আল-জামি` আল-কামিল
3401 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو صحيح يقول:"إنه لم يُقبض نبي قط حتى يرى مقعده من الجنة، ثم يُحَيَّا أو يُخيَّر".
فلما اشتكى، وحضره القبضُ، ورأسه على فخذ عائشة غُشي عليه، فلما أَفاق شَخَص بصرُه نحو سقْفِ البيت ثم قال:"اللهم في الرفيق الأعلى" فقلت: إذا لا يُجاورنا، فعرفتُ أنه حديثُه الذي كان يحدثنا وهو صحيح.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4437) عن أبي اليمان، أخبرنا شُعيب، عن الزهري، قال عروة بن الزبير: إنّ عائشة قالت فذكرته واللفظ له.
ورواه مسلم في الفضائل (2444) من وجه آخر عن ابن شهاب قال: أخبرني سعيد بن المسيب وعروة بن الزبير في رجال من أهل العلم أن عائشة قالت فذكرت نحوه وليس فيه:"ثم يُحَيَّا".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুস্থ ছিলেন, তখন তিনি বলতেন: "কোনো নবীকে ততক্ষণ পর্যন্ত কবজ করা হয় না, যতক্ষণ না তিনি জান্নাতে তাঁর বসার স্থানটি দেখে নেন। এরপর তাঁকে অভিনন্দন জানানো হয় অথবা তাঁকে (দুনিয়া ও আখিরাতের মধ্যে) এখতিয়ার (পছন্দ) দেওয়া হয়।"
যখন তিনি অসুস্থ হয়ে পড়লেন এবং তাঁর রূহ কবজ হওয়ার সময় উপস্থিত হলো, আর তাঁর মাথা আয়েশার উরুতে ছিল, তখন তিনি বেহুঁশ হয়ে গেলেন। যখন তিনি জ্ঞান ফিরে পেলেন, তখন তাঁর দৃষ্টি ঘরের ছাদের দিকে স্থির হলো। এরপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! (আমি) সর্বোচ্চ বন্ধুর (আর-রাফীকুল আ'লা) সাথে।" তখন আমি (মনে মনে) বললাম, "তাহলে তো তিনি আমাদের প্রতিবেশী হবেন না।" তখন আমি বুঝতে পারলাম যে, এটি সেই হাদিস, যা তিনি সুস্থ অবস্থায় আমাদের বলতেন।
3402 - عن عائشة أنها أخبرت أنها سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول قبل أن يموتَ وهو مستند إلى صدرها، وأصْغَتْ إليه وهو يقول:"اللهم اغفر لي، وأرحمني، وألحِقْني بالرفيق الأعلى".
متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (46) عن هشام بن عروة، عن عبَّاد بن عبد الله بن الزبير، أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أخْبرته، أنها سمعتْ فذكرته.
ورواه مسلم في فضائل الصحابة (2444) عن قتيبة بن سعيد، عن مالك فذكره.
ورواه البخاري في المغازي (4440) وفي المرضى (5674) من طرق أخرى عن هشام بن عروة بإسناده مثله.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি খবর দিয়েছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর মৃত্যুর পূর্বে তাঁর বুকের উপর হেলান দেওয়া অবস্থায় বলতে শুনেছেন। তিনি (আয়িশা) কান পেতে শুনেছিলেন যখন তিনি বলছিলেন: "হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করুন, আমার প্রতি রহম করুন এবং আমাকে সর্বোচ্চ বন্ধুর (আল্লাহর) সাথে মিলিত করুন।"
3403 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُعوِّذ بهذه الكلمات:"أذهب الباسَ ربَّ الناس، اشف وأنت الشافي، لا شفاء إلا شفاؤك، شفاءً لا يغادر سقمًا" فلما ثقل رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرضه الذي مات فيه، أخذت بيده فجعلت أمسحه بها وأقولها.
قالت: فنزع يده مني ثم قال:"رب اغفر لي، وألحقني بالرفيق".
قال أبو معاوية: قالت: فكان هذا آخر ما سمعتُ من كلامه.
قال ابن جعفر: إنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان إذا عاد مريضًا مسحه بيده. وقال:"أذهِب".
صحيح: رواه الإمام أحمد (24182) عن أبي معاوية، قال: حدثنا الأعمش، عن مسلم، عن مسروق، عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وابن جعفر قال: حدثنا شعبة، عن سليمان، عن أبي الضُحى (وهو مسلم)، عن مسروق، عن عائشة قالت: فذكرته.
ورواه مسلم في السلام (2191) من طرق عن شعبة ولم يسق لفظه كاملًا.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (26243) من وجه آخر عن عمرو بن مالك، عن أبي الجوزاء أن عائشة قالت: كنت أُعَوِّذُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بدعاءٍ إذا مرض، كان جبريل يُعوِّذه به، ويدعو له به إذا مرض قالت: فذهبتُ أعوّذه به:"أذهب الباسَ رب الناس، بيدك الشفاءُ، لا شافي إلا أنت، اشف شفاء لا يُغادر سقمًا" قالت: فذهبتُ أدعو له به في مرضه الذي توفي فيه، فقال:"ارفعي عَنِّي" قال:"فإنما كان ينفعني في المدة".
وعمرو بن مالك هو: النكري قال فيه الحافظ،"يُخطي ويغرب".
