আল-জামি` আল-কামিল
3361 - عن السائب بن يزيد يقول: ذهبت بي خالتي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله إن ابن أختي وَجِعٌ، فمسح رأسي ودعا لي بالبركة.
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5670)، ومسلم في الفضائل (2345) كلاهما من حديث حاتم بن إسماعيل، عن الجعد بن عبد الرحمن، قال: سمعت السائب بن يزيد يقول: فذكره.
يقول الجُعيد بن عبد الرحمن: رأيت السائب بن يزيد ابن أربع وتسعين جلدًا معتدلًا فقال: قد علمتُ ما مُتِّعتُ به سَمْعي وبَصري إلا بدعاء النبي صلى الله عليه وسلم، إن خالتي ذهبتْ بي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره. أخرجه البخاري (3540) عن الفضل بن موسى، عن الجعيد بن عبد الرحمن.
সায়িব ইবনু ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার খালা আমাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন এবং বললেন, “হে আল্লাহর রাসূল! আমার ভাগ্নে অসুস্থ।” অতঃপর তিনি আমার মাথা মাসাহ করলেন এবং আমার জন্য বরকতের দু‘আ করলেন।
জু‘আইদ ইবনু আব্দুর রহমান বলেন: আমি সায়িব ইবনু ইয়াযিদকে নিরানব্বই বছর বয়সেও সুঠাম ও মধ্যমাকৃতির দেখেছি। তিনি বললেন: আমি জানি, আমার শ্রবণশক্তি ও দৃষ্টিশক্তির যে শক্তি আমি ভোগ করেছি, তা কেবল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দু‘আর বরকতে। আমার খালা আমাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গিয়েছিলেন... (এরপর তিনি এই ঘটনাটি উল্লেখ করলেন)।
3362 - عن عائشة بنت سعد أن أباه قال: تشكيت بمكة شكوى شديدة فجاءني النبي صلى الله عليه وسلم يعودني فوضع يَدَه على جبهتي، ثم مسح يديه على وجهي وبطني، ثم قال:"اللَّهم اشف سعدًا، وأتمم له هجرته" فمازلت أجد بردَه على كبدي فيما يُخال إلي حتى الساعة.
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5659) عن المكي بن إبراهيم، أخبرنا الجُعيد، عن عائشة بنت سعد فذكرته.
ورواه مسلم في الوصايا (1628/ 8) من أوجه أخرى عن ثلاثة من ولد سعد، كلهم يحدثه عن أبيه، أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل على سعد يعوده بمكة، فبكى، قال:"ما يبكيك؟" فقال: قد خشيتُ أن أموت بالأرض التي هاجرت منها كما مَات سعد بن خولة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اللَّهم! اشف سعدًا اللهم! اشف سعدًا" ثلاث مرار فذكر الحديث بطوله وسيأتي في الوصية.
وثلاثة أولاد سعد هم: عامر بن سعد، ومصعب بن سعد، وعائشة بنت سعد، وحديث عائشة بنت سعد لم يخرجه مسلم، وإنما أخرجه البخاري وحده.
সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মক্কায় মারাত্মকভাবে অসুস্থ হয়ে পড়ি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে আসলেন। তিনি তাঁর হাত আমার কপালে রাখলেন, অতঃপর তাঁর হাত আমার মুখমণ্ডল ও পেটের ওপর বুলিয়ে দিলেন। এরপর তিনি বললেন: “হে আল্লাহ! সা'দকে আরোগ্য দান করুন এবং তার হিজরতকে পরিপূর্ণ করুন।” সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার ধারণা অনুযায়ী আমি তখন থেকে নিয়ে এখন পর্যন্ত আমার কলিজায় তাঁর হাতের ঠাণ্ডা অনুভব করে আসছি।
3363 - عن عثمان بن أبي العاص أنه أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، قال عثمان: وبي وجع قد كان يُهلكني. قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"امسحه بيمينك سبع مرات. وقل أعوذ بعزة الله وقدرته من شَرِّ ما أجد".
قال: فقلت ذلك. فأذهب الله ما كان بي. فلم أزل آمر بها أهلي وغيرهم.
صحيح: رواه مالك في العين (9) عن يزيد بن خصيفة، أن عمرو بن عبد الله بن كعب السلمي أخبره أن نافع بن جبير أخبره، عن عثمان بن أبي العاص فذكره.
ورواه مسلم في السلام (2202) من وجه آخر عن ابن شهاب، قال: أخبرني نافع بن جبير بن مطعم بإسناده أنه شكا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وَجَعًا يجده في جسده منذ أسلم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ضع يدك على الذي تألم من جسدك. وقل: باسم الله ثلاثًا، وقل سبع مرات: أعوذ بالله وقدرته من شر ما أجد وأحاذرُ".
