হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3421)


3421 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نعى النجاشيَّ في اليوم الذي مات فيه، خرج إلى المصلى فصف بهم، وكبَّر أربعًا.

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (14) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره. ورواه البخاري في الجنائز (1245) عن إسماعيل، ومسلم في الجنائز (951) عن يحيى بن يحيى -كلاهما عن مالك به مثله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজ্জাশী (হাবশার বাদশাহ)-এর মৃত্যুর দিনেই তাঁর মৃত্যুর সংবাদ ঘোষণা করেছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের মাঠে বের হলেন এবং সাহাবীগণকে কাতারবদ্ধ করলেন, আর চার তাকবীর দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3422)


3422 - عن أبي هريرة قال: نعى رسول الله صلى الله عليه وسلم النجاشيَّ صاحب الحبشة يوم الذي مات فيه فقال:"استغفروا لأخيكم".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1327)، ومسلم في الجنائز (951/ 63) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن عُقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة، أنهما حدثاه عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাবশার (আবিসিনিয়া) বাদশাহ নাজাশীর মৃত্যুর দিন তাঁর মৃত্যুর সংবাদ ঘোষণা করেন, অতঃপর বললেন: "তোমরা তোমাদের ভাইয়ের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3423)


3423 - عن عمران بن حصين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن أخًا لكم قد مات، فقوموا فصلوا عليه" يعني النجاشي.

وفي رواية:"إن أخاكم".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (953) من طرق، عن ابن علية، عن أبوب، عن أبي قلابة، عن أبي المهلَّب، عن عمران بن حصين فذكره.

وفي السنن: فقمنا فصففنا عليه كما يُصف على الميت، وصلينا عليه كما يُصَلَّى على الميت. رواه النسائي (1975) من طريق محمد بن سيرين، عن أبي المهلب بإسناده.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের এক ভাই মারা গেছেন, তাই তোমরা দাঁড়াও এবং তার উপর সালাত আদায় করো।" (অর্থাৎ তিনি নাজ্জাশীর কথা বোঝাচ্ছিলেন।)

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "নিশ্চয় তোমাদের ভাই।"

এবং সুনান গ্রন্থসমূহে এসেছে: অতঃপর আমরা দাঁড়ালাম এবং মৃতের জন্য যেভাবে কাতার তৈরি করা হয়, আমরা তার জন্য সেভাবে কাতার তৈরি করলাম এবং মৃতের জন্য যেভাবে সালাত আদায় করা হয়, আমরা সেভাবে তার উপর সালাত আদায় করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3424)


3424 - عن أنس بن مالك قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أخذ الراية زيد فأُصيبَ، ثم أخذها
جعفر فأُصيب، ثم أخذها عبد الله بن رواحة فأُصيبَ، -وإن عيني رسول الله صلى الله عليه وسلم لتذرفان- ثم أخذ الراية خالد بن الوليد من غير إمرةٍ ففُتح له".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1246) عن أبي معمر، حدثنا عبد الوارث، حدثنا أيوب، عن محمد بن هلال، عن أنس فذكره.

وبوَّب البخاري بقوله: الرجل ينعي إلى أهل البيت بنفسه.

قال الحافظ:"وفائدة هذه الترجمة الإشارة إلى أن النعي ليس ممنوعًا كله. وإنما نُهي عما كان أهل الجاهلية يصنعونه فكانوا يرسلون من يُعلن بخبر موت الميت على أبواب الدور والأسواق".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যায়িদ (ইবনে হারিসা) পতাকা ধারণ করলেন এবং শহীদ হলেন। এরপর জা'ফর (ইবনে আবী তালিব) তা ধরলেন এবং তিনিও শহীদ হলেন। এরপর আবদুল্লাহ ইবনে রাওয়াহা তা ধরলেন এবং তিনিও শহীদ হলেন। - আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উভয় চোখ থেকে তখন অশ্রু ঝরছিল - এরপর খালিদ ইবনে ওয়ালীদ (কোনো পূর্ববর্তী) নেতৃত্ব ছাড়াই পতাকাটি ধারণ করলেন এবং আল্লাহ তাঁর মাধ্যমে বিজয় দান করলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3425)


3425 - عن خالد بن شُمير قال: قَدِمَ علينا عبد الله بن رباح فوجدته قد اجتمعَ إليه ناسٌ من الناس، قال: حدَّثنا أبو قتادة فارسُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: بعثَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم جيشَ الأُمراء وقال:"عليكم زيدُ بن حارثةَ، فإنْ أُصيبَ زيدٌ، فجَعْفَرٌ، فإنْ أُصِيبَ جعفرٌ، فعبد الله بن رواحةَ الأنصاريُّ" فوثبَ جعفرٌ، فقال: بأبي أنت يا نبيَّ الله وأُمِّي، ما كنتُ أَرهبُ أن تستعمل عليَّ زيدًا، قال:"امْضُوا فإِنَّكَ لا تَدْري أيُّ ذلك خَيْرٌ" قال: فانطلق الجيشُ فَلَبثُوا ما شاء الله، ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم صَعِدَ المِنبر وأَمَرَ أن يُنادَى: الصَّلاةُ جَامِعَة، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"نابَ خبرٌ -أوْ ثابَ خبرٌ، شكَّ عبد الرحمن- ألا أُخْبِرُكم عن جَيْشِكُم هذا الغازي، إنَّهم انطلقُوا حتى لَقُوا العَدُوَّ، فأصيبَ زيدٌ شهيدًا، فاستغفِرُوا له" فاستغفر له الناسُ"ثم أخَذَ اللِّواءَ جعفرُ بنُ أبي طالب فَشَدَّ على القَوم حتَّى قُتِلَ شهيدًا، أَشْهَدُ له بالشَّهادَةِ، فاستغفِرُوا له، ثم أَخَذَ اللِّواءَ عبد الله بنُ رواحَةَ، فأَثبتَ قَدَمَيْهِ حتَّى أُصِيبَ شَهِيدًا، فاستغفروا له، ثم أَخَذَ اللِّواءَ خالدُ بنُ الوليدِ ولم يكُنْ مِن الأُمَرَاءِ، هو أَمَّرَ نَفْسَه" فرفع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أُصبَعَيْه، وقال:"اللهمَّ هو سَيْفٌ مِن سُيوفِك فانصره"، وقال عبد الرحمن مرة:"فانتصر به" فيومئذ سُمي خالد سيف الله. ثم قال النبي صلى الله عليه وسلم:"انفِرُوا فأمدُّوا إخوانكم ولا يتخَلَّفَنَّ أحد" فنفر الناس في حرٍّ شديدٍ مشاةً وركبانًا.

حسن: رواه الإمام أحمد (22551) عن عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا الأسود بن شيبان، عن خالد بن شُمير فذكره.

وإسناده حسن لأجل خالد بن شُمير، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يَهِمْ.

وصحّحه ابن حبان (7048) من وجه آخر عن سليمان بن حرب، عن الأسود بن شيبان به مثله.

وأما ما رُوي عن حذيفة أنه قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن النعي فهو ضعيف. رواه الترمذي (986)،
وابن ماجه (1476) كلاهما من طريق حبيب بن سُليم العبسي، عن بلال بن يحيى العبسي، عن حذيفة بن اليمان قال: إذا متُّ فلا تُؤذنوا لي، إني أخاف أن يكون نعْيًا، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهى عن النعي.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (23270).

وفي رواية ابن ماجه: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم بأذُنيَّ هاتين ينهى عن النعي". قال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: في تحسينه وتصحيحه نظر، فإن بلال بن يحيى العبسي لم يسمع من حذيفة كما قال ابن معين، وروايته عن حذيفة بلاغات. قال ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (2/ 396):"والذي روي عن حذيفة -وجدته يقول- بلغني عن حذيفة".

وقال أبو الحسن القطان:"روي عن حذيفة أحاديث معنعنة، ليس في شيء منها ذكر سماع.

وحبيب بن سُليم العَبسي لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، وحيث لم يتابع فهو"ليّنُ الحديث".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن مسعود برفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إياكم والنعيَ فإن النعي، من عمل الجاهلية".

قال عبد الله:"النعي أذان للميت".

رواه الترمذي (984، 985) من وجهين من طريق عنبسة وسفيان الثوري كلاهما عن أبي حمزة، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله رفعه في رواية عنبسة، ولم يرفعه في رواية الثوري.

