হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3208)


3208 - عن أُبَي بن كعبٍ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ يوم الجمعة تبارك، وهو قائم، فذكَّرنا بأيَّام الله، وأبو الدرداء أو أبو ذرٍّ يغمِزني فقال: متى أُنزلت هذه السورة؟ إنِّي لم أسمعها إلَّا
الآن، فأشار إليه أَن اسكتْ، فلمَّا انصرفوا قال: سألتك متى أُنزلت هذه السورة فلم تخبرني؟ فقال أُبَي: ليس لك من صلاتك اليوم إلَّا ما لغوت، فذهب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، وأخبره بالذي قال أُبَي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صدق أُبَي".

حسن: رواه ابن ماجه (1111) وأحمد (21287) كلاهما من حديث عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن شريك بن عبد الله بن أبي نَمِر، عن عطاء بن يسار، عن أبي بن كعب، فذكره، واللفظ لابن ماجه. وعند أحمد: قرأ يوم الجمعة براءة.

وإسناده حسن؛ لأنَّ الدراوردي، وشريكًا صدوقان، وقال البوصيري:"هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات".

وحسَّن إسناده المنذري في الترغيب، ورواه ابن خزيمة (1807) والحاكم (1/ 287) كلاهما من طريق محمد بن جعفر، عن شريك، عن عطاء، عن أبي ذر فذكر نحوه، إلَّا أنَّه ذكر سورة براءة أيضا بدل سورة الملك.

وإسناد ابن خزيمة والحاكم صحيح، رجاله كلهم ثقات، قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه".

وقال الذهبي:"ما أحسب عطاء أدرك أبا ذر".

قلت: أبو ذر توفي سنة (32)، وكان مولد عطاء سنة (19) فلا يبعد إدراكه إياه. والله أعلم.

وقد رُوي هذا الحديث من وجوهٍ أُخرى مُختلفة أشار إليها البيهقي في السنن الكبرى (3/ 220).

ورُوي من حديث أبي الدرداء، قال:"جلس رسول الله صلى الله عليه وسلم يومًا على المنبر، فخطب الناسَ، وتلا آية وإلى جنبي أبي بن كعب …". فذكر نحوه. وزاد في آخره: فقال: (يعني رسول الله صلى الله عليه وسلم):"صدق أبي، فإذا سمعت إمامك يتكلَّم فأنصت حتَّى يفرغَ".

أخرجه الإمام أحمد (21730): عن مكي، ثنا عبد الله بن سعيد، عن حرب بن قيس، عن أبي الدرداء.

وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات، إلَّا أنَّه منقطع؛ حرب بن قيس لم يسمع من أبي الدرداء، قال أبو حاتم:"لم يدرك أبا الدرداء، وهو مرسل، وهو في سن مالك بن أنس"."تحفة التحصيل: 63".

ولا يصح ما رُوي عن أبي هريرةَ، قال: بينما رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب يوم الجمعة إذ قال أبو ذر لأُبي بن كعب …" وذكر نحوه.

رواه الطيالسي في مسنده (2486) والبزار (643 - كشف الأستار) من طريق أسود بن عامر، كلاهما عن حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرةَ.

والصحيح أنَّ هذا الحديث يرويه أبو سلمة مرسلًا، لا يذكر فيه أبا هريرة. انظر"العلل" للدارقطني (8/ 51).

وأمَّا ما رُوي عن جابر بن عبد الله الأنصاري أنَّه قال: دخل عبد الله بن مسعود المسجد والنبي صلى الله عليه وسلم -
يخطب، فجلس إلى جنب أبي بن كعب، فسأله عن شيءٍ، أو كلَّمه عن شيءٍ، فلم يرد عليه، فظنَّ ابن مسعود أنَّه موجِدة، فلمَّا انفتل النبي صلى الله عليه وسلم من صلاته قال ابن مسعود:"يا أُبي! ما منعك أن تردَّ عليَّ؟ قال: إنَّك لم تحضر معنا الجمعةَ، قال: بمَ؟ قال: تكلَّمت والنبي صلى الله عليه وسلم يخطب. فقام ابن مسعود فدخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صدق أُبي، أَطع أُبيًّا". فهو ضعيف.

رواه أبو يعلى (364 - المقصد العلي) ومن طريقه ابن حبان (2794) والطبراني في"الأوسط" (992 - مجمع البحرين) من طريق يعقوب القمي، عن عيسى بن جارية، عن جابر.

قال الهيثمي:"رواه أبو يعلى والطبراني في"الأوسط" بنحوه، وفي"الكبير" باختصار، ورجال أبي يعلى ثقات".

قلت: بل مداره على عيسى بن جارية، وهو ضعيف؛ ضعفه ابن معين، وأبو داود، والنسائي، وقال:"منكر الحديث".

وقال ابن عدي:"أحاديثه غير محفوظة".

قلت: وهذا الحديث كما قال ابن عدي غير محفوظ؛ لأنَّ هذه القصَّة إنَّما وقعت بين أبي الدرداء وأبي، وذكر ابن مسعود فيه غير محفوظ، والله أعلم.

وقوله:"موجدة": أي غضبا. كما في"النهاية".

ورُوي أيضا من حديث ابن عباس، وفيه أنَّ القصَّة دارت بين ابن مسعود وبين رجلٍ لم يُسم.

رواه ابن خزيمة (1809) وفي إسناده الحسين بن عيسى، وهو ضعيفٌ.




