আল-জামি` আল-কামিল
3341 - عن أبي هريرة قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"حق المسلم على المسلم خمس: رد السّلام، وعيادة المريض، واتباع الجنائز، وإجابة الدعوة، وتشميت العاطس".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1240)، ومسلم في كتاب السّلام (2162) كلاهما من حديث ابن شهاب، قال: أخبرني سعيد بن المسيب، أن أبا هريرة قال: فذكره.
ورواه مسلم من طريق آخر عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة وفيه"حق المسلم على المسلم ست" والسادس"وإذا استنصحك فانصح له" وفيه بدلًا من رد السّلام"إذا لقيته فسلم عليه".
ورواه البخاريّ في"الأدب المفرد" (519) من وجه ثالث من طريق عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة وفيه"ثلاث كلهن حق على كل مسلم" فذكر من الثلاثة:"عيادة المريض، وشهود الجنازة، وتشميت العاطس إذا حمد الله عز وجل".
ولكن رواه ابن ماجه (1435) من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر فيه الخمس مثل حديث الزهري. وهذا أصح لموافقته للزهري. فلعل عمر بن أبي سلمة اختصره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "এক মুসলমানের উপর অপর মুসলমানের পাঁচটি হক রয়েছে: সালামের জবাব দেওয়া, অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে যাওয়া, জানাযার অনুসরণ করা, দাওয়াত গ্রহণ করা এবং হাঁচিদাতার জবাবে (দোয়া বা কল্যাণ কামনা) করা।"
[হাদিসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি: বুখারী ও মুসলিম কর্তৃক বর্ণিত।]
[উল্লেখ্য: মুসলিমের অন্য এক বর্ণনায় ছ’টি হকের কথা উল্লেখ রয়েছে এবং ষষ্ঠ হকটি হলো: "যখন সে তোমার কাছে উপদেশ চায়, তখন তাকে উপদেশ দাও।" এবং তাতে 'সালামের জবাব' দেওয়ার পরিবর্তে রয়েছে: "যখন তার সাথে তোমার দেখা হয়, তখন তাকে সালাম দাও।"]
3342 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أصبح منكم اليوم صائمًا؟" قال أبو بكر: أنا. قال:"فمن تبع منكم اليومَ جِنازة؟" قال أبو بكر: أنا. قال:"فمن أطعم منكم اليوم مسكينًا؟" قال أبو بكر: أنا. قال:"فمن عاد منكم اليوم مريضًا؟"
قال أبو بكر: أنا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما اجتمعن في امرئ إِلَّا دخل الجنّة".
صحيح: رواه مسلم في الفضائل (1028) عن محمد بن أبي عمر المكيّ، حَدَّثَنَا مروان بن معاوية الفزاريّ، عن يزيد (وهو ابن كيسان) عن أبي حازم الأشجعي، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আজ তোমাদের মধ্যে কে রোযা অবস্থায় সকাল করেছে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমি।" তিনি বললেন, "আজ তোমাদের মধ্যে কে কোনো জানাযায় অংশগ্রহণ করেছে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমি।" তিনি বললেন, "আজ তোমাদের মধ্যে কে কোনো মিসকীনকে খাবার খাইয়েছে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমি।" তিনি বললেন, "আজ তোমাদের মধ্যে কে কোনো অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে গিয়েছে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমি।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই সব গুণাবলী কোনো ব্যক্তির মধ্যে একত্রিত হলে সে অবশ্যই জান্নাতে প্রবেশ করবে।"
3343 - عن وعن أبي هريرة قال: دخل أبو بكر على رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: كيف أصبحت يا رسول الله؟ قال:"صالحًا بخير من رجل لم يُصبح صائمًا، ولم يعد مريضًا، ولم يتبع جنازة".
حسن: رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (7333) عن محمد بن أبان الأصبهانيّ، ثنا أبو حفص عمرو بن عليّ، ثنا أبو داود الطيالسيّ، نا أبو عوانة، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
قال الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (3/ 183):"وفيه عمر بن أبي سلمة، وثَّقه ابن حبَّان وجماعة، وضعَّفه آخرون، وقد تقدّم حديث ابن عباس في عيادة المريض". انتهى.
قلت: عمر بن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف الزهري مختلف فيه، فضَعَّفه النسائيّ والجوزجانيّ، ومشَّاه الآخرون، والخلاصة فيه أنه حسن الحديث كما قال ابن عدي.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন এবং বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কেমন আছেন?’ তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি সেই ব্যক্তির চেয়ে উত্তম অবস্থায় আছি, যে ব্যক্তি ভোরে সওম (রোযা) পালনকারী ছিল না, কোনো অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে যায়নি এবং কোনো জানাযায় অংশগ্রহণ করেনি।"
3344 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أطعموا الجائع، وعودوا المريض، وفكوُّا العاني".
صحيح: رواه البخاريّ في المرضى (5649) عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا أبو عوانة، عن منصور، عن أبي وائل، عن أبي موسى الأشعري فذكره.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ক্ষুধার্তকে খাবার দাও, রোগীর শুশ্রূষা করো এবং বন্দীকে মুক্ত করো।"
3345 - عن أبي سعيد الخدريّ، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"عودوا المريض، وامشُوا مع الجنائز تذكركم الآخرة".
حسن: رواه الإمام أحمد (11180) والبزّار"كشف الأستار" (821) كلاهما من طريق يحيى ابن سعيد، عن المثنى بن سعيد، حَدَّثَنَا قتادة، عن أبي عبسي الأسواريّ، عن أبي سعيد فذكره.
ورواه البخاريّ في"الأدب المفرد" (518) من وجه آخر عن قتادة.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 29) وقال:"رواه أحمد والبزّار، ورجاله ثقات".
قلت: وهو كما قال إِلَّا أن أبا عيسى الأُسواري تكلم فيه عليّ بن المديني فقال: مجهول، ولكن قال الطبرانيّ: بصري ثقة، وقال البزّار: بصري مشهور، وروى له مسلم متابعة، وذكره ابن حبَّان في الثّقات، وأخرج حديثه هذا في صحيحه (2955) وقد روى عنه جمع، منهم ثابت البنانيّ، وقتادة، وعاصم الأحول وغيرهم، فمثله يحسن حديثه، وأمّا قول عليّ بن المديني فيحمل على أنه أراد به عدم الشهرة، والله أعلم.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা রোগীকে দেখতে যাও এবং জানাজার সাথে চলো, এতে তোমাদের আখিরাতের কথা স্মরণ হবে।”
3346 - عن أبي مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"للمسلم على المسلم أربع خِلال:
يُشمتُه إذا عطس، ويُجيبه إذا دعاه، ويشهده إذا مات، ويعوده إذا مرض".
