হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3261)


3261 - عن بُريدة بن الحُصيْب قال: كنت عند النبيِّ صلى الله عليه وسلم فبلغه أنَّ امرأةً من الأنصار مات ابن لها فجزعت عليه، فقام النبي صلى الله عليه وسلم ومعه أصحابه، فلمَّا بلغ باب المرأة قيل للمرأة: إنَّ نبيَّ الله صلى الله عليه وسلم يريد أن يدخل يُعزِّيها، فدخل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أما إنَّه قد بلغني أنَّكِ جزعتِ على ابنكِ". فقالت: يا نبيَّ الله! ما لي لا أجزع وأنا رقوب، لا يعيش لي ولد، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّما الرَّقوب الذي يعيش ولدها، إنَّه لا يموت لامرأةٍ مسلمة أو امرئٍ مسلم نَسَمةٌ، أو قال: ثلاثة من ولده، فيحتسبهم إلَّا وجبت له الجنَّة". فقال عمر -وهو عن يمين النبي صلى الله عليه وسلم: بأبي أنت وأمِّي، واثنين؟ فقال نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم:"واثنين".

حسن: رواه البزَّار (857 - كشف الأستار)، عن أحمد بن عثمان، ثنا جعفر بن عون، عن بشير ابن المهاجر، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، فذكره.

ورواه الحاكم في المستدرك (1/ 383 - 384) من طريق بشير بن المُهاجر به نحوه، وقال:"صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه بذكر الرقوب".

قلت: وهو كذلك، إلَّا أنَّ بشير بن المهاجر وإن كان من رجال مسلم إلَّا أنَّه مختلفٌ فيه: فقال أحمد:"منكر الحديث". وقال أبو حاتم:"يُكتب حديثه ولا يُحتجُّ به"، ولكن وثَّقه ابن معين والعجلي. وقال النسائي:"ليس به بأس". فمثله لا ينزل عن درجة الحسن، وخاصَّة في الشواهد.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। এ সময় তাঁর কাছে খবর পৌঁছাল যে আনসারী মহিলাদের মধ্যে একজনের ছেলে মারা গেছে এবং সে তাতে খুব অস্থির ও বিমর্ষ হয়ে পড়েছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে সাথে নিয়ে দাঁড়িয়ে গেলেন। যখন তিনি সেই মহিলার দরজার কাছে পৌঁছলেন, তখন মহিলাকে বলা হলো: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে সান্ত্বনা দেওয়ার জন্য ভেতরে প্রবেশ করতে চাচ্ছেন। অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করলেন এবং বললেন: "আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে তুমি তোমার সন্তানের মৃত্যুতে অস্থির হয়ে পড়েছো।" সে বলল: হে আল্লাহর নবী! আমি কেন অস্থির হবো না? আমি তো 'রাকূব' (দুর্ভাগা), আমার কোনো সন্তানই বেঁচে থাকে না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আসল রাকূব (দুর্ভাগা) সে, যার সন্তান জীবিত থাকে। নিশ্চয়ই কোনো মুসলিম মহিলা অথবা কোনো মুসলিম ব্যক্তির যখন একটি প্রাণ (সন্তান) অথবা তিনি বললেন: তার তিনজন সন্তান মারা যায়, আর সে ধৈর্যধারণ করে সওয়াবের আশা করে, তবে তার জন্য জান্নাত অবধারিত হয়ে যায়।" তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) – যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ডান পাশে ছিলেন – বললেন: আমার পিতা-মাতা আপনার ওপর উৎসর্গ হোক! (যদি মারা যায়) দুজন সন্তান? তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, দুজন হলেও।"









আল-জামি` আল-কামিল (3262)


3262 - عن عمرو بن عبسةَ، قال: سمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول، فذكر الحديثَ بطوله وفيه:"وأيُّما رجلٍ مسلم قدَّم له في صلبه ثلاثًا لم يبلغوا الحنثَ، أو امرأة، فهم له سترٌ من النار".

حسن: رواه عبد بن حُميد في"المنتخب" (304) عن أحمد بن يونس، ثنا عبد الحميد بن بهرام، ثنا شهر بن حوشب، قال: أخبرني أبو ظبية، أنَّ شرحبيل بن السمط دعا عمرو بن عبسة السلمي، فقال:"يا ابن عبسة! هل أنت مُحدِّثي حديثًا سمِعته أنت من رسول الله صلى الله عليه وسلم ليس فيه تزيُّدٌ ولا كذبٌ؟ ولا تحدِّثنيه عن آخر سمعه منه غيرك؟". فقال:"نعم. سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول .. فذكر الأشياءَ.
ورواه الإمام أحمد (17023) عن روح، قال: حدَّثنا عبد الحميد بن بهرام بإسناده، إلَّا أنَّه لم يسقِ اللفظ المذكور أعلاه، وإنَّما ساق له لفظًا آخر، وجزءًا أيضًا من الحديث الطويل بهذا الإسناد.

وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب، فإنه حسن الحديث، وكان علي بن المديني وأحمد والبخاري وغيرهم حسن الرأي فيه.

وللحديث أسانيد أُخرى غير أن ما ذكرته هو أصحُّها، منها ما رواه الإمام أحمد (19437) عن هاشم بن القاسم، حدثنا الفرج، حدثنا لقمان، عن أبي أُمامة، عن عمرو بن عبسة السَّلَمي، قال:"قلت له: حدِّثنا حديثًا سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، ليس فيه انتقاص ولا وهم". قال: سمعته يقول:"من وُلد له ثلاثة أولاد في الإسلام، فماتوا قبل أن يلغوا الحنث، أدخله الله عز وجل الجنة برحمته إياهم، ومن شاب شيبةً في سبيل الله عز وجل كانت له نورًا يومَ القيامةِ، ومن رمى بسهمٍ في سبيل الله عز وجل بلغ به العدو، أصاب أو أخطأ، كان له كعَدل رقبة، ومن أعتق رقبةً مؤمنةً أعتق الله بكلِّ عضوٍ منها عضوًا منه من النار، ومن أنفق زوجين في سبيل الله عز وجل فإنَّ للجنة ثمانية أبوابٍ، يُدخله الله عز وجل من أي باب شاء منها الجنَّة".

وفيه الفرج، وهو: ابن فَضالة بن النُّعمان التنوخي الشامي، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، حتَّى قال ابن حبَّان:"كان ممن يقلب الأسانيد، ويُلزق المتون الواهية بالأسانيد الصحيحة، لا يحل الاحتجاج به"."المجروحين" (862).

وعمرو بن عبسة هو السَّلَمي، أبو نُجيح، ويقال: أبو شعيب، أسلم قديمًا بمكَّة، ثمَّ رجع إلى بلاده، فأقام بها إلى أن هاجر بعد خيبر، وقبل الفتح، وكان يقول:"أنا رابع الإسلام". فسأله أبو أُمامة: بأي شيءٍ يدَّعي أنَّه رابع الإسلام؟ فقال:"كنت في الجاهلية أرى الناسَ على ضلالة ولا أرى الأوثانَ شيئًا، ثمَّ سمعتُ عن مكة خبرًا، فركبت حتى قدمتُ مكةَ، فإذا أنا برسول الله صلى الله عليه وسلم مستخفيًا، وإذا قومه عليه جُراء، فتلطَّفتُ فدخل عليه. فقلتُ: من أنتَ؟ قال:"نبيُّ الله". قلتُ: آالله أرسلك؟ ! قال:"نعم". قلتُ: بأيِّ شيءٍ؟ قال:"بأن يوحَّد الله، ولا يُشرك به شيء، تكسر الأصنام، وتوصل الرحم". قلت: من معك على هذا؟ قال:"حرٌّ وعبدٌ". فإذا معه أبو بكر وبلالٌ، فقلت: إنِّي متَّبعك. قال:"إنَّك لا تستطيع، ارجع إلى أهلك، فإذا سمعتَ بي ظهرتُ فالحق بي". فرجعتُ إلى أهلي وقد أسلمتُ، فهاجر رسول الله صلى الله عليه وسلم، وجعلتُ أتخبَّر الأخبارَ إلى أن قدِمتُ عليه المدينة. فقلتُ: أتعرفني؟ قال:"نعم، أنت الذي أتيتني بمكَّة". قلت: نعم. فعلِّمني ممَّا علَّمك الله. ذكر الحديثَ بطوله كما أخرجه مسلم في كتاب الصلاة، ومضى.

روى عنه ابن مسعود -مع تقدُّمه- وأبو أمامة الباهلي، وسهل بن سعد، ومن التابعين شرحبيل بن السمط، وسعدان بن أبي طلحة، وسليم بن عامر، وآخرون. ويُقال: إنَّه ممَّن نزل حمص من الصحابة". انظر"الإصابة" (3/ 5).




আমর ইবনু আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি— এরপর বর্ণনাকারী সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করেছেন, যার মধ্যে এই অংশটিও ছিল: “যে কোনো মুসলিম পুরুষ, যার ঔরসে জন্ম নেওয়া তিনজন সন্তান বালেগ হওয়ার বয়সে পৌঁছার আগেই মৃত্যুবরণ করেছে, অথবা (এমন) কোনো নারী (যার তিনজন সন্তান মারা যায়), তারা তার জন্য জাহান্নামের আগুন থেকে আবরণ বা পর্দা হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3263)


3263 - عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أنَّه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّه يُقال للولدان يوم القيامة: ادخلوا الجنَّة. قال: فيقولون: يا ربِّ حتَّى يدخلَ آباؤنا وأمُّهاتنا، قال: فيأبون، قال: فيقول الله عز وجل: ما لي أراهم مُحبنطِئين؟ ادخلوا الجنَّة. قال: فيقولون: يا ربِّ! آباؤنا. قال: فيقول: ادخلوا الجنَّة أنتم وآباؤكم".

