسائي (1347) وابن ماجة (1636) كلّهم من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس، فذكره.
وإسناده صحيح، وصحّحه ابن خزيمة (1733) وابن حبان (910) والحاكم (1/ 278) فأخرجوه من طريق عبد الرحمن بن يزيد به.
قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه" بل هو على شرطهما عنده، فقد أخرجا لجميع رواته، إلَّا أنَّ البخاري لم يخرج لأبي الأشعث الصنعاني (واسمه: شرحبيل بن آدة) إلَّا تعليقًا، والحاكم لا يُفرِّق بين الإخراج للراوي تعليقًا أو متابعة، أو أصالة.
وصحّحه النووي في"الأذكار" (97).
وقد أُعلَّ هذا الحديث بما لا يقدح في صحَّه. انظر:"جلاء الأفهام" (66، 67).
وقوله:"وفيه الصعقة": أي الغشي والموت.
وفي الباب عن أبي أُمامة مرفوعًا:"أكثروا علىَّ الصلاة في كل يوم جمعةٍ؛ فإنَّ صلاة أمَّتي تُعرض عليَّ في كلِّ يوم جمعة، فمن كان أكثرهم عليَّ صلاة كان أقربهم منَّي منزلة".
رواه البيهقي (3/ 249) عن علي بن أحمد بن عبدان، أنبأنا أحمد بن عبيد، ثنا الحسين بن
سعيد، ثنا إبراهيم بن الحجاج، ثنا حماد بن سلمة، عن برد بن سنان، عن مكحول الشامي، عن أبي أمامة، فذكره.
وبرد بن سنان هو الشامي، لا السمرقندي، وثَّقه يحيى بن معين، والنسائي، وقال أبو زرعة:"لا بأس به". ولكن تكلَّم فيه ابن المديني إلَّا أنَّه لا ينزل عن درجة"صدوق" كما في"التقريب".
ولكن فيه علَّة أخرى، وهي الانقطاع؛ فإنَّ مكحولًا لم يسمع من أبي أمامة شيئًا؛ ولذا حكم عليه أكثر أهل العلم بالانقطاع؛ إلَّا أنَّ المنذريّ قال:"رواه البيهقي بإسناد حسن، إلَّا أنَّ مكحولًا قيل: لم يسمع من أبي أمامة". كذا قال في"الترغيب" (2600). وهو الصواب. انظر"المراسيل" (212) لابن أبي حاتم.
وعن أنسٍ مرفوعًا:"أكثروا الصلاة عليَّ يوم الجمعة؛ فإنَّه أتاني جبريل آنفًا من ربِّه عز وجل فقال: ما على الأرض من مسلم يصلي عليك مرة واحدة إلَّا صلَّيتُ أنا وملائكتي عليه عشرًا".
وفي رواية:"أكثروا الصلاة عليَّ يوم الجمعة؛ فإنَّ صلاتكم تُعرض عليَّ".
الرواية الأولى رواه الطبراني من طريق أبي ظلالٍ، عن أنسٍ."جلاء الأفهام" (73). قال المنذري في"الترغيب" (2585):"رواه الطبراني عن أبي ظلال، وأبو ظلال وُثِّق، ولا يضرُّ في المتابعات".
قلت: وأبو ظلال هو هلال بن ميمون القسملي، مشهور بكنيته، جمهور أهل العلم على تضعيفه، وفي"التقريب":"ضعيف".
وأما ابن حبان؛ فذكره في"الثقات" (5/ 504).
والرواية الثانية من طريق جبارة بن مُغلِّس، حدّثنا أبو إسحاق خازم، عن يزيد الرقاشي، عن أنس، فذكره. ومن طريقه رواه ابن عدي في الكامل (3/ 944). وفيه سلسلة الضعفاء، وهم: جُبارة بن مُغلِّس، وشيخه أبو إسحاق خازم، وشيخه يزيد الرقاشي.
وعن أبي الدرداء مرفوعًا:"أكثروا الصلاة عليَّ يوم الجمعة؛ فإنَّه مشهود؛ تشهده الملائكة، وإنَّ أحدًا لن يُصلِّي عليَّ إلَّا عُرضت عليَّ صلاته حتَّى يفرغ منها". قال: قلت: وبعد الموت؟ قال:"وبعد الموت، إنَّ الله حرَّم على الأرض أن تأكلَ أجساد الأنبياء فنبيُّ الله حيٌّ يرزق".
رواه ابن ماجة (1637) عن عمرو بن سوَّاد المصري، قال: حدّثنا عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن سعيد بن أبي هلال، عن زيد بن أيمن، عن عبادة بن نُسَي، عن أبي الدرداء، فذكره.
أورده المنذري في"الترغيب" (2599)، وقال:"رواه ابن ماجة بإسنادٍ جيد".
قلت: ليس بجيِّد، قال البوصيري في"الزوائد":"هذا إسناد رجاله ثقات إلَّا أنَّه منقطع في موضعين؛ عبادة بن نُسي روايته عن أبي الدرداء مرسلةٌ، قاله العلائي. وزيد بن أيمن عن عبادة بن نُسي مرسلة. قاله البخاري".
وقال العراقي:"إسناده لا يصح".
وعن أبي مسعود الأنصاري، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرفوعًا:"أكثروا علىَّ الصلاة في يوم الجمعة، فإنَّه ليس أحد يصلي عليَّ يوم الجمعة إلَّا عُرضت عليَّ صلاته".
رواه الحاكم (2/ 421) عن أبي بكر بن إسحاق الفقيه، أنبأنا أحمد بن علي الأبار، ثنا أحمد ابن عبد الرحمن بن بكار الدمشقي، ثنا الوليد بن مسلم، حدثني أبو رافع، عن سعيد المقبري، عن أبي مسعود الأنصاري، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد؛ فإنَّ أبا رافع هذا هو إسماعيل بن رافع". وتعقبه الذهبي فقال:"ضعَّفوه".
قلت: إسماعيل بن رافع هذا جمهور أهل العلم، منهم الإمام أحمد، وابن معين، وأبو حاتم، والدارقطني، والعجلي، وابن حبان، وغيرهم مطبقون على تضعيفه.
وفي الباب أحاديث أُخرى وكلُّها معلولة، إلَّا أنَّ مجموعها تدلُّ على أثر له أصلًا.
