আল-জামি` আল-কামিল
3141 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يصوم أحدكم يوم الجمعة إلَّا يومًا قبله، أو بعده".
متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1985) ومسلم في الصيام (1144) كلاهما من حديث حفص بن غياث، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره. واللفظ للبخاري.
ولفظ مسلم:"لا يصم أحدكم يوم الجمعة إلَّا أن يصوم قبله أو بعده".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন জুমু‘আর দিন রোযা না রাখে, তবে তার একদিন আগে অথবা একদিন পরে (রোযা রাখলে সেটা ভিন্ন)।"
3142 - عن وعن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تختصُّوا الجمعة بقيام من بين الليالي، ولا تخصُّوا يوم الجمعة بصيام من بين الأيام. إلَّا أن يكون في صوم يصومه أحدكم".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1144) عن أبي كريب، حدّثنا حسين (يعني الجعفي) عن زائدة، عن هشام، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা অন্য রাতের তুলনায় জুমার রাতকে (বিশেষভাবে) কিয়ামুল লাইলের জন্য নির্দিষ্ট করো না এবং অন্য দিনের তুলনায় জুমার দিনকে (বিশেষভাবে) রোজা রাখার জন্য নির্দিষ্ট করো না। তবে যদি তোমাদের কারও এমন কোনো রোজা থাকে যা সে (এমনিতেই) পালন করে (আর সেটা জুমার দিনে পড়ে যায়, তাহলে ভিন্ন কথা)।"
3143 - عن محمد بن جعفر المخزومي، قال: لقي أبا هريرةَ رجل وهو يطوف بالبيت، فقال: يا أبا هريرة! أنت نهيت الناس عن صوم يوم الجمعة؟ قال: لا وربّ الكعبة! ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عنه.
صحيح: رواه الإمام أحمد (9097) عن يونس، حدّثنا المستور -يعني ابن عباد- حدّثنا محمد ابن جعفر المخزومي، فذكره.
وإسناده صحيح، والمستور -وقيل: المستورد بن عباد الهاني، وثَّقه ابن معين، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وصحَّحه ابن خزيمة (2157)، وابن حبان (3609) إلَّا أنَّهما روياه من وجهٍ آخر عن سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، أخبرني يحيي بن جعدة، أنَّه سمع عبد الله بن عمرو ابن عبد القاري يقول: سمعت أبا هريرة يقول، فذكر الحديث.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (7388).
وعبد الله بن عمرو بن عبد القاري لم يرو عنه سوى يحيى بن جعدة؛ ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول". أي حيث يتابع، وقد توبع في الإسناد السابق، وأخطأ من قال: عبد الرحمن
ابن عمرو القاري.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে বাইতুল্লাহ তাওয়াফরত অবস্থায় এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল, "হে আবু হুরায়রা! আপনি কি লোকজনকে জুমু‘আর দিনে সিয়াম পালন করতে নিষেধ করেছেন?" তিনি বললেন, "না, কা'বার রবের কসম! বরং আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামই তা নিষেধ করেছেন।
3144 - عن عبد الله بن مسعود قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم من غُرَّة كل شهرٍ ثلاثة أيام.
وفي رواية: قلمَّا رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يُفطر يوم الجمعة.
حسن: رواه أبو داود (2400) والترمذي (742) وابن ماجة (1725) كلهم من طريق شيبان،
عن عاصم، عن زر، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.
قال الترمذي:"حديث عبد الله حسن غريب، وقد استحبَّ قوم من أهل العلم صيام يوم الجمعة، وإنَّما يكره أن يصوم يوم الجمعة لا يصوم قبله ولا بعده، روي شعبة، عن عاصم هذا الحديث ولم يرفعه، وفي الباب عن ابن عمر، وأبي هريرة". انتهى.
وقد صححه أيضًا ابن خزيمة (2129) وابن حبان (3641) فروياه في صحيحيهما من هذا الوجه. قلت: وإسناده حسن؛ من أجل عاصم، وهو ابن أبي النجود، وهو حسن الحديث.
وأمَّا الاختلاف في رفعه ووقفه؛ فقال الحافظ الدارقطني في"العلل": (5/ 60):"رفعه صحيح".
وأمَّا معنى الحديث؛ فهو كما قال الترمذي: أنَّه صلى الله عليه وسلم كان يصوم الخميس والجمعة، وأمَّا إفراد يوم الجمعة فقد ثبت النهي عن ذلك.
وأما ما رُوي عن جنادة الأزدي، أنَّهم دخلوا على رسول الله صلى الله عليه وسلم ثمانية نفرٍ، هو ثامنهم. فقرَّب إليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم طعاما يوم الجمعة، فقال:"كلوا". قالوا: صيام. قال:"صمتم أمس؟". قالوا: لا. قال:"صائمون غدًا؟" قالوا: لا. قال:"فأفطروا". فهو ضعيف.
أخرجه النسائي في"الكبرى" (2786) وأحمد (24009/ 4) والطبراني في"الكبير" (2173) والحاكم (3/ 608) كلهم من طرق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد الله اليزني -أبي الخير، عن حذيفة البارقي، عن جنادة الأزدي، فذكره، واللفظ للنسائي.
وزاد البعض في المتن:"فأكلنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فلمَّا خرج وجلس على المنبر، والناس ينظرون، يُريهم أنَّه لا يصوم يوم الجمعة.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
والصواب أنَّه ليس على شرط مسلم؛ فإنَّ حذيفة البارقي، ويقال: الأزدي، لم يخرج له سوي النسائي، ولم يرو عنه غير مرثد بن عبد الله؛ ولذا قال فيه الذهبي:"مجهول". وقال الحافظ:"مقبول".
وأما قوله في"الفتح": (4/ 234): رواه النسائي بإسناد صحيح؛ فيبدوا أنَّه رحمه الله وهِمَ فيه.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس مرفوعا:"لا تصوموا يوم الجمعة وحده".
