আল-জামি` আল-কামিল
3281 - عن أبي سعيد الخدري، قال: دخلت على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يوعك، فوضعت يدي عليه، فوجدت حره بين يديَّ فوق اللِّحاف، فقلت: يا رسول الله! ما أشدَّها عليك! قال:"إنَّا كذلك يُضعَّف لنا البلاء، ويُضعَّف لنا الأجر". قلت: يا رسول الله! أي الناس أشد بلاءً؟ قال:"الأنبياء". قلت: يا رسول الله! ثمَّ من؟ قال:"ثمَّ الصالحون، إن كان أحدهم ليبتلى بالفقر حتَّى ما يجد أحدهم إلَّا العباءة يحوبها، وإن كان أحدهم ليفرح بالبلاء كما يفرح أحدكم بالرخاء".
حسن: رواه ابن ماجه (4024) عن عبد الرحمن بن إبراهيم، قال: حدثنا ابن أبي فُديك، قال: حدثني هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
إسناده حسن من أجل الكلام في هشام بن سعد المدني؛ فقد ضعَّفه ابن معين، والنسائي، ومشَّاه الآخرون، فقال أبو زرعة:"محله الصدق". وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ولا يُحتجُّ به".
وقال العجلي:"جائز الحديث".
قلت: هو من رجال مسلم، من أثبت الناس في زيد بن أسلم، وقد صحَّح هذا الإسناد البوصيري في"زوائده"، إلَّا أنَّه زاد بين الأنبياء والصالحين"العلماء"، وزاد أيضًا: ويبتلى بالقمل حتَّى تقتله". وقال:"صحيح على شرط مسلم، فقد احتجَّ بهشام بن سعد".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট প্রবেশ করলাম যখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। তখন আমি তাঁর উপর আমার হাত রাখলাম এবং কাঁথার (লেপের) উপর দিয়েই তাঁর হাতের নিচে প্রচণ্ড তাপ অনুভব করলাম। আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনার উপর তা (কষ্ট) কতই না কঠিন!' তিনি বললেন, "আমরা এমনই। আমাদের জন্য বিপদ দ্বিগুণ করে দেওয়া হয় এবং আমাদের জন্য পুরস্কারও দ্বিগুণ করে দেওয়া হয়।" আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! মানুষের মধ্যে কার বিপদ সবচেয়ে কঠিন?' তিনি বললেন, "নবীগণ।" আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! এরপর কারা?' তিনি বললেন, "এরপর সৎকর্মশীলগণ। তাদের মধ্যে কেউ কেউ এমন দারিদ্র্যের শিকার হন যে, তাদের কেবল একটি মাত্র কম্বল বা পশমের পোশাক থাকে যা তারা পরিধান করে (বা জড়িয়ে থাকে)। আর তাদের মধ্যে কেউ কেউ বিপদে এমন খুশি হন, যেমন তোমাদের কেউ কেউ প্রাচুর্য বা স্বাচ্ছন্দ্যে খুশি হয়।"
3282 - عن فاطمة، أخت حذيفة، قالت: أتينا رسول الله صلى الله عليه وسلم نعوده في نساء، فإذا سقاء معلق نحوه، يقطر ماؤه عليه من شدة ما يجد من حرِّ الحمَّى، قلنا: يا رسول الله! لو دعوت الله فشفاك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ من أشد الناس بلاءً الأنبياء، ثمَّ الذين يلونهم، ثمَّ الذين يلونهم".
حسن: رواه الإمام أحمد (27079) والطبراني في"الكبير" (24/ 245) كلاهما من طريق شعبة، عن حصين بن عبد الرحمن، قال: سمعت أبا عبيدة بن حذيفة يحدث عن عمَّته فاطمة، فذكرت الحديث.
ورواه الحاكم (4/ 404) من هذا الوجه، ورجال إسناده ثقات، غير أبي عبيدة بن حذيفة، وهو معروف بكنيته، ولا يسمَّى كما قال أبو حاتم. وقد روي عنه جمع، ووثَّقه ابن حبان، والعجلي، وحسن حديثه الهيثمي في"المجمع" (2/ 292) ولم يُعرف فيه جرح، وأمَّا الحافظ؛ فقال فيه:"مقبول". أي إذا توبع، لكني لم أقف على متابع له غير أنَّه يُحسَّن حديثه لشهرته، وشواهده.
ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি) বলেন, আমরা কয়েকজন মহিলা রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অসুস্থতার সময় তাঁকে দেখতে গেলাম। তখন তাঁর নিকট একটি মশক ঝুলানো ছিল, যার পানি তাঁর উপর ফোঁটা ফোঁটা পড়ছিল, কারণ তিনি জ্বরের প্রচন্ড উত্তাপ অনুভব করছিলেন। আমরা বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসুল! আপনি যদি আল্লাহর নিকট দু’আ করতেন, তাহলে তিনি আপনাকে আরোগ্য দান করতেন!’ তখন রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “নিশ্চয় মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি কষ্টের শিকার হন নবীগণ, তারপর যারা তাদের নিকটবর্তী, তারপর যারা তাদের নিকটবর্তী।”
3283 - عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: دخلنا على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يوعك. فقلنا: أخ أخ، بآبائنا وأمهاتنا يا رسول الله! ما أشدَّ وعكك! فقال:"إنَّا معشر الأنبياء يُضاعف علينا البلاءُ تضعيفًا". قال: قلنا: سبحان الله! قال:"أفعجبتم؟ إنَّ أشدَّ الناس بلاءً الأنبياء والصالحون، الأمثل فالأمثل". قلنا سبحان الله! قال:"أفعجبتم؟ إن كان النبي من الأنبياء ليدرع العباءة من الحاجة، لا يجد غيرها". قلنا: سبحان الله! قال:"أفعجبتم؟ إن كان النبي من الأنبياء ليقتله القمل". قلنا: سبحان الله! قال:"أفعجبتم؟ إن كانوا ليفرحون بالبلاء كما تفرحون بالرّخاء".
