আল-জামি` আল-কামিল
3321 - عن صُهَيبٍ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عجبًا لأمر المؤمن، إنَّ أمره كلَّه خير، وليس ذاك لأحدٍ إِلَّا للمؤمن؛ إن أصابته سرَّاءُ شكر فكان خيرًا له، وإن أصابته ضرَّاء صبر فكان خيرًا له".
صحيح: رواه مسلم في الزهد والرقائق (2999) عن هدَّاب بن خالد الأزديّ، وشيبان بن فرُّوخ، كلاهما عن سليمان بن مغيرة، حَدَّثَنَا ثابت، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن صُهَيب، فذكره. وخرَّجه البيهقيّ (3/ 375) من طريق أحمد بن النضر بن عبد الوهَّاب، عن شيبان بن فرُّوخ، بإسناده، وزاد في آخره:"فكلُّ قضاء الله للمسلمين خيرٌ".
সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মুমিনের বিষয়টি সত্যিই আশ্চর্যজনক। তার প্রতিটি কাজই তার জন্য কল্যাণকর। মুমিন ছাড়া অন্য কারো জন্য এটি প্রযোজ্য নয়। যদি তার উপর কোনো সুখ-শান্তি আসে, তখন সে শুকরিয়া আদায় করে। ফলে তা তার জন্য কল্যাণকর হয়। আর যদি তার উপর কোনো দুঃখ-কষ্ট আসে, তখন সে ধৈর্য ধারণ করে। ফলে তাও তার জন্য কল্যাণকর হয়।"
3322 - عن سعد بن أبي وقَّاص، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عجبت من قضاء الله للمؤمن؛ إن أصابه خير حمد ربه وشكر، وإن أصابته مصيبة حمد ربه وصبر، المؤمن يؤجر في كلِّ شيءٍ حتّى في اللقمة يرفعها إلى في امرأته".
حسن: رواه الإمام أحمد (1487)، عن عبد الرحمن بن مهديّ، وعبد الرزّاق، قالا: أخبرنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن العَيْزار بن حريث، عن عمر بن سعد، عن أبيه، فذكر مثله.
وأبو إسحاق هو عمرو بن عبد الله السبيعيّ، مدلِّس ومختلط، لكن روى عنه شعبة كما عند الإمام أحمد (1531) والبزّار - (3166 - كشف الأستار)، ومسند الشاشي (132)، وابن أبي الدُّنيا في"المرض والكفارات" (224). وقد كفانا شعبةُ تدليسَ أبي إسحاق. وتابع بدر بن عثمان أبا إسحاق، في رواية عند الشاشي (129)، وإسناده حسن من أجل الكلام في عمر بن سعد بن أبي وقَّاص المدني؛ لأنَّ الناس مقتوه لكونه أميرًا على الجيش الذين قتلوا الحسين بن علي، غير أنَّه"صدوق"، كما قال الحافظ في"التقريب". ووهم من ذكره في الصّحابة.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি মু'মিনের জন্য আল্লাহর ফায়সালার (বিধানের) ওপর বিস্মিত হই; যদি তার কোনো কল্যাণ হয়, সে তার রবের প্রশংসা করে এবং কৃতজ্ঞতা জ্ঞাপন করে। আর যদি তার ওপর কোনো বিপদ নেমে আসে, সে তার রবের প্রশংসা করে এবং ধৈর্যধারণ করে। মু'মিন প্রতিটি জিনিসের জন্যই প্রতিদান লাভ করে, এমনকি সেই লোকমার জন্যও যা সে তার স্ত্রীর মুখে তুলে দেয়।"
3323 - عن أنس، قال: سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"عجبتُ للمؤمن! إنَّ الله لم يقض له قضاء إِلَّا كان خيرًا له".
حسن: رواه الإمام أحمد (12160) عن يحيى (هو ابن سعيد) عن سفيان، قال: حَدَّثَنِي القاسم ابن شريح، عن ثعلبة، قال: سمعت أنسًا يقول، فذكره.
والقاسم"شيخ" كما قال أبو حاتم في"الجرح والتعديل" (7/ 111)، وذكره ابن حبَّان في"الثّقات".
وقد توبع؛ فرواه أبو يعلى (4217، 4218) والقضاعي في مسند الشهاب (596) من طرق، عن الحسن بن عبيد الله (هو ابن عروة النخعي)، ثقة فاضل، وقد تحرف في بعض المصادر إلى الحسين بن عبيد الله.
وكذلك تابعه أيضًا عاصم الأحول، عن ثعلبة بن عاصم، ومن طريقه رواه عبد الله بن الإمام أحمد في زياداته في"المسند" (20283)، وابن حبَّان (728) كلاهما من طرق، عن نوح بن حبيب، قال: حَدَّثَنَا حفص بن غياث، عن عاصم الأحول، بإسناده نحوه.
وثعلبة بن عاصم هو أبو بحر مولي أنس، قال أبو حاتم:"صالح". وذكره ابن حبَّان في"الثّقات"، وروى عنه جمع، وهو حسن الحديث.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আমি মুমিনের বিষয়ে আশ্চর্যবোধ করি! আল্লাহ তার জন্য যে ফয়সালাই করেন না কেন, তা তার জন্য কল্যাণকরই হয়।"
3324 - عن كعب بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مثل المؤمن كمثل الخامة من الزرع، تُفيئها الرياح، تصرعها مرة، وتعدلها حتَّى يأتيه أجله، ومثل المنافق مثل الأرزة المُجذية التي لا يُصيبها شيءٌ حتَّى يكون انجعافها مرَّة واحدة".
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5643)، ومسلم في صفات المنافقين (2810)، كلاهما من حديث سفيان، عن سعد بن إبراهيم، عن عبد الله بن كعب بن مالك، عن أبيه، فذكر الحديث. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ قريب منه.
قوله:"الخامة" هي الطاقة الطرية اللينة. قال الخليل:"الخامة: الزرع أول من ينبت على ساق واحد".
وقوله:"تُفيئها" أي تُميلها.
وقوله:"الأرزة" قال الخطّابي:"الأرزة -مفتوحة الراء-: واحدة الأَرز، وهو شجر الصنوبر فيما يُقال". وقال غيره:"هو شجر معتدل صلب، لا يُحرِّكه هبوب الريح".
وقوله:"انجعافها" أي: انقلاعها.
ومعنى الحديث كما قال المهلب:"أنَّ المؤمن حيث جاء أمر الله انطاع له، فإن وقع له خير فرح به وشكر، وإن وقع له مكروه صبر ورجا فيه الخير والأجر، فإذا اندفع عنه اعتدل شاكرًا. والكافر لا يتفقده الله باختباره، بل يحصل له التيسير في الدُّنيا، ليتعسَّر عليه الحال في المعاد، حتّى إذا أراد الله إهلاكهـ قصمه، فيكون موته أشد عذَابًا عليه، وأكثر ألمًا في خروج نفسه".