উসমান ইবনে আবিল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন এবং বললেন যে, তার এমন ব্যথা হচ্ছিল যা তাকে প্রায় ধ্বংস করে দিচ্ছিল।
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: “তুমি তোমার শরীরের যে স্থানে ব্যথা অনুভব করছো, সেখানে তোমার হাত রাখো। প্রথমে তিনবার ‘বিসমিল্লাহ’ বলো। এরপর সাতবার বলো: ‘আ‘ঊযু বিল্লাহি ওয়া ক্বুদরাতিহি মিন শাররি মা আজিদু ওয়া উহাযিরু’ (আমি যা অনুভব করছি এবং যা থেকে আশঙ্কা করছি, তার ক্ষতি থেকে আল্লাহর ক্ষমতা ও শক্তিতে আশ্রয় চাচ্ছি)।”
উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাই করলাম। ফলে আল্লাহ আমার ভেতরের সে ব্যথা দূর করে দিলেন। আমি এরপর থেকে আমার পরিবার-পরিজন ও অন্যকেও তা দ্বারা আদেশ করতে থাকি।
3364 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا اشتكى أحدكم فليضع يده حيث يشتكي، ثم يقول:"بسم الله، أعوذ بعزة الله وقدرته من شر ما أجد من وَجَعي هذا، ثم يرفع يده ثم يُعيد ذلك وترًا".
حسن: رواه الترمذي (3588) عن عبد الوارث بن عبد الصمد، حدثني أبي، حدثنا محمد بن سالم، حدثنا ثابت البناني، عن أنس بن مالك فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه، ومحمد بن سالم هذا شيخ بصري".
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الحاكم (4/ 219) وصحّحه.
ورواه الطبراني في"الصغير" (1/ 181) عن طالب بن مرة الأذني، حدثنا محمد بن عيسي الطباع، حدثنا محمد بن سالم البصري بإسناده، مثله.
وقال:"لم يروه عن ثابت إلا محمد بن سالم البصري. تفرد به ابن الطباع".
قلت: وهو ليس كما قال، بل رواه أيضًا عبد الصمد، عن محمد بن سالم كما ترى وإسناده حسن من أجل محمد بن سالم وهو لا بأس به كما قال أبو حاتم، وذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 396).
وأما ما روي عن أبي أمامة مرفوعًا:"تمام عيادة المريض أن يضع أحدكم يده على جبهته أو قال: على يده، فيسأله كيف هو؟ وتمام تحياتكم بينكم المصافحة" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (2731) عن سويد بن نصر، أخبرنا عبد الله، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن عبيد الله ابن زحر، عن علي بن زيد، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة فذكره.
ورواه الإمام أحمد (22236) عن الخلف بن الوليد، عن ابن المبارك وقرنه بعلي بن إسحاق - كلاهما عن يحيى بن أيوب بإسناده مثله.
قال الترمذي: هذا إسناد ليس بقوي. قال محمد: وعبيدالله بن زحر ثقة، وعلي بن زيد ضعيف، والقاسم بن عبد الرحمن يكنى أبا عبد الرحمن وهو ثقة، وهو مولي عبد الرحمن بن خالد بن يزيد بن معاوية، والقاسم شامي" انتهي
وقول البخاري عن عبيد الله بن زَحر ثقة، لم يوافق عليه أحد حتى قال ابن حبان فيه: يروي الموضوعات عن الأثبات، فهو إلى الضعف أقرب.
وأما علي بن زيد وهو الألهاني فأهل العلم مطبقون على تضعيفه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ অসুস্থ হয়, তখন সে যেন তার হাত সেই স্থানে রাখে যেখানে সে ব্যথা অনুভব করে। অতঃপর সে যেন বলে: "বিসমিল্লাহ। আমি আল্লাহর ইজ্জত ও তাঁর কুদরতের মাধ্যমে আশ্রয় প্রার্থনা করছি এই কষ্টের অনিষ্ট থেকে, যা আমি অনুভব করছি।" অতঃপর সে হাত তুলে নেবে এবং বেজোড় সংখ্যকবার তা পুনরাবৃত্তি করবে।
3365 - عن جابر بن عبد الله يقول: مرضتُ مرضًا، فأتاني النبي صلى الله عليه وسلم يعودني وأبو بكر وهما ماشيان، فوجداني أغمي عليَّ، فتوضأ النبي صلى الله عليه وسلم ثم صَبَّ وَضوءه عليَّ، فأفقتُ فإذا النبي صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، كيف أصنع في مالي؟ كيف أقضي في مالي؟ فلم يُجبني بشيء حتى نزلت آية الميراث.
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5651)، ومسلم في الفرائض (1616) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن محمد بن المنكدر، سمع جابر بن عبد الله قال: فذكر الحديث.