معنى الحديث: هذا الحديث لا يفهم منه، ولا يستدل به على حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم حياةً حقيقية؛ وإنَّما يدل على أنَّ من صلَّى عليه من أُمَّته تبلغه، وتُعرض عليه؛ لأنَّ الله ملائكةً سيَّاحين في الأرض، يبلغونه سلام أمَّته؛ لأنَّه لم يثبت في شيء من الحديث أنَّه يسمع صوت المصلِّي عليه والمسلم بنفسه؛ إنَّما فيه أنَّ ذلك يُعرض عليه، ويبلغه، سواء صلَّى عليه وسلَّم في مسجده، أو مدينته، أو مكان آخر. انظر للمزيد"الصارم المنكي" لابن عبد الهادي (14
আওস ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিঃসন্দেহে তোমাদের দিনগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ দিন হলো জুম্মার দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এই দিনেই তাঁকে উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে (মৃত্যু হয়েছে), এই দিনেই (শিঙ্গায়) ফুঁক দেওয়া হবে এবং এই দিনেই (মানুষ) বেহুঁশ হয়ে যাবে (বা মৃত্যুর সম্মুখীন হবে)। অতএব, এই দিনে তোমরা আমার প্রতি বেশি করে সালাত (দরূদ) পাঠ করো, কারণ তোমাদের সালাত আমার কাছে পেশ করা হয়।" (রাবী বলেন:) সাহাবাগণ বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কিভাবে আমাদের সালাত আপনার কাছে পেশ করা হবে, অথচ আপনি তো জীর্ণ হয়ে যাবেন?" (অর্থাৎ, আপনি তো মিশে যাবেন?) তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা নবীদের দেহ মাটির জন্য হারাম করে দিয়েছেন।
3129 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال:"الصلاة -وفي رواية: الصلوات- الخمس، والجمعة إلى الجمعة كفارة لما بينهنَّ ما لم تُغشَ الكبائر".
وزاد في رواية:"ورمضان إلى رمضان مكفِّرات".
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (233) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، أخبرني العلاء بن عبد الرحمن -مولى الحُرَقة- عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وستأتي بقية الأحاديث في جامع آداب يوم الجمعة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচ ওয়াক্ত সালাত – এবং অন্য এক বর্ণনায়: সালাতসমূহ – এবং এক জুমু‘আহ থেকে পরবর্তী জুমু‘আহ এর মধ্যবর্তী সময়ের জন্য কাফ্ফারা (গুনাহ মোচনকারী), যতক্ষণ পর্যন্ত সে কবীরা গুনাহে লিপ্ত না হয়।”
আর এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: “আর এক রমযান থেকে অপর রমযান পর্যন্তও (গুনাহ মোচনকারী)।”
3130 - عن سلمان الفارسي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتدري ما يوم الجمعة؟". قلت: الله ورسوله أعلم. ثمَّ قال:"أتدري ما يوم الجمعة؟". قلت: نعم -قال: لا أدري زعم سأله الرابعة أم لا-، قال: قلت: هو اليوم الذي جُمِع فيه أبوه، أو أبوكم، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ألا أحدِّثك عن يوم الجمعة؟ ! لا يتطهَّر رجل مسلمٌ ثمَّ يمشي إلى المسجد، ثمَّ يُنصت حتَّى يقضي الإمام صلاته إلَّا كان كفَّارةً لما بينها وبين الجمعة التي بعدها ما اجتنبت المَقْتَلة".
حسنٌ: رواه أحمد (23729) والطبراني في"الكبير" (6089)، كلاهما من طريق إبراهيم، عن علقمة، عن قَرْثَع الضبي، عن سلمان.
وإسناده حسن؛ من أجل قُرْثَع الضبي؛ فإنَّه"صدوق" كما في"التقريب".
وصحَّحه ابن خزيمة (1732) والحاكم (1/ 277) وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد، واحتجَّ الشيخان بجميع رواته غير قَرْثَع، سمعت أبا علي يقول: أردت أن أجمع مسانيد قَرْثَع الضبي؛ فإنَّه من زهاد التابعين، فلم يسند تمام العشرة". انتهي.
ولكن قال ابن حبان في"المجروحين" (2/ 211) عن قَرْثَع:"روي أحاديثَ يسيرةً خالف فيها الأثبات، لم تظهر عدالته فيُسلك به مَسلك العدول حتَّى يُحتَجَّ بما انفرد، ولكن عندي: يستحقُّ مجانبة ما انفرد من الروايات؛ لمخالفته الأثبات".
قلت: ليس في حديثه هذا ما يخالف الثقات من الرواة عن سلمان، بل لحديثه هذا شواهد تشهد له.
قوله:"مقتلة": أي ما لم يُصب مقتلة، وهي من الكبائر. وقد ثبت في الأحاديث الصحيحة أنَّ الصغائر تكفر بالصلوات الخمس، والجمعة لمن اجتنب الكبائر.
وأما ما روي عن أبي مالك الأشعريّ مرفوعًا:"الجمعة كفارة لما بينها وبين الجمعة التي قبلها، وزيادة ثلاثة أيام، وذلك بأن الله عز وجل قال: {مَنْ جَاءَ بِالْحَسَنَةِ فَلَهُ عَشْرُ أَمْثَالِهَا}" فقيه انقطاع وضعف.
رواه الطبراني في"الكبير" (3/ 338) عن هاشم، ثم قال: ثنا محمد، حدثني أبي، حدثني ضمضم، عن شريح، عن أبي مالك، فذكر الحديث.
ومحمد هو ابن إسماعيل بن عياش ضعيف، وقال أبو حاتم:"لم يسمع من أبيه شيئًا" انظر: مجمع الزوائد (2/ 173، 174).
وشريح هو ابن عبيد بن شريح الحضرمي الحمصي، قال ابن أبي حاتم في"المراسيل":"ويروي عن أبي مالك مرسلًا".
وقد قيل لمحمد بن عوف: هل سمع أحدًا من الصحابة؟ قال: ما أظن؛ لأنه لا يقول في شيء من ذلك:"سمعت" وهو ثقة.
সালমান আল-ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি কি জানো জুমু'আর দিন কী?” আমি বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। এরপর তিনি আবার বললেন: “তুমি কি জানো জুমু'আর দিন কী?” আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি (সালমান) বললেন: আমি বললাম, এটি সেই দিন যেদিন তার পিতাকে, অথবা তোমাদের পিতাকে (আদমকে) একত্রিত করা হয়েছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি কি তোমাকে জুমু'আর দিন সম্পর্কে বলব না?! যখন কোনো মুসলিম ব্যক্তি পবিত্রতা অর্জন করে, তারপর মসজিদে যায়, অতঃপর ইমাম সালাত শেষ করা পর্যন্ত নীরব থাকে, তখন তা তার এবং পরবর্তী জুমু'আর মধ্যবর্তী সময়ের (গুনাহসমূহের) জন্য কাফ্ফারা হয়ে যায়, যতক্ষণ না সে গুরুতর পাপ (যেমন নরহত্যা) থেকে বিরত থাকে।”
3131 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا كان يوم الجمعة كان على كل باب من أبواب المسجد ملائكة يكتبون: الأول فالأول، فإذا جلس الإمام طووا الصحف، وجاؤا يستمعون الذكر. ومثل المُهجِّر كمثل الذي يُهدي البدنة، ثمَّ كالذي يُهدي بقرةً، ثمَّ كالذي يُهدي الكبش، ثمَّ كالذي يُهدي الدجاجة، ثمَّ كالذي
يُهدي البيضةَ".
متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (929) ومسلم في الجمعة (850) كلاهما من حديث ابن شهاب، أخبرني أبو عبد الله الأغر، عن أبي هريرة، فذكر الحديثَ. واللفظ لمسلمٍ، ولفظ البخاري قريب منه، وفيه تقديم وتأخير.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন জুমু‘আর দিন হয়, তখন মসজিদের প্রত্যেক দরজায় ফেরেশতারা থাকেন। তাঁরা (আগমনকারীদের) লিখতে থাকেন: প্রথমজন, তারপরের জন (এভাবে)। যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বসেন, তখন তাঁরা দপ্তরগুলো বন্ধ করে দেন এবং এসে যিক্র (খুতবা) শুনতে থাকেন। আর যে ব্যক্তি (প্রথম ভাগে) আসে, তার দৃষ্টান্ত হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি উট কোরবানি করে। এরপর যে ব্যক্তি আসে, সে যেন একটি গাভী কোরবানি করে। এরপর যে আসে, সে যেন একটি মেষ কোরবানি করে। এরপর যে আসে, সে যেন একটি মুরগি কোরবানি করে। এরপর যে আসে, সে যেন একটি ডিম দান করে।"
3132 - عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من اغتسل يوم الجمعة غسل الجنابة ثمَّ راح في الساعة الأولى فكأنَّما قرَّب بدنةً، ومن راح في الساعة الثانية فكأنَّما قرَّب بقرةً، ومن راح في الساعة الثالثة فكأنَّما قرَّب كبشًا أقرن، ومن راح في الساعة الرابعة فكأنَّما قرَّب دجاجةً، ومن راح في الساعة الخامسة فكأنَّما قرَّب بيضة، فإذا خرج الإمام حضرت الملائكة يستمعون الذكر".
متفق عليه: رواه مالك في الجمعة (1) عن سُمَيِّ مولى أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أبي صالح السمان، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه البخاري في الجمعة (881) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في الجمعة (850) عن قتيبة ابن سعيد، كلاهما عن مالكٍ به مثله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুমার দিন জানাবাতের গোসলের ন্যায় গোসল করল, এরপর প্রথম মুহূর্তে (মসজিদে) গেল, সে যেন একটি উট কুরবানি করল। আর যে দ্বিতীয় মুহূর্তে গেল, সে যেন একটি গরু কুরবানি করল। আর যে তৃতীয় মুহূর্তে গেল, সে যেন শিংবিশিষ্ট একটি মেষ (দুম্বা) কুরবানি করল। আর যে চতুর্থ মুহূর্তে গেল, সে যেন একটি মুরগি কুরবানি করল। আর যে পঞ্চম মুহূর্তে গেল, সে যেন একটি ডিম কুরবানি করল। যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বেরিয়ে আসেন, তখন ফেরেশতারা যিকির (খুতবা) শোনার জন্য উপস্থিত হন।"
3133 - عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"على كل باب من أبواب المسجد ملك يكتب: الأول فالأول (مَثَّلَ الجزور، ثمَّ نزَّلهم حتَّى صغَّر إلى مثل البيضة) فإذا جلس الإمام طُوِيت الصحف، وحضروا الذكرَ".
صحيح: رواه مسلم في الجمعة (850/ 25) عن قتيبة بن سعيد، حدَّثنا يعقوب (يعني ابن عبد الرحمن) عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديثَ.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মসজিদের প্রতিটি দরজায় একজন ফেরেশতা থাকেন যিনি (সওয়াব লেখার জন্য) প্রথম আগমনকারীকে, তারপরের আগমনকারীকে লিখতে থাকেন। (প্রথমে আগমনকারীর সওয়াব যেন একটি উট কুরবানী করার সমতুল্য, তারপর ক্রমান্বয়ে তা ছোট হতে হতে ডিম দান করার মতো সওয়াব পর্যন্ত)। যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বসে পড়েন, তখন খাতাগুলো গুটিয়ে ফেলা হয় এবং তারা (ফেরেশতারা) যিকির (খুতবা) শুনতে উপস্থিত হন।"
3134 - عن علقمة، قال: خرجت مع عبد الله إلى الصلاة فوجد ثلاثةً وقد سبقوه، فقال: رابع أربعةٍ وما رابع أربعة ببعيد، إنِّي سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الناس يجلسون من الله يوم القيامة على قدر رواحهم إلى الجمعات، الأول، والثاني، والثالث" ثمَّ قال: رابع أربعةٍ وما رابع أربعةٍ ببعيدٍ.
حسنٌ: رواه ابن ماجةَ (1094) عن كثير بن عبيد الحمصي، ثنا عبد المجيد بن عبد العزيز، عن معمر، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، فذكره.
وإسناده حسن؛ من أجل عبد المجيد بن عبد العزيز، فإنَّه"صدوق"، ورُمي بالإرجاء كما في"التقريب". وقد أخرج له مسلم مقرونًا. وحسَّنه الحافظ المنذري في"الترغيب والترهيب".
وقال البوصيري في مصباح الزجاجة (1/ 364):"هذا إسناد فيه مقال، عبد المجيد هو ابن عبد العزيز بن أبي روَّاد، وإن أخرج له مسلم في صحيحه فإنَّما أخرج له مقرونًا بغيره، فقد كان شديد
الإرجاء، داعيةً إليه، لكن وثقه الجمهور: أحمد، وابن معين، وأبو داود، والنسائي، وليَّنه أبو حاتم، وضعَّفه ابن حبان، وباقي رجال الإسناد ثقات، فالإسناد حسن، ورواه ابن أبي عاصم من هذا الوجه بإسناد حسن، ورواه الطبراني في الكبير، من حديث عبد الله بن مسعود أيضًا".
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলক্বামা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সালাতের জন্য বের হলাম। তিনি দেখলেন, তিনজন লোক তাদের আগেই চলে গেছে। তখন তিনি বললেন: (আমরা হলাম) চারজনের মধ্যে চতুর্থ, আর চারজনের মধ্যে চতুর্থ হওয়াও খুব দূরের নয়। নিশ্চয় আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয় কিয়ামতের দিন মানুষ জুম'আর সালাতের জন্য তাদের (মসজিদে) দ্রুত গমনের পরিমাণের উপর ভিত্তি করে আল্লাহর নিকট উপবিষ্ট হবে, (তাঁরা হলো) প্রথম, দ্বিতীয় এবং তৃতীয় (শ্রেণিভুক্ত ব্যক্তিগণ)।” এরপর তিনি বললেন: (আমরা হলাম) চারজনের মধ্যে চতুর্থ, আর চারজনের মধ্যে চতুর্থ হওয়াও খুব দূরের নয়।
3135 - عن أبي سعيد الخدري، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنَّه قال:"إذا كان يوم الجمعة قعدت الملائكة على أبواب المسجد، فيكتبون الناس من جاء من الناس على منازلهم، فرجل قدَّم جزورًا، ورجل قدَّم بقرةً، ورجل قدَّم شاةً، ورجل قدَّم دجاجةً، ورجلٌ قدَّم عصفورًا، ورجلٌ قدَّم بيضةً. قال: فإذا أذَّن المؤذِّن وجلس الإمام على المنبر، طُوِيت الصحف، ودخلوا المسجد يستمعون الذكر".
حسن: رواه الإمام أحمد (11769) ثنا يعقوب، ثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني العلاء ابن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي سعيد، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق، وقد صرَّح بالتحديث، وهو حسن الحديث، وكذلك العلاء بن عبد الرحمن أيضًا لا ينزل حديثه عن درجة الحسن.
وشيخ الإمام أحمد: يعقوب، هو ابن إبراهيم بن سعد الزهري.