وقال غيره:"المعنى أنَّ المؤمن يتلقى الأعراض الواقعة عليه لضعف حظه من الدُّنيا، فهو كأوائل الزرع، شديد الميلان لضعف ساقه، والكافر بخلاف ذلك، وهذا في الغالب من حال الاثنين. انظر"الفتح" (10/ 107).
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মুমিনের উদাহরণ হলো ফসলের নরম কচি ডগার মতো, বাতাস যাকে ঝুঁকাতে থাকে; একবার তাকে ভূপাতিত করে আবার তাকে সোজা করে দেয়—এভাবে তার মৃত্যু আসা পর্যন্ত চলতে থাকে। আর মুনাফিকের উদাহরণ হলো আরজা (শক্ত সিডার) গাছের মতো, যাকে কোনো কিছুই স্পর্শ করে না, যতক্ষণ না সে একবারে উপড়ে পড়ে যায়।”
3325 - عن أبي هريرة، أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"مثل المؤمن كمثل الخامة من الزرع، من حيث أتتها الريح كفأتها، فإذا اعتدلت تكفَّأ بالبلاء. والفاجر كالأرزة صمَّاء معتدلة، حتّى يقصمها الله إذا شاء".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المرضى (5644) ومسلم في صفات المنافقين (2809) كلاهما من وجهين مختلفين، عن أبي هريرة، واللّفظ للبخاريّ.
ولفظ مسلم:"مثل المؤمن كمثل الزرع. لا تزال الريح تُميله. ولا يزال المؤمن يصيبه البلاءُ. ومثل المنافق كمثل شجرة الأرز، لا تهتزُّ حتَّى تُستحصد".
وفي رواية - مكان"تميله""تُفيئه".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিনের উপমা হলো শস্যের কচি ডগার মতো। বাতাস যেদিক থেকেই আসে, তাকে সেদিকেই ঝুঁকিয়ে দেয়। যখন সেটি সোজা হয়ে দাঁড়ায়, তখন মুমিন বিপদাপদের মাধ্যমে ঝুঁকে যায় (পরীক্ষিত হয়)। আর পাপী ব্যক্তি আরয বৃক্ষের মতো, যা সুদৃঢ় ও সোজা হয়ে দাঁড়িয়ে থাকে, যতক্ষণ না আল্লাহ যখন ইচ্ছা করেন, তখন তাকে সমূলে ভেঙে দেন।
3326 - عن جابر بن عبد الله، أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"مثل المؤمن كمثل السنبلة تخرُّ مرَّةً وتستقيم مرَّةً، ومثل الكافر مثل الأرزِ، لا يزال مستقيمًا حتَّى يخرَّ ولا يشعر".
حسن: رواه الإمام أحمد (14761) عن موسى وحسن، قالا: حَدَّثَنَا ابن لهيعة، عن أبي الزُّبير، عن جابر، فذكر مثله.
والكلام في ابن لهيعة مشهور، إِلَّا أنَّه روى عنه في بعض طرق هذا الحديث عبد الله بن وهب، وسماعه منه كان قديمًا، وأبو الزُّبير مدلس وقد عنعن، ولكن جاء الحديث من طريق آخر ليس فيه أبو الزبير، وهو ما رواه البزّار (45، 46 - كشف)، والقضاعي في مسند الشهاب (2/ 280، 281) كلاهما من طرق، عن أبي بكر بن عَيَّاش، عن الأعمش، عن عطاء، عن جابر، فذكر نحوه. وبهذه المتابعة يرتقي الإسناد إلى الحسن لغيره. أورده الحافظ في"الفتح" (10/ 106) وعزاه لأحمد، وسكت عليه.
وقوله:"الأرزة"، قيل: هو الصنوبر.
ورُوي مثله عن أُبَي بن كعب، أنَّه دخل على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: متى عهدك بأُمِّ مِلدَم؟" وهو حرٌّ بين الجلد واللحم. قال: إنَّ ذلك لوجع ما أصابني قط. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مثل المؤمن مثل الخامة، تحمرُّ مرَّةً وتصفرُّ أخرى". وفيه رجل لم يُسم. رواه الإمام أحمد (21282)، عن سفيان بن عيينة، عن إسماعيل بن أُميَّة، عمَّن حدَّثه، عن أمِّ ولد أُبيِّ بن كعب، عن أُبي بن كعب، فذكر مثله.
و"أمُّ مِلدَم" بوزن منبر، كنية الحمى.
و"الخامة" هي الغضُّ الرطب من النبات.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عبد الله بن إياس بن أبي فاطمة الضمري، عن أبيه، عن جدِّه في حديث طويل وفي بعض ألفاظه نكارة. رواه الطبراني في"الكبير" (22/ 323) وفيه محمد بن أبي حُميد، وهو ضعيف، ترجمه العقيلي في"الضعفاء" (1613): قال عبد الله بن الإمام أحمد: سمعت
أبي يقول:"محمد بن أبي حميد أحاديثه أحاديث مناكير". وقال في موضع آخر:"ليس هو بقوي في الحديث". وقال البخاريّ:"محمد بن أبي حميد منكر الحديث".
وفي الباب عن أنس بن مالك، وعمار بن ياسر مرفوعًا:"مثل المؤمن مثل السنبلة يميل أحيانًا ويقوم أحيانًا، ومثل الكافر كمثل أرزِّ، يخرُّ ولا يُشعرَ به".
حديث أنس رواه أبو يعلى (3068). وفيه فهد بن حبَّان، وهو ضعيف، كما قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 293).
وحديث عمار بن ياسر رواه الطبرانيّ في"الكبير"، وفيه مهلب بن العلاء، قال الهيثميّ:"لم أجد من ذكره".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মু'মিনের উদাহরণ হলো শস্যের শীষের মতো, যা একবার হেলে পড়ে আবার একবার সোজা হয়ে দাঁড়ায়। আর কাফিরের উদাহরণ হলো আরয (শক্ত) গাছের মতো, যা সর্বদা সোজা হয়ে থাকে, অবশেষে যখন তা পড়ে যায়, তখন সে টেরও পায় না।"
3327 - عن عائشة، أنَّها قالت: وا رأساه! فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ذاك لو كان وأنا حيٌّ فأستغفر لكِ وأدعو لكِ". فقالت عائشة: واثُكلياه! والله إنِّي لأظنُّكَ تُحبُّ موتي، ولو كان ذلك لظَلِلْتَ آخر يومكَ مُعرِّسًا ببعض أزواجك، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"بل أنا وار أساه، لقد هممتُ أو أردتُ أن أُرسِل إلى أبي بكر وابنه، وأعهد: أن يقول القائلون، أو يتمنَّى المتمنُّون، ثمّ قلتُ: يأبى الله ويدفع المؤمنون، أو يدفع الله، ويأبى المؤمنون".