حسن: رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (5) عن عبيدالله بن عمر الجُشمي، وغيره، حدَّثنا يحيى بن سليم الطائفي، حدثنا إسماعيل بن كثير، عن زياد بن أبي زياد -مولي ابن عياش-، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، قال: فذكره.
وإسناده حسن، فإنَّ يحيى بن سليم الطائفي وإن كان من رجال الجماعة إلَّا أنَّه مختلف فيه؛ فتكلَّم فيه النسائي، والدارقطني، ووثَّقه ابن معين، وابن سعد، وابن حبان، والعجلي، وغيرهم. وهو حسن الحديث. وبقية رجاله ثقات، وزياد بن أبي زياد -مولي ميسرة المخزومي- المدني،
مولي عبد الله بن عياش بن أبي ربيعة، من رجال مسلم، روي عن مولاه، وعن جماعة من الصحابة، وثَّقه النسائي وغيره، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال:"كان عابدًا زاهدًا". وقال مالك:"كان عمر بن عبد العزيز يُكرمه". وقال أيضًا:"كان رجلًا عابدًا معتزلًا لا يزال يكون وحده".
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম, তখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। আমরা বললাম: আহা! ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোন! আপনার জ্বর (বা রোগ) কতই না কঠিন! তিনি বললেন: "নিশ্চয় আমরা নবীরা, আমাদের উপর বিপদ দ্বিগুণ করে দেওয়া হয়।" বর্ণনাকারী বলেন, আমরা বললাম: সুবহানাল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমরা কি অবাক হচ্ছো? নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে সর্বাধিক কঠিন বিপদ আসে নবীদের উপর এবং অতঃপর নেককারদের উপর— যারা (নেককারীতে) তাদের নিকটবর্তী, অতঃপর যারা তাদের নিকটবর্তী।" আমরা বললাম: সুবহানাল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমরা কি অবাক হচ্ছো? কোনো কোনো নবী তো অভাবের কারণে একটিমাত্র পশমের পোশাক (বা চাদর) পরিধান করতেন, যা ছাড়া অন্য কিছুই তারা পেতেন না।" আমরা বললাম: সুবহানাল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমরা কি অবাক হচ্ছো? কোনো কোনো নবীকে তো উকুন মেরে ফেলত।" আমরা বললাম: সুবহানাল্লাহ! তিনি বললেন: "তোমরা কি অবাক হচ্ছো? নিশ্চয়ই তারা (নবী ও নেককারগণ) বিপদে এমনভাবে আনন্দিত হন, যেমন তোমরা (সাধারণ মানুষ) প্রাচুর্যে (সুখে) আনন্দিত হও।"
3284 - عن عمر، قال: وضعتُ يدي على النبي صلى الله عليه وسلم، فقلت: بأبي وأمي ما أجرك! وهو يومئذٍ محموم، فقال:"إن كنَّا يُضاعف لنا البلاء كما يضاعف لنا الأجر".
صحيح: رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (241) عن عبد الرحمن بن صالح، حدثنا علي بن ثابت، عن الأوزاعي، عن نافع، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، عن عمر، فذكر مثله.
ورجاله ثقات، غير علي بن ثابت، وهو الجزري، فقال فيه الحافظ:"صدوق ربما أخطأ، وقد ضعَّفه الأزدي بلا حجة". كذا قال، والصواب أنَّه ثقة؛ لأنَّه وثَّقه ابن معين، وأبو داود، وأبو زرعة، وابن سعد، وقال النسائي:"ليس به بأس". وذكره ابن حبان في الثقات.
وفي الباب عن أبي هريرة، قال: سئل النبي صلى الله عليه وسلم: من أشد الناس بلاءً؟ فقال:"النبيون، ثمَّ الصالحون".
رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (4)، وفيه ليث، وهو ابن أبي سُليم، ضعَّفه جمهور أهل العلم لضعف حفظه واختلاطه في آخر عمره، قال ابن حبان:"اختلط في آخر عمره، فكان يقلب الأسانيد، ويرفع المراسيل، ويأتي عن الثقات بما ليس من حديثهم".
وفي الباب أيضًا عن عائشة مرفوعًا:"إنَّا معشر الأنبياء يُشدُّ علينا الوجع ليكفِّر عنَّا".
رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (9)، عن إبراهيم، (وهو ابن زياد سبلان)، حدَّثني يحيى بن بُكير، حدثنا ابن لهيعة، حدثني محمد بن عبد الرحمن، عن عروة، عن عائشة، قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُشدَّد عليه إذا مرض، حتَّى لربَّما مكث خمس عشرة لا ينام، وكان يأخذه عرق الكلية، وهو الخاصرة، فقلنا: يا رسول الله! لو دعوتَ الله فيكشف عنك. فقال، فذكرت الحديثَ.
وابن لهيعة فيه كلام مشهور، والحديث ليس من رواية أحد العبادلة عنه.
وفي الباب أيضًا عن عائشة مرفوعًا:"من أُصيب بمصية فليتعز بمصيبته بي؛ فإنَّه لن يُصاب أحد من أمتي بأشد منها".
رواه ابن ماجه (1599)، من حديث موسي بن عبيدة، حدثنا مصعب بن محمد، عن أبي سلمة ابن عبد الرحمن، عن عائشة، فذكرته.
وفيه موسى بن عبيدة الربذي، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وبه ضعَّفه البوصيري في زوائد ابن ماجه.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর আমার হাত রাখলাম এবং বললাম, আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গ হোক! আপনার (কষ্টের) কী প্রতিদান! আর তখন তিনি জ্বরে ভুগছিলেন। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমাদের জন্য যেমন পুরস্কার বহুগুণে বৃদ্ধি করা হয়, তেমনি আমাদের জন্য বিপদও বহুগুণে বৃদ্ধি করা হয়।"
3285 - عن أبي هريرة، وأبي سعيدٍ، عن النبي صلى الله عليه وسلم، قال:"ما يُصيب المسلمَ من نصبٍ، ولا وَصبٍ، ولا همٍّ، ولا حزنٍ، ولا أذىً، ولا غمٍّ، حتَّى الشوكة يُشاكها إلَّا كفَّر الله بها من خطاياه".