وقال في التقريب:"صدوق له أوهام" فلعل قوله:"ارفعي عني …" من أوهامه، لأنه لم يتابع عليه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বাক্যগুলো দ্বারা ঝাড়-ফুঁক করতেন (বা আল্লাহ্র আশ্রয় চাইতেন): "হে মানুষের প্রতিপালক! কষ্ট দূর করে দাও, আরোগ্য দান করো, আর তুমিই আরোগ্য দানকারী। তোমার আরোগ্য ছাড়া কোনো আরোগ্য নেই, এমন আরোগ্য যা কোনো রোগকে ছেড়ে যায় না।" যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই অসুস্থতার কারণে গুরুতর দুর্বল হয়ে পড়লেন, যে অসুস্থতায় তিনি মৃত্যুবরণ করেছিলেন, তখন আমি তাঁর হাত ধরে তা দিয়ে তাঁকে মুছতে লাগলাম এবং এই দু’আগুলো পড়তে লাগলাম।
তিনি (আয়িশা) বললেন: তখন তিনি আমার কাছ থেকে তাঁর হাত সরিয়ে নিলেন, অতঃপর বললেন: "হে আমার প্রতিপালক! আমাকে ক্ষমা করে দাও এবং আমাকে (জান্নাতে) সর্বোত্তম বন্ধুর সাথে মিলিয়ে দাও।"
আবু মু‘আবিয়া বলেছেন: তিনি (আয়িশা) বলেন, তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুখ থেকে শোনা এটিই ছিল সর্বশেষ কথা।
ইবনু জা‘ফার বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে যেতেন, তখন তিনি নিজের হাত দিয়ে তাকে মুছে দিতেন এবং বলতেন: "দূর করো (কষ্ট)।"
3404 - عن جابر قال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم قبل وفاته بثلاث يقول:"لا يموتن أحدكم إلا وهو يحسن بالله الظنَّ".
صحيح: رواه مسلم في الجنة (2877) عن يحيى بن يحيى، أخبرنا يحيى بن زكريا، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর ইন্তেকালের তিন দিন পূর্বে বলতে শুনেছি: "তোমাদের কেউ যেন আল্লাহ্ সম্পর্কে সুধারণা পোষণ করা ব্যতীত মৃত্যুবরণ না করে।"
3405 - عن حيَّان أبي النضر قال: دخلت مع وائلة بن الأسقع على أبي الأسود الجُرَشي في مَرضه الذي مات فيه فسلَّم عليه وجلس، قال: فأخذ أبو الأسود يَمِينَ واثلةَ فمسح بها على عينَيه ووجهه لبيعته بها رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فقال له واثلة: واحدة أسأَلك عنها. قال: وما هي؟ قال: كيف ظنك بربك؟ قال: فقال أبو الأسود: وأشار برأسه -أي حسن. قال وائلة: أبْشر إني سمعت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"قال الله عز وجل: أنا عند ظن عبدي بي فليظن بي ما شاء".
صحيح: رواه الإمام أحمد (16016) عن الوليد بن مسلم، قال: حدثني الوليد بن سليمانَ - يعني ابن أبي السائب- قال: حدثني حيَّان أبو النَضْر، قال: فذكره.
ورواه أيضًا الطبراني في"الكبير" (22/ 88) من طريق الوليد بن مسلم بإسناده إلا أنه لم يذكر القصّة.
ورواه الطبراني في"الأوسط" (403) من وجه آخر عن حيان أبي النَضْر قال: لقيت واثلة بن الأسقع فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"أنا عند ظن عبدي بي، إن ظن خيرًا فخيرًا، وإن ظن
شرًا فشرًا".
وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 318) عن حيان أبي النضر. وعزاه لأحمد والطبراني في"الأوسط"، وقال:"رجال أحمد ثقات".
وفاته العزو إلى"الكبير" وهو أولى لاتحاد المخرجين، ثم رواه الطبراني في"الأوسط" (7947) أيضًا من وجه آخر عن يونس بن ميسرة بن حلْبَس قال: دخلنا على يزيد بن الأسود عائدين، فدخل عليه واثلة بن الأسقع فذكر نحوه.
والوليد بن مسلم مدلس إلا أنه صرَّح بالتّحديث، وحيَّان أبو النضْر هو الأسدي الشامي وثَّقه ابن معين. وقال أبو حاتم: صالح، ترجمته في"التاريخ الكبير" (3/ 55)، و"الجرح والتعديل" (3/ 244 - 245).
وصحَّحه ابن حبان (633، 634، 635)، والحاكم (4/ 240) كلاهما من وجه آخر عن هشام ابن الغاز، قال: حدثنا حيان أبو النضر، عن واثلة بن الأسقع فذكر الحديث بدون قصة.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
হাইয়্যান আবুন নাদর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ওয়াছিলাহ ইবনুল আসকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আবূল আসওয়াদ আল-জুরাশির কাছে প্রবেশ করলাম, যখন তিনি এমন অসুস্থ ছিলেন যে, তিনি তাতে মারা যান। ওয়াছিলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সালাম দিলেন এবং বসলেন। তিনি (হাইয়্যান) বলেন: তখন আবূল আসওয়াদ ওয়াছিলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ডান হাত ধরে নিলেন এবং তার চোখ ও মুখের ওপর তা বুলিয়ে দিলেন, কারণ সেই হাত দিয়ে তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর হাতে বাই‘আত করেছিলেন। অতঃপর ওয়াছিলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আমি আপনাকে একটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতে চাই। তিনি (আবূল আসওয়াদ) বললেন: সেটি কী? ওয়াছিলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনার রব সম্পর্কে আপনার ধারণা কেমন? তিনি (হাইয়্যান) বলেন: আবূল আসওয়াদ মাথা নেড়ে ইঙ্গিত করলেন— অর্থাৎ, উত্তম (ধারণা)। ওয়াছিলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি সুসংবাদ গ্রহণ করুন! কেননা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: “আল্লাহ তা‘আলা বলেছেন: আমার বান্দা আমার প্রতি যেমন ধারণা করে, আমি তার কাছে তেমনই। সুতরাং সে আমার প্রতি যেমন ইচ্ছা তেমন ধারণা করতে পারে।”
3406 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يقول الله: أنا عند ظن عبدي بي، وأنا معه إذا دعاني".
