হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (341)


341 - عن ابن عباس قال: مرّ يهوديٌّ بالنبيّ صلى الله عليه وسلم فقال له النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"يا يهوديّ! حدّثنا". فقال: كيف تقول يا أبا القاسم إذا وضع اللَّه السماوات على ذِه، والأرضين على ذِه، والماء على ذِه، والجبال على ذِه، وسائر الخلق على ذِه".

وأشار أبو جعفر محمد بن الصّلت بخنصره أولًا، ثم تابع حتى بلغ الإبهام، فأنزل اللَّه: {وَمَا قَدَرُوا اللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِ} [سورة الزمر: 67]".

حسن: رواه الترمذيّ (3240) عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن، أخبرنا محمد بن الصّلتْ، حدثنا أبو كدينة، عن عطاء بن السائب، عن أبي الضُّحى، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (2267، 2988)، وابن أبي عاصم في السنة (545)، وابن خزيمة في كتاب التوحيد (129)، وابن منده في الرد على الجهمية (65) كلهم من طريق أبي كُدينة - واسمه يحيى بن المهلّب.

ورواه عبد اللَّه بن أحمد في السنة (493) من طريق عمران بن عيينة، وابن منده في الرد على الجهمية (66) من طريق حماد بن سلمة كلاهما من عطاء بن السائب، عن أبي الضّحى إِلَّا أنّ ابن منده أوقفه على مسروق، وهو لم يدرك النبيّ صلى الله عليه وسلم. قال الترمذي:"حسن غريب صحيح".

قلت: هو حسن فقط من أجل الاختلاف في عطاء بن السائب وقد اختلط بآخره، وكان حماد ابن سلمة قديم السماع منه إِلَّا أنه أرسله عن مسروق، فإذا ضمَّ إليه من وصله يتبين أن له أصلًا، وهو شاهد لما سبق، ولذا أخرجه ابن خزيمة في كتاب التوحيد كما سبق.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একবার এক ইহুদি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন, "হে ইহুদি! আমাদের কিছু বর্ণনা করো।"

সে বলল: হে আবুল কাসিম! আপনি কী মনে করেন, যখন আল্লাহ আকাশসমূহকে এর ওপর, জমিনসমূহকে এর ওপর, পানিকে এর ওপর, পাহাড়সমূহকে এর ওপর এবং অবশিষ্ট সৃষ্টিকে এর ওপর রাখবেন?

(বর্ণনাকারী) আবূ জা’ফর মুহাম্মাদ ইবনুস সল্ত প্রথমে তাঁর কনিষ্ঠা আঙুল দ্বারা ইশারা করলেন, অতঃপর এভাবে ইশারা করতে লাগলেন যে, তা বৃদ্ধাঙ্গুল পর্যন্ত পৌঁছাল।

অতঃপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "আর তারা আল্লাহকে যথার্থভাবে মূল্যায়ন (কদর) করতে পারেনি।" (সূরা যুমার: ৬৭)









আল-জামি` আল-কামিল (342)


342 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، قال: إنّه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ قلوب بني آدم كلَّها بين إصبعين من أصابع الرحمن، كقلبٍ واحد يصرفه حيث يشاء". ثم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اللَّهمَّ مصرّف القلوبَ صرِّف قلوبنا على طاعتك".

صحيح: رواه مسلم في القدر (2654) من طرق عن عبد اللَّه بن يزيد المقرئ، حدّثنا حَيَوَة، أخبرني أبو هانيء، أنه سمع أبا عبد الرحمن الحُبُليّ، أنه سمع عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয়ই তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয়ই আদম সন্তানের সকল অন্তর রহমানের (আল্লাহর) আঙ্গুলসমূহের দু'টি আঙ্গুলের মধ্যে একটি অন্তরের ন্যায়। তিনি তা যেভাবে ইচ্ছা সেভাবে পরিচালিত করেন।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! হে অন্তরসমূহের পরিবর্তনকারী! আমাদের অন্তরসমূহকে আপনার আনুগত্যের দিকে পরিচালিত করুন।"









আল-জামি` আল-কামিল (343)


343 - عن النّواس بن سَمْعان الكِلابيّ قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من قلب إِلَّا بين إصبعين من أصابع الرحمن، إن شاء أقامه وإن شاء أزاغه". وكان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يا مثبت القلوب ثبِّت قلوبنا على دينك". قال:"والميزان بيد
الرّحمن يرفع أقوامًا، ويخفض آخرين إلى يوم القيامة".

صحيح: روه ابن ماجه (199) عن هشام بن عمّار، قال: حدثنا صدقة بن خالد، قال: حدّثنا ابن جابر، قال: سمعت بُسْر بن عبد اللَّه يقول: سمعتُ أبا إدريس الخولانيّ يقول: حدثني النواس ابن سمعان، فذكره.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا ابن أبي عاصم في السنة (219).

وابن جابر هو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، وهشام بن عمار فيه ضعف يسير لأنه حين كبر صار يتلقّن إِلَّا أنه لم ينفرد به.

فقد رواه الإمام أحمد (17630) عن الوليد بن مسلم قال: سمعت -يعني- ابن جابر، يقول: حدثني بُسْر بن عبيد اللَّه الحضرميّ، بإسناده مثله.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا الدارقطنيّ في"الصفات" (43).

وصحّحه ابن خزيمة فأخرجه في كتاب التوحيد (132)، وابن منده في الرد على الجهمية (68) كلاهما من طريق الوليد بن مسلم، وابن حبان في صحيحه (943) من طريق عبد اللَّه بن المبارك، والحاكم (1/ 525) من طريق بشر بن بكر، كلهم عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، بإسناده مثله.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: الوليد بن مسلم مدلس إِلَّا أنه صرّح بالتحديث كما أنه ينفرد به بل تابعه عبد اللَّه بن المبارك وبشر بن بكر عن ابن جابر، به مثله.

وأما ابن مصفى فرواه عن أبي المغيرة، ثنا الوليد بن سليمان بن أبي السائب، ثنا بسر بن عبيد اللَّه، عن أبي إدريس الخولاني، عن نعيم بن همّار، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر نحوه).

فجعله من مسند نعيم بن همار، فلعلّ هذا الوهم يعود إلى ابن مصفى - واسمه محمد فإنه وصف"صدوق له أوهام" كما في التقريب.

ومن طريقه رواه ابن أبي عاصم في"السنة" (221).




নওয়াস ইবনু সাম'আন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো অন্তর নেই যা রহমানের (আল্লাহর দয়ালু সত্তার) দুই আঙ্গুলের মাঝখানে অবস্থিত নয়; তিনি চাইলে তাকে স্থির করে দেন এবং চাইলে বক্র করে দেন।" আর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "ইয়া মুছাব্বিতাল কুলূব! ছাব্বিত কুলূবানা 'আলা দীনিক" (হে অন্তরসমূহকে স্থিরকারী! আমাদের অন্তরকে আপনার দীনের উপর স্থির করে দিন)। তিনি (নওয়াস) আরও বলেন: "আর (আমলের) মিজান (পাল্লা) রহমানের হাতে; তিনি কিয়ামত পর্যন্ত কিছু লোককে উঁচু করেন এবং অন্যদের নিচু করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (344)


344 - عن أنس قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يُكثر أن يقول:"يا مقلّب القلوب ثبِّتْ قلبي على دينك". فقلت: يا نبي اللَّه، آمنَّا بك، وبما جئتَ به، فهل تخاف علينا؟ قال:"نعم، إنّ القلوبَ بين أصبعين من أصابع اللَّه يقلِّبها كيف يشاء".