متفق عليه: رواه البخاري في المرض (5641، 5642) ومسلم في البر والصلة (2573) كلاهما من حديث محمد بن عمرو بن عطاء، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد وأبي هريرة، فذكر الحديثَ، واللفظ للبخاري.
وفي رواية مسلم:"حتَّى الهمّ يُهمُّه إلَّا كفَّر به من سيِّئاته".
قال الترمذي (966): وسمعت الجارود يقول: سمعت وكيعًا يقول:"لم يُسمع في الهمِّ أنَّه يكون كفَّارة إلَّا في هذا الحديث".
وقوله:"نَصَب ووَصَب" كلاهما بفتحتين، والنصب: التعب، والوصب: دوام الوجع ولُزومه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মুসলিমের ওপর যে ক্লান্তি, দীর্ঘস্থায়ী রোগ, দুশ্চিন্তা, দুঃখ, কষ্ট বা মানসিক যন্ত্রণা আপতিত হয়, এমনকি একটি কাঁটা পর্যন্ত যা তাকে বিদ্ধ করে, আল্লাহ তার বিনিময়ে তার গুনাহসমূহ মোচন করে দেন।"
3286 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله عز وجل يقول يوم القيامة: يا ابن آدم! مَرِضتُ فلم تعُدني؟ قال: يا ربِّ! كيف أعودك وأنتَ ربُّ العالمين؟ قال: أما علِمتَ أنَّ عبدي فلانًا مرِض فلم تعُده؟ أما علِمتَ أنَّك لو عُدتَه لوجدتَّني عنده؟ يا ابن آدم! استطعمتُكَ فلم تُطعِمني؟ قال: يا ربِّ! وكيف أُطعمك وأنت ربُّ العالمين؟ قال: أما علمتَ أنَّه استطعمك عبدي فلانٌ فلم تُطعمه؟ أما علمتَ أنَّك لو أطعمته لوجدت ذلك عندي؟ يا ابن آدم! استسقيتُك فلم تَسقني؟ قال: يا ربِّ! كيفَ أسقيك وأنت ربُّ العالمين؟ قال: استسقاك عبدي فلانٌ فلم تَسقه، أمَا إنَّك لو سقيتَه وجدتَّ ذلك عندي".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2569) عن محمد بن حاتم بن ميمون، حدَّثنا بهزٌ، حدَّثنا حمَّاد بن سلمة، عن ثابتٍ، عن أبي رافعٍ، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা কিয়ামতের দিন বলবেন: হে আদম সন্তান! আমি অসুস্থ হয়েছিলাম, কিন্তু তুমি আমার শুশ্রূষা (দেখভাল) করোনি?" সে বলবে: "হে আমার রব! আপনি তো বিশ্বজগতের প্রতিপালক, আমি কীভাবে আপনার শুশ্রূষা করব?" তিনি বলবেন: "তুমি কি জানতে না যে আমার অমুক বান্দা অসুস্থ হয়েছিল, কিন্তু তুমি তার শুশ্রূষা করোনি? তুমি কি জানতে না যে তুমি যদি তার শুশ্রূষা করতে, তবে আমাকে তার কাছেই পেতে? হে আদম সন্তান! আমি তোমার কাছে খাবার চেয়েছিলাম, কিন্তু তুমি আমাকে খাবার দাওনি?" সে বলবে: "হে আমার রব! আপনি তো বিশ্বজগতের প্রতিপালক, আমি কীভাবে আপনাকে আহার করাব?" তিনি বলবেন: "তোমার কি জানা ছিল না যে আমার অমুক বান্দা তোমার কাছে খাবার চেয়েছিল, কিন্তু তুমি তাকে খাবার দাওনি? তুমি কি জানতে না যে তুমি যদি তাকে খাবার দিতে, তবে তা আমার কাছেই পেতে? হে আদম সন্তান! আমি তোমার কাছে পানীয় চেয়েছিলাম, কিন্তু তুমি আমাকে পান করাওনি?" সে বলবে: "হে আমার রব! আপনি তো বিশ্বজগতের প্রতিপালক, আমি কীভাবে আপনাকে পান করাব?" তিনি বলবেন: "আমার অমুক বান্দা তোমার কাছে পানীয় চেয়েছিল, কিন্তু তুমি তাকে পান করাওনি। মনে রেখো, তুমি যদি তাকে পান করাতে, তবে তা আমার কাছেই পেতে।"
3287 - عن أبي هريرة، لمَّا نزلت: {مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ} [سورة النساء: 123]. بلغت من المسلمين مبلغًا شديدًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قاربوا وسدِّوا، ففي كلِّ ما يُصاب به المسلم كفَّارةٌ، حتَّى النكبة يُنكبها، والشوكة يُشاكها".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2574) من طرق عن سفيان بن عيينة، عن ابن محيصن، شيخٍ من قريش، سمِع محمد بن قيس يُحدِّث عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "যে মন্দ কাজ করবে, সে তার ফল ভোগ করবে।" (সূরা নিসা: ১২৩), তখন এটি মুসলমানদের মাঝে তীব্র উদ্বেগের সৃষ্টি করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা মধ্যপন্থা অবলম্বন করো এবং সঠিক কাজ করে যাও। কেননা মুসলমানের উপর যে কোনো বিপদই আপতিত হোক না কেন, তা তার জন্য কাফ্ফারা (গুনাহের মোচনকারী) হয়ে যায়; এমনকি সামান্য কোনো বিপদ বা কাঁটা যা তাকে বিদ্ধ করে, তাও।"
3288 - عن أبي هريرة، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"وصب المؤمن كفَّارةٌ لخطاياه".
صحيح: رواه الحاكم (1/ 347) وابن أبي الدنيا في"المرض" (58، 131) كلاهما من طريق عبيدالله بن موسى، أنبأ إسرائيل، عن عبد الله بن المختار، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره. قال الحاكم:"صحيح".