صحيح: رواه أحمد (13192) وأبو يعلى (3232) كلاهما من حديث أبي داود الطيالسي، حدثنا شعبة، حدثنا قتادة، عن أنس، فذكره. وإسناده صحيح.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তা'আলা বলেন: আমি আমার বান্দার ধারণা অনুযায়ী তার কাছে থাকি, এবং যখন সে আমাকে ডাকে, আমি তার সাথে থাকি।"
3407 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أكثروا ذكر هادِم اللّذات" يعني الموت.
حسن: رواه الترمذي (2307)، والنسائي (1824)، وابن ماجه (4258) وابن حبان (2992)، والحاكم (4/ 321)، وأحمد (7925)، والخطيب (9/ 470) كلهم من طرق، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
ومن هؤلاء الذين رووا عن محمد بن عمرو: الفضل بن موسى، وعبد العزيز بن مسلم، ومحمد ابن ابراهيم بن عثمان والد أبي بكر وعثمان بن أبي شيبة، والعلاء بن محمد بن سيار، وسليم بن أخضر، وحماد بن سلمة، ويزيد بن هارون، وعبد الرحمن بن قيس الزعفراني، وغيرهم.
وخالفهم جميعًا أبو أسامة فرواه عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، مرسلًا. قال الدارقطني في"العلل" (8/ 39 - 40):"والصحيح المرسل".
كذا قال، وهو إمام في الجرح والتعديل، ولكن قواعد التخريج تقتضي أن نحكم لمن رفع لكثرتهم، وإن كان فيهم الضعيف، وكثير الخطأ، ولكن فيهم الفضل بن موسى السيناني وصفه في
التقريب"ثقة ثبت" فهؤلاء يعضد بعضهم بعضًا.
وأبو أسامة هو حماد بن أسامة بن زيد القرشي مولاهم الكوفي، وثقه جماعة من أهل العلم، إلا أنه وصف بالتدليس.
وقال الحافظ في"التقريب":"ثقة ثبت، ربما دلس، وكان بأخرة يحدّث من كتب غيره" يعني بدون سماع من أصحابها، وهذا مظنة للخطأ. وإن كان قول ابن حجر:"يحدِّث من كتب غيره" فيه نظر؛ فإنَّ المحققين كالذّهبي وغيره نفوا عنه هذه التّهمة.
قال الترمذي:"حسن غريب". مع أنه رواه عن الفضل بن موسى السيناني وهو ثقة ثبت كما مضى.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة؛ فإنه حسن الحديث.
وقوله: هادم: من الهدم، وهو هدم البناء، والمراد الموت، وفي رواية:"هاذم" بالذال المعجمة بمعنى القاطع.
وما ورد في بعض الروايات من الزيادات:"فما ذكره عبد قط وهو في ضيق وإلا وسَّعه عليه، ولا ذكره وهو في سعةٍ إلا ضيَّقه عليه" فهي منكرة أو شاذّة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা ভোগ-বিলাসের বিনাশকারীকে (অর্থাৎ মৃত্যুকে) বেশি বেশি স্মরণ করো।"
3408 - عن أنس بن مالك قال: مر النبي صلى الله عليه وسلم بقوم من الأنصار يضحكون. فقال:"أكثروا ذكر هادِم اللذات".
حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (3623) عن جعفر بن محمد بن الفُضيل، والطبراني في"الأوسط" (695) عن أحمد بن محمد بن أبي بزَّة، كلاهما عن مؤمل بن إسماعيل، قال: حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن أنس فذكره.
قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن ثابت إلا حماد، تفرد به مؤمل" انتهى.
قلت: ليس كما قال، بل رواه أيضًا عبد الأعلى بن حماد النرسي، عن حماد بن سلمة بإسناده. رواه الخطيب في تاريخه (6428) بإسناده عنه، وهذه متابعة قوية لمؤمل بن إسماعيل فإنه ضعيف، ولكنه يعتبر به عند المتابعة، وعبد الأعلى بن حماد النرسي"ثبت" كما قال الذهبي في"الكاشف" وبه صار الإسناد حسنًا. وحسَّنه أيضًا الهيثمي في"المجمع" (10/ 308) بعد أن عزاه للبزار والطبراني، وهو تساهل منه، فإن مؤمل بن إسماعيل لا يُحسن حديثه إلا بعد المتابعة.
ولكن نقل عبد الرحمن بن أبي حاتم في"العلل" (2/ 131) عن أبيه فقال: سألت أبي عن حديث رواه ابن أبي بزة، عن مؤمل بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، قال: مر رسول الله صلى الله عليه وسلم بمجلس من مجالس الأنصار، وهم يمزحون ويضحكون فقال:"أكثروا ذكر هاذم اللذات -يعني الموت" قال أبي:"هذا حديث باطل لا أصل له" يجعلنا أن نتأمل في صحة هذا الحديث، فإن أبا حاتم لم يحكم عليه ببطلانه إلا بعد الاستقراء والاطلاع على جميع طرقه، فهل
هو باطل لا أصل له؟ .
وفي الباب عن أبي سعيد مرفوعًا في حديث طويل وفيه: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم مصلاه، فرأى ناسًا كأنهم يكتثِرون، فقال لهم:"أما إنكم لو أكثرتم ذكر هادِم اللذات لشغلكم عما أرى الموتُ، فأكثروا من ذكر هادِم اللذات الموت …".