حسن: رواه ابن ماجه (1434) عن أبي بشر بكر بن خلف ومحمد بن بشار قالا: حَدَّثَنَا يحيى بن سعيد، قال: حَدَّثَنَا عبد الحميد بن جعفر، عن أبيه، عن حكيم بن أفلح، عن أبي مسعود فذكره.
وفي الإسناد حكيم بن أفلح لم يرو عنه سوى جعفر، ولم يوثقه أحد غير أن ابن حبَّان ذكره في الثّقات كما في"التهذيب" ولم أقف على ترجمته في"الثقات" المطبوعة، ومن طريقه أخرجه في صحيحه (240) وأخرجه أيضًا الحاكم (4/ 264) وأحمد (22342) وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين"، وهذا وهم منه؛ فإن حكيم بن أفلح لم يخرج له صاحبا الصَّحيح، وإنما أخرج له البخاريّ في"الأدب المفرد" (923).
قال الحافظ في ترجمته في"التهذيب":"قرأت بخط الذّهبيّ تفرّد عنه جعفر، وذكره ابن حبَّان في"الثقات" وروى ابن مندة في الصّحابة من طريق محمد بن عجلان، عن حكيم البصريّ، عن أبي مسعود حديثًا فيحتمل أن يكون هو هذا".
قلت: وعلى هذا فإن حكيم بن أفلح خرج من كونه مجهولًا، فيكون إسناده حسنًا.
وأمّا ما رُوي عن عليّ مرفوعًا:"للمسلم على المسلم ست بالمعروف: يسلم عليه إذا لقيه، ويُجيبه إذا دعاه، ويُشَمِّتُه إذا عطس، ويعودُه إذا مرض، ويتبع جِنازتَه إذا مات، ويحب له ما يحب لنفسه" فإسناده ضعيف.
رواه الترمذيّ (2736) وابن ماجه (1433)، وأحمد (763) كلّهم من طريق أبي إسحاق، عن الحارث، عن عليّ فذكره.
والحارث هو الأعور ضعيف جدًّا، بل وقد كذَّبه بعض أهل العلم.
وزاد الأمر السابع:"وينصح له بالغيب" مع أنه قال في أول الحديث مثل ما مضى. فزيادة الأمر السابع يعود إلى ضعف الحارث الأعور، فلعله روي مرة كما مضى وأخرى كما في مسند الإمام أحمد.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس: أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عاد رجلًا، فقال:"ما تشتهي؟" قال: أشتهي خبز برٍ. قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"من كان عنده خبز بُرّ فليبعث إلى أخيه" قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إذا اشتهي مريض أحدكم شيئًا فليُطْعِمه". رواه ابن ماجه (1439) عن الحسن بن عليّ الخلال، قال: حَدَّثَنَا صفوان بن هُبَيْرة، قال: حَدَّثَنَا أبو مَكينٍ، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
هذا الحديث أخرجه العقلي في"الضعفاء" (2/ 212) في ترجمة صفوان بن هُبَيْرة المخدَّج وقال:"ولا يتابع على حديثه، ولا يُعرف إِلَّا به، بصري" ثمّ ذكر الحديث.
وقال في ترجمة نوح بن ربيعة أبي مَكين (4/ 305 - 306):"ولا يتابع على حديثه، ولا يعرف إِلَّا به" ثمّ ساق له الحديث المذكور. وكذلك فعل الذّهبيّ في"الميزان" فقال في ترجمة نوح بن ربيعة:"وثَّقه غير واحد، وله حديث غريب. قال العقيلي: لا يتابع عليه" ثمّ ساق له الحديث المذكور.
ثمّ قال في ترجمة"صفوان بن هُبَيْرة" عن أبي مَكين بخبر منكر، قال العقيلي:"لا يتابع على حديثه، ولا يعرف إِلَّا به".
فظهر من هذا أن الحديث منكر من رواية صفوان بن هبيرة عن شيخه أبي مَكين، وإن كان أبو مَكين مختلف فيه، فوثَّقه الأئمة الإمام أحمد وابن معين وأبو زرعة وأبو داود، وقال فيه البخاريّ:"منكر الحديث".
وهذا يرد على قول البوصيري في زوائد ابن ماجه: بأنه إسناد حسن.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أنس بن مالك قال: دخل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على مريض يعودُه، فقال:"أتشتهي شيئًا؟ ، أتشتهي كعكًا؟" قال: نعم. فطلبوا له.
رواه ابن ماجه (1440) عن سفيان بن وكيع، قال: حَدَّثَنَا أبو يحيى الحِمَّانيّ، عن الأعمش، عن يزيد الرقاشيّ، عن أنس بن مالك، قال فذكره.
وفيه يزيد بن أبان وهو الرقاشي ضعيف، وكان شعبة شديدًا في الطعن فيه، وبه ضعَّفه البوصيري في زوائد ابن ماجه.
وفيه أيضًا شيخ ابن ماجه وهو سفيان بن وكيع بن الجرَّاح مختلف فيه.
قال فيه الحافظ:"صدوق، إِلَّا أنه ابتلي بوراقه، فأدخل عليه ما ليس من حديثه، فنصح فلم يقبل، فسقط حديثه".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عمر بن الخطّاب قال: قال لي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إذا دخلت على مريض فمره أن يدعو لك، فإن دُعاءَه كدعاء الملائكة".
رواه ابن ماجه (1441) عن جعفر بن مسافر، قال: حَدَّثَنِي كثير بن هشام، قال: حَدَّثَنَا جعفر ابن بُرْقان، عن ميمون بن مهران، عن عمر بن الخطّاب، فذكره.
وفيه علتان:
الأوّلى: الانقطاع، فإن ميمون بن مهران لم يدرك عمر بن الخطّاب.