قال الترمذي:"وهذا أصح من حديث عنبسة عن أبي حمزة. وأبو حمزة هو ميمون الأعور. وليس هو بالقوي عند أهل الحديث، وقال: حديث عبد الله حسن غريب". انتهى.

وفي قوله:"حسن" نظر، لأنه لم يرو إلَّا من طريق أبي حمزة. وقد اتفق جمهور أهل العلم على تضعيفه.

والمنع من نعي الجاهلية هو أن يُنادَي على المنائر والأسواق بأن فلانًا قد مات، فاحضروا جنازته، ويدفع الأجرة على هذا، وقد يمدح السائحُ الميتَ بما قد يعلم أنه ليس كذلك لأجل الأُجرة. فهذا محرم قطعًا، أما إعلام الأقارب والأصدقاء فلا بأس به، بل هو مشروع لحضور جنازته والدّعاء له بالمغفرة.




আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমীরদের (সেনাপতিদের) একটি সৈন্যদল প্রেরণ করলেন এবং বললেন: "তোমাদের দায়িত্বে থাকবে যায়দ ইবন হারিসাহ। যদি যায়দ আক্রান্ত হয় (শহীদ হয়), তবে জাফর (সেনাপতি হবে)। যদি জাফর আক্রান্ত হয় (শহীদ হয়), তবে আবদুল্লাহ ইবন রাওয়াহাহ আনসারী (সেনাপতি হবে)।"

তখন জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্রুত উঠে দাঁড়ালেন এবং বললেন: আমার পিতা ও মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোন, হে আল্লাহর নবী! আমি এই ভয় করিনি যে আপনি আমার উপর যায়দকে সেনাপতি নিযুক্ত করবেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা যাও, কারণ তুমি জানো না যে এর মধ্যে কোনটি কল্যাণকর।"

তিনি বললেন: এরপর সেনাবাহিনী চলে গেল এবং আল্লাহ যা চাইলেন, তত দিন তারা সেখানে থাকল। তারপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং ঘোষণা দেওয়ার নির্দেশ দিলেন: "আস-সালাতু জামিআহ" (নামাযের জন্য সকলে সমবেত হও)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "(নতুন) সংবাদ এসেছে – অথবা (অন্য বর্ণনায়) সংবাদ ফিরে এসেছে – (বর্ণনাকারী আবদুর রহমানের সন্দেহ)। আমি কি তোমাদেরকে তোমাদের এই গাজীর (যোদ্ধা) সেনাবাহিনী সম্পর্কে খবর দেব না? তারা যাত্রা করেছে এবং শত্রুদের সম্মুখীন হয়েছে। অতঃপর যায়দ শহীদ হয়েছে। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো।" তখন লোকেরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করল। "এরপর জাফর ইবন আবী তালিব পতাকা গ্রহণ করল এবং সে শত্রুদের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল, শেষ পর্যন্ত সেও শহীদ হলো। আমি তার জন্য শাহাদাতের সাক্ষ্য দিচ্ছি। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো।" এরপর আবদুল্লাহ ইবন রাওয়াহাহ পতাকা গ্রহণ করল এবং সে দৃঢ়তার সাথে দাঁড়িয়ে থাকল, অবশেষে সেও শহীদ হলো। সুতরাং তোমরা তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো। "এরপর খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ পতাকা গ্রহণ করল, অথচ সে আমীরদের (মনোনীত সেনাপতিদের) অন্তর্ভুক্ত ছিল না। সে নিজেই নিজেকে সেনাপতি নিযুক্ত করল।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু'টি আঙুল উপরে তুললেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! সে তোমার তরবারিগুলোর মধ্যে একটি তরবারি। সুতরাং তুমি তাকে সাহায্য করো।" আর (বর্ণনাকারী) আবদুর রহমান একবার বললেন: "তুমি তাকে দিয়ে বিজয় দান করো।" সেই দিন থেকেই খালিদকে 'সাইফুল্লাহ' (আল্লাহর তরবারি) নামে ডাকা হয়।

এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা (যুদ্ধের জন্য) বেরিয়ে পড়ো এবং তোমাদের ভাইদেরকে সাহায্য করো। কেউ যেন পিছনে না থাকে।" অতঃপর প্রচণ্ড গরমের মধ্যে লোকেরা পদব্রজে এবং আরোহী হয়ে (যুদ্ধের উদ্দেশ্যে) বেরিয়ে পড়ল।









আল-জামি` আল-কামিল (3426)


3426 - عن سعد بن أبي وقاص قال: جاءني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يعودني عام حجة الوداع، من وجع اشتد بي، فقلتُ: يا رسولَ الله، قد بلغ بي من الوجع ما تَرَى، وأنا ذُو
مالٍ، ولا يرثني إلَّا ابنة لي، أفأَتَصدَّقُ بثُلُثَي مَالِي؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا" فقلت: فالشَّطْرُ؟ قال:"لا" ثم قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"الثُّلُثُ، والثلث كثير، إنك أنْ تَذر ورثتك أغنياء خير من أن تذرَهم عالة يتكفَّفُون الناس، وإنك لن تُنفِقَ نفقَة تبتغي بها وجه الله، إلَّا أُجرتَ، حتى ما تجعل في فِي امرأتِكَ" قال: فقلتُ: يا رسول الله! أُخَلَّفُ بعد أصحابي؟ فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّكَ لَنْ تُخَلَّفَ، فَتَعملَ عملًا صالِحًا، إلَّا ازْدَدْتَ به درجةً ورِفْعَةً. ثُم لعلك أن تُخَلَّفَ حتى ينتفِعَ بك أقوامٌ ويُضَرَّ بك آخرُون. اللَّهمَّ! أَمْضِ لأصحابي هِجْرَتَهُم، ولا تردهم على أعقابهم، لكن البائسُ سعد بن خولة"، يَرْثِي له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أنْ ماتَ بمَكَّة.

متفق عليه: رواه مالك في الوصية (4) عن ابن شهاب، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه أنَّه قال: فذكر الحديث.

ورواه البخاري في الجنائز (1295) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به مثله.

ورواه مسلم في الوصية (1628) من طرق عن ابن شهاب بإسناده مثله.

وقوله:"لكن البائسُ سعد بن خولة" البائس: اسم فاعل من بئس يبأس إذا أصابه بؤس، وهو الضرر، وسعد بن خولة هو: زوج سبعة الأسلمية، وهو رجل من بني عامر بن لؤي، أنَّه هاجر إلى المدينة وشهد بدرًا وغيرها ثم رجع إلى مكة مختارًا، وتوفي بها في حجة الوداع، فرثى له النبي صلى الله عليه وسلم. فتحرَّج سعد بن أبي وقاص والمهاجرون من أن يموتوا بمكة.

وأما قوله:"يرثي له رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أن مات بمكة" فقيل: إنه من كلام سعد بن أبي وقاص، وقيل: إنه من كلام الزهري وعليه أكثر الناس.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বিদায় হজ্জের বছর আমার কঠিন অসুস্থতার সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে এসেছিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি দেখতেই পাচ্ছেন, আমার অসুস্থতা কত গুরুতর হয়েছে। আর আমি একজন সম্পদশালী ব্যক্তি, আমার একজন মাত্র কন্যা ছাড়া অন্য কেউ আমার ওয়ারিশ নেই। আমি কি আমার সম্পদের দুই-তৃতীয়াংশ সাদাকা করে দেব? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "না।" আমি বললাম, তবে কি অর্ধেক? তিনি বললেন, "না।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এক-তৃতীয়াংশ। আর এক-তৃতীয়াংশই অনেক। তুমি যদি তোমার উত্তরাধিকারীদেরকে সচ্ছল অবস্থায় রেখে যাও, সেটাই মানুষের কাছে হাত পেতে বেড়ানো নিঃস্ব অবস্থায় রেখে যাওয়ার চেয়ে উত্তম। আর আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে তুমি যা কিছুই ব্যয় করবে, তার প্রতিদান তুমি অবশ্যই পাবে—এমনকি তোমার স্ত্রীর মুখে তুমি যে লোকমা তুলে দাও, তার জন্যও।"

তিনি (সা'দ) বললেন, আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি আমার সাথীদের পরে (মক্কায়) থেকে যাব? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই তুমি যদি পেছনে থেকে যাও এবং কোনো ভালো কাজ করো, তাহলে এর মাধ্যমে তোমার মর্যাদা ও উচ্চতা বৃদ্ধি পাবে। হয়তো তুমি পেছনে থেকে যাবে, ফলে একদল লোক তোমার দ্বারা উপকৃত হবে এবং অন্যরা তোমার দ্বারা ক্ষতিগ্রস্ত হবে। হে আল্লাহ! আমার সাহাবীদের হিজরতকে স্থায়ী করে দাও, আর তাদের উল্টো দিকে ফিরিয়ে দিও না। কিন্তু সা'দ ইবনু খাওলা বড়ই দুর্ভাগা।" (সা'দ ইবনু খাওলা মক্কায় মৃত্যুবরণ করায়) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জন্য আক্ষেপ করছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3427)


3427 - عن عبد الله بن جعفر أن النبي صلى الله عليه وسلم أمهل آل جعفر ثلاثًا أن يأتيهم، ثم أتاهم فقال:"لا تبكوا على أخي بعد اليوم" ثم قال:"ادعوا لي بني أخي" فجئ بنا كأنَّا أفْرخ، فقال:"ادعو لي الحلاق" فأمره فحلق رؤوسنا.