وعبد الله بن المختار وإن قال فيه الحافظ:"لا بأس به". فالصواب أنَّه ثقة؛ فقد وثَّقه جماعة من أهل العلم، منهم: ابن معين، والنسائي، وغيرهما، وهو من رجال مسلم. وأمَّا بقية الرجال؛ فهم ثقات من رجال الصحيح.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "মুমিনের রোগ-যন্ত্রণা তার গুনাহসমূহের কাফ্ফারা।"
3289 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما يزال البلاء بالمؤمن والمؤمنة في نفسه وولده وماله، حتَّى يلقى الله وما عليه خطيئةٌ".
حسن: رواه الترمذي (2399) وأحمد (7859) والحاكم (1/ 346) كلهم من حديث محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن فإن محمد بن عمرو هو ابن علقمة الليثي؛ وهو حسن الحديثِ.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মু'মিন পুরুষ ও মু'মিন নারীর উপর বিপদাপদ তার নিজ সত্তা, সন্তান-সন্ততি এবং ধন-সম্পদের ক্ষেত্রে লেগেই থাকে, যতক্ষণ না সে আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ করে এমন অবস্থায় যে তার উপর কোনো গুনাহ (পাপ) বাকি থাকে না।"
3290 - عن أبي هريرة، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: إنَّ الله ليبتلي عبدَه بالسقم، حتَّى يُكفِّر ذلك عنه كلَّ ذنبٍ".
حسن: رواه الحاكم (1/ 347 - 348) من طريق ابن وهب، أخبرني عبد الرحمن بن سلمان الحجري، عن عمرو بن أبي عمرو، عن المقبري، عن أبي هريرة، فذكره.
وإليه عزاه المنذري في"الترغيب والترهيب" (5161).
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
والصواب أنَّ عبد الرحمن بن سلمان الحجري لم يخرج له البخاري، وإنَّما أخرج له مسلم فقط. ثمَّ هو مختلفٌ فيه، قال البخاري:"فيه نظر". وقال النسائي:"ليس به بأس".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: নিশ্চয় আল্লাহ তাঁর বান্দাকে অসুস্থতা (রোগ) দিয়ে পরীক্ষা করেন, যতক্ষণ না এর দ্বারা তাঁর সমস্ত গুনাহ মোচন হয়ে যায়।
3291 - عن أبي هريرة قال: جاءت الحمَّى إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: ابعثي إلى آثر أهلك عندك. فبعثها إلى الأنصار. بقيت عليهم ستة أيام ولياليهم. فاشتدَّ ذلك عليهم.
فأتاهم في ديارهم، فشكوا ذلك إليه، فجعل النبي صلى الله عليه وسلم يدخل دارًا دارًا، وبيتًا بيتًا، يدعو لهم بالعافية. فلمَّا رجع؛ تبعته امرأة منهم فقالت: والذي بعثك بالحق إنِّي لمن الأنصار، وإنَّ أبي لمن الأنصار، فادع الله لي كما دعوت للأنصار، قال:"ما شئتِ؟ إن شئتِ دعوت الله أن يُعافيكِ، وإن شئتِ صبرتِ ولكِ الجنَّة". قالت: بل أصبر، ولا أجعل الجنَّة خطرًا.
حسن: رواه البخاري في الأدب المفرد (502) عن قرة بن حبيب، قال: حدثنا إياس بن أبي تميمة، عن عطاء بن أبي رباح، عن أبي هريرة، فذكر مثله.
وإسناده حسن من أجل إياس بن أبي تميمة؛ فإنَّه"صدوق".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, জ্বর (রোগ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো এবং বললো: আপনার কাছে যারা আপনার সর্বাধিক প্রিয়, আমাকে তাদের কাছে পাঠিয়ে দিন। তখন তিনি সেটিকে আনসারদের কাছে পাঠিয়ে দিলেন। এটি তাদের উপর ছয় দিন ও রাত অবস্থান করলো। ফলে এটি তাদের জন্য খুবই কঠিন হয়ে দাঁড়ালো।
অতঃপর তিনি তাদের বাড়িতে গেলেন। তারা তাঁর কাছে এ বিষয়ে অভিযোগ করলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরে ঘরে ও বাড়িতে বাড়িতে প্রবেশ করতে লাগলেন এবং তাদের জন্য আরোগ্যতার দোয়া করতে লাগলেন।
যখন তিনি ফিরে যাচ্ছিলেন, তখন তাদের মধ্যে থেকে এক মহিলা তাঁকে অনুসরণ করে এলো এবং বললো: যিনি আপনাকে সত্য সহকারে প্রেরণ করেছেন, তাঁর শপথ! আমি আনসারদের অন্তর্ভুক্ত এবং আমার পিতাও আনসারদের অন্তর্ভুক্ত। তাই আপনি আমার জন্য আল্লাহর কাছে দোয়া করুন, যেমন আপনি আনসারদের জন্য করেছেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কী চাও? যদি তুমি চাও, তবে আমি আল্লাহর কাছে দোয়া করবো যেন তিনি তোমাকে আরোগ্য দান করেন। আর যদি তুমি চাও, তবে ধৈর্য ধারণ করতে পারো, আর তোমার জন্য রয়েছে জান্নাত।" মহিলাটি বললো: বরং আমি ধৈর্য ধারণ করবো এবং জান্নাতকে তুচ্ছ করে দেবো না।
3292 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تزال المليلةُ والصداع بالعبد والأَمة، وإنَّ عليهما من الخطايا مثل أحدٍ، فما يدعهما وعليهما مثقال خردلةٍ".
حسن: رواه أبو يعلى (6124 - الأثري) عن سويد بن سعيد، حدَّثنا ضِمام، عن موسي بن وَرْدَان، عن أبي هريرة، فذكر مثله.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 301):"رواه أبو يعلى ورجاله ثقات".