رواه أحمد (2615) عن عتَّاب بن زياد، قال: أخبرنا عبد الله، قال: أخبرنا الحسين بن عبد الله ابن عبيد الله بن عباس، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
والحسين بن عبد الله بن عبيد الله بن عباس بن عبد المطلب الهاشمي ضعيف.
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي هريرة مرفوعًا:"يوم الجمعة يوم عيد، فلا تجعلوا يوم عيدكم يوم صيامكم، إلَّا أن تصوموا قبله، أو بعده". رواه الإمام أحمد (8025) عن عبد الرحمن (ابن مهدي) عن معاوية، يعني ابن صالح، عن أبي بشر، عن عامر بن لُدين الأشعري، عن أبي هريرة، فذكره.
ومن هذا الطريق رواه الحاكم (1/ 437) وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه إلَّا أنَّ أبا بشر هذا لم أقف على اسمه، وليس ببيان بن بشر، ولا جعفر بن أبي وحشية". وقال الذهبي في تلخيصه:"هو مجهول".
وقال فيه الحافظ:"مقبولٌ إن كان هو مؤذن دمشق، وإن كان أبو بشر صاحب أبي الزاهرية فضعيف".
وقال ابن خزيمة في صحيحه (2162) بعد أن رواه من طريق ابن مهدي:"أبو بشر هذا شامي، ليس بأبي بشر جعفر بن أبي وحشية صاحب شعبة وهشيم".
الأرض ما أدركتَ فضلَ غدوتهم".
رواه الترمذي (527) عن أحمد بن منيع، حدَّثنا أبو معاوية، عن الحجاج، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه أحمد (1966) عن أبي معاوية بإسناده مثله.
قال الترمذي:"هذا حديث لا نعرفه إلَّا من هذا الوجه، قال علي بن المديني: قال يحيى بن سعيد: قال شعبة: لم يسمع الحكم من مقسم إلَّا خمسة أحاديث، وعدَّها شعبة، وليس هذا الحديث فيما عدَّ شعبة، وكأنَّ هذا الحديث لم يسمعه الحكم من مقسم". انتهى.
قلت: وفي سنده أيضًا الحجاج، وهو ابن أرطاة، وصف بكثرة الخطأ والتدليس وقد عنعن.
ثمَّ قال الترمذي:"وقد اختلف أهل العلم في السفر يوم الجمعة، فلم ير بعضهم بأسًا بأن يخرج يوم الجمعة في السفر، ما لم تحضر الصلاة. وقال بعضهم: إذا أصبح فلا يخرج حتَّى يصلي الجمعة، انتهي.
وكذلك لا يصح ما رُوي أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج مسافرًا يوم الجمعة ضحى قبل الصلاة.
رواه عبد الرزاق (5540) عن الثوري، عن ابن أبي ذئب، عن صالح بن كثير، عن الزهري، قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وهو مع إرساله فيه صالح بن كثير، وهو المدني"مقبول" كما في"التقريب".
ولكن ثبت عن عمر بن الخطاب أنَّه رأى رجلًا عليه ثياب سفرٍ، بعد ما قضى الجمعة، قال: ما شأنك؟ قال: أردت سفرًا، فكرهت أن أخرج حتَّى أصلِّي. فقال عمر: إن الجمعة لا تمنعك السفر ما لم يحضر وقتها.
رواه عبد الرزاق (5536) عن معمر، عن خالد الحذاء، عن ابن سيرين أو غيره، أنَّ عمر رأي رجلًا فذكره.
وفي رواية أخرى رواها عن الثوري، عن الأسود بن قيس، عن أبيه، قال: أبصر عمر بن الخطاب رجلًا عليه هيئة السفر، وقال الرجل: إنَّ اليوم يوم الجمعة، ولولا ذلك لخرجتُ. فقال عمر: إنَّ الجمعة لا تحبس مسافرًا، فاخرج ما لم يحن الرواح.
وخلاصة ما في هذا الباب: أنَّ المسافر إذا لم يَخَفْ فَوتَ رفقته فالأولى له أن يصلي إن دخل الوقت قبل شروعه في السفر، فإن خاف فوت رفقته، وانقطاعه بعدهم جاز له السفر مطلقًا؛ لأنَّ هذا عذر يُسقط الجمعة والجماعة. هذا ما رجَّحه الحافظ ابن القيم في"زاد المعاد" (1/ 383).
ويقاس عليه اليوم وسائل السفر التي ليست في اختيار المسافر.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক মাসের প্রথম দিকে তিন দিন সিয়াম পালন করতেন।
অপর এক বর্ণনায় এসেছে: জুমু‘আর দিনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সিয়াম ভঙ্গ করতে (রোজা না রাখতে) আমি খুব কমই দেখেছি।
3145 - عن أبي سعيد الخدري، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"غسل يوم الجمعة واجب على كل محتلم".
متفقٌ عليه: رواه مالك في الجمعة (4) عن صفوان بن سليم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد، فذكره.
ورواه البخاري في الجمعة (879)، عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في الجمعة (846)، عن يحيى بن يحيى، كلاهما عن مالكٍ.
وفي حديثٍ آخر لأبي سعيد الخدري من غير طريق مالكٍ:"غسل يوم الجمعة على كل محتلم، والسواك، ويمس من الطيب ما قدر عليه".
وفي رواية:"ولو من طيب المرأة". وكلُّها في صحيحٍ مسلمٍ. وستأتي.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "জুমু'আর দিন গোসল করা প্রতিটি বালেগ (প্রাপ্তবয়স্ক)-এর উপর ওয়াজিব।"
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য একটি হাদীসে, যা মালিক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সনদ ব্যতীত বর্ণিত, তাতে (তিনি বলেন): "প্রত্যেক বালেগের জন্য জুমু'আর দিনের গোসল, মিসওয়াক এবং যতটুকু সম্ভব সুগন্ধি ব্যবহার করা।"
অন্য এক বর্ণনায় (এসেছে): "যদি তা স্ত্রীর সুগন্ধিও হয়।" (এই সবগুলো সহীহ মুসলিমে বিদ্যমান।)
3146 - عن ابن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا جاء أحدكم الجمعة فليغتسل".