والثانية: ما قاله الحافظ في ترجمة جعفر بن مسافر في"التهذيب" (3/ 107):"وقفت له على حديث معلول أخرجه ابن ماجه عنه عن كثير بن هشام، عن جعفر بن برنان، عن ميمون بن مهران، عن عمر في الأمر بطلب الدعاء من المريض. قال النوويّ في الأذكار: صحيح أو حسن، لكن ميمونًا لم يدرك عمر، فمشي على ظاهر السند، وعلتُه أن الحسن بن عرفة رواه عن كثير، فأدخل بينه وبين جعفر رجلًا ضعيفًا جدًّا، وهو عيسي بن إبراهيم الهاشميّ، كذلك أخرجه ابن السُنِّي (557) والبيهقي من طريق الحسن، فكأن جعفرًا كان يدلس تدليس التسوية، إِلَّا أني وجدت في نسختي من ابن ماجه تصريح كثير بتحديث جعفر له، فلعل كثيرًا عنعنه، فرواه جعفر عنه بالتصريح لاعتقاده أن الصيغتين سواء من غير المدلس، لكن ما وقفت على كلام أحد وصفه بالتدليس. فإن
كان الأمر كما ظننتُ أولًا، وإلَّا فيسلم جعفر من التسوية، ويثبت التدليس في كثير" انتهى.
আবূ মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক মুসলমানের উপর অপর মুসলমানের চারটি কর্তব্য রয়েছে: যখন সে হাঁচি দেবে, তখন তার হাঁচির জবাব দেবে (তার জন্য দুআ করবে), যখন সে তাকে ডাকবে (বা দাওয়াত দেবে), তখন তার ডাকে সাড়া দেবে, যখন সে মারা যাবে, তখন তার জানাযায় শরীক হবে এবং যখন সে অসুস্থ হবে, তখন তাকে দেখতে যাবে।"
3347 - عن ابن عباس قال: جاء رجل إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: كيف أصبحتم؟ قال: بخير من قوم لم يعودوا مريضًا ولم يشهدوا جِنازة".
صحيح: رواه أبو يعلى (2168) عن عبد الله بن عمر بن أبان، حَدَّثَنَا معاوية بن هشام، حَدَّثَنَا سفيان، عن حبيب، عن عطاء، عن ابن عباس فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع" (2/ 300) بعد أن عزاه لأبي يعلى:"إسناده حسن".
وهو كما قال فإن عبد الله بن عمر بن أبان وشيخه معاوية بن هشام صدوقان.
ورواه ابن أبي شيبة (6/ 147 تحقيق اللحام) عن وكيع، عن سفيان، عن عثمان الثقفيّ، عن سالم بن أبي الجعد، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.
وأمّا ما رُوي عن جابر قال: قلت: كيف أصبحت يا رسول الله؟ قال:"بخير من رجل لم يُصبح صائمًا، ولم يعد سقيمًا" فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (3710) عن أبي بكر، قال: حَدَّثَنَا عيسى بن يونس، عن عبد الله بن مسلم، عن عبد الرحمن بن سابط، عن جابر فذكره. وهو في المصنف (6/ 147 تحقيق اللحام).
وعبد الله بن مسلم هو ابن هرمز المكي ضعَّفه جمهور أهل العلم،
وعبد الرحمن بن سابط ثقة إِلَّا أنه كثير الإرسال، قال ابن معين: مرسل لم يسمع من جابر، وأثبته ابن أبي حاتم. والله تعالى أعلم بالصواب.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞাসা করল: আপনারা কেমন সকালে উপনীত হলেন (বা কেমন আছেন)? তিনি বললেন: আমরা এমন লোকদের চেয়ে ভালো আছি, যারা কোনো রোগীকে দেখতে যায়নি এবং কোনো জানাযায়ও অংশ নেয়নি।
3348 - عن عائشة قالت: أصيب سعد يوم الخندق، رماه رجل من قريش يقال له: حِبَّان
ابن العِرَقة، رماه في الأكحل، فضرب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خيمةً في المسجد ليعوده من قريب.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4122)، ومسلم في الجهاد (1769) كلاهما من حديث عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
والأكحل: عرق وسط الذّراع.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খন্দকের দিন আহত হলেন। কুরাইশের একজন লোক, যার নাম হিব্বান ইবনু আল-ইরাকাহ, তাঁকে আঘাত করেছিল। সে তাঁর আক্হাল (নামক রগ)-এ তীর মেরেছিল। তাই নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে একটি তাঁবু স্থাপন করলেন, যেন তিনি খুব কাছ থেকে তাঁর (সা'দের) খোঁজ-খবর নিতে পারেন।
(আক্হাল হলো হাতের মাঝখানের একটি শিরা।)
3349 - عن عبد الله بن عمر أنه قال: كنا جلوسًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ جاءه رجل من الأنصار فسلم عليه. ثمّ أدبر الأنصاريّ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أخا الأنصار! كيف أخي سعد بن عبادة؟" فقال: صالح. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من يعوده منكم؟" فقام وقمنا معه، ونحن بضعةَ عشرَ، ما علينا نعال ولا خفاف ولا قلانس ولا
قُمص. نمشي في تلك السِبَاخ حتّى جئنا، فاستأخر قومه من حوله، حتّى دنا رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه الذين معه.
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (925) من حديث عمارة بن غزية، عن سعيد بن الحارث بن المعلَّي، عن عبد الله بن عمر فذكره.
وقوله: السِباخ - جمع سَبْخة كالكلبة، وهي الأرض التي تعلوها الملوحة، ولا تكاد تنبتُ إِلَّا بعض الشجر.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বসে ছিলাম। এমন সময় আনসার সম্প্রদায়ের এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে তাঁকে সালাম দিলেন। এরপর আনসারী লোকটি চলে যাচ্ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'হে আনসারী ভাই! আমার ভাই সা’দ ইবনে উবাদা কেমন আছে?' লোকটি বললেন: 'ভালো আছেন।' তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'তোমাদের মধ্যে কে তাকে দেখতে যাবে?' তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উঠলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে উঠলাম। আমরা সংখ্যায় দশের কিছু বেশি ছিলাম। আমাদের পায়ে কোনো জুতা ছিল না, চামড়ার মোজা ছিল না, টুপী বা জামা (কামীস) কিছুই ছিল না। আমরা ঐ লবণাক্ত জমিতে হেঁটে চলছিলাম যতক্ষণ না আমরা সেখানে পৌঁছলাম। (সেখানে পৌঁছার পর) তাঁর (সা’দের) আশপাশের লোকেরা সরে গেল, যাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথীগণ কাছাকাছি যেতে পারেন।
3350 - عن أم سلمة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا حضرتم المريض أو الميتَ، فقولوا خيرًا، فإن الملائكة يؤمنون على ما تقولون" قالت: فلمّا مات أبو سلمة أتيتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله إن أبا سلمة قد مات. قال:"قولي: اللَّهُمَّ اغفر لي وله، وأعقِبْني منه عُقْبى حسنةً".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (919) من طرق، عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن شقيق، عن أم سلمة فذكرته.