حسن: رواه الإمام أحمد (16971) عن أبي المغيرة، حدَّثنا حريز، قال: حدَّثنا شرحبيل بن شفعة، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وإسناده حسن من أجل شرحبيل، وهو ابن شفعة الرحبي، ذكره ابن حبان في"الثقات"، وهو من شيوخ حريز بن عثمان، وشيوخ حريز بن عثمان كلهم ثقات، قاله أبو داود وغيره.

وقال الهيثمي في"المجمع" (10/ 387):"رواه أحمد، ورجاله رجال الصحيح، غير شرحبيل، وهو ثقة".

وقال في موضع آخر (3/ 11):"رواه أحمد، ورجاله ثقات".

وشرحبيل هذا جعله الحافظ في مرتبة"صدوق". وهو الأنسب.

قوله:"مُحبنْطئين" بضمِّ الميم، وسكون الحاء، من احبنطأ، أي: انتفخ جوفه، وامتلأ غيظًا.

وأمَّا ما رُوي عن بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جدِّه مرفوعًا:"سوداء ولود خير من حسناء لا تلد، إنِّي مكاثر بكم الأمم، حتَّى بالسِّقط، يظلُّ مُحبنطِئًا على باب الجنة. يقال له: ادخل الجنة، فيقول: يا ربِّ وأبواي؟ فيقال له: ادخل الجنة أنت وأبواك". فهو ضعيف، رواه الطبراني (19/ 416) عن الحسين بن إسحاق التستري، ثنا يحيى بن درست، ثنا علي بن الربيع، حدثني بهز بن حكيم به مثله.

قال الهيثمي في"المجمع" (4/ 258):"فيه علي بن الربيع، وهو ضعيف". وقال ابن حبان:"هذا حديث ضعيف، لا أصل له من حديث بهز بن حكيم، وعلى هذا يروي المناكير، فلمَّا كثر في روايته المناكير بطل الاحتجاج به""المجروحين" (683). وأخرجه العقيلي (3/ 253)، ولكن سمَّاه علي بن نافع. وقال:"هو مجهول بالنقل، حديثه غير محفوظ".

وفي الباب عن عبد الله بن مسعود مرفوعًا:"من قدَّم ثلاثةً لم يلغوا الحُلُمَ كانوا له حِصنًا حصينًا من النارِ".

قال أبو ذرٍّ: قدمت اثنين. قال:"واثنين". فقال أبي بن كعبٍ سيِّد القرَّاء: قدمت واحدًا. قال:"وواحدًا، ولكن إنَّما ذلك عند الصدمة الأولى".

رواه الترمذي: (1061)، وابن ماجه: (1606)، كلاهما عن نصر بن علي الجهضمي، ثنا إسحاق بن يوسف، حدثنا العوام بن حوشب، عن أبي محمد مولى عمر بن الخطَّاب، عن أبي عبيدة، عن عبد الله بن مسعود، فذكر مثله. واللفظ للترمذي، ولفظ ابن ماجه نحوه.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب، وأبو عبيدة لم يسمع من أبيه".

قلت: ومع هذا الانقطاع فيه من لا يُعرف، وهو أبو محمد، كذا جاء ذكره في السنن، واعتمده المزي فذكره في الكُنى. وجاء مثله في مسند الإمام أحمد (4077، 4079).

وقيل: اسمه محمد بن أبي محمد، هكذا جاء أيضًا في"المسند" (3554، 4078)، فرجَّح الحافظ الأول، وبه جزم أبو أحمد الحاكم. وأبو محمد هذا لا يُعرف من هو.

وعن أبي نضرة السَّلَمي مرفوعًا:"لا يموت لأحد من المسلمين ثلاثة من الولد فيحتسبهم إلَّا كانوا له جُنَّة من النار". فقالت امرأة عند رسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله! أو اثنان؟ قال:"أو اثنان".

رواه مالك في الجنائز (39) عن محمد بن أبي بكر بن عمرو بن حزم، عن أبيه، عن أبي النضر السَّلَمي، فذكر مثله.

قال ابن عبد البر في"الاستذكار" (8/ 330):"هذا الحديث قد اضطرب فيه رواة"المؤطَّأ" في أبي النضر هذا، فطائفة تقول كما قال يحيي: عن أبي النضر، وطائفة تقول: عن أبي النضر السَّلَمي، منهم القعنبي". قال:"وهو رجل مجهول لا يعرف في حملة العلم، ولا يوقف له على نسبٍ، ولا يُدرى أصاحب هو أو تابع؟ وهو مجهولٌ، ظلمةٌ من الظلمات، قيل فيه: محمد بن النضر، وقيل: عبد الله بن النضر، وقال فيه أكثرهم: السَّلَمي -بفتح السين واللام، كأنَّه من بني سلمة في الأنصار، وقال بعض المتأخرين فيه: إنَّه أنس بن مالك بن النضر، نُسب إلى جدِّه النضر. قال: وكنية أنس بن مالك: أبو النضر، وهذا جهلٌ واضحٌ وغباوةٌ بيِّنةٌ؛ وذلك أنَّ أنس بن مالك بن النضر ليس من بني سلمة، وإنَّما هو من بني عدي بن النجار، لم يكن قط بأبي النضر، وإنَّما كنيته: أبو حمزة". انتهى.

وعن الحارث بن أُقيش (بالقاف - مصغَّرًا) قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من مسلمين يموت لهما أربعة أفراطٍ إلَّا أدخلهما الله الجنَّة بفضل رحمته". قالوا: يا رسول الله! وثلاثة؟ قال:"وثلاثة". قالوا:"واثنان؟" قال:"واثنان".

رواه الإمام أحمد (17859) والطبراني في"الكبير" (3/ 300) كلاهما من طريق داود بن أبي هند، عن عبد الله بن قيس، عن الحارث بن أقيش، قال: كُنَّا عند أبي برزة ليلةً، فحدَّث ليلتئذٍ عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديثَ مثله.

هكذا رواه الإمام أحمد، وبادئ النظر يظهر منه أنَّ الحديثَ من مسند أبي برزة، وهو نضلة بن عبيد الصحابي المشهور بكنيته، ولكن الصواب أنَّه من مسند الحارث بن أقيش. وهو الذي يدل عليه صنيع الإمام أحمد، فإنَّه ذكره في مسند الحارث بن أُقيش، وكذلك فعله الطبراني، وكذلك أخرجه الحاكم"في المستدرك" (1/ 77) من طريق داود بن أبي هند، فلا بدَّ أن نُفسِّر قوله في مسند الإمام أحمد:"قال" أي عبد الله بن قيس، فحدّث ليلتئذٍ، أي الحارث بن أُقيش. ليكون موافقًا
للنصوص الأخرى.

أمَّا قول الحاكم:"صحيح الإسناد على شرط مسلم". فإنَّ عبد الله بن قيس وهو النخعي الكوفي الراوي عن الحارث بن أُقيش، وعنه داود بن أبي هند، قال فيه علي بن المديني:"مجهول". لم يرو عنه غير داود بن أبي هند. وكذلك قال فيه الذهبي وابن حجر في"التقريب".

والوهم الثاني: أنَّه ليس من رجال مسلم؛ وإنَّما هو من رجال ابن ماجه. وله حديث الشفاعة في الإيمان.

وأمَّا قول الهيثمي في"المجمع" (3/ 8):"رواه أحمد من حديث أبي برزة ورجاله ثقات". فهو نبع لابن حبان؛ فإنَّه ذكر عبد الله بن قيس في كتاب"الثقات" (5/ 42) وقال:"عداده في أهل البصرة، روى عنه داود بن أبي هند، وأبو حرب أحسبه الذي روى عنه أبو إسحاق السبيعي، عن ابن عبَّاسٍ قوله".

وعن أبي موسى الأشعري مرفوعًا:"قال الله تعالى: يا ملك الموت، قبضتَ ولدَ عبدي؟ قبضتَ قرَّة عينه وثمرة فؤاده؟ قال: نعم. قال: فما قال؟ قال: حمدك واسترجع. قال: ابنوا له بيتًا في الجنَّة وسَمُّوه بيتَ الحمدِ".

رواه الترمذي (1021) عن سويد بن نصر، حدثنا عبد الله بن المبارك، عن حماد بن سلمة، عن أبي سنان، قال: دفنتُ ابن سنانًا وأبو طلحة جالس على شفير القبر، فلمَّا أردتُ الخروجَ أخذ بيدي فقال: ألا أُبشِّرُك يا أبا سنان؟ قلت: بلى. فقال: حدَّثني الضحاك بن عبد الرحمن بن عرزَب، عن أبي موسى الأشعري، فذكر الحديثَ.

والحديث في مسند الإمام أحمد (19725) من طريق حمَّاد بن سلمة بإسناده نحوه. وفيه ضعفٌ وإرسال. وأبو سنان هو: عيسى بن سنان الحنفي القسملي، أكثر النقَّاد على تضعيفه، منهم: الإمام أحمد، وابن معين، وأبو حاتم، وأبو زرعة، والنسائي، والعقيلي. وأمَّا العجلي فقال: لا بأسَ به، وذكره ابن حبَّان في"الثقات"، فهو إلى الضعف أقرب. قال الحافظ:"ليِّن الحديث".

وأبو طلحة هو: الخولاني، لم يوثقه غير ابن حبان؛ ولذا قال الحافظ:"مقبول". أي: حيث يتابع، وإلَّا فليِّن الحديث. وفي الضحاك بن عبد الرحمن، لم يسمع من أبي موسى كما قال الحافظ وغيره. قال أبو حاتم:"روي عن أبي موسى الأشعري، مرسلٌ". ومع هذا كلِّه قال الترمذي:"حسن غريب". وهذا تساهلٌ. والله أعلم

وعن أم سُليم بنت مِلحان، وهي أم أنس بن مالك، مرفوعًا:"ما من امْرأين مسلمين يموت لهما ثلاثة أولادٍ لم يبلغوا الحنثَ إلَّا أدخلهم الله الجنَّة بفضل رحمته إيَّاهم". رواه الإمام أحمد (27113) والطبراني في"الكبير" (25/ 126) كلاهما من طريق عبد الله بن نمير، قال: حدَّثنا عثمان -يعني ابن حكيم-، قال: حدَّثني عمرو الأنصاري، عن أم سليم، فذكرته.
ولم يسم والد عمرو الأنصاري، فقيل: إنَّه عمر كما في رواية الطبراني الأخرى من طريق عبد الواحد بن زياد، عن عثمان بن حكيم، ورجَّح المزِّي في تهذيب الكمال أن يكون اسم أبيه:"عاصم". وهو الذي اختاره الهيثمي فقال في"المجمع" (3/ 806): رواه أحمد والطبراني في"الكبير"، وفيه عمرو بن عاصم الأنصاري، ولم أجد من وثَّقه ولا من ضعَّفه، وبقية رجاله ثقات". قلت: وهو كما قال؛ فإنَّ عمروا الأنصاري هذا سواء كان اسم أبيه عمر أو عاصم، فهو مجهولٌ.