متفق عليه: رواه مالك في الجمعة (5)، عن نافعٍ، عن ابن عمر. فذكره.
ورواه البخاري في الجمعة (877)، عن عبد الله بن يوسف، عن مالك.
وأخرجه مسلم في الجمعة (844)، من غير طريق مالك، وفيه: إذا أراد أحدكم أن يأتي الجمعة فليغتسل".
وفي رواية عند البخاريّ (919)، ومسلم، كلاهما من وجهٍ آخر عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنَّه قال وهو قائم على المنبر: من جاء منكم الجمعة فليغتسل".
وأمَّا ما رواه ابن خزيمة (1752) وابن حبان (1226) من طريق عثمان بن واقد، حدثني نافع، عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أتى الجمعة من الرجال والنساء فليغتسل، ومن لم يأتها فليس عليه غسلٌ من الرجال والنساء".
فهو ضعيفٌ، عثمان بن واقد فيه كلامٌ، وقد استنكر الأئمة عليه هذا الحديث؛ فقال أبو داود:"هو ضعيف، حدث بحديث:"من أتي الجمعة من الرجال والنساء فليغتسل". ولا أحدًا قال هذا غيره". وقال البزار:"أخشى أن يكون عثمان بن واقد وهم فيه".
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন তোমাদের মধ্যে কেউ জুমু'আর (সালাতে) আসে, তখন সে যেন গোসল করে।"
3147 - عن ابن عمر، أنَّ عمر بن الخطاب بينما هو قائم في الخطبة يوم الجمعة إذ
دخل رجل من المهاجرين الأولِّين من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فناداه عمر: أيَّة ساعةٍ هذه؟ قال: إنِّي شُغِلتُ فلم أنقلِبْ إلى أهلي حتَّى سمعتُ التأذينَ، فلم أزد أن توضَّأتُ. فقال: والوضوء أيضًا؟ ! وقد علمت أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمرُ بالغسل.
متفقٌ عليه: رواه البخاري في الجمعة (878) من طريق مالك، ومسلم في الجمعة (845) من طريق يونس، كلاهما عن الزّهريّ، عن سالم بن عبد الله بن عمر، عن ابن عمر، فذكره.
والحديث في"الموطَّأ برواية يحي في كتاب الجمعة (3): عن الزّهريّ، عن سالم بن عبد الله، قال:"دخل رجلٌ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم …". وهو مرسلٌ؛ لأنَّ سالما لم يُدرك جدَّه عمر كما ذكره أبو زرعة، وغيره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জুমু'আর দিন খুতবায় দাঁড়ানো অবস্থায়, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাহাবীদের মধ্য থেকে প্রথম যুগের মুহাজিরদের একজন প্রবেশ করলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ডেকে জিজ্ঞেস করলেন: এটা কিসের সময় (অর্থাৎ এত দেরি কেন)? তিনি (আগন্তুক) বললেন: আমি ব্যস্ত ছিলাম, আযান না শোনা পর্যন্ত আমি আমার পরিবারের কাছে ফিরিনি। এরপর আমি শুধু উযু করে নিলাম। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: শুধু উযু? অথচ তুমি তো জানো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম গোসল করার নির্দেশ দিতেন।
3148 - عن وعن أبي هريرةَ أنَّ عمر بينما هو يخطب يوم الجمعة إذ دخل رجلٌ فقال عمر: لِم تحتبسون عن الصّلاة؟ فقال الرجلُ: ما هو إلَّا أن سمعتُ النداء توضَّأتُ. فقال: ألم تسمعوا النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا راح أحدكم إلى الجمعةِ فليغتسل".
متفقٌ عليه: رواه البخاري في الجمعة (882)، ومسلم في الجمعة (4/ 845) كلاهما من طريق يحيى بن أبي كثيرٍ، حدَّثني أبو سلمة بن عبد الرحمن، حدَّثني أبو هريرة، فذكر الحديث.
وفي مسلم أنَّ الداخل هو عثمان بن عفَّان. فقال عمر: ما بال الناس يتأخرون بعد النداء؟ فقال عثمان: يا أمير المؤمنين! ما زدتُ حين سمعتُ النداء أن توضَّأتُ ثمَّ أقبلتُ. فقال عمر: والوضوء أيضًا! ألم تسمعوا رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا جاء أحدكم إلى الجمعة فليغتسل".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জুমু‘আর দিন খুতবা দিচ্ছিলেন। এমন সময় একজন লোক প্রবেশ করলো। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: তোমরা সালাতে আসতে এতো দেরি করো কেন? লোকটি বলল: আমি আযান শোনার পরই কেবল ওযূ করে এসেছি। তখন তিনি বললেন: তোমরা কি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শোনোনি: “যখন তোমাদের কেউ জুমু‘আর দিকে যায়, তখন সে যেন গোসল করে নেয়।”
[হাদীসটি] মুত্তাফাকুন আলাইহি: এটি বুখারী জুমু‘আ অধ্যায়ে (৮৮২) এবং মুসলিম জুমু‘আ অধ্যায়ে (৪/৮৪৫) বর্ণনা করেছেন। উভয়েই ইয়াহইয়া ইবনু আবূ কাছীর-এর সূত্রে, তিনি আবূ সালামাহ ইবনু ‘আব্দুর রহমান থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।
সহীহ মুসলিমে আছে যে, প্রবেশকারী ব্যক্তি ছিলেন উসমান ইবনু আফ্ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: আযানের পরে লোকজনের এত দেরি হয় কেন? উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমীরুল মুমিনীন! আমি আযান শোনার পর ওযূ করে আগমন করা ছাড়া আর কোনো দেরি করিনি। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কেবল ওযূ করা! তোমরা কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শোনোনি: “যখন তোমাদের কেউ জুমু‘আর দিকে আসে, তখন সে যেন গোসল করে নেয়?”
3149 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"حقٌّ لله على كلِّ مسلمٍ أن يغتسلَ في كلِّ سبعة أيَّامٍ، يغسل رأسَه وجسده".