وقوله:"وأعقبني منه عُقْبى حسنة" هو بمعنى:"وأخلف لي خيرًا منه" أي عاقبة جميلة.
ورواه الترمذيّ (977)، وابن ماجه (1447) كلاهما من طريق أبي معاوية بإسناده. قال الترمذيّ:"حسن صحيح، وقد كان يُستحب أن يُلقَّن المريضُ عند الموت قول:"لا إله إِلَّا الله" وقال بعض أهل العلم: إذا قال ذلك مرة، فما لم يتكلم بعد ذلك فلا ينبغي أن يُلقَّن، ولا يُكثر عليه في ذلك".
وقال:"ورُوي عن ابن المبارك أنه لما حضرته الوفاةُ جعل رجل يُلَقِّنه: لا إله إِلَّا الله -وأكثر عليه. فقال له عبد الله: إذا قلت مرةً فأنا على ذلك ما لم أتكلم بكلام. وإنما معنى قول عبد الله إنّما أراد ما رُوي عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"من كان آخر قوله: لا إله إِلَّا الله - دخل الجنّة" انتهى كلام الترمذيّ.
وأمّا ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ، مرفوعًا:"إذا دخلتم على المريض فنفِّسوا له في الأجل، فإن ذلك لا يرد شيئًا، وهو يطيب بنفس المريض" فهو ضعيف أيضًا.
رواه الترمذيّ (2087) وابن ماجة (1438) كلاهما من حديث عقبة بن خالد السكونيّ، عن
موسي بن محمد بن إبراهيم التيميّ، عن أبيه، عن أبي سعيد الخدريّ فذكره.
وفيه موسي بن محمد بن إبراهيم التيمي أبو محمد المدني قال فيه البخاريّ: عنده مناكير، وقال أبو زرعة والنسائي: منكر الحديث. وقال الدَّارقطنيّ: متروك، وضعَّفه غيرهم من أهل العلم.
قال الترمذيّ:"حديث غريب" أي ضعيف.
وقال عبد الرحمن بن أبي حاتم في"العلله (2/ 241): سألت أبي عن أحاديث رواها عقبة بن خالد، عن موسى بن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبيه، عن جابر، وعن أبيه، عن أبي سعيد، وعن أبيه، عن أنس إلخ، وذكر منها حديث أبي سعيد أعلاه، وقال: هذه أحاديث منكرة، كأنها موضوعة، وموسى ضعيف الحديث جدًّا، وأبوه محمد بن إبراهيم لم يسمع من جابر، ولا من أبي سعيد".
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “যখন তোমরা কোনো অসুস্থ ব্যক্তির কাছে বা মৃত ব্যক্তির (নিকটে) উপস্থিত হও, তখন ভালো কথা বলো। কারণ তোমরা যা বলো, ফেরেশতারা তার উপর ‘আমিন’ বলেন।”
তিনি (উম্মে সালামাহ) বলেন, যখন আবূ সালামাহ মারা গেলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এলাম এবং বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আবূ সালামাহ তো মারা গেছেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি বলো: ‘আল্লা-হুম্মাগফির লী ওয়া লাহ, ওয়া আ’কিবনী মিনহু উকবা- হাসানা-ন’ (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আমাকে এবং তাকে ক্ষমা করুন, আর তার স্থলাভিষিক্ত হিসেবে আমাকে উত্তম প্রতিদান দিন)।”
সহীহ: এটি মুসলিম জানাইয অধ্যায়ে (৯১৯) একাধিক সূত্রে আবূ মু'আবিয়া থেকে, তিনি আ'মাশ থেকে, তিনি শাকীক থেকে, তিনি উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
তাঁর উক্তি: “ওয়া আ’কিবনী মিনহু উকবা- হাসানা-ন”-এর অর্থ হলো: “আর আমার জন্য তার চেয়ে উত্তম কিছুর স্থলাভিষিক্ত করুন,” অর্থাৎ একটি সুন্দর পরিণাম।
আর এটি তিরমিযী (৯৭৭) ও ইবনু মাজাহ (১৪৪৭) উভয়ে আবূ মু'আবিয়ার সনদে বর্ণনা করেছেন। তিরমিযী বলেন: “হাসান সহীহ। আর মৃত্যুকালে মুমূর্ষু রোগীকে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলার তালকীন (শিক্ষা) দেওয়া মুস্তাহাব ছিল।” কিছু সংখ্যক জ্ঞানীর মতে: যদি সে একবার তা বলে ফেলে, তবে এরপর যতক্ষণ সে কোনো কথা না বলে, ততক্ষণ তাকে আর তালকীন দেওয়া উচিত নয় এবং এ ব্যাপারে তার উপর বেশি চাপ দেওয়া উচিত নয়। তিনি (তিরমিযী) আরও বলেন: ‘ইবনু মুবারক (রাহিমাহুল্লাহ) সম্পর্কে বর্ণিত আছে যে, যখন তাঁর মৃত্যুর সময় ঘনিয়ে এলো, তখন এক ব্যক্তি তাঁকে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’-এর তালকীন দিচ্ছিলেন—এবং তিনি খুব বেশি চাপাচাপি করছিলেন। তখন আব্দুল্লাহ (ইবনু মুবারক) তাকে বললেন: যখন আমি একবার বলেছি, তখন যতক্ষণ না আমি অন্য কোনো কথা বলি, ততক্ষণ আমি এর উপরেই আছি। আব্দুল্লাহর এই কথার অর্থ কেবল এটাই যে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণিত এই হাদিসটিই বুঝাতে চেয়েছেন: “যার শেষ কথা হবে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।”’—তিরমিযীর আলোচনা সমাপ্ত হলো।