رواه الترمذي (2460) عن محمد بن أحمد مدُّويَهْ، حدثنا القاسم بن الحكم العرني، حدثنا عبيد الله بن الوليد الوصافي، عن عطية، عن أبي سعيد فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من هذا الوجه".
قلت: بل هو ضعيف جدًّا وفيه سلسلة الضعفاء، القاسم بن محمد العرني، وشيخه عبيد الله بن الوليد الوصافي، وشيخه عطية كلهم من الضعفاء.
وفي الباب أيضًا عن ابن عمر مرفوعًا ولفظه:"أكثروا ذكر هادِم اللذات، فإنه لا يكون في كثير
إلا قلَّله، ولا في قليل إلا كثَّره".
رواه الطبراني في"الأوسط" (5780) من طريق أبي عامر الأسدي، عن عبيد الله بن عمر العمري، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. ومن هذا الطريق رواه القضاعي في"مسند الشهاب" (671).
وأبو عامر هو القاسم لا يُعرف، ذكره ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" ولم يقل فيه شيئًا.
وكذلك لا يصح ما رُوي عنه قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فجاءه رجل من الأنصار، فسلَّم على النبي صلى الله عليه وسلم ثم قال: يا رسول الله! أيّ المؤمنين أفضل؟ قال:"أحسنهم خلقًا" قال: أي المؤمنين أكيس؟ قال:"أكثرهم للموت ذكرًا، وأحسنهم لما بعده استعدادًا، أولئك الأكياس".
رواه ابن ماجه (4259) من طريق نافع بن عبد الله، عن فروة بن قيس، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عمر فذكره.
ونافع بن عبد الله"مجهول"، وكذلك شيخه فروة بن قيس حجازي"مجهول" أيضًا.
وقال الذهبي:"هذا خبر باطل" نقله البوصيري عنه في الزوائد.
وأما قول المنذري في"الترغيب والترهيب" (4/ 129):"بإسناد جيد" فغير جيد، وللحديث طرق لا يخلو من ضعف ومجهول.
وفي الباب أيضًا عن عمر بن الخطاب، أخرجه أبو نعيم في"الحلية" (6/ 355) وفيه عبد الملك ابن يزيد قال الذهبي:"لا يُدرى من هو؟".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن شداد بن أوس مرفوعًا:"الكيِّس من دان نفسه، وعمل لما بعد الموت، والعاجز من أَتْبع نفسه هواها، ثم تمنى على الله".
رواه الترمذي (2459)، وابن ماجه (4260) كلاهما من طريق أبي بكر بن أبي مريم، عن ضمرة بن حبيب، عن أبي يعلى شداد بن أوس فذكره.
قال: الترمذي: حسن.
قلت: ليس بحسن، فإن فيه أبا بكر بن أبي مريم وهو: أبو بكر بن عبد الله بن أبي مريم الغساني الشامي، قد ينسب إلى جده، اتفق أهل هذا الفن على تضعيفه منهم الإمام أحمد وأبو حاتم وأبو داود وأبو زرعة والجوزجاني والنسائي والدارقطني وابن سعد وغيرهم، والراوي عنه عند ابن ماجه بقية بن الوليد إلا أنه توبع، ومعنى قوله:"دان نفسه" أي حاسب نفسه في الدنيا قبل أن يحاسب يوم القيامة.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনসারদের একদল লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন তারা হাসছিল। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা স্বাদ-বিনাশকারীর (মৃত্যুর) স্মরণ অধিক পরিমাণে করো।"
3409 - عن أبي سعيد الخدري أنه لما حضره الموت دعا بثياب جدد فلبسها ثم قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الميت يُبعث في ثيابه الذي يموت فيها".
حسن: رواه أبو داود (3114) عن الحسن بن علي، حدثنا ابن أبي مريم، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد الخدري فذكر الحديث مثله.
إسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب وهو الغافقي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وأخرجه ابن حبان في صحيحه (7316)، والحاكم (1/ 340) كلاهما من حديث ابن أبي مريم به مثله.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
إلا أن ابن حبان لم يذكر قصة أبي سعيد في تجديد ثيابه عند موته.
وقال:"معنى قوله صلى الله عليه وسلم:"الميت يبعث …" أراد به في أعماله كقوله تعالى: {وَثِيَابَكَ فَطَهِّرْ} [المدثر: 4] يريد به: وأعمالك أصلِحها، لا أن الميت يبعث في ثيابه التي قبض فيها، إذ الأخبار الجمة تُصرح عن المصطفى صلى الله عليه وسلم بأن الناس يحشرون يوم القيامة حفاة عراة غرْلًا"، انتهى.
وقال الخطابي: وأبو سعيد استعمل الحديث على ظاهره، وقد تأول بعض العلماء على خلاف ذلك فقال: الثياب معناه العمل، ثم قال:"وقال بعضهم: البعث غير الحشر، فقد يجوز أن يكون البعث مع الثياب، والحشر مع العري والحفا".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর যখন মৃত্যু নিকটবর্তী হলো, তখন তিনি নতুন পোশাক চাইলেন এবং তা পরিধান করলেন। এরপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় মৃত ব্যক্তিকে তার সেই পোশাকেই পুনরুত্থিত করা হবে, যে পোশাকে সে মারা যায়।"
3410 - عن عبيد بن خالد السُلمي قال: آخى رسول الله صلى الله عليه وسلم بين رجلين، فقتل أحدهما، ومات الآخر بعده بجمعة أو نحوها، فصلينا عليه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما قلتم؟" فقلنا: دعونا له، وقلنا: اللهم اغفر له، وألحقه بصاحبه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فأين صلاته بعد صلاته، وصومه بعد صومه؟" شك شعبة في صومه."وعمله
بعد عمله، إن بينهما كما بين السماء والأرض".