متفق عليه: رواه مسلم في الجمعة (849) عن محمد بن حاتم، ثنا بهز، ثنا وُهَيب، ثنا عبد الله ابن طاوس، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
ورواه البخاري (896) في سباق أطول عن مسلم بن إبراهيم، قال: حدّثنا وهيب بإسناده، وأوله عنده:"نحن الآخرون السابقون يوم القيامة، أوتوا الكتاب من قبلنا، وأوتيناه من بعدهم، فهذا اليوم الذي اختلفوا فيه، فهدانا الله، فغدًا لليهود، وبعد غدٍ للنصاري". فمكث ثمَّ قال:"حق على كلِّ مسلمٍ أن يغتسل …". فذكر مثله.
وقوله:"فمكث": أي النبي صلى الله عليه وسلم؛ لأن الجملة الثانية أيضًا مرفوع بدليل ما رواه البخاري في كتاب الأنبياء (3486)، وليس فيه:"فمكث".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: প্রত্যেক মুসলমানের উপর আল্লাহর পক্ষ থেকে এটি একটি অপরিহার্য অধিকার যে, সে যেন প্রতি সাত দিনে একবার গোসল করে, তার মাথা ও শরীর ধৌত করে।
3150 - عن طاوس قال: قلت لابن عباس: ذكروا أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"اغتسلوا يوم الجمعة، واغسلوا رؤوسكم وإن لم تكونوا جنبًا، وأصيبوا من الطيب".
قال ابن عباس: أمَّا الغسل فنعم، وأمَّا الطيب فلا أدري.
وفي رواية عن طاوس، عن ابن عباس: أنَّه ذكر قول النبي صلى الله عليه وسلم في الغسل يوم الجمعة. فقلت لابن عباس: أيمس طيبًا أو دهنًا إن كان عند أهله؟ فقال:"لا أعلمه". كلها في صحيح البخاري.
متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (884، 885) ومسلم في الجمعة (848) كلاهما من طريق طاوس، عن ابن عباس، أنَّه ذكر قول النبي صلى الله عليه وسلم في الغسل يوم الجمعة، قال طاوس: فقلت لابن عباس: ويمس طيبًا أو دُهنًا إن كان عند أهله؟ قال: لا أعلمه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাউস বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: লোকেরা বর্ণনা করে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা জুমু'আর দিনে গোসল করো, এবং তোমাদের মাথা ধৌত করো—যদি তোমরা জুনুব (অপবিত্র) নাও থাকো—আর সুগন্ধি ব্যবহার করো।"
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "গোসলের বিষয়টি হ্যাঁ (সঠিক), কিন্তু সুগন্ধির বিষয়টি আমি জানি না।"
তাউস থেকে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অপর এক বর্ণনায় এসেছে যে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জুমু'আর দিনের গোসল সম্পর্কিত বাণী উল্লেখ করলেন। তাউস বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: সে কি সুগন্ধি অথবা তেল ব্যবহার করবে, যদি তা তার পরিবারের কাছে থাকে? তিনি বললেন: "আমি তা জানি না।"
3151 - عن عكرمة أَنَّ أُنَاسًا مِنْ أَهْلِ الْعِرَاِق جَاءُوا، فَقَالُوا: يَا ابْنَ عَبَّاس! أَتَرَي الْغُسْلَ يَوْمَ الْجُمُعَةِ وَاجِبًا؟ قَالَ: لَا وَلَكِنَّهُ أَطْهَرُ وَخَيْرٌ لِمَنِ اغْتَسَلَ، وَمَنْ لَمْ يَغْتَسِلْ فَلَيْسَ عَلَيْهِ بِوَاجِبٍ، وَسَأُخْبِرُكُمْ كَيْفَ بَدْءُ الْغُسْلِ: كَانَ النَّاسُ مَجْهُودِينَ يَلْبَسُونَ الصُّوفَ وَيَعْمَلُونَ عَلَى ظُهُورِهِمْ، وَكَانَ مَسْجِدُهُمْ ضَيِّقًا مُقَارِبَ السَّقْفِ إنَّمَا هُوَ عَرِيشٌ، فَخَرَجَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِي يَوْم حَارٍّ وَعَرِقَ النَّاسُ فِي ذَلِكَ الصُّوفِ حَتَّى ثَارَتْ مِنْهُمْ رِياحٌ آذَى بذَلِكَ بَعْضُهُمْ بَعْضًا، فَلَمَّا وَجَدَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم تِلْكَ الرِّيحَ قَالَ:"أَيُّهَا النَّاسُ! إِذَا كَانَ هَذَا الْيَوْمُ فَاغْتسِلُوا، وَلَيَمَسَّ أَحَدُكُمْ أَفْضَلَ مَا يَجِدُ مِنْ دَهْنِهِ وَطِيبِهِ". قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ: ثُمّ جَاءَ اللهُ بِالْخَيْرِ، وَلَبِسُوا غَيْرَ الصُّوفِ، وَكُفُوا الْعَمَلَ، وَوُسِّعَ مَسْجِدُهُمْ، وَذَهَبَ بَعْضُ الَّذِي كَانَ يُؤْذِي بَعْضُهُمْ بَعْضًا مِن الْعَرَقِ.