وزاد أحمد في روايته: ثم قال:"أما محمد فشبيه عمنا أبي طالب، وأما عبد الله فشبيه خَلقي وخُلقي" ثم أخذ بيدي فأشالها فقال:"اللَّهم! اخلُف جعفرًا في أهله، وبارك لعبد الله في صفْقَة يمينه" قالها ثلاث مرات. قال: فجاءت أمنا، فذكرت له يُتْمنا، وجعلتْ تُفْرِح له، فقال:"العيلة تخافين عليهم، وأنا وَلِيُّهم في الدّنيا والآخرة".

صحيح: رواه أبو داود (4192)، والنسائي (5227) كلاهما من حديث وهب بن جرير، قال:
حدثنا أبي، قال: سمعتُ محمد بن أبي يعقوب، يحدث عن الحسن بن سعد، عن عبد الله بن جعفر فذكر الحديث مختصرًا.

ورواه الإمام أحمد (1750) عن وهب بن جرير بإسناده بأتم منه كما ذكرت بعضه، والبعض الآخر في المواضع المناسبة، وإسناده صحيح. وأخرجه الحاكم (3/ 298) قطعةً منه وقال:"صحيح الإسناد".

تنبيه: سقط من النسائي"الحسن بن سعد" وهو ثابت في السنن الكبرى له (9295) فتنبه.

وقوله:"فحلق رؤوسنا" لأن أمهم شغلت بالمصيبة عن ترجيل شعورهم وغسل رؤوسهم، فخاف عليهم الوسخ والقمل، كما أفاده السيوطي.




আব্দুল্লাহ ইবনে জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জা'ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবারের কাছে আসার জন্য তাদের তিন দিন সময় দিলেন। অতঃপর তিনি তাদের কাছে এসে বললেন: "আজকের পর আমার ভাইয়ের জন্য আর কান্নাকাটি করো না।" এরপর তিনি বললেন: "আমার ভাইয়ের সন্তানদেরকে আমার কাছে ডেকে আনো।" তখন আমাদেরকে আনা হলো, আমরা যেন ছিলাম ছোট পাখির ছানা। তিনি বললেন: "আমার জন্য নাপিতকে ডাকো।" অতঃপর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন এবং সে আমাদের মাথা মুণ্ডন করে দিল।

ইমাম আহমাদ তাঁর বর্ণনায় যোগ করেছেন: এরপর তিনি বললেন: "মুহাম্মাদ আমাদের চাচা আবূ ত্বালিবের মতো দেখতে, আর আব্দুল্লাহ তার শারীরিক গঠন ও চরিত্রে আমার অনুরূপ।" এরপর তিনি আমার হাত ধরে তুলে ধরলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! জা'ফরের অনুপস্থিতিতে তার পরিবারে তুমিই তার স্থলাভিষিক্ত হও, এবং আব্দুল্লাহর ডান হাতের লেনদেনে বরকত দাও।" তিনি এই কথা তিনবার বললেন।

তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে জা'ফর) বললেন: তখন আমাদের মা এলেন এবং তাঁর কাছে আমাদের ইয়াতিম হওয়ার কথা উল্লেখ করলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চিন্তিত করতে লাগলেন। তিনি (নবী) বললেন: "তুমি কি তাদের দারিদ্র্যের ভয় করছো? আমিই তো দুনিয়া ও আখিরাতে তাদের অভিভাবক।"









আল-জামি` আল-কামিল (3428)


3428 - عن قرة المزني، قال: كان نبي الله صلى الله عليه وسلم إذا جلس يجلسُ إليه نفرٌ من أصحابه، وفيهم رجل له ابنٌ صغير يأتيه من خلف ظهره فيقعده بين يديه، فهلك فامتنع الرجلُ أن يحضر الحلْقة لذكر ابنه، فحزن عليه ففقده النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"ما لي لا أري فلانًا؟" قالوا: يا رسول الله! بُنَيّه الذي رأيْتهُ هلك، فلقيه النبي صلى الله عليه وسلم فسأله عن بُنيه فأخبره أنَّه هلك فعزّاه عليه ثم قال:"يا فلان! أَيُّما كان أَحَبُّ إليك أن تمَتَّع به عمرك، أو لا تأتي غدًا إلى باب من أبواب الجنة إلا وجَدْته قد سبقك إليه يفتحه لك؟" قال: يا نبي الله! بل يسبقني إلى باب الجنة فيفتَحُها لي لهو أحبُّ إليَّ، قال:"فذاك لك".

صحيح: رواه النسائي (2088) عن هارون بن زيد -وهو ابن أبي الزرقاء- قال: حدثنا أبي، قال: حدثنا خالد بن ميسرة، قال: سمعتُ معاوية بن قرة، عن أبيه فذكر الحديث.

ورواه الإمام أحمد (15595، 20365) من وجه آخر عن شعبة، عن معاوية بن قرة بإسناده وزاد في آخر الحديث: فقال رجل: يا رسول الله! أَلَهُ خاصة أو لكلنا؟ قال:"بل لكلكم".

وإسناده صحيح، وقد صحَّحه ابن حبان (2947)، والحاكم (1/ 384).

وفي الباب ما رُوي عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قبرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم -يعني ميتًا- فلما فرغنا انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم وانصرفنا معه، فلما حاذى بابه وقف، فإذا نحن بامرأة مقبلة، قال: أظنه عرفها، فلما ذهبت إذا هي فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما أخرجك من بيتك يا فاطمة؟" قالت: أتيت أهل هذا البيت، فترحمتُ عليهم، وعزيتُهم لميتهم. فقال:"لعلك بلغتِ معهم الكُدي" قالت: معاذ الله أن أكون بلغتُها، وقد سمعتك تذكر في ذلك ما تذكر. فقال:"لو بلغتها معهم ما رأيتِ الجنة، حتى يراها جدُّ أبيكِ".

رواه أبو داود (3123)، والنسائي (1880) كلاهما من طريق ربيعة بن سيف المعافري، عن أبي
عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره، واللفظ للنسائي، ولفظ أبي داود نحوه.

قال النسائي:"ربيعة ضعيف".

قلت: وهو كما قال: قال فيه البخاري:"عنده مناكير"، وقال فيه الحافظ:"صدوق له مناكير".

وكذلك ما رُوي عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، يحدث عن أبيه، عن جده مرفوعًا:"ما من مؤمن يُعَزِّي أخاه بمصيبة إلا كساه الله سبحانه وتعالى من حلل الكرامة يوم القيامة" فهو ضعيف أيضًا.

رواه ابن ماجه (1601) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا خالد بن مخلد، قال: حدثني قيس أبو عُمارة مولى الأنصار، قال: سمعتُ عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم فذكره.

ورواه عبد بن حميد في"المنتخب" (287) عن خالد بن مخلد البجلي بإستاده مثله.

وقيس أبو عمارة الفارسي مولي سودة بنت سعيد المديني، قال فيه البخاري:"فيه نظر".

وأورده العقيلي في"الضعفاء الكبير" (1524) وساق له حديثين آخرين وقال:"لا يتابع عليهما جميعًا" وبه أعلّه البوصيري في زوائد ابن ماجه. وأما ابن حبان فأورده في"الثقات".

وليَّن فيه الحافظ القول فقال:"فيه لين" والحق أنه ضعيف.