صحيح: رواه أبو داود (2524)، والنسائي (1985) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، قال سمعت عمرو بن ميمون، عن عبد الله بن رُبَيِّعة، عن عبيد الله بن خالد السلمي فذكره واللفظ لأبي داود، ولفظ النسائي نحوه إلا أنه قال بعد ذكر عبد الله بن رُبَيِّعة: وكان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، ويقال: إن شعبة لم يتابع على قوله هذا، وقد نفى أبو حاتم الصحبة له، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين.
والحديث في مسند الإمام أحمد (16074) من طريق شعبة بإسناده ولكن قال هذا القول في شأن عبيد الله بن خالد السلمي بأنه كان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.
وفي الحديث دليل على فضيلة طول العمر إذا كان معه العمل، ويدل عليه أيضًا حديث سعد بن أبي وقاص كما سبق في كتاب الوضوء، باب ما جاء في فضل الوضوء والصلاة عقبه.
وأما ما رُوي عن طلحة بن عبيد الله في حديث طويل فهو منقطع وتم تخريجه في الباب المشار إليه.
উবাইদ ইবনু খালিদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দু’জন লোকের মাঝে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করিয়ে দিলেন। অতঃপর তাদের একজন শহীদ হয়ে গেল। আর অন্যজন এর এক জুমু'আহ (সপ্তাহ) বা তার কাছাকাছি সময় পরে মারা গেল। অতঃপর আমরা তার জানাযার সালাত আদায় করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তোমরা কী বলেছ?” আমরা বললাম: আমরা তার জন্য দু’আ করেছি এবং বলেছি: "হে আল্লাহ! আপনি তাকে ক্ষমা করুন এবং তার সাথীর (শহীদ ব্যক্তির) সাথে তাকে মিলিত করুন।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তাহলে তার (মৃত ব্যক্তির) সালাতের পরের সালাত, তার সাওমের (রোযার) পরের সাওম কোথায়? [শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সাওম (রোযা) সম্পর্কে সন্দেহ পোষণ করেছেন।] আর তার আমলের পরের আমল কোথায়? নিশ্চয়ই তাদের দুজনের মাঝে আসমান ও যমীনের মতো ব্যবধান রয়েছে।”
3411 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يتمنَّينَّ أحد منكم الموت لضُرٍّ نزل به، فإن كان لا بدَّ متمنِّيا للموت فليقل: اللهم أحْيني ما كانت الحياة خيرًا لي وتوفني إذا كانت الوفاةُ خيرًا لي".
متفق عليه: رواه البخاري في الدعوات (6351)، ومسلم في الذكر والدّعاء (2680) كلاهما من حديث إسماعيل ابن علية، عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس بن مالك فذكره.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন তার ওপর আপতিত কষ্টের কারণে মৃত্যু কামনা না করে। আর যদি সে একান্তই মৃত্যু কামনা করতে বাধ্য হয়, তবে সে যেন বলে: হে আল্লাহ! আমাকে ততক্ষণ বাঁচিয়ে রাখুন, যতক্ষণ জীবন আমার জন্য কল্যাণকর হয় এবং আমাকে মৃত্যু দিন, যখন মৃত্যু আমার জন্য কল্যাণকর হয়।
3412 - عن قيس بن أبي حازم قال: دخلنا على خَبَّاب نعوده، وقد اكتوى سبع كيَّات، فقال: إن أصحابنا الذين سلفوا مضوا ولم تنقُصْهم الدنيا، وإنا أصبنا ما لا نجد موضِعا إلا التراب، ولولا أن النبي صلى الله عليه وسلم نهانا أن ندعو بالموت لدعوت به، ثم أتيناه مرة أخرى، وهو يبنى حائطًا له، فقال: إن المسلم ليُؤجر في كل شيء يُنفِقُه إلا في شيء يجعله في هذا التراب.
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5672)، ومسلم في الذكر والدّعاء (2681) كلاهما عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم فذكره واللفظ للبخاريّ. وأما مسلم فلم يذكر قول خبَّاب:"إن المسلم يؤجر في كل شيء …".
وفي لفظ عند الترمذي (970) عن حارثة بن مُضَرِّب قال: دخلت على خَبَّاب، وقد اكتوى في بطْنِه فقال: ما أعلم أحدًا من أصحاب النبي لقي من البلاء ما لقيتُ، لقد كنتُ وما أجد درهمًا على عهد النبي صلى الله عليه وسلم، وفي ناحيةٍ من بيتي أربعون ألفًا. ولولا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا أو نهى أن نتمنَّى
الموتَ لتمنَّيتُ.
رواه من طريق شعبة، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرب به مثله.
قوله:"إلا في شيء يجعله في هذا التراب". يعني يتكلف في البناء ما لا يحتاج إليه.
খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। কায়স ইবনে আবি হাযিম বলেন: আমরা তাঁকে দেখতে গেলাম, তখন তিনি সাতবার গরম লোহা দ্বারা (পেটে) দাগ দিয়ে চিকিৎসা নিয়েছিলেন। তিনি বললেন: নিশ্চয় আমাদের সেই সাথীরা যারা আগে চলে গেছেন, তারা চলে গেছেন এবং দুনিয়া তাদের কিছুই কমাতে পারেনি। আর আমরা এমন জিনিস অর্জন করেছি যার জন্য মাটি (কবর) ছাড়া আর কোনো স্থান আমরা পাচ্ছি না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যদি আমাদের মৃত্যু কামনা করতে নিষেধ না করতেন, তবে আমি অবশ্যই তা কামনা করতাম। এরপর আমরা আরেকবার তাঁর কাছে আসলাম, তখন তিনি নিজের জন্য একটি দেয়াল বানাচ্ছিলেন। তিনি বললেন: মুসলিম যে জিনিসই খরচ করে, তার সবকিছুর জন্য তাকে সাওয়াব দেওয়া হয়, তবে ওই জিনিস ছাড়া যা সে এই মাটির উপর (অর্থাৎ, নির্মাণ কাজে) ব্যয় করে।
3413 - عن أبي هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لن يُدخل أحدًا عملُه الجنة" قالوا: ولا أنت يا رسول الله؟ قال:"لا، ولا أنا، إلا أن يتغمدني الله بفضلٍ ورحمةٍ، فسَدِّدوا وقَارِبُوا، ولا يتمنينَّ أحدكم الموت، إما محسنًا فلعله أن يزداد خيرًا، وإما مُسيئًا فلعله أن يستعتِب".
متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5673) عن أبي اليمان، أخبرنا شُعيب، عن الزهري، قال: أخبرني أبو عبيد مولى عبد الرحمن بن عوف، أن أبا هريرة قال: فذكره.
ورواه مسلم في صفات المنافقين (2816) من طريق ابن شهاب بإسناده، ومن أوجه كثيرة غير أنه لم يذكر فيه النهي عن تمني الموت.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কারো আমলই তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাতে পারবে না।" তাঁরা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল, আপনিও কি নন?" তিনি বললেন: "না, আমিও নই। তবে আল্লাহ যদি আমাকে তাঁর দয়া ও করুণা দ্বারা আবৃত করেন (তাহলে ভিন্ন কথা)। সুতরাং তোমরা সঠিক কাজ করে যাও এবং (সদাচরণের) কাছাকাছি থাকো। আর তোমাদের কেউ যেন মৃত্যু কামনা না করে। কেননা, সে যদি নেককার হয়, তাহলে হয়তো সে আরো বেশি নেক কাজ করার সুযোগ পাবে। আর যদি সে পাপী হয়, তাহলে হয়তো সে (তাওবা করে) আল্লাহর সন্তুষ্টি অর্জন করতে পারবে।"
3414 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يتمنَّى أحدكم الموتَ، ولا يدْعُ به من قبل أن يأتيه، إنه إذا مات أحدكم انقطع عملُه. وإنه لا يزيد المؤمنَ عمرُه إلا خيرًا".
صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2682) من حديث همام بن منبه قال: هذا ما حدثنا أبو هريرة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر أحاديث منها: هذا الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন মৃত্যুর আকাঙ্ক্ষা না করে এবং তা আসার আগে যেন এর জন্য দু'আ না করে। কেননা তোমাদের কেউ যখন মারা যায়, তখন তার আমল বন্ধ হয়ে যায়। আর মু'মিনের দীর্ঘ জীবন কেবল তার জন্য কল্যাণই বৃদ্ধি করে।
3415 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تمنوا الموت، فإن هول المطَّلع شديد، وإن من السعادة أن يطولَ عمرُ العبد، ويرزقه الله الإنابة".
حسن: رواه الإمام أحمد (14564)، والبزار"كشف الأستار" (3240، 3422) كلاهما من طريق أبي عامر العقدي (وهو عبد الملك بن عمرو العقَدي)، حدثنا كثير بن زيد، حدثني الحارث ابن يزيد، قال: سمعتُ جابر بن عبد الله فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل الحارث بن يزيد وهو من رجال التعجيل (166)، ذكره ابن حبان في الثقات وقال:"روى عنه محمد بن يحيى المدني، وكثير بن زيد".
وأورده المنذري في"الترغيب" (4/ 257)، وعزاه إلى أحمد، وحسّن إسناده ومن هذا الوجه أخرجه الحاكم في"المستدرك" (4/ 240) وسكت عنه.
وأما ما رُوي عن أم الفضل أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل على العباس وهو يشتكي، فتمنى الموتَ، فقال:"يا عباس، يا عم رسول الله، لا تتمنَّ الموتَ، إن كنت محسنًا تزداد إحسانًا إلى إحسانك خير لك، وإن كنت مسيئًا، فإن تؤخر تستعتبُ خير لك، فلا تتمنى الموت".
قال يونس:"وإن كنت مسيئًا فإن تُؤخَّر تستعتب من إساءتك خير لك".
رواه الإمام أحمد (26874)، وأبو يعلى (7076)، والطبراني (44) كلهم من طريق يزيد بن الهاد، عن هند بنت الحارث عن أم الفضل فذكرته.
وهند بنت الحارث هي الخثعمية امرأة عبد الله بن شَدَّاد بن الهاد، روت عن أم الفضل لُبابة بنت الحارث حديثين أحدهما هذا، ولم يُوثقها غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ"مقبولة" أي حيث تتابع، ولم تتابع، فهي مجهولة ولينة الحديث.
ورواه الحاكم (1/ 339) وقال:"صحيح على شرط الشيخين" وكذا أورده المنذري في"الترغيب والترهيب" (4/ 256) وقال:"صحيح على شرط الشيخين". وذلك ظنًا منهما بأن هند بنت الحارث هي: الفِراسية -بكسر الفاء، ويقال لها: القرشية، فإنها ثقة من رجال البخاري، والصواب كما قلت إنها الخثعمية، والله تعالى أعلم.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মৃত্যুর কামনা করো না। কারণ (মৃত্যুর পর) সম্মুখীন হওয়ার ভয়াবহতা অত্যন্ত কঠিন। আর নিশ্চয়ই এটা সৌভাগ্যের বিষয় যে, বান্দার জীবন দীর্ঘ হয় এবং আল্লাহ তাকে (আল্লাহর দিকে) প্রত্যাবর্তন করার (বা তাওবা করার) ক্ষমতা দান করেন।"
3416 - عن عائشة قالت: إن رجلا قال للنبي صلى الله عليه وسلم إن أمي افْتُلِتَتْ نفسُهَا، وأظنها لو تكلمتْ تصدقتْ، فهل لها أجر إن تصدقتُ عنها؟ قال:"نعم".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1388)، ومسلم في الزكاة (1004) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته، واللفظ للبخاري.