وفي رواية عند مسلم: في بني سَلمة.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অসুস্থ হয়ে পড়লাম। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হেঁটে হেঁটে আমার দেখতে এলেন। তাঁরা এসে দেখলেন যে আমি বেহুশ (অজ্ঞান) হয়ে আছি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওযু করলেন এবং সেই ওযুর পানি আমার উপর ঢেলে দিলেন। তখন আমার জ্ঞান ফিরল। আমি দেখলাম, সেখানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপস্থিত। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার সম্পদের ব্যাপারে আমি কী করব? আমার সম্পদ সম্পর্কে আমি কীভাবে সিদ্ধান্ত নেব? তিনি আমাকে কোনো উত্তর দেননি, যতক্ষণ না মীরাসের (উত্তরাধিকারের) আয়াত নাযিল হলো।
মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী এটি ‘রোগী’ অধ্যায়ে (৫৬৫১) এবং মুসলিম এটি ‘উত্তরাধিকার’ অধ্যায়ে (১৬১৬) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই সুফিয়ান ইবনে উয়াইনা থেকে, তিনি মুহাম্মদ ইবনুল মুনকাদির থেকে, তিনি জাবির ইবনে আব্দুল্লাহকে বলতে শুনেছেন – তিনি হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।
মুসলিমের অন্য এক বর্ণনায় রয়েছে: বানু সালামার গোত্রের বিষয়ে।
3366 - عن زيد بن أرقم قال: عادني رسول الله صلى الله عليه وسلم من وجعٍ كان بعيني.
حسن: رواه أبو داود (3102) عن عبد الله بن محمد النفيلي، حدثنا حجاج بن محمد، عن يونس بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن زيد بن أرقم فذكره.
ومن هذا الطريق أخرجه الحاكم (1/ 342)، وقال:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: إسناده حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، كما أن البخاري لم يخرج له في صحيحه، وأبوه مختلط مدلس، وقد صرَّح بالسماع في رواية سلّم بن قتيبة قال: حدثنا يونس بن أبي إسحاق، عن أبي إسحاق، قال: سمعت زيد بن أرقم يقول: رمدتْ عيني، فعادني النبيّ صلى الله عليه وسلم ثم قال:"يا زيد! لو أن عينك لَمَّا بها كيف كنت تصنع؟" قال: كنتُ أصبر واحتسب. قال:"لو أن عينك لما بها، ثم صبرت واحتسبت كان ثوابك الجنة" رواه البخاري في"الأدب المفرد" (532) عن عبد الرحمن بن المبارك، قال: حدثنا سلم بن قتيبة به مثله.
وسلم بن قتيبة"صدوق".
وزاد الطبراني:"فعمي بعد ما مات النبي صلى الله عليه وسلم، ثم رد الله عز وجل إليه بصره، ثم مات رحمه الله. قال الهيثمي في"المجمع" (1/ 342):"فيه نباتة بنت برير بن حماد لم أجد من ذكرها".
যায়েদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার চোখে যে কষ্ট হয়েছিল তার জন্য আমাকে দেখতে এসেছিলেন।
3367 - عن أنس قال: عاد النبي صلى الله عليه وسلم زيد بن أرقم من رمد كان به.
صحيح: رواه الحاكم (1/ 342) عن أبي علي الحسين بن علي الحافظ، أنبأ محمد بن يحيي ابن كثير الحمصي، ثنا محمد بن المصفَّى، ثنا معاوية بن حفص، ثنا مالك بن مغول، عن الزبير بن عدي، عن أنس فذكره.
قال الحاكم عقب حديث زيد بن أرقم:"وله شاهد صحيح من حديث أنس بن مالك".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চোখে যে রמד (প্রদাহ/রোগ) হয়েছিল, তার কারণে তাঁকে দেখতে গিয়েছিলেন।
3368 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم عاد رجلًا من المسلمين قد خَفَتَ فصار مثل الفَرْخ. فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هل كنت تدعو بشيء، أو تسأله إياه" قال: نعم.
كنت أقول: اللهم ما كنتَ معاقبي به في الآخرة فعَجِّله لي في الدنيا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"سبحان الله لا تُطيقه -أو لا تستطيعه- أفلا قلت: اللَّهم! آتنا في الدنيا حسنةً، وفي الآخرة حسنةً وقِنا عذاب النار" قال: فدعا الله له فشفاه.
صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2688) عن أبي الخطَّاب، زياد بن يحيى الحسَّاني، حدثنا محمد بن أبي عدي، عن حُميد، عن ثابت، عن أنس فذكره.
ورواه الترمذي (3487) من طريق سهل بن يوسف، عن حُميد وفيه قال النبي صلى الله عليه وسلم له:"أما كنت تدعو؟ أما كنت تسأل ربك العافية؟" والباقي نحوه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একজন মুসলিম রোগীকে দেখতে গেলেন, যিনি দুর্বল হতে হতে পাখির ছানার মতো হয়ে গিয়েছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি কোনো কিছু দিয়ে (আল্লাহকে) ডাকতে, বা তাঁর কাছে তা চাইতে?" লোকটি বলল: হ্যাঁ।
আমি বলতাম: 'হে আল্লাহ! আখিরাতে যে শাস্তি আপনি আমাকে দিতে চান, তা দুনিয়াতেই আমার জন্য দ্রুত দিয়ে দিন।'
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সুবহানাল্লাহ! তুমি তা সহ্য করতে পারবে না—অথবা তিনি বললেন: তা তুমি করতে সক্ষম হবে না—তুমি কি এই দু‘আ করলে না: 'হে আল্লাহ! আমাদেরকে দুনিয়াতে কল্যাণ দিন এবং আখিরাতেও কল্যাণ দিন, আর আমাদেরকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করুন'?"
বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জন্য আল্লাহর কাছে দু‘আ করলেন এবং আল্লাহ তাকে সুস্থতা দান করলেন।
3369 - عن ابن عباس قال: لما حُضِر رسول الله صلى الله عليه وسلم وفي البيت رجال، فيهم عمر بن الخطاب قال النبي صلى الله عليه وسلم:"هَلُمَّ أَكتبْ لكم كتابًا لا تضلوا بعده" فقال عمر: إن النبي صلى الله عليه وسلم قد غلب عليه الوجع، وعندكم القرآن، حسبنا كتابُ الله. فاختلف أهل البيت فاختصموا. منهم من يقول: قَرِّبوا يكتب لكم النبي صلى الله عليه وسلم كتابًا لن تضلوا بعده، ومنهم من يقول ما قال عمر. فلما أكثروا اللغو والاختلاف عند النبي صلى الله عليه وسلم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قوموا". وفي رواية:"قوموا عني، ولا ينبغي عندي التنازع"، قال عبيد الله: فكان ابن عباس يقول: إن الرزية كل الرزية ما حال بين رسول الله صلى الله عليه وسلم وبين أن يكتب لهم ذلك الكتاب من اختلافهم ولغطهم.
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5669)، ومسلم في الوصية (1637/ 22) كلاهما من حديث عبد الرزاق، عن معمر، عن الزهري، عن عبيد الله بن عتبة، عن ابن عباس فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর (মৃত্যুর) সময় উপস্থিত হলো এবং ঘরে কিছু লোক উপস্থিত ছিল, তাদের মধ্যে উমর ইবনুল খাত্তাবও ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা এসো, আমি তোমাদের জন্য এমন একটি লিখিত দলিল দিয়ে যাই, যার পরে তোমরা আর পথভ্রষ্ট হবে না।" তখন উমর বললেন, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর রোগের তীব্রতা বৃদ্ধি পেয়েছে। তোমাদের কাছে কুরআন আছে। আল্লাহর কিতাবই আমাদের জন্য যথেষ্ট। তখন ঘরের লোকেরা মতপার্থক্য করল এবং বিতর্ক শুরু করল। তাদের মধ্যে কেউ কেউ বলছিল: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কাছে আনো, তিনি তোমাদের জন্য এমন একটি কিতাব লিখে দেবেন, যার পরে তোমরা পথভ্রষ্ট হবে না।" আবার তাদের কেউ কেউ উমর যা বলেছিলেন তাই বলল। যখন তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গোলমাল ও মতপার্থক্য বাড়াতে লাগল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা উঠে যাও।" অন্য বর্ণনায় আছে: "তোমরা আমার কাছ থেকে উঠে যাও। আমার কাছে ঝগড়া করা উচিত নয়।" উবাইদুল্লাহ বলেন, ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: সবচেয়ে বড় দুর্ভাগ্য ছিল, তাদের এই মতপার্থক্য ও গোলমালের কারণে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য সেই লিখিত দলিলটি দিতে পারেননি।
3370 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على أم السائب، أو أم المسيب فقال:"ما لك يا أم السائب، أو يا أم المسيب! تزفزفين؟" قالت: الحُمَّى لا بارك الله فيها. فقال:"لا تَسُبِّي الحُمَّى، فإنها تُذهب خطايا بني آدم كما يُذهب الكيرُ خبَثَ الحديد".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2575) عن عبيد الله بن عمر القواريري، حدثنا يزيد بن زُريع، حدثنا الحجاج الصواف، حدثني أبو الزبير، حدثنا جابر بن عبد الله فذكره.
ورواه الحاكم (1/ 346) من وجه آخر عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم عاد امرأة من الأنصار فقال لها:"أهي أم ملدم؟" قالت: نعم، فلعنها الله. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُسبيها، فإنها تغسل ذنوب العبد كما يذهب الكير خبَثَ الحديد".
وقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه بهذا اللفظ، إنما أخرجه مسلم بغير هذا اللفظ من حديث حجاج بن أبي عثمان، عن أبي الزبير".
قلت: وهو كما قال. وحجاج بن أبي عثمان هو الحجاج الصواف كما مضي.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মুস্ সায়েব অথবা উম্মুল মুসাইয়্যিব-এর নিকট গেলেন। তিনি তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "হে উম্মুস্ সায়েব অথবা হে উম্মুল মুসাইয়্যিব! তোমার কী হলো? তুমি কাঁপছো কেন?" তিনি বললেন: জ্বর, আল্লাহ যেন তাতে বরকত না দেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জ্বরকে গালি দিও না। কারণ এটি বনী আদমের গুনাহসমূহ দূর করে দেয়, যেমন হাপর লোহার খাদ দূর করে দেয়।"
3371 - عن أم العلاء قالت: عادني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا مريضة فقال:"أبشري يا أمّ العلاء! فإن مرض المسلم يُذهب الله به خطاياه كما تُذهب النارُ خبث الذهب والفِضَّة".
صحيح: رواه أبو داود (3092) عن سهل بن بكار، عن أبي عوانة، عن عبد الملك بن عمير،
عن أم العلاء فذكرته.
وإسناده صحيح، رجاله ثقات رجال البخاري إلا أن المنذري قال في الترغيب:"حسن".
উম্মুল আলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অসুস্থ থাকাকালে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে এসেছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে উম্মুল আলা! সুসংবাদ গ্রহণ করো! কেননা মুসলিমের অসুস্থতার মাধ্যমে আল্লাহ তার গুনাহসমূহ দূর করে দেন, যেমন আগুন সোনা ও রূপার ময়লা দূর করে দেয়।"
3372 - عن فاطمة الخزاعية، وكانت قد أدركت عامة أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم عاد امرأة من الأنصار، وهي وجعة، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كيف تجدينك؟" فقالت: بخير يا رسول الله، وقد بَرَّحت بي أم ملدم -تريد الحُمَّي- فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اصبري، فإنها تُذهب من خبث الإنسان كما يُذْهب الكير من خبث الحديد".
صحيح: رواه عبد الرزاق (30306) ومن طريقه الطبراني في"الكبير" (24/ 405) عن معمر، عن الزهري، قال: حدثتني فاطمة الخزاعية، فذكرت الحديث.
قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 307):"رجاله رجال الصحيح".
وفاطمة الخزاعية ليست صحابية، ولكنها تروي عن الصحابة، وجهالة الصحابة لا تضر. وقول الهيثمي:"رجاله رجال الصحيح" ليس بصحيح، فإن فاطمة ليست من رواة الصحيح.
ফাতেমা আল-খুযাঈয়াহ থেকে বর্ণিত, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অধিকাংশ সাহাবীর সাক্ষাৎ পেয়েছিলেন, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের এক অসুস্থ মহিলাকে দেখতে গেলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কেমন অনুভব করছো?" তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি ভালো আছি, তবে উম্মে মিলদাম (তিনি জ্বরকে বুঝাতে চাইলেন) আমাকে কাবু করে ফেলেছে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "ধৈর্য ধারণ করো। কেননা এটি (জ্বর) মানুষের পাপ দূর করে দেয়, যেমন হাপর লোহার মরিচা দূর করে দেয়।"
3373 - عن عائشة أم المؤمنين أنها قالت: لما قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة، وُعِك أبو بكر وبلال. قالت: فدخلت عليهما فقلت: يا أبتِ! كيف تَجِدُك؟ ويا بلال! كيف تَجِدُك؟ قالت: فكان أبو بكر إذا أخذتْه الحُمَّى يقول:
كل امرئٍ مُصبَّحٌ في أهله … والموت أدنى من شِراك نعله
وكان بلال إذا أُقْلِع عنه يرفَعُ عَقيرتَه فيقول:
ألا ليتَ شِعري هل أبيتنَّ ليلةً … بوادٍ وحولي إذْخِرٌ وجَليلُ
وهل أَرِدَنْ يومًا مِياهَ مجِنَّةٍ … وهل يَبْدُوَنْ لي شامةٌ وطَفِيلُ
قالت عائشة: فجئت رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبرتُه فقال:"اللَّهم! حَبِّبْ إلينا المدينة كحبِّنا مكة أو أشدَّ وصَحِّحْها وبارِكْ لنا في صاعِها ومدَّها وانقُل حمَّاها فاجعلها بالجحفة".
متفق عليه: رواه مالك في كتاب الجامع (14) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
ورواه البخاري في المناقب (3926)، وفي كتاب المرضى (5654) من طريقين عن مالك به مثله.
ورواه مسلم في الحج (1376) من وجه آخر عن هشام بإسناده مختصرًا ولم يذكر ما يُنشد به أبو بكر وبلال.
وقوله:"يرفع عقيرتَه" أي يرفع صوته.
وقوله:"أقلع عنه" أي خَفَّت عنه وطأة الحُمَّى.
وقوله:"إذخر وجليل" من نباتات مكة.
وقوله:"مَجِنَّة" موضع على بعد أميال من مكة.
وقوله:"شَامةٌ وطَفِيلٌ" جبلان على مقربة من مكة.
আয়িশা উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মদীনায় আগমন করলেন, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জ্বরে আক্রান্ত হলেন।
তিনি (আয়িশা) বলেন: আমি তাঁদের উভয়ের নিকট প্রবেশ করলাম এবং বললাম: হে আমার পিতা! আপনি কেমন অনুভব করছেন? আর হে বিলাল! আপনি কেমন অনুভব করছেন?