উবাই ইবন কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিনে দাঁড়িয়ে সূরা তাবারাক (সূরা আল-মুলক) পড়লেন। আর তিনি আমাদের আল্লাহর দিনগুলো (ঐতিহাসিক ঘটনা ও উপদেশ) স্মরণ করিয়ে দিলেন। (এ সময়) আবূ দারদা অথবা আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে কনুই দিয়ে খোঁচা দিলেন এবং বললেন: এই সূরা কবে অবতীর্ণ হয়েছে? আমি এইমাত্র ছাড়া আর কখনো শুনিনি। তখন আমি তাকে চুপ থাকার জন্য ইশারা করলাম। যখন তারা (সাহাবীগণ) সালাত শেষ করে চলে গেলেন, তখন তিনি (আবূ দারদা/আবূ যার) বললেন: আমি তোমাকে জিজ্ঞেস করলাম, এই সূরা কবে অবতীর্ণ হয়েছে, কিন্তু তুমি আমাকে জানালে না? উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আজকের এই সালাতে তোমার জন্য ততটুকুই প্রতিদান রয়েছে, যতটুকু তুমি অনর্থক কথা বলেছ (অর্থাৎ, তুমি অনর্থক কথা বলার কারণে সালাতের পূর্ণ প্রতিদান পাওনি)। অতঃপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন এবং তাঁকে এ বিষয়টি জানালেন এবং উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে যা বলেছিলেন, সে সম্পর্কেও অবহিত করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "উবাই সত্য বলেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3209)


3209 - عن * *




৩২০৯ - থেকে।









আল-জামি` আল-কামিল (3210)


3210 - عن سلمة بن الأكوَع قال: كنَّا نصلِّي مع النبيِّ صلى الله عليه وسلم الجمعةَ ثمَّ ننصرِف وليس للحيطان ظلٌّ يُستظلُّ فيه.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4168) ومسلم في الجمعة (860/ 32) كلاهما من طريق يعلى بن الحارث المُحاربي، عن إياس بن سلمة بن الأكوع، عن أبيه، فذكر الحديثَ.

وفي رواية عند مسلم:"كنا نجمَّع مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا زالت الشمس، ثمَّ نرجع نتتبَّع الفيءَ".




সালামাহ ইবনুল আক্‌ওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জুমু'আর সালাত আদায় করতাম, অতঃপর আমরা এমন সময় ফিরে আসতাম যখন দেওয়ালে এমন কোনো ছায়া তৈরি হতো না, যার নিচে আশ্রয় নেওয়া যায়।

মুসলিমের এক বর্ণনায় এসেছে: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জুমু'আহ আদায় করতাম যখন সূর্য হেলে যেত (যাওয়াল হওয়ার পর), অতঃপর আমরা ফিরে আসতাম এবং (আশ্রয় নেওয়ার জন্য) ছায়া খুঁজতে থাকতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3211)


3211 - عن سهلٍ قال: ما كنَّا نقيل ولا نتغدَّى إلَّا بعد الجمعة.

وفي رواية: على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (939) ومسلم في الجمعة (859) كلاهما من حديث عبد الله بن مسلمة، قال حدثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهلٍ، فذكره. ولفظهما سواء، إلَّا أنَّ الرواية الثانية رواها مسلم وحده عن علي بن حجر، عن عبد العزيز به.

وذكر البخاري في روايةٍ أخرى (938) عن أبي غسَّان قال: حدثني أبو حازم، عن سهلٍ قال:"كانت فينا امرأة تجعل على أربعاء في مزرعة لها سلقًا، فكانت إذا كان يوم جمعة تنزع أصولَ السلق فتجعله في قدرٍ، ثمَّ تجعل عليه قبضة من شعيرٍ تطحنها، فتكون أصول السلق عرقة، وكنَّا ننصرف من صلاة الجمعة فسلِّم عليها، فتقرِّب ذلك الطعام إلينا فنعلقه، وكنَّا نتمنَّى يوم الجمعة لطعامها ذلك". وزاد في رواية (2349):"وما كنَّا نتغدَّى ولا نقيل إلَّا بعد الجمعة".




সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা জুমু'আর নামাযের পূর্বে না বিশ্রাম নিতাম আর না খাবার খেতাম। অপর এক বর্ণনায় রয়েছে: এটি ছিল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগেই।

তিনি আরও বলেন: আমাদের মাঝে একজন মহিলা ছিলেন। তার বাগানের একটি নালায় তিনি পালংশাক জাতীয় সবজি (সিলক্ব) রোপণ করতেন। যখন জুমু'আর দিন আসত, তখন তিনি সেই সবজির গোঁড়া তুলে একটি পাত্রে রাখতেন, এরপর তার ওপর এক মুঠো যব পিষে দিতেন। (রান্নার পর) সবজির গোঁড়াগুলো চর্বিযুক্ত গোশতের মতো সুস্বাদু হতো। আমরা জুমু'আর নামায শেষে ফিরে এসে তাকে সালাম দিতাম। তিনি আমাদের জন্য সেই খাবারটি পরিবেশন করতেন এবং আমরা তা খেতাম। আমরা কেবল সেই খাবারের কারণেই জুমু'আর দিনের অপেক্ষায় থাকতাম।

অন্য এক বর্ণনায় (বুখারী ২৩৪৯) আরও বলা হয়েছে: আমরা জুমু'আর নামাযের পরই কেবল খাবার খেতাম এবং বিশ্রাম নিতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3212)


3212 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا اشتدَّ البردُ بكَّر بالصلاةِ وإذا اشتدَّ الحرُّ أبرد بالصلاةِ. يعني الجمعة.

صحيحٌ: رواه البخاري في الجمعةِ (906) من طريق أبي خلدةَ -وهو خالد بن دينار-، قال: سمعت أنس بن مالك، فذكر الحديثَ.

قال البخاري:"قال يونس بن بُكَير: أخبرنا أبو خلدةَ، قال: صلَّى بنا أميرٌ الجمعةَ ثمَّ قال لأنسٍ رضي الله عنه: كيف كان النبي صلى الله عليه وسلم يصلِّي الظهرَ؟".