حسن: رواه أبو داود (353) وأحمد (2419) وصححه ابن خزيمة (1755) والحاكم (1/ 281، 282) كلهم من طريق عمرو بن أبي عمرو، عن عكرمة، فذكره، واللفظ لأبي داود.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن أبي عمرو فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
আবদুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইরাকের কিছু লোক এসে বলল: হে ইবন আব্বাস! আপনি কি মনে করেন যে জুমু‘আর দিন গোসল করা ওয়াজিব? তিনি বললেন: না, (ওয়াজিব নয়)। তবে যে গোসল করে, তার জন্য এটি অধিক পবিত্র ও উত্তম। আর যে গোসল করে না, তার উপর তা ওয়াজিব নয়। আমি তোমাদেরকে বলবো, গোসলের শুরুটা কেমন ছিল:
মানুষজন কষ্টকর জীবন যাপন করত। তারা পশমের কাপড় পরিধান করত এবং পিঠে (ভারী) কাজ করত। তাদের মসজিদ ছিল সংকীর্ণ, ছাদও ছিল নিচু। সেটি ছিল কেবল একটি ছাউনি। এরপর এক গরমের দিনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মসজিদে) বের হলেন। সেই পশমী কাপড়ের কারণে মানুষের শরীর থেকে প্রচুর ঘাম বের হচ্ছিল, এমনকি তাদের থেকে এমন দুর্গন্ধ সৃষ্টি হলো যে তার দ্বারা একে অপরের কষ্ট হচ্ছিল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই গন্ধ পেলেন, তখন তিনি বললেন: “হে লোক সকল! যখন এই দিনটি (জুমু‘আর দিন) আসে, তখন তোমরা গোসল করো। আর তোমাদের প্রত্যেকে যেন তার কাছে থাকা উত্তম তেল ও সুগন্ধি ব্যবহার করে।”
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আল্লাহ তা‘আলা প্রাচুর্য দান করলেন। ফলে তারা পশম ব্যতীত অন্য কাপড় পরিধান করল, কাজ করা থেকে বিরত হলো, তাদের মসজিদ প্রশস্ত করা হলো এবং ঘামের কারণে একে অপরের যে কষ্ট হচ্ছিল, তা অনেকটা দূর হয়ে গেল।
3152 - عن ابن عباس رضي الله عنهما، قال: جاء رجلٌ والنبي يخطب يوم الجمعة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يلهو أحدكم حتى إذا كادت الجمعة تفوته جاء يتخطى رقاب الناس يؤذيهم!".
فقال: ما فعل يا نبيَّ الله! ولكن كنتُ راقدًا ثم استيقظت فقمت وتوضأت، ثم أقبلتُ. فقال النبيُّ:"أوَ يوم وضوء هذا؟ !".
حسن: رواه محمد بن أبي عمر العدني في مسنده (720 - المطالب)، ومن طريقه الطبراني في الأوسط (975 - مجمع البحرين)، ثنا بشر بن السري، ثنا عمر بن الوليد الشني، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
قال الطبراني:"لم يروه عن عكرمة إلَّا عمر بن الوليد، ولا عنه إلَّا بشر، تفرَّد به العَدَني". وقال ابن حجر:"رجاله ثقات إلَّا عمر، ففيه مقالٌ". وقال البوصيري:"رواه ابن أبي عمر، ورجاله ثقات".
قلت: إسناده حسن، رجاله ثقات معروفون إلَّا عمر بن الوليد؛ فهو صدوق في أقلِّ أحواله. قال النسائي:"ليس بالقوي". وليَّنه القطان فقال:"ليس هو عندي ممن أعتمد عليه، ولكنَّه لا بأس به".
ووثَّقه أحمد وابن معين وأبو زرعة، وقال أبو زرعة:"ما أرى بحديثه بأسًا، وعامة حديثه عن عكرمة فقط، قلَّ ما يجاوز به إلى ابن عباسٍ، لا يُشبه شبيب بن بِشر الذي جعل عامة حديثه موصولًا".
قلت: هذا الكلام يدل على تثبُّته وحفظه لما يرفعه عن عكرمة، عن ابن عباسٍ. وذكره أيضًا ابن حبان، وابن شاهين في"الثقات". فهو حسن الحديث إن شاء الله.
وأمَّا قول الطبراني:"تفرد به العدني". فالعدني هو محمد بن يحيى بن أبي عمرو العدني، صاحب المسند المعروف، وثَّقه ابن معين والدارقطني، واحتجَّ به مسلمٌ في"الصحيح"، وكان الإمام أحمد يحث أهل الحديث على الأخذ عنه، وذكره ابن حبان في الثقات، فمثل هذا لا يضرُّ تفرُّده، ولكن قال أبو حاتم الرازي:"كانت فيه غفلةٌ". والله أعلم.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি আসলেন যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিন খুতবা দিচ্ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের কেউ কেউ খেল-তামাশায় মেতে থাকে, এমনকি যখন জুমু‘আ প্রায় ফوت হওয়ার উপক্রম হয়, তখন সে লোকজনের ঘাড় ডিঙিয়ে আসতে থাকে এবং তাদের কষ্ট দেয়!"
লোকটি বললেন: হে আল্লাহর নবী! আমি তো (খেলতামাশা) করিনি! বরং আমি ঘুমিয়ে ছিলাম, তারপর ঘুম থেকে উঠলাম, এরপর দাঁড়ালাম এবং ওযু করলাম, তারপর (মসজিদের দিকে) রওনা হলাম।
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা কি শুধু ওযু করার দিন (সময়)?"
3153 - عن عائشة قالت: كان الناس ينتابون يوم الجمعة من منازلهم، والعوالي، فيأتون في الغبار، يصيبهم الغبار والعرق، فيخرج منهم العرق، فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم إنسان منهم وهو عندي، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لو أنَّكم تطهَّرتم ليومكم هذا".
متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (902) واللفظ له، ومسلم في الجمعة (847)، كلاهما من طريق عبد الله بن أبي جعفر، أنَّ محمد بن جعفر بن الزبير حدَّثه، عن عروة بن الزبير، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرته.
وفي مسلم:"فيأتون في العباء".
قال الحافظ في"الفتح": وهو أصوب.
وفي رواية أخرى عند مسلمٍ: قالت عائشة:"كان الناس أهل عملٍ، ولم يكن لهم كُفاةٌ، فكانوا يكون لهم تَفَلٌ. فقيل لهم: لو اغتسلتم يوم الجمعة". وفي رواية عند البخاري (903):"كان الناس مَهَنة أنفسهم، وكانوا إذا راحوا إلى الجمعة راحوا في هيئتهم، فقيل لهم:"لو اغتسلتم".