قال الهيثمي:"رواه أحمد ورجاله ثقات".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন জুমুআর দিন আসে, তখন ফেরেশতারা মসজিদের দরজাসমূহে বসে যান। অতঃপর তারা আগত লোকদের তাদের (সওয়াবের) স্তর অনুযায়ী লিখে রাখেন। প্রথম ব্যক্তি (যেন) একটি উট কোরবানি করলো, দ্বিতীয় ব্যক্তি একটি গরু কোরবানি করলো, তৃতীয় ব্যক্তি একটি ছাগল কোরবানি করলো, চতুর্থ ব্যক্তি একটি মুরগি কোরবানি করলো, পঞ্চম ব্যক্তি একটি চড়ুই পাখি কোরবানি করলো, এবং ষষ্ঠ ব্যক্তি একটি ডিম কোরবানি করলো। (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর যখন মুয়াজ্জিন আযান দেন এবং ইমাম মিম্বরে বসেন, তখন (ফেরেশতারা) দফতরগুলো গুটিয়ে নেন এবং মসজিদে প্রবেশ করে যিকির (খুতবা) শুনতে থাকেন।
3136 - عن أبي أُمامةَ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"تقعد الملائكة على أبواب المساجد يوم الجمعة، فيكتبون الأول، والثاني، والثالث، حتَّى إذا خرج الإمام رُفِعت الصحف".
حسن: رواه الإمام أحمد (22242) والطبراني في الكبير (8102) كلاهما من طريق زيد، حدثني حسين، حدثني أبو غالب، حدثني أبو أُمامة، فذكر الحديثَ.
وإسناده حسن من أجل أبي غالب، واسمه: خَزَوَّر، وهو كما قال الذهبي:"صالح الحديث، وصحَّح له الترمذي". وقال الحافظ في"التقريب":"صدوق يخطئ".
قلت: وحديثه هذا ليس بمنكر، بل له شواهد صحيحة ذكرتها في هذا الباب.
وفي رواية لأحمد: (22268):"تقعد الملائكة يوم الجمعة على أبواب المسجد، معهم الصحف، يكتبون الناس، فإذا خرج الإمام طُوِيت الصحف". قلت يا أبا أُمامة! ليس لمن جاء بعد خروج الإمام جمعة؟ قال: بلى، ولكن ليس ممن يُكتب في الصحف.
وفي الباب عن علي بن أبي طالب، رواه أبو داود (1051): عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا عيسي، ثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، قال: حدثني عطاء الخراساني، عن مولى امرأته أمِّ عثمان قال: سمعت عليًّا رضي الله عنه على منبر الكوفة يقول:"إذا كان يوم الجمعة غدت
الشياطين براياتها إلى الأسواق، فيرمون الناس بالترابيث، أو بالربائث، ويثبطونهم عن الجمعة، وتغدو الملائكة فيجلسون على أبواب المساجد، فيكتبون الرجل من ساعة، والرجل من ساعتين، حتى يخرج الإمام، فإذا جلس الرجل مجلسًا يستمكن فيه من الاستماع والنظر، فأنصت ولم يلغُ، كان له كِفلان من أجرٍ، فإن نأي وجلس حيث لا يسمع فأنصت ولم يلغ كان له كِفلٌ من أجرٍ، وإن جلس مجلسًا يستمكن فيه من الاستماع والنظر فلغا ولم يُنصت كان له كفلٌ من وزرٍ، ومن قال يوم الجمعة لصاحبه: صهٍ فقد لغا، ومن لغا فليس له من جمعته تلك شيءٌ". ثمَّ يقول في آخر ذلك: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول ذلك.
رواه الإمام أحمد (719) من وجه آخر عن عطاء الخراساني به.
وفيه مولى امرأته وهو"مجهولٌ" كما في"التقريب".
وقوله:"يرمون الناس بالترابيث أو الربائث": من ربَثَه عن حاجته إذا حبسه، والمراد: أي ذكَّروهم الحوائج التي تربُثُهم.
وأمَّا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"تُبعث الملائكة على أبواب المسجد يوم الجمعة يكتبون مجيءَ الناس، فإذا خرج الإمام طُوِيت الصحف، ورُفِعت الأقلام، فتقول الملائكة بعضهم لبعض: ما حبس فلانًا؟ فتقول الملائكة: اللهمَّ: إن كان ضالًّا فاهده، وإن كان مريضًا فاشفه، وإن كان عائلًا فاغنه".
رواه ابن خزيمة (1771) والبيهقي (3/ 226) من طريق مطر، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه عن جده.
ومطر هو ابن طهمان الوراق، مختلفٌ فيه، فضعَّفه يحيى بن سعيد القطَّان، والإمام أحمد، وابن معين، والنسائي وابن سعد، وأبو داود، والعقيلي، والدارقطني، وقال أبو زرعة وأبو حاتم:"صالح الحديث". وقال البزار:"ليس به بأس". وقال ابن عدي:"وهو مع ضَعفه يُجمع حديثه ويُكتب".
قلت: لعلَّ هذا الحديث ما أخطأ فيه؛ فقد انفرد بروايته هكذا بهذا الإسناد. وقد ورد عدة أحاديث ثابتة في الوعيد الشديد لمن تخلَّف عن الجمعة لا الدعاء لهم.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "জুমু‘আর দিন ফেরেশতাগণ মসজিদের দরজাসমূহে অবস্থান করেন, এবং তারা প্রথম, দ্বিতীয় এবং তৃতীয় ব্যক্তির নাম লিখতে থাকেন। অবশেষে, যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বের হন, তখন সহীফাসমূহ তুলে নেওয়া হয়।"
3137 - عن أوس بن أوسٍ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من غسَّل يومَ الجمعةِ واغتسلَ، وبكَّر وابتكرَ، ومشي ولم يركب، ودنا من الإمام فاستمع ولم يلغُ، كان له بكلِّ خُطوَةٍ عمل سنةٍ، أجر صيامِها وقيامها".
وفي رواية:"من غسَّل رأسه يومَ الجمعةِ واغتسلَ".
صحيح: رواه أبو داود (345) والترمذي (496) والنسائي (1381) وابن ماجة (1087) كلُّهم
من طريق أبي الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس الثقفي، فذكره.
وإسناده صحيح، وصحّحه ابن خزيمة (1767) وابن حبان (27881) والحاكم (1/ 281 - 282) كلهم من طريق أبي الأشعث الصنعاني.
والرواية الثانية رواها أبو داود (346) من طريق سعيد بن أبي هلال، عن عُبادة بن نُسي، عن أوس الثقفي، فذكره.
وإسناده صحيح، رجاله ثقات، وإن قال الحافظ ابن حجر في سعيد بن أبي هلالٍ إنَّه"صدوق". إلَّا أنَّه ثقة على الأرجح؛ فقد وثَّقه جماهير الأئمَّة، وأخرج له الشيخان في صحيحيهما، وبقية أصحاب السنن.
قال الحاكم -بعد ما ساق أسانيد هذا الحديث-:"قد صحَّ هذا الحديث بهذه الأسانيد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، وأظُنَّه لحديثٍ واهٍ، لا يُعلَّ مثل هذه الأسانيد بمثله. ثمَّ ذكر ما رُوي عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من غسَّل واغتسلَ، ودنا وابتكر، واستمع، كان له بكلِّ خطوةٍ يخطوها قيام سنةٍ وصيامها". وهو حديث ضعيفٌ، في إسناده عثمان الشامي، لم يروِ عنه إلَّا ثور بن يزيد، ولم يقل فيه توثيقٌ لأحدٍ.