صحيح: رواه البخاريّ في المرضى (5666)، عن يحيى بن يحيى أبي زكريا، أخبرنا سليمان ابن بلال، عن يحيى بن سعيد، قال: سمعت القاسم بن محمد، قال: قالت عائشة، فذكرت مثله.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: হায় আমার মাথা! তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি এমন হয় (তুমি মারা যাও) আর আমি জীবিত থাকি, তবে আমি তোমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করব এবং তোমার জন্য দু‘আ করব।" তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হায় আমার দুর্ভাগ্য! আল্লাহর কসম, আমি অবশ্যই মনে করি যে আপনি আমার মৃত্যু কামনা করছেন। আর যদি এমনটা হতো, তবে আপনি আপনার দিনের শেষে আপনার অন্য কোনো স্ত্রীর সাথে রাত্রিযাপন করতেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বরং আমিই হায় আমার মাথা! আমি সংকল্প করেছিলাম অথবা চেয়েছিলাম যে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর পুত্রকে ডেকে পাঠিয়ে (খেলাফতের) নির্দেশ দিয়ে যাব, যাতে কোনো বক্তা কিছু বলতে না পারে, অথবা কোনো আকাঙ্ক্ষাকারী আকাঙ্ক্ষা পোষণ না করে। এরপর আমি (মনে মনে) বললাম: আল্লাহ অবশ্যই প্রত্যাখ্যান করবেন এবং মুমিনগণও প্রতিরোধ করবেন, অথবা আল্লাহ প্রতিরোধ করবেন এবং মুমিনগণ প্রত্যাখ্যান করবেন।"
3328 - عن أبي هريرة، قال: دخل أعرابي على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أخذتك أم ملدم قط؟". قال: وما أم ملدم؟ قال:"حر يكون بين الجلد واللحم". قال: ما وجدتُّ هذا قط. قال:"فهل أخذك الصداع قط؟" قال: وما الصداع؟ قال:"عروق تضرب على الإنسان في رأسه". قال: ما وجدت هذا قط. قال: فلمّا ولَّى قال:"من أحبَّ أن ينظر إلى رجلٍ من أهل النّار فلينظر إلى هذا".
حسن: رواه الإمام أحمد (8395) والبزّار - (778 - كشف) كلاهما من طريق محمد بن عمرو ابن علقمة، حَدَّثَنَا أبو سلمة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن؛ من أجل محمد بن عمرو بن علقمة، فإنَّه حسن الحديث. وصحَّحه ابن حبَّان (2916) والحاكم (1/ 347)، وقال:"على شرط مسلم".
معنى الحديث:
قال الحافظ ابن حبَّان:"قوله صلى الله عليه وسلم:"من أحبَّ أن ينظر إلى رجلٍ من أهل النّار فلينظر إلى هذا". لفظة إخبار عن شيء مرادها الزجر عن الركون إلى ذلك الشيء، وقلة الصبر على ضدّه، وذلك أنَّ الله -جلَّ وعلا- جعل العللَ في هذه الدُّنيا، والغموم، والأحزان، سبب تكفير الخطايا عن المسلمين، فأراد صلى الله عليه وسلم إعلام أُمَّته أنَّ المرْءَ لا يكاد يتعرَّى عن مقارفة ما نهى الله عنه في أيَّامه ولياليه، وإيجاب النّار له بذلك إن لم يتفضَّل عليه بالعفو، فكأنَّ كلَّ إنسانٍ مرتهنٌ بما كسبت يداه، والعلل تُكفِّر بعضها عنه في هذه الدُّنيا، لا أنَّ من عوفي في هذه الدُّنيا يكون من أهل النّارِ".
قلت: هذا الذي ذكره ابن حبَّان مستقيم على العموم، أمَّا في خصوص هذا الرّجل؛ فلعلَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم اطَّلع منه على أسبابٍ لإيجاب النّار له. والله أعلم.
وأمّا ما رُوي عن أنس مرفوعًا مثله، وزاد فيه:"أخرجوه عنِّي". فهو ضعيف، رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (5905)، وفيه الحسن بن أبي جعفر الجُفريّ، جمهور أهل العلم على تضعيفه، قال الحافظ:"ضعيف الحديث مع عبادته وفضله".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন বেদুঈন (আ'রাবী) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট প্রবেশ করল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি কখনও উম্মে মিলদাম-এ আক্রান্ত হয়েছো?" সে বলল: উম্মে মিলদাম কী? তিনি বললেন: "এটা এমন এক উষ্ণতা যা চামড়া ও মাংসের মধ্যখানে অনুভব হয় (তীব্র জ্বর)।" সে বলল: আমি কখনোই এটি অনুভব করিনি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি কখনও মাথা ব্যথায় (সিদা'য়) আক্রান্ত হয়েছো?" সে বলল: মাথা ব্যথা কী? তিনি বললেন: "এটা এমন শিরা যা মানুষের মাথায় আঘাত করে (ধপধপে ব্যথা)।" সে বলল: আমি কখনোই এটি অনুভব করিনি। তিনি (আবূ হুরায়রা) বলেন: অতঃপর যখন লোকটি ফিরে গেল, তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি জাহান্নামের অধিবাসীদের মধ্যে একজন মানুষকে দেখতে পছন্দ করে, সে যেন এই লোকটিকে দেখে।"
3329 - عن أنس بن مالك، أنَّ امرأةً أتت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! ابنة لي كذا وكذا -ذكرت من حسنها وجمالها- فآثرتك بها. فقال:"قبلتُها". فلم تزل تمدحها حتّى ذكرت أنَّها لم تُصدَّع، ولم تشتكِ شيئًا قطُّ. قال:"لا حاجة لي في ابنتك".
حسن: رواه أحمد (12580) وأبو يعلى (4234) كلاهما من حديث عبد الله بن بكر، أبي وهب، حَدَّثَنَا سنان بن ربيعة، عن الحضرميّ، عن أنسٍ، فذكره.
وإسناده حسن؛ من أجل سنان بن ربيعة، وهو مختلف فيه، غير أنَّه حسن الحديث، فقد أخرج له البخاريّ مقرونًا، وذكره ابن حبَّان في"الثّقات" وقال ابن عدي:"أرجو أنَّه لا بأس به، وضعَّفه ابن معين، وأبو حاتم.
والخلاصة: أنَّه حسن الحديث.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (2/ 294)، وقال:"رجاله ثقات".
والحضرمي: هو ابن لاحق، قال فيه ابن معين:"ليس به بأس".
وأمّا ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا: ألا أُنبِّئكم بأهل الجنَّة؟". قالوا: بلى يا رسول الله! . قال:"الضعفاء المظلومون. ألا أُنبئكم بأهل النّار؟". قالوا: بلى يا رسول الله؟ قال:"كل شديد جعظريِّ، هم الذين لا يألمون رؤوسهم"، فهو ضعيف، رواه الإمام أحمد (10598) والبزّار (3631 - كشف) كلاهما من حديث يزيد بن هارون، أخبرنا البراء بن يزيد، عن عبد الله بن شقيق، عن أبي هريرة، فذكر مثله، واللّفظ لأحمد، وزاد البزّار بعد قوله:"جعظري":"ألا أخبركم بخياركم؟ أحاسنكم أخلاقًا. ألا أُنبِّئكم بشراركم؟ الثرثارون المتشدقون المتفيهقون".