والأمير هو: الحكم بن أبي عقيل الثقفيّ.

وأخرجه ابن خزيمةَ (1842) من طريق حَرَمي بن عُمارةَ، حدَّثني أبو خلدةَ، قال: سمعت أنس
ابن مالكٍ وناداه يزيد الضبِّي يوم الجمعة في زمن الحجَّاج، فقال: يا أبا حمزة! شهدت الصلاة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وشهدت الصلاة معنا فكيف كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلِّي؟ قال .. فذكر مثلَه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তীব্র শীত অনুভব করতেন, তখন সালাত (নামাজ) দ্রুত আদায় করতেন। আর যখন তীব্র গরম অনুভব করতেন, তখন সালাত ঠাণ্ডা করতেন (বিলম্ব করতেন)। অর্থাৎ জুমু'আর সালাত।









আল-জামি` আল-কামিল (3213)


3213 - عن أنس بن مالك رضي الله عنه أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يُصلِّي الجمعةَ حين تميلُ الشمس.

صحيح: رواه البخاري في الجمعة (904) عن شُريح بن النعمان، حدَّثنا فُلَيح بن سليمان، عن عثمان بن عبد الرحمن بن عثمان التيمي، عن أنس بن مالك، فذكر الحديثَ.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্য হেলে যাওয়ার পর জুমুআর সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3214)


3214 - عن جعفر بن محمد الصادق، عن أبيه، أنَّه سأل جابر بن عبد الله: متى كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يُصلِّي الجمعة؟ قال: كان يُصلِّي ثمَّ نذهب إلى جِمالنا فنُريحها.

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (858/ 29) من طرق عن سليمان بن بلالٍ، عن جعفر فذكر الحديثَ.

قال مسلم: زاد عبد الله (أي ابن عبد الرحمن الدارمي شيخ مسلم) في حديثه:"حين تزول الشمس".

وفي رواية له من طريق حسن بن عياش، عن جعفر بن محمد به. قال حسن: فقلت لجعفر: فأي ساعةٍ تلك؟ قال:"زوال الشمس".




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে (তাঁর পিতা) জিজ্ঞেস করলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখন জুমু'আর সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: তিনি সালাত আদায় করতেন, তারপর আমরা আমাদের উটগুলোর কাছে যেতাম এবং সেগুলোকে বিশ্রাম দিতাম।

(অন্য এক বর্ণনায় আছে, জুমু'আর সালাত হতো) যখন সূর্য পশ্চিমাকাশে হেলে পড়ত (দিবাপরের পর)। হাসান ইবনু আয়্যাশ (বর্ণনাকারী) বলেন, আমি জাফর ইবনে মুহাম্মাদকে জিজ্ঞেস করলাম: সেই সময়টা কখন? তিনি বললেন: সূর্য হেলে যাওয়ার সময়।









আল-জামি` আল-কামিল (3215)


3215 - عن الحكم بن عُتَيبة قال: إنَّ الحجَّاج أخَّر الصلاةَ يومَ الجمعة فقال له شيخٌ: والله! لقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلِّي فما رأيته يصنع كما تصنع أنت. قال: فلمَّا رأيته ذكر رسول الله صلى الله عليه وسلم قلتُ له: كيف رأيتَه يصنع؟ قال: رأيته صلى الله عليه وسلم خرج حين زالت الشمس، وإذا الرجل أبو جُحيفة رضي الله عنه.

صحيحٌ: رواه أبو يعلى (2/ 187، حديث: 886)، عن زهير، ثنا يزيد بن هارون، ثنا سفيان ابن حسين، عن الحكم بن عتيبة، فذكر الحديثَ.

وهذا إسناد صحيح، رواته ثقات عن آخرهم. قال البوصيري:"رواه أبو يعلى الموصلي ورجاله ثقات".

قلت: وقد فات الهيثمي هذا الحديث؛ فلم أجده في مظانِّه عنده.

وأمَّا ما رُوي عن الزبير بن العوام أنَّه قال:"كنَّا نُصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم الجمعةَ ثمَّ ننصرف فنبتدر في الآجامِ، فلا نجد إلَّا قدر موضع أقدامنا". فهو ضعيف.

أخرجه الإمام أحمد (1412، 1436) وابن خزيمة (1840) من رواية مسلم بن جندب، عن الزبير بن العوام. ومسلم لم يُدرك الزبير. وفي روايةٍ قال: حدَّثني مَن سمِع الزبيرَ.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي قتادة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنَّه كره الصلاة نصف النهار إلَّا يوم الجمعة.

وقال:"إنَّ جهنَّم تُسجر إلَّا يوم الجمعة". فهو ضعيف، رواه أبو داود (1083) عن محمد بن عيسى، حدثنا حسان بن إبراهيم، عن ليث، عن مجاهد، عن أبي الخليل، عن أبي قتادة، فذكر الحديث.

قال أبو داود:"وهو مرسل؛ ومجاهد أكبر من أبي الخليل، وأبو الخليل لم يسمع من أبي قتادة".

قلت: وفيه أيضًا ليثٌ، وهو ابن أبي سُليم، وهو مضطرب الحديث كما قال الإمام أحمد. وضعيف
الحديث كما قال أبو حاتم. وفي"التقريب":"صدوق، اختلط أخيرًا، ولم يتميَّز حديثه فتُرك".

ولكن قال البيهقي (2/ 464) بعد أن نقل الحديث من طريق أبي داود، ونقل قوله بأنَّه مرسل، قال:"وله شواهد، وإن كانت أسانيدها ضعيفةً". فذكر من شواهده حديث أبي هريرة أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن الصلاة نصف النهار حتَّى تزول الشمس إلَّا يوم الجمعة.