رواه أحمد (6954)، عن روح، ثنا ثور بن يزيد، عن عثمان الشامي، أنَّه سمع أبا الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.
قال الحاكم:"عثمان الشامي مجهول".
وقال البيهقي في"السنن الكبرى" (3/ 227):"الوهم في إسناد هذا الحديث ومتنه من عثمان الشامي هذا، والصحيح رواية الجماعة: عن الأشعث، عن أوس، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم. والله أعلم".
وشهِد جنازةً، وشهد نِكاحًا، وجبت له الجنَّة".
فهو ضعيف؛ رواه الطبراني في"الأوسط" (951 - مجمع البحرين). وفي إسناده محمد بن حفص، وهو ضعيف، وقد انفرد بهذا، قال الطبراني:"لم يروه عن حريز إلَّا محمد". يعني ابن حفص الأوصابي، أو الوصابي.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"من زار قبر أبويه، أو أحدهما كلّ جمعة غُفر له، وكتب بَرًّا".
رواه الطبراني في"الأوسط" و"الصغير" -"مجمع البحرين" (1329) - عن محمد بن أحمد ابن النعمان بن شبل البصري، ثنا أبي، حدثني عم أبي محمد بن النعمان بن عبد الرحمن، عن يحيي بن العلاء البجلي، عن عبد الكريم أبي أُميّة، عن مجاهد، عن أبي هريرة، فذكره.
وفيه سلسلة من الضعفاء والمجاهيل؛ محمد بن النعمان، وشيخه يحيي بن العلاء، وشيخه عبد الكريم كلهم ضعفاء، بل قد اتهم يحيى بن العلاء البجليّ.
وقد ضعّفه أيضًا الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 59، 60) ولكن من جهة عبد الكريم أبي أمية فقط، وهو ابن أبي المخارق.
نسخة (أ)، والبيهقي في"شعب الإيمان" (2/ 472).
وقال الذهبي:"وقفه أصح".
ومع وقفه فقد روي بألفاظ مختلفة ذكر بعضها المستغفريّ في فضائل القرآن.
وفي الباب ما رواه ابن مردويه، ومن طريقه الضياء المقدسي في"المختارة" (2/ 50) من حديث عبد الله بن مصعب بن منظور بن زيد بن خالد الجهني من وجهين عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وعن علي بن الحسين، عن أبيه، عن علي بن أبي طالب، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولفظه:"من قرأ سورة الكهف يوم الجمعة فهو معصوم إلى ثمانية أيام من كل فتة تكون، فإن خرج الدجال عُصم منه".
قال الضياء المقدسي:"عبد الله بن مصعب لم يذكره البخاري ولا ابن أبي حاتم في كتابيهما".
وأورده الحافظ ابن كثير في"التفسيره" (3/ 131) وسكت عليه، فالظاهر -والله أعلم- أنَّه لم يقف أيضًا على ترجمة عبد الله بن مصعب بن منظور فهو مجهول.
ورواه المستغفري في"فضائل القرآن" (817) من حديث أبي هريرة، وابن عباس بأطول منه وفيه إسماعيل بن أبي زياد الشامي. قال الدارقطني: كان يضع الحديث.
وكذلك لا بصح ما رُوي عن ابن عمر، ولفظه:"من قرأ سورة الكهف في يوم الجمعة سطع له نور من تحت قدمه إلى عنان السماء، يضيء له يوم القيامة، وغُفر له ما بين الجمعتين".
أخرجه ابن مردويه في تفسيره، من طريق محمد بن خالد الختلي كما قال ابن عراق في"تنزيه الشريعة" (1/ 302)، والضياء المقدسي في أحكامه (2/ 389، 390)، ومحمد بن خالد الختلي قال ابن الجوزي في"الموضوعات":"كذَّبوه". وقال ابن مندة:"صاحب مناكير". ذكره الذهبي في"الميزان" (3/ 534)، وأورد الحديث المذكور من طريقه.
وأورده الحافظ ابن كثير في تفسيره، وقال:"رواه الحافظ أبو بكر بن مردويه في تفسيره بإسناد له غريب". وهذا الحديث في رفعه نظر، وأحسن أحواله الوقف.
وقال ابن الملقن في"تحفة المحتاج" (1/ 523):"رواه الضياء في أحكامه (2/ 390) من حديث ابن مردويه أحمد بن موسي، بسندٍ فيه من لا أعرفه".
وأما قول المنذري في"الترغيب":"رواه أبو بكر بن مردويه في تفسيره بإسنادٍ لا بأس به" ففيه نظرٌ.
وقد جاء في الصحيح في فضل قراءة فواتح سورة الكهف، وستأتي في فضائل القرآن.
وعن أبي أمامة ولفظه:"من قرأ {حم} الدخان في ليلة الجمعة بنى الله له بها بيتًا في الجنة".
رواه الطبراني في"الكبير" وفيه فضال بن جبير، ضعيف جدًّا. قاله الهيثمي في"المجمع" (2/ 168).
وعن ابن عباس ولفظه:"من قرأ السورة التي يذكر فيها (آل عمران) يوم الجمعة، صلى الله عليه، وملائكته حتَّى يغيب الشمس"."مجمع البحرين" (953). وفيه سلسلة من الضعفاء والمجاهيل.
هذه الأحاديث أوردها الحافظ المنذري في"الترغيب والترهيب"، وقال في بعضها:"إسناد جيد". وفي كلامه هذا نظر.
وكذلك ما رُوي عن عائشة بلفظ:"من قرأ سورة الكهف يوم الجمعة غُفر له ما بينه وبين الجمعة، وزيادة ثلاثة أيام، ومن قرأ الخمس الأواخر منها عند نومه بعثه الله أي الليل شاء". رواه ابن مردويه في تفسيره بإسناد ضعيف جدًّا كما قال ابن عراق في التنزيه الشريعة".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"من قرأ حم الدخان في ليلة الجمعة غُفر له" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (2889) عن نصر بن عبد الرحمن الكوفي، حدّثنا زيد بن حباب، عن هشام أبي المقدام، عن الحسن، عن أبي هريرة، فذكره مثله.
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وهشام أبو المقدام يضعَّف، ولم يسمع الحسن من أبي هريرة.
هكذا قال أيوب ويونس بن عبيد، وعلي بن زيد".
وأخرجه أيضًا (2888) مطلقًا بدون قيد يوم الجمعة ولفظه:"من قرأ حم الدخان في ليلة، أصبح يستغفر له سبعون ألف ملك". رواه عن سفيان بن وكيع، حدّثنا زيد بن حباب، عن عمر بن أبي خثعم، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب، لا نعرفه إلَّا من هذا الوجه، وعمر بن خثعم يُضعَّف؛ قال محمد: هو منكر الحديث".