حسن: رواه الترمذيّ (2140) عن هنَّاد، حدّثنا أبو معاوية، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن أنس، فذكر مثله.

وأبو معاوية هو محمد بن خازم الضرير ثقة أحفظ الناس لحديث الأعمش، وقد يهم في حديث غيره. كذا قال الحافظ في"التقريب".
ومن طريقه رواه الإمام أحمد (12107)، وابن أبي عاصم في السنة (225)، والحاكم (1/ 526)، وجعله شاهدًا صحيحًا لحديث النّواس بن سمعان، وأقرّ الذَّهبيُّ على تصحيحه.

قال الترمذيّ:"حسن".

قلت: وهو كما قال، فإن في الإسناد أبا سفيان وهو طلحة بن نافع الواسطيّ وهو وإن كان من رجال الجماعة إِلَّا أنه"صدوق" كما في التقريب.

وأما ما رواه ابن ماجه (3834) من وجه آخر عن الأعمش، عن يزيد الرّقاشيّ، عن أنس، فذكر مثله.

فإسناده ضعيف من أجل يزيد بن عبد اللَّه الرّقاشيّ.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রায়ই এই দোয়াটি পড়তেন: "হে অন্তরসমূহের পরিবর্তনকারী! আমার অন্তরকে আপনার দীনের (ধর্মের) ওপর দৃঢ় রাখুন।" আমি (আনাস) বললাম: হে আল্লাহর নবী! আমরা আপনার প্রতি এবং আপনি যা নিয়ে এসেছেন তার প্রতি ঈমান এনেছি, তবুও কি আপনি আমাদের জন্য ভয় করেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, নিশ্চয়ই অন্তরসমূহ আল্লাহর আঙুলসমূহের মধ্য থেকে দুটি আঙুলের মাঝে রয়েছে, তিনি যেভাবে ইচ্ছা তা পরিবর্তন করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (345)


345 - عن أمّ سلمة قالت: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يُكثر في دعائه أن يقول:"اللَّهمّ مقلّب القلوب، ثبِّتْ قلبي على دينك". قالت: قلت: يا رسول اللَّه، أَوَ إِنَّ القلوب لتقلّبُ؟ قال:"نعم، ما من خلق اللَّه من بني آدم من بشر إِلَّا أنّ قلبه بين أصبعين من أصابع اللَّه، فإن شاء اللَّه عز وجل أقامه، وإن شاء أزاغه، فنسأل اللَّه ربَّنا أن لا يُزيغ قلوبنا بعد إذ هدانا، ونسأله أن يهب لنا من لدُنْه رحمةً، إنّه هو الوهَّاب". قالت: قلت: يا رسول اللَّه، ألا تُعلّمني دعوةً أدعو بها لنفسي؟ قال:"بلى، قولي: اللَّهُمَّ ربّ النّبيّ محمد اغفرْ ذنبيّ، وأَذْهِبْ غيظ قلبيّ، وأجرني من مُضلّات الفتن ما أحييتنا".

حسن: رواه الإمام أحمد (26576)، والطبراني في الكبير (32/ 338)، وفي الدّعاء (1258) من طرق عن عبد الحميد قال: حدَّثني شهر بن حوشب، قال: سمعت أمَّ سلمة تحدّث أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يُكْثر في دُعائه أن يقول (فذكره).

صحّحه ابن خزيمة ورواه في كتاب التوحيد (133) من وجه آخر عن شهر بن حوشب، به، مثله.

وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب فإنه صدوق، إذا لم يخالف في الإسناد، ولم يأت في المتن ما ينكر عليه. وهذا الحديث له شواهد أجزائه.

وعبد الحميد هو ابن بهرام الفزاريّ صاحب شهر بن حوشب، قال فيه أبو حاتم وابن عدي: ليس به بأس، وذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 120).

وفي التقريب:"صدوق".




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দো'আয় এই কথাটি বেশি বেশি বলতেন: "হে আল্লাহ, হে অন্তরসমূহ পরিবর্তনকারী, আমার অন্তরকে তোমার দীনের উপর সুদৃঢ় রাখো।" তিনি বলেন, আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল, অন্তরসমূহ কি সত্যিই পরিবর্তন হয়?' তিনি বললেন: "হ্যাঁ। বনি আদমের সৃষ্টিকুলের কোনো মানুষই এমন নেই, যার অন্তর আল্লাহর আঙ্গুলসমূহের দু'টি আঙ্গুলের মধ্যে নেই। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লাহ যদি চান, তবে তিনি এটিকে সুদৃঢ় রাখেন, আর যদি চান, তবে তিনি এটিকে বিপথগামী করে দেন। অতএব আমরা আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করি—যিনি আমাদের রব—তিনি যেন আমাদেরকে হিদায়াত দানের পর আমাদের অন্তরকে বিপথগামী না করেন। আমরা তাঁর কাছে আরও প্রার্থনা করি যেন তিনি তাঁর পক্ষ থেকে আমাদের জন্য রহমত দান করেন। নিশ্চয়ই তিনি মহাদাতা (আল-ওয়াহহাব)।" তিনি (উম্মু সালামাহ) বলেন, আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল, আপনি কি আমাকে এমন কোনো দো'আ শিখিয়ে দেবেন না যা আমি নিজের জন্য করব?' তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তুমি বলো: 'হে আল্লাহ, হে নবী মুহাম্মাদের রব, আমার গুনাহ মাফ করো, আমার অন্তরের ক্রোধ দূর করে দাও, এবং যতক্ষণ তুমি আমাকে জীবিত রাখো, ততক্ষণ আমাকে পথভ্রষ্টকারী ফিতনাগুলো থেকে রক্ষা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (346)


346 - عن وعن سبرة بن فاكهة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"قلبُ ابن آدم بين أصبعين من أصابع الرحمن، إن شاء أن يقيمه أقامه، وإن شاء أن يُزيغه أزاغه".

حسن: رواه ابن أبي عاصم في السنة (220) عن هشام بن عمار، ثنا أبو مطيع معاوية بن يحيى الأطرابلسيّ، حدثنا محمد بن الوليد الزّبيديّ، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه، عن سبرة
ابن فاكهة، فذكره.

ورواه الطبرانيّ في"الكبير" (7/ 137 - 138)، والآجريّ في الشريعة (908) كلاهما من طريق هشام بن عمّار الدّمشقيّ بإسناده نحوه مختصرًا.

وإسناده حسن من أجل الكلام اليسير في أبي مطيع وهو معاوية بن يحيى غير أنه حسن الحديث، وكذلك شيخه هشام بن عمّار.

ولذا قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 211):"رواه الطبرانيّ ورجاله ثقات".




সিবরাহ ইবন ফাকিহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানের হৃদয় পরম করুণাময়ের (আল্লাহর) অঙ্গুলিসমূহের দুটি অঙ্গুলির মাঝে রয়েছে। তিনি চাইলে তাকে সোজা পথে প্রতিষ্ঠিত রাখেন, আর তিনি চাইলে তাকে বক্র করে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (347)


347 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّما قلب ابن آدم بين أصبعين من أصابع الرّحمن".