والعلة الأخرى: أن فيه إرسالًا، فإن عبد الله بن أبي بكر -جده محمد بن عمرو بن حزم أبو عبد الملك المدني- له رؤية وليس له سماع، قتل يوم الحرة سنة ثلاث وستين.

قال الحافظ في"النكت الظراف" (8/ 148):"هذا الحديث من رواية محمد بن عمرو بن حزم، فإن في الإسناد عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن أبيه، عن جده -فجده هو"محمد" وله رؤية، والحديث مرسل، نقلت ذلك من خط ابن عبد الهادي".

وكذلك ما رُوي عن أنس مرفوعًا:"من عَزَّى أخاه المؤمن من مصيبة كساه الله حلة يُحْبَر بها" قيل: يا رسول الله وما يُحبر بها؟ قال:"يُغْبَطُ بها يوم القيامة".

رواه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1572).

قال: كتب إلي مكحول، ثنا عبد الله بن هارون، حدثني قدامة بن محمد بن خشرم، حدثني أبي، عن بكير بن عبد الله بن الأشج، عن ابن شهاب، عن أنس فذكره.

قال الشيخ: هذا الحديث بهذا الإسناد ليس له أصل. وقال أيضًا بعد أن ذكر حديثين آخرين:"لم أر لعبد الله بن هارون الفروي أنكر من هذه الأحاديث التي ذكرتها" وأورده ابن حبان في"المجروحين" (885) في ترجمة قدامة بن محمد بن خشرم الخشرمي، عن أبيه بإسناده كما سبق وقال:"لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد".

وقدامة بن محمد هذا ذكره ابن عدي في"الكامل"، وابن الجَوْزي في"الضعفاء والمتروكين" (2763).
ورواه ابن أبي شيبة (3/ 260) عن وكيع، عن أبي مودود، عن طلحة بن عبيدالله بن كريز فذكره. وهذا موقوف عليه، فإن طلحة بن عبيدالله بن كريز تابعي.

وكذلك لا يصح ما رواه الترمذي (1076) عن محمد بن حاتم المؤدِّب، حدثنا يونس بن محمد، قال: حدثتنا أم الأسود، عن منْية بنت عبيد بن أبي برزة، عن جدها أبي برزة مرفوعًا:"من عزَّي ثكلي كُسِي بردًا في الجنة".

قال الترمذي:"حديث غريب، وليس إسناده بالقوي".

قلت: وهو كما قال، فإن في الإسناد مُنية بنت عبيد لا يعرف حالها.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن مسعود مرفوعًا:"من عزَّي مصابًا فله مثلُ أجره".

رواه الترمذي (1073)، وابن ماجه (1602) كلاهما من طريق علي بن عاصم قال: حدثنا والله محمد بن سوقة، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عبد الله فذكر الحديث.

قال الترمذي:"حديث غريب لا نعرفه مرفوعًا إلا من حديث علي بن عاصم، وروى بعضهم عن محمد بن سوقة بهذا الإسناد مثله موقوفًا ولم يرفعه، ويقال: أكثر ما ابتلي به علي بن عاصم بهذا الحديث نقموا عليه".

وأخرجه البيهقي (4/ 59) من هذا الوجه وقال:"تفرد به علي بن عاصم، وهو أحد ما أنكر عليه، وقد رُوي عن غيره، والله أعلم".

وأدخله ابن الجَوْزي في"الموضوعات" (3/ 223).

وقال الخطيب في تاريخه (11/ 450 - 454):"ومما أنكره الناس على علي بن عاصم -وكان أكثر كلامهم فيه- بسبه حديث محمد بن سوقة ثم ساق الحديث بأسانيد مختلفة وتقل عن يعقوب بأنه: حديث كوفي منكر، يرون أنه لا أصل له مسندًا ولا موقوفًا …

قال الخطيب:"وقد روى حديث ابن سوقة عبدُ الحكيم بن منصور مثل ما رواه علي بن عاصم، رُوي كذلك عن سفيان الثوري وشعبة وإسرائيل ومحمد بن الفضل بن عطية وعبد الرحمن بن مالك ابن مغول والحارث بن عمران الجعفري، كلهم عن أبن سوقة، وقد ذكرنا أحاديثهم في مجموعنا لحديث محمد بن سوقة، وليس شيء منها ثابتًا". انتهي.

وقال الحافظ في"التلخيص" (2/ 138) بعد أن نقل كلام الخطيب:"ويُحكي عن أبي داود أنه قال: عاتب يحيى بن سعيد القطان علي بن عاصم في وصل هذا الحديث، وإنما هو عندهم منقطع، وقال له: إن أصحابك الذين سمعوه معك لا يسندونه، فأبى أن يرجع".

ثم قال الحافظ:"وله شاهد أضعف منه من طريق محمد بن عبيدالله العرزمي، عن أبي الزبير، عن جابر ساقها ابن الجَوْزي في الموضوعات".

قلت: وهو كما قال، فإن العرزمي متروك، فلا يستشهد به.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن القاسم بن عبد الله بن عمر، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جده، قال: لما توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم، وجاءت التعزية سمعوا قائلًا يقول:"إن في الله عزاءً من كل مصيبة، وخلفًا من كل هالك، ودركًا من كل ما فات، فبالله فثِقُوا، وإياه فارجوا، فإن المصاب من حرم الثواب"، قال البيهقي (4/ 60):"وقد رُوي معناه من وجه آخر عن جعفر، عن أبيه، عن جابر، ومن وجه آخر عن أنس بن مالك. وفي أسانيده ضعف". انتهي.

وقال الذهبي في"مهذب السنن الكبري" (3/ 1404): هذا مرسل، والقاسم كذَّبه أحمد بن حنبل، ثم ذكر كلام البيهقي.

وقوله: رُوي عن أنس بن مالك، قلت: رواه الطبراني في"الأوسط" (8120) عن أنس قال: لما قبض رسول الله صلى الله عليه وسلم قعد أصحابه حزان يبكون حوله، فجاء رجل طويل صبيح فصيح في إزار ورداء، أشعر المنكبين والصدر، فتخطى أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أخذ بعضادي الباب، فبكي على رسول الله صلى الله عليه وسلم ساعة ثم قال:"إن في الله عزاءً من كل مصيبة، وخلفًا من كل هالك، وعوضًا من كل ما فات، فإلى الله فأنيبوا، وإليه فارغبوا، فإنما المصاب من لم يجبره الثواب" فقال القوم تعرفون الرجل، فنظروا يمينًا وشمالًا فلم يروا أحدًا، فقال أبو بكر: هذا الخضر أخو النبي صلى الله عليه وسلم.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 3):"رواه الطبراني في"الأوسط" وفيه عباد بن عبد الصمد أبو معمر ضعَّفه البخاري".

وقال ابن حبان:"منكر الحديث جدًّا، يروي عن أنس بن مالك ما ليس من حديثه، وما أُراه سمع منه شيئًا، فلا يجوز الاحتجاج به فيما وافق الثقات، فكيف إذا انفرد بالأوابد والطامات""المجروحين" (791).

وكذلك لا يثبت ما رُوي عن زرارة بن أبي أوفى قال: عزى النبي صلى الله عليه وسلم رجلًا على ولده فقال:"آجرك الله، وأعظم لك الأجر" وزرارة بن أبي أوفي تابعي، لم تثبت صحبته.

وكذلك ما رُوي عن حسين بن أبي عائشة، عن أبي خالد -يعني الوالبي، أن النبي صلى الله عليه وسلم عزَّي رجلًا فقال:"يرحَمك الله ويأجرك" رواه ابن أبي شيبة (3/ 260) والبيهقي (4/ 60) وقال: هذا مرسل.

قلت: وأبو خالد الوالبي اسمه هرمز، جعله الحافظ في التقريب"مقبول" أي حيث يتابع، إلا أنه لم يتابع عليه فهو"لين الحديث" مع الإرسال فيه.

وابن أبي عائشة لم بوثقه أحد، غير أن ابن حبان ذكره في"الثقات" (2/ 59).

انظر للمزيد"باب التعزية" في"المنة الكبرى" (3/ 102 - 106).

وأما ما رُوي عن معاذ بن جبل أنه مات ابن له، فكتب إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم يعزيه بابنه:"بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ، من محمد رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى معاذ بن جبل، سلام عليك فإني أحمد إليك الله الذي لا إله إلا هو، أما بعد: فأعظم الله لك الأجر، وألهمك الصبر، ورزقنا وإياك الشكر، فإن
أنفسنا وأموالنا وأهلينا وأولادنا من مواهب الله الهنية، وعوارية المستودعة، متعك به في غبطة وسرور، وقبضه منك إلى أجر كثير، الصلاة والرحمة والهدى إن احتسبته، فاصبر ولا يحبط جزعك أجرك فتندم، واعلم أن الجزع لا يرد ميتًا، ولا يدفع حزنًا، وما هو نازل فكان قد، والسلام" فهو ضعيف جدًّا، بل موضوع.