وعن أبي ثعلبة الأشجعي، قال: مات لي يا رسول الله ولدان في الإسلام. فقال:"من مات له ولدان في الإسلام أدخله الله عز وجل الجنة بفضل رحمته إياهما". قال: فلما كان بعد ذلك قال: لقيني أبو هريرة قال: فقال: أنت الذي قال له رسول الله صلى الله عليه وسلم في الولدين ما قال؟ قال: قلت: نعم. قال: فقال: لأن يكون قاله لي أحبُّ إليَّ ممَّا غُلِّقت عليه حمص وفلسطين.

رواه الإمام أحمد (27220) والطبراني في"الكبير" (22/ 229، 384) كلاهما من حديث حمَّاد بن مسعدة، قال: حدثنا ابن جريج، عن أبي الزبير، عن عمر بن نبهان، عن أبي ثعلبة الأشجعي، إلَّا أنَّ الطبراني قال في الموضع الأول:"عن أبي ثعلبة الخشني" وقال في الموضع الثاني مثل قول الإمام أحمد.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 7) وقال:"رواه أحمد، والطبراني في"الكبير" ورجاله ثقات"، وقال في الموضع الثاني (3/ 9) وهو حديث الخشني:"رواه الطبراني في"الكبير" وفرقهما، جعل الأشجعي الذي تقدَّم غير هذا، ورجاله رجال الصحيح".

ورواه أيضًا الطبراني في"الكبير" (22/ 384) من وجهٍ آخر، عن مندل بن علي، عن ابن جريج بإسناده، عن أبي ثعلبة الأشجعي، فذكر الحديثَ إلَّا أنَّه اختصره، ولم يذكر قصَّة أبي هريرة.

وعمرو بن نبهان مجهول، وإن كان ذكره ابن حبان في"الثقات" على عادته في ذكر المجاهيل في"الثقات". ومندل -بكسر الميم- بن علي العنزي أبو عبد الله الكوفي، ضعَّفه أكثر أهل العلم، منهم أحمد، وابن معين، والنسائي، وابن حبان، والدارقطني، وغيرهم.

وأمَّا قول الهيثمي في"المجمع":"رجاله رجال الصحيح" فغير صحيحٍ، لأنَّ عمر بن نبهان من رجال أبي داود فقط، وهو مجهولٌ، ومِندل بن علي من رجال أبي داود وابن ماجه، وهو أيضًا ضعيفٌ.

وأمَّا أبو ثعلبة الخشني؛ فهو صحابي مشهورٌ بكنيته، وله أحاديث في الصحيحين وغيرهما.

وأمَّا أبو ثعلبة الأشجعي؛ فقال البخاري: اله صحبة". ولكن قال أبو أحمد الحاكم في ترجمة الراوي عنه:"لا أعرفه، ولا أعرف أبا ثعلبة". وقال الدارقطني:"رواه بعضهم عن ابن جريج فقال: الخشني". فالذي يظهر أنَّه أبو ثعلبة الخشني؛ وإنَّما وهم بعض الرواة فجعلوه الأشجعي.

وعن ابن سيرين قال: جاء الزبير بابنه عبد الله إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ما من مؤمنين يموت لهما ثلاثة إلَّا أدخلهم الله الجنة، فيقول لهم: ادخلوا الجنَّة، فيقولون: وآباؤنا؟ فيقال لهم:
وآباؤكم".

رواه عبد الرزاق (20138) عن معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين، فذكر مثله. وفيه إرسالٌ؛ فإنَّ محمد بن سيرين لم يحضر القصَّةَ.

وعن معاذ مرفوعًا:"ما من مسلمين يتوفى لهما ثلاثة إلَّا أدخلهما الله الجنَّة بفضل رحمته إيَّاهما". فقالوا: يا رسول الله! أو اثنان؟ قال:"أو اثنان". قالوا: أو واحد؟ قال:"أو واحد". ثمَّ قال: والذي نفسي بيده! إنَّ السِّقطَ ليجرُّ أمَّه بسَرره إلى الجنَّة إذا احتسبته".

رواه أحمد (22090) والطبراني في"الكبير" (20/ 145 - 146)، كلاهما من طريق يحيى بن عبد الله التيمي، عن عبيد الله بن مسلم، عن معاذ بن جبل، فذكره.

ورواه ابن ماجه (1609) من هذا الوجه إلَّا أنَّه اقتصر على الجزء الثاني من الحديث. وإسناده ضعيف من أجل يحيي بن عبد الله التيمي، وهو يحيي بن عبد الله بن الحارث الجابر، ضعَّفه ابن معين، وأبو حاتم الرازي، والنسائي، وغيرهم. وقال أبو حاتم وابن حبَّان:"منكر الحديث، يروي المناكير الكثيرة التي لا تُشبه حديث الأئمة، حتَّى ربَّما سبق إلى القلب أنَّه كان يتعمَّدُ لذلك، لا يجوز الاحتجاج به بحالٍ"،"المجروحين" (1215). وليَّنه الذهبي، وابن حجر.

وأمَّا قول الهيثمي في"المجمع" (3/ 9):"وفيه يحيى بن عبيد الله التيمي، ولم أجد من وثَّقه، ولا جرَّحه"، فهو ظنٌّ فيه بأنَّه غير ابن الجابر، وإلَّا فيحيى بن عبيدالله أو عبد الله بن الجابر معروف من رجال السنن، عدا النسائي، وهذا الذي رجَّحه المزي وغيره. وضعَّف البوصيري هذا الإسناد، ولكن ظنًّا منه بأنَّه يحيي بن عبيد الله بن موهب؛ فإنَّه ضعيفٌ أيضًا.

وعن أم مبشر، رفعته عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنَّه دخل عليها وهي تطبخ حيسًا، فقال:"من مات له ثلاثة لم يبلغوا الحنثَ كانوا له حجابًا من النار". فقالت: قلت: يا رسولَ الله! واثنان؟ قال:"ثلاثة". قالت: واثنان؟ . قال:"ثلاثة". ثمَّ سكتَ. ثمَّ قال:"اثنان يا أمَّ مبشِّر، اثنان يا أمَّ مبشر".

رواه أبو بكر بن أبي شيبة قال: حدثنا بكر بن عبد الرحمن، حدَّثنا عيسى بن المختار، عن ابن أبي ليلي، عن عبد الله بن عطاء المكِّي، عن رجلٍ من الأنصار من بني زُريق، عن أمِّ مبشِّر، فذكرته.

قال الحافظ في"المطالب" (789):"وقال أبو يعلي: حدَّثنا أبو بكر بهذا".

قلت: وإسناده ضعيفٌ من أجل الكلام في ابن أبي ليلى، وفيه راوٍ مجهولٌ، وهو رجل من بني زُرَيق، وبهما ضعَّفه البوصيري في"الإتحاف".

وعن أبي أُمامة مرفوعًا:"ما من مؤمنين يموت لهما ثلاثة أولاد لم يبلغوا الحنثَ إلَّا أدخلهما الله الجنَّة بفضل رحمته إياهما".

رواه ابن أبي شيبة (3/ 353) عن أبي أسامة، عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن القاسم، عن أبي أمامة، فذكره.
وأبو أسامة لم يسمع من عبد الرحمن بن يزيد، وأنَّما لقي ابن تميم، فظنَّ أنَّه ابن جابر، وابن جابر ثقة، وابن تميم ضعيف. انظر التهذيب، (6/




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয় কিয়ামতের দিন শিশুদেরকে বলা হবে: 'জান্নাতে প্রবেশ করো।' তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! আমাদের পিতা-মাতা প্রবেশ না করা পর্যন্ত (আমরা যাব না)।'" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "অতঃপর তারা অস্বীকার করবে।" আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলবেন: "কী হলো, আমি দেখছি তারা কেন ইতস্তত করছে/পিছিয়ে আছে? তোমরা জান্নাতে প্রবেশ করো।" তারা বলবে: "হে আমাদের রব! আমাদের পিতা-মাতা।" তিনি বলবেন: "তোমরা এবং তোমাদের পিতা-মাতারা জান্নাতে প্রবেশ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3264)


3264 - عن أبي هريرة أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما لعبدي المؤمن عندي جزاء إذا قبضتُ صفيَّه من أهل الدنيا، ثمَّ احتسبه إلَّا الجنَّة".

صحيح: رواه البخاريّ في الرقاق (6424) عن قتيبة، حدثنا يعقوب بن عبد الرحمن، عن عمرو، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكره.

وقوله:"صفيَّه" بفتح الصاد، وكسر الفاء، وتشديد الياء: هو الحبيب المصافي، كالولد، والأخ، وكلُّ من يُحبُّه الإنسان.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার মু'মিন বান্দার জন্য আমার কাছে জান্নাত ব্যতীত অন্য কোনো প্রতিদান নেই, যখন আমি দুনিয়াবাসীর মধ্য হতে তার প্রিয়জনকে উঠিয়ে নেই, আর সে এর উপর ধৈর্য ধারণ করে সওয়াবের আশা রাখে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3265)


3265 - عن ابن عباس، أنَّه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من كان له فرطان من أمَّتي أدخله الله بهما الجنَّة". فقالت عائشة: فمن كان له فرط من أُمَّتك؟ قال:"ومن كان له فرطٌ يا موفَّقة". قالت: فمن لم يكن له فرط من أمَّتك؟ قال:"فأنا فرط أمَّتي، لن يُصابوا بمثلي".