আওস ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি জুমুআর দিনে (স্ত্রীকে) গোসল করালো এবং নিজেও গোসল করলো, আর দ্রুত মসজিদে গেল ও প্রথম দিকে পৌঁছল, এবং হেঁটে গেল, কোনো বাহনে আরোহণ করলো না, আর ইমামের কাছাকাছি হলো, মনোযোগ সহকারে শুনল ও অনর্থক কথা বলল না, তার জন্য প্রতি পদক্ষেপে এক বছরের আমলের সওয়াব হবে—তার রোজা ও (রাত জাগা) ইবাদতের সওয়াব।”
অন্য এক বর্ণনায় আছে: “যে ব্যক্তি জুমুআর দিন তার মাথা ধৌত করল ও গোসল করল।”
3138 - عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"ما من مسلم يموت يوم الجمعة أو ليلة الجمعة إلَّا وقاه الله فتنة القبرِ".
حسن: رواه الترمذي (1074) عن محمد بن بشار، حدّثنا عبد الرحمن بن مهدي، وأبو عامر العقدي، قالا: حدّثنا هشام بن سعد، عن سعيد بن أبي هلال، عن ربيعة بن سيف، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث.
قال الترمذي:"حسن غريبٌ، وهذا حديثٌ ليس إسناده بمتصل، ربيعة بن سيف إنَّما يروي عن أبي عبد الرحمن الحُبُلِّي، عن عبد الله بن عمرو، ولا نعرف لربيعة بن سيف سماعًا من عبد الله بن عمرو".
هكذا في نسخة محمد فؤاد عبد الباقي، وفي نسخٍ أخرى:"غريبٌ" فقط. وهو الصحيح؛ لأنَّ الحُسنَ والانقطاع لا يجتمعان.
أمَّا الحديث؛ فله طرق أخرى يتقوى بها، منها ما رواه الإمام أحمد من وجهين:
أحدهما (6646): عن سريج، حدّثنا بقية، عن معاوية بن سعيد، عن أبي قُبَيل، عن عبد الله بن عمرو فذكره. وبقية مدلس وقد عنعن، لكن صرَّح بالتحديث في الوجه الثاني الذي رواه الإمام أحمد (7050) عن إبراهيم بن أبي العباس، حدّثنا بقية، حدَّثني معاوية بن سعيد التجيبي، سمعت أبا قبيل المصري يقول: سمعت عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكر الحديث.
وقد صرَّح بقية في هذا الإسناد بالتحديث، كما صرح في بقية الإسناد بالسماع، فزالت بذلك تهمة التدليس، وهذا إسناد حسن؛ فإنَّ أبا قَبيلٍ المصري هو حُيي بن هانئ، قال فيه الإمام أحمد وابن معين وأبو زرعة:"ثقة". وقال أبو حاتم:"صالح الحديث".
وللحديث طرق أُخرى غير أنَّ ما ذكرته هو أصحُّها.
وفي الباب حديثان آخران ولكنهما ضعيفان، أحدهما: حديث أنس بن مالكٍ، رواه أبو يعلى (4099 - تحقيق الأثري) عن أبي معمر إسماعيل بن إبراهيم، حدّثنا عبد الله بن جعفر، عن واقد ابن سلامة، عن يزيد الرقاشي، عن أنسٍ، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من مات يوم الجمعة وُقي عذاب القبر".
وواقد بن سلامة وشيخه يزيد الرقاشي (وهو ابن أبان القاص) ضعيفان.
والثاني: حديث جابر بن عبد الله، أخرجه أبو نعيم في الحلية (3/ 155) من حديث عمر بن موسي بن الوجيه، عن محمد بن المنكدر، عن جابر نحوه. قال أبو نعيم:"غريب من حديث جابر ومحمد بن المنكدر، تفرد به عمر بن موسى، وهو مدني، فيه لين". انتهى.
وعمر بن موسى هذا أورده الذهبي في"الميزان" ونقل عن ابن عدي أنَّه قال:"هو ممن يضع الحديثَ متنًا وإسنادًا". وقال أبو حاتم:"ذاهب الحديث، كان يضع الحديث". وتكلَّم فيه أيضًا البخاري والدارقطني. فمثله لا يستشهد به.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি এটিকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন): "যে কোনো মুসলিম ব্যক্তি জুমআর দিনে অথবা জুমআর রাতে মারা যায়, আল্লাহ তাকে কবরের ফিতনা (পরীক্ষা) থেকে রক্ষা করেন।"
3139 - عن محمد بن عباد بن جعفر، قال: سألت جابر بن عبد الله، وهو يطوف بالبيت: أَنَهي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن صيام يوم الجمعة؟ قال: نعم، وربِّ هذا البيت! .
متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1984)، ومسلم في الصيام (1143) كلاهما من حديث ابن جريج، قال: أخبرني عبد الحميد بن جُبير بن شيبة، أنّه أخبره محمد بن عباد بن جعفر فذكره، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري:"أنهى النبي صلى الله عليه وسلم عن صوم يوم الجمعة؟ قال: نعم".
قال البخاري: زاد غير أبي عاصم:"يعني أن ينفرد بصومه".
قلت: أبو عاصم هو الضحاك بن مخلد النبيل، شيخ البخاري.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মাদ ইবনু আব্বাদ ইবনু জা‘ফার বলেন, আমি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করা অবস্থায় জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি জুমু‘আর দিনে সওম (রোযা) পালন করতে নিষেধ করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এই ঘরের রবের শপথ!
3140 - عن جويرية بنت الحارث، أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل عليها يوم الجمعة، وهي صائمة،
فقال:"أصمتِ أمس؟" قالت: لا. قال:"أتريدين أن تصومي غدًا؟" قالت: لا. قال:"فأفطري"؟
صحيح: رواه البخاري في الصوم (1986) من طرق عن شعبة، عن قتادة، عن أبي أيوب، عن جويرية بنت الحارث، فذكرت مثله.
وجويرية بنت الحارث من بني المصطلق أم المؤمنين كان اسمها برّة، فغيّرها النبي صلى الله عليه وسلم.
قال الحافظ في"الفتح" (4/ 234):"وليس لجويرية زوج النبي صلى الله عليه وسلم في البخاري من روايتها سوى هذا الحديث".
জুওয়ায়রিয়াহ বিনতে আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন জুমু'আর দিন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর নিকট এলেন, তখন তিনি সাওম (রোযা) অবস্থায় ছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "তুমি কি গতকাল সাওম রেখেছিলে?" তিনি বললেন, "না।" তিনি বললেন, "তুমি কি আগামীকাল সাওম রাখতে চাও?" তিনি বললেন, "না।" তিনি বললেন, "তাহলে তুমি সাওম ভেঙ্গে দাও (ইফতার করে নাও)।"
3141 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يصوم أحدكم يوم الجمعة إلَّا يومًا قبله، أو بعده".
متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1985) ومسلم في الصيام (1144) كلاهما من حديث حفص بن غياث، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره. واللفظ للبخاري.