حسن: رواه ابن أبي عاصم في السنة (229) عن عمر بن الخطّاب، ثنا أبو صالح، ثنا اللّيث، ثنا يحيى بن سعيد، عن خالد بن أبي عمران، حدثني أبو عياش، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي عياش هو ابن النعمان المعافري، روى عنه جمعٌ، ولم يُعرف فيه جرح، ولحديثه أصول ثابتة، وفات ابن حبان ذكرُه في ثقاته لأنه على شرطه.

وفي الباب عن عائشة قالت: إنّ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يُكثر أن يقول:"يا مقلّب القلوب ثَبِّتْ قلبي على دينك وطاعتك" فقيل له: يا رسول اللَّه، إنّك تكثر أن تقول: يا مقلّب القلوب ثَبِّتْ قلبي على دينك وطاعتك؟ قال:"وما يُؤْمِنّي، وإنَّما قلوب العباد بين أصبعي الرحمن، إنه إذا أراد أن يُقلّب قلْبَ عبد قلَّبه".

رواه الإمام أحمد (26133)، وأبو يعلى (4669)، والطبراني في الدعاء (1259)، وابن أبي عاصم في السنة (224، 233) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة، قال: حدثنا علي بن زيد، عن أمّ محمد، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده ضعيف من أجل عليّ بن زيد وهو ابن جدعان فقد اتفق أهل العلم على تضعيفه.

وأمّ محمد لم يرو عنها إِلَّا علي بن زيد ولم يوثقها غير ابن حبان في"مجهولة".

وقد رُوي الحديث من وجه آخر عن الحسن، عن عائشة. رواه الإمام أحمد (24604)، والحسن مدلّس ولم يثبت سماعه من عائشة.

وفي الباب أيضًا عن أبي ذر في حديث طويل، رواه ابن خزيمة في كتاب التوحيد (134)، وفيه شرحبيل بن الحكم وشيخه عمر بن نائل وهما ضعيفان، ولذا قال ابن خزيمة:"أنا أبرأ من عهدة شرحبيل بن الحكم، وعامر بن نائل، وقد أغنانا اللَّه -فله الحمد كثيرًا- عن الاحتجاج في هذا الباب بأمثالهما".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানের অন্তর তো পরম দয়াময় (আল্লাহর) আঙ্গুলসমূহের দু'টি আঙ্গুলের মাঝখানে অবস্থিত।"









আল-জামি` আল-কামিল (348)


348 - عن أبي هريرة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يد اللَّه ملآى لا يَغِيظُها نفقةٌ سحَّاءُ الليل والنهارَ". وقال:"أرأيتُم ما أنفق منذ خلق السماوات والأرض، فإنه لم يَغِضْ ما في يده". وقال:"وكان عرشُه على الماء، وبيده الأخرى الميزان، يخفضُ ويرفع".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7411) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، حدثنا أبو الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

ورواه مسلم في الزّكاة (993) من وجهين عن سفيان بن عيينة، عن أبي الزّناد، عن أبي هريرة، وفيه:"قال اللَّه تبارك وتعالى: يا ابن آدم أَنْفق أُنْفق عليك". وقال:"يمين اللَّه ملآى سحاء لا يغيضها شيءٌ اللَّيل والنَّهار".

ومن طريق همَّام بن منبه، عن أبي هريرة، وفيه:"إنّ اللَّه قال لي: أَنفق أُنفق عليك". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يمين اللَّه ملآى لا يغيضها سحاء الليل والنهار، أرأيتم ما أنفق مُذ خلق السماء والأرض، فإنه لم يَغِضْ ما في يمينه". قال:"وعرشه على الماء، وبيده الأخرى القبض، يرفع ويخفض".

ومن هذا الطّريق رواه أيضًا البخاريّ (7419).

وقوله:"سحّاء" بالمدّ على وزن فعلاء.

قال النوويّ:"جاءت هذه اللفظة على وجهين: أحدهما"سحًّا" بالتنوين على المصدر وهو الأصح الأشهر. والثاني:"سحَّاء" بالمد".

قال ابن الأثير في"النهاية" أي دائمة الصّب والهطل بالعطاء، يقال: سحَّ يسُحُّ سَحًّا فهو ساحٌّ.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আল্লাহর হাত পরিপূর্ণ, দিন ও রাতের অবিরাম খরচও তা হ্রাস করে না।” তিনি আরও বললেন: “তোমরা কি দেখছ, আসমান ও যমিন সৃষ্টির পর থেকে তিনি যা কিছু খরচ করেছেন, তা তাঁর হাতের (ভান্ডার) এতটুকুও কমায়নি।” তিনি আরও বললেন: “আর তাঁর আরশ ছিল পানির উপরে, এবং তাঁর অন্য হাতে রয়েছে দাঁড়িপাল্লা (মিযান), তিনি (যাকে ইচ্ছা) নিচু করেন এবং উঁচু করেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (349)


349 - عن حكيم بن حزام، قال: سألت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من المال، فألْتحفُتُ، فقال:"يا حكيم ما أنكرَ مسألتَك! يا حكيم إنّ هذا المال خضرة حُلوة، وإنَّما هو مع ذلك أوساخ أيدي الناس، ويدُ اللَّه فوق يد المعطيّ، ويدُ المُعطِي فوق يد المعطَى، وأسفل الأيدي يد المعطَى".

صحيح: رواه الإمام أحمد (15321)، والطبراني في الكبير (3/ 216 - 217) كلاهما من حديث ابن أبي ذئب، عن مسلم بن جندب، عن حكيم بن حزام، فذكره، ولفظهما سواء.

وصحّحه ابن خزيمة، وأخرجه في كتاب التوحيد (103، 104)، والحاكم (3/ 484) كلاهما من هذا الوجه.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

وقال ابن خزيمة:"مسلم بن جندب قد سمع من ابن عمر غير شيء، وقال: أمرني ابن عمر أن أشتري له بدنة، فلست أنكر أن يكون قد سمع من حكيم بن حزام" انتهى.

وصحّح الحافظ إسناده في"الفتح" (3/ 293) بعد أن عزاه للطبراني وحده.

ثم إنّ مسلم بن جندب قد توبع، فقد رواه الطبرانيّ في الكبير (3/ 212) من وجه آخر عن فليح ابن سليمان، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، وعروة بن الزبر، عن حكيم بن حزام، فذكر مثله، وزاد في أول الحديث:"ما أنكر مسألتَك يا حكيم! إنّ هذا المال خضرة حلوة، وأنَّها أوساخ أيدي الناس فمن أخذها بسخاوة بورك له فيها، ومن أخذها بإشراف نفس لم يبارك له فيه، وكان كالآكل ولا يشبع". ثم ذكر:"يد اللَّه فوق يد المعطِي. . .".

وفيه فليح بن سليمان الخزاعيّ، أكثر أهل العلم على تضعيفه ولكن لا بأس به في المتابعات.




হাকীম ইবনে হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সম্পদ চাইলাম, আর তিনি আমাকে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: “হে হাকীম, তোমার চাওয়াটা অস্বাভাবিক কিছু নয়! হে হাকীম, নিঃসন্দেহে এই সম্পদ সবুজ ও মিষ্টি, কিন্তু এতদসত্ত্বেও এটা হলো মানুষের হাতের ময়লা (অবশিষ্ট)। আর আল্লাহর হাত দাতার হাতের ওপরে, আর দাতার হাত গ্রহণকারীর হাতের ওপরে, আর সবচেয়ে নিচে হলো গ্রহণকারীর হাত।”









আল-জামি` আল-কামিল (350)


350 - عن مالك بن نَضْلَة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الأيدي ثلاثة: فيد اللَّه العليا، ويد المعطي التي تليها، ويد السائل السفلى، فأعطِ الفضْل ولا تعجزْ عن نفسك".