حسن: رواه الترمذي (1062) عن نصر بن علي الجهضمي، وزياد بن يحيى البصري، قالا: حدَّثنا عبد ربِّه بن بارق الحنفي، قال: سمعت جدِّي أبا أُمِّي، سماك بن الوليد الحنفي، يُحدِّث أنَّه سمع ابن عباس يحدِّث أنَّه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول، فذكر الحديثَ.

ورواه الإمام أحمد (3098) من طريق عبد ربه بن بارقٍ بإسناده مثله.

قال الترمذي:"حسن غريب، لا نعرفه إلَّا من حديث عبد ربِّه بن بارق، وقد روى عنه غير واحدٍ من الأئمَّة". وقال:"وسماك بن الوليد هو: أبو زميل الحنفي". قلت: وهو كما قال؛ فإنَّ إسناده حسن من أجل الكلام في عبد ربه بن بارق الحنفي، فوثَّقه أبو حاتم. وقال أحمد: ما أري به بأسًا.

وذكره ابن حبَّان في"الثقات". وحسن حديثه الترمذي، إلَّا أنَّ ابن معين قال فيه:"ليس بشيءٍ".

والخلاصة: مثله يُحسَّن حديثه.

قوله:"من كان له فرط" أي: واحد، ويؤيِّده حديث أبي هريرة السابق: إذا قبضتُ صفيَّه من أهل الدنيا، أي الواحد فما فوقه.

وفيه رد على من زعم أنَّه لم يصح حديث:"من مات له ولد واحد دخل الجنة".

وهذا الذي رجَّحه أيضًا الحافظ ابن حجر (3/ 119) بعد أن نقل قوله:"وليس في شيءٍ من هذه
الطرق ما يصلح للاحتجاج، بل وقع في رواية شريك التي علَّق المصنِّف إسنادها كما سيأتي ولم يسأل عن واحدٍ".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমার উম্মতের মধ্যে যার দু’টি [বালক/শিশু] অগ্রগামী (আগে মারা যায়) হবে, আল্লাহ এর বিনিময়ে তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।" তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'আপনার উম্মতের মধ্যে যার একটি [বালক/শিশু] অগ্রগামী হবে (আগে মারা যাবে), তার কী হবে?' তিনি বললেন, "হে সফলতা লাভকারিণি! যার একটি অগ্রগামী হবে, (তার জন্যও তাই)।" তিনি (আয়েশা) বললেন, 'আর আপনার উম্মতের মধ্যে যার কোনো অগ্রগামী (শিশু) নেই, তার কী হবে?' তিনি বললেন, "তবে আমিই আমার উম্মতের অগ্রগামী (فرط)। তারা আমার মতো বিপদে আর কখনো আক্রান্ত হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3266)


3266 - عن أبي سعيد وأبي هريرة، أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما من امرأةٍ تدفن ثلاثة أفراطٍ إلاّ كانوا لها حجابًا من النار". فقالت امرأةٌ: يا رسول الله! قدمت اثنين. قال:"واثنين". ولم تسأله عن الواحد.

قال أبو هريرة:"من لم يبلغ الحنثَ".

صحيح: رواه البخاري معلقًا (1250) عن شريك، عن ابن الأصبهاني، حدَّثنا أبو صالح، عن أبي سعيد، وأبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم. قال أبو هريرة:"لم يبلغوا الحنثَ".

ووصله ابن أبي شيبة عن شريك، عن عبد الرحمن بن الأصبهاني، قال: أتاني أبو صالح يعزِّيني عن ابن لي، فأخذ يُحدِّث عن أبي سعيد وأبي هريرة، فذكر مثله.

وقد سبق حديث أبي سعيد في أول الباب.




আবু সাঈদ ও আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে নারীই তার তিন জন নাবালেগ সন্তানকে দাফন করবে, তারা অবশ্যই তার জন্য জাহান্নামের আগুন থেকে অন্তরায় (পর্দা) হয়ে যাবে।" তখন একজন মহিলা বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো দু'জনকে আগে পাঠিয়েছি (দাফন করেছি)।' তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আর দু'জন হলেও (একই প্রতিদান পাবে)।" কিন্তু তিনি (মহিলাটি) এক জনের বিষয়ে তাঁকে জিজ্ঞাসা করেননি। আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, '(এরা হলো) যারা বালেগ হয়নি (অর্থাৎ পাপের হিসাবযোগ্য হয়নি)।'









আল-জামি` আল-কামিল (3267)


3267 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما تعُدُّون الرقوب فيكم؟". قالوا: الذي لا ولد له. قال:"لا، بل الذي لا فرط له".

حسن: رواه أبو يعلى (6006) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدَّثنا أبو خالد الأحمر، عن هشام، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكر مثله.

وإسناده حسن من أجل أبي خالد الأحمر، وهو سليمان بن حيان الأزدي، من رجال الجماعة، وثَّقه ابن المديني والعجلي، وقال ابن معين والنسائي:"ليس به بأس". وذكره ابن حبان في"الثقات".

والخلاصة أنَّه حسن الحديث. قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 11):"رواه أبو يعلى ورجاله رجال الصحيح". وقال البوصيري في"الإتحاف:"رجاله ثقات. وسكت عليه الحافظ في المطالب العالية (1/ 196).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের মধ্যে কাকে 'রাকুব' (সন্তানহীন) মনে করো?" সাহাবীগণ বললেন, "যার কোনো সন্তান নেই।" তিনি বললেন, "না। বরং সে হলো ঐ ব্যক্তি যার পূর্বে (আখিরাতের জন্য কোনো নেক আমল কিংবা মৃত সন্তান) অগ্রিম পাঠানো নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3268)


3268 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما تعدُّون الرقوب فيكم؟". قالوا: الذي لا ولد له. قال:"بل، هو الذي لا فرط له".

حسن: رواه البزار (860 - كشف الأستار) عن إبراهيم بن المستمر العروفي، ثنا يعقوب بن إسحاق، ثنا همام، عن قتادة، عن أنس، فذكر مثله. وإسناده حسن من أجل يعقوب بن إسحاق، وهو ابن زيد بن عبد الله الحضرمي مولاهم، أبو محمد النحوي المقرئ من رجال مسلم، قال فيه أبو حاتم:"صدوق". وذكره ابن حبان في"الثقات". وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 11):"رواه أبو يعلى والبزَّار باختصار، ورجال البزار رجال الصحيح.
ورواه أبو يعلى (446 - المقصد العلي) من وجه آخر عن رُشيد أبي عبد الله، ثنا ثابت، عن أنسٍ، فذكر نحوه.

ورشيد الزُّرْبري، مجهول كما قال الذهبي في"الميزان" (2/ 51)، ولذا لم يُصحِّح الهيثمي هذا الإسناد؛ وإنَّما اكتفى بقوله كما ذكرتُ، وإن كان عزاه إلى أبي يعلى.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "তোমাদের মধ্যে তোমরা 'আর-রাকূব' কাকে মনে করো?" তারা বললো, "যার কোনো সন্তান নেই।" তিনি বললেন, "বরং সে হলো সেই ব্যক্তি, যার কোনো 'ফারত' (অগ্রগামী মৃত শিশু) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3269)


3269 - عن أنس بن مالك، قال: مرَّ النبي صلى الله عليه وسلم بامرأة تبكي عند قبر، فقال:"اتقي الله واصبري". قالت: إليك عني، فإنَّك لم تُصب بمصيبتي. ولم تعرفه. فقيل لها: إنَّه رسول الله صلى الله عليه وسلم. فأتت النبيَّ صلى الله عليه وسلم فلم تجد عنده بوَّابين، فقالت: لم أعرفكَ. فقال:"إنَّما الصبر عند الصدمة الأولى".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1283) ومسلم في الجنائز (926) كلاهما من حديث شعبة، عن ثابت البُناني، عن أنس بن مالك، فذكر مثله.

وفي معناه ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"الصبر عند الصدمة الأولى". رواه البزار (791 - كشف الأستار)، عن أحمد بن منصور، ثنا فهد بن حيان، ثنا عمران، عن محمد، عن أبي هريرة، فذكر مثله.

قال البزار:"لا نعلمه عن أبي هريرة إلَّا من هذا الوجه".

قلت: فيه فهد بن حيان أبو زيد، من أهل البصرة، اتفق أهل العلم على تضعيفه. قال ابن حبان:"كان ممن يخطئ حتى يجيء بأحاديث مقلوبة، خرج عن حد الاحتجاج به لما كثر ذلك"،"المجروحين" (868).

وأمَّا قول البزار:"لا نعلمه عن أبي هريرة إلَّا من هذا الوجه. فإنَّه قال ذلك حسب علمه، وإلَّا فقد رُوي هذا الحديث أيضًا من وجه آخر، رواه أبو يعلى (6141 - الأثري) من طريق أبي عبيدة الناجي، حدَّثنا ابن سيرين، عن أبي هريرة، في قصَّة طويلة، وفيه:"الصبر عند الصدمة الأولى، الصبر عند الصدمة الأولى".

وأبو عبيدة الناجي هو بكر بن الأسود، من أهل البصرة، وكان يحيى بن كثير يروي عنه ويقول:"هو كذَّاب". وضعَّفه ابن معين، وقال ابن حبان:"كان أبو عبيدة رجلًا صالحًا، وهو من الجنس الذي ذكرت ممن غلب عليه التقشف حتى غفل عن تعاهد الحديث، فصار الغالب على حديثه المعضلات".

انظر:"المجروحين" (149).

وفي معناه أيضا ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"الصبر عند أول صدمة". رواه البزار (792 -
كشف) من طريق محمد بن عمر بن واقد، ثنا إبراهيم بن إسماعيل، عن داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكر مثله.