وفي الحديث إشارة بأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يُبد كراهيته لموت الفُجاءة.
وقوله:"افتُلِتَتْ" بضم التاء وكسر اللام -أي سُلِبَتْ على ما لم يُسم فاعله، يقال: افتلَتَ فلان- أي مات فجأةٌ.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল, "আমার মায়ের হঠাৎ মৃত্যু হয়েছে (তার রূহ ছিনিয়ে নেওয়া হয়েছে), আর আমি ধারণা করি যে, যদি তিনি কথা বলতে পারতেন, তবে অবশ্যই সাদকা করতেন। আমি যদি তার পক্ষ থেকে সাদকা করি, তবে কি তার জন্য সওয়াব হবে?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ।"
3417 - عن تميم بن سلمة أو سعد بن عبيدة، عن عبيد بن خالد السلمي رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال مرة: عن النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قال مرة: عن عبيد قال:"موت الفجأة أخْذةُ أسَفٍ.
صحيح: رواه أبو داود (3110) عن مسدد، حدثنا يحيى، عن شعبة، عن منصور، عن تميم بن سلمة، أو سعد بن عبيدة، عن عبيد بن خالد السلمي فذكره.
ومن طريق أبي داود رواه البيهقي (3/ 378) وقال:"ورواه روح بن عبادة، عن شعبة، عن منصور، عن تميم بن سلمة، عن عبيد من غير شك ورفعه، قال شعبة: هكذا حدثنيه، وحدثنيه مرة أخرى فلم يرفعه. وقال محمد بن بشار، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة بهذا موقوف".
قلت: هكذا رواه أيضًا الإمام أحمد (15497) عن محمد بن جعفر وهو غندر، عن شعبة موقوفًا،
كما رواه قبله عن يحيى بن سعيد، عن شعبة موقوفًا أيضًا وقال: وحدَّث به مرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم. والحكم في هذا المتن لمن رفعه، لأن معه زيادة علم، وقول الحافظ في"الفتح" (3/ 254):
"في إسناده مقال، لأن راويه رفعه مرة، ووقفه أخرى" فيه نظر؛ فإن فيه من رواه بدون شك، وقد أجاد المنذري في قوله في"مختصر أبي داود":"رجال إسناده ثقات، والوقف فيه لا يُؤَثِّر، فإن مثله لا يُؤخذ بالرأي، فكيف وقد أسنده الراوي مرة، والله أعلم".
وقوله:"أَسَف" بفتح السين -غَضب وزنا ومعني، ورُوي بوزن فاعل أي غضبان، والمراد أنه أثر غضبه تعالى حيث لم يتركه للتوبة، وإعداد زاد الآخرة.
وقد نُقل عن أحمد وبعض الشافعية كراهة موت الفجأة.
ونقل النووي عن بعض القدماء:"أن جماعة من الأنبياء والصالحين ماتوا كذلك". قال النووي:"وهو محبوب للمراقبين" انتهى كلامه.
قال الحافظ ابن حجر:"وبذلك يجتمع القولان" انظر:"الفتح" (3/ 255).
وأما ما رُوي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم"إني أكره موت الفوات" فهو ضعيف جدًّا، رواه الإمام أحمد (8666)، وأبو يعلى (6612) كلاهما من طريق إسرائيل بن يونس، عن إبراهيم بن إسحاق، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم مر بجدار، أو حائط مائل، فأسرع المشي، فقيل له فقال:"إني أكره موت الفوات"، إبراهيم بن إسحاق هو: يقال له: إبراهيم ابن الفضل المخزومي المدني، قال فيه البخاري:"منكر الحديث" وقال الدارقطني:"متروك" وضعَّفه غير واحد من الأئمة.
وكذلك لا يصح ما رُوي عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم إني أعوذ بك أن أموت غمًّا، أو هَمًّا، أو أن أموت غرقًا، وأن يتخبطني الشيطانُ عند الموت، وأن أموت لديغًا" رواه الإمام أحمد (8667) وفيه أيضًا إبراهيم بن إسحاق وهو: ابن الفضل المخزومي.
وقد رُوي استعاذته عن موت الفجاءة عن عمرو بن العاص وابنه عبد الله بن عمرو وأبي أمامة وغيرهم وفي كلها مقال.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة قالت: سألت رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عن موت الفَجْأة؟ فقال:"راحة للمؤمن وأخذةُ أَسَفٍ للفاجر" رواه الإمام أحمد (25042) عن وكيع، حدثنا عبيد الله بن الوليد، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن عائشة فذكرته. وعبيد الله بن الوليد وهو الوصافي ضعيف جدًّا، وعبد الله بن عبيد بن عمير لم يسمع من عائشة، وله طرق أخرى أضعف منها.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن موسى بن طلحة قال: بلغ عائشة أن ابن عمر يقول: إن موت الفجأة سُخطةٌ على المؤمنين، فقالت: يغفر الله لابن عمر! إنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"موت الفجأة تخفيف عن المؤمنين، وسُخطة على الكافرين" رواه الطبراني في"الأوسط" (3153) عن بكر، قال: حدثنا سعيد بن منصور، قال: نا صالح بن موسى الطلحي، عن عبد الملك بن عُمير، عن موسى بن طلحة فذكره.