وفي الإسناد البراء بن عبد الله بن يزيد الغنويّ، وقد يُنسب إلى جدِّه، ضعيفٌ، ضعَّفه الإمام أحمد، ويحيى، وغيرهما.
وأخرج العقيلي هذا الحديث في"الضعفاء" (1/ 161) من وجه آخر عن البراء بن عبد الله الغنويّ، وقال:"لا يُتابع عليه".
و"الجعظري" -بفتح الجيم، وسكون العين المهملة، بعدها ظاء معجمة مفتوحة- هو الفظ الغليظ.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার একটি কন্যা আছে, এমন এমন... (সে তার রূপ ও সৌন্দর্যের কথা উল্লেখ করল) এবং বলল: আমি তাকে আপনার জন্য মনোনীত করলাম (উপহার দিলাম)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি তাকে গ্রহণ করলাম। এরপরও মহিলাটি তার প্রশংসা করতে থাকল। একপর্যায়ে সে বলল যে, তার কখনো মাথাব্যথা হয়নি এবং সে কখনো কোনো অসুস্থতার অভিযোগ করেনি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমার কন্যার প্রতি আমার কোনো প্রয়োজন নেই।
3330 - عن البراء بن عازب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما اختلج عِرق ولا عين إِلَّا بذنبٍ، وما يدفع الله عنه أكثر".
حسن: رواه الطبرانيّ في"الصغير" (2/ 102) عن محمد بن يعقوب أبي صالح الورَّاق الأصبهانيّ، نا أحمد بن الفرات الرازيّ، حَدَّثَنَا محمد بن كثير، حَدَّثَنَا محمد بن فُضيل، عن الصلت بن بهرام، عن أبي وائل، عن البراء، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 295):"رواه الطبرانيّ في"الصغير" وفيه الصلت بن بهرام، وهو ثقة إِلَّا أنَّه كان مرجئًا".
قلت: الصلت بن بهرام الكوفي التميميّ، أبو هاشم، وثَّقه ابن معين، وأحمد، وقال أبو حاتم:"صدوق ليس له عيب إِلَّا الإرجاء". وذكره ابن حبَّان في"الثّقات".
قال الحافظ ابن حجر:"ذكره الحافظ عبد الغنيّ، وحذفه المزي؛ لأنَّه لم يقف على رواية له في الكتب المذكورة، وكان الأوّلى أن يذكره احتياطًا".
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "কোনো শিরা বা রগ কাঁপে না এবং কোনো চোখ পলক ফেলে না, পাপ ছাড়া। আর আল্লাহ যা প্রতিহত করেন, তা এর চেয়েও অনেক বেশি।"
3331 - عن عائشة قالت: ما رأيت أحدًا أشدَّ عليه الوجع من رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المرضى (5646)، ومسلم في البر والصلة (2570) كلاهما من حديث شعبة، عن الأعمش، عن أبي وائل (هو شقيق بن سلمة.)، عن مسروق، عن عائشة، فذكرته.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেয়ে অন্য কারও ওপর অধিক কঠিন রোগ-যন্ত্রণা হতে দেখিনি।
3332 - عن عائشة، قالت: مات النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وإنه لبين حاقِنَتي وذاقِنَتي، فلا أَكره شدة الموت لأحد أبدًا بعد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4446) عن عبد الله بن يوسف، حَدَّثَنَا اللّيث، قال: حَدَّثَنِي ابن الهاد، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন, আর তিনি তখন আমার বুক ও চিবুকের মধ্যবর্তী স্থানে ছিলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (মৃত্যু) কষ্টের পর আমি আর কখনো কারো জন্য মৃত্যুর কষ্টকে অপছন্দ করি না।
3333 - عن وعن ابن أبي مليكة، أنَّ أبا عمرو ذكوان مولي عائشة أخبره، أنَّ عائشة كانت تقول: إنَّ من نعم الله عليَّ أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم توفي في بيتي، وفي يومي، وبين سَحْري ونحري، وأنَّ الله جمع بين ريقي وريقه عند موته، دخل عليَّ عبد الرحمن وبيده سواك، وأنا مُسندة رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فرأيته ينظر إليه، فعرفت أنَّه يُحبُّ السواك، فقلت: آخذ لك؟ فأشار برأسه:"أن نعم". فليَّنته، وبين يديه ركوة، أو علبة -يشك عمر- فيها ماء، فجعل يُدخل يديه في الماء، فيمسح بهما وجهه ويقول:"لا إله إِلَّا الله، إنَّ للموت سكرات". ثمَّ نصب يده فجعل يقول:"في الرفيق الأعلى". حتَّى قُبض، ومالت يده.
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4449) عن محمد بن عبيد، ثنا عيسى بن يونس، عن عمر بن سعيد، قال: أخبرني ابن أبي مليكة، فذكره.
وأمّا ما رُوي عن عائشة، قالت: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يموت وعنده قدح فيه ماء، وهو يدخل يده في القدح، ثمَّ يمسح وجهه بالماء، ثمَّ يقول: اللَّهُمَّ أعنِّي على غمرات الموت" أو"سكرات الموت". فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (978) وابن ماجة (1623) والنسائي في"اليوم والليلة" (1093) كلّهم عن اللّيث ابن سعد، عن ابن الهاد، عن موسي بن سرجس، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته.
وموسي بن سرجس مجهولٌ؛ لأنَّه تفرَّد بالرواية عنه ابن الهاد، ولم يوثقه أحدٌ.
وقال الترمذيّ:"حسن غريب". وأخرجه الحاكم (2/ 465)، وقال:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه" وابن الهاد هو: يزيد بن عبد الله بن أُسامة بن الهاد.