قال البزار:"تفرد به عكرمة، عن ابن عباس، وفيه الواقدي". وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 3):"فيه الواقدي، وفيه كلام كثير، وقد وُثِّق".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি কবরের পাশে ক্রন্দনরত এক মহিলার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন, "আল্লাহকে ভয় করো এবং ধৈর্য ধারণ করো।" মহিলাটি বলল, আমার কাছ থেকে সরে যান, কারণ আপনি আমার মতো বিপদে আক্রান্ত হননি। সে তাঁকে চিনতে পারেনি। অতঃপর তাকে বলা হলো, ইনি তো আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তখন সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো এবং তাঁর কাছে কোনো প্রহরী বা দ্বাররক্ষক দেখতে পেল না। সে বলল, আমি আপনাকে চিনতে পারিনি। তখন তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই ধৈর্য হলো প্রথম আঘাতের সময়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3270)


3270 - عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أصابته مصيبة فقال كما أمر الله: {إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} اللهم أجرني في مصيبتي، وأعقبني خيرًا منها، إلَّا فعل الله ذلك به".

قالت أم سلمة: فلمَّا توفي أبو سلمة، قلتُ ذلك. ثمَّ قلت: ومن خير من أبي سلمة؟ . فأعقبها الله رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فتزوَّجها.

وفي رواية:"ما من مسلم تُصيبه مصيبة فيقول ما أمره الله به: {إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} اللهم أجرني في مصيبتي، وأخلِف لي خيرًا منها، إلَّا خلف الله له خيرًا منها".

قالت: فلمَّا مات أبو سلمة قلت: أي المسلمين خير من أبي سلمة؟ أوّل بيتٍ هاجر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثمَّ إنِّي قلتها، فأخلف الله لي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم.

قالت: أرسل إليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حاطب بن أبي بلتعة يخطبني له. فقلتُ: إنَّ لي بنتًا وأنا غيور. فقال:"أمَّا ابنتها؛ فندعو الله أن يُغنيها عنها، وأدعو الله أن يذهب بالغيرة".

صحيح: رواه مالك في الجنائز (42) عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرته.

والرواية الثانية رواها مسلم في الجنائز (918) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، قال: أخبرني سعد بن سعيد، عن عمر بن كثير بن أفلح، عن ابن سفينة، عن أم سلمة، فذكرت مثله.

وقد رُوي عن أبي سلمة أنَّه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من مسلم يُصاب بمصيبةٍ فيفزع إلى ما أمر الله به من قوله: {إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} اللَّهم عندك احتسبتُ مصيبتي، فأجرني فيها، وعَوِّضني منها، إلَّا آجره الله عليها، وعاضه خيرًا منها".

رواه ابن ماجه (1598) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا يزيد بن هارون، قال: أنبأنا عبد الملك بن قدامة الجمحي، عن أبيه، عن عمر بن أبي سلمة، عن أمِّه أمّ سلمة، عن أبي سلمة، فذكر مثله.

وعبد الملك بن قدامة ضعيف، وأبوه قدامة"مقبول" لأنَّه توبع، ولكن وقع فيه اضطراب، وهو ما
رواه الترمذي (3511) وأحمد (16343) كلاهما من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت، عن عمر بن سلمة، عن أمه أم سلمة، عن أبي سلمة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أصاب أحدكم مصيبة فليقل: اللَّهم عندك احتسبتُ مصيبتي، فأجرني فيها، وأبدلني منها خيرًا". فلمَّا احتضر أبو سلمة قال: اللَّهم اخلف في أهلي خيرًا منِّي، فلمَّا قُبض قالت أم سلمة: {إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} عند الله أحتسبتُ مصيبتي؛ فأجرني فيها.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، ورُوي هذا الحديث من غير هذا الوجه عن أم سلمة. وأبو سلمة اسمه: عبد الله بن عبد الأسد".

ورواه الإمام أحمد مختصرًا إلَّا أنَّه زاد فيه بين ثابت وعمر بن أبي سلمة - ابن عمر بن أبي سلمة، وكذلك رواه أيضًا النسائي في"عمل اليوم والليلة" (1072).

وابن عمر بن أبي سلمة اسمه: محمد. ذكره الحافظ في التقريب وقال فيه:"مقبول" أي حيث يتابع، وإلَّا فليِّن الحديث.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (16344) من وجه آخر عن المطلب عن أم سلمة، قالت: أتاني أبو مسلمة يومًا من عند رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: لقد سمعت من رسول الله قولًا فسُررتُ به، قال:"لا يُصيب أحدًا من المسلمين مصيبةٌ فيسترجع عند مصيبته، ثمَّ يقول: اللَّهم أجرني في مصيبتي، وأخلِف لي خيرًا منها، إلَّا فُعل ذلك به". قالت أم سلمة: فحفظت ذلك منه، فلمَّا توفي أبو سلمة استرجعتُ، وقلت: اللهم أجرني في مصيبتي، وأخلِف لي خيرًا منه. ثمَّ رجعتُ إلى نفسي، قلت: مِن أين لي خيرٌ من أبي سلمة؟ ! فلمَّا انقضت عدَّتي استأذن عليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا أدبُغُ إهابًا لي، فغسلت يدي من القَرَظ، وأذنتُ له، فوضعتُ له وِسادةَ أَدَم حشوها ليفٌ، فقعد عليها، فخطبني إلى نفسي، فلمَّا فرغ من مقالته، قلتُ: يا رسول الله! ما بي أن لا تكون بك الرغبة فيَّ، ولكنِّي امرأةٌ فيَّ غيرةٌ شديدةٌ، فأخاف أن ترى منِّي شيئًا يُعذِّبني الله به، وأنا امرأةٌ قد دخلتُ في السنِّ، وأنا ذاتُ عِيالٍ. فقال:"أمَّا ما ذكرتِ مِنَ الغيرة؛ فسوف يُذهبها الله -عَزَّوَجَلَّ- منكِ، وأمَّا ما ذكرتِ من السنِّ؛ فقد أصابني مثلُ الذي أصابكِ، وأمَّا ما ذكرت من العيالِ؛ فإنَّما عِيالُكِ عِيالي". قالت: فقد أسلمتُ لرسول الله صلى الله عليه وسلم. فتزوَّجها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت أمُّ سلمة: فقد أبدلني الله بأبي سلمة خيرًا منه؛ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم.

والمطلب هو: ابن عبد الله بن حنطب، روايته عن الصحابة مرسلة إلَّا أنس بن مالك ومن في طبقته.

وأظنُّ لوجود هذا الاختلاف لم يصحح الترمذي حديثَ أبي سلمة، وإنَّما أشار إلى أنَّ الحديثَ رُوي من غير هذا الوجه عن أمِّ سلمة؛ لأنَّ الصحيح الثابت أنَّ هذا الحديثَ من مسند أمِّ سلمة كما مضي. والله أعلم.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী, থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো বিপদে আক্রান্ত হয় এবং সে আল্লাহর নির্দেশ অনুসারে বলে: '{إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ} (নিশ্চয় আমরা আল্লাহর জন্য এবং নিশ্চয় আমরা তাঁর দিকেই প্রত্যাবর্তনকারী)। হে আল্লাহ! আমার এই বিপদে আমাকে প্রতিদান দাও এবং আমাকে এর চেয়ে উত্তম কিছু দান করো', আল্লাহ অবশ্যই তার জন্য তাই করে দেন।"

উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, আমি সেই দু'আটি পড়লাম। এরপর (মনে মনে) বললাম: আবূ সালামাহর চেয়ে উত্তম আর কে আছে? কিন্তু আল্লাহ তাঁকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দ্বারা উত্তম প্রতিদান দিলেন এবং তিনি তাঁকে বিবাহ করলেন।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "যে কোনো মুসলিম বিপদে আক্রান্ত হয় এবং আল্লাহর নির্দেশ অনুসারে বলে: '{إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ}। হে আল্লাহ! আমার এই বিপদে আমাকে প্রতিদান দাও এবং আমাকে এর চেয়ে উত্তম বিকল্প দান করো', আল্লাহ অবশ্যই তাকে এর চেয়ে উত্তম বিকল্প দান করেন।"

তিনি (উম্মু সালামাহ) বলেন: আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা যাওয়ার পর আমি বললাম: আবূ সালামাহর চেয়ে উত্তম আর কোন মুসলিম হতে পারে? (তিনি তো ছিলেন) সেই প্রথম পরিবার যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে হিজরত করেছিল। এরপরও আমি সেই দু'আটি করলাম। ফলে আল্লাহ আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাধ্যমে উত্তম বিকল্প দান করলেন।

তিনি (উম্মু সালামাহ) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাতিব ইবনু আবী বালতাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠিয়ে আমার কাছে তাঁর জন্য বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। আমি বললাম: আমার একটি কন্যা আছে এবং আমি খুবই আত্মমর্যাদাসম্পন্ন (ঈর্ষাপরায়ণ নারী)। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার কন্যার ব্যাপারে, আমরা আল্লাহর কাছে দু'আ করব যেন আল্লাহ তাকে তার (অন্য স্বামী বা প্রয়োজন) থেকে মুক্ত করে দেন। আর আমি আল্লাহর কাছে দু'আ করব যেন আল্লাহ তার সেই আত্মমর্যাদার ভাব (غيرة) দূর করে দেন।"