صحيح: رواه أبو داود (1649) عن أحمد بن حنبل، حدثنا عبيدة بن حُميد التيمي، حدثني أبو الزّعراء، عن أبي الأحوص، عن أبيه مالك بن نَضْلة، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (15890) من هذا الوجه.

وإسناده صحيح، وأبو الأحوص هو عوف بن مالك بن نضلة، وقد صحّحه ابن خزيمة (2440)، وابن حبان (3362)، والحاكم (1/ 408) كلّهم من طريق عبيدة بن حُميد التّيميّ بإسناده، مثله.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

وأمّا ما رُوي عن عبد اللَّه بن مسعود مرفوعًا:"الأيدي ثلاثة: فيدُ اللَّه العليا، ويد المعطي التي تليها، ويد السَّائل السُّفلى" فهو ضعيف.

رواه الإمام أحمد (4261) عن القاسم بن مالك، قال: أخبرنا الهجريّ، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه، فذكره.

والهجريّ هو إبراهيم بن مسلم العبديّ ضعَّفه أكثر أهل العلم.

قال الحافظ في التقريب:"لين الحديث رفع موقوفات".

قلت: هكذا فعل، فقد رواه مرفوعًا وموقوفًا، فرفعه القاسم بن مالك عنه كما هنا، وكذلك رفعه جرير وشعبة عنه، ومن طريقهما رواه ابن خزيمة في صحيحه (2435)، وفي التوحيد (105)، والحاكم (1/ 408) من طريق شعبة وحده.

ورواه جعفر بن عون، عنه موقوفًا كما قال البيهقي في"الأسماء والصفات" (700) فالظَّاهر أن
هذا يرجع إلى إبراهيم الهجري مع مخالفته في الإسناد كما سبق.

وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 97):"رواه أحمد وأبو يعلى، ورجاله موثقون". فهو ليس كما قال، فإن إبراهيم بن مسلم الهجري لم يوثقه أحدٌ حتى ابن حبان لم يذكره في"الثقات"، وإنما أدخله في"المجروحين" (7) فلعله اعتمد على تصحيح ابن خزيمة، واللَّه تعالى أعلم.




মালিক ইবনু নদ্বলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হাত তিনটি। প্রথমটি হলো আল্লাহর হাত, যা সবার উপরে। দ্বিতীয়টি হলো দানকারীর হাত, যা এর (আল্লাহর হাতের) পরের স্থানে। তৃতীয়টি হলো যাচনাকারীর (ভিক্ষুকের) হাত, যা সবার নিচে। সুতরাং তোমরা (প্রয়োজনের চেয়ে) অতিরিক্ত সম্পদ থেকে দান করো এবং নিজের ব্যাপারে অপারগতা দেখাও না (বা নিজেকে কষ্ট দিও না)।”









আল-জামি` আল-কামিল (351)


351 - عن أنس بن مالك، قال: قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لا تزال جهنّم تقول: هل من مزيد حتى يضع ربُّ العزّة فيها قدمه، فتقول: قطْ قطْ وعزّتِك، ويُزْوى بعضُها إلى بعض".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأيمان والنّذور (6661)، ومسلم في كتاب الجنة (2848) كلاهما من شيبان، عن قتادة، حدثنا أنس بن مالك، فذكر الحديث، ولفظهما سواء.

قال البخاريّ: رواه شعبة عن قتادة.

قلت: وهو ما رواه البخاريّ (48480) عن عبد اللَّه بن أبي الأسود، حدثنا حرمي بن عمارة، حدثنا شعبة، بإسناده وفيه:"حتى يضع قدمه".

وكذلك رواه البخاريّ في التوحيد (7384) بالإسناد نفسه، وليس في رواية شعبة بيان من يضع قدمه.

ثم قال البخاريّ: وقال لي خليفة، حدثنا يزيد بن زريع، حدثنا سعيد، عن قتادة، عن أنس. وعن معتمر، سمعت أبي، عن قتادة، عن أنس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يزال يُلْقى فيها وتقول: هل من مزيد، حتى يضع ربُّ العالمين قدمه فينزوي بعضُها إلى بعض. ثم تقول: قد قد، بعزّتك وكرمك. ولا تزال الجنة تفضل حتى ينشئ اللَّه لها خلقًا فيسكنهم فضل الجنّة".

وتبيّن من هذا أن واضع القدم هو اللَّه سبحانه وتعالى.

وقوله:"قَط قَط" وفي رواية"قد قد" وقطْ بالتخفيف ساكنًا، ويجوز الكسر (قِط) بغير إشباع، و"قد" هي لغة أيضًا، وكلّها بمعنى يكفي وحسبي.

قال ابن خزيمة: اختلف رواةُ هذه الأخبار في هذه اللّفظة في قوله:"قَط" أو"قِط" فروى بعضهم بنصب القاف، وبعضهم بخفضها، وهم أهل اللّغة، ومنهم يقتبس هذا الشأن، ومحال أن يكون أهل الشّعر أعلم بلفظ الحديث من علماء الآثار الذين يعنون بهذه الصّناعة يروونها، ويسمعونها من ألفاظ العلماء، ويحفظونها، وأكثر طلاب العربية إنّما يتعلّمون العربية من الكتب المشتراة أو المستعارة من غير سماع، ولسنا ننكر أن العرب تنصب بعض حروف الشيء، وبعضها يخفض ذلك الحرف لسعة لسانها. قال المطلبيّ (أي الشَّافعيّ) رحمه الله:"لا يُحيط أحدٌ علمًا بألسنة العرب جميعًا غيرُ نبيّ". انتهى. كتاب التوحيد (1/ 226 - 227).




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জাহান্নাম সর্বদা বলতে থাকবে: আরও আছে কি? যতক্ষণ না আল্লাহ রব্বুল ইজ্জত তার মধ্যে তাঁর কদম (পায়ের পাতা) রাখবেন। তখন সে বলবে: যথেষ্ট, যথেষ্ট, আপনার ইজ্জতের কসম! এবং তার এক অংশ আরেক অংশের সাথে সংকুচিত হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (352)


352 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تزال جهنّم تقول: هل من مزيد؟ . قال:"فيدلّي فيها ربُّ العالمين قدمَه". قال:"فينزوي بعضُها إلى بعض، وتقول: قط قط بعزّتك، ولا يزالُ في الجنة فضْلٌ حتى ينشئَ اللَّه لها خلقًا آخر فيُسكنه في فضول الجنة".

صحيح: رواه الإمام أحمد (12380) عن بهز وعفان، قالا: حدثنا أبان بن يزيد العطّار، حدثنا قتادة، حدثنا أنس بن مالك، فذكره.