قوله:"كُفاة": جمع كافٍ، كقضاة جمع قاضٍ، وهم الخَدَم الذين يكفونهم العمل.
و"تَفَلٌ": أي رائحة كريهةٌ.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা জুম্মার দিনে তাদের নিজ নিজ ঘর এবং আল-আওয়ালী (মদীনার নিকটবর্তী উঁচু এলাকা) থেকে পালাক্রমে (বা নিয়মিত) আসত। তারা আসত ধূলার মধ্যে, আর তাদের উপর ধুলা ও ঘাম লাগত। ফলে তাদের শরীর থেকে ঘাম বের হতো। তখন তাদের মধ্য হতে একজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসল, আর সে তখন আমার কাছেই ছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তোমরা আজকের দিনের (জুম্মার) জন্য পবিত্রতা অর্জন (গোসল) করে নিতে!"
3154 - عن عبد الله بن أبي قتادة قال: دخل عليَّ أبي وأنا أغتسل يوم الجمعة فقال: غسلك هذا من جنابة أو للجمعة؟ قلت: من جنابة، قال: أعِد غسلًا آخر؛ إنِّي سمعت
رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من اغتسل يوم الجمعة كان في طهارة إلى الجمعة الأخرى".
حسن: رواه الطبراني في الأوسط"مجمع البحرين" (968): ثنا موسي بن هارون، ثنا سُرَيج ابن يونس، ثنا هارون بن مسلم العجلي البصري، ثنا أبان بن يزيد، عن يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة، فذكره.
وإسناده حسن، رجاله ثقات غير هارون بن مسلم العجلي، وهو صدوق حسن الحديث، ومدار الحديث عليه، قال الطبراني:"لم يروه عن يحيى إلَّا أبان، ولا عنه إلَّا هارون". وقد صحح هذا الحديث ابن خزيمة (1760) وابن حبان (1222) والحاكم (1/ 282) فأخرجوه من طريق هارون ابن مسلم به. قال ابن خزيمة:"هذا حديث غريبٌ، لم يروه غير هارون".
وقال الحاكم:"هذا حديث على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه …". وهو ليس كذلك؛ فلم يُخرج الشيخان لهارون هذا شيئًا، بل ولا أحد من أصحاب الأصول الستَّة، وإن كان حديثُه حسنًا. وأورده المنذري في"الترغيب" (1063) وقال:"إسناده قريبٌ من الحسن".
قوله:"كان في طهارةٍ إلى الجمعة الأخرى": وعند ابن حبان:"لم يزل طاهرًا إلى الجمعة الأخرى". قال ابن حبان:"يريد من الذنوب؛ لأنَّ من حضر الجمعةَ بشرائطها غُفر له ما بينها وبين الجمعة الأُخرى".
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী কাতাদা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জুমু'আর দিন গোসল করছিলাম, তখন আমার বাবা আমার কাছে আসলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তোমার এই গোসল কি জানাবাত (নাপাকী) থেকে পবিত্রতার জন্য, নাকি জুমু'আর জন্য? আমি বললাম: জানাবাত থেকে। তিনি বললেন: অন্য আরেকটি গোসল করো; কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি জুমু'আর দিন গোসল করে, সে পরবর্তী জুমু'আ পর্যন্ত পবিত্রতার মধ্যে থাকে।"
3155 - عن سمرةَ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من توضأ يوم الجمعة فبها ونعمت، ومن اغتسل فهو أفضل".
صحيح: رواه أبو داود (354) والترمذي (417) والنسائي (1379) كلهم من طرق عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة، فذكر مثله.
وإسناده صحيح، وإن كان قتادة مدلِّسًا إلَّا أنَّه روى عنه شعبة في بعض طرقه، وهو القائل:"كفيتكم تدليس ثلاثة: الأعمش، وأبي إسحاق، وقتادة".
وأمَّا الحسن؛ فاخْتُلف في سماعه من سمرة، والذي رجَّحته تبعًا لابن المديني، والبخاري وغيرهما: أنَّه سمع منه مطلقًا، وقال ابن دقيق العيد في الإلمام:"من يحمل رواية الحسن عن سمرة على الاتصال يُصحِّح هذا الحديث". ونقل ابن الملقن، أنَّ أبا حاتم صحَّح هذا الحديث من طريقيه؛ أعني الاتصال، والإرسال، وذكر ابنه عنه أنه قال:"هما جميعًا صحيحان".
انظر"البدر المنير" (4/ 651).
وصحَّحه أيضًا ابن خزيمة (1757)؛ فرواه من طريق شعبه، عن قتادة به مثله.
قال الترمذي:"حديث سمرة حديث حسن، وقد روى بعض أصحاب قتادة هذا الحديث عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة، ورواه بعضهم عن قتادة، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا".
قلت: من رواه موصولًا ثقات؛ فلا تضرُّ رواية من رواه مرسلًا.
وأمَّا ما رُويَ عن البراء بن عازب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حق على المسلمين أن يغتسلوا
يوم الجمعة، وليمَسَّ أحدهم من طيب أهله، فإن لم يجد فالماء له طيبٌ".
فهو ضعيف؛ رواه الترمذي (528): عن علي بن الحسن، ثنا أبو يحيى إسماعيل بن إبراهيم التيمي، عن يزيد بن أبي زيادٍ، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن البراء فذكره.
وهذا إسناد ضعيفٌ؛ إسماعيل بن إبراهيم التيمي ضعيف، إلَّا أنَّه لم ينفرد به، فقد رواه الترمذي (529) وأحمد (18488) والطحاوي في"شرح معاني الآثار" (1/ 116) كلهم من طريق هُشيم، عن يزيد بن أبي زيادٍ به. وصرَّح هشيم بالتحديث في رواية الطحاوي، لكن مداره على يزيد بن أبي زياد، وهو الهاشمي مولاهم الكوفي، ضعيف، كبر فتغيَّر، وصار يتلقَّن، وكان شيعيًّا.