তিনি বলেন: আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যখন জ্বর পেয়ে বসত, তখন তিনি এই কবিতা বলতেন:
"প্রত্যেক ব্যক্তিই তার পরিবারে সকালে উপনীত হয়,
অথচ মৃত্যু তার জুতার ফিতা থেকেও নিকটবর্তী।"
আর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যখন জ্বর কিছুটা কমতো (বা বিরতি দিত), তখন তিনি উচ্চস্বরে (দীর্ঘশ্বাস ফেলে) কণ্ঠস্বর তুলে বলতেন:
"আহ! আমি যদি জানতাম, কোনো রাতে কি আমি উপত্যকায় কাটাতে পারব?
যেখানে আমার চারপাশে ইযখির ও জলীল (মক্কার ঘাস) থাকবে?
আর কোনো দিন কি আমি মাজিন্নার ঝরনার পানি পান করতে পারব?
আর আমার সামনে কি শামা ও তাফীল (মক্কার নিকটবর্তী পর্বতদ্বয়) প্রকাশিত হবে?"
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে তাঁকে এ বিষয়ে জানালাম। তখন তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আমাদের কাছে মক্কাকে যেমন প্রিয় করেছ, মদীনাকে তার চেয়েও বেশি প্রিয় করে দাও অথবা তার মতো প্রিয় করে দাও। মদীনাকে স্বাস্থ্যকর করে দাও এবং এর 'সা' ও 'মুদ'-এর (পরিমাপ পাত্র) মধ্যে আমাদের জন্য বরকত দাও। আর এর জ্বরকে স্থানান্তর করে জুহ্ফা নামক স্থানে পাঠিয়ে দাও।"
3374 - عن أنس أن غلامًا ليهود كان يخدم النبي صلى الله عليه وسلم فمرض فأتاه النبي صلى الله عليه وسلم يعوده، فقال:"أسلم، أسلم" وفي رواية: فنظر إلى أبيه وهو عنده. فقال له: أطِع أبا القاسم صلى الله عليه وسلم. فأسلم، فخرج النبي وهو يقول:"الحمد لله الذي أنقذه من النار".
صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1356)، وفي المرضى (5657) عن سليمان بن حرب، حدثنا حماد بن زيد، عن ثابت، عن أنس فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ইহুদী বালক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর খেদমত করত। সে অসুস্থ হলে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে দেখতে গেলেন। তিনি বললেন, "ইসলাম গ্রহণ করো, ইসলাম গ্রহণ করো।" অন্য বর্ণনায় আছে: তখন সে তার বাবার দিকে তাকাল, যে তার কাছেই ছিল। তার বাবা তাকে বলল, "আবুল কাসেম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আনুগত্য করো।" অতঃপর সে ইসলাম গ্রহণ করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বেরিয়ে আসলেন এবং বললেন, "সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি তাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দিলেন।"
3375 - عن * *
৩৩৭৫ - থেকে
3376 - عن أبي سعيد الخدري قال: لما قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم كنا نؤذنه لمن حُضِرَ من موتانا، فيأتيه قبل أن يموتَ فيحضُرُه ويستغفرُ له، وينتظرُ مَوْتَهُ. قال: فكان ذلك ربما حَبَسهُ الحَبْسَ الطَّويل، فيشق عليه، قال: فقلنا: أرفقُ برسولِ الله أن لا نؤذنه بالميت حتى يموت، قال: فكُنَّا إذا ماتَ منا المَيتُ آذنَّاه به، فجاء في أهله، فاستغفر له، وصَلَّى عليه، ثم إن بدا له أن يَشْهَدَه، انتظر شهودَه، وإن بدا له أن ينصرفَ انصرف، قال: فكُنَّا على ذلك طبقةً أخرى قال: فقلنا: أرفقُ برسول الله صلى الله عليه وسلم أن نَحْمِلَ مَوتانا إلى بيته، ولا نُشْخِصُهُ ولا نُعَنِّيه، قال: ففعلْنا ذلك، فكان الأمر.
حسن: رواه الإمام أحمد (11628) عن يونس، حدثنا فليح، عن سعيد بن عبيد بن السباق، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
وصحَّحه ابن حبان (3006)، والحاكم (1/ 357) كلاهما من طريق فليح، قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في فليح بن سليمان أبي يحيى المدني وهو"صدوق كثير الخطأ" كما في التقريب، وقد تكلم فيه غير واحد من الأئمة، والخلاصة فيه كما قال ابن عدي: له أحاديث صالحة، وذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 324) وأخرج له الجماعة، ولذا قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 26):"رواه أحمد ورجاله ثقات".