وأخرجه من طريق الشافعي قال: أنبأنا إبراهيم بن محمد، عن إسحاق بن عبد الله، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكر مثله.

قلت: فيه إبراهيم بن محمد، وهو ابن أبي يحيي، شيخ الشافعي، وهو ضعيف جدًّا، بل كذَّبه ابن معين، وشيخه إسحاق بن عبد الله، وهو ابن أبي فروة، قال فيه أبو حاتم وأبو زرعة والنسائي والدارقطني:"متروك". وقال البخاري:"تركوه".

ثمَّ روى البيهقي حديث أبي هريرة من وجهٍ آخر بلفظ:"تحرم -يعني الصلاة- إذا انتصف النهار إلَّا يوم الجمعة". بإسناده عن شيخ من أهل المدينة، يقال له: عبد الله، عن سعيد، عن أبي هريرة.

ثمَّ قال:"ورُوي في ذلك عن أبي سعيد الخدري، وعمرو بن عبسة، وابن عمر مرفوعًا.

والاعتماد على أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم استحبَّ التبكير إلى الجمعة، ثمَّ رغَّب في الصلاة إلى خروج الإمام من غير تخصيص ولا استثناء، نذكرها إن شاء الله في كتاب الجمعة".

ثمَّ قال:"وروينا الرخصة في ذلك عن طاوس ومكحول" انتهى.

قلت: هذا مذهب الشافعي ومن وافقه، وهو اختيار شيخ الإسلام ابن تيمية.

قال الحافظ ابن القيم في"الزاد" (1/ 378): أنَّه"لا يُكره فعل الصلاة فيه وقت الزوال عند الشافعي رحمه الله ومن وافقه، وهو اختيار شيخنا أبي العباس ابن تيمية. ولم يكن اعتماده على حديث ليث، عن مجاهد، عن أبي الخليل، عن أبي قتادة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، أنَّه كره الصلاة نصف النهار إلَّا يوم الجمعة، وإنَّما كان اعتماده على أنَّ من جاء إلى الجمعة يُستحب له أن يصلي حتى يخرج الإمام، وفي الحديث الصحيح:"لا يغتسل رجل يوم الجمعة، ويتطهَّر ما استطاع من طهر، ويدَّهن من دهنه، أو يمس من طيب بيته، ثمَّ يخرج، فلا يفرِّق بين اثنين، ثمَّ يصلي ما كُتب له، ثمَّ يُنصت إذا تكلَّم الإمام، إلَّا غُفر له ما بينه وبين الجمعة الأخرى". رواه البخاري، فندبه إلى الصلاة ما كُتب له، ولم يمنعه عنها إلَّا في وقت خروج الإمام، ولهذا قال غير واحدٍ من السلف، منهم عمر بن الخطاب رضي الله عنه، وتبعه عليه الإمام أحمد: خروج الإمام يمنع الصلاةَ، وخطبته تمنع الكلام. فجعلوا المانع من الصلاة خروج الإمام. لا انتصاف النهار.

وأيضًا، فإنَّ الناس يكونون في المسجد تحت السقوف، ولا يشعرون بوقت الزوال، والرجل يكون متشاغلًا بالصلاة لا يدري بوقت الزوال، ولا يمكنه أن يخرج، ويتخطَّى رِقاب الناس، وينظر إلى الشمس ويرجع، ولا يُشرع له ذلك". انتهى.




হাকাম ইবনে উতাইবা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই হাজ্জাজ জুম্মার সালাত বিলম্বিত করলেন। তখন একজন শায়খ তাঁকে বললেন: আল্লাহর কসম! আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে সালাত আদায় করতে দেখেছি, কিন্তু তিনি আপনার মতো করেননি। [হাকাম] বলেন: আমি যখন দেখলাম তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কথা উল্লেখ করেছেন, তখন আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি তাঁকে কীভাবে সালাত আদায় করতে দেখেছিলেন? তিনি বললেন: আমি তাঁকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দেখেছি যখন সূর্য পশ্চিমাকাশে হেলে গেল, তখন তিনি (নামাজের জন্য) বের হলেন। আর এই লোকটিই ছিলেন আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।









আল-জামি` আল-কামিল (3216)


3216 - عن جابر بن عبد الله، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يخطب قائمًا يوم الجمعة، فجاءت عيرٌ من الشام، فانفتل الناس إليها، حتَّى لم يبقَ إلَّا اثنا عشر رجلًا. فنزلت هذه الآية التي في الجمعةِ: {وَإِذَا رَأَوْا تِجَارَةً أَوْ لَهْوًا انْفَضُّوا إِلَيْهَا وَتَرَكُوكَ قَائِمًا} [الجمعة 11].

متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (936) ومسلم في الجمعة (863) كلاهما من طريق حصين بن عبد الرحمن، عن سالم بن أبي الجعد، عن جابر بن عبد الله، فذكر الحديثَ. واللفط المسلم، ولفظ البخاري نحوه.

وروى مسلم بإسناده عن كعب بن عُجرة، قال: دخل المسجدَ وعبد الرحمن بن أم الحكم يخطب قاعدًا فقال: انظروا إلى هذا الخبيث! يخطب قاعدًا، وقال الله تعالى: {وَإِذَا رَأَوْا تِجَارَةً أَوْ لَهْوًا انْفَضُّوا إِلَيْهَا وَتَرَكُوكَ قَائِمًا} [الجمعة 11].