وللحديث أسانيد أخرى ولكنَّها تدور على يزيد بن أبي زيادٍ، ولذا قال الطبراني في"المعجم الأوسط" (813):"لم يُروَ هذا الحديثُ عن البراء إلَّا بهذا الإسناد، تفرَّد به يزيد بن أبي زيادٍ.
সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি জুমু'আর দিনে শুধু ওযু করে, তবে তা যথেষ্ট এবং উত্তম। আর যে ব্যক্তি গোসল করে, তবে তা অধিক উত্তম।”
3156 - عن أبي سعيد قال: شهدت على رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"غسل يوم الجمعة واجب على كل محتلم، وأن يستنَّ، وأن يمسَّ طيبًا إن وجدَ".
متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (880) من طريق شعبة، عن أبي بكر بن المنكدر، حدَّثني عمرو بن سُليم الأنصاري، قال: أشهد على أبي سعيد قال: أشهد على رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قال عمرو: أمَّا الغسل فأشهد أنَّه واجبٌ، وأمَّا الاستنان والطيبُ؛ فالله أعلم أواجبٌ هو أم لا، ولكن هكذا في الحديث.
ورواه مسلم في الجمعة (846) من طريق عمرو بن الحارث أنَّ سعيد بن أبي هلالٍ وبكير بن الأشج حدَّثاه عن أبي بكر بن المنكدر، عن عمرو بن سُلَيم، عن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري، عن أبيه، فذكر مثله.
قال مسلمٌ:"إلَّا أنَّ بُكيرًا لم يذكر: (عبد الرحمن). وقال في الطّيب: (ولو من طيب المرأةِ)". انتهى.
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর পক্ষ থেকে সাক্ষ্য দিচ্ছি যে তিনি বলেছেন: "জুমুআর দিনের গোসল প্রত্যেক বালেগের উপর ওয়াজিব, আর সে যেন মিসওয়াক করে এবং সুগন্ধি পেলে তা ব্যবহার করে।"
3157 - عن سلمان الفارسي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يغتسل رجل يوم الجمعة ويتطهَّر ما استطاع من طهرٍ، ويدَّهِن من دُهنه، أو يمسَّ من طيب بيته، ثمَّ يخرج فلا يُفرِّق بين اثنين، ثم يصلِّي ما كُتب له، ثم يُنصِت إذا تكلَّم الإمام، إلَّا غُفِر له ما بينه وبين الجمعة الأخرى".
صحيحٌ: رواه البخاري في الجمعة (883) من طريق سعيد المقبري، عن أبيه، عن ابن وديعة، عن سلمان الفارسي، فذكره.
সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে কোনো ব্যক্তি জুমু'আর দিন গোসল করে এবং যতদূর সম্ভব পবিত্রতা অর্জন করে, আর তার তেল ব্যবহার করে অথবা তার ঘরের সুগন্ধি থেকে কিছু ব্যবহার করে, অতঃপর (মসজিদে) বের হয়ে দু'জনের মাঝে ফাঁক সৃষ্টি করে না, এরপর সে তার জন্য নির্ধারিত (নফল) সালাত আদায় করে, অতঃপর ইমাম যখন কথা বলেন (খুতবা দেন), তখন সে চুপ থাকে (ও মনোযোগ সহকারে শোনে), তার এই জুমু'আ ও পরবর্তী জুমু'আর মধ্যবর্তী সময়ের গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।
3158 - عن أبي ذر، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، قال:"من اغتسل يوم الجمعة فأحسن غسله، وتطهَّر فأحسن طهوره، ولبس من أحسن ثيابه، ومسَّ ما كتب الله له من طيب أهله، ثمَّ أتي
الجمعةَ، ولم يَلْغُ، ولم يفرق بين اثنين، غُفر له ما بينه وبين الجمعة الأخرى".
حسن: رواه ابن ماجة (1097) من طريق يحيى القطَّان، عن محمد بن عجلان، عن سعيد المقبري، عن أبيه، عن عبد الله بن وديعة، عن أبي ذرٍّ، فذكره.
وإسناده حسنٌ، من أجل بن عجلان؛ فإنَّه صدوق. قال البوصيري:"هذا إسناد صحيحٌ، رجاله ثقات". وصحَّحه أيضًا ابن خزيمة (1763).
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি জুমুআর দিন গোসল করল এবং উত্তমরূপে গোসল করল, আর পবিত্রতা অর্জন করল এবং উত্তমরূপে পবিত্রতা অর্জন করল, আর তার সর্বোত্তম পোশাক পরিধান করল, এবং তার পরিবারের জন্য আল্লাহ যা নির্দিষ্ট করেছেন তা থেকে সুগন্ধি ব্যবহার করল, তারপর জুমুআর সালাতে আসল, আর অনর্থক কাজ করল না এবং দুইজনের মাঝে ব্যবধান সৃষ্টি করল না, তাহলে এই জুমুআ এবং পরবর্তী জুমুআর মধ্যবর্তী সময়ের গুনাহসমূহ তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হবে।
3159 - عن رجلٍ من الأنصار من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم، قال:"حق على كل مسلم يغتسل يوم الجمعة، ويتسوَّك، ويمسُّ من طيبٍ إن كان لأهله".
صحيحٌ: رواه الإمام أحمد (16398) عن عبد الرحمن، عن سفيان، عن سعد بن إبراهيم، عن محمد ابن عبد الرحمن بن ثوبان، عن رجل من الأنصار من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره. وإسناده صحيح.
وهذا الحديث ممَّا خالف فيه شعبة سفيان؛ فرواه شعبة، عن سعد بن إبراهيم قال: سمعت محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان يحدِّث عن رجلٍ من الأنصار، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. فزاد في الإسناد رجلًا من الأنصار. كذا أخرجه أحمد (16397) وأبو يعلي (7132) كلاهما من طريق شعبة.