وأمّا ابن ماجه فجعله يزيد بن أبي حبيب، وأخرجه عن ابن أبي شيبة (10/ 258) وليس فيه إِلَّا يزيد، وكذلك رواه الإمام أحمد (24356) عن يونس، قال: حَدَّثَنَا اللّيث، عن يزيد بإسناده. فزاد ابن ماجه نسبته، وجعله ابن أبي حبيب، وهو خطأٌ فاحش؛ فإنَّ أحدًا لم يقل به. وقد نبَّه على هذا الحافظ ابن حجر في"النكت الظراف" (12/ 286 - 287). فراجعه.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: নিশ্চয়ই আমার উপর আল্লাহর অনুগ্রহসমূহের মধ্যে এটিও ছিল যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার ঘরে, আমার দিনে, এবং আমার বুক ও থুতনির মাঝখানে (মাথা হেলানো অবস্থায়) ইন্তেকাল করেছেন। এবং আল্লাহ তাঁর মৃত্যুর সময় আমার লালা ও তাঁর লালার মধ্যে যোগসূত্র স্থাপন করেছেন। (ঘটনা হলো,) আবদুর রহমান (তাঁর ভাই) আমার কাছে আসলেন, তাঁর হাতে ছিল একটি মিসওয়াক। আমি তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে (আমার কোলে) হেলান দিয়ে রেখেছিলাম। আমি দেখলাম তিনি সেটির দিকে তাকাচ্ছেন। আমি বুঝতে পারলাম যে তিনি মিসওয়াক পছন্দ করেন। তখন আমি বললাম: আমি কি আপনার জন্য এটি নেব? তিনি মাথা দিয়ে ইশারা করলেন যে, "হ্যাঁ।" তখন আমি সেটি নরম করে দিলাম। আর তাঁর সামনে একটি ছোট মশক অথবা কৌটা (বর্ণনাকারী উমার সন্দেহ করেছেন) ছিল, যাতে পানি ছিল। তিনি তাঁর উভয় হাত পানিতে প্রবেশ করিয়ে তা দিয়ে মুখ মুছতে লাগলেন এবং বলছিলেন: "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, নিশ্চয়ই মৃত্যুর রয়েছে তীব্র যন্ত্রণা (সাকারাত)।" এরপর তিনি তাঁর হাত উপরে উঠালেন এবং বলতে লাগলেন: "উচ্চতম বন্ধুর (আল্লাহর) নিকট।" অবশেষে তিনি ইন্তেকাল করলেন এবং তাঁর হাত একদিকে হেলে পড়ল।
3334 - عن عبد الله بن مسعود عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا كان أجل أحدكم بأرض أوثبته إليها الحاجة، فإذا بلغ أقصى أثره قبضه الله سبحانه، فتقول الأرض يوم القيامة: ربّ هذا ما استودعتني".
صحيح: رواه ابن ماجه (4263) والبزّار (1889) والحاكم (1/ 41) من طرق، عن عمر بن عليّ قال: أخبرني إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.
واللّفظ لابن ماجه.
وقال البزّار: وهذا الحديث لا نعلمه أحدًا يرفعه إِلَّا عمر بن عليّ المقدمي.
قلت: تابعه غيره. وقد قال الحاكم:"قد احتج الشيخان برواة هذا الحديث عن آخرهم، وعمر ابن عليّ المقدمي متفق على إخراجه في الصحيحين، وقد تابعه محمد بن خالد الوهبي على سنده عن إسماعيل، ثمّ أسند روايته ثمّ قال: وقد أسنده هشيم، عن إسماعيل بن أبي خالد، ثمّ أسند روايته وقال: فقد أسند هذا الحديث ثلاثة من الثّقات عن إسماعيل، ووقفه عنه سفيان بن عيينة، فنحن على شرطنا في إخراج الزيادة من الثقة في الوصل والسند" انتهى.
قلت: جمهور علماء الحديث والفقه على هذا المنهج، ولذا صحَّحه أيضًا البوصيري في زوائد ابن ماجه.
وأمّا أبو حاتم فقال:"الكوفيون لا يرفعونه". العلل (1073).
وكذا رجّح الدَّارقطنيّ في"العلل" (848) فقال:"رواه ابن عيينة ويحيى القطان وغيرهما موقوفًا، وهو الصواب".
قلت: الموقوف أقوى إسنادًا، لكن لا يمنع أن يكون الصحابي رواه مرفوعًا أيضًا وهو الأصل.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কারো মৃত্যু কোনো ভূমিতে নির্ধারিত থাকে, তখন প্রয়োজন তাকে সেদিকে চালিত করে। অতঃপর যখন সে তার শেষ চিহ্ন (বা গন্তব্য) পর্যন্ত পৌঁছে যায়, তখন আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা‘আলা তাকে (তার রূহ) কবজ করেন। অতঃপর কিয়ামতের দিন ভূমি বলবে: হে আমার রব, এই হলো তা, যা আপনি আমার কাছে আমানত রেখেছিলেন।
3335 - عن * *
৩৩৩৫ - থেকে * *
3336 - عن ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من عاد مريضًا لم يزل في خُرْفَةِ الجنّة حتّى يرجع".
وفي رواية: قيل يا رسول الله! وما خُرْفَةِ الجنّة؟ قال:"جناها".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2568) من طرق، عن أبي قِلابة، عن أبي أسماء الرحبيّ، عن ثوبان فذكره.
قال الترمذيّ (967): وروى أبو غفار وعاصم الأحول هذا الحديث عن أبي قلابة، عن أبي الأشعث، عن أبي أسماء، عن ثوبان، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نحوه. وسمعت محمدًا يقول: من روى هذا الحديث عن أبي الأشعث، عن أبي أسماء فهو أصح. وقال محمد: وأحاديث أبي قلابة إنّما هي عن أبي أسماء، إِلَّا هذا الحديث فهو عندي عن أبي الأشعث، عن أبي أسماء، انتهى.
ثمّ رواه الترمذيّ (968) من طريق عاصم الأحول الذي أشار إليه البخاريّ، وهو عند مسلم أيضًا (2568/ 42).
وقوله:"خُرفة الجنّة" أي اجتناء ثمر الجنّة.
وأبو أسماء الرحبي: اسمه عمرو بن مرثد.
থাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম, থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো অসুস্থ রোগীকে দেখতে যায়, সে প্রত্যাবর্তন না করা পর্যন্ত জান্নাতের ফসল সংগ্রহে থাকে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: জিজ্ঞাসা করা হলো, "হে আল্লাহর রাসূল! জান্নাতের ফসল সংগ্রহ (খুরফাতুল জান্নাহ) কী?" তিনি বললেন: "এর ফল।"
3337 - عن عليّ بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أتي أخاه المسلم عائدًا مشى في خِرافة الجنّة حتّى يجلس، فإذا جلس غَمَرَتْه الرحمةُ، فإن كان غدوةً صلي عليه سبعون ألف ملك حتّى يُمسى، وإن كان مساءً صلي عليه سبعون ألف ملك حتَّى يُصبح".
صحيح: رواه ابن ماجه (1442) وأبو داود (3099) كلاهما من طريق أبي معاوية، قال: حَدَّثَنَا الأعمش، عن الحكم، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عليّ فذكره واللّفظ لابن ماجه، ولفظ أبي داود بمعناه.
ورواه الإمام أحمد (612) عن أبي معاوية بإسناده عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، قال: جاء أبو موسى إلى الحسن بن عليّ يعوده، فقال له عليّ: أعائدًا جئتَ أم شامتًا؟ قال: لا، بل عائدًا. قال: فقال له علي: إن كنت جئت عائدًا فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث مثل لفظ ابن ماجه.
وهذا إسناد صحيح، والحكم هو ابن عتيبة، وصحَّحه أيضًا الحاكم (1/ 349 - 350) على شرط الشّيخين، وقال: لم يخرجاه لخلاف على الحكم فيه، ثمّ رأى أن هذه العلة غير قادحة، وقال أيضًا (1/ 341 - 342):"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه لأن جماعة من الرواة أوقفوه عن الحكم بن عتيبة ومنصور بن المعتمر، عن ابن أبي ليلى، عن عليّ من حديث شعبة، وأنا على أَصْلي في الحكم لراوي الزيادة".