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মদীনায়) আগমন করলেন, তখন আমরা আমাদের মুমূর্ষু ব্যক্তিদের বিষয়ে তাঁকে জানাতাম। তিনি তাদের মৃত্যুর পূর্বে আগমন করতেন, তাদের কাছে উপস্থিত হতেন, তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতেন এবং তার মৃত্যুর অপেক্ষা করতেন। তিনি বলেন: এটা কখনো কখনো তাঁকে দীর্ঘ সময় আটকে রাখত, যা তাঁর জন্য কষ্টকর হতো। তিনি বলেন: তখন আমরা বললাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সহানুভূতি দেখানোর জন্য এটাই উত্তম হবে যে, আমরা যেন মৃত হওয়ার আগে তাঁকে (মুমূর্ষু) সম্পর্কে না জানাই। তিনি বলেন: এরপর যখন আমাদের কেউ মারা যেত, তখন আমরা তাঁকে এ বিষয়ে জানাতাম। অতঃপর তিনি তাদের পরিবারের কাছে আসতেন, তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতেন এবং তার জানাযার সালাত আদায় করতেন। এরপর যদি তিনি (দাফনে) উপস্থিত থাকা জরুরি মনে করতেন, তবে তিনি উপস্থিতির জন্য অপেক্ষা করতেন। আর যদি তিনি চলে যাওয়া জরুরি মনে করতেন, তবে চলে যেতেন। তিনি বলেন: আমরা এই নীতির উপর আরও একটি ধাপে অগ্রসর হলাম। তিনি বলেন: আমরা বললাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সহানুভূতি দেখানোর জন্য এটাই উত্তম হবে যে, আমরা যেন আমাদের মৃতদের তাঁর বাড়ির দিকে বহন করে নিয়ে যাই, যাতে তাঁকে কষ্ট করে দূরে যেতে না হয় বা তাঁকে কষ্ট না দিতে হয়। তিনি বলেন: অতঃপর আমরা তাই করলাম এবং এটাই নিয়ম হয়ে গেল।
3377 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله:"لقِّنوا موتاكم: لا إله إلا الله".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (916) من طرق، عن عمارة بن غزية، حدثنا يحيى بن عمارة،
قال: سمعت أبا سعيد الخدري فذكر الحديث.
قوله:"لقنوا موتاكم" المراد من حضره الموت، لا من مات. والمقصود من هذا التلقين أن يكون آخر كلامه: لا إله إلا الله كما سيأتي في الباب الذي بعده. وكذلك قيل: إذا قال مرة فلا يعاد عليه إلا إن تكلم بكلام آخر.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মুমূর্ষু ব্যক্তিদের 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' শিক্ষা দাও।"
3378 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقنوا موتاكم لا إله إلا الله".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (917) من طرق، عن أبي خالد الأحمر، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
ورواه ابن حبان في صحيحه (3004) من وجه آخر، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقنوا موتاكم لا إله إلا الله، فإنه من كان آخر كلمته لا إله إلا الله عند الموت دخل الجنة يومًا من الدهر، وإن أصابه قبل ذلك ما أصابه" وإسناده صحيح. وقد رُوي عنه موقوفًا، والرفع أصح.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের মুমূর্ষু ব্যক্তিদেরকে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'-এর তালকীন দাও। কেননা যার শেষ কথা মৃত্যুকালে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ হবে, সে জীবনের কোনো না কোনো দিন জান্নাতে প্রবেশ করবে, যদিও তার পূর্বে তার উপর কোনো বিপদ আপতিত হয়।"
3379 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقنوا هَلْكاكم قول لا إله إلا الله".
صحيح: رواه النسائي (1827) عن إبراهيم بن يعقوب، قال: حدثني أحمد بن إسحاق، قال: حدثنا وُهيب، قال: حدثنا منصور بن صفية، عن أمه صفية بنت شيبة، عن عائشة فذكرتِ الحديث. وإسناده صحيح.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মুমূর্ষু (মৃত্যুপথযাত্রী) ব্যক্তিদেরকে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলার তালকীন দাও।"
3380 - عن عبد الله بن مسعود رفعه قال:"لقنوا موتاكم لا إله إلا الله، فإن نفس المؤمن تخرج رشحًا، ونفس الكافر تخرج من شدقه كما تخرج نفس الحمار".
حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (10/ 233) عن عبدان بن أحمد، ثنا سليمان بن أيوب صاحب البصري، ثنا حماد بن زيد، عن عاصم، عن أبي وائل، عن عبد الله فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم وهو ابن أبي النجود فإنه حسن الحديث. وقد حسنه أيضًا الهيثمي في"المجمع" (2/ 323).
ورواه ابن أبي شيبة (3/ 238) من وجه آخر عن شريك، عن عاصم، عن المسيب بن رافع، عن عبد الله موقوفًا عليه ولفظه:"لقنوا موتاكم لا إله إلا الله فإنها لا تكون آخر كلام امرئ مسلم إلا حرمه الله على النار" وشريك ضعيف، وما صحَّ لا يُعَلُّ به.
وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"لقنوا موتاكم شهادة أن لا إله إلا الله، فمن قالها عند موته وجبت له الجنة" قالوا: يا رسول الله! فمن قالها في صحة قال:"تلك أوجب وأوجب" ثم قال:"والذي نفسي بيده لو جيء بالسماوات والأرضين، ومن فيهن، وما بينهن، وما تحتهن فوُضعت في كفة الميزان، ووُضعت شهادة أن لا إله إلا الله في الكفة الأخرى لرجحت بهن".
رواه الطبراني في"الكبير" (13024) عن بكر بن سهل، ثنا عبد الله بن صالح، حدثني معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس فذكره.
وعلي بن أبي طلحة لم يسمع من ابن عباس.