وسفيان وشعبة إماما عصرهما، لكن إذا اختلفا فالقول فول سفيان؛ فإنَّه أحفظ الرجلين. قال يحيى القطَّان:"ليس أحد أحبُّ إليَّ من شعبة، ولا يعدله أحد عندي، وإذا خالفه سفيان أخذت بقول سفيان". وقال أبو داود:"ليس يختلف سفيان وشعبة في شيءٍ إلَّا يظفر به سفيان، خالفه في أكثر من خمسين حديثًا القول قول سفيان".
আনসারী একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক মুসলিমের উপর জুমআর দিন গোসল করা, মিসওয়াক করা এবং তার পরিবারে সুগন্ধি থাকলে তা ব্যবহার করা কর্তব্য।"
3160 - عن ابن عمر، أنَّ عمر بن الخطاب رأي حُلَّةً سِيراء تُباعُ عند باب المسجدِ، فقال: يا رسولَ الله! لو اشتريت هذه الحلة فتلبسها يوم الجمعةِ وللوفدِ إذا قدِموا عليك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّما يلبس هذه من لا خلاق له في الآخرةِ". ثمَّ جاء رسولَ الله منها حُلَلٌ، فأعطى عمر بن الخطاب منها حُلَّةً فقال عمرُ: يا رسولَ الله! أَكَسَوْتنيها وقد قلت في حُلَّة عُطارِد ما قُلتَ؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"لم أُكسِكها لتلبسَها". فكساها عمر أخًا له مشركًا.
متفق عليه: رواه مالكٌ في اللباس (18) عن نافعٍ، عن ابن عمرَ، فذكره.
ورواه البخاري في الجمعة (886) عن عبد الله بن يوسف. ومسلم في اللباس (2068) عن يحيى بن يحيي كلاهما عن مالكٍ.
وأمَّا ما رُوي عن عبد الله بن سلام مرفوعًا:"ما على أحدكم إن وجد" أو"ما على أحدكم إن
وجدتم أن يَتَّخِذَ ثوبين ليوم الجمعةِ سوى ثوبي مِهنته".
ففيه انقطاعٌ؛ رواه أبو داود (1078) وابن ماجةَ (1095) كلاهما من طريق موسي بن سعد، عن محمد بن يحيى بن حَبَّان، عن عبد الله بن سلام، فذكره.
وهذا إسنادٌ رجاله ثقات إلَّا أنَّ فيه انقطاعًا؛ فقد اتفقوا على أنَّ عبد الله بن سلام توفي سنةَ 43، وتوفي محمد بن يحيى بن حَبَّان سنة 121، وكان عمره 74 سنةً، فهذا يعني أنَّه وُلد سنة 47، أي بعد وفاةِ ابن سلام بأربع سنين، فهو على هذا لم يُدركهـ قطعًا.
وقد رُوي هذا الحديث أيضًا عن محمد بن يحيى بن حَبَّان مرسلًا عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم
أخرجه أبو داود من طريق يحيي بن سعيد الأنصاري عنه.
ورُوي من وجهٍ آخر عن محمد بن يحيى بن حَبَّان، عن يوسف بن عبد الله بن سلام، عن أبيه. رواه ابن ماجةَ من طريق أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا شيخٌ لنا، عن عبد الحميد بن جعفر، عن محمد ابن يحيى بن حَبَّان بإسناده.
وهذا إسناد ضعيف؛ لجهالة الشيخ المبهم.
ورُوي من وجهٍ آخر عن يوسف بن عبد الله بن سلام، عن النبي صلى الله عليه وسلم. يعني بدون واسطة أبيه. وهذا أيضًا مرسل؛ لأنَّ يوسف بن عبد الله بن سلام من أولاد الصحابة الذين يُحتمل أنَّهم وُلدوا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يثبت لهم منه صلى الله عليه وسلم سماعٌ، وقد ذكره بعضهم في التابعين.
ورُوي عن عائشةَ أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم خطب يوم الجمعة، فرأى عليهم ثياب النمار، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"ما على أحدكم إن وجد سعةٌ أن يتَّخذ ثوبين لجمعته، سوى ثوبي مِهنته".
أخرجه ابن ماجة (1096) من طريق عمرو بن أبي سلمة، عن زهير، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشةَ، فذكرته.
وفي إسناده عَمرو بن أبي سلمة، وهو التنيسي، صدوق، إلَّا أنَّ روايته عن زهير ضعيفةٌ: ضعَّفه ابن معين، وقال أبو حاتم:"يُكتب حديثه ولا يُحتجُّ به". وقال العقيلي:"في حديثه وهمٌ". ولعلَّ هذا القول الإمام أحمد:"روى عن زهير أحاديثَ بواطيلَ، كأنَّه سمِعها من صدقةَ بن عبد الله، فغلِط فقلبها عن زهير".
قلت: وصدقة بن عبد الله ضعيف، فهذا يدلُّ على أنَّ ما تفردَّ به عمرو بن أبي سلمة عن زهير خاصة لا يكون صحيحًا ولا حسنًا، ولعلَّ من صحَّح هذا الحديثَ لم يتنبَّه لهذه العلَّةِ. والله الموفِّق.
وقد أخرجه ابن خزيمة (1765)، وعنه ابن حبان (2777) في صحيحيهما من هذا الطريق.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদের দরজায় রেশমী কাপড়ের একটি জোড়া (হুল্লা সিয়ারা) বিক্রি হতে দেখলেন। তিনি বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি যদি এই জোড়াটি ক্রয় করতেন এবং তা জুমআর দিনে ও আপনার কাছে আগমনকারী প্রতিনিধি দলের জন্য পরিধান করতেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি আখিরাতে তার কোনো অংশ (সৌভাগ্য) চায় না, সেই কেবল এটি পরিধান করে।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ওই ধরনের কিছু পোশাক এলো। তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সেগুলোর মধ্যে থেকে একটি পোশাক দিলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি আমাকে এটি পরার জন্য দিলেন, অথচ আপনি উতারিদের পোশাক সম্পর্কে যা বলার তা বলেছিলেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি তোমাকে এটি পরিধানের জন্য দিইনি।" অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পোশাকটি তাঁর এক মুশরিক ভাইকে পরিধান করতে দিলেন।