قلت: وهو يشير إلى ما رواه شعبة، عن الحكم، عن عبد الله بن نافع، عن عليّ مرة مرفوعًا، ومرة موقوفًا.
فمن المرفوع ما رواه الإمام أحمد (975) عن عبد الله بن يزيد، عن شعبة، عن الحكم، عن عبد الله بن نافع قال: عاد أبو موسى الأشعريُّ الحسنَ بن عليّ، فقال له عليّ: أعائدًا جئت أم زائرًا؟ فقال أبو موسى: بل جئت عائدًا فقال عليّ: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر نحوه.
وعبد الله بن نافع هو أبو جعفر الهاشمي مولاهم، كان غلامًا للحسن بن عليّ، لم يرو عنه غير الحكم بن عُتيبة، وذكره ابن حبَّان في"الثقات" (7/ 24) وقال:"صدوق".
ومن هذا الوجه رواه أيضًا البيهقيّ (3/ 381) وقال:"وكذلك رواه محمد بن عديّ، عن شعبة مرفوعًا. ورواه محمد بن كثير، عن شعبة موقوفًا".
قلت: وعن محمد بن كثير رواه أبو داود (3098) وقال: رواه منصور، عن الحكم كما رواه شعبة (يعني موقوفًا). ثمّ رواه من طريق جرير، عن منصور به.
وقال: أُسند هذا عن عليّ، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من غير وجه صحيح".
قلت: ومن هذه الوجوه غير الصحيحة ما رواه الترمذيّ (969) عن أحمد بن مُنيع، حَدَّثَنَا الحسن بن محمد، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن ثُوير (وهو ابن أبي فاختة) عن أبيه قال: أخذ عليّ بيدي قال: انطلِق بنا إلى الحسن نعودُه. فوجدنا عنده أبا موسى، فقال عليّ: أعائدًا جئت يا أبا موسي! أم زائرًا؟ فقال: لا بل عائدًا. فقال عليّ: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث مثله. وزاد فيه:"وكان له خريف في الجنّة".
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب، وقد رُوي عن عليّ هذا الحديث من غير وجه، منهم من وقَّفه، ولم يرفعه. وأبو فاختة اسمه: سعيد بن عِلاقة" انتهى.
قلت: بل إسناده ضعيف جدًّا من أجل ثوير -مصغرًا- ابن أبي فاختة فقد ضعَّفه جمهور أهل العلم وقال فيه الدَّارقطنيّ وابن الجنيد:"متروك" وقال ابن حبَّان:"كان يقلب الأسانيد حتي يجئ في روايته أشياء كأنّها موضوعة" وقال الحافظ:"ضعيف رمي بالرفض".
وأمّا أبوه أبو فاختة سعيد بن عِلاقة فثقة.
ومن هذه الطرق ما رواه الإمام أحمد (754) وأبو يعلى (289) وابن حبَّان في صحيحه (2958)
كلهم من حديث حمّاد بن سلمة، عن يعلى بن عطاء، عن عبد الله بن يسار أن عمرو بن حُريث عاد الحسن بن عليّ فقال له عليّ: أتعود الحسن، وفي نفسك ما فيها؟ فقال له عمرو: إنك لست بربيّ، فتُصرف قلبي حيثُ شئتَ قال عليّ: أما إن ذلك لا يمنعنا أن نُودي إليك النصيحة سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من مسلم عاد أخاه إِلَّا ابتعث الله له سبعين ألف ملك يُصلون عليه من أي ساعات النهار كان حتى يُمسى، ومن أي ساعات الليل كان حتّى يُصبح".
وعبد الله بن يسار، أبو همام الكوفيّ، ويقال: عبد الله بن نافع"مجهول" كما قال الحافظ في التقريب ومع هذا ذكره ابن حبَّان في"الثّقات" (5/ 51) ولم يذكر من الرواة عنه سوى أبي صخرة جامع بن شداد، وأخرج حديثه في صحيحه، وفيه دليل على أنه يوثق المجاهيل وإن كان روي في صحيحه عن يعلى بن عطاء عنه.
وللحديث أسانيد أخرى لا تخلو من ضعف أو مجهول. إِلَّا أن هذه الأسانيد لا تعلل ما صحَّ منها.
وأمّا كونه رُوي مرفوعًا أو موقوفًا فذهب الحافظ الدَّارقطنيّ في كتابه"العلل" (3/ 269) إلى ترجيح الموقوف. وذهب غيره إلى ترجيح المرفوع لما فيه من زيادة علم كما قال الحاكم:"وأنا على أصلي في الحكم لراوي الزيادة" كما أن ما ثبت مرفوعًا أقوى إسنادًا فإنه على شرط الشّيخين كما قال الحاكم، ثمّ مثل هذا لا يقال بالرأي، لأنه يشتمل على الأمور الغيبية التي لا تعلم إِلَّا بالوحي.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার মুসলিম ভাইকে দেখতে আসে, সে বসা পর্যন্ত জান্নাতের বাগান (বা ফল) চয়ন করতে থাকে। অতঃপর যখন সে বসে, তখন তাকে রহমত আচ্ছন্ন করে নেয়। যদি সে সকালে আসে, সত্তর হাজার ফিরিশতা সন্ধ্যা পর্যন্ত তার জন্য দু'আ করতে থাকে। আর যদি সে সন্ধ্যায় আসে, সত্তর হাজার ফিরিশতা সকাল পর্যন্ত তার জন্য দু'আ করতে থাকে।"
3338 - عن معاذ قال: عهد إلينا رسول الله صلى الله عليه وسلم في خمس من فعل منهن كان ضامنا على الله:"من عاد مريضًا، أو خرج مع جنازة، أو خرج غازيًا في سبيل الله، أو دخل على إمام يُريد بذلك تعزيره وتوقيره، أو قعد في بيته، فيَسلم الناس منه ويَسلم".
حسن: رواه الإمام أحمد (22093) عن قتيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا ابن لهيعة، عن الحارث بن يزيد، عن عليّ بن رباح، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن معاذ فذكره.
وفيه ابن لهيعة وقد اختلط، ولكن قال بعض أهل العلم أن قُتَيبة بن سعيد، أيضًا ممن سمع منه قبل الاختلاط، كما أنه لم ينفرد به، فقد رواه ابن خزيمة (1495) وعنه ابن حبَّان في صحيحه (372) عن سعد بن عبد الله بن عبد الحكم، قال: حَدَّثَنَا أبيّ، قال: حَدَّثَنَا اللّيث بن سعد، عن الحارث بن يعقوب، عن قيس بن رافع القيسيّ، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد الله بن عمرو، عن معاذ مثله، غير أنه جعل مكان"من خرج مع جنازة""من غدا إلى مسجد أو راح".