قلت: وهو كما قال، إلَّا أنَّ سويد بن سعيد وإن كان مسلم أخرج له ولكنه مختلَف فيه؛ قال عبد الله بن أحمد:"عرضت على أبي أحاديثَ سويد عن ضمام بن إسماعيل، فقال لي: اكتُبْها كلَّها؛ فإنَّه صالحٌ، أو قال: ثقة". وقال الميموني عن أحمد:"ما علمت إلَّا خيرًا". وتكلم فيه ابن معين والنسائي، وغيرهما، غير أنَّ الخلاصة فيه: أنَّه حسن الحديث، وخاصة في ضمام بن إسماعيل.
وكذلك فيه عن موسي بن وَرْدَان أبي عمر المصري، مختلف فيه، غير أنَّه حسن الحديث إذا لم يخالف.
والمليلة: حرارة الحُمَّى التي تكون في العِظام.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: বান্দা ও বান্দীর সাথে উচ্চ জ্বর ও মাথাব্যথা লেগে থাকে, যদিও তাদের উপর উহুদ পর্বতের সমপরিমাণ পাপ থাকে। এরপরও এগুলি (পীড়াগুলি) তাদের এমনভাবে ত্যাগ করে না, যতক্ষণ না তাদের উপর একটি সরিষার দানা পরিমাণ পাপও অবশিষ্ট থাকে।
3293 - عن جابر بن عبد الله، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على أم السائب، أو أم المسيب، فقال:"ما لكِ يا أمَّ السائب! أو أمَّ المُسيِّب! تُزفزفين؟". قالت: الحُمَّى لا بارك الله فيها! فقال:"لا تسُبِّي الحمَّى؛ فإنَّها تُذِهب خطايا بني آدم كما يُذهِب الكير خَبَثَ الحديدِ".
صحيح: رواه مسلم في البر والصّلة (2575) عن عبيدالله بن القواريريّ، حدَّثنا يزيد بن زُرَيع، حدَّثنا حجَّاجٌ الصوَّاف، حدَّثني أبو الزبير، حدَّثنا جابر بن عبد الله، فذكره.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মুস সা-ইব অথবা উম্মুল মুসায়্যিব-এর নিকট প্রবেশ করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে উম্মুস সা-ইব! অথবা উম্মুল মুসায়্যিব! তোমার কী হলো যে তুমি কাঁপছো/শিহরিত হচ্ছো?" তিনি বললেন: জ্বর! আল্লাহ এতে বরকত না দিন! তখন তিনি বললেন: "তুমি জ্বরকে গালি দিও না; কারণ এটি বনী আদমের (মানুষের) গুনাহসমূহ দূর করে দেয়, যেমন হাপর লোহার মরিচা দূর করে দেয়।"
3294 - عن جابر، قال: استأْذَنَت الحُمَّي على النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"من هذه؟". قالت: أُمُّ مِلْدَم. قال: فأمر بها إلى أهلِ قباء. فلقوا منها ما يعلم الله، فأتوه فشكوا ذلك إليه. فقال:"ما شئتم؟ إن شئتم أن أدعو الله لكم فيكشفها عنكم، وإن شئتم أن تكون لكم طَهورًا".
وفي رواية قالوا: بل تكون طهورًا.
صحيح: رواه الإمام أحمد (14393) وأبو يعلي (1892) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكر مثله.
وصحَّحه ابن حبان (2935) والحاكم (1/ 346) وقال:"صحيح على شرط مسلم". وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 305 - 306) وقال:"رواه أحمد، وأبو يعلى، ورجال أحمد رجال الصحيح".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জ্বর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসার জন্য অনুমতি চাইল। তখন তিনি বললেন: “কে এটি?” সে বলল: “উম্মে মিলদাম।” তিনি একে কুবাবাসীর দিকে যাওয়ার নির্দেশ দিলেন। আল্লাহ জানেন, তারা এর কারণে কী ধরনের কষ্ট ভোগ করল। অতঃপর তারা তাঁর কাছে এসে এ ব্যাপারে অভিযোগ করল। তখন তিনি বললেন: “তোমরা কী চাও? যদি তোমরা চাও, আমি তোমাদের জন্য আল্লাহর কাছে দু'আ করব, ফলে তিনি তা তোমাদের থেকে দূর করে দেবেন। আর যদি তোমরা চাও, তবে এটা তোমাদের জন্য পবিত্রতা (পাপ মোচনকারী) হবে।” অন্য এক বর্ণনায় আছে, তারা বলল: “বরং এটা পবিত্রতা (পাপ মোচনকারী) হোক।
3295 - عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من مسلم ولا مسلمة، ولا مؤمن ولا مؤمنة، يمرض مرضًا إلَّا حطَّ الله عنه من خطاياه".
حسن: رواه الإمام أحمد (15146) وأبو يعلى (2305) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكر مثله، واللفظ لأحمد.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا البخاري في"الأدب المفرد" (508) إلَّا أنَّه قال فيه:"إلَّا قضي الله به عنه خطاياه".
وأبو سفيان هو طلحة بن نافع، وهو"صدوق"، وقد توبع عند أحمد (14725) والبزار (758 - كشف) وابن حبان في صحيحه (2927) فرووه من وجهٍ آخر عن أبي الزبير، عن جابر.
ولفظ ابن حبان:"إلَّا حطَّ الله بذلك خطاياه كما تنحط الورقة عن الشجرة".
قال البزار:"لا نحفظ له طريقًا عن جابر أحسن من هذا".
وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 301):"رواه أحمد وأبو يعلى والبزار، ورجال أحمد رجال الصحيح".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এমন কোনো মুসলিম পুরুষ বা মুসলিম নারী অথবা মুমিন পুরুষ বা মুমিন নারী নেই, যে কোনো রোগে আক্রান্ত হয়, কিন্তু আল্লাহ এর বিনিময়ে তার কিছু গুনাহ মোচন করে দেন।”
3296 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يُصيب المؤمنَ من مصيبة حتَّى الشوكة إلَّا قُصَّ بها، أو كفِّر بها من خطاياه".
لا يدري أيهما قال عروة.