আর আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে যা বর্ণিত হয়েছে: “যখন তোমরা কোনো রোগীর কাছে প্রবেশ করবে, তখন তার জীবনের সময়কাল সম্পর্কে আশার কথা বলো (অর্থাৎ তাকে সান্ত্বনা দাও), কারণ তা (মৃত্যুকে) ফিরিয়ে দিতে পারে না, তবে তা রোগীর মনকে শান্ত করে।”—এটিও দুর্বল। এটি তিরমিযী (২০৮৭) এবং ইবনু মাজাহ (১৪৩৮) উভয়ে উকবাহ ইবনু খালিদ আস-সাকুনী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি মূসা ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু ইবরাহীম আত-তাইমী থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি উল্লেখ করেছেন। এই সনদে মূসা ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু ইবরাহীম আত-তাইমী, আবূ মুহাম্মাদ আল-মাদানী রয়েছেন। তাঁর সম্পর্কে বুখারী বলেন: তাঁর নিকট মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস আছে। আবূ যুরআহ এবং নাসাঈ বলেন: তিনি মুনকারুল হাদীস (অস্বীকৃত হাদীসের বর্ণনাকারী)। দারাকুতনী বলেন: তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত)। অন্য আহলে ইলমও তাঁকে দুর্বল বলেছেন। তিরমিযী বলেন: “এটি গরীব হাদীস” অর্থাৎ দুর্বল। আব্দুর রহমান ইবনু আবী হাতিম তাঁর ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (২/২৪১) বলেছেন: আমি আমার পিতাকে উকবাহ ইবনু খালিদ কর্তৃক মূসা ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু ইবরাহীম আত-তাইমী থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে; এবং তাঁর পিতা থেকে, আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে; এবং তাঁর পিতা থেকে, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে—ইত্যাদি যে হাদীসগুলো বর্ণনা করেছেন, সে সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিলাম। তিনি এর মধ্যে উপরোক্ত আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটিও উল্লেখ করেন এবং বলেন: “এগুলো মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস, যেন এগুলো মাওযূ‘ (বানোয়াট)। আর মূসা হাদীসের ক্ষেত্রে অত্যন্ত দুর্বল। এবং তাঁর পিতা মুহাম্মাদ ইবনু ইবরাহীম জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বা আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কারোর থেকেই শুনেননি।”
3351 - عن عائشة قالت: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا أتى مريضًا أو أُتي به إليه قال عليه الصلاة والسلام:"أَذْهِب البأس رب النَّاس، اشف وأنت الشافي، لا شفاءَ إلَّا شِفاءُك، شفاءً لا يُغادِرُ سَقَمًا".
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5675)، ومسلم في السلام (2191/ 47) كلاهما من حديث أبي عوانة، عن منصور، عن إبراهيم، عن مسروق، عن عائشة فذكرته.
وفي رواية: كان يعود بعض أهله، يمسح بيده اليمنى ثم يقول: فذكره.
رواه البخاري في الطب (5743)، ومسلم من طريق أبي الضُحي مسلم بن صبيح، عن مسروق، عن عائشة، وفي أبي يعلى وغيره: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا عاد مريضًا يضع يده على المكان الذي يألم ثم يقول:"بسم الله لا بأس".
قال الهيثمي في"المجمع"، (/ 299):"رواه أبو يعلى ورجاله موثقون".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন কোনো অসুস্থ ব্যক্তির নিকট যেতেন অথবা তাঁকে রোগীর কাছে আনা হতো, তখন তিনি বলতেন: "হে মানবজাতির রব! কষ্ট দূর করে দিন। আরোগ্য দান করুন, আপনিই আরোগ্যদানকারী। আপনার আরোগ্য ব্যতীত অন্য কোনো আরোগ্য নেই, এমন আরোগ্য দিন যা কোনো রোগকে অবশিষ্ট রাখে না।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি তাঁর পরিবারের কোনো কোনো সদস্যকে দেখতে যেতেন, (রোগীর) ডান হাত দিয়ে মুছে দিতেন এবং এরপর এই (উপরোক্ত দু'আটি) বলতেন।
আবু ইয়া'লা (রহ.) ও অন্যান্যদের বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন কোনো রোগীকে দেখতে যেতেন, তখন ব্যথার স্থানে তাঁর হাত রাখতেন এবং বলতেন: "আল্লাহর নামে, কোনো অসুবিধা নেই (বা ভয় নেই)।"
3352 - عن عائشة: أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول للمريض:"بسم الله، تُرْبةُ أرضِنا، بريقةِ بعضِنا يُشْفى سَقِيمُنا، بإذن ربنا".
متفق عليه: رواه البخاري في الطب (5745)، ومسلم في السلام (2194) كلاهما من حديث سفيان، قال: حدثني عبد ربه بن سعيد، عن عمرة، عن عائشة فذكرته.
وفي مسلم: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا اشتكى الإنسان الشيء منه، أو كانت به قَرْحةٌ، أو جُرْحٌ، قال النبيّ صلى الله عليه وسلم بإصبعه، ووضع سفيان سبابتَه بالأرض، ثم رفعها، ثم ذكر الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম রোগীকে লক্ষ্য করে বলতেন: "বিসমিল্লাহ। আমাদের মাটির কণা, আমাদের কারো লালার সাথে (মিশ্রিত হয়ে), আমাদের অসুস্থ ব্যক্তি আরোগ্য লাভ করবে, আমাদের রবের অনুমতিক্রমে।"
সহীহ মুসলিমে (অন্য বর্ণনায়) রয়েছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন কোনো ব্যক্তি তাঁর দেহের কোনো কিছুর অভিযোগ করত অথবা তার কোনো ফোঁড়া কিংবা ক্ষত থাকত, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর আঙ্গুল দ্বারা (মাটি স্পর্শ করে লালার সাথে মিশ্রিত করতেন)। বর্ণনাকারী সুফিয়ান (তাঁর শাহাদাত আঙ্গুল) মাটিতে রাখলেন, তারপর উঠালেন এবং অতঃপর উক্ত হাদীস বর্ণনা করলেন।
3353 - عن عائشة قالت: كان إذا اشتكى رسول الله صلى الله عليه وسلم رقاه جبريل قال: باسم الله
يُبريك، من كل داء يَشْفيك، ومن شر حاسد إذا حسد، وشر كل ذي عين.