ورواه ابن خزيمة في التوحيد (155) من طريق بهز بن أسد وحده بإسناده، مثله.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জাহান্নাম সর্বদা বলতে থাকবে: আরও আছে কি? তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: তখন রাব্বুল আলামীন তার মধ্যে তাঁর পা স্থাপন করবেন। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: তখন তার একাংশ আরেক অংশের সাথে মিশে যাবে এবং বলবে: আপনার ইজ্জতের কসম! যথেষ্ট হয়েছে, যথেষ্ট হয়েছে! আর জান্নাতে তখনও স্থান বাকি থাকবে। অবশেষে আল্লাহ তার জন্য অন্য এক সৃষ্টি তৈরি করবেন এবং তাদের জান্নাতের অবশিষ্ট অংশে বসবাস করাবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (353)


353 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تحاجت الجنّة والنار، فقالت النار: أُوثرتُ بالمتكبّرين والمتجبرين. وقالت الجنةُ: فما لي لا يدخلني إِلَّا ضعفاء الناس وسَقَطُهم وغِرَّتهُم؟ قال اللَّه للجنة: إنّما أنتِ رحمتي أرحمُ بك من أشاء من عبادي. وقال للنار: إنّما أنتِ عذابي أُعذِّبُ بك من أشاء من عبادي. ولكلّ واحدة منكما مِلؤها. فأمَّا النّار فلا تمتلئ حتى يضع اللَّه تبارك وتعالى رِجْلَه. تقول: قَطْ قَطْ قَطْ. فهنالك تمتلئُ، ويُزْوي بعضُها إلى بعض، ولا يظلم اللَّه من خلقه أحدًا، وأمّا الجنَّةُ فإنّ اللَّه يُنشئ لها خلقًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4850)، ومسلم في كتاب الجنة (2846: 36) كلاهما عن محمد بن رافع، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن همام، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জান্নাত ও জাহান্নাম পরস্পরে তর্ক করল। তখন জাহান্নাম বলল: আমাকে তো অহংকারী ও দাম্ভিকদের জন্য বেছে নেওয়া হয়েছে। আর জান্নাত বলল: আমার কী হলো যে আমার মধ্যে দুর্বল, সাধারণ লোক এবং সহজ-সরল লোক ছাড়া আর কেউ প্রবেশ করবে না? আল্লাহ জান্নাতকে বললেন: তুমি তো আমার রহমত; আমি তোমার মাধ্যমে আমার বান্দাদের মধ্যে যাকে ইচ্ছা তার প্রতি দয়া করি। আর তিনি জাহান্নামকে বললেন: তুমি তো আমার আযাব; আমি তোমার মাধ্যমে আমার বান্দাদের মধ্যে যাকে ইচ্ছা তাকে শাস্তি দেই। তোমাদের উভয়ের প্রত্যেকের জন্য তার পূর্ণতা রয়েছে। অতঃপর জাহান্নামের ব্যাপারে (যা ঘটবে, তা হলো) আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তাতে তাঁর কদম (পাদদেশ) না রাখা পর্যন্ত তা পূর্ণ হবে না। তখন সে বলবে: যথেষ্ট, যথেষ্ট, যথেষ্ট (ক্বত, ক্বত, ক্বত)। আর তখনই তা পূর্ণ হবে এবং এর অংশগুলো একে অপরের সাথে মিশে যাবে (সংকুচিত হবে)। আর আল্লাহ তাঁর সৃষ্টির কারো প্রতিই যুলম করেন না। আর জান্নাতের ব্যাপারে (যা ঘটবে, তা হলো) আল্লাহ তার জন্য নতুন সৃষ্টি তৈরি করবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (354)


354 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"احتجّت الجنَّةُ والنَّار، فقالت النار: أوثرتُ بالمتكبّرين والمتجبّرين" فذكر الحديث إلى قوله:"ولكليكما عليّ ملؤها". ولم يذكرْ ما بعده من الزّيادة.

وفي رواية من الزيادة:"ولكلّ واحدة منكما ملؤها، فأمَّا النّار فيُلقى فيها أهلها فتقول: هل من مزيد؟ ويلقى فيها أهلُها فتقول: هل من مزيد؟ حتى يأتيها تبارك وتعالى فيضعُ قدميه عليها، فتنزوي وتقول: قِدْني قِدْني. وأما الجنة فيبقى منها ما شاء اللَّه أن يبقى فينشئُ اللَّه لها خلقًا ممن يشاء".

صحيح: رواها مسلم في صفة الجنة والنار (2847) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر الحديث، ولم يسق مسلمٌ لفظه كاملًا، وإنما أحال على لفظ أبي هريرة إلى قوله:"ولكليكما عليّ ملؤها" ولم يذكر ما بعد من الزيادة.

والرواية الثانية عند الإمام أحمد (11099)، وأبي يعلى (1313) كلاهما من طريق حماد بن
سلمة، عن عطاء بن السائب، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة، عن أبي سعيد، فذكر الحديث كاملًا.

وصحّحه ابن خزيمة فأخرجه في كتاب التوحيد (148، 161)، وابن حبان في صحيحه (7454)، وابن أبي عاصم في السنة (528) كلهم من طرق عن حماد بن سلمة.

وهذا إسناد صحيح، عطاء بن السائب ثقةٌ، وثَّقه الأئمة إِلَّا أنه اختلط لكن حمّاد بن سلمة سمع منه قبل الاختلاط كما صرّح بذلك ابن معين وأبو داود وغيرهما. وجعل الطّحاويّ ممن سمع منه قبل الاختلاط أربعة وهم: شعبة، وسفيان الثوريّ، وحماد بن سلمة، وحماد بن زيد. إِلَّا أنّ عبد الحق الإشبيليّ قال في"الأحكام":"إنّ حماد بن سلمة سمع منه بعد الاختلاط كما قاله العقيليّ في"الضعفاء" وقد تعقَّبه الحافظ أبو عبد اللَّه محمد بن أبي بكر المواق كلام عبد الحقّ وقال: لا نعلم من قاله غير العقيليّ، وقد غلط من قال: إنه قدم في آخر عمره إلى البصرة، وإنَّما قدم عليهم مرتين، فمن سمع منه القدمة الأولى صحَّ حديثه منها. انظر للمزيد:"الكواكب النيرات" (ص 319 - 326).




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জান্নাত ও জাহান্নাম বিতর্ক করল (তর্ক করল)। তখন জাহান্নাম বলল: আমাকে অহংকারী ও দাম্ভিকদের জন্য বিশেষিত করা হয়েছে।" বর্ণনাকারী হাদীসটি উল্লেখ করেন এই পর্যন্ত যে, আল্লাহ বললেন: "তোমাদের উভয়েরই আমার কাছে পূর্ণতা রয়েছে (তোমাদের উভয়কে পূর্ণ করা আমার দায়িত্ব)।"

এবং অন্য এক বর্ণনার অতিরিক্ত অংশে রয়েছে: "তোমাদের প্রত্যেকের জন্যই আমার পক্ষ থেকে পূর্ণতা রয়েছে। সুতরাং জাহান্নামে যখন তার অধিবাসীদের নিক্ষেপ করা হবে, তখন সে বলবে: আরও কিছু আছে কি? যখন তার মধ্যে তার অধিবাসীদের নিক্ষেপ করা হবে, তখন সে বলবে: আরও কিছু আছে কি? যতক্ষণ না আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তার কাছে আসবেন এবং তাঁর কদম (পাদদেশ) তার উপরে রাখবেন। তখন তা সংকুচিত হবে এবং বলবে: যথেষ্ট হয়েছে, যথেষ্ট হয়েছে (ক্বিদনী, ক্বিদনী)। আর জান্নাতের ক্ষেত্রে, আল্লাহ যা চান তা অবশিষ্ট থাকবে। তখন আল্লাহ তার জন্য নতুন এক সৃষ্টি তৈরি করবেন, যাকে তিনি চান।"









আল-জামি` আল-কামিল (355)