অন্য এক দীর্ঘ বর্ণনায় উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এসে আমাকে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এমন একটি কথা শুনেছি যা আমাকে আনন্দিত করেছে। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মুসলিম যখন কোনো বিপদে আক্রান্ত হয় এবং বিপদের সময় সে ইস্তিরজা (ইন্না লিল্লাহ...) পাঠ করে, তারপর বলে: 'হে আল্লাহ! আমার এই বিপদে আমাকে প্রতিদান দাও এবং এর চেয়ে উত্তম বিকল্প আমাকে দান করো', আল্লাহ তার জন্য তাই করে দেন।" উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেই কথাটি মুখস্থ করে রাখলাম। যখন আবূ সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, আমি ইস্তিরজা পাঠ করলাম এবং বললাম: হে আল্লাহ! আমার এই বিপদে আমাকে প্রতিদান দাও এবং তাঁর চেয়ে উত্তম বিকল্প আমাকে দান করো। এরপর আমি মনে মনে ভাবলাম: আবূ সালামাহর চেয়ে উত্তম আমি কোথা থেকে পাবো?! আমার ইদ্দতকাল শেষ হলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। তখন আমি আমার একটি চামড়া দাবাগাত করছিলাম। আমি ক্বারায (গাছের ছাল) থেকে হাত ধুয়ে তাঁকে অনুমতি দিলাম। আমি তাঁর জন্য খেজুর পাতার আঁশ ভর্তি একটি চামড়ার বালিশ রেখে দিলাম। তিনি তার ওপর বসলেন এবং আমার কাছে নিজের জন্য বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তাঁর কথা শেষ হলে আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার ব্যাপারে আপনার আগ্রহ না থাকার কারণ নেই, তবে আমি একজন নারী যার প্রবল আত্মমর্যাদা (ঈর্ষা) আছে। আমি ভয় করি যে আমি আপনার এমন কিছু দেখব যার জন্য আল্লাহ আমাকে শাস্তি দেবেন। আর আমি বয়সের ভারে উপনীত হয়েছি এবং আমার অনেক সন্তান-সন্ততি আছে। তিনি বললেন: "তুমি তোমার যে আত্মমর্যাদার (غيرة) কথা বললে, আল্লাহ তাআলা শীঘ্রই তোমার থেকে তা দূর করে দেবেন। আর তুমি বয়সের কথা যা বললে, আমি নিজেও সেই বয়সে উপনীত হয়েছি। আর সন্তান-সন্ততির কথা যা বললে, তোমার সন্তান-সন্ততিই আমার সন্তান-সন্ততি।" উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে নিজেকে সমর্পণ করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বিবাহ করলেন। উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এভাবে আল্লাহ আমাকে আবূ সালামাহর চেয়ে উত্তম বিকল্প দান করলেন—আর তিনি হলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।









আল-জামি` আল-কামিল (3271)


3271 - عن أبي موسى قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا مرِض العبد أو سافر،
كُتب له مثل ما كان يعمل مُقيمًا صحيحًا".

صحيح: رواه البخاري في الجهاد (2996) عن مطر بن الفضل، حدثنا يزيد بن هارون، حدثنا العوام، حدثنا إبراهيم أبو إسماعيل السكسكي، قال: سمعت أبا بردة، واصطحب هو ويزيد بن أبي كبشة في سفرٍ، فكان يزيد يصوم في السفر، فقال له أبو بردة: سمعت أبا موسى مِرارًا يقول، فذكر الحديث.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: যখন কোনো বান্দা অসুস্থ হয় অথবা সফরে যায়, তখন সে সুস্থ ও অবস্থানকালে (মুকিম অবস্থায়) যে আমল করত, তার অনুরূপ সওয়াব তার জন্য লিপিবদ্ধ করা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3272)


3272 - عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما أحدٌ من الناس يُصاب ببلاءٍ في جسده إلَّا أَمر الله عز وجل الملائكة الذين يحفظونه فقال: اكتبوا لعبدي في كلِّ يومٍ وليلةٍ ما كان يعمل من خيرٍ، ما كان في وِثاقي".

صحيح: رواه الإمام أحمد (6482)، عن إسحاق بن يوسف الأزرق، حدثنا سفيان الثوري، عن علقمة بن مرثد، عن القاسم، يعني - ابن مُخَيمِرة، عن عبد الله بن عمرو، فذكر مثله.

ورواه أيضًا (6825) عن إسحاق بن يوسف مقرونًا بوكيع، قالا: حدثنا سفيان بإسناده، وفيه:"اكتبوا لعبدي مثل ما كان يعمل وهو صحيح، ما دام محبوسًا في وثاقي". وإسناده صحيح. ورواه الحاكم (1/ 384) من طريق سفيان، وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وقال الهيثمي في المجمعه (2/ 303):"رواه أحمد والبزار، والطبراني في الكبير ورجال أحمد رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، وإن كان البخاري روي عن القاسم بن مخيمرة معلقًا، فإنَّ الحاكم والهيثمي لا يفرقان بين الأصل والتعليق.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মানুষের মধ্যে এমন কেউ নেই যে তার শরীরে কোনো বিপদে পতিত হয়, তবে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল তাঁর সংরক্ষণকারী ফেরেশতাদেরকে নির্দেশ দেন এবং বলেন: আমার বান্দা আমার বন্ধনে (অসুস্থতায়) যতদিন থাকে, ততদিন তার জন্য প্রতি দিন ও রাতে সেই ভালো আমলগুলো লিখতে থাকো, যা সে করত।









আল-জামি` আল-কামিল (3273)


3273 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ العبد إذا كان على طريقة حسنة من العبادة ثمَّ مرض، قيل للملك الموكَّل به: اكتب له مثل عمله إذ كان طليقًا حتَّى أُطلِقَه أو أَكفِتَه إليَّ".

حسن: رواه عبد الرزاق (20308) وعنه الإمام أحمد (6895) وابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (26) عن معمر، عن عاصم بن أبي النجود، عن خيثمة، عن عبد الله بن عمرو، فذكر مثله. وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 303) وقال:"رواه أحمد وإسناده صحيح".

قلت: إسناده حسن من أجل عاصم بن أبي النجود؛ فإنَّه حسن الحديث.

قوله:"أَكْفِته" أي: أَضمُّه إلى القبر كما قال البغوي، وقال: ومنه قوله تعالى: {أَلَمْ نَجْعَلِ الْأَرْضَ كِفَاتًا} [المرسلات: 25].

أي: ذوات كفتٍ - أي ضمٍّ وجمعٍ. يضمُّهم أحياءً على ظهورِها، وأمواتًا في بُطونها"."شرح السنَّة" (5/ 241).




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় কোনো বান্দা যখন ইবাদতের উত্তম পদ্ধতিতে থাকে এবং এরপর সে অসুস্থ হয়ে যায়, তখন তার জন্য দায়িত্বপ্রাপ্ত ফেরেশতাকে বলা হয়: সে মুক্ত (সুস্থ) অবস্থায় যেমন আমল করত, ঠিক সেই আমল তার জন্য লিখতে থাকো, যতক্ষণ না আমি তাকে মুক্তি দেই অথবা আমার দিকে টেনে নেই (মৃত্যু দান করি)।”









আল-জামি` আল-কামিল (3274)


3274 - عن أنس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ابتلي الله العبد المسلم ببلاء في جسده، قال الله: اكتب له صالح عمله الذي كان يعمله، فإن شفاه غسله وطهَّره، وإن قبضه غفر له ورحِمَه".

حسن: رواه الإمام أحمد (12503) وأبو يعلى (4233) كلاهما من حديث حماد بن سلمة، عن سنان بن ربيعة، عن أنس، فذكر مثله.

وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 304):"رواه أبو يعلى وأحمد، ورجاله ثقات".

قلت: إسناده حسن من أجل سنان بن ربيعة الباهلي البصري، أبو ربيعة؛ فإنَّه حسن الحديث، أخرج له البخاري مقرونًا.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ কোনো মুসলিম বান্দাকে তার শরীরে কোনো রোগ বা বিপদ দিয়ে পরীক্ষা করেন, তখন আল্লাহ (ফেরেশতাদের) বলেন: সে (সুস্থ অবস্থায়) যে নেক আমল করত, তা তার জন্য লিখতে থাকো। অতঃপর যদি তিনি তাকে আরোগ্য দান করেন, তবে এই রোগ তাকে (গুনাহ থেকে) ধুয়ে-মুছে পবিত্র করে দেয়। আর যদি তিনি তাকে উঠিয়ে নেন (মৃত্যু দেন), তবে তিনি তাকে ক্ষমা করেন এবং তার প্রতি রহম করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3275)


3275 - عن عقبة بن عامر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"ليس من عمل يوم إلَّا وهو يُختم عليه، فإذا مرض المؤمن قالت الملائكة: يا ربَّنا! عبدك فُلان قد حبسته، فيقول الربُّ - عَزَّوَجَلَّ -: اختموا له على مثل عمله حتَّى يبرأ أو يموت".

حسنٌ: رواه الإمام أحمد (17316) عن علي بن إسحاق، قال: أخبرنا عبد الله، أخبرني ابن لهيعة، قال: حدَّثني يزيد، أنَّ أبا الخير حدَّثه، أنَّه سمع عقبة بن عامر يحدِّث، فذكر مثلَه.

وإسناده حسن، من أجل رواية عبد الله، وهو ابن المبارك، عن ابن لهيعة؛ لأنَّه سمع منه قبل احتراق كتبه.

ورواه الطبراني في الكبير" (17/ 284) وفي"الأوسط" (3257) من طرق أخرى، عن ابن الهيعة بهذا الإسناد.

ورواه الحاكم (4/ 260) و (4/ 308 - 309) من وجهين آخرين، عن عقبة بن عامر، وقال في الموضع الأول:"صحيح على شرط الشيخين".

وقال في الموضع الثاني:"صحيح الإسناد". وتعقَّبه الذهبي فقال:"فيه رشدين، واهٍ". قلت: وهو كما قال؛ فإنَّ رشدين، وهو ابن سعد بن مفلح المهري، تكلَّم فيه جمهور النقَّاد وضعَّفوه.




উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দিনের কোনো আমল এমন নেই যার উপর মোহর লাগানো হয় না (বা যা সংরক্ষিত হয়)। অতঃপর যখন কোনো মুমিন অসুস্থ হয়ে পড়ে, তখন ফেরেশতারা বলে: 'হে আমাদের রব! আপনার অমুক বান্দাকে আপনি আটকে রেখেছেন।' তখন আল্লাহ তা'আলা বলেন: 'সে সুস্থ না হওয়া পর্যন্ত অথবা মৃত্যু বরণ না করা পর্যন্ত তার আমলনামায় তার পূর্বের কৃতকর্মের সমতুল্য আমল লিখে দাও (বা সংরক্ষণ করো)।'"









আল-জামি` আল-কামিল (3276)


3276 - عن أبي الأشعث الصنعاني، أنَّه راح إلى مسجد دمشق، وهجَّر بالرواح، فلقي شدَّاد بن أوس والصُّنابحي معه، فقلت: أين تريدان يرحمكما الله؟ قالا: نريد هاهنا إلى أخٍ لنا مريض نعوده. فانطلقت معهما حتَّى دخلا على ذلك الرجل، فقالا له: كيف أصبحتَ؟ قال: أصبحتُ بنعمة. فقال له شدَّاد: أَبشر بكفَّارات السيِّئات، وحطِّ الخطايا؛ فإنِّي سمِعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الله عز وجل يقول: إنِّي إذا ابتلَيتُ عبدًا من عبادي مؤمِنًا فحمِدني على ما ابتليته؛ فإنَّه يقوم من مضجعه ذلك كيوم ولدته أُمُّه من الخطايا، ويقول الربُّ - عَزَّوَجَلَّ -: أنا قيَّدتُ عبدي، وابتليتُه، فأَجْروا له
كما كنتم تُجْرون له وهو صحيح".

حسن: رواه الإمام أحمد (17118) والطبراني في"الكبير" (7136) وفي"الأوسط" (4706) كلهم من طرف عن إسماعيل بن عياش، عن راشد بن داود الصنعاني، عن أبي الأشعث، فذكر مثلَه.

وإسناده حسن، من أجل راشد بن داود؛ فإنَّه مختلَف فيه؛ فوثَّقه ابن معين، والدارميّ، وذكره ابن حبَّان في الثقات، وتكلَّم فيه البخاري، والدارقطني، غير أنَّه حسن الحديث في الشواهد، ولا يُقبل إذا انفرد أو خالف.

وأمَّا إسماعيل بن عيَّاش؛ فهو الحمصي، وهو ضعيف في غير الشاميين، وبه أعلَّه الهيثمي في"المجمع" (2/ 303 - 304)، وروايته هنا عن الشاميين؛ فإنَّ راشد بن داود الصنعاني من أهل صنعاء دمشق، وليس من صنعاء اليمن. والله أعلم.




শাদ্দাদ ইবনে আউস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ আল-আশআছ আস-সান‘আনী বলেন যে, তিনি (আবূ আল-আশআছ) দামেশকের মাসজিদে গেলেন এবং দ্রুত হাঁটা শুরু করলেন। সেখানে তিনি শাদ্দাদ ইবনে আউস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর সঙ্গে আস-সুনাবিহীকে পেলেন। আমি বললাম: আল্লাহ আপনাদের উপর রহম করুন! আপনারা কোথায় যাচ্ছেন? তারা বললেন: আমরা আমাদের এক অসুস্থ ভাইকে দেখতে এখানে যাচ্ছি। আমি তাদের সাথে গেলাম। তারা সেই ব্যক্তির কাছে প্রবেশ করে তাকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনার কেমন লাগছে? সে বলল: আল্লাহর অনুগ্রহে আছি। তখন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আপনি গুনাহ মাফ এবং পাপ মোচনের সুসংবাদ গ্রহণ করুন! কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বলেন: আমি যখন আমার মুমিন বান্দাদের কাউকে কোনো বিপদে ফেলে পরীক্ষা করি, আর সে আমার দেওয়া সেই পরীক্ষার উপর আমার প্রশংসা করে, তবে সে তার বিছানা থেকে এমনভাবে উঠে দাঁড়ায়, যেমন তার মা তাকে সেদিনের মতো জন্ম দিয়েছিল যখন সে ছিল পাপমুক্ত। আর মহান প্রভু আযযা ওয়া জাল্লা বলেন: আমি আমার বান্দাকে বেঁধে ফেলেছি (অসুস্থতার কারণে), আর তাকে আমি পরীক্ষা করেছি। অতএব, সে সুস্থ অবস্থায় থাকা কালে তার জন্য তোমরা যে নেকি জারি রাখতে, এখন সে অসুস্থ থাকা সত্ত্বেও তার জন্য সেই নেকি জারি রাখো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3277)


3277 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قال الله تعالى:"إذا ابتليتُ عبدي المؤمن، ولم يشكني إلى عُوَّاده أطلقته من إِساري، ثمَّ أبدلته لحمًا خيرًا من لحمه، ودمًا خيرًا من دمه، ثمَّ يستأنِف العمل".

صحيح: رواه الحاكم (1/ 348 - 349) من طريق أبي بكر الحنفي، ثنا عاصم بن محمد بن زيد، عن سعيد بن أبي سعيد المقري، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر مثلَه. وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وفي الباب: عن أبي هريرة مرفوعًا:"ما من عبد يمرض مرضًا إلَّا أمر الله حافظه أنَّ ما عمِل من سيئة فلا يكتبها، وما عمل من حسنةٍ أن يكتبها له عشر حسنات، وأن يكتب له من العمل الصالح كما كان يعمل وهو صحيح، وإن لم يعمل".

رواه أبو يعلى (6607 - الأثري) عن صالح بن مالك، حدَّثنا عبد الأعلى بن أبي المساور، حدَّثنا محمد بن عمرو بن عطاء، عن أبي هريرة، فذكر مثلَه.

قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 304):"فيه عبد الأعلى، وهو ضعيفٌ".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা বলেন: যখন আমি আমার মুমিন বান্দাকে কোনো বিপদে ফেলি (পরীক্ষা করি) আর সে তার দেখতে আসা লোকদের কাছে আমার ব্যাপারে কোনো অভিযোগ না করে, তখন আমি তাকে আমার বন্ধন থেকে মুক্ত করে দেই। অতঃপর আমি তাকে তার মাংসের চেয়ে উত্তম মাংস এবং তার রক্তের চেয়ে উত্তম রক্ত দ্বারা পরিবর্তন করে দেই। এরপর সে নতুন করে (সৎ) কাজ শুরু করে।









আল-জামি` আল-কামিল (3278)


3278 - عن أنس بن مالك، قال: اشتكى ابن لأبي طلحة، قال: فمات وأبو طلحة خارجٌ. فلمَّا رأت امرأته أنَّه قد مات هيَّأت شيئًا، ونحَّته في جانب البيت. فلمَّا جاء أبو طلحة قال: كيفَ الغلام؟ قالت: قد هدأت نفسُه، وأرجو أن يكون قد استراح.
وظنَّ أبو طلحة أنَّها صادقة، قال: فبات، فلمَّا أصبح اغتسل. فلمَّا أراد أن يخرجَ أعلمته أنَّه قد ماتَ! فصلَّي مع النبي صلى الله عليه وسلم، ثمَّ أخبر النبيَّ صلى الله عليه وسلم بما كان منهما. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لعلَّ الله أن يُبارك لكما في ليلتكما". قال سفيان: فقال رجل من الأنصار: فرأيتُ لهما تسعة أولادٍ كلُّهم قد قرأ القرآن.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1301) عن بشر بن الحكم، حدَّثنا سفيان بن عيينة، أخبرنا إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، أنَّه سمع أنسًا فذكره.

ورواه مسلم في فضائل الصّحابة (2144) من طريق بهز، ثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس بن مالك، قال:"مات ابن لأبي طلحة من أمِّ سُلَيم، فقالت لأهلها: لا تُحدِّثوا أبا طلحة بابنه حتَّى أكون أنا أُحدِّثه. قال: فجاء، فقرَّبت إليه عَشاءً. فأكل وشرب. فقال: ثمَّ تصنَّعت له أحسن ما كان تصنَّعُ قبل ذلك، فوقع بها. فلمَّا رأت أنَّه قد شبع وأصاب منها، قالت: يا أبا طلحة! أرأيتَ لو أنَّ قومًا أعاروا عاريتهم أهل بيتٍ، فطلبوا عاريتهم، ألهم أن يمنعوهم؟ قال: لا. قالت: فاحتسب ابنك. قال: فغضب، وقال: تركتني تلطَّختُ ثمَّ أخبرتني بابني؟ ! فانطلق حتَّى أتي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخبره بما كان. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بارك الله لكما في غابر ليلتكما". فذكر الحديثَ وفيه قصَّة تحنيك الأبن لأم سُليم.

ورواه أبو داود الطيالسيّ في مسنده (2168)، عن سليمان بن المغيرة، وحماد بن سلمة،

وجعفر بن سليمان، كلهم عن ثابت، عن أنس، وساق بهذا الإسناد قصة أم سليم بشيءٍ من

التفصيل، وها أنا أسوقها بكاملها لاشتمالها على فوائد كثيرةٍ، قال: قال مالكٌ أبو أنسٍ لامرأته أم

سليم -وهي أم أنس-: إنَّ هذا الرجل -يعني النبي صلى الله عليه وسلم يُحرِّم الخمرَ، فانطلَق حتَّى أتى الشامَ

فهلك هناك، فجاء أبو طلحة، فخطب أمَّ سُليم، فكلَّمها في ذلك، فقالت: يا أبا طلحة! ما مثلكَ

يُردُّ، ولكنَّكَ امروءٌ كافرٌ، وأنا امرأةٌ مسلِمة، لا يصلُح لي أن أتزوَّجَك. فقال: ما ذاكِ دهركِ.

قالت: وما دهري؟ قال: الصفراء والبيضاء. قالت: فإني لا أُريد صفراءَ ولا بيضاءَ، أُريدُ منكَ

الإسلامَ. قال: فمن لي بذلك؟ قالت: لك بذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم. فانطلق أبو طلحة يُريدُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم،

ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم جالسٌ في أصحابه، فلمَّا رآه قال:"جاءكم أبو طلحة، غُرَّة الإسلامِ بينَ عينيه".