رواه الطبراني في"الكبير" (20/ 155 - 156) عن أحمد بن يحيى بن خالد بن حيان الرقي، حدثنا عمرو بن بكر بن بكار القعنبي، ثنا مجاشع بن عمرو بن حسان الأسدي، ثنا الليث بن سعد، عن عاصم بن عمر بن قتادة، عن محمود بن لبيد، عن معاذ بن جبل فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 3) بعد أن عزاه أيضًا إلى"الأوسط": فيه مجاشع بن عمرو ضعيف.

قلت: بل هو متهم بالوضع، قال الذهبي: هذا من وضع مجاشع، معقبًا على الحاكم في"المستدرك" (3/ 273)، ورواه أبو نعيم في"الحلية" (1/ 243 - 244) عن الطبراني وقال:"ورُوي من حديث ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر نحوه. وكل هذه الروايات ضعيفة لا تثبت، فإن وفاة ابن معاذ كانت بعد وفاة النبي صلى الله عليه وسلم بسنين، وإنما كتب إليه بعض الصحابة، فوهم الراوي، فنسبها إلى النبي صلى الله عليه وسلم". انتهي.




কুররা আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসতেন, তখন তাঁর সাহাবীদের একটি দল তাঁর সাথে বসত। তাদের মধ্যে এমন একজন লোক ছিলেন, যার একটি ছোট ছেলে ছিল। সে তার পিঠের পেছন দিক থেকে আসত এবং নবীজীর সামনে তাঁর কোলে বসে যেত। এরপর ছেলেটি মারা গেল। তার ছেলের কথা স্মরণ করে লোকটি (নবীজীর) মজলিসে আসা থেকে বিরত থাকল। সে তার জন্য খুবই দুঃখিত ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে না দেখে তার খোঁজ নিলেন এবং বললেন: "আমি অমুককে দেখছি না কেন?" তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তার সেই ছোট ছেলেটি, যাকে আপনি দেখতেন, সে মারা গেছে। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে দেখা করলেন এবং তার ছেলে সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। লোকটি তাঁকে জানাল যে সে মারা গেছে। তখন তিনি তাকে সান্ত্বনা দিলেন। এরপর তিনি বললেন: "হে অমুক! তোমার কাছে কোনটি অধিক প্রিয়—তুমি তোমার সারা জীবন তাকে নিয়ে উপভোগ করবে, নাকি আগামীকাল তুমি জান্নাতের কোনো দরজায় যাবে আর দেখবে যে সে তোমার আগেই সেখানে গিয়েছে এবং তোমার জন্য দরজা খুলে দিচ্ছে?" লোকটি বলল: হে আল্লাহর নবী! বরং সে আমার আগে জান্নাতের দরজায় গিয়ে আমার জন্য তা খুলে দিক—এটাই আমার কাছে অধিক প্রিয়। তিনি বললেন: "তাহলে তাই তোমার জন্য রইল।"









আল-জামি` আল-কামিল (3429)


3429 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها كانت إذا مات الميِّت من أهلها فاجتمع لذلك النساء، ثم تفرَّقن إلا أهلها وخاصَّتها، أمَرَت ببُرمة من تَلبينةٍ فَطُبختْ، ثم صُنع ثريد فصُبت التلبينةُ عليها، ثم قالت: كُلن منها، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"التلبينة مُجِمَّةٌ لفؤاد المريض، تذهبُ ببعض الحزن".

متفق عليه: رواه البخاري في الأطعمة (5417)، ومسلم في السلام (2216)، كلاهما من طريق الليث بن سعد، حدثني عُقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.

قولها:"التلبينة": ويُقال: التَّلبين، وهو حساء يُعمل من دقيق أو نخالة، وربما جُعل فيها عسل، سُميت به تشبيهًا باللبن لبياضها، ورقَّتها.

قولها:"مجمَّة": أي مريحة، والجِمام -بكسر الجيم- الراحة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী ছিলেন, তিনি এমন ছিলেন যে, যখন তার পরিবারের কেউ মারা যেত এবং সে কারণে মহিলারা একত্রিত হতো, অতঃপর তারা যখন চলে যেত (বিচ্ছিন্ন হতো), তবে শুধু তার পরিবারের লোক ও ঘনিষ্ঠজনেরা ছাড়া, তখন তিনি এক হাঁড়ি তালবিনা (বার্লির তৈরি নরম খাবার) রান্না করার আদেশ করতেন। এরপর 'ছারীদ' (রুটি বা রুটির টুকরো দিয়ে তৈরি খাবার) তৈরি করা হতো এবং তার ওপর সেই তালবিনা ঢেলে দেওয়া হতো। এরপর তিনি বলতেন: তোমরা এটা থেকে খাও। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তালবিনা অসুস্থ ব্যক্তির হৃদয়ের জন্য আরামদায়ক এবং তা কিছু দুঃখ দূর করে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3430)


3430 - عن جرير بن عبد الله البجلي قال: كنا نرى الاجتماع إلى أهل الميت، وصنعة الطعام، من النياحة.

صحيح: رواه ابن ماجة (1612) والإمام أحمد في مسنده (6905) كلاهما من إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن جرير بن عبد الله البجلي قال: فذكر الحديث. وإسناده صحيح.
وقوله:"كنا نرى الاجتماع"، أي في عهد النبي صلى الله عليه وسلم، أو في عهد الصحابة.




জারীর ইবনে আবদুল্লাহ আল-বাজালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা মৃত ব্যক্তির পরিবারের কাছে একত্রিত হওয়া এবং (মৃতের পরিবারের জন্য) খাবার তৈরি করাকে উচ্চস্বরে ক্রন্দন (নিয়াফাহ)-এর অন্তর্ভুক্ত বলে মনে করতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3431)


3431 - عن أبي بن كعب أن رجلًا اعتزي بعزاء الجاهلية فأَعضَّه، ولم يكنه. فنظر القوم إليه فقال للقوم: إني قد أرى الذي في أنفسكم، إني لم أستطع إلا أن أقول هذا، إن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرنا:"إذا سمعتم من يعتزي بعزاء الجاهلية فأعِضُّوه ولا تكنوا".

وفي رواية: عن عُتي قال: رأيتُ رجلًا تعزَّى عند أُبيّ بعزاء الجاهلية، افتخر بأبيه، فأعضَّه بأبيه، ولم يكنه.

وفي رواية: قال أُبيّ: كنا نُؤمر إذا الرجل تعزي بعزاء الجاهلية فأعِضُّوه بِهَنِ أبيه، ولا تكنوا.

حسن: هذه الروايات كلها أخرجها الإمام أحمد (21233، 21234، 21236) من طرق، عن عوف، عن الحسن، عن عُتَيّ، عن أبي بن كعب، إلا الرواية الثانية فهي من طريق يونس، عن الحسن، وصحَّحه ابن حبان (3153) فأخرجه من طريق عوف بإسناده في فصل في النياحة وغيرها.

ورواه أيضًا النسائي في"اليوم والليلة" (976) من طريق عوف، ومن طرق أخرى أيضًا (974، 975) عن الحسن بإسناده وفي هذه الطرق:"فأعضوه بِهَنِ أبيه ولا تكنوا".

وعُتُيّ -بضم أول مصغرا- ابن ضمرة التميمي السعدي البصري، وثَّقه العجلي، وذكره ابن حبان في الثقات، وقال ابن سعد: كان ثقة قليل الحديث.

وأما علي بن المديني فقال:"مجهول سمع من أبي بن كعب، لا نحفظها إلا من طريق الحسن، وحديثه يُشبه حديث أهل الصدق وإن كان لا يعرفه.

فهو في أكثر أحواله يكون صدوقًا، إلا أن الحافظ قال فيه:"ثقة".

والحسن هو الإمام البصري، وهو وإن كان مدلسًا وقد عنعن، إلا أن سماعه عن عُتي ثابت كما أكد بذلك كثير من أهل العلم، وعوف هو الأعرابي العبدي البصري ثقة، ورمي بالقدر، إلا أنه توبع.