355 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يجمع اللَّه الناس يوم القيامة في صعيد واحد، ثم يطّلع عليهم ربُّ العالمين فيقول: ألا يتبع كلُّ إنسان ما كانوا يعبدونه، فيُمثّل لصاحب الصليب صليبه، ولصاحب التصاوير تصاويره، ولصاحب النّار ناره، فيتبعون ما كانوا يعبدون، ويبقى المسلمون فيطَّلعُ عليهم ربُّ العالمين فيقول: ألا تتبعون النّاس؟ فيقولون: نعوذ باللَّه منك، نعوذ باللَّه منك، اللَّه ربُّنا، وهذا مكاننا حتى نرى ربَّنا وهو يأمرهم ويثبّتُهم، ثم يتوارى ثم يطَّلعُ فيقول: ألا تتّبعون النّاس؟ فيقولون: نعوذ باللَّه منك، نعوذ باللَّه منك، اللَّهُ ربُّنا، وهذا مكاننا حتى نرى ربَّنا وهو يأمرهم ويثبّتُهم". قالوا: وهل نراه يا رسول اللَّه؟ قال:"وهل تضارُّون في رؤية القمر ليلة البدر؟" قالوا: لا يا رسول اللَّه. قال:"فإنَّكم لا تُضَارُّون في رؤيته تلك السَّاعة. ثم يتوارى، ثم يطّلعُ فيُعرِّفُهم نَفْسه، ثم يقول: أنا ربُّكم فاتبعوني فيقوم المسلمون، ويوضع الصّراط فيمرون عليه مثل جياد الخيل والرّكاب وقولهم عليه: سلِّم سلِّم، ويبقى أهلُ النار فيطرح منهم فيها فوجٌ فيقال: هل امتلأت؟ فتقول: هل من مزيد، ثم يطرح فيها فوجٌ، فيقال: هل امتلأت؟ فتقول: هل من مزيد، حتى إذا أُوعِبُوا فيها وضع الرحمن قدمه فيها، وأُزْوِيَ بعضُها إلى بعض، ثم قال: قط، قالت: قط قط، فإذا أدخل اللَّه أهل الجنة الجنة وأهل النار النار، قال: أُتِي بالموت مُلَبِّيًا فيوقف على السور الذي بين أهل الجنة وأهل النار، ثم يقال: يا أهل الجنة فيطّلِعون خائفين، ثم يقال: يا أهل النار فيطّلعون
مستبشرين يرجون الشّفاعة، فيقال لأهل الجنة وأهل النار: هل تعرفون هذا؟ فيقولون (هؤلاء وهؤلاء): قد عرفناه هو الموت الذي وُكِّل بنا، فيضجع فيذبح ذبحا على السُّور الذي بين الجنة والنار، ثم يقال: يا أهل الجنة خلود لا موت، ويا أهل النّار خلود لا موت".

حسن: رواه الترمذيّ (2557) عن قتيبة، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه ابن خزيمة في التوحيد (150) من طريق عبد العزيز بن محمد الدّراورديّ، بإسناده، مثله.

قال أبو عيسى الترمذيّ:"حديث حسن صحيح".

قلت: هو حسن فقط من أجل عبد العزيز بن محمد الدراورديّ وهو مختلف فيه وإن كان من رجال الجماعة، تكلّم فيه أبو زرعة والنسائي وغيرهما، ومشّاه الآخرون وهو حسن الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাআলা মানবজাতিকে এক সমতল ভূমিতে একত্রিত করবেন। অতঃপর রব্বুল আলামীন তাদের সামনে প্রকাশিত হয়ে বলবেন: প্রত্যেক ব্যক্তি যেন সেটির অনুসরণ করে, যার তারা ইবাদত করত। ফলে ক্রুশপূজারীর সামনে তার ক্রুশ, মূর্তিপূজারীর সামনে তার মূর্তিগুলো এবং অগ্নিপূজারীর সামনে তার আগুনকে প্রতিমূর্ত করা হবে। অতঃপর তারা যেগুলোর ইবাদত করত সেগুলোর অনুসরণ করবে। আর মুসলিমগণ অবশিষ্ট থাকবে। অতঃপর রব্বুল আলামীন তাদের সামনে প্রকাশিত হয়ে বলবেন: তোমরা কি লোকদের অনুসরণ করবে না? তারা বলবে: আমরা আপনার নিকট আশ্রয় চাই, আমরা আপনার নিকট আশ্রয় চাই। আল্লাহ আমাদের রব। আমরা এখানেই থাকব, যতক্ষণ না আমরা আমাদের রবকে দেখতে পাই। (এ কথা বলে তারা দৃঢ় থাকবে এবং আল্লাহ তাদের দৃঢ়তা দেবেন)। তারপর তিনি অদৃশ্য হয়ে যাবেন। পুনরায় প্রকাশিত হয়ে বলবেন: তোমরা কি লোকদের অনুসরণ করবে না? তারা বলবে: আমরা আপনার নিকট আশ্রয় চাই, আমরা আপনার নিকট আশ্রয় চাই। আল্লাহ আমাদের রব। আমরা এখানেই থাকব, যতক্ষণ না আমরা আমাদের রবকে দেখতে পাই। (এ কথা বলে তারা দৃঢ় থাকবে এবং আল্লাহ তাদের দৃঢ়তা দেবেন)।

সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা কি আমাদের রবকে দেখতে পাব? তিনি বললেন: পূর্ণিমার রাতে চাঁদ দেখতে তোমাদের কি কোনো সমস্যা হয়? তাঁরা বললেন: না, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তিনি বললেন: তাহলে তোমরা সেই সময়ে তাঁকে দেখতে কোনো সমস্যার সম্মুখীন হবে না।

এরপর তিনি অদৃশ্য হয়ে যাবেন। অতঃপর আবার প্রকাশিত হয়ে তাদের নিকট নিজের পরিচয় দেবেন। এরপর তিনি বলবেন: আমি তোমাদের রব। অতএব তোমরা আমার অনুসরণ করো। তখন মুসলিমগণ উঠে দাঁড়াবে এবং সিরাত (পুল) স্থাপন করা হবে। তারা দ্রুতগামী ঘোড়া ও আরোহীর মতো তার ওপর দিয়ে অতিক্রম করবে। আর সেখানে তাদের কথা হবে: হে আল্লাহ! নিরাপত্তা দাও, নিরাপত্তা দাও!

আর জাহান্নামীরা অবশিষ্ট থাকবে। অতঃপর তাদের মধ্য থেকে একদলকে তাতে নিক্ষেপ করা হবে। জিজ্ঞেস করা হবে: তা কি পূর্ণ হয়েছে? সে (জাহান্নাম) বলবে: আরো আছে কি? অতঃপর তাতে আরেক দলকে নিক্ষেপ করা হবে। জিজ্ঞেস করা হবে: তা কি পূর্ণ হয়েছে? সে বলবে: আরো আছে কি? অবশেষে যখন তাদের সবাইকে তাতে পূর্ণ করা হবে, তখন দয়াময় আল্লাহ তার মধ্যে নিজের পা রাখবেন। ফলে তার এক অংশ আরেক অংশের সাথে সংকুচিত হয়ে যাবে এবং তিনি বলবেন: যথেষ্ট হয়েছে? তখন সে বলবে: যথেষ্ট হয়েছে, যথেষ্ট হয়েছে।