ولفظ مسلم:"لا يصم أحدكم يوم الجمعة إلَّا أن يصوم قبله أو بعده".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন জুমু‘আর দিন রোযা না রাখে, তবে তার একদিন আগে অথবা একদিন পরে (রোযা রাখলে সেটা ভিন্ন)।"
3142 - عن وعن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تختصُّوا الجمعة بقيام من بين الليالي، ولا تخصُّوا يوم الجمعة بصيام من بين الأيام. إلَّا أن يكون في صوم يصومه أحدكم".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1144) عن أبي كريب، حدّثنا حسين (يعني الجعفي) عن زائدة، عن هشام، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা অন্য রাতের তুলনায় জুমার রাতকে (বিশেষভাবে) কিয়ামুল লাইলের জন্য নির্দিষ্ট করো না এবং অন্য দিনের তুলনায় জুমার দিনকে (বিশেষভাবে) রোজা রাখার জন্য নির্দিষ্ট করো না। তবে যদি তোমাদের কারও এমন কোনো রোজা থাকে যা সে (এমনিতেই) পালন করে (আর সেটা জুমার দিনে পড়ে যায়, তাহলে ভিন্ন কথা)।"
3143 - عن محمد بن جعفر المخزومي، قال: لقي أبا هريرةَ رجل وهو يطوف بالبيت، فقال: يا أبا هريرة! أنت نهيت الناس عن صوم يوم الجمعة؟ قال: لا وربّ الكعبة! ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عنه.
صحيح: رواه الإمام أحمد (9097) عن يونس، حدّثنا المستور -يعني ابن عباد- حدّثنا محمد ابن جعفر المخزومي، فذكره.
وإسناده صحيح، والمستور -وقيل: المستورد بن عباد الهاني، وثَّقه ابن معين، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وصحَّحه ابن خزيمة (2157)، وابن حبان (3609) إلَّا أنَّهما روياه من وجهٍ آخر عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، أخبرني يحيي بن جعدة، أنَّه سمع عبد الله بن عمرو ابن عبد القاري يقول: سمعت أبا هريرة يقول، فذكر الحديث.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (7388).
وعبد الله بن عمرو بن عبد القاري لم يرو عنه سوى يحيى بن جعدة؛ ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول". أي حيث يتابع، وقد توبع في الإسناد السابق، وأخطأ من قال: عبد الرحمن
ابن عمرو القاري.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে বাইতুল্লাহ তাওয়াফরত অবস্থায় এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল, "হে আবু হুরায়রা! আপনি কি লোকজনকে জুমু‘আর দিনে সিয়াম পালন করতে নিষেধ করেছেন?" তিনি বললেন, "না, কা'বার রবের কসম! বরং আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামই তা নিষেধ করেছেন।
3144 - عن عبد الله بن مسعود قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم من غُرَّة كل شهرٍ ثلاثة أيام.
وفي رواية: قلمَّا رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُفطر يوم الجمعة.
حسن: رواه أبو داود (2400) والترمذي (742) وابن ماجة (1725) كلهم من طريق شيبان،
عن عاصم، عن زر، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.
قال الترمذي:"حديث عبد الله حسن غريب، وقد استحبَّ قوم من أهل العلم صيام يوم الجمعة، وإنَّما يكره أن يصوم يوم الجمعة لا يصوم قبله ولا بعده، روي شعبة، عن عاصم هذا الحديث ولم يرفعه، وفي الباب عن ابن عمر، وأبي هريرة". انتهى.
وقد صححه أيضًا ابن خزيمة (2129) وابن حبان (3641) فروياه في صحيحيهما من هذا الوجه. قلت: وإسناده حسن؛ من أجل عاصم، وهو ابن أبي النجود، وهو حسن الحديث.
وأمَّا الاختلاف في رفعه ووقفه؛ فقال الحافظ الدارقطني في"العلل": (5/ 60):"رفعه صحيح".
وأمَّا معنى الحديث؛ فهو كما قال الترمذي: أنَّه صلى الله عليه وسلم كان يصوم الخميس والجمعة، وأمَّا إفراد يوم الجمعة فقد ثبت النهي عن ذلك.
وأما ما رُوي عن جنادة الأزدي، أنَّهم دخلوا على رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمانية نفرٍ، هو ثامنهم. فقرَّب إليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم طعاما يوم الجمعة، فقال:"كلوا". قالوا: صيام. قال:"صمتم أمس؟". قالوا: لا. قال:"صائمون غدًا؟" قالوا: لا. قال:"فأفطروا". فهو ضعيف.
أخرجه النسائي في"الكبرى" (2786) وأحمد (24009/ 4) والطبراني في"الكبير" (2173) والحاكم (3/ 608) كلهم من طرق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد الله اليزني -أبي الخير، عن حذيفة البارقي، عن جنادة الأزدي، فذكره، واللفظ للنسائي.
وزاد البعض في المتن:"فأكلنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فلمَّا خرج وجلس على المنبر، والناس ينظرون، يُريهم أنَّه لا يصوم يوم الجمعة.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
والصواب أنَّه ليس على شرط مسلم؛ فإنَّ حذيفة البارقي، ويقال: الأزدي، لم يخرج له سوي النسائي، ولم يرو عنه غير مرثد بن عبد الله؛ ولذا قال فيه الذهبي:"مجهول". وقال الحافظ:"مقبول".
وأما قوله في"الفتح": (4/ 234): رواه النسائي بإسناد صحيح؛ فيبدوا أنَّه رحمه الله وهِمَ فيه.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس مرفوعا:"لا تصوموا يوم الجمعة وحده".
رواه أحمد (2615) عن عتَّاب بن زياد، قال: أخبرنا عبد الله، قال: أخبرنا الحسين بن عبد الله ابن عبيد الله بن عباس، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
والحسين بن عبد الله بن عبيد الله بن عباس بن عبد المطلب الهاشمي ضعيف.
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي هريرة مرفوعًا:"يوم الجمعة يوم عيد، فلا تجعلوا يوم عيدكم يوم صيامكم، إلَّا أن تصوموا قبله، أو بعده". رواه الإمام أحمد (8025) عن عبد الرحمن (ابن مهدي) عن معاوية، يعني ابن صالح، عن أبي بشر، عن عامر بن لُدين الأشعري، عن أبي هريرة، فذكره.
ومن هذا الطريق رواه الحاكم (1/ 437) وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه إلَّا أنَّ أبا بشر هذا لم أقف على اسمه، وليس ببيان بن بشر، ولا جعفر بن أبي وحشية". وقال الذهبي في تلخيصه:"هو مجهول".
وقال فيه الحافظ:"مقبولٌ إن كان هو مؤذن دمشق، وإن كان أبو بشر صاحب أبي الزاهرية فضعيف".
وقال ابن خزيمة في صحيحه (2162) بعد أن رواه من طريق ابن مهدي:"أبو بشر هذا شامي، ليس بأبي بشر جعفر بن أبي وحشية صاحب شعبة وهشيم".
الأرض ما أدركتَ فضلَ غدوتهم".
رواه الترمذي (527) عن أحمد بن منيع، حدَّثنا أبو معاوية، عن الحجاج، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه أحمد (1966) عن أبي معاوية بإسناده مثله.
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه إلَّا من هذا الوجه، قال علي بن المديني: قال يحيى بن سعيد: قال شعبة: لم يسمع الحكم من مقسم إلَّا خمسة أحاديث، وعدَّها شعبة، وليس هذا الحديث فيما عدَّ شعبة، وكأنَّ هذا الحديث لم يسمعه الحكم من مقسم". انتهى.