متفق عليه: رواه مالك في العين (6) عن يزيد بن خصيفة، عن عروة بن الزبير، أنَّه قال: سمعتُ عائشةَ زوج النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت مثله.
ورواه مسلم في البر والصلة (2572) عن أبي الطاهر، أخبرنا ابن وهب، قال: أخبرني مالك ابن أنس، بإسناده، فذكر مثله.
ورواه الشيخان، البخاري في المرضى (5640) ومسلم كلاهما من حديث ابن شهابٍ، عن عروة، بإسناده، وفيه:"إلَّا كفَّر الله بها عنه، حتَّى الشوكة يُشاكُها" بدون تردد.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মুমিনকে যে কোনো বিপদ স্পর্শ করে—এমনকি একটি কাঁটার আঘাতও—তা দ্বারা হয়তো তার (পাপের) কিছুটা কমানো হয়, অথবা এর দ্বারা তার পাপসমূহ মোচন করা হয়।"
3297 - عن الأسود، قال: دخل شابٌ من قريش على عائشة، وهي بمنًى وهم يضحكون، فقالت: ما يُضحككم؟ قالوا: فُلانٌ خرَّ على طُنُبِ فُسطاط فكادت عنقه، أو عينه أن تذهب، فقالت: لا تضحكوا؛ فإنِّي سمِعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من مسلم يُشاك شوكةً فما فوقها إلَّا كُتِبت له بها درجةٌ، ومُحِيَت عنه بها خطيئةٌ".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2572) من طرق عن جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، به مثله.
وقوله:"طُنب": هو الحبل الذي يُشدُّ الفسطاط، والخِباء، ونحوه.
وفي الباب عن عائشة، أنَّ رجلًا تلا هذه الآية: {مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ}، فقال: إنَّا لنُجزي
بكلِّ عملنا؟ هلكنا إذًا! فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"نعم يُجزى به المؤمنون في الدنيا في مصيبة في جسده فيما يؤذيه".
رواه أحمد (24368) وأبو يعلى (4675، 4839) كلاهما عن هارون بن معروف، حدثنا ابن وهب، قال: أخبرني عمرو، أنَّ بكر بن سوادة حدَّثه، أنَّ يزيد بن أبي يزيد حدَّثه، عن عبيد بن عمير، عن عائشة، فذكرت الحديث.
وصحَّحه ابن حبَّان (2923)، وفي الإسناد يزيد بن أبي يزيد، وهو الأنصاري، مولي مسلمة بن مخلد، لم يوثقه أحدٌ، وإنَّما ذكره ابن حبَّان في"الثقات" (7/ 631)، وأخرج حديثَه في صحيحه، وهو من رجال"التعجيل" (1193)، وقد أطال الحافظ الكلام عليه، فانظره، وأمَّا قول الهيثمي في"المجمع" (7/ 12):"رواه أحمد وأبو يعلى، ورجالهما رجال الصحيح"، فليس بصحيحٍ؛ لأنَّ يزيد بن أبي يزيد ليس من رجال الصحيح، ولعلَّ الهيثمي ظنَّ أنَّه يزيد بن أبي يزيد الضُّبَعي، المعروف بالرِّشك؛ فإنَّه من رجال الجماعة، وليس كذلك.
وأمَّا ما رُوي عن أبي بكر، قال: يا رسول الله! كيف الصلاح بعد هذه الآية: {لَيْسَ بِأَمَانِيِّكُمْ وَلَا أَمَانِيِّ أَهْلِ الْكِتَابِ مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ} [النساء: 123]. فكلُّ سوء عملنا جُزينا به؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"غفر الله لك يا أبا بكر! ألستَ تمرض؟ ألست تنصب؟ ألست تحزن؟ ألستَ تصيبُك اللأواء؟". قال: بلى. قال:"فهو ما تُجزون به". ففيه انقطاع، رواه الإمام أحمد (68) وأبو يعلى (98، 99، 100، 101) كلاهما من طرق، عن إسماعيل بن أبي خالدٍ، عن أبي بكر بن أبي زهير، قال: أُخبِرتُ أنَّ أبا بكر قال، فذكر مثله. واللفظ لأحمد.
وأخرجه ابن حبَّان في صحيحه (2910، 2926) والحاكم (3/ 74، 75) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالدٍ، وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإِسناد.
قلتُ: أبو بكر بن أبي زهير لم يروِ عنه إلَّا اثنان، ولم يوثقه أحدٌ؛ ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، ثمَّ هو من صغار التابعين، لم يسمع من أبي بكر؛ وقد جزم به الحافظ في التهذيب:"أرسل عن أبي بكر".
ولهذا الحديث أسانيد أخرى، وكلُّها معلولةٌ، وإلى هذا يشير الترمذي (3039) بعد أن رواه من وجهٍ آخر:"هذا حديثٌ غريب، وفي إسناده مقال، موسي بن عُبيدة يُضعَّف في الحديث، ضعَّفه يحيى بن سعيد، وأحمد بن حنبل. ومولي ابن سباع مجهول. وقد رُوي هذا الحديث من غير هذا الوجه عن أبي بكر، وليس له إسنادٌ صحيحٌ".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة. أنَّها سُئلت عن قول الله تعالى: {وَإِنْ تُبْدُوا مَا فِي أَنْفُسِكُمْ أَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُمْ بِهِ اللَّهُ} [البقرة: 284]، وعن قوله تعالى: {مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ}، فقالت: ما سألني عنها أحد منذ سألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"هذه معاتبة الله العبدَ فيما يُصيبُه من الحُمَّى
والنكبة، حتَّى البضاعة يضعها في كمِّ قميصه فيفقدها، فيفزع لها، حتَّى إنَّ العبد ليخرج من ذنوبه كما يخرج التِّبْرُ الأحمر من الكير".