صحيح: رواه مسلم في السلام (2185) عن محمد بن أبي عمر المكي، حدثنا عبد العزيز الدراوردي، عن يزيد (وهو ابن عبد الله بن أسامة بن الهاد) عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অসুস্থ হতেন, তখন জিবরাঈল (আঃ) তাঁর জন্য রুকইয়াহ (ঝাড়ফুঁক) করতেন। তিনি বলতেন: "আল্লাহর নামে, তিনি আপনাকে রোগমুক্ত করুন, প্রতিটি রোগ থেকে আপনাকে আরোগ্য দান করুন, এবং যখন হিংসুক হিংসা করে তার অনিষ্ট থেকে এবং প্রতিটি কুদৃষ্টিদাতার অনিষ্ট থেকে (আপনাকে রক্ষা করুন)।"
3354 - عن عبد العزيز بن صهيب قال: دخلت أنا وثابت على أنس بن مالك فقال
ثابت: يا أبا حمزة! اشتكيت. فقال أنس: أفلا أرقيك برقية رسول الله؟ قال: بلى. قال:"اللهم رَبَّ الناس، مُذْهِبَ البأسَ، اشفِ أنت الشافي، لا شافي إلا أنت. شفاءً لا يغادر سقَمًا".
صحيح: رواه البخاري في الطب (5742) عن مسدد، حدثنا عبد الوارث، عن عبد العزيز بن صهيب فذكره.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল আযীয ইবনে সুহাইব (রহ.) বলেন, আমি ও সাবেত (রহ.) আনাস ইবনে মালিকের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট গেলাম। সাবেত (রহ.) বললেন, হে আবূ হামযাহ! আমি অসুস্থ হয়ে পড়েছি। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি কি তোমাকে আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রুকইয়া দ্বারা রুকইয়া করব না? সাবেত (রহ.) বললেন, হ্যাঁ। তিনি (আনাস) বললেন, (দোয়াটি হলো:)
"اللهم رَبَّ الناس، مُذْهِبَ البأسَ، اشفِ أنت الشافي، لا شافي إلا أنت. شفاءً لا يغادر سقَمًا"
(অর্থাৎ) হে আল্লাহ! মানুষের প্রতিপালক, কষ্ট দূরকারী, আরোগ্য দান করুন, আপনিই আরোগ্য দানকারী, আপনি ছাড়া আরোগ্য দানকারী আর কেউ নেই। এমন আরোগ্য দান করুন যা কোনো রোগকে অবশিষ্ট রাখে না।
3355 - عن محمد بن حاطب قال: انصبت على يدي من قِدْرٍ، فذهبتْ بي أمي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في مكان، قال: فقال كلامًا فيه:"أذهبِ البأس ربَّ الناس" وأحسبه قال:"اشفِ أنت الشافي" قال: كان يتفُلُ.
حسن: رواه الإمام أحمد (15452) عن يحيى بن سعيد، عن شعبة، عن سماك، قال: قال محمد بن حاطب فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه الطبراني في"الكبير" (19/ 536) وصحَّحه ابن حبان (2976)، ورواه من طريق شعبة به وفيه: فأتيناه، وهو في الرحبة، فأحفظ أنه قال:"أَذهب البأس ربِّ الناس" وأكثر علمي أنه قال:"أنت الشافي لا شافي إلا أنت".
وإسناده حسن من أجل سماك وهو ابن حرب، وسماع شعبة عنه كان قديمًا.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (18276) من وجه آخر عن إسرائيل، عن سماك، عن محمد بن حاطب قال: تناولت قِدْرًا لأمي، فاحترقَتْ يدي، فذهبتْ بي أمي إلى النبيّ، فجعل يمسح يدي، ولا أدري ما يقول، أنا أصغر من ذاك، فسألت أمي فقالت: كان يقول:"أذهبِ البأسَ ربَّ الناس، واشف أنت الشافي، لا شِفاءَ إلا شِفاؤُك".
وما جاء في رواية أحمد (18277) فسألت أمي في خلافة عثمان، من الرجل؟ فقالت: رسول الله صلى الله عليه وسلم. فهو ضعيف من أجل شريك وهو ابن عبد الله النخعي.
ومحمد بن حاطب هو الجمحي القرشي، يقال: ولد بأرض الحبشة، وهاجر أبواه، ومات أبوه بها، فقدمت به أمه المدينة وجاء أنه أول من سمي محمدًا في الإسلام، وأخرج الإمام أحمد (18278) عن معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق، عن أبي مالك الأشجعي قال: كنت جالسًا مع محمد بن حاطب فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إني قد رأيتُ أرضًا ذات نخْل فاخرجوا" فخرج حاطب وجعفر في البحر قِبَل النجاشي، قال: فولدتُ أنا في تلك السفينة. وأخرجه الطبراني في"الكبير" (19/ 541) من طريق معاوية بن عمرو به مثله.
قال الهيثمي في"المجمع" (6/ 27): رواه أحمد والطبراني، ورجاله رجال الصحيح".
وأما ما رُوي عن محمد بن حاطب، عن أمه أم جميل بنت المُجلّل قالت: أقبلت بك من أرض
الحبشة، حتى إذا كنت من المدينة على ليلة، أو ليلتين طبخت لك طبيخًا، ففَني الحطب، فخرجت أطلبه، فتناولت القِدْر فانكفأت على ذراعِك، فأتيت بك النبيّ صلى الله عليه وسلم فقلت: بأبي وأمي يا رسول الله! هذا محمد بن حاطب، فتفل في فيك، ومسح على رأسك، ودعا لك، وجعل يَتْفُل على يديك ويقول:"أذهبِ البأسَ رب الناس، واشف أنت الشافي لا شفاء إلا شفاؤك، شفاءً لا يغادر سقمًا. فقالت: فما قُمت بك من عنده حتى برأت يدك. فهو ضعيف. رواه الإمام أحمد (15453) عن إبراهيم بن أبي العباس ويونس بن محمد، قالا: حدثنا عبد الرحمن بن عثمان -قال إبراهيم بن العباس في حديثه- ابن إبراهيم بن محمد بن حاطب، قال: حدثني أبي، عن جده محمد ابن حاطب، عن أمه فذكره.
وصححه ابن حبان (2977)، وأخرجه الحاكم (4/ 62 - 63).
وأورده الهيثمي في المجمع (5/ 112 - 113) وقال:"رواه أحمد والطبراني في"الكبير" (24/ 363) وفيه عبد الرحمن بن عثمان الحاطبي ضعَّفه أبو حاتم".
قلت: عبد الرحمن بن عثمان هو ابن إبراهيم بن محمد بن حاطب القرشي، قال أبو حاتم: يهولني ما يُسند، وذكر الذهبي في"الميزان" أن أبا حاتم ضعَّفه. كذا في"التعجيل" (638) وأبوه عثمان بن إبراهيم أيضًا من رجال"التعجيل"، قال أبو حاتم: شيخ يكتب حديثه. وبقية كلامه: روى عنه ابنه أحاديث منكرة. كذا في التعجيل.