قلت: وفي سنده أيضًا الحجاج، وهو ابن أرطاة، وصف بكثرة الخطأ والتدليس وقد عنعن.
ثمَّ قال الترمذي:"وقد اختلف أهل العلم في السفر يوم الجمعة، فلم ير بعضهم بأسًا بأن يخرج يوم الجمعة في السفر، ما لم تحضر الصلاة. وقال بعضهم: إذا أصبح فلا يخرج حتَّى يصلي الجمعة، انتهي.
وكذلك لا يصح ما رُوي أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج مسافرًا يوم الجمعة ضحى قبل الصلاة.
رواه عبد الرزاق (5540) عن الثوري، عن ابن أبي ذئب، عن صالح بن كثير، عن الزهري، قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وهو مع إرساله فيه صالح بن كثير، وهو المدني"مقبول" كما في"التقريب".
ولكن ثبت عن عمر بن الخطاب أنَّه رأى رجلًا عليه ثياب سفرٍ، بعد ما قضى الجمعة، قال: ما شأنك؟ قال: أردت سفرًا، فكرهت أن أخرج حتَّى أصلِّي. فقال عمر: إن الجمعة لا تمنعك السفر ما لم يحضر وقتها.
رواه عبد الرزاق (5536) عن معمر، عن خالد الحذاء، عن ابن سيرين أو غيره، أنَّ عمر رأي رجلًا فذكره.
وفي رواية أخرى رواها عن الثوري، عن الأسود بن قيس، عن أبيه، قال: أبصر عمر بن الخطاب رجلًا عليه هيئة السفر، وقال الرجل: إنَّ اليوم يوم الجمعة، ولولا ذلك لخرجتُ. فقال عمر: إنَّ الجمعة لا تحبس مسافرًا، فاخرج ما لم يحن الرواح.
وخلاصة ما في هذا الباب: أنَّ المسافر إذا لم يَخَفْ فَوتَ رفقته فالأولى له أن يصلي إن دخل الوقت قبل شروعه في السفر، فإن خاف فوت رفقته، وانقطاعه بعدهم جاز له السفر مطلقًا؛ لأنَّ هذا عذر يُسقط الجمعة والجماعة. هذا ما رجَّحه الحافظ ابن القيم في"زاد المعاد" (1/ 383).
ويقاس عليه اليوم وسائل السفر التي ليست في اختيار المسافر.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক মাসের প্রথম দিকে তিন দিন সিয়াম পালন করতেন।
অপর এক বর্ণনায় এসেছে: জুমু‘আর দিনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সিয়াম ভঙ্গ করতে (রোজা না রাখতে) আমি খুব কমই দেখেছি।
3145 - عن أبي سعيد الخدري، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"غسل يوم الجمعة واجب على كل محتلم".
متفقٌ عليه: رواه مالك في الجمعة (4) عن صفوان بن سليم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد، فذكره.
ورواه البخاري في الجمعة (879)، عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في الجمعة (846)، عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالكٍ.
وفي حديثٍ آخر لأبي سعيد الخدري من غير طريق مالكٍ:"غسل يوم الجمعة على كل محتلم، والسواك، ويمس من الطيب ما قدر عليه".
وفي رواية:"ولو من طيب المرأة". وكلُّها في صحيحٍ مسلمٍ. وستأتي.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "জুমু'আর দিন গোসল করা প্রতিটি বালেগ (প্রাপ্তবয়স্ক)-এর উপর ওয়াজিব।"
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য একটি হাদীসে, যা মালিক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সনদ ব্যতীত বর্ণিত, তাতে (তিনি বলেন): "প্রত্যেক বালেগের জন্য জুমু'আর দিনের গোসল, মিসওয়াক এবং যতটুকু সম্ভব সুগন্ধি ব্যবহার করা।"
অন্য এক বর্ণনায় (এসেছে): "যদি তা স্ত্রীর সুগন্ধিও হয়।" (এই সবগুলো সহীহ মুসলিমে বিদ্যমান।)
3146 - عن ابن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا جاء أحدكم الجمعة فليغتسل".
متفق عليه: رواه مالك في الجمعة (5)، عن نافعٍ، عن ابن عمر. فذكره.
ورواه البخاري في الجمعة (877)، عن عبد الله بن يوسف، عن مالك.
وأخرجه مسلم في الجمعة (844)، من غير طريق مالك، وفيه: إذا أراد أحدكم أن يأتي الجمعة فليغتسل".
وفي رواية عند البخاريّ (919)، ومسلم، كلاهما من وجهٍ آخر عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّه قال وهو قائم على المنبر: من جاء منكم الجمعة فليغتسل".
وأمَّا ما رواه ابن خزيمة (1752) وابن حبان (1226) من طريق عثمان بن واقد، حدثني نافع، عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أتى الجمعة من الرجال والنساء فليغتسل، ومن لم يأتها فليس عليه غسلٌ من الرجال والنساء".
فهو ضعيفٌ، عثمان بن واقد فيه كلامٌ، وقد استنكر الأئمة عليه هذا الحديث؛ فقال أبو داود:"هو ضعيف، حدث بحديث:"من أتي الجمعة من الرجال والنساء فليغتسل". ولا أحدًا قال هذا غيره". وقال البزار:"أخشى أن يكون عثمان بن واقد وهم فيه".
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন তোমাদের মধ্যে কেউ জুমু'আর (সালাতে) আসে, তখন সে যেন গোসল করে।"
3147 - عن ابن عمر، أنَّ عمر بن الخطاب بينما هو قائم في الخطبة يوم الجمعة إذ
دخل رجل من المهاجرين الأولِّين من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فناداه عمر: أيَّة ساعةٍ هذه؟ قال: إنِّي شُغِلتُ فلم أنقلِبْ إلى أهلي حتَّى سمعتُ التأذينَ، فلم أزد أن توضَّأتُ. فقال: والوضوء أيضًا؟ ! وقد علمت أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمرُ بالغسل.
متفقٌ عليه: رواه البخاري في الجمعة (878) من طريق مالك، ومسلم في الجمعة (845) من طريق يونس، كلاهما عن الزّهريّ، عن سالم بن عبد الله بن عمر، عن ابن عمر، فذكره.
والحديث في"الموطَّأ برواية يحي في كتاب الجمعة (3): عن الزّهريّ، عن سالم بن عبد الله، قال:"دخل رجلٌ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم …". وهو مرسلٌ؛ لأنَّ سالما لم يُدرك جدَّه عمر كما ذكره أبو زرعة، وغيره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জুমু'আর দিন খুতবায় দাঁড়ানো অবস্থায়, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাহাবীদের মধ্য থেকে প্রথম যুগের মুহাজিরদের একজন প্রবেশ করলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ডেকে জিজ্ঞেস করলেন: এটা কিসের সময় (অর্থাৎ এত দেরি কেন)? তিনি (আগন্তুক) বললেন: আমি ব্যস্ত ছিলাম, আযান না শোনা পর্যন্ত আমি আমার পরিবারের কাছে ফিরিনি। এরপর আমি শুধু উযু করে নিলাম। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: শুধু উযু? অথচ তুমি তো জানো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম গোসল করার নির্দেশ দিতেন।