وأخرجه الحاكم (2/ 90) من طريق اللّيث بن سعد وقال: صحيح.
قلت: فيه قيس بن رافع القيسي ذكره ابن حبَّان في"الثقات" (5/ 315) وهو"مقبول" عند الحافظ. أي إذا توبع، وقد توبع في أصل الحديث.
মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট পাঁচটি বিষয়ে অঙ্গীকার বা নির্দেশনা দিয়েছিলেন। যে ব্যক্তি এর কোনো একটি কাজ করে, সে আল্লাহর যিম্মাদারিতে থাকবে: "যে ব্যক্তি কোনো রোগীকে দেখতে যায়, অথবা কোনো জানাযার সাথে বের হয়, অথবা আল্লাহর পথে জিহাদকারী হিসেবে বের হয়, অথবা এমন শাসকের নিকট যায়, যার দ্বারা সে তাকে সম্মান ও শ্রদ্ধা জানাতে চায়, অথবা যে ব্যক্তি তার ঘরে বসে থাকে, ফলে মানুষ তার থেকে নিরাপদ থাকে এবং সেও নিরাপদ থাকে।"
3339 - عن جابر بن عبد الله قال: سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"من عاد مريضًا خاض في الرحمة، حتّى إذا قعد استقرَّ فيها".
صحيح: رواه البخاريّ في الأدب المفرد (522) عن قيس بن حفص، قال: حَدَّثَنَا خالد بن الحارث، قال: حَدَّثَنَا عبد الحميد بن جعفر، قال: أخبرني أبيّ، أن أبا بكر بن حزم ومحمد بن المنكدر في ناس من أهل المسجد عادوا عمر بن الحكم بن رافع الأنصاري قالوا: يا أبا حفص! حَدَّثَنَا. قال: سمعت جابر بن عبد الله قال: سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول فذكر الحديث.
وإسناده صحيح، ووالد عبد الحميد هو: جعفر بن عبد الله بن الحكم.
وعمر بن الحكم بن رافع هو: عم جعفر بن عبد الله بن الحكم.
وعمر بن الحكم بن رافع الأنصاري سماه هُشيم بن ثوبان كما سيأتيّ، وقد قيل هما رجل واحد، ولا يضر هذا الخلاف، فإن صحَّ أنهما رجلان فكلاهما ثقتان.
وحديث هُشيم هذا رواه الإمام أحمد (14260) عن عبد الحميد بن جعفر، عن عمر بن الحكم ابن ثوبان، عن جابر بن عبد الله ولفظه:"من عاد مريضًا لم يزل يخوضُ الرحمةَ حتّى يجلس، فإذا جلس اغتمس فيها".
قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 297):"رواه أحمد والبزّار، ورجال أحمد رجال الصَّحيح".
وأخرجه أيضًا ابن حبَّان في صحيحه (2956)، والحاكم (1/ 350) وقال:"صحيح الإسناد على شرط مسلم".
قلت: وهو كما قال، إِلَّا أن هُشيما أسقط الواسطة بين عبد الحميد بن جعفر وبين عمر بن الحكم بن ثوبان، والصواب إثباته لما فيه زيادة علم، وإن كان عبد الحميد بن جعفر رُوي عن أبيه، وعن عم أبيه وهو عمر بن الحكم.
وقد رُوي هذا الحديث عن كعب بن مالك ولفظه:"من عاد مريضًا خاض في الرحمة، فإذا جلس عنده استنقع فيها".
وقال:"وقد استنقعتُم إن شاء الله في الرحمة" رواه الإمام أحمد (15797) والبزّار"كشف الأستار" (775)، والطَّبرانيّ في"الكبير" (19/ 353)، وفي"الأوسط" (907) وفي طريقهم أبو معشر، وهو نُجيح بن عبد الرحمن السندي وهو ضعيف من قبل حفظه، فلعله وهم في ذلك فجعله من مسند كعب بن مالك، وأخرى من كعب بن عجرة كما في"الكبير" للطبرانيّ، فقول الهيثميّ في"المجمع" (2/ 298): رواه أحمد والطَّبرانيّ في الكبير والأوسط وإسناده حسن" ليس بحسن، بل هو ضعيف.
وقد رُوي عن أنس مرفوعًا:"أيما رجل يعود مريضًا فإنما يخوض في الرحمة، فإذا قعد عند المريض غَمَرتُه الرحمةُ" قال: فقلت: يا رسول الله، هذا الصَّحيح الذي يَعود المريضَ، فالمريضُ ما له؟ قال:"تُحط عنه ذُنوبه".
رواه أحمد (12782) والطَّبرانيّ في"الأوسط" (8846) كلاهما من حديث هلال بن أبي داود الحبطي
أبي هشام، قال: أخي هارون بن أبي داود حَدَّثَنِي، قال: أتيت أنس بن مالك، فقلت يا أبا حمزة! إن المكان بعيد، ونحن يُعجبنا أن نعودك، فرفع رأسه فقال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
قال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن هارون إِلَّا أخوه هلال.
قلت: هارون بن أبي داود"مجهول" فإنه لم يرو عنه إِلَّا أخوه، وذكره البخاريّ وابن أبي حاتم في كتابيهما، وسمياه: مروان بن أبي داود، ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا، وإنما ذكره ابن حبَّان في"الثّقات" ولم يؤثر عن أحد توثيقه.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 297):"رواه أحمد والطَّبرانيّ في"الصغير" و"الأوسط" وزاد: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا مرض العبد ثلاثة أيام خرج من ذنوبه كيوم ولدته أمه". وأبو داود ضعيف جدًّا وفي إسناد الطبرانيّ: إبراهيم بن الحكم بن أبان وهو ضعيف أيضًا" انتهى.
هكذا قال: أبو داود، وإنما هو ابن أبي داود.
وأمّا رواية الطبرانيّ التي فيها إبراهيم بن الحكم بن أبان فهي في"الصغير" (519) رواه من طريقه، عن أبيه، عن عكرمة، عن أنس فذكره، وقال: لم يروه عن عكرمة إِلَّا الحكم، تفرّد به إبراهيم.
وفي الباب أيضًا عن أبي أمامة مرفوعًا:"عائد المريض يخوض في الرحمة ووضع رسول الله صلى الله عليه وسلم يده على وَرِكهـ، ثمّ قال:"هكذا مقبلًا ومدبرًا، فإذا جلس عنده غمرتْه الرحمة".
رواه أحمد (22309) والطبرانيّ، قال الهيثميّ في"المجمع": وفيه عبيد الله بن عبيد بن زحر، عن عليّ بن زيد وكلاهما ضعيف.
كذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"من عاد مريضًا أو زار أخًا له في الله ناداه هنا: أن طبتَ، وطاب ممشاك، وتبوأتَ من الجنّة منزلًا".