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমার দিনে দাঁড়িয়ে খুতবা দিচ্ছিলেন। তখন সিরিয়া (শাম) থেকে একটি বাণিজ্য কাফেলা আসল। লোকেরা সেদিকে চলে গেল, মাত্র বারোজন লোক ছাড়া আর কেউ অবশিষ্ট রইল না। তখন জুমু'আহ সম্পর্কিত এই আয়াতটি অবতীর্ণ হয়: "আর যখন তারা দেখে ব্যবসা অথবা কৌতুক, তারা সেদিকে ছুটে যায় এবং আপনাকে দাঁড়ানো অবস্থায় রেখে যায়।" [সূরা জুমু'আহ: ১১]।

ইমাম মুসলিম তাঁর সনদে কা'ব ইবনে উজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণনা করেছেন, তিনি (কা'ব) বলেন: তিনি মসজিদে প্রবেশ করলেন যখন আবদুর রহমান ইবনে উম্মুল হাকাম বসে খুতবা দিচ্ছিলেন। তখন তিনি (কা'ব) বললেন: তোমরা এই খবীসকে দেখো! সে বসে খুতবা দিচ্ছে, অথচ আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "আর যখন তারা দেখে ব্যবসা অথবা কৌতুক, তারা সেদিকে ছুটে যায় এবং আপনাকে দাঁড়ানো অবস্থায় রেখে যায়।" [সূরা জুমু'আহ: ১১]।









আল-জামি` আল-কামিল (3217)


3217 - عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك -وكان قائد أبيه بعدما ذهب بصره-، عن أبيه كعب بن مالك، أنَّه كان إذا سمع النداء يوم الجمعة ترحَّمَ لأسعد بن زرارة، فقلت له: إذا سمعت النداء ترحمت لأسعد بن زرارة؟ قال: لأنَّه أوَّل من جمَّع بنا في هزم النبيت من حرَّة بني بياضة، في نقيعٍ يُقال له: نقيع الخَضِمات. قلت: كم أنتم يومئذٍ؟ قال: أربعون.

حسن: رواه أبو داود (1070) وابن ماجه (1082) كلاهما من طريق محمد بن إسحاق، عن محمد بن أبي أُمامة بن سهل بن حنيف، عن أبيه، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق، فهو صدوق يدلِّس، لكنَّه صرَّح بالتحديث في روايات أخرى كما سيأتي.

وصحَّحه ابن خزيمة (1724) والحاكم (1/ 281) كلاهما عن طريق محمد بن إسحاق قال: حدَّثني محمد بن أبي أُمامة.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

وأمَّا ما رُوي عن أم عبد الله الدوسية مرفوعًا:"الجمعة واجبة على كلِّ قرية، وإن لم يكن فيها إلَّا أربعة".

وفي لفظ:"إلَّا ثلاثة، رابعهم إمامهم". فهو ضعيف، رواه الدارقطني (2/ 8) وبيَّن ضعفه فقال:"فيه الوليد بن محمد الموقري، متروك".

وكذلك لا يصحُّ ما رُوي عن أبي أمامة مرفوعًا:"على الخمسين جمعة، وليس فيما دون ذلك". رواه الدارقطني من رواية جعفر بن الزبير، عن القاسم بن عبد الرحمن، وقال:"جعفر بن
الزبير متروك".

وكذلك لا يصحُّ ما رُوي عن جابر بن عبد الله، قال:"مضت السنة أنَّ في كلِّ ثلاثةٍ إمام، وفي كلِّ أربعين فما فوق ذلك جمعة، وأضحى، وفِطر. وذلك أنَّهم جماعة". رواه الدارقطني من طريق عبد العزيز بن عبد الرحمن، ثنا خُصَيف، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر، فذكر مثله. وعبد العزيز بن عبد الرحمن البالسي قال فيه الإمام أحمد:"اضرب على أحاديثه، هي كذبٌ". أو قال:"موضوعة". انظر"الجرح والتعديل" (5/ 388)، وشيخه خُصَيف ضعَّفه جماعة من الأئمَّة.




কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি জুমার দিন আযান শুনতেন, তখন আসআদ ইবনে যুরারাহর জন্য রহমতের দোয়া করতেন। (আব্দুর রহমান) তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: আপনি আযান শুনলেই আসআদ ইবনে যুরারাহর জন্য রহমতের দোয়া করেন কেন? তিনি বললেন: কারণ তিনিই প্রথম ব্যক্তি, যিনি হাররাহ বনী বায়াযাহ-এর হাযমুন নাবী'ত নামক স্থানে, না'কী আল-খাদিমা'ত নামক একটি উপত্যকায় আমাদের নিয়ে জুমু'আর সালাত প্রতিষ্ঠা করেছিলেন। আমি বললাম: সেদিন আপনারা কতজন ছিলেন? তিনি বললেন: চল্লিশ জন।









আল-জামি` আল-কামিল (3218)


3218 - عن عمر، قال: صلاة السفر ركعتان، وصلاة الجمعة ركعتان، والفطر والأضحى ركعتان، تمامٌ غير قصرٍ، على لسانِ محمد صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه ابن ماجه (1064) عن محمد بن عبد الله بن نُمَير، ثنا محمد بن بشرٍ، قال: أنبأنا يزيد بن زياد بن أبي الجعد، عن زُبَيد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عُجرة، عن عمر، فذكره.

ورواه ابن خزيمة (1465) من طريق محمد بن بشر، بإسناده.

يزيد بن زياد بن أبي الجعد الأشجعي الكوفي، وثَّقه ابن معين، والعجلي، وقال أبو حاتم:"ما بحديثه بأس". ولكنَّه خالفه سفيان، فرواه عن زبيد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عمر. ومن هذا الطريق رواه النسائي (1420، 1566) والإمام أحمد (257) وابن حبان (2783).