وكذلك لم يصح ما رُوي عن علي بن أبي طالب مرفوعًا:"اللهم أذهب البأس ربَّ الناس،
واشفِ فأنت الشافي، لا شِفَاء إلا شِفاؤك شِفاءً لا يُغادر سقَمًا رواه الترمذي (3565) عن سفيان ابن وكيع، حدثنا يحيى بن آدم، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علِيٍّ قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا عاد مريضًا قال: فذكره.
قال الترمذي:"حسن".
قلت: ليس بحسن، وإنما هو ضيف من أجل الحارث وهو ابن عبد الله الأعور الهمداني ضعيف جدًّا، وقد كذبه البعض. ومن هذا الوجه رواه أيضًا الطبراني في الدعاء (1109) وابن أبي الدنيا في"المرض والكفارات" (52/ 190).
মুহাম্মদ বিন হাতিব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একটি হাঁড়ি থেকে (গরম কিছু) আমার হাতের উপর পড়ে গিয়েছিল। তখন আমার মা আমাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন। তিনি এক স্থানে অবস্থান করছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু কথা বললেন, যার মধ্যে ছিল: "হে মানুষের প্রতিপালক! কষ্ট দূর করে দিন (বা রোগ দূর করে দিন)।" আমি ধারণা করি যে, তিনি আরও বলেছিলেন: "আরোগ্য দান করুন, আপনিই আরোগ্যদাতা।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফুঁ দিচ্ছিলেন।
3356 - عن أبي سعيد أن جبريل أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا محمد اشتكيت؟ فقال:"نعم" قال: باسم الله أَرْقيك، من كل شيء يُؤذيك، من شر كل نفس أو عين حاسدٍ اللهُ يشفيكَ باسم الله أَرْقِيك.
صحيح: رواه مسلم في السلام (2186) عن بشر بن هلال الصواف، حدثنا عبد الوارث، حدثنا عبد العزيز بن صُهيب، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد فذكره.
وأخرجه الترمذي من هذا الوجه (972) وقال:"حسن صحيح. وسألت أبا زرعة عن هذا
الحديث فقلت له: رواية عبد العزيز عن أبي نضرة، عن أبي سعيد أصح أو حديث عبد العزيز عن أنس؟ قال: كلاهما صحيح".
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিবরীল (আঃ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন এবং বললেন: "হে মুহাম্মাদ, আপনি কি অসুস্থ/কষ্ট অনুভব করছেন?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" জিবরীল (আঃ) বললেন: "আল্লাহর নামে আমি আপনাকে রুকইয়াহ করছি, প্রত্যেক সেই জিনিস থেকে যা আপনাকে কষ্ট দেয়; প্রত্যেক আত্মা বা হিংসুক চোখের অনিষ্ট থেকে। আল্লাহ আপনাকে আরোগ্য দিন। আল্লাহর নামে আমি আপনাকে রুকইয়াহ করছি।"
3357 - عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على رجل يعوده فقال: لا بأس، طهور إن شاء الله" فقال: كلا، بل هي حُمي تفور على شيخ كبير حتى تُزِيره القبور، فقال النبي:"فنعم إذا".
صحيح: رواه البخاري في المرضى (5662) عن إسحاق، حدثنا خالد بن عبد الله، عن خالد (الحذاء) عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে দেখতে (রোগী দেখতে) তার নিকট গেলেন। তিনি বললেন: "কোনো চিন্তা নেই, ইনশাআল্লাহ (এই রোগ) পবিত্রকারী হবে।" তখন লোকটি বলল: "না, বরং এটি এমন এক জ্বর যা এক বৃদ্ধের উপর এমনভাবে উথলে উঠেছে যে তাকে কবরে পৌঁছে দেবে।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তাই হোক।"
3358 - عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من عاد مريضًا لم يحضر أجلُه فقال عنده سبع مرار: أسأل الله العظيم رب العرش العظيم أن يشفيك، إلا عافاه الله من ذلك المرض.
وفي رواية: إذا عاد مريضًا جلس عند رأسه، ثم قال سبع مرات.
حسن: رواه أبو داود (3106)، والترمذي (2083) كلاهما من حديث شعبة، عن يزيد أبي خالد، عن المنهال بن عمرو، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره. ولفظهما سواء.
قال الترمذي: حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث المنهال بن عمرو".
وأخرجه الحاكم (1/ 342) من هذا الوجه وقال:"صحيح على شرط البخاري".
قلت:"ليس كما قال، فإن يزيد أبا خالد وهو الدالاني ليس من رجال البخاري، ولا من رجال مسلم، وإنما أخرج له أصحاب السنن، ثم هو مختلف فيه. فقال ابن معين والنسائي:"ليس به بأس". وقال أبو حاتم:"صدوق ثقة"، وقال ابن حبان في الضعفاء:"كان كثير الخطأ فاحش الوهم، خالف الثقات في الروايات حتى إذا سمعها المبتدي في هذه الصناعة علم أنها معلولة أو مقلوبة، لا يجوز الاحتجاج به إذا وافق الثقات، فكيف إذا انفرد بالمعضلات".
قلت: هذا الكلام من ابن حبان فيه تحامل واضح، وقد قال الحاكم:"إن الأئمة المتقدمين شهدوا له بالصدق والإتقان".
والخلاصة فيه أنه حسن الحديث وقد توبع.
ورواه النسائي في"عمل اليوم والليلة" (1045، 1046، 1047) والطبراني في الدعاء (1115، 1116، 1118، 1119) من طرق، عن شعبة، عن ميسرة، عن المنهال بن عمرو بإسناده مثله.
وميسرة هو ابن حبيب النهدي أبو حازم الكوفي"صدوق" كما في التقريب".
وللحديث أسانيد أخرى منها عن منهال بن عمرو، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس أخرجه الطبراني في الدعاء (1117، 1120).
ومنها: عن المنهال بن عمرو، عن عبد الله بن الحارث، عن ابن عباس. رواه الإمام أحمد (2138، 3298)
والبخاري في"الأدب المفرد" (536)، والحاكم (4/ 213).
ومنها: عن المنهال بن عمرو قال: أخبرني سعيد بن جبير، عن عبد الله بن الحارث، عن ابن عباس. رواه ابن حبان في صحيحه (2975)، والحاكم (4/ 213) كلاهما من طريق عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن عبد ربه بن سعيد، حدثني المنهال بن عمرو به مثله. قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه، ولم يتابع عمرو بن الحارث بن سعيد وابن عباس أحد، إنما رواه حجاج بن أرطاة، عن المنهال، عن عبد الله بن الحارث، ولم يذكر بينهما سعيد بن جبير"، انتهى.