رواه الترمذيّ (2008) وابن ماجه (1443) كلاهما عن محمد بن بشار، قال: حَدَّثَنَا يوسف بن يعقوب، قال: حَدَّثَنَا أبو سنان القسْمَلي وهو الشامي، عن عثمان بن أبي سودة، عن أبي هريرة فذكره ولفظهما سواء.
قال الترمذيّ:"حسن غريب، وأبو سنان اسمه عيسى بن سنان، وقد روي حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أبي رافع، عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم شيئًا من هذا" انتهى.
وصحّحه ابن حبَّان (2961) وأخرجه من وجه آخر عن حمّاد بن سلمة، عن أبي سنان بإسناده مثله. وحسنه المنذري في الترغيب والترهيب (3/ 364) وهذا يدل على تساهلهما فإن في الإسناد أبا سنان وهو عيسي بن سنان القسملي قال فيه ابن معين: ضعيف الحديث، وقال أبو زرعة: مخلط ضعيف الحديث، وقال أبو حاتم: ليس بقوي في الحديث، وقال النسائيّ: ضعيف.
وكذلك لا يصح ما رُوي عنه بلفظ"من عاد المريض خاض في الرحمة، فإذا جلس عنده اغتمس فيها" رواه الطبرانيّ في"الصغير" (1/ 53) وفيه شيخ الطبرانيّ وهو أحمد بن الحسن
المصري الأيلي. قال ابن عدي: كان يسرق الحديث. وقال ابن حبَّان: كذاب، دجال، يضع الحديث على الثقات. وكذَّبه أيضًا الدَّارقطنيّ وغيره. انظر اللسان (1/ 150) والميزان (1/ 89)، ولكن قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 298):"رجاله ثقات غير شيخ الطبرانيّ فإني لم أعرفه".
فلا أدري هل هو رجل آخر غير الذي تكلم فيه ابن عدي وابن حبَّان وغيرهما أو خفي أمره على الهيثميّ مع أنه إمام متخصص في رجال الطبراني.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"من توضأ فأحسن الوضوء، وعاد أخاه المسلم محتسبًا بوعد من جهنّم مسيرة سبعين خريفًا".
قلت: يا أبا حمزة: وما الخريف؟ . قال: العام.
رواه أبو داود (3097) عن محمد بن عوف الطائيّ، حَدَّثَنَا الربيع بن روح بن خُليد، حَدَّثَنَا محمد بن خالد، حَدَّثَنَا الفضل بن دَلْهم الواسطي، عن ثابت البناني، عن أنس فذكره.
قال أبو داود:"والذي تفرّد به البصريون منه العيادة وهو متوضئ".
قلت: وفي الإسناد الفضل بن دلْهم الواسطي البصري القصاب، قال فيه أبو داود: ليس بالقوي ولا بالحافظ، وفي رواية عنه: حديثه منكر. وليس هو برضي، وتكلم فيه عليّ بن الجنيد، وأبو الفتح الأزدي. واختلف فيه قول الإمام أحمد، فقال الأثرم عنه: ليس به بأس إِلَّا أن له أحاديث (هكذا ويبدو تتمة كلامه: أخطأ فيها) كما رواه الحلواني عنه قال: كان لا يحفظ، وذكر أشياء أخطأ فيها.
والخلاصة أنه ضعيف في حفظه، وهذا مما أخطأ فيه. لأنه لا يشترط الوضوء للعيادة.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن أبيه، عن جده مرفوعًا:"من عاد مريضًا لا يزال يخوض في الرحمة، حتّى إذا قعد استنقع فيها، ثمّ إذا رجع لا يزال يخوض فيها حتّى يرجع من حيث جاء".
رواه عبد بن حميد في"المنتخب" (288) عن خالد بن مخلد، قال: حَدَّثَنِي قيس أبو عمارة، قال: سمعت عبد الله بن أبي بكر بن حزم فذكر بقية إسناده مثله.
وأخرجه الطبرانيّ في"الكبير" كما في"المجمع"، (2/ 297) و"الأوسط" كما في"مجمع البحرين" (1190) وابن أبي الدُّنيا في"المرض والكفارات" (232) والعقيلي في"الضعفاء الكبير" (3/ 468) كلّهم من طرق عن قيس أبي عمارة به نحوه.
وفي الإسناد علتان:
الأوّلى: في أبو عمارة وهو الفارسي مولي سودة بنت سعيد. قال فيه البخاريّ: فيه نظر، وبه أعلّه البوصيري في زوائد ابن ماجه في حديث رواه في العزاء كما سيأتي، وفيه قيس أبو عمارة.
والعلة الثانية: عبد الله بن أبي بكر، جده: محمد بن عمرو بن حزم وله رؤية وليس له سماع.
قال الحافظ في"النكت الظراف" (8/ 148):"والحديث مرسل".
وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع":"رواه الطبرانيّ في الكبير والأوسط، ورجاله موثقون" فهو اعتمادًا على ابن حبَّان، فإنه ذكر قيسًا أبا عُمارة في"الثّقات".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি কোনো রোগীকে দেখতে যায়, সে (আল্লাহর) রহমতের মধ্যে প্রবেশ করে (বা রহমতে সাঁতার কাটে)। এরপর যখন সে বসে পড়ে, তখন সে এর (রহমতের) মধ্যে স্থির হয়ে যায়।"
3340 - عن البراء قال: أمرنا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بسبع، ونهانا عن سبع: أمرنا باتباع الجنائز، وعيادة المريض، وإجابة الداعيّ، ونصر المظلوم، وإبرار القسم، ورد السّلام، وتشميت العاطس، ونهانا عن آنية الفضة، وخاتم الذهب، والحرير، والديباج، والقَسِّي، والاستبرق.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1239) عن أبي الوليد، حَدَّثَنَا شعبة، عن الأشعث قال: سمعتُ معاوية بن سويد بن مُقرّن، عن البراء فذكره.
ورواه مسلم من أوجه أخرى (2066) عن أشعث، قال: حَدَّثَنِي معاوية بن سُويد قال: دخلتُ على البراء بن عازب فسمعتُه يقول: فذكر الحديث وفيه"إفشاء السّلام" بدلًا من"رد السّلام".
ورواه أيضًا من طريق شعبة كما رواه البخاريّ إِلَّا أن فيه"نهانا عن خاتم الذّهب أو حَلْقة الذّهب".
বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে সাতটি কাজের নির্দেশ দিয়েছেন এবং সাতটি কাজ থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি আমাদেরকে জানাজার অনুসরণ করতে, অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে যেতে, দাওয়াতকারীর আমন্ত্রণ গ্রহণ করতে, অত্যাচারিতকে সাহায্য করতে, শপথ পূর্ণ করতে, সালামের উত্তর দিতে এবং হাঁচিদাতার জন্য শুভ কামনা করতে (ইয়ারহামুকাল্লাহ বলতে) নির্দেশ দিয়েছেন। আর তিনি আমাদেরকে রূপার পাত্র, সোনার আংটি, রেশম (কাপড়), দীবাজ, কাস্সি এবং ইসতিবরাক ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।