وهذا منقطع، لأنَّ عبد الرحمن بن أبي ليلى لم يُدرك عمر، وقد قيل: يُحتمل سماعه منه؛ لأنَّه وُلد في خلافة الصديق، أو قبله، وقد رجَّح أبو حاتم الرواية المنقطعة، كما في"العلل" (1/ 138)، لأنَّ سفيان أحفظ من يزيد بن زياد، وقال غيره: زيادة الثقة مقبولة. والله أعلم.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: সফরের সালাত দুই রাকাত, জুমু‘আর সালাত দুই রাকাত এবং ঈদুল ফিতর ও ঈদুল আযহার সালাত দুই রাকাত। মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জবানীতে এগুলি কসর নয়, বরং পূর্ণাঙ্গ সালাত।









আল-জামি` আল-কামিল (3219)


3219 - عن أبي هريرةَ أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أدرك ركعةً من الصلاةِ فقد أدرك الصلاةَ".

متفق عليه: رواه مالك في وُقوتِ الصلاة (15) عن ابن شهابٍ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرةَ، فذكره.

ورواه البخاري في مواقيت الصلاة (580)، ومسلمٌ في المساجد (607) كلاهما من طريق مالك به.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাতের এক রাক‘আত পেল, সে সালাতকে পেল।"









আল-জামি` আল-কামিল (3220)


3220 - عن أبي هريرةَ عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من أدرك من صلاةِ الجمعة ركعةً فقد أدرك".

صحيح: رواه النسائيّ (1425) عن قتيبة ومحمد بن منصور -واللّفظ له- عن سفيان، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرةَ، فذكره.
وإسناده صحيح. وصحّحه أيضا ابن خزيمة (1850)، والحاكم (1/ 291) كلاهما رواه من وجه آخر عن الزّهريّ بإسناده، مثله.

قال الحاكم -بعد أن رواه من ثلاث طرق-:"كلُّ هؤلاء الأسانيد الثلاثة صِحاح، على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظ".

وفي معناه ما رواه ابن ماجه (1121) من وجه آخر عن الزّهريّ، عن أبي سلمة وسعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم بلفظ:"من أدرك من الجمعة ركعة -فلْيُصَلِّ أو- فليَصِلْ إليها أخرى".

رواه عن محمد بن الصبّاح، قال: أنبأنا عمر بن حبيب، عن ابن أبي ذئب، عن الزّهريّ، بإسناده؛ فهو ضعيف من أجل عمر بن حبيب وهو العدويّ القاضي البصريّ، جمهور أهل العلم مطبقون على تضعيفه.

ورواه ابن خزيمة في صحيحه (1851)، والدارقطني في السنن (1598)، والحاكم (1/ 291) كلّهم من طريق ابن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن أسامة بن زيد اللّيثيّ، عن ابن شهاب الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أدرك من الجمعة ركعة فليصل إليها أخرى".

وفيه يحيى بن أيوب الغافقيّ، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، وقد وُصف بأنه سيء الحفظ؛ فلعلّ هذا من خطئه؛ لأنّ شيخه أسامة بن زيد يقول: سمعت من أهل المجلس القاسم بن محمد وسالمًا يقولان: بلغ ذلك، فجعله يحيى بن أيوب مرفوعًا.

وله أسانيد أخرى ذكرها الدارقطني وغيره.

وقد رُوي عن ابن عمر مرفوعًا بلفظ:"من أدرك ركعة من صلاة الجمعة أو غيرها، فقد أدرك الصّلاة". رواه النسائيّ (557)، وابن ماجه (1123)، والدارقطني (1606) من طريق بقية، عن يونس بن يزيد الأيلي، قال: حدثني الزّهري، عن سالم، عن أبيه، فذكره.

وبقية مدلِّس، وقد صرَّح بالتحديث في رواية ابن ماجه، ولكن وقع فيه خطأ كما قال أبو حاتم:"هذا خطأ، إنما هو الزهري عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم" العلل (1/ 210).

وقال أيضًا في موضع آخر (1/ 181):"هذا حديث منكر".

ثم رُوي مرسلًا وموقوفًا. وصوَّب الدّارقطني وقفه. العلل له (12/ 347)، وكذا في التلخيص أيضًا (2/ 41).

فالصّواب أنّه من حديث أبي هريرة باللّفظ الأوّل، وأخطأ يحيى بن أيوب فذكره باللّفظ الثاني، والصّواب فيه أنه من حديث ابن عمر إلا أنه موقوف على سالم.

وقد قال بعض أهل العلم:"ثبوت لفظ"الجمعة" في حديث أبي هريرة فيه نظر، والصّحيح ما في الصحيحين:"من أدرك ركعة من الصّلاة، فقد أدرك الصّلاة" عامة، يدخل فيه الجمعة وغيرها.
وروى مالكٌ في الجمعة (11) عن ابن شهابٍ أنَّه كان يقول:"من أدرك من الجمعة ركعة فليصل إليها أُخرى". قال ابن شهابٍ"وهي السنَّة".

فالذي يظهر أنّ لفظ"الجمعة" في هذا الحديث من تفسير الزهري، وليس بمرفوع، وهو تفسير متَّجه. قال أبو بكر بن خزيمة. عقب ذكره الحديثَ بلفظ:"من أدرك من صلاة الجمعة ركعةً فقد أدرك الصلاةَ"- قال:"هذا خبرٌ رُوي على المعنى، لم يُؤَدَّ على لفظ الخبر، ولفظ الخبر:"من أدرك من الصلاة ركعةٌ" فالجمعة من الصلاة أيضًا كما قاله الزهري" انتهى.