قال الطبراني:"لم يروه عن عبد الملك إلا صالح".
قلت: صالح بن موسى هو ابن إسحاق بن طلحة التيمي قال فيه ابن معين: ليس بشيء، وقال أبو حاتم: ضعيف. وقال ابن حبان:"كان يروي عن الثقات ما لا يُشبه حديث الأثبات".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن مسعود مرفوعًا:"إن نفس المؤمن تخرج رَشْحًا، ولا أحب موتًا كموت الحمار" قيل: وما موتُ الحمار؟ قال:"موت الفَجْأَةِ". رواه الترمذي (980) عن أحمد بن الحسن، قال: حدثنا مسلم بن إبراهيم، قال: حدثنا حُسام بن المِصكِّ قال: حدثنا أبو معشر، عن إبراهيم، عن علقمة، قال: سمعت عبد الله فذكره.
وحُسام بن المِصَكِّ -بكسر الميم، وفتح المهملة، وبعدها كاف مثقلة، الأزدي أبو سهل البصري ضعَّفه أكثر أهل العلم حتى قال الدارقطني: متروك الحديث. وفي التقريب:"ضعيف، يكاد أن يترك".
উবাইদ ইবনু খালিদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবিদের মধ্যে একজন ছিলেন। তিনি একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, আবার একবার উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: "আকস্মিক মৃত্যু (মওতূল ফাজআহ) হলো আক্ষেপের সাথে পাকড়াও করা।"
3418 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قال الله تبارك وتعالى للنفس: اخرجي. قالت: لا أخرج إلا كارهة. قال: اخرجي وإن كرهت".
صحيح: رواه البخاري في"الأدب المفرد" (219) والبزار (9590) والبيهقي في"الزهد" (460) من حديث موسى بن إسماعيل قال: حدثنا الربيع بن مسلم، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة، فذكره.
وقال البزار:"وهذا الحديث لا نعلم رواه إلا أبو هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولا رواه عن أبي هريرة إلا محمد بن زياد، ولا عن محمد إلا الربيع بن مسلم، والربيع بن مسلم ثقة مأمون". أهـ.
قلت: وكذلك محمد بن زياد (وهو القرشي الجمحي)، وموسى بن إسماعيل ثقتان ثبتان.
قال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (2/ 325):"رواه البزار ورجاله ثقات".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা নফস (আত্মা)-কে বললেন: তুমি বের হয়ে এসো। নফস বললো: আমি অনিচ্ছায় বের হবো না। আল্লাহ বললেন: তুমি বের হয়ে এসো, যদিও তুমি অনিচ্ছুক হও।"
3419 - عن أمِّ سلمة قالت: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم على أبي سلمة، وقد شق بصره فأغمضه، ثم قال:"إن الرُوح إذا قُبض تبعه البصر" فضجَّ ناس من أهله فقال:"لا تدعوا على أنفسكم إلا بخير، فإن الملائكة يؤمنون على ما تقولون".
ثم قال:"اللهم اغفر لأبي سلمة، وارفع درجته في المهديين، واخلفْه في عقِبه في الغابرين، واغفر لنا وله يا رب العالمين، وافسح له في قبره، ونور له فيه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (920) عن زهير بن حرب، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا أبو إسحاق الفزاري، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن قبيصة بن ذُؤيب، عن أم سلمة فذكرته.
ورواه من وجه آخر عن عبيد الله بن الحسن، عن خالد الحذاء بهذا الإسناد نحوه غير أنه قال فيه:"واخْلُفه في تركته" وقال:"اللهم أوسع له في قبره" ولم يقل:"افسح له" وزاد: قال خالد الحذاء: ودعوة أخرى سابعة نسيتُها.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আবূ সালামাহর কাছে প্রবেশ করলেন। তখন তার দৃষ্টি স্থির হয়ে গিয়েছিল (দৃষ্টি উপরের দিকে ছিল)। তিনি তার চোখ দুটি বন্ধ করে দিলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই যখন রূহ কব্জ করা হয়, তখন দৃষ্টি তা অনুসরণ করে।"
তখন তাঁর (আবূ সালামাহর) পরিবারের কিছু লোক উচ্চস্বরে কান্নাকাটি শুরু করল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের নিজেদের জন্য কল্যাণ ছাড়া অন্য কিছুর দ্বারা বদদোয়া করো না। কারণ তোমরা যা বলো, ফেরেশতারা তার উপর 'আমীন' বলেন।"
এরপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আবূ সালামাহকে ক্ষমা করে দাও, হেদায়েত প্রাপ্তদের মধ্যে তার মর্যাদা বাড়িয়ে দাও, তার পরবর্তী বংশধরদের মধ্যে তুমি তার প্রতিনিধি হও, হে সৃষ্টিকুলের রব! আমাদের এবং তাকে ক্ষমা করো, আর তার কবর প্রশস্ত করে দাও এবং সেখানে তার জন্য নূর দ্বারা আলোকিত করে দাও।"
3420 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألم تروا الإنسان إذا مات شَخَصَ بصرُه؟" قالوا: بلى. قال:"فذلك حين يتبع بصرُه نفْسَه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (921) عن محمد بن رافع، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، عن العلاء بن يعقوب، قال: أخبرني أبي أنه سمع أبا هريرة فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কি দেখো না, যখন কোনো মানুষ মারা যায়, তখন তার চক্ষু স্থির হয়ে যায়?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "এটা তখনই ঘটে যখন তার দৃষ্টি তার আত্মাকে অনুসরণ করে।"