يبدو أنه وقع خطأ في إقحام سعيد بن جبير بين المنهال وبين عبد الله بن الحارث، فقد رواه البخاري في"الأدب المفرد" كما سبق عن أحمد بن عيسى، قال: حدثنا عبد الله بن وهب بإسناده ولم يدخل بين المنهال وعبد الله بن الحارث"سعيد بن جبير".
وكذلك رواه الحجاج بن أرطاة عن المنهال. رواه الإمام أحمد (2138) عن أبي معاوية وعن يزيد (3298) كلاهما عن الحجاج بن أرطاة، عن المنهال بن عمرو كما سبق.
وفي بعض طرقه أنه صلى الله عليه وسلم عاد المريض فجلس عند رأسه. وبوَّب البخاري في"الأدب المفرد" بقوله:"أين يقعد العائد".
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি এমন কোনো রোগীকে দেখতে যায়, যার মৃত্যুর সময় এখনও উপস্থিত হয়নি, আর সে তার কাছে সাতবার বলে: 'আমি মহান আল্লাহ্র কাছে প্রার্থনা করি, যিনি মহান আরশের রব, তিনি যেন তোমাকে আরোগ্য দান করেন,' তবে আল্লাহ্ তাকে সেই রোগ থেকে অবশ্যই আরোগ্য দান করেন।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যখন সে কোনো রোগীকে দেখতে যায়, তখন সে তার মাথার কাছে বসে, এরপর সাতবার (ঐ দু'আ) বলে।"
3359 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على أعرابي يعودُه، وهو محموم فقال:"كفارة وطهور" فقال الأعرابي: بل حُمَّى تفور على شيخ كبير، تزيره القبور.
فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم وتركهـ.
حسن: رواه الإمام أحمد (13616) عن عفان، حدثنا حماد بن سلمة، حدثنا أبو ربيعة، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي ربيعة وهو سنان بن ربيعة الباهلي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث وخاصة إذا كان في الشواهد.
وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 299):"رواه أحمد ورجاله ثقات".
وأما ما رُوي عن شرحبيل قال: كنا جلوسًا عند النبي صلى الله عليه وسلم إذ جاءه أعرابي طويل أبيض. فقال: يا رسول الله شيخ كبير به حُمَّى تفور تزيره القبور. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"شيخ كبير به حُمَّى تفور، هي له كفارة وطهوره فأعادها، وأعادها عليه النبي صلى الله عليه وسلم فأعادها ثلاث مرات أو أربعة، قال النبي صلى الله عليه وسلم: أما إذا أَبيت فهي كما تقول، وما قضى الله فهو كائن" قال: فما أمسى من الغد إلا ميتا.
ففي إسناده من لا يعرفون، رواه الطبراني في"الكبير" (7/ 366 - 367) عن العباس بن الفضل الأسناطي، ثنا أبو عون الزيادي، ثنا حماد بن يزيد المنقري، عن مخلد بن عقبة بن شرحبيل، عن جده شرحبيل فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 307): رواه الطبراني في"الكبير"، وفيه من لم أعرفه.
وأورده الحافظ في"الفتح" (6/ 625) وقال:"أخرجه الطبراني وغيره من رواية شرحبيل والد عبد الرحمن فذكر نحو حديث ابن عباس".
قلت: إن كان الحافظ يقصد به الحديث المذكور فهو ليس نحو حديث ابن عباس، بل عكس منه، ففي حديث ابن عباس عاد النبيُّ صلى الله عليه وسلم الأعرابي، وفي حديث شرحبيل زار الأعرابيُّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم.
وقال في"الفتح" (10/ 119) بعد أن أخرجه من حديث شرحبيل:"وأخرجه الدولابي في"الكني" وابن السكن في"الصحابة"، ولفظه:"فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ما قضى الله فهو كائن" فأصبح الأعرابي ميتًا".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন বেদুঈনের (গ্রামীণ আরবের) কাছে তার অসুস্থতার খোঁজ নিতে গেলেন, যখন সে জ্বরে আক্রান্ত ছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি পাপের কাফফারা এবং পবিত্রতা (শুদ্ধি)।" তখন বেদুঈনটি বলল: বরং এটি তো এমন এক প্রচণ্ড জ্বর, যা একজন বৃদ্ধ লোককে কবরের (মৃত্যুর) দিকে নিয়ে যাবে।
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উঠে দাঁড়ালেন এবং তাকে ছেড়ে চলে গেলেন।
3360 - عن ابن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا جاء الرجل يعود مريضًا فليقل: اللهم اشف عبدك ينكأ لك عَدُوًا، أو يمشي لك إلى جنازة".
حسن: رواه أبو داود (3107) عن يزيد بن خالد الرملي، حدثنا ابن وهب، عن حُيي بن عبد الله، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن ابن عمرو فذكره.
وصحَّحه ابن حبان (2974)، والحاكم (1/ 344، 549) كلاهما من طريق ابن وهب به نحوه إلا أنهما قالا:"أو يمشي لك إلى صلاة" قال الحاكم في الموضع الأول:"صحيح على شرط مسلم". وقال في الموضع الثاني:"هذا حديث مصري صحيح الإسناد".
قلت: إسناده حسن من أجل حُيي بن عبد الله فقد تكلم فيه أحمد والبخاري والنسائي، ومشاه الآخرون، فقال ابن معين:"ليس به بأس" وقال ابن عدي:"أرجو أنه لا بأس به"، وذكره ابن حبان في الثقات. فمثله يحسن حديثه إذا لم يأتي بما ينكر عليه، ولم يقع منه الوهم.
وللحديث أسانيد أخرى والذي ذكرته هو أصحها.
وقوله:"ينكأ" أي يكثر فيهم الجرح والقتل.
وفي الباب أحاديث ستأتي في كتاب الطب.
ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন কোনো লোক কোনো অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে আসে, তখন সে যেন বলে: ‘হে আল্লাহ, আপনার এই বান্দাকে আরোগ্য দান করুন, যেন সে আপনার জন্য (ইসলামের) শত্রুদেরকে পরাজিত করতে পারে অথবা আপনার জন্য কোনো জানাযায় হেঁটে যেতে পারে।”