وقوله:"وهي السنة" أي أنّ مَنْ أدرك أقلّ من ركعة فليصلِّها ظهرًا، وبه قال جمهور أهل العلم مالك والشافعي وأحمد والثوريّ والأوزاعيّ وغيرهم، وجمع من الصّحابة والتّابعين.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি জুমুআর সালাতের এক রাকআত পেল, সে (জুমুআর) সালাত পেল।"









আল-জামি` আল-কামিল (3221)


3221 - عن ابن عباس، أنَّه خطب في يوم ردْغٍ، فلمَّا بلغَ المؤذِّن:"حيَّ على الصلاةِ" فأمره أن يُنادي:"الصلاةُ في الرحالِ". فنظر القوم بعضهم إلى بعضٍ. فقال:"فعل هذا من هو خير منه، وإنَّها عَزْمُةٌ".

متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (616) ومسلم في صلاة المسافرين (699) كلاهما من طريق حمَّاد بن زيدٍ، عن أيوب، وعبد الحميد صاحب الزيادي، وعاصم الأحول، عن عبد الله بن الحارث، عن ابن عباس، فذكره. واللفظ للبخاري.

ورواه أيضًا البخاري في الجمعة (901) ومسلم كلاهما من طريق إسماعيل ابن علية، قال: أخبرني عبد الحميد صاحب الزيادي، قال: حدثنا عبد الحميد بن الحارث ابن عمِّ محمد بن سيرين، قال ابن عباس لمؤذنه في يوم مطيرٍ:"إذا قلتَ: أشهد أنَّ محمدًا رسول الله فلا تقل: حيَّ على الصلاة. قل: صلُّوا في بيوتكم". فكأنَّ الناسَ استنكروا. قال:"فعله من هو خير منِّي، إنَّ الجمعةَ عزْمَة، وإنِّي كرهتُ أن أُحرجَكم فتمشون في الطين والدَّحض. واللفظ للبخاري. ونحوه لفظ مسلم أيضًا.

قوله:"في يوم ردغٍ" الردغُ: الماء والطين.

وقوله:"إنَّ الجمعةَ عزْمةٌ" بإمكان الزاي: أي واجبةٌ متحتّمة، فلو قال المؤذن:"حيَّ على الصلاةِ" لكُلِّفتم المجيءَ إليها ولحقتكم المشقَّة.

وقوله:"في الطين والدَّحض" -بإسكان الحاء المهملة وبعدها ضاد معجمة- والدَّحض: الزلل والزلق.

والردغ -بفتح الراء، وإسكان الدال المهملة، بعدها غين معجمة- بمعنى الدحض. ورواه بعض رواة مسلم:"رزغ" -بالزاي- وهو الصحيح أيضًا، وهو بمعنى الردغ، وقيل: هو المطر
الذي يُبِلُّ وجهَ الأرض.

ومضى الحديث في كتاب الصلاة، باب الرخصة في ترك الجماعة عند المطر والعذر. وقد سبق فيه حديث أبي المليح.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এক কাদাভরা দিনে (জুমাআর) খুতবা দিচ্ছিলেন। যখন মুআযযিন 'হাইয়্যা আলাস সালাহ' (সালাতের জন্য আসো) পর্যন্ত পৌঁছলেন, তখন তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন যেন ঘোষণা দেন: 'তোমরা নিজ নিজ আস্তানায়/বাসস্থানে সালাত আদায় করো।' এতে উপস্থিত লোকেরা একে অপরের দিকে তাকাতে লাগল। তখন তিনি বললেন: 'আমার চেয়ে উত্তম ব্যক্তিও এই কাজটি করেছেন। আর নিশ্চয়ই এটি (জুমাআর সালাত) একটি অপরিহার্য (কর্তব্য)।'









আল-জামি` আল-কামিল (3222)


3222 - عن أبي هريرةَ قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يقرأ في الجمعة في صلاة الفجر: {الم (1) تَنْزِيلُ} [السجدة: 1 - 2]. و {هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ} [الإنسان: 1].

متفق عليه: رواه البخاري في الجمعة (891) ومسلم في الجمعة (880) كلاهما من حديث سفيان، عن سعد بن إبراهيم، عن الأعرج، عن أبي هريرةَ، فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিন ফজরের সালাতে {الم (1) تَنْزِيلُ} (সূরা সাজদাহ) এবং {هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ} (সূরা ইনসান) পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3223)


3223 - عن ابن عباس أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في صلاة الفجر يوم الجمعة: {الم (1) تَنْزِيلُ} [السجدة: 1 - 2]. و {هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ} [الإنسان: 1]. وأنَّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في صلاة الجمعةِ سورة الجمعة والمنافقين.

صحيحٌ: رواه مسلم في الجمعة (879) من طرق عن مُخَوَّل بن راشد، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

ورُوي مثله من حديث ابن مسعود، ولا يصحُّ. رواه الطبراني في الأوسط (958 - مجمع البحرين). وفيه شيخ الطبراني محمد بن بشر بن يوسف الأموي الدمشقي، لم أقف على توثيق فيه ولا جرح، وفيه أيضًا الوليد بن مسلم، وهو مشهور بتدليس التسوية، ولم يُصرِّح في جميع الإسناد، وأبو إسحاق السبيعي أيضًا مدلِّس، وقد عنعن. والله أعلم.

وأمَّا ما رواه البيهقي في"السنن الكبرى" (3/ 201) من طريق سعيد بن سماك بن حربٍ، حدَّثني أبي، لا أعلمه إلَّا عن جابر بن سمرةَ قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في صلاة المغرب ليلة الجمعة: {قُلْ يَاأَيُّهَا الْكَافِرُونَ} و {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ}. وكان يقرأ في صلاة العشاء الآخرة ليلة الجمعة سورة الجمعة والمنافقين. فهو ضعيفٌ جدًّا؛ فإنَّ سعيد بن سماك متروك الحديثِ، وأبوه سماك بن حرب صدوقٌ تغيَّر بآخره، وكان يتلقَّن. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (2/ 225).