অতঃপর যখন আল্লাহ জান্নাতবাসীদেরকে জান্নাতে এবং জাহান্নামীদেরকে জাহান্নামে প্রবেশ করাবেন, তখন মৃত্যুকে উপস্থিত করা হবে এবং তাকে জান্নাতী ও জাহান্নামীদের মাঝে অবস্থিত প্রাচীরের উপর দাঁড় করানো হবে। তারপর বলা হবে: হে জান্নাতবাসীরা! তখন তারা ভয় নিয়ে উঁকি দেবে। এরপর বলা হবে: হে জাহান্নামবাসীরা! তখন তারা শাফা‘আতের আশায় আনন্দিত হয়ে উঁকি দেবে। অতঃপর জান্নাতী ও জাহান্নামী উভয়কে জিজ্ঞেস করা হবে: তোমরা কি একে চেনো? তখন তারা (উভয় দল) বলবে: হ্যাঁ, আমরা তাকে চিনি। এ হচ্ছে সেই মৃত্যু, যা আমাদের উপর মোতায়েন করা হয়েছিল। এরপর তাকে জান্নাত ও জাহান্নামের মাঝের প্রাচীরের উপর শোয়ানো হবে এবং জবাই করা হবে। অতঃপর বলা হবে: হে জান্নাতবাসীরা! চিরস্থায়িত্ব, কোনো মৃত্যু নেই। আর হে জাহান্নামবাসীরা! চিরস্থায়িত্ব, কোনো মৃত্যু নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (356)


356 - عن ابن عباس قال: أُنشد رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم بيتين من قول أميّة بن أبي الصّلت الثقفيّ:

رجل وثور تحت رجل يمينه … والنّسر للأخرى وليث مرصَّد

فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"صدق".

وأُنشد قوله:

لا الشّمس تأبى فما تخرج … إِلَّا معذبة وإلا تُجْلَدُ

فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"صدق".

حسن: رواه ابن خزيمة في كتاب"التوحيد" (137) عن محمد بن أبان، قال: حدثنا يونس بن بكير، قال: أخبرني محمد بن إسحاق، قال: حدثني يعقوب بن عتبة بن المغيرة بن الأخنس، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلِّس وقد صرَّح.

والغريب في الأمر أن ابن خزيمة رواه (135) بهذا الإسناد نفسه ولم يصرّح فيه محمد بن إسحاق بالتحديث، وذكر فيه ثلاثة أبيات وهي:

رجل وثور تحت رجل يمينه … والنسر للأخرى وليث مرصّد

والشمس تصبح كل آخر ليلة … حمراء يصبح لونها يتورد

تأبى مما تطلع لنا في رسلها … إِلا معذبة وإلا تجلد

فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"صدق".
فالظّاهر أَنّ الأصل في المدلّس هو التحديث، لأنّ الراويّ يهتم بصيغة الأداء إذا كان شيخه مدلِّسّا، فإذا قال مرة:"حدثنا"، وأخرى:"عن"، فمعناه أنه لم يضبط في المرة الثانية، فما ضبطه لا ينقضه ما لم يضبطه، إِلَّا أَنَّ هذا الحديث معروف من رواية عبدة بن سليمان، عن محمد بن إسحاق، عن يعقوب بن عتبة بالعنعنة، ومن طريقه رواه الإمام أحمد (2314)، وابن أبي عاصم في السنة (579)، والطبراني في الكبير (11591)، وابن منده في الرد على الجهمية (12)، وابن خزيمة في التوحيد (136).

وتابعه على التحديث به أحمد بن عبد الجبار، نا يونس بن بكير، عن ابن إسحاق، قال: حدثني يعقوب بن عتبة. ومن طريقه رواه البيهقي في الأسماء والصفات (771).

وأحمد بن عبد الجبار وهو العُطارديّ قال فيه الدارقطني: لا بأس به، وضعَّفه غيره إِلَّا أنه روى عن يونس بن بكير مغازي محمد بن إسحاق. قال الحافظ في"التقريب":"ضعيف وسماعه للسيرة صحيح".

وأمّا قول البيهقيّ: هذا حديث يفرّد به محمد بن إسحاق بن يسار بإسناده هذا فهو ليس بصحيح، بل إنه قد توبع.

فقد رواه ابن خزيمة في التوحيد (138) عن أبي هاشم زياد بن أيوب، قال: حدثنا إسماعيل -يعني ابن عليّة- قال: حدثنا عمارة بن أبي حفصة، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكر القصة.

قال عكرمة:"فقلت لابن عباس: وتجلد الشّمس؟ فقال: عضضت بهني أبيك! وإنَّما اضطره الراوي إلى أن قال: تجلدُ".

وروى عن هشام بن عروة قال:"حملة العرش: أحدهم على صورة إنسان، والثاني على صورة ثور، والثالث على صورة نَسْر، والرابع على صورة أسد".

قال البيهقيّ: وإنَّما أريد به ما جاء في حديث آخر عن ابن عباس أن الكرسي يحمله أربعة من الملائكة: ملك في صورة رجل، وملك في صورة أسد، وملك في صورة ثور، وملك في صورة نسر، فكأنّه إن صحّ بين: أن الملك الذي في صورة رجل، والملك الذي في صورة ثور يحملان الكرسي من موضع الرجل اليمنى، والملك الذي في صورة النسر، والذي في صورة الأسد وهو اللّيث يحملان من الكرسي موضع الرجل الأخرى، أن لو كان الذي عليه ذا رجلين".

ولا منافاة بينه وبين قوله تعالى: {وَيَحْمِلُ عَرْشَ رَبِّكَ فَوْقَهُمْ يَوْمَئِذٍ ثَمَانِيَةٌ} [سورة الحاقة: 17] فهذا خاص بيوم القيامة، وأمّا قبل يوم القيامة فأربعة إن صحّ هذا الحديث كما قال البيهقيّ؛ ولذا لم ير ابن خزيمة التعارض بين الحديث والآية، إلَّا أنه أخّر الجمع بين الحديث والآية في موضع آخر في كتابه.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উমাইয়াহ ইবনু আবিস সলত আস-সাকাফী’র বলা দুটি কবিতা আবৃত্তি করে শোনানো হলো:
"(১) একজন মানুষ এবং একটি ষাঁড় রয়েছে তাঁর (আরশের) ডান পায়ের নিচে, আর একটি ঈগল ও একটি ওঁত পেতে থাকা সিংহ রয়েছে অন্যটির জন্য।"
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে সত্য বলেছে।"
এবং তাঁকে (উমাইয়ার) এই উক্তিও শোনানো হলো:
"(২) সূর্য বের হতে অস্বীকার করে না, কিন্তু সে যখন বের হয়, হয় সে শাস্তিপ্রাপ্ত হয় অথবা তাকে চাবুক মারা হয়।"
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে সত্য বলেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (357)


357 - عن أبي سعيد قال: سمعتُ النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"يكشِفُ ربُّنا عن ساقه، فيسجد له كلّ مؤمن ومؤمنة، ويبقى من كان يسجد في الدّنيا رياءً وسمعةً، فيذهب ليسجدَ فيعود ظهره طبقًا واحدًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4919) عن آدم بن أبي إياس، حدثنا الليث، عن خالد ابن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد، فذكره مختصرًا هكذا.

ورواه في التوحيد (7439) عن يحيى بن بكير، حدثنا اللّيث بن سعد، بإسناده مطوَّلًا وهو مذكور في موضعه وفيه:"فيكشف عن ساقه. . .".

ورواه مسلم في الإيمان (183) من وجه آخر عن زيد بن أسلم، بإسناده وفيه:"فيكشف عن ساق".