رواه الترمذي (2991) من طريق حمَّاد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أمية، أنَّها سألت، فذكرت مثله.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (25835) ولفظه:"يا عائشة! هذه متابعة الله عز وجل العبد بما يصيبه من الحُمَّة، والنكبة، والشوكة، حتَّى البضاعة يضعها في كُمِّه، فيفقدها، فيفزع لها، فيجدها في ضِبنه، حتَّى إنَّ المؤمن ليخرج من ذنوبه كما يخرج التبر من الكير". أورده الهيثمي في"المجمع" (7/ 12) وعزاه لأحمد، وقال:"وأمية لم أعرفها".
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من حديث عائشة، لا نعرفه إلَّا من حديث حمَّاد بن سلمة".
قلت: علي بن زيد، وهو ابن جُدعان ضعيف، وأمَيَّة هي بنت عبد الله، لا يُعرف حالها، وهي أم محمد، امرأة والد علي بن زيد بن جُدعان، وليست بأمِّه. كذا في"التقريب". وتفرَّد بالرواية عنها علي بن جدعان، ابن زوجها، ولم ينُقل توثيقها عن أحدٍ.
قوله:"معاتبة" و"متابعة" هكذا في الروايتين.
وقوله:"فيجدها في ضِبْنه" بكسر الضاد، وسكون الباء، هو ما بين الكشح والإبط. والكشح: هو ما بين الخاصرة والضلوع.
وأمَّا ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"من أُصيبَ بمصيبة في ماله، أو جسده، فكتمها، فلم بشكها إلى الناس، كان حقًّا على الله أن يغفر له". فهو موضوعٌ، أخرجه الطبراني في"الكبير" (11/ 184) عن أحمد بن علي الأبَّار، ثنا هشام بن خالد، ثنا بقية، عن ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكر مثله. قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 331)"فيه بقية، وهو مدلس".
وذكر ابن أبي حاتم، عن أبيه ثلاثة أحاديث من رواية هشام بن خالد الأزرق، منها الحديث المذكور، فقال: قال أبي:"هذه الثلاثة الأحاديث موضوعة، لا أصل لها، وكان بقيَّة يُدلِّس، فظنَّ هؤلاء أنَّه يقول في كلِّ حديثٍ: حدَّثنا، ولم يتفقَّدوا الخبر منه". العلل" (1871)، ونقل عن أبيه، في موضع آخر بأنَّه حديثٌ باطل (2028).
وذكر ابن حبان هذه الأحاديث الثلاثة في"المجروحين" (1/ 231) وقال: هي كلُّها موضوعة".
وأمَّا هشام بن خالدٍ، فهو من ثقات الدماشقة، ولكنَّه يروج عليه، قاله الذهبي في"الميزان" في ترجمته. ثمَّ ذكر الحديثَ المذكور. ونقل قول أبي حاتم بأنَّه موضوع وأقرَّه.
وأمَّا قول المنذري في"الترغيب" (4/ 286):"رواه الطبراني ولا بأس به". فهو تساهلٌ منه.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أنس مرفوعًا:"إنما مثل المريض إذا برأ وصحَّ كالبَرْدة تقع من السماء
في صفائها ولونها".
رواه الترمذي (2086) عن علي بن حُجْر، قال: أخبرنا الوليد بن محمد الموقَري، عن الزهري، عن أنسٍ، فذكر مثله.
ووهم الهيثمي، فأورده في"المجمع" (2/ 303) وهو ليس على شرطه، وعزاه للبزار والطبراني في"الأوسط" وقال: فيه الوليد بن محمد الموقري، وهو ضعيف".
قلت: وهو كما قال؛ فإنَّ الوليد بن محمد الموقَري -بضمِّ الميم، وقاف مفتوحة- أبو بشر البلقاوي مولى بني أميَّة، العلماء مطبقون على تضعيفه، وقال في"التقريب":"متروك".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল-আসওয়াদ বলেন: কুরাইশ বংশের এক যুবক তাঁর নিকট মিনায় প্রবেশ করল। তখন তারা হাসছিল। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা কিসের জন্য হাসছো? তারা বলল: অমুক ব্যক্তি একটি তাঁবুর রশির ওপর আছাড় খেয়ে পড়ল, ফলে তার গলা বা চোখ প্রায় চলে যেতে বসেছিল। তিনি বললেন: তোমরা হাসো না; কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "কোনো মুসলমানের দেহে যদি একটি কাঁটা অথবা তার চেয়েও বড় কিছু বিদ্ধ হয়, তবে এর বিনিময়ে তার জন্য একটি মর্যাদা লিখে দেওয়া হয় এবং এর মাধ্যমে তার একটি গুনাহ মুছে দেওয়া হয়।"
3298 - عن عائشة، قالت: سألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الحساب اليسير، فقلت: يا رسول الله! ما الحساب اليسير؟ فقال: الرجل تُعرَض عليه ذنوبه، ثمَّ يُتجاوز له عنها، إنَّه من نوقش الحساب هلكَ، ولا يُصيبُ عبدًا شوكةٌ فما فوقها، إلَّا قاصّ الله عز وجل بها من خطاياه".
حسن: رواه الإمام أحمد (25515) عن يونس بن محمد، حدَّثنا عبد الواحد بن زياد، قال: حدَّثنا عبد الواحد بن حمزة بن عبد الله بن الزبير، قال: سمعتُ عباَّد بن عبد الله بن الزبير يقول: سمعت أمَّ المؤمنين عائشة، فذكرته.
وإسناده حسن من أجل عبد الواحد بن حمزة، فإنَّه ليس به بأس كما قال ابن معين، وروى له مسلم.
ورواه أيضًا (24215) من وجهٍ آخر عن محمد بن إسحاق، قال: حدَّثني عبد الواحد بن حمزة بإسناده، إلَّا أنَّه زاد في أوَّل الحديث: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول في بعض صلاته:"اللهمَّ حاسبني حسابًا يسيرًا". فلما انصرف قلت: يا نبي الله! ما الحساب اليسير؟". فذكر بقية الحديث مثله.
ومن هذا الوجه أخرجه الحاكم (1/ 57، 255) وأبو حاتم بن حبان في صحيحه (7372).
قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه بهذا اللفظ؛ إنَّما اتفقا على حديث ابن أبي مليكة، عن عائشة: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: من نوقش الحساب عُذِّب".