وللحديث إسناد آخر رواه عبد الله بن أحمد في مسند أبيه (21218) عن محمد بن عمرو بن العباس الباهلي، حدثنا سفيان، عن عاصم، عن أبي عثمان، عن أُبيِّ أن رجلًا اعتزى فأعَضَّه أُبيٌّ بِهَنِ أبيه، فقالوا: ما كنت فحَّاشًا! فقال: إنا أمرنا بذلك.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن العباس الباهلي ترجمة الخطيب في"تاريخ بغداد" (4/ 213) الطبعة الجديدة، قال:"أخبرنا علي بن محمد بن الحسين الدقاق، قال: قرأنا على الحسين بن هارون، عن أبي العباس بن سعيد، قال: محمد بن عمرو بن العباس الباهلي سمعت عبد الرحمن بن يوسف يقول: كان ثقة" انتهي.
وترجمه أبو أحمد الحاكم في"الكني" (658).

قلت: وعبد الرحمن بن يوسف هو: ابن خراش المروزي البغدادي (ت- 283) ونقل الخطيب عن محمد بن إسحاق الثقفي أنه قال: مات محمد بن عمرو بن العباس الباهلي سنة تسع وأربعين ومائتين. قال البغوي: بالبصرة.

وقوله:"أعضَّه" أي قال له: اعضض ذكر أبيك.

وقوله:"الهنُ" الشَّيْءُ - كناية عن الشيء يستقبح ذكره. وهنا كناية عن ذَكر الرجل.

ومعنى قوله:"من تعزَّي" وفي رواية:"من اعتزى" أي من تعزَّي بعزاء الجاهلية، ولم يتعزَّ بعزاء الإسلام كقوله في المصيبة:"إنا لله وإنا إليه راجعون".

وهذا هو المعنى الذي فهمه ابن حبان والحافظ الهيثمي فذكرا الحديث في كتاب الجنائز. والمعنى المشهور للتَعَزِّي بعزاء الجاهلية -والانتماء والانتساب إلى القوم يقال: عزيتُ الشيء، وعزوته- إذا أسندته إلى أحد. والعزاءُ والعِزْوَةُ اسم لدعوى المستغيث، وهو أن يقول: يا لفلان، أو يا للأنصار، أو يا للمهاجرين. انظر"النهاية" (3/




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি জাহেলিয়াতের আহ্বান দ্বারা আহ্বান করল। তখন তিনি তাকে বললেন: তুমি তোমার বাবার [বিশেষ অঙ্গ] কামড় দাও, এবং তিনি সরাসরি উল্লেখ করতে কুণ্ঠাবোধ করেননি। তখন লোকেরা তাঁর দিকে তাকাল। তিনি লোকেদের বললেন: তোমাদের মনে কী রয়েছে, তা আমি দেখতে পাচ্ছি, কিন্তু আমি এটি না বলে থাকতে পারিনি। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আদেশ করেছেন: "তোমরা যখন কাউকে জাহেলিয়াতের আহ্বান দ্বারা আহ্বান করতে শুনবে, তখন তাকে তার বাবার [বিশেষ অঙ্গ] কামড় দিতে বলো, এবং তোমরা উপমা ব্যবহার করবে না।"

অন্য এক বর্ণনায় (উবাই বলেন): আমরা আদিষ্ট হতাম যে, যখন কোনো ব্যক্তি জাহেলিয়াতের আহ্বান দ্বারা আহ্বান করবে, তখন আমরা যেন তাকে তার বাবার [বিশেষ অঙ্গ] কামড় দিতে বলি, এবং যেন আমরা উপমা ব্যবহার না করি।









আল-জামি` আল-কামিল (3432)


3432 - عن أبي هريرة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا مات الإنسان انقطع عنه عمله إلا من ثلاثة: إلا من صدقة جارية، أو علم ينتفع به، أو ولد صالح يدعو له".

صحيح: رواه مسلم في الوصية (1631: 14) من طرق، عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন মানুষ মারা যায়, তার আমলসমূহ বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়, তিনটি ব্যতীত: সাদকায়ে জারিয়া (অবিচ্ছিন্ন দান), অথবা এমন ইলম (জ্ঞান) যা দ্বারা উপকৃত হওয়া যায়, অথবা নেক সন্তান যে তার জন্য দু‘আ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3433)


3433 - عن أبي قتادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير ما يخلّف الرجل من بعده ثلاثٌ: ولد صالح يدعو له، وصدقة تجري يبلغه أجرها، وعلمٌ يعمل به من بعده".

صحيح: رواه ابن ماجه (241)، وصححه ابن حبان (93) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي كريمة الحراني، قال: ثنا محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرّحيم، (هو خالد بن أبي يزيد بن سماك) قال: حدّثني زيد بن أبي أُنيسة، عن زيد بن أسلم، عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه، فذكره.

وإسناده صحيح. والكلام عليه مبسوط في كتاب العلم، باب أن العلم النافع لا ينقطع أجره.

والحديث يدل على أن الميت ينتفع بآثاره الصالحة التي خلّفها من صدقة جارية، أو علم نافع، أو ولد صالح يدعو له.

وأما ما ينتفع الميت بعمل غيره، فالصدقة عنه، والدعاء له، والحج والعمرة عنه، وقضاء الصيام، والدَّين عنه، والوفاء بالنذر عنه، وما يفعله أولاده الصالحون من الأعمال الصالحة.

هذه من جملة الأعمال التي جاءت النصوص الصحيحة والصريحة في انتفاع الميت بعمل غيره
-وهي مخرجة في مواضعها- وهي مما استثنى من قوله تعالى: {وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَى} [النجم: 39].

وأما انتفاعه بقراءة الفاتحة وغيرها من القرآن، وإهداء ثوابها له فهو مختلف فيه، والصحيح والراجح أنه لا ينتفع به.

قال سماحة الشيخ ابن باز رحمه الله:"ولو كان إهداء التلاوة مشروعًا لفعله السلف الصالح، والعبادة لا يجوز فيها القياس، لأنها توقيفية لا تثبت إلا بالنص من كلام الله عز وجل أو من سنة رسوله". اهـ.

وأما الصلاة والطواف وصيام التطوع وغيرها من الأعمال الصالحة فالصحيح أن ثوابها لا يصل إلى الميت بدون خلاف.




আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষ তার মৃত্যুর পর যে উত্তম জিনিসগুলো রেখে যায়, তা তিনটি: নেক সন্তান যে তার জন্য দু'আ করে, প্রবহমান সাদাকাহ (সাদাকাহ জারিয়াহ) যার সাওয়াব তার কাছে পৌঁছায় এবং এমন জ্ঞান যা তার মৃত্যুর পরেও কাজে লাগানো হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3434)


3434 - عن * *




৩৪৩৪ - থেকে **









আল-জামি` আল-কামিল (3435)


3435 - عن عائشة قالت: لما جاء النبيَّ صلى الله عليه وسلم قتلُ أبن حارثة وجعفر وابن رواحة جلس يعرف فيه الحزنُ، وأنا أنظر من صائِر الباب شَقِّ الباب، فأتاه رجل فقال: إن نساء جعفر -وذكر بكاءهُن- فأمره أن يَنْهاهُنَّ فذهب، ثم أتاه الثانية لم يُطِعْنَه، فقال:"انههن" فأتاه الثالثة، قال: والله! غلَبْنَنَا يا رسول الله! فزعمت أنه قال:"فَاحْثُ في أفواههن الترابَ" فقلت: أرغم الله أنفك، لم تفعل ما أمرك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ولم تترك رسول الله صلى الله عليه وسلم من العَناء.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1299)، ومسلم في الجنائز (935) كلاهما عن محمد ابن المثني، حدثنا عبد الوهاب، قال: سمعتُ يحيى بن سعيد، يقول: أخبرتني عمرة أنها سمعت عائشة تقول فذكرته.

وفي رواية عند مسلم من وجه آخر: وما تركت رسول الله صلى الله عليه وسلم من العِيِّ.

قوله:"فاحثُ في أفواههن من التراب" من حثا يحثو بمعني ارم في أفواههن التراب. والأمر بذلك مبالغة في إنكار البكاء، ومنعهن منه.