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আমাদের রব তাঁর সাক্ব (বা পায়ের গোছা) প্রকাশ করবেন। তখন প্রত্যেক মুমিন পুরুষ ও মুমিন নারী তাঁর জন্য সিজদা করবে। আর তারা অবশিষ্ট থাকবে যারা দুনিয়াতে লোক দেখানো ও সুখ্যাতি লাভের জন্য সিজদা করত। তারা যখন সিজদা করতে যাবে, তখন তাদের পিঠ শক্ত হয়ে একটি তক্তার মতো হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (358)


358 - عن أبي هريرة يقول: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا جمع اللَّهُ العباد بصعيد واحد نادى منادٍ: يلحقُ كلُّ قومٍ بما كانوا يعبدون، فيلحق كلُّ قومٍ بما كانوا يعبدون، ويبقى الناسُ على حالهم، فيأتيهم فيقول: ما بال النّاس ذهبوا وأنتم ههنا؟ فيقولون: ننتظر إلهنا، فيقول: هل تعرفونه؟ فيقولون: إذا تعرّف إلينا عرفناه، فيكشفُ لهم عن ساقه فيقعون سجّدًا، فذلك قول اللَّه تعالى: {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ وَيُدْعَوْنَ إِلَى السُّجُودِ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ} [سورة القلم: 42]، ويبقى كلُّ منافق فلا يستطيع أن يسجد، ثم يقودهم إلى الجنّة".

حسن: رواه الدّارميّ في سننه (2845) عن محمد بن يزيد البزّار، عن يونس بن بُكير، قال: أخبرني ابن إسحاق، قال: أخبرني سعيد بن يسار، قال: سمعتُ أبا هريرة يقول (فذكر الحديث).

وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق وهو مدلس، ولكنّه صرّح بالتحديث فزالت تهمة التدليس.

رواه ابن منده في"الرّد على الجهمية" (8) عن علي بن أحمد بن الأزرق بمصر، ثنا أحمد بن محمد بن مروان. . . ثنا أحمد بن محمد بن أبي عبد اللَّه البغداديّ، ثنا يحيى بن حماد، ثنا أبو عوانة، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ} قال:"يكشف عز وجل عن ساقه".

وفي الإسناد من لم أعرفه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন আল্লাহ তাআলা বান্দাদেরকে একটি খোলা সমতল ভূমিতে একত্রিত করবেন, তখন একজন ঘোষক ঘোষণা করবেন: প্রত্যেক জাতি যেন তাদের উপাস্যদের সাথে মিলিত হয়। সুতরাং প্রত্যেক জাতি তাদের উপাস্যদের সাথে মিলিত হবে, আর (মুমিন) মানুষজন তাদের অবস্থাতেই থেকে যাবে। তখন তিনি তাদের কাছে এসে বলবেন: কী ব্যাপার, লোকেরা চলে গেল, আর তোমরা এখানে আছ কেন? তারা বলবে: আমরা আমাদের ইলাহ্ (উপাস্য)-এর জন্য অপেক্ষা করছি। তিনি বলবেন: তোমরা কি তাঁকে চিনতে পারো? তারা বলবে: যখন তিনি আমাদের কাছে নিজের পরিচয় দেবেন, তখন আমরা তাঁকে চিনতে পারবো। তখন তিনি তাদের জন্য তাঁর সাক (পায়ের গোছা) উন্মোচন করবেন, ফলে তারা সাজদায় লুটিয়ে পড়বে। আর এটাই হলো আল্লাহ তাআলার বাণী: {যেদিন পায়ের গোছা উন্মোচিত করা হবে এবং তাদেরকে সাজদা করার জন্য আহ্বান করা হবে, তখন তারা সক্ষম হবে না} [সূরা আল-কালাম: ৪২]। প্রত্যেক মুনাফিক (কপট) বাকি থাকবে এবং তারা সাজদা করতে সক্ষম হবে না। অতঃপর তিনি তাদের (মুমিনদের) জান্নাতের দিকে নিয়ে যাবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (359)


359 - عن عبد اللَّه بن مسعود، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في حديث طويل وجاء فيه:"فيتمثّل لهم الرّبُّ عز وجل فيقول لهم: ما لكم لا تنطلقون كما انطلق الناس؟ فيقولون: إنّ لنا ربًّا ما رأيناه بعد. فيقول: فيم تعرفون ربَّكم إن رأيتموه؟ قالوا: بيننا وبينه علامة إن رأينا عرفناه. قال: وما هي؟ قالوا: يكشف عن ساقه، قال: فعند ذلك يكشف عن
ساق فيخرُّ كلّ من كان يسجد طائعًا ساجدًا ويبقي فوم ظهورهم كصياصي البقر، يريدون السُّجود فلا يستطيعون. . .".

وفي رواية:"يكشف اللَّه عن ساقه".

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (9/ 416 - 421) عن عليّ بن عبد العزيز، ثنا أبو غسان، ثنا عبد السلام بن حرب، عن أبي خالد الدالاني، عن المنهال بن عمرو، عن أبي عبيدة، عن مسروق، عن عبد اللَّه بن مسعود فذكره في حديث طويل.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي خالد الدّالانيّ غير أنه حسن الحديث. انظر تخريجه مفصّلًا في باب رؤية المؤمنين ربَّهم يوم القيامة، وقد أشار البيهقيّ في"الأسماء والصفات" (2/ 182) إلى حديث ابن مسعود هذا المرفوع.

والرّواية الثانية عند عبد اللَّه بن أحمد في السنة (1203).

وقوله:"صياصي البقر" أي قرونها.

قال ابن منده في"الرّد على الجهمية" (ص 36) بعد أن أخرج حديث أبي سعيد الخدريّ:"هذا حديث ثابت باتفاق من البخاريّ ومسلم بن الحجّاج".

وقد اختلف الصّحابة في معنى قوله عز وجل: {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ}، فروي عن ابن مسعود ما يوافق المرفوع من طريقه: عبد الرزاق، عن الثوريّ، عن مسلمة بن كهيل، عن أبي الزّعراء، عن ابن مسعود في قوله عز وجل: {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ} قال:"عن ساقيه".

قال ابن منده:"هكذا قراءة ابن مسعود -يَكْشِفُ- بفتح الياء، وكسر الشّين. وعنه أيضًا في قوله: {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ} قال: عن ساقه فيسجد كلُّ مؤمن، ويقسو كلّ كافر فيكون عظما واحدًا".

وقال البيهقيّ في"الأسماء والصّفات" (2/ 182):"اختلفت الرّوايات عن عبد اللَّه بن عباس في قوله تعالى {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ} فروى أسامة بن زيد، عن عكرمة، عن ابن عباس {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ} بالياء وضمّها. وقال يعقوب الحضرميّ عن ابن عباس أنه قرأ {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ} -تكشف- بالتاء المفتوحة، ومعنى تكشف القيامة عن شدّة شديدة، والعرب تقول: كشف هذا الأمر عن ساق، إذا صار إلى شدّة ومنه قول الشّاعر:

كشفت لهم عن ساقها … وبدا من الشّر الصّراح

ذكره ابن جرير الطبريّ في تفسيره، انظر لمزيد من الآثار التي ساقها البيهقيّ في"الأسماء والصفات" (2/ 183).

قلت: هذا التفسير عن ابن عباس بناءً على أنّ السّاق لم ينسب إلى اللَّه سبحانه وتعالى في الآية
الكريمة ولذا فسّره بكلام العرب، فلا يقال: إنّه أوّل صفة السّاق، وإليه يشير شيخُ الإسلام ابن تيمية رحمه الله بقوله:"ولا ريب أن ظاهر القرