হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3381)


3381 - عن أبي قتادة، أن النبي صلى الله عليه وسلم حين قدم المدينة سأل عن البراء بن معرور، فقالوا: توفي، وأوصى بثلثه لك يا رسول الله، أوصى أن يوجه إلى القبلة لما احتضر، فقال رسول الله:"أصاب الفطرة، وقد رددت ثلثه على ولده" ثم ذهب فصلى عليه فقال: اللهم اغفر له، وارحمه، وأدخله جنتك وقد فعلت".

حسن: رواه الحاكم (1/ 353) وعنه البيهقي (3/ 384) من طريق نعيم بن حماد، ثنا عبد العزيز ابن محمد الدراوردي، عن يحيى بن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه، عن أبي قتادة فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح، فقد احتج البخاري بنعيم بن حماد، واحتج مسلم بن الحجاج بالدراوردي، ولم يخرجا هذا الحديث، ولا أعلم في توجه المحتضر إلى القبلة غير هذا الحديث.

وقع في نسخة"المستدرك" للحاكم و"السنن الكبرى" للبيهقي: عن يحيى بن عبد الله، عن أبيه، وليس عندهما عن أبي قتادة.

لكن نقل الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 252) من طريق الحاكم مع الزيادة في الإسناد عن أبي قتادة".

وكذلك فعل الحافظ في التلخيص فقال:"رواه الحاكم والبيهقي عن أبي قتادة"، والنووي في"المجموع" (5/ 116 - 117) فقال:"رواه الحاكم والبيهقي من حديث أبي قتادة" وكذا في"الخلاصة" (3268).

فيظهر منه وقوع خطأ في نسخة المستدرك، ومن ثم سنن البيهقي.

قال البيهقي:"كان البراء بن معرور أول من استقبل القبلة حيًا وميتًا".

وروى يعقوب بن سفيان في تاريخه عن طريق ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب قال: قال كعب: كان البراء بن معرور أول من استقبل الكعبة حيًا، وعند حضرة وفاته قبل أن
يتوجهها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فأمره أن يستقبل بيت المقدس فأطاع، فلما كان

عند موته أمر أهله أن يوجهوه قبل الكعبة.

والبراء توفي قبل مقدم النبي في المدينة بشهر.




আবু কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনায় আগমন করলেন, তখন তিনি বারা ইবনু মা’রূর সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তারা বলল, তিনি ইন্তিকাল করেছেন এবং তাঁর সম্পদের এক-তৃতীয়াংশ আপনার জন্য ওসিয়ত করে গেছেন, হে আল্লাহর রাসূল! যখন তাঁর মুমূর্ষু অবস্থা এসেছিল, তখন তিনি ওসিয়ত করেছিলেন যেন তাঁকে কিবলার দিকে ফিরানো হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেন: "তিনি স্বভাবজাত ধর্মকে (ফিতরাত) গ্রহণ করেছেন। আমি তার এক-তৃতীয়াংশ তার সন্তানদের ফিরিয়ে দিলাম।" এরপর তিনি গেলেন এবং তার জানাযার সালাত আদায় করলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! তাকে ক্ষমা করে দিন, তার প্রতি দয়া করুন এবং তাকে আপনার জান্নাতে প্রবেশ করান—আপনি তা করে ফেলেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3382)


3382 - عن يحيى بن طلحة، عن أمه سُعدي المُريَّة قالت: مر عمر بطلحة بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: ما لك كئيبًا؟ أسَاءتْك إمرةُ ابن عمك؟ قال: لا، ولكن سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إني لأعلم كلمةً لا يقولُها أحد عند موته إلَّا كانت نورًا لصحيفته، وإن جسدَه ورُوحَه ليجدان لها رَوْحًا عند الموت فلم" أسأله حتى توفي. قال: أنا أعلمُها، هي التي أراد عمَّه عليها، ولو علم أن شيئًا أنْجي له منها لأمره.

صحيح: رواه ابن ماجه (3795) عن هارون بن إسحاق الهمداني، قال: حدّثنا محمد بن عبد الوهاب، عن مسعر، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي، عن يحيى بن طلحة فذكره.

وصحَّحه ابن حبَّان (205) ورواه من طريق هارون بن إسحاق إلَّا أنَّه اختلف على الشعبي وهو عامر، قال البوصيري في"مصباح الزجاجة": فقيل عنه هكذا، وقيل عنه عن ابن طلحة، عن أبيه، وقيل: عنه، عن يحيى بن طلحة، عن أبيه، وقيل: عنه، عن يحيى بن طلحة، عن أمه سُعدي، عن طلحة، وقيل: عنه عن طلحة مرسلًا، ورواه أبو بكر بن أبي شيبة في مسنده من طريق مجالد، عن الشعبي، عن جابر، عن طلحة" انتهي.

قلت: ما صحَّ منه لا يُعل بهذا الاختلاف، ومن الطرق الصحيحة ما رواه الإمام أحمد (1384)، وأبو يعلى (655)، والحاكم (1/ 350 - 351) كلهم من طرق، عن مطرف بن طريف الحارثي، عن الشعبي، عن يحيى بن طلحة بن عبيد الله، عن أبيه أن عمر رآه كئيبًا فذكره وفيه:

والكلمة هي:"لا إله إلَّا الله، فقال طلحة: هي والله هي.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

ويحيى بن طلحة بن عبيد الله ليس من رجال الشيخين، وإنَّما هو من رجال السنن إلا أنه ثقة.




তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর মা সু'দি আল-মুরিইয়াহ বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাতের পর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি এত বিষণ্ণ কেন? তোমার চাচাতো ভাইয়ের শাসন কি তোমাকে খারাপ লাগছে? তিনি (তালহা) বললেন: না, তবে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমি এমন একটি বাক্য জানি, মৃত্যুর সময় যেই ব্যক্তি তা উচ্চারণ করে, তা তার আমলনামার জন্য আলোস্বরূপ হয়ে যায় এবং মৃত্যুর সময় তার শরীর ও আত্মা এর কারণে স্বস্তি (রাউহ) লাভ করে।" কিন্তু তাঁর (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওফাত পর্যন্ত আমি তাঁকে (সেই বাক্যটি) জিজ্ঞেস করিনি। তিনি (উমার) বললেন: আমি সেটি জানি। এটি হলো সেই বাক্য, যার উপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চাচাকে রাজি করাতে চেয়েছিলেন। যদি তিনি জানতেন যে এর চেয়েও বেশি মুক্তিদায়ক অন্য কিছু আছে, তাহলে তিনি তাকে সেটার নির্দেশ দিতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3383)


3383 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل على رجل من بني النجار يعوده، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا خال؛ قل: لا إله إلا الله" فقال: أو خال أنا، أو عم؟ فقال النبي:"لا، بل خال" فقال له:"قل: لا إله إلا هو" قال: خير لي؟ قال:"نعم".

صحيح: رواه الإمام أحمد (12543، 12563، 13826) والبزار"كشف الأستار" (787)، وأبو يعلي (3512) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن أنس فذكره. وإسناده صحيح.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 325) وعزاه إلى أبي يعلى والبزار فقط، وفاته العزو إلى
أحمد. وقال:"رجاله رجال الصحيح". وصحَّحه أيضا الضياء في"المختارة" (1639).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু নাজ্জার গোত্রের এক ব্যক্তির কাছে তাকে দেখতে (রোগী দেখতে) প্রবেশ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "হে মামা, আপনি বলুন: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'।" লোকটি বললেন: আমি কি মামা, নাকি চাচা? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না, বরং মামা।" তিনি তাকে বললেন: "বলুন: 'লা ইলাহা ইল্লা হু' (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)।" লোকটি বললেন: এতে কি আমার জন্য কল্যাণ আছে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"









আল-জামি` আল-কামিল (3384)


3384 - عن صفوان بن عسال، قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم على غلام من اليهود وهو مريض فقال:"أتشهد أن لا إله إلا الله؟ قال: نعم، قال:"أتشهد أن محمدًا عبده ورسوله؟" قال: نعم، ثم قبض، فوليه رسول الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون فغسلوه ودفنوه.

حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (8/ 80) عن الحسين بن إسحاق التستري، ثنا المسبب بن واضح، ثنا أبو إسحاق الفزاري، عن ابن عجلان، عن عاصم بن بهدلة، عن زر بن حبيش، عن صفوان بن عسال فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن بهدلة فإنه حسن الحديث، وأما المسيب بن واضع فقد سبق أن تكلمت عليه بإسهاب في باب المسح على الخفين، والخلاصة فيه أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.

وقد حسن إسناده الهيثمي في"المجمع" (2/ 324 - 325) بعد أن عزاه للطبراني في"الكبير".




সাফওয়ান ইবনু আস্সাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একজন অসুস্থ ইয়াহুদী বালকের কাছে গেলেন এবং বললেন: "তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল?" সে বলল: "হ্যাঁ।" এরপর সে মারা গেল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং মুসলিমরা তার দায়িত্ব গ্রহণ করলেন, অতঃপর তাকে গোসল দিলেন এবং দাফন করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3385)


3385 - عن رجل من أصحاب النبي أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"من لُقِّن عند الموت لا إله إلا الله دخل الجنة".

صحيح: رواه الإمام أحمد (15894) عن حسن بن موسى، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، عن زاذان أبي عمر قال: حدثني من سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، وعطاء بن السائب ثقة، وثَّقه الأئمة إلا أنه اختلط في آخر عمره، لكن رواية حماد بن سلمة عنه كانت قبل اختلاطه، وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 322) وعزاه لأحمد وعلله بعطاء بن السائب ولم يفرق بين من روى عنه قبل الاختلاط ومن روى عنه بعد الاختلاط.

وزاذان أبو عمر الكندي البزار"صدوق" ويرسل إلا أنه صرَّح هنا بالسماع عمن سمع من النبي صلى الله عليه وسلم وجاء في بعض الروايات أن الصحابي هو: ابن عمر، والله تعالى أعلم.




নবীর একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "মৃত্যুকালে যাকে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' (কালেমা) শিক্ষা দেওয়া হয়, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3386)


3386 - عن معاذ بن جبل قال: قال رسول الله:"من كان آخر كلامه لا إله إلا الله دخل الجنة".

حسن: رواه أبو داود (3116) عن مالك بن عبد الواحد المِسْمَعِي، حدثنا الضحاك بن مخلد، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثني صالح بن أبي غَريب، عن كثير بن مرة، عن معاذ بن جبل فذكره. وصحَّحه الحاكم (1/ 351).

ورواه الإمام أحمد (22034) من وجه آخر عن عبد الحميد -يعني ابن جعفر- بإسناده.

وفيه: قال لنا معاذ في مرضه: قد سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم شيئًا كنت أَكتمكموه، سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من كان آخر كلامه لا إله إلا الله وجبت له الجنة".

وصالح بن أبي عريب روي عنه جماعة منهم الليث وحيوة بن شُريح وابن لهيعة وعبد الحميد بن
جعفر الأنصاري وغيرهم إلا أنه لم يرد فيه توثيق من أحد الأئمة غير ابن حبان، وبهذا ترتفع عنه جهالة العين، وتبقى جهالة الحال كما هو معروف ومقرر في علم الحديث.

ولذا قال ابن القطان فيه:"لا يعرف".

رُوي عنه أيضًا مرفوعًا:"ما من نفس تموت تشهد أن لا إله إلا الله، وأني رسول الله، يرجع ذلك إلى قلب مُوقِنٍ، إلا غفر الله لها" رواه ابن ماجه (3796) من حديث يونس، عن حُميد بن هلال، عن هِصَّانَ بن الكاهل، عن عبد الرحمن بن سمرة، عن معاذ بن جبل فذكره.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (21998)، والنسائي في"عمل اليوم والليلة" (1136)، وابن حبان في صحيحه (203).

ومداره على هِصَّان بن الكاهل، ويقال: الكاهن، روى عنه اثنان، ولم يوثقه غير ابن حبان فهو مجهول الحال عند جمهور المحدثين، وفي التقريب"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له المتابعة إلا في المعنى العام كما سبق وبهذا يرتقي الحديث إلى درجة"جيد الإسناد".

وفي الباب ما روي عن حذيفة قال: أسندتُ النبي صلى الله عليه وسلم إلى صدري فقال:"من قال: لا إله إلا الله ابتغاء وجه الله، خُتِم له بها، دخل الجنة، ومن صام يومًا ابتغاءَ وجهِ الله، خُتم له بها دخلَ الجنة، ومن تصدق بصدقةٍ ابتغاء وجهِ الله، خُتم له بها، دخلَ الجنة" إلا أنه منقطع.

رواه الإمام أحمد (23324) من طريق حماد بن سلمة، عن عثمان البَتِّي، عن نُعيم قال عفان في حديثه: ابن أبي هند - عن حذيفة فذكره.

ونعيم بن أبي هند لم يلق حذيفة. وهذا أصح ما رُوي به هذا الحديث.

وأخرجه البزار"كشف الأستار" (1038) من وجه آخر عن الحسن بن أبي جعفر، عن محمد بن جحادة، عن نعيم بن أبي هند، عن ربعي، عن حذيفة مختصرًا في ذكر الصوم فقط.

قال البزار:"لا نعلم رواه عن نُعيم إلا محمد، ولا عنه إلا الحسن".

قلت: وهو كما قال، فقد تفرد الحسن بن أبي جعفر بهذا الإسناد وهو ممن ضعَّفه جمهور أهل العلم منهم البخاري والنسائي وابن المديني والعجلي وأبو حاتم وغيرهم. وأطلق عليه الحافظ كلمة"ضعيف الحديث مع عبادته وفضله" إذا عرفت هذا فقول الهيثمي في"المجمع" (2/ 324):"رواه أحمد، وروى البزار طرفا منه في الصيام فقط، ورجاله موثقون"، دليل على تساهله، وكذلك قال أيضًا في"المجمع" (3/ 183):"رواه البزار، وهو مطول عند أحمد، وقد تقدم في تلقين الميت، ورجاله موثقون".




মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার শেষ কথা হবে ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3387)


3387 - عن بريدة بن الحصيب، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"المؤمن يموت بعَرقِ الجَبين".
صحيح: رواه الترمذي (982)، والنسائي (1828)، وابن ماجه (1452) كلهم من طريق يحيي ابن سعيد، عن المُثَنَّى بن سعيد، عن قتادة، عن ابن بريدة، عن أبيه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال فذكر الحديث. وإسناده صحيح.

وصحَّحه ابن حبان (3011)، والحاكم (1/ 361) وروياه من طريق يحيي بن سعيد بإسناده قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

ولكن قال الترمذي:"حديث حسن"، وقد قال بعض أهل العلم:"لا نعرف لقتادة سماعًا من عبد الله بن بريدة".

قلت: ولكنه توبع، فقد رواه النسائي من طريق كهمس، عن عبد الله بن بريدة به، وهو يقوي حديث قتادة.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মু'মিন কপালের ঘাম নিয়ে মৃত্যুবরণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3388)


3388 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المؤمن يموت بعرق الجبين".

حسن: رواه الطبراني في"الأوسط" (1530) والبزار في مسنده (1546) كلاهما من حديث إسحاق بن زياد الأبلي، حدثنا معلي بن راشد العمي، حدثنا يزيد بن زريع، عن يونس بن عبيد، عن أبي معشر زياد بن كليب، عن إبراهيم النخعي، عن علقمة بن قيس، عن ابن مسعود، فذكره.

وإسناده حسن من أجل إسحاق بن زياد الأبلي، فقد روى عنه حسن بن محمد بن أسد وقال: نعم الصالح، وذكره ابن حبان في الثقات (8/ 119) وقال الهيثمي في"المجمع" (2/ 352):"رجاله ثقات ورجال الصحيح".

وقوله:"عرق الجبين": قيل معناه كناية عن التشديد في الموت ليمحص ذنوبه، أو يرفع درجه، وقيل غير ذلك.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মুমিন ব্যক্তি কপালের ঘর্মসহ মৃত্যুবরণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3389)


3389 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل على شاب وهو في الموت فقال:"كيف تجدك؟" قال: والله يا رسول الله! إني أرجو الله، وإني أخاف ذنوبي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يجتمعان في قلب عبد في مثل هذا الموطن إلا أعطاه الله ما يرجو، وآمنه مما يخاف".

حسن: رواه الترمذي (983)، وابن ماجه (4261) كلاهما من طريق سيار بن حاتم، حدثنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس فذكره.

وإسناده حسن لأجل سيَّار بن حاتم، قال فيه الحافظ: صدوق له أوهام، إلا أنه توبع. رواه عبد بن حميد (1370) عن يحيى بن عبد الحميد، ثنا جعفر بن سليمان بإسناده فذكره. ويحيى بن عبد الحميد اليماني حافظ من رجال مسلم إلا أنه اتهم بسرقة الحديث ولكن لا بأس به عند المتابعة.

وأما قول الترمذي:"حسن غريب، وقد روى بعضهم هذا الحديث عن ثابت، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا" فلا يضر، لأن من رفعه عنده زيادة علم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক যুবকের কাছে গেলেন যখন সে মৃত্যুশয্যায় ছিল (বা মৃত্যুর সন্নিকটে ছিল)। অতঃপর তিনি বললেন: "তুমি কেমন অনুভব করছ?" সে বলল: আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি আল্লাহর রহমতের আশা রাখি, এবং আমি আমার গুনাহের ভয় করি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এইরকম পরিস্থিতিতে (মৃত্যুকালে) কোনো বান্দার অন্তরে এই দুটি জিনিস (আশা ও ভয়) একত্রিত হলে, আল্লাহ তাকে অবশ্যই তার প্রত্যাশিত জিনিস দান করেন এবং তাকে তার ভয়ের বিষয় থেকে নিরাপত্তা দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3390)


3390 - عن عائشة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل عليها، وعندها حميم لها يخنقُه الموت. فلما رأى النبي صلى الله عليه وسلم ما بها قال لها:"لا تَبْتَثِسي على حميمكِ فإن ذلك من حسناته".

حسن: رواه ابن ماجه (1451) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا الوليد بن مسلم، قال: حدثنا الأوزاعي، عن عطاء، عن عائشة فذكرته.

إسناده حسن لأجل هشام بن عمار شيخ ابن ماجه فإنه"صدوق مقرئ كبر فصار يتلقن، فحديثه القديم أصح، وقد سمع من معروف الخياط، لكن معروف ليس بثقة" هكذا في التقريب وقد وثَّقه ابن معين والعجلي. وقال النسائي: لا بأس به، وقال الدارقطني: صدوق، وذكره ابن حبان في الثقات.

قلت: فمثله يحسن حديثه. وأما الوليد بن مسلم فهو الدمشقي، مشهور متفق على توثيقه في نفسه، وإنما عابوا عليه كثرة التدليس والتسوية، فإذا صرَّح بسماعه من شيخه وهو الأوزاعي، وقد صرَّح به، وصرَّح شيخه من شيخه، فهذا مقبول عند الجميع. وأما إذا اكتفى بالتحديث عن شيخه، وشيخُ شيخه لم يصرح به فالجمهور على قبوله أيضًا ولذا قال البوصيري في"مصباح الزجاجة":"هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات -والوليد- وإن كان يُدلس، فقد صرَّح بالتحديث، فزالتْ تهمة تدليسه".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন। তখন তাঁর নিকট তাঁর একজন নিকটাত্মীয় ছিলেন, যার মৃত্যু যন্ত্রণা হচ্ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তার অবস্থা দেখলেন, তখন তিনি তাঁকে বললেন: "তোমার এই নিকটাত্মীয়ের জন্য (শোকে) হতাশ বা বিচলিত হয়ো না। কেননা, এটি তার নেক আমলের অন্তর্ভুক্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3391)


3391 - عن أبي هريرة قال:"إذا خرجتْ روح المؤمن تلقاه ملكان يُصْعِدانها".

قال حماد: فذكر من طيب ريحها، وذكر المسك وقال:"ويقول أهل السماء: روح طيبة جاءت من قبل الأرض، صلى الله عليك وعلى جسد كنتِ تعمرنيه، فينطلق به إلى ربه عز وجل. ثم يقول: انطلقوا به إلى آخر الأجل".

قال:"وإن الكافر إذا خرجتْ روحُه -قال حماد: وذكر من نَتْنِها وذكر لعنًا- ويقول أهل السماء: روح خبيثة جاءت من قبل الأرض قال: فيقال: انطلقوا إلى آخر الأجل". قال أبو هريرة: فرد رسول الله صلى الله عليه وسلم رَيْطَةً كانت عليه على أنفه هكذا.

وفي رواية عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المَيِّتُ تحضُرُه الملائكة، فإذا كان الرجل صالحًا، قالوا: اخرجي أيتها النفس الطيبة! كانت في الجسد الطيب اخرجي حميدة، وأبشري بروحٍ وريحان وربٍّ غير غضبان، فلا يزال يقال لها ذلك، حتى تخرج، ثم يعرجُ بها إلى السماء، فيفتح لها، فيقال: مَنْ هذا؟ فيقولون: فلان، فيقال: مرحبًا بالنفس الطيبة، كانت في الجسد الطيب، ادْخُلي حميدةً، وأبشري بروح وريحان ورب غير غضبان، فلا يزال يقال لها ذلك حتى يُنْتَهى بها إلى السماء التي فيها الله عز وجل، وإذا كان الرجل السوء قال: اخرجي أيتها النفس
الخبيثة! كانت في الجسد الخبيث، اخرجي ذميمة، وأبشري بحميم وغسّاق، وآخر من شكله أزواج، فلا يزال يقال لها ذلك حتى تخرج، ثم يعرجُ بها إلى السماء، فلا يفتح لها، فيقال: مَنْ هذا؟ فيقال: فلان، فيقال: لا مرحبا بالنفس الخبيثة، كانت في الجسد الخبيث، ارجعي ذميمة، فإنها لا تُفتح لك أبواب السماء، فَيُرْسَلُ بها من السماء، ثم تَصِيرُ إلى القبر".

صحيح: الرواية الأولى أخرجها مسلم في الجنة (2872) عن عبيد الله بن عمر القواريري، حدثنا حماد بن زيد، حدثنا بُديل، عن عبد الله بن شقيق، عن أبي هريرة موقوفًا عليه.

وحكمه المرفوع لأنه مثله لا يقال بالرأي، ولذا أخرجه مسلم في صحيحه، وهو الذي جاء في الرواية الثانية مرفوعًا، رواها ابن ماجه (4262) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا شبابة، عن ابن أبي ذئب، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن سعيد بن يسار، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه الإمام أحمد (8769) من وجه آخر عن ابن أبي ذئب به مثله.

ورواه النسائي (1833) من حديث معاذ بن هشام، قال: حدثني أبي، عن قتادة، عن قُسامة بن زهير، عن أبي هريرة مرفوعًا ولفظه:

قال: إذا حُضِر المؤمن أتتْه ملائكة الرحمة بحريرة بيضاء فيقولون: اخرجي راضية مرضيًا عنك إلى روح الله وريحان ورَب غير غضبان فتخرج كأطيب ريح المسك حتى أنه ليُناوِلُهُ بعضُهم بعضًا حتى يأتون به بابَ السماء فيقولون: ما أطيب هذه الريح التي جاءتْكم من الأرض فيأتون به أرواح المؤمنين فلهم أشدُّ فرحًا به من أحدكم بغائبه يقدم عليه فيسألونه ماذا فعل فلانٌ؟ ماذا فعل فلان؟ فيقولون: دعوهُ فإنه كان في غم الدنيا، فإذا قال: أما أتاكم قالوا: ذُهِبَ به إلى أمِّه الهاوية، وإن الكافر إذا احتُضِر أتَتْه ملائكة العذاب بمسح فيقولون: اخْرُجي ساخطةً مسخوطًا عليك إلى عذاب الله عز وجل، فتخرج كأَنتن ريح جيفَة حتى يأتون به باب الأرض فيقولون: ما أنتن هذه الريح حتَّى يأتونَ به أرواحَ الكُفَّار.

وصحَّحه ابن حبان (3014)، والحاكم (1/ 352 - 353) كلاهما من طريق معاذ بن هشام به مثله، وللحاكم أسانيد أخرى وقال في آخرها:"هذه الأسانيد كلها صحيحة" وقال الذهبي:"والكل صحيح".

قوله في حديث مسلم:"انطلقوا به إلى آخر الأجل" أي إلى سدرة المنتهى وذلك بالنسبة لأرواح المؤمنين.

وقوله مرة ثانية:"انطلقوا به إلى آخر الأجل" أي إلى السجين بالنسبة لأرواح الكفار.

وقوله:"رَيْطَة" الريط ثوب رقيق. وكان سبب ردها على الأنف ما ذكر من نتن ريح روح الكافر.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন মুমিন ব্যক্তির রূহ বের হয়, তখন দুজন ফেরেশতা তাকে গ্রহণ করে এবং তারা সেটাকে উপরে আরোহণ করায়। হাম্মাদ (রাহ.) বলেন: তিনি এর সুগন্ধি উল্লেখ করেন এবং কস্তুরীর কথা উল্লেখ করে বলেন: আসমানবাসীগণ বলে, পবিত্র রূহ! যা জমিন থেকে এসেছে। তোমার উপর আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক এবং তুমি যে দেহের মধ্যে বসবাস করতে তার উপরও (আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক)। অতঃপর সেটাকে নিয়ে তার রবের কাছে যাওয়া হয়। এরপর আল্লাহ বলেন: একে শেষ সময় পর্যন্ত নিয়ে যাও। তিনি (আবূ হুরায়রা) বলেন: আর যখন কাফিরের রূহ বের হয়— হাম্মাদ (রাহ.) বলেন: তিনি এর দুর্গন্ধ উল্লেখ করেন এবং অভিশাপের কথা উল্লেখ করেন— তখন আসমানবাসীগণ বলে: এ অপবিত্র রূহ! যা জমিন থেকে এসেছে। তখন বলা হয়: একে শেষ সময় পর্যন্ত নিয়ে যাও। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এ সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিহিত চাদরটি এভাবে তাঁর নাকের ওপর চেপে ধরেন (অর্থাৎ অপবিত্র রূহের দুর্গন্ধের কারণে)।

অপর এক বর্ণনায় আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: যখন মৃত ব্যক্তির কাছে ফেরেশতাগণ উপস্থিত হন, আর যদি লোকটি নেককার হয়, তখন তারা বলেন: হে পবিত্র নফস (আত্মা)! যা পবিত্র দেহের মধ্যে ছিল, বেরিয়ে এসো প্রশংসিত হয়ে, আর সুসংবাদ গ্রহণ করো আল্লাহর আরামদায়ক পরিবেশ, উত্তম প্রতিদান ও অসন্তুষ্ট নন এমন রবের পক্ষ থেকে। তার রূহ বেরিয়ে না আসা পর্যন্ত তাকে এভাবে বলা হতে থাকে। এরপর সেটাকে নিয়ে আসমানের দিকে আরোহণ করা হয়। সেটার জন্য আসমানের দরজা খোলা হয় এবং বলা হয়: এ কে? তারা বলেন: অমুক। তখন বলা হয়: এই পবিত্র আত্মাকে স্বাগতম! যা পবিত্র দেহের মধ্যে ছিল। প্রশংসিত হয়ে প্রবেশ করো এবং সুসংবাদ গ্রহণ করো আল্লাহর আরামদায়ক পরিবেশ, উত্তম প্রতিদান ও অসন্তুষ্ট নন এমন রবের পক্ষ থেকে। সে আসমান পর্যন্ত না পৌঁছা পর্যন্ত তাকে এভাবেই বলা হতে থাকে, যে আসমানে আল্লাহ্ তা‘আলা অবস্থান করেন। আর যদি লোকটি অসৎ হয়, তখন তারা বলেন: হে অপবিত্র নফস! যা অপবিত্র দেহের মধ্যে ছিল, বেরিয়ে এসো নিন্দিত অবস্থায়, আর সুসংবাদ গ্রহণ করো উত্তপ্ত পানি, পূঁজ ও রক্ত এবং অনুরূপ ধরনের অন্যান্য শাস্তির। তার রূহ বের না হওয়া পর্যন্ত তাকে এভাবে বলা হতে থাকে। এরপর সেটাকে নিয়ে আসমানের দিকে আরোহণ করা হয়, কিন্তু তার জন্য আসমানের দরজা খোলা হয় না। তখন জিজ্ঞেস করা হয়: এ কে? তারা বলেন: অমুক। তখন বলা হয়: এই অপবিত্র আত্মাকে স্বাগতম নয়! যা অপবিত্র দেহের মধ্যে ছিল। নিন্দিত অবস্থায় ফিরে যাও, কেননা তোমার জন্য আসমানের দরজা খোলা হবে না। তখন সেটাকে আসমান থেকে নিক্ষেপ করা হয়, অতঃপর সেটা কবরে ফিরে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (3392)


3392 - عن أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أحب لقاء الله أحب الله لقاءَه، ومن
كره لقاء الله كره الله لقاءَه".

متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6508)، ومسلم في الذكر والدعاء (2686) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن بُريد، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره ولفظها سواء.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর সাক্ষাৎ ভালোবাসে, আল্লাহও তার সাক্ষাৎ ভালোবাসেন। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর সাক্ষাৎ অপছন্দ করে, আল্লাহও তার সাক্ষাৎ অপছন্দ করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3393)


3393 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"قال الله تبارك وتعالى إذا أحب عبدي لقائي، أحببتُ لقاءَه، وإذا كره لقائي كرهت لقاءَه".

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (50) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البخاري في التوحيد (7504) عن إسماعيل (وهو ابن أبي أويس) قال: حدثني مالك فذكره.

ورواه مسلم في الذكر والدعاء (2685) من وجه آخر عن شريح بن هانئ، عن أبي هريرة فذكره.

قال: فأتيت عائشة فقلت: يا أم المؤمنين سمعت أبا هريرة يذكر عن رسول الله صلى الله عليه وسلم حديثًا، إن كان كذلك فقد هلكنا. فقالت: إن الهالك من هلك بقول رسول الله صلى الله عليه وسلم، وما ذاك؟ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أحب لقاء الله أحب الله لقاءَه، ومن كره لقاء الله كره الله لقاءه" وليس منا أحد إلا وهو يكره الموت. فقالت: قد قاله رسول الله صلى الله عليه وسلم وليس بالذي تذهب إليه، ولكن إذا شخص البصرُ، وحَشْرَج الصدر، واقشعرَّ الجلد، وتشنَّجتِ الأصابع، فعند ذلك من أحب لقاء الله أحب الله لقاءه، ومن كره لقاء الله كره الله لقاءه. انتهى.

قولها:"حشرج الصدر": هي تردد النفّس في الصدر.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা বলেছেন: যখন আমার বান্দা আমার সাক্ষাৎ পছন্দ করে, আমি তার সাথে সাক্ষাৎ করা পছন্দ করি। আর যখন সে আমার সাক্ষাৎ অপছন্দ করে, আমি তার সাথে সাক্ষাৎ করা অপছন্দ করি।"

(অন্য এক বর্ণনায়) শুরাইহ ইবনু হানি' বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বললাম: হে উম্মুল মু'মিনীন! আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে একটি হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি। যদি তা সেরকম হয়, তাহলে তো আমরা ধ্বংস হয়ে গেলাম। তিনি (আয়িশা) বললেন: যে ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথায় ধ্বংস হয়, সে ধ্বংসপ্রাপ্ত। আর তা কী? সে বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ পছন্দ করে, আল্লাহও তার সাথে সাক্ষাৎ পছন্দ করেন। আর যে আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ অপছন্দ করে, আল্লাহও তার সাথে সাক্ষাৎ অপছন্দ করেন।" অথচ আমাদের মধ্যে এমন কেউ নেই যে মৃত্যুকে অপছন্দ করে না। তিনি (আয়িশা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবশ্যই তা বলেছেন। কিন্তু এর অর্থ তুমি যা মনে করছ, তা নয়। বরং যখন চোখ স্থির হয়ে যায়, বুক ঘড়ঘড় করে, চামড়া শিহরিত হয় এবং আঙ্গুলগুলো সংকুচিত হয়ে যায় (অর্থাৎ মৃত্যুর সময় আসন্ন হয়), তখন যে আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ পছন্দ করে, আল্লাহও তার সাথে সাক্ষাৎ পছন্দ করেন; আর যে আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ অপছন্দ করে, আল্লাহও তার সাথে সাক্ষাৎ অপছন্দ করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3394)


3394 - عن عبادة بن الصامت، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أحب لقاء الله أحب الله لقاءَه، ومن كره لقاءَ الله كره الله لقاءَه" قالت عائشة، أو بعض أزواجه: إنا لنكره الموتَ. قال:"ليس ذاكِ، ولكن المؤمن إذا حضره الموتُ بُشِّر برضوان الله وكرامته، فليس شيء أَحبَّ إليه مما أمامَه، فأحبَّ لقاءَ الله، وأحبَّ الله لقاءَه، وإن الكافر إذا حُضر بُشِّر بعذاب الله وعقوبته، فليس شيء أكرهَ إليه مما أمامه، كره لقاءَ الله فكره الله لقاءَه".

قال البخاري: اختصره أبو داود وعمرو، عن شعبة.

وقال سعيد، عن قتادة، عن زرارة، عن سعد، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6507) عن حجاج، حدثنا همَّام، حدثنا قتادة، عن أنس، عن عبادة بن الصامت فذكره.

ورواه مسلم في الذكر والدعاء (2683) عن هدَّاب بن خالد، عن همام بإسناده، فاقتصر على أصل الحديث وهو قوله صلى الله عليه وسلم:"من أحب لقاءَ الله أحب الله لقاءَه، ومن كره لقاءَ الله كره الله لقاءَه".
وحديث عائشة الذي ذكره البخاري معلقًا هو الآتي.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ করা পছন্দ করে, আল্লাহও তার সাথে সাক্ষাৎ করা পছন্দ করেন। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ করা অপছন্দ করে, আল্লাহও তার সাথে সাক্ষাৎ করা অপছন্দ করেন।” (এ কথা শুনে) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অথবা তাঁর অন্য কোনো স্ত্রী বললেন: আমরা তো মৃত্যুকে অপছন্দ করি। তিনি বললেন: “বিষয়টি এমন নয়। বরং মু’মিন ব্যক্তি যখন মৃত্যুশয্যায় উপস্থিত হয়, তখন তাকে আল্লাহর সন্তুষ্টি ও তাঁর সম্মান সম্পর্কে সুসংবাদ দেওয়া হয়। ফলে তার সামনে যা রয়েছে, তার চেয়ে প্রিয় আর কোনো কিছুই তার কাছে থাকে না। তখন সে আল্লাহর সাক্ষাৎকে পছন্দ করে এবং আল্লাহও তার সাক্ষাৎকে পছন্দ করেন। পক্ষান্তরে, কাফির ব্যক্তি যখন মৃত্যুশয্যায় উপস্থিত হয়, তখন তাকে আল্লাহর শাস্তি ও কঠোরতা সম্পর্কে সুসংবাদ দেওয়া হয়। ফলে তার সামনে যা রয়েছে, তার চেয়ে অপ্রিয় আর কোনো কিছুই তার কাছে থাকে না। তখন সে আল্লাহর সাক্ষাৎকে অপছন্দ করে এবং আল্লাহও তার সাক্ষাৎকে অপছন্দ করেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (3395)


3395 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أحب لقاءَ الله أحب الله لقاءَه، ومن كره لقاءَ الله كره الله لقاءَه" فقلت: يا نبي الله! أكراهيةُ الموت؟ فكلنا نكره الموتَ. فقال:"ليس كذلك، ولكن المؤمن إذا بُشِّر برحمة الله ورضوانه، وجنته أحب لقاءَ الله، فأحب الله لقاءَه، وإن الكافر إذا بُشِّر بعذاب الله وسَخَطِه كره لقاءَ الله، وكره الله لقاءَه".

صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2684) عن محمد بن عبد الله الرُّزِّي، حدثنا خالد بن الحارث الهُجَيمي، حدثنا سعيد، عن قتادة، عن زرارة، عن سعد بن هشام، عن عائشة فذكرته.

ورواه البخاري تعليقًا كما مضى، ووصله مسلم، فمن عزاء إلى البخاري فقد وهم، وسعيد هو ابن أبي عروبة.

وبمعناه روي عن رجل سَمِعَ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم يَقُولُ:"مَنْ أَحَبَّ لِقَاءِ اللهِ أَحَبَّ اللهُ لِقَاءَهُ، وَمَنْ كَرِهَ لِقَاءَ اللهِ كَرِهَ اللهُ لِقَاءَهُ" قَالَ: فَأَكَبَّ الْقَوْمُ يَبْكُونَ، فَقَالَ:"مَا يُبْكِيكُمْ؟" فَقَالُوا: إِنَّا نَكْرَهُ الْمَوْتَ. قَالَ:"لَيْسَ ذَلِكَ، وَلَكِنَّهُ إِذَا حُضِرَ: {فَأَمَّا إِنْ كَانَ مِنَ الْمُقَرَّبِينَ (88) فَرَوْحٌ وَرَيْحَانٌ وَجَنَّتُ نَعِيمٍ} [الواقعة: - 88 - 89) فَإِذَا بُشِّرَ بِذَلِكَ أَحَبَّ لِقَاءَ اللهِ، وَاللهُ لِلِقَائِهِ أَحَبُّ، {وَأَمَّا إِنْ كَانَ مِنَ الْمُكَذِّبِينَ الضَّالِّينَ (92) فَنُزُلٌ مِنْ حَمِيمٍ} [الواقعة: 92 - 93] قَالَ عَطَاءٌ: وَفِي قِرَاءَةِ ابْنِ مَسْعُودٍ ثُمَّ تَصْلِيَةُ جَحِيمٍ فَإِذَا بُشِّرَ بِذَلِكَ يَكْرَهُ لِقَاءَ اللهِ، وَاللهُ لِلِقَائِهِ أَكْرَهُ".

رواه أحمد (18283) عن عفان، حدثنا همام، حدثنا عطاء بن السائب قال: كان أول يوم عرفت فيه عبد الرحمن بن أبي ليلى، رأيت شيخا أبيض الرأس واللحية على حمار، وهو يتبع جنازة، فسمعته يقول: حدثني فلان بن فلان، سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول، فذكره.

وهمام هو ابن يحيى العوذي البصري لم ينص أحد من النقاد أنه سمع من عطاء قبل الاختلاط، وقد نصوا على من سمع منهم قبل الاختلاط وهم: شعبة والثوري وحماد بن زيد وحماد بن سلمة فقط بل قالوا: وفي حديث البصريين الذين يحدثون عنه تخاليط كثيرة لأنه قدم عليهم في آخر عمره، وهمام من البصرين.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে আল্লাহর সাথে সাক্ষাতকে ভালোবাসে, আল্লাহও তার সাথে সাক্ষাতকে ভালোবাসেন। আর যে আল্লাহর সাথে সাক্ষাতকে অপছন্দ করে, আল্লাহও তার সাথে সাক্ষাতকে অপছন্দ করেন।" তখন আমি বললাম: হে আল্লাহর নবী! (এর দ্বারা) কি মৃত্যুকে অপছন্দ করা বোঝায়? কেননা, আমরা সবাই তো মৃত্যুকে অপছন্দ করি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বিষয়টি এমন নয়। বরং মুমিন ব্যক্তিকে যখন আল্লাহর রহমত, তাঁর সন্তুষ্টি এবং তাঁর জান্নাতের সুসংবাদ দেওয়া হয়, তখন সে আল্লাহর সাথে সাক্ষাতকে ভালোবাসে। ফলে আল্লাহও তার সাক্ষাতকে ভালোবাসেন। আর কাফিরকে যখন আল্লাহর আযাব ও তাঁর ক্রোধের সুসংবাদ দেওয়া হয়, তখন সে আল্লাহর সাথে সাক্ষাতকে অপছন্দ করে। ফলে আল্লাহও তার সাক্ষাতকে অপছন্দ করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3396)


3396 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أحب لقاءَ الله أحب الله لقاءَه، ومن كره لقاءَ الله كره الله لقاءَه".