وقولها:"العِيِّ" أي التعب، وهو بمعنى العناء كما في اللفظ السابق.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ইব্‌ন হারিসা, জা‘ফর ও ইব্‌ন রাওয়াহার শাহাদাতের খবর এল, তিনি বসে পড়লেন এবং তাঁর চেহারায় দুঃখের ছাপ ফুটে উঠল। আমি দরজার ফাঁক দিয়ে তাকিয়ে দেখছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে বলল, জা‘ফরের স্ত্রীরা কাঁদছে—আর সে তাদের কান্নার কথা উল্লেখ করল। তিনি লোকটিকে তাদের নিষেধ করার জন্য নির্দেশ দিলে সে চলে গেল। এরপর লোকটি দ্বিতীয়বার আসল এবং বলল, তারা কথা মানেনি। তিনি বললেন, "তাদের নিষেধ করো।" লোকটি তৃতীয়বার আসল এবং বলল, আল্লাহর কসম! হে আল্লাহর রাসূল! তারা আমাদের কাবু করে ফেলেছে। তিনি (আয়েশা) ধারণা করেন, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তাদের মুখে মাটি নিক্ষেপ করো।" আমি (লোকটিকে) বললাম, আল্লাহ তোমার নাক ধূলিধূসরিত করুন! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাকে যা নির্দেশ দিয়েছেন, তুমি তা পালন করোনি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কষ্ট থেকেও মুক্তি দাওনি।









আল-জামি` আল-কামিল (3436)


3436 - عن أم عطية قالت: أخذ علينا النبي صلى الله عليه وسلم عند البيعة أن لا ننوحَ، فما وفتْ منا امرأة غير خمس نسوة: أم سُليم، وأم العلاء، وابنة أبي سبرة امرأة معاذ، وامرأتين، أو ابنة أبي سبرة، وامرأةُ معاذ، وامرأة أخرى.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1306)، ومسلم في الجنائز (936) كلاهما من طريق حماد بن زيد، حدثنا أيوب، عن محمد، عن أم عطية فذكرته.

قال القاضي عياض: ومعنى قولها: فما وفت منا امرأة غير خمس نسوة … لم يف ممن بايع معها على ذلك.

أي ليس المراد من قولها هذا أنه لم يترك النياحة من المسلمات غير خمس.




উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বায়'আতের সময় আমাদের কাছ থেকে এই অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে আমরা যেন (মৃতের জন্য) বিলাপ না করি। কিন্তু আমাদের মধ্যে পাঁচজন মহিলা ছাড়া অন্য কেউ সেই অঙ্গীকার পূরণ করেনি: উম্মে সুলাইম, উম্মুল আলা, মু'আযের স্ত্রী আবূ সাবরার কন্যা এবং আরও দুজন মহিলা। অথবা (তিনি বলেছিলেন), আবূ সাবরার কন্যা, মু'আযের স্ত্রী এবং আরেকজন মহিলা।









আল-জামি` আল-কামিল (3437)


3437 - عن أمِّ عطية قالت: بايعنا رسولَ الله فقرأ علينا: {أَنْ لَا يُشْرِكْنَ بِاللَّهِ شَيْئًا}
[الممتحنة: 12] ونهانا عن النياحة، فقبضتِ امرأة يدها فقالت: أسعدتْني فُلانة، فأريد أن أَجْزِيَها، فما قال لها النبي صلى الله عليه وسلم شيئًا، فانطلقتْ ورجعت فبايعتْ.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4892) عن أبي معمر، حدثنا عبد الوارث، حدثنا أيوب، عن حفصة بنت سيرين، عن أم عطية قالت فذكرت الحديث واللفظ للبخاري.

وزاد النسائي: لما أردت أن أبايع رسول الله صلى الله عليه وسلم قلت: يا رسول الله! إن امرأة أسعدتْني في الجاهلية، فأذهبُ فأُسعدُها، ثم أجيئك فأبايعك. قال:"اذهبي فأسعديها" قالت: فذهبتُ فساعدتُها، ثم جئتُ فبايعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم.

ورواه مسلم في الجنائز (936/ 33) من وجه آخر عن عاصم، عن حفصة بإسناده وهذا لفظه: عن أم عطية قالت: لما نزلت هذه الآية: {يُبَايِعْنَكَ عَلَى أَنْ لَا يُشْرِكْنَ بِاللَّهِ شَيْئًا وَلَا يَسْرِقْنَ وَلَا يَزْنِينَ وَلَا يَقْتُلْنَ أَوْلَادَهُنَّ وَلَا يَأْتِينَ بِبُهْتَانٍ يَفْتَرِينَهُ بَيْنَ أَيْدِيهِنَّ وَأَرْجُلِهِنَّ وَلَا يَعْصِينَكَ فِي مَعْرُوفٍ} [الممتحنة: 12] قالت: كان منه النياحة. قالت: فقلت: يا رسول الله! إلا آل فلانٍ، فإنهم كانوا أسعدوني في الجاهلية. فلا بد لي أن أُسْعِدهم. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إلا آل فلان".

وروت أم سلمة الأنصارية قالت: قالت امرأة من النسوة: ما هذا المعروف الذي لا ينبغي لنا أن نعصيك فيه؟ قال:"تَنُحْنَ" قلت: يا رسول الله: إن بني فلان قد أسعدوني على عمي، ولابد لي من قضائهن فأبى عليَّ. فأتيته مرارًا فأذن لي في قضائهن. فلم أُنْح بعد على آخائهن ولا غيره حتي الساعة، ولم يبق من النسوة امرأة إلا وقد ناحت غيري، رواه الترمذي (3307) عن عبد بن حُميد، حدثنا أبو نعيم، حدثنا يزيد بن عبد الله الشيباني، قال: سمعت شهر بن حوشب. قال: حدثتنا أم سلمة الأنصارية فذكرته.

قال الترمذي:"حسن، وفيه أم عطية رضي الله عنها، قال عبد بن حُميد: أم سلمة الأنصارية هي أسماء بنت يزيد بن السكن".

ورواه ابن ماجه (1579) من وجه آخر عن وكيع، عن يزيد بن عبد الله مولى الصهباء بإسناده مختصرًا.

قلت: فرجعت القصة إلى أم عطية. وفي الإسناد شهر بن حوشب مختلف فيه.

قوله:"إلا آل فلان" استشكله كثير من أهل العلم، لأن الناحة محرمة على رأي جمهور أهل العلم، فكيف يؤذن لأم عطية. ذكر القرطبي في"المفهم" عدة تأويلات ورجح أن يكون ذلك من جهة الإنكار، كما قال للمستأذن حين قال: أنا، فقال صلى الله عليه وسلم:"أنا أنا" منكرًا عليه. وقال: ويدل على صحة هذا التأويل ما زاد النسائي في حديث بمعنى حديث أم عطية فقال:"لا إسعاد في الإسلام" أي على نياحة انتهي.

ورجّح الحافظ بعد أن سرد أقاويل كثيرة بأن أقرب الأجوبة أنها كانت مباحة، ثم كرهت كراهة تنزيه، ثم التحريم."الفتح" (8/ 639). ومعنى الإسعاد قيام المرأة مع الأخرى في النياحة
تراسلها، وهو خاص بهذا المعنى، ولا يستعمل إلا في البكاء والمساعدة عليه. ويقال: إن أصل المساعدة وضع الرجل يده على ساعد الرجل صاحبه عند التعاون على ذلك. انظر"الفتح".




উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বাইয়াত গ্রহণ করেছিলাম। তিনি আমাদের সামনে এই আয়াত পাঠ করলেন: “যেন তারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরিক না করে...” [সূরা মুমতাহিনা: ১২] এবং তিনি আমাদের নুহাহ (বিলাপ করে ক্রন্দন) করতে নিষেধ করলেন। এক মহিলা তাঁর হাত গুটিয়ে নিলেন এবং বললেন: অমুক পরিবার জাহিলিয়াতের যুগে আমাকে (শোক প্রকাশে) সাহায্য করেছিল, আমি তাদের প্রতিদান দিতে চাই। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে কিছু বললেন না। অতঃপর সে মহিলা চলে গেলেন এবং ফিরে এসে বাইয়াত গ্রহণ করলেন।

[মুসলিম ও নাসাঈর অন্য বর্ণনায় এসেছে যে] উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: “তারা আপনার কাছে বাইয়াত গ্রহণ করে যে, তারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরিক করবে না, চুরি করবে না, ব্যভিচার করবে না, তাদের সন্তানদের হত্যা করবে না, মিথ্যা অপবাদ রটনা করবে না, যা তারা তাদের নিজেদের হাতে ও পায়ের মধ্যখানে সৃষ্টি করে এবং কোনো ভালো কাজে আপনাকে অমান্য করবে না।” [সূরা মুমতাহিনা: ১২] তিনি বলেন: এর মধ্যে নুহাহ (বিলাপ) করাও ছিল। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! অমুক পরিবার ব্যতীত? কারণ তারা জাহিলিয়াতের যুগে আমাকে সাহায্য করেছিল, তাই আমারও তাদের সাহায্য করা প্রয়োজন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “অমুক পরিবার ব্যতীত (তুমি তা করতে পারো)।”

[অন্য এক সাহাবীয়া, উম্মে সালামা আনসারীয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনায় আছে যে,] তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করেন: “হে আল্লাহর রাসূল! এই ভালো কাজ কোনটি, যা অমান্য করা আমাদের জন্য উচিত নয়?” তিনি বললেন: “তোমরা বিলাপ করবে না।” আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! বনী অমুকরা আমার চাচার জন্য আমাকে শোক প্রকাশের ক্ষেত্রে সাহায্য করেছিল, আমার জন্য তাদের প্রতিদান দেওয়া অপরিহার্য। প্রথমে তিনি প্রত্যাখ্যান করলেন। আমি বারবার তাঁর নিকট আসলাম, অবশেষে তিনি আমাকে তাদের প্রতিদান দেওয়ার অনুমতি দিলেন। এরপর থেকে আমি আর তাদের জন্য বা অন্য কারো জন্য বিলাপ করিনি। সেই মহিলাদের মধ্যে আর কেউ অবশিষ্ট থাকেনি, যারা আমার ব্যতীত বিলাপ করেনি।









আল-জামি` আল-কামিল (3438)


3438 - عن امرأة من المبايعات قالت: كان فيما أخذ علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم في المعروف الذي أخذ علينا:"أن لا نعصيه فيه، أن لا تخمش وجها، ولا ندعو ويلًا، ولا نشق جيبًا، وأن لا ننشر شَعرًا".

حسن: رواه أبو داود (3131) عن مسدد، حدثنا حُميد بن الأسود، حدثنا الحجاج عامل لعمر ابن عبد العزيز على الربذة، حدثني أَسيد بن أبي أُسيد، عن امرأة من المبايعات فذكرته.

وفي الإسناد حُميد بن الأسود، وشيخه الحجاج وهو ابن صفوان، وشيخه أَسيد بن أبي أُسيد لا يرتقون إلى درجة"ثقات" وإنما هم قريبون من درجة"صدوق" والمرأة المبايعة لعلها أم عطية، لأنها بايعت النبي صلى الله عليه وسلم على ذلك كما مضت قصتها.




বায়াত গ্রহণকারী মহিলাদের মধ্য থেকে একজন মহিলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কাছ থেকে যে সৎ কাজের ব্যাপারে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন, তার মধ্যে ছিল: যেন আমরা সে বিষয়ে তাঁর অবাধ্যতা না করি, যেন আমরা মুখমণ্ডলে আঁচড় না দিই, আর যেন আমরা দুর্গতি কামনা না করি, আর যেন জামার কলার না ছিঁড়ি এবং যেন চুল খুলে না দিই।









আল-জামি` আল-কামিল (3439)


3439 - عن أبي أمامة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لعن الخامشة وجهها، والشاقة جيهَا، والداعية بالويل والثُّبور.

صحيح: رواه ابن ماجه (1585) عن محمد بن جابر المحاربي، ومحمد بن كرامة، قالا: حدثنا أبو أسامة، عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن مكحول والقاسم، عن أبي أمامة فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، وصحَّحه أيضًا ابن حبان (3156) ورواه من وجه آخر عن أبي أسامة بإسناده مثله. وأبو أسامة هو: حماد بن أسامة القرشي.

وقال البوصيري في زوائد ابن ماجه:"هذا إسناد صحيح، محمد بن جابر وثَّقه محمد بن عبد الله الحضرمي، ومسلمة الأندلسي، والذهبي في الكاشف، وبقية رجال الإسناد ثقات على شرط مسلم …".

وأما ما روي عن عجوز من الأنصار كانت فيمن بايعن النبي صلى الله عليه وسلم قالت: أتيناه يومًا فأخذ علينا"أن لا يَنُحْنَ" قالت العجوز: يا رسول الله! إن ناسًا قد كانوا أسعدوني على مصيبةٍ أصابتني، وإنَّهم أصابتْهم مصيبة، وأنا أريد أن أُسعدَهم، ثم إنها أتتْه فبايعتْه وقالت: هو المعروف الذي قال الله عز وجل: {وَلَا يَعْصِينَكَ فِي مَعْرُوفٍ} [الممتحنة: 12] فهو ضعيف، رواه الإمام أحمد (16556) عن أبي سعيد، حدثنا عمر بن فرُّوخ، قال: حدثنا مصعب الأنصاري قال: أدركتُ عجوزًا كانت فيمن بايعن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.

ومصعب هو ابن نوح، ذكره الذهبي في"ديوان الضعفاء" (4139) ممن سمي بمصعب وهم أربعة: مصعب بن المثني، مصعب بن نوح، ومصعب بن خارجة، ومصعب الحميري قال: أربعتهم مجاهيل.

وترجم له الحافظ في"التعجيل" (1043) وذكر القصة وقال: روى عنه عمر بن فرُّوخ، قال أبو
حاتم:"مجهول". وذكره ابن حبان في الثقات"، قلت: لكنه ذكره في الطبقة الثالثة كان يروي المقاطيع، فكأنه عنده لم يسمع من الصحابية المذكورة". انتهى قول ابن حجر.

وأما قول الهيثمي في"المجمع" (3/ 15):"رواه أحمد ورجاله ثقات".

فهو اعتمادًا على توثيق ابن حبان.

والعجوز: هي أم عطية، وقصتها صحيحة من غير هذا الإسناد.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن معاذ بن جبل أن النبي صلى الله عليه وسلم لما بعثه إلى اليمن، خرج عليه السلام، ومعاذ راكب، ورسول الله صلى الله عليه وسلم يمشي إلى جنب راحلته فقال:"يا معاذ! إنك عسى أن لا تلقاني بعد عامي هذا فتمر بقبري ومسجدي" فبكي معاذ جشعًا لفراق رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"لا تبك يا معاذ! فإن البكاء من الشيطان".

رواه البزار"كشف الأستار" (804) عن العباس بن عبد الله، ثنا عبد القدوس بن الحجاج، ثنا صفوان بن عمرو، عن راشد بن سعد، عن معاذ بن جبل فذكره. وفيه انقطاع، فإن راشد بن سعد لم يلق معاذ بن جبل، وقد وصف بأنه كثير الإرسال، توفي عام (108 هـ) ولم يلق صغار الصحابة، فكيف بمعاذ بن جبل الذي توفي عام (18 هـ).




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সে নারীকে অভিশাপ দিয়েছেন, যে (শোকের সময়) তার মুখমণ্ডল আঁচড়ায়, তার জামার কলার ছিঁড়ে ফেলে এবং ধ্বংস ও দুর্ভোগের জন্য চিৎকার করে।









আল-জামি` আল-কামিল (3440)


3440 - عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس منا من ضرب الخدود، وشق الجيوب، ودعا بدعوى الجاهلية".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1298)، ومسلم في الإيمان (103) كلاهما من حديث الأعمش، عن عبد الله بن مرة، عن مسروق، عن عبد الله، فذكره.

وما رُوي عن أبي هريرة مثله ففيه عبد الله بن عبد القدوس وهو ضعيف ضعَّفه أبو داود، والنسائي وغيرهما، وتساهل فيه ابن حبان فذكره في"الثقات" (7/ 48).

ورواه الطبراني في"الأوسط" (2143) من طريقه، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث، قال الطبراني:"لم يرو عن الأعمش إلا عبد الله".

قلت: وعبد الله بن عبد القدوس ممن لا يحتمل تفرده وهو ضعيف، وقول الهيثمي في"المجمع" (3/ 15):"فيه عبد الله بن عبد القدوس، وفيه كلام وقد وُثِّق" فهو اعتمادًا على إدخاله ابن حبان في"الثقات".




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি (শোকে) গালে আঘাত করে, জামার কলার বা বুক ছিঁড়ে ফেলে এবং জাহেলিয়াতের যুগের রীতিনীতি অনুযায়ী চিৎকার করে (বিলাপ করে), সে আমাদের দলভুক্ত নয়।"