قلت: حديث ابن أبي مليكة، عن عائشة ذكر في كتاب الإيمان، وأمَّا زيادة ابن إسحاق في أول الحديث: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول في بعض صلاته:"اللهمَّ حاسبني حسابًا يسيرًا". فلم يوافقه عليها أحدٌ.
وكذلك زاد أبو عامر الخزَّاز، عن ابن أبي مليكة في أوَّل الحديث عن عائشة قالت: قلت: يا رسول الله! إنِّي لأعلم أشدَّ آية في القرآن، قال: أية آيةٍ يا عائشة؟" قالت: قول الله عز وجل: {مَنْ يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ}. قال:"أما علِمتِ يا عائشة! أنَّ المؤمن تُصيبه النكبة أو الشوكة فيُكافأُ بأسوء عمله؟ ومن نوقش؛ عُذِّب". قالت: أليس الله يقول: {فَسَوْفَ يُحَاسَبُ حِسَابًا يَسِيرًا}؟ [الانشقاق: 8]. قال:"ذاكم العرض يا عائشة! من نوقش الحساب غُذِّب". رواه أبو داود (3093) من طرق عن أبي عامر الخزَّاز، به مثله.
وأبو عامر اسمه: صالح بن رُستم المُزني مولاهم. قال ابن معين:"ضعيف". وفي"التقريب":"صدوق كثير الخطأ". وعليه؛ فلعلَّ زيادته في أوَّل الحديث من أخطائه؛ فإنَّه لم يُوافقه عليها أحدٌ.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সহজ হিসাব (আল-হিসাব আল-ইয়াসীর) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! সহজ হিসাব কী? তিনি বললেন: (সহজ হিসাব হলো) যখন কোনো ব্যক্তির গুনাহসমূহ তার সামনে পেশ করা হবে, অতঃপর তা মাফ করে দেওয়া হবে। নিশ্চয় যার হিসাবের চুলচেরা বিশ্লেষণ করা হবে, সে ধ্বংস হয়ে যাবে। আর কোনো বান্দাকে যদি একটি কাঁটা অথবা তার চেয়ে কঠিন কিছু স্পর্শ করে, আল্লাহ তাআলা এর বিনিময়ে তার গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেন।
3299 - عن عائشة قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ الحُمَّى تحطُّ الخطايا كما تحطُّ الشجر ورقها".
حسن: رواه ابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (22) عن هاشم بن الوليد، حدَّثنا عبد الوهاب ابن عطاء، عن عمر بن قيس، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرت مثله.
إسناده حسن؛ من أجل عبد الوهاب بن عطاء، وهو الخفاف، مختلف فيه، فضعفه البخاري والنسائي، وقال ابن معين:"لا بأس به". وقال أبو حاتم:"يكتب حديثه، محله الصدق". وقال ابن سعد:"كان صدوقًا". فمثله يُحسن حديثه إذا لم يخالف؛ ولذا قال فيه الحافظ:"صدوق ربما أخطأ، أنكروا عليه حديثا في فضل العباس، يقال دلَّسه عن ثور".
وأمَّا شيخه عمر بن قيس؛ فلم أستطع تعيينه؛ فهو إمَّا أن يكون عمر بن قيس الماصر بن أبي مسلم الكوفي أبو الصباح، مولي ثقيف، وهو ثقة، والغالب أنَّه هو، أو هو عمر بن قيس المكي، أبو جعفر المعروف بسَنْدَل، وهما متقاربان في الطبقة، إلَّا أنَّ الثاني ضعيف جدًّا. فمن تأكَّد أنَّه الثاني فليضرب على هذا الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই জ্বর গুনাহসমূহকে এভাবে ঝরিয়ে দেয়, যেভাবে গাছ তার পাতা ঝরিয়ে দেয়।"
3300 - عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا اشتكى المؤمن أَخلصه ذلك كما يُخلص الكيرُ خَبَثَ الحديد".
صحيح: رواه ابن حبَّان (2936) والقُضاعي في"مسند الشهاب" (1407) كلاهما من حديث ابن أبي ذئب، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
ورواه الطبراني في"الأوسط" (1155 - مجمع البحرين) والقُضاعي (1406) وابن أبي الدنيا في"المرض والكفَّارات" (90) كلُّهم من حديث ابن أبي الذئب، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة مثله.
وإسناده صحيح، ولا يُعلُّ بما رواه البخاري في"الأدب المفرد" (497) فأدخل بين ابن أبي الذئب وبين ابن شهاب"جُبَير بن أبي صالح". وجبير هذ؛ قال عنه الذهبي:"لا يُدري من هو؟"؛ فإنَّ الإسنادَ صحيح بدونه، بل هو الأولى؛ لأنَّ جمهورَ الرواة عن ابن أبي ذئبٍ أسقطوا جبير بن أبي صالح.
أمَّا ما رُوي عن فاطمة الخزاعية -وكانت قد أدركت عامة أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عاد امرأة من الأنصار، وهي وَجِعَةٌ، فقال لها:"كيف تجدينكِ؟". فقالت: بخير يا رسول الله! وقد برَّحت بي أمُّ مِلْدَم -تُريد الحُمَّى- فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صبري، فإَّنها تُذهِب من خَبَثِ الإنسان كما يُذهب الكير من خَبَث الحديد".
فهو مرسل كما هو واضح، رواه عبد الرزَّاق (30306) ومن طريقه الطبراني في"الكبير" (24/ 405) عن معمر، عن الزهري، قال: حدَّثني فاطمة الخزاعية، فذكرت الحديث.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 307):"رجاله رجال الصّحيح". وفاطمة الخزاعية -كما في قول الزهري-، تابعيّة، وعليه فروايتها عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلةٌ.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন কোনো মুমিন অসুস্থ হয়, তখন সেই কষ্ট তাকে খাঁটি করে দেয়, যেমন কামারের হাঁপর লোহার ময়লা দূর করে খাঁটি করে তোলে।"