قال أبو حاتم: علي بن أبي طلحة عن ابن عباس مرسل، إنما يروي عن مجاهد والقاسم بن محمد وراشد بن سعد ومحمد بن زيد وأورده الهيثمي في"المجمع" (4/ 323) وقال:"رجاله ثقات
إلا أن ابن أبي طلحة لم يسمع من ابن عباس".
وهذا بخلاف تفسيره منه فقد عرفت فيه الواسطة بينهما.
وفي معناه ما روي عن جابر مرفوعًا:"لقنوا موتاكم لا إله إلا الله" فإنه ضعيف. رواه البزار"كشف الأستار" (785) عن يوسف بن موسي، ثنا وكيع، ثنا عبد الوهاب بن مجاهد (بن جبر)، عن أبيه، عن جابر فذكره.
فيه عبد الوهاب بن مجاهد ضعيف.
قال ابن حبان في"المجروحين" (751):"وعبد الوهاب كان ممن يروي عن أبيه ولم يره، ويجيب في كل ما يُسأل، وإن لم يحفظه فاستحق الترك، كان الثوري يرميه بالكذب" انتهي.
وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 323) وقال: رواه البزار، وفيه عبد الوهاب بن مجاهد وهو ضعيف.
وكذلك لا يثبت ما روي عن عبد الله بن جعفر مرفوعًا:"لقِّنوا موتاكم: لا إله إلا الله الحليم الكريم، سبحان الله رب العرش العظيم، الحمد لله رب العالمين". قالوا: يا رسول الله! كيف للأحياء؟ قال:"أجود، وأجود".
فإن فيه إسحاق بن عبد الله بن جعفر، يروي عن أبيه، وإسحاق"مستور".
رواه ابن ماجه (1446) عن محمد بن بشار، قال: حدثنا أبو عامر، قال: حدثنا كثير بن زيد، عن إسحاق بن عبد الله بن جعفر بإسناده فذكره.
ورواه ابن أبي شيبة (3/ 238) موقوفًا على عبد الله بن جعفر.
وفي الباب أيضًا عن أبي بكر الصديق أنه دخل على النبي صلى الله عليه وسلم وهو كئيب، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"ما لي أراك كئيبًا!" قال: يا رسول الله! كنت عند ابن عمي البارحة، وهو يكيد بنفسه فقال:"هل لا لقَّنته لا إله إلا الله؟" قال: قد لقَّنتُه، قال:"فقالها؟" قال: نعم، قال:"وجبت له الجنة" قال أبو بكر: يا رسول الله! فكيف هي للأحياء؟ فقال:"هي أهدم لذنوبهم، هي أهدم لذنوبهم، هي أهدم لذنوبهم" رواه البزار"كشف الأستار" (786) من طريق زائدة بن أبي الرقاد، عن زياد النميري، عن أنس، عن أبي بكر؛ وزائدة بن أبي الرقاد وهو الباهلي يروي عن زياد النميري، روى عنه أهل البصرة، يروي المناكير عن المشاهير، لا يحتج به، ولا يكتب إلا للاعتبار،"المجروحين" (362).
قال الهيثمي:"رواه أبو يعلى والبزار، وفيه زائدة بن أبي الرقاد وثَّقَه القواريري، وضعَّفه البخاري وغيره".
وأما ما روي عن معقل بن يسار قال: قال رسول الله:"اقرؤا عند موتاكم" يعني سورة يس فهو ضعيف.
رواه أبو داود (3121) وابن ماجه (1448) وابن حبان (3002) والحاكم (1/ 565) وأحمد (20301) كلهم من حديث عبد الله بن المبارك، حدثنا سليمان التيمي، عن أبي عثمان -وليس
بالنهدي- عن أبيه، عن معقل بن يسار، فذكره. وأبو عثمان وأبوه مجهولان.
تقل أبو بكر ابن العربي عن الدارقطني أنه قال: هذا حديث ضعيف الإسناد، مجهول المتن، ولا يصح في الباب حديث، ذكره الحافظ في"التلخيص الحبير" (2/ 104).
وفي معناه أثر غضيف بن الحارث الثمالي إلا أنه غير مرفوع.
رواه أحمد (16969) عن أبي المغيرة، حدثنا صفوان، حدثني المشيخة أنهم حضروا غضيف ابن الحارث الثمالي حين اشتد سوقه، فقال: هل منكم أحد يقرأ يس؟ قال: فقرأها صالح بن شريح السكوني، فلما بلغ أربعين منها قبض، قال: وكان المشيخة يقولون: إذا قرئت عند الميت خفف عنه بها. قال صفوان: وقرأها عيسي بن المعمر عند ابن معبد.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (মারফূ’রূপে) বলেন: তোমরা তোমাদের মৃত্যুমুখী ব্যক্তিদেরকে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’-এর তালকীন (শিক্ষা) দাও। কারণ মুমিনের আত্মা ঘামের মতো সহজে বের হয়ে আসে। আর কাফিরের আত্মা তার চোয়াল থেকে এমনভাবে বের হয়, যেমন গাধার শ্বাস বের হয়।