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমার দিন ফজরের সালাতে 'আলিম লাম মীম তানযীল' (সূরা আস-সিজদাহ) এবং 'হাল আতা আলাল ইনসান' (সূরা আল-ইনসান) পড়তেন। এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমার সালাতে সূরা আল-জুমুআহ ও সূরা আল-মুনাফিকুন পড়তেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3224)


3224 - عن النعمان بن بشير قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأ في العيدين وفي الجمعة بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} [الأعلى: 1] و {هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ} [الغاشية: 1].

قال: وإذا اجتمع العيد والجمعة في يوم واحدٍ يقرأ بهما أيضًا في الصّلاتين.

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (878) من طريق إبراهيم بن محمد بن المنتشر، عن أبيه، عن حبيب بن سالم مولى النعمان بن بشير، عن النعمان بن بشير، فذكره.
وفي رواية: كتب الضحاك بن قيس إلى النعمان بن بشير يسأله: أي شيءٍ قرأ رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الجمعة سوى سورة الجمعة؟ فقال: كان يقرأ: {هَلْ أَتَاكَ}.




নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই ঈদের সালাতে এবং জুমু'আর সালাতে {সাবি্বহি ইসম রাব্বিকাল আ‘লা} (সূরা আল-আ'লা) এবং {হাল আতাকা হাদীসুল গা-শিয়াহ্} (সূরা আল-গাশিয়াহ্) তেলাওয়াত করতেন।

তিনি বলেন: যখন একই দিনে ঈদ এবং জুমু'আ একত্রিত হতো, তখনও তিনি উভয় সালাতেই এই দুটি সূরা তেলাওয়াত করতেন।

অপর এক বর্ণনায় এসেছে: দাহ্হাক ইবনু ক্বায়স নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে চিঠি লিখে জানতে চাইলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু'আর দিন সূরা আল-জুমু'আহ্ ছাড়া আর কী পাঠ করতেন? তিনি বললেন: তিনি {হাল আতাকা} পাঠ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3225)


3225 - عن أبي رافع، قال: استخلف مروانُ أبا هريرةَ على المدينةِ، وخرج إلى مكَّةَ، فصلَّى لنا أبو هريرة الجمعةَ فقرأ بعد سورةِ الجمعةِ في الركعةِ الأخيرةِ: {إِذَا جَاءَكَ الْمُنَافِقُونَ}. قال: فأدركتُ أبا هريرةَ حينَ انصرف فقلتُ له: إنَّك قرأتَ بسورتين كان علي بن أبي طالبٍ يقرأ بهما في الكوفةِ. فقال أبو هريرةَ: إنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقرأُ بهما يومَ الجمعةِ.

صحيحٌ: رواه مسلم في الجمعةِ (877) عن عبد الله بن مَسلَمة، حدَّثنا سليمان (هو ابن بلال) عن جعفر، عن أبيه، عن أبي رافعٍ، فذكره.

وفي رواية: عن عبد الله بن أبي رافع، عن أبي هريرة: فقرأ بسورة الجمعة في السجدة الأولى، وفي الآخرة: {إِذَا جَاءَكَ الْمُنَافِقُونَ}.




আবু রাফি' থেকে বর্ণিত, মারওয়ান (একবার) আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মদীনার (শাসক হিসেবে) স্থলাভিষিক্ত করে মক্কার উদ্দেশে রওয়ানা হলেন। অতঃপর আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের নিয়ে জুমু‘আর সালাত আদায় করলেন এবং তিনি (সালাতের) শেষ রাকাআতে সূরা আল-জুমু'আর পর 'ইযা জা-আকাল মুনাফিকূন' (সূরা আল-মুনাফিকুন) পাঠ করলেন। তিনি (আবু রাফি') বলেন, যখন তিনি (আবু হুরায়রাহ) ফিরে যাচ্ছিলেন, তখন আমি তাঁকে পেলাম এবং বললাম: আপনি এমন দুটি সূরা পাঠ করেছেন যা আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কূফায় পাঠ করতেন। তখন আবু হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জুমু‘আর দিন এই দুটি সূরা পাঠ করতে শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (3226)


3226 - عن أبي هريرةَ: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم مما يقرأ في صلاة الجمعة بالجمعة، فيحرض به المؤمنين، وفي الثانية بسورة المنافقين، فيقرع به المنافقين.

حسنٌ: رواه الطبراني في الأوسط (994 - مجمع البحرين): حدثنا الوليد بن أبان، ثنا محمد ابن عمَّار الرازي، ثنا عبد الصمد بن عبد العزيز، ثنا عمرو بن أبي قيس، عن منصور، عن أبي جعفر، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الهيثمي:"إسناده حسنٌ". وهو كما قال.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর সালাতে যা তিলাওয়াত করতেন, তার মধ্যে একটি হলো, সূরা আল-জুমু‘আহ, এর মাধ্যমে তিনি মু'মিনদের উৎসাহিত করতেন, এবং দ্বিতীয় (রাকাআতে) সূরা আল-মুনাফিকূন, এর মাধ্যমে তিনি মুনাফিকদের ভর্ৎসনা করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3227)


3227 - عن سمرة بن جندب، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقرأ في صلاة الجمعة بـ {سَبِّحِ اسْمَ رَبِّكَ الْأَعْلَى} [الأعلى: 1] و {هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ الْغَاشِيَةِ} [الغاشية: 1].

صحيح: رواه أبو داود (1125) والنسائي (1422) كلاهما من طريق شعبة، عن معبد بن خالد، عن زيد بن عقبة، عن سمرة بن جندب، فذكره.

وإسناده صحيح، وصحَّحه ابن خزيمة (1847) وابن حبان (2797) فروياه من طريق شعبة به.




সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু'আর সালাতে {সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ'লা} এবং {হাল আতাকা হাদীসুল গা-শিয়াহ্} পাঠ করতেন।