قلنا: يا رسول الله! كلنا نكره الموت، قال:"ليس ذاك كراهية الموت، ولكن المؤمن إذا حُضر، جاءه البشيرُ من الله بما هو صائر إليه، فليس شيء أحبَّ إليه من أن يكون قد لقي الله، فأحب الله لقاءَه، وإن الفاجر -أو الكافر- إذا حُضر جاءه بما
هو صائر إليه من الشرِّ -أو ما يلْقَى من الشَرِّ- فكره لقاءَ الله وكره الله لقاءَه".

صحيح: رواه أحمد (12047) عن ابن أبي عدي، عن حميد، عن أنس فذكره.

ورواه أبو يعلى (3877) والبزار"كشف الأستار" (780) كلاهما من طريق حميد، عن أنس فذكره واللفظ لأحمد، ورواية البزار مختصرة.

أورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 320) وقال:"رواه أحمد وأبو يعلى والبزار، ورجال أحمد رجال الصحيح".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর সাক্ষাৎ পছন্দ করে, আল্লাহও তার সাক্ষাৎ পছন্দ করেন। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর সাক্ষাৎ অপছন্দ করে, আল্লাহও তার সাক্ষাৎ অপছন্দ করেন।" আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমরা তো সবাই মৃত্যুকে অপছন্দ করি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওটা (সাধারণ) মৃত্যু অপছন্দ করা নয়। কিন্তু মুমিন যখন (মৃত্যুর) সম্মুখীন হয়, তখন তার কাছে আল্লাহর পক্ষ থেকে এমন সুসংবাদ আসে, যা তাকে (জান্নাতের দিকে) নিয়ে যাবে। ফলে আল্লাহর সাক্ষাতের চেয়ে তার কাছে প্রিয় আর কিছুই থাকে না, তখন আল্লাহও তার সাক্ষাৎ পছন্দ করেন। আর পাপাচারী—অথবা কাফির—যখন (মৃত্যুর) সম্মুখীন হয়, তখন তার কাছে এমন কিছু আসে যা তাকে অমঙ্গলের দিকে নিয়ে যাবে—অথবা যা সে মন্দ পরিণতি ভোগ করবে—তখন সে আল্লাহর সাক্ষাৎ অপছন্দ করে, আর আল্লাহও তার সাক্ষাৎ অপছন্দ করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3397)


3397 - عن فَضالة بن عبيد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم من آمن بك، وشهد أني رسولك، فحَبِّبْ إليه لقاءَك، وسَهِّل عليه قضاءك، وأقلل له من الدنيا، ومن لم يؤمن بك، ويشهد أني رسولك فلا تُحبِّبْ إليه لقاءَك، ولا تُسَهِّل عليه قضاءَك، وأكثر له من الدنيا".

صحيح: رواه الطبراني في"الكبير" (18/ 313) عن يحيى بن عثمان بن صالح، ثنا أصبغ بن الفرح، ثنا عبد الله بن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، عن أبي هانئ، عن عمرو بن مالك، عن فَضالة بن عبيد فذكره.

وصحَّحه ابن حبان (208) ورواه من وجه آخر عن عبد الله بن وهب به مثله.

وقال الهيثمي في"المجمع" (10/ 286):"ورجاله ثقات".

وأما ما رُوي عن معاذ بن جبل مرفوعًا:"إن شئتُم أنبأتكم ما أول ما يقول الله للمؤمنين يوم القيامة، وما أول ما يقولون له؟" قلنا: نعم يا رسول الله. قال:"إن الله يقول للمؤمنين: هل أُحْببتُم لقائي؟ فيقولون: نعم يا ربنا، فيقول: لِم؟ فيقولون: رجونا عفوك، ومغفرتك، فيقول: قد وجبت لكم مغفرتي" فهو ضعيف.

رواه الإمام أحمد (22072)، والطبراني في"الكبير" (20/ 251) كلاهما من طريق عبد الله بن المبارك، وهو في زهده (276) عن يحيى بن أيوب، عن عبيد الله بن زَحْر، حدثه عن خالد بن أبي عمران، عن أبي عياش، قال: قال معاذ فذكره.

وعبيد الله بن زَحْر ضعيف، وأبو عياش لم يسمع من معاذ، ورواه أيضًا الطبراني في"الكبير" (20/ 1841) من وجه آخر عن خالد بن معدان، عن معاذ، وخالد لم يسمع من معاذ أيضًا.

وكذلك ما رُوي عن معاوية أمير المؤمنين أنه كان يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من أحب لقاءَ الله أحب الله لقاءَه، ومن كره لقاءَ الله كره الله لقاءَه" فهو ضعيف أيضًا.

رواه الطبراني في"الكبير" (19/ 391) من طريق إسحاق بن إبراهيم (ابن العلاء بن زبريق) ثنا عمرو بن الحارث، ثنا عبد الله بن سالم، ثنا نُمير بن أوس، عن الزبيدي، أن معاوية ذكره مثله.
وإسحاق بن إبراهيم بن العلاء بن زبريق قال فيه النسائي: ليس بثقة، وأطلق عليه محمد بن عوف أنه يكذب. وشيخه عمرو بن الحارث قال فيه الذهبي: لا تُعرف عدالته.

ومع هذا كله قال فيه الهيثمي في"المجمع" (2/ 321):"رواه الطبراني في"الكبير" وإسناده حسن".




ফাযালা ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হে আল্লাহ! যে ব্যক্তি তোমার প্রতি ঈমান আনে এবং সাক্ষ্য দেয় যে আমি তোমার রাসূল, তার জন্য তোমার সাথে সাক্ষাৎকে প্রিয় করে দাও, তার জন্য তোমার ফয়সালা সহজ করে দাও এবং তার জন্য দুনিয়ার (ভোগ) কমিয়ে দাও। আর যে ব্যক্তি তোমার প্রতি ঈমান আনে না এবং সাক্ষ্য দেয় না যে আমি তোমার রাসূল, তার জন্য তোমার সাক্ষাৎকে প্রিয় করো না, তার জন্য তোমার ফয়সালা সহজ করো না এবং তার জন্য দুনিয়ার (ভোগ) বাড়িয়ে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (3398)


3398 - عن محمود بن لبيد أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اثنتان يكرههما ابن آدم: الموت، والموتُ خير للمؤمن من الفتنة، ويكره قلة المال، وقلةُ المال أقلُّ للحساب".