فجاء، فأخبر النبيَّ صلى الله عليه وسلم بما قالت أمُّ سُليم، فتزوَّجها على ذلك. قال ثابتٌ: فما بلغنا أنَّ مهرًا كان أعظم منه، إنَّها رضيت الإسلامَ مهرًا، فتزوَّجها، وكانت امرأةً مليحة العينين، فيها صغر، فكانت معه حتَّى وُلِد له بُنَيٌّ، وكان يُحبُّه أبو طلحة حبًّا شديدًا، ومرِض الصبيُّ، وتواضعَ أبو طلحة لمرضه، أو تضعضعَ له، فانطلق أبو طلحة إلى النبي صلى الله عليه وسلم، ومات الصبيُّ، فقالت أم سليم: لا ينعينَّ إلى أبي طلحة أحدٌ ابنه، حتَّى أكون أنا الذي أنعاء له. فهيَّأت الصبيَّ ووضعته، وجاء أبو طلحة من عند رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّي دخل عليها، فقال: كيف ابني؟ فقالت: يا أبا طلحة! ما كان منذ اشتكي
أسكن منه الساعة. قال: فلله الحمد. فأتته بعَشائه فأصاب منه، ثمَّ قامت فتطيَّبت وتعرَّضت له، فأصاب منها، فلمَّا علِمت أنَّه طعم وأصابَ منها، قالت: يا أبا طلحة! أرأيتَ لو أنَّ قومًا أعاروا قومًا عاريةً لهم، فسألوهم إيَّاها، أكان لهم أن يمنعوهم؟ فقال: لا. قالت: فإنَّ الله عز وجل كان أعارك ابنك عاريهً ثمَّ قبضه إليه، فاحتسب ابنَك، واصبر. فغضب، ثمَّ قال: تركتيني حتَّى إذا وقعتُ بما وقعتُ به نعيتِ إليَّ ابني؟ ! ثمَّ غدا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخبره فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بارك الله لكما في غابر ليلتكما. فتلقَّت من ذلك الحملَ، وكانت أم سليم تسافر مع النبي صلى الله عليه وسلم، تخرج معه إذا خرج، وتدخل معه إذا دخل، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ولدت فأتوني بالصبي".

فأخذها الطلق ليلةَ قربهم من المدينة، فقالت: اللَّهم إني كنتُ أدخل إذا دخل نبيك، وأخرج إذا

خرج نبيُّك، وقد حضر هذا الأمر، فولَدت غلامًا، وقالت لابنها أنسٍ: انطلقْ بالصبي إلى رسول الله

صلى الله عليه وسلم، فأخذ أنسٌ الصبيَّ فانطلق به إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وهو يسم إبلًا أو غنمًا، فلمَّا نظر إليه قال لأنسٍ:

"أولدت بنت مِلحانَ؟". قال: نعم. فألقى ما في يده، فتناولَ الصبيَّ، فقال:"ائتوني بتمراتٍ عجوةٍ". فأخذ النبي صلى الله عليه وسلم التمرَ، فجعل يُحنِّكُ الصبيَّ، وجعلَ الصبيُّ يتلمَّظ، فقال:"انظروا إلى حُبِّ الأنصار التمرَ". فحنَّكه رسول الله صلى الله عليه وسلم، وسمَّاه عبد الله.

قال ثابتٌ: وكانَ يُعدُّ من خيارِ المسلمينَ. ولعل الزيادات التي في هذه القصة ليست من سليمان بن المغيرة؛ لأن السياق الذي ساقه مسلم والإمام أحمد (13026) عنه، ليس فيه هذه الزيادات، وإليه أشار الطيالسي في قوله: وحدثنا شيخ سمعه من النضر بن أنس، وقد دخلت حديث بعضهم في بعض، قال مالك أبو أنس لامرأته، فذكر القصة. وهذا الشيخ المجهول لا يضر؛ لأنَّ أبا داود أسنده عن غيره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এক সন্তান অসুস্থ হয়ে পড়ল। তিনি (আনাস) বলেন, অতঃপর সে মারা গেল, যখন আবু তালহা বাইরে ছিলেন। যখন তাঁর স্ত্রী (উম্মে সুলাইম) দেখলেন যে সে মারা গেছে, তখন তিনি (সন্তানকে) কিছু কাপড় দিয়ে ঢেকে ঘরের এক কোণে সরিয়ে রাখলেন। যখন আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন, তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, "ছেলেটি কেমন আছে?" স্ত্রী বললেন, "তার আত্মা স্থির হয়েছে, আর আমি আশা করি সে আরাম পেয়েছে।"

আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মনে করলেন যে তিনি সত্য বলছেন। তিনি বলেন, অতঃপর তিনি রাত্রি যাপন করলেন। যখন সকাল হলো, তিনি গোসল করলেন। যখন তিনি বের হতে চাইলেন, তখন স্ত্রী তাকে জানালেন যে, সে মারা গেছে। অতঃপর তিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করলেন, তারপর নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাদের দুজনের মধ্যে যা ঘটেছিল তা জানালেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হয়তো আল্লাহ তোমাদের এই রাতের মধ্যে বারাকাহ দান করবেন।" সুফিয়ান বলেন: আনসারদের এক ব্যক্তি বললেন, "আমি তাদের নয়জন সন্তানকে দেখেছি, যাদের প্রত্যেকেই কুরআন পাঠকারী ছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (3279)


3279 - عن سعد بن أبي وقاص، قال: قلت: يا رسول الله! أيُّ الناس أشد بلاءً؟ قال:"الأنبياء، ثمَّ الأمثل، فالأمثل، فيبتلى الرجل على حسب دينه، فإن كان دينه صُلبًا اشتدَّ بلاؤه، وإن كان في دينه رقَّة ابتُلي على حسب دينه، فما يبرح البلاء بالعبد حتَّى يتركه يمشي على الأرض ما عليه خطيئة".

حسن: رواه الترمذي (2398) وابن ماجه (4023) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن عاصم، عن مصعب بن سعد، عن أبيه سعد بن أبي وقاص، فذكر مثله، ولفظهما سواء. قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: إسناده حسن فقط؛ لأنَّ عاصمًا وهو ابن بَهدلة، حسن الحديث، ومن طريقه رواه الإمام أحمد (1481)، وصححه ابن حبان (2900).

ولكن قال الحاكم (1/ 40 - 41):"ولحديث عاصم بن بهدلة، عن مصعب بن سعد، عن أبيه،
طرق يُتَّبع ويُذاكر بها، وقد تابع العلاء بن المسيب عاصم بن بهدلة على روايته عن مصعب بن سعد، ثمَّ أسنده من طريقه، ولفظه: سئل النبي صلى الله عليه وسلم: أيُّ الناس أشد بلاءً؟ قال: والأنبياء، ثمَّ الأمثل، فالأمثل، فإن كان الرجل صلب الدين يبتلى الرجل على قدر دينه، فمن ثخن دينه ثخن بلاؤه". وقال:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين". ثمَّ أسند من طرق كثيرة حديث عاصم عن مصعب بن سعد، عن أبيه.

قلت: ولكن رواه ابن حبان في صحيحه (2920) من وجه آخر عن العلاء بن المسيب، عن أبيه، عن سعد نحوه. والمسيب هو ابن رافع، لم يسمع من سعد.

وقوله:"الأمثل فالأمثل" أي الأعلى فالأعلى في الرتبة والمنزلة. يقال: هذا أمثل من هذا، أي أفضل، وأماثل الناس: خيارهم.

والخلاصة في حديث الباب: أنَّ ابتلاء الأنبياء صلوات الله عليهم ليس لمحو خطاياهم إذ لا خطايا لهم؛ بل لرفع درجاتهم عند الله - عَزَّوَجَلَّ -. انظر معنى هذا عند الطحاوي في مشكله: (5/ 456).




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! সব মানুষের মধ্যে কার বালা-মুসিবত সবচেয়ে কঠিন?' তিনি বললেন, "নবীগণ, অতঃপর যারা তাঁদের কাছাকাছি, অতঃপর যারা তাঁদের কাছাকাছি। মানুষকে তার দ্বীনের মান অনুযায়ী পরীক্ষা করা হয়। যদি তার দ্বীন মজবুত ও সুদৃঢ় হয়, তবে তার পরীক্ষা কঠোর হয়। আর যদি তার দ্বীনে দুর্বলতা থাকে, তবে তার দ্বীনের মান অনুযায়ীই তাকে পরীক্ষা করা হয়। বান্দার উপর এই বিপদাপদ লেগেই থাকে যতক্ষণ না মুসিবত তাকে এমন অবস্থায় ছেড়ে দেয় যে, সে জমিনের উপর চলাফেরা করে অথচ তার কোনো গুনাহ অবশিষ্ট থাকে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3280)


3280 - عن عبد الله بن مسعود، قال: دخلتُ على رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يوعَك، فقلت: يا رسول الله! إنَّك توعَك وَعْكًا شديدًا؟ ! قال:"أَجل! إنِّي أُوعَك كما يوعَك رجلان منكم". فقلتُ: ذلك أنَّ لك أجرين؟ قال:"أَجل! ذلك كذلك، ما من مسلم يُصيبُه أذىً، شوكةٌ فما فوقها إلَّا كفَّر الله بها سيِّئآته كما تحطُّ الشجر ورقها".

متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5647) ومسلم في البر والصلة (2571) كلاهما من حديث سفيان، عن الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن الحارث بن سُوَيد، عن عبد الله، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম, তখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি তো কঠিন জ্বরে/কষ্টে ভুগছেন! তিনি বললেন, "হ্যাঁ! তোমাদের মধ্যে দু'জন লোক যেমন জ্বরে ভুগে, আমিও তেমন জ্বরে ভুগি।" আমি বললাম, এর কারণ কি এই যে আপনার জন্য দ্বিগুণ সওয়াব রয়েছে? তিনি বললেন, "হ্যাঁ! ব্যাপারটি সেরকমই। কোনো মুসলিম যখনই কোনো কষ্টের সম্মুখীন হয়—একটি কাঁটা বিধলেও বা তার চেয়েও বড় কিছু ঘটলেও—আল্লাহ এর মাধ্যমে তার পাপসমূহ এমনভাবে মোচন করে দেন, যেমন গাছ তার পাতা ঝরিয়ে দেয়।"