حسن: رواه الإمام أحمد (23625) عن أبي سلمة، أخبرنا عبد العزيز -يعني ابن محمد- عن عمرو (وهو ابن أبي عمرو) عن عاصم بن عمر بن قتادة، عن محمود بن لبيد فذكره. ورواه أيضًا (23626) عن سليمان بن داود، أخبرنا إسماعيل (وهو ابن جعفر) أخبرني عمرو بن أبي عمرو بإسناده مثله.

وأخرجه البغوي في"شرح السنة" (4066) من وجه آخر عن عمرو بن أبي عمرو بإسناده.

وإسناده حسن من أجل عبد العزيز بن محمد وهو الدراوردي فإنه صدوق، ومن أجل شيخه عمرو بن أبي عمرو وهو مختلف فيه فضعَّفه ابن معين والنسائي ومشَّاه غيرهما، والخلاصة فيه أن حديثه حسن كما قال الذهبي.

وأورده المنذري في"الترغيب والترهيب" (4813) وعزاه إلى أحمد وقال:"رواه أحمد بإسنادين رواة أحدهما محتج بهم في الصحيح، ومحمود له رؤية، ولم يصح له سماع فيما أرى".

قلت: يعتبر حديثه مرسل الصّحابي، وهو حجّة عند الجمهور.

وذكره الهيثمي في"المجمع" (2/ 321) وقال:"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".




মাহমুদ ইবনে লাবিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “দুটি জিনিস আদম সন্তান অপছন্দ করে: মৃত্যু। অথচ মৃত্যু মুমিনের জন্য ফিতনা (বিপদ বা পরীক্ষা) থেকে উত্তম। আর সে সম্পদের স্বল্পতা অপছন্দ করে, অথচ সম্পদের স্বল্পতা হিসাবের জন্য (দায়িত্ব) কম।”









আল-জামি` আল-কামিল (3399)


3399 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الدنيا سجن المؤمن، وجنة الكافر".

صحيح: رواه مسلم في الزهد والرقائق (2956) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا عبد العزيز (يعني الدراوردي) عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وقوله:"الدنيا سجن المؤمن" أي أن المؤمن يكون مسجونًا في الدنيا، أي ممنوع من الشهوات المحرمة والمكروهة. فإذا مات استراح من هذا السجن، وانقلب ما أعد الله له من النعيم الدائم، والراحة الخالصة، مختصرًا لما ذكره النووي.

وأما ما رُوي عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"تحفة المؤمن الموت" فهو ضعيف. رواه عبد بن حميد في"المنتخب" (347) عن يحيى بن عبد الحميد، ثنا ابن المبارك، عن يحيى بن أيوب، عن بكر بن عمرو، عن عبد الرحمن بن زياد، عن أبي عبد الرحمن الحُبلي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وأخرجه الحاكم (4/ 319) من طريق عبد الله بن المبارك وصحَّحه. وتعقبه الذهبي فقال:
عبد الرحمن بن زياد هو الإفريقي ضعيف.

قلت: وهو كما قال الذهبي، فإن عبد الرحمن بن زياد بن أنعم الإفريقي اتفق أهل العلم على تضعيفه حتى قال فيه ابن حبان:"يروي الموضوعات عن الثقات، ويدلس".

وهذا الحديث أورده المنذري في"الترغيب والترهيب" (5249) وعزاه إلى الطبراني وقال:"إسناده جيد" وهو الآخر من تساهل في تصحيحه.

وكذلك لا يصح أيضًا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"الدنيا سجن المؤمن وسنَتُه، فإذا فارق الدنيا فارق السجن والسنَةَ" رواه الإمام أحمد (6855) عن علي بن إسحاق، أخبرنا عبد الله، أخبرنا يحيى بن أيوب، أخبرني عبد الله بن جنادة المعافرِي، أن أبا عبد الرحمن الحُبُلى حدثه، عن عبد الله بن عمرو فذكره. ومن طريق عبد الله بن المبارك أخرجه عبد بن حميد في"المنتخب" (346).

وأخرجه الحاكم (4/ 315) من طريق سعيد بن أبي مريم، عن يحيى بن أيوب، بإسناده.

وفيه عبد الله بن جنادة المعافري مجهول، لأنه لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 23) حسب عادته في توثيق المجاهيل. وقال: روى عنه سعيد بن أبي أيوب.

وتبعه الهيثمي فقال في"المجمع" (10/ 288):"رواه أحمد والطبراني باختصار، ورجال أحمد رجال الصحيح غير عبد الله بن جنادة وهو ثقة".

قلت: كلا بل هو مجهول.

وقوله:"سنتُه" السنَّةُ بفتح السين وتخفيف النون: الجدب والقحط.

وفي الباب أيضًا عن ابن عمر مرفوعًا:"الدنيا سجن المؤمن، وجنة الكافر" رواه البزار"كشف الأستار" (3645) عن هارون بن سفيان المستملي، ثنا عبد الله بن كثير المدني، ثنا كثير بن جعفر ابن أبي كثير، عن زيد بن أسلم، عن ابن عمر، فذكره. ح وحدثنا عبد الله بن شبيب، ثنا إسماعيل ابن أبي أويس، عن أبي الزناد، عن موسى بن عقبة، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، فذكره. وقال البزار:"لا نعلمه يُروى عن ابن عمر إلا من هذين الوجهين".

وأورده الهيثمي في"المجمع" (10/ 289) وقال:"رواه البزار بسندين أحدهما ضعيف، والآخر فيه جماعة لم أعرفهم".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "দুনিয়া মুমিনের জন্য কারাগার এবং কাফিরের জন্য জান্নাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3400)


3400 - عن عائشة قالت: كنت أسمع أنه لا يموت نبي حتى يخير بين الدنيا والآخرة. فسمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول في مرضه الذي مات فيه، وأخذتْه بحة يقول: {مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ} [النساء: 69] فظننتُ أنه خُيِّر.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4435)، ومسلم في فضائل الصحابة (2444) كلاهما من حديث محمد بن جعفر غندر، حدثنا شعبة، عن سعيد بن إبراهيم، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

والبحة هي غلظ في الصّوت.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি শুনতে পেতাম যে, কোনো নবীকে দুনিয়া ও আখিরাতের মধ্যে পছন্দের স্বাধীনতা (ইখতিয়ার) না দেওয়া পর্যন্ত তিনি মৃত্যুবরণ করেন না। অতঃপর আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তাঁর মৃত্যুকালীন অসুস্থতার সময় শুনতে পেলাম, তাঁর কণ্ঠস্বর তখন বসে গিয়েছিল, তিনি বলছিলেন: {যাদের প্রতি আল্লাহ্ তাআলা অনুগ্রহ করেছেন তাদের সাথে} [সূরা নিসা: ৬৯]। তখন আমি মনে করলাম যে, তাঁকে পছন্দের স্বাধীনতা দেওয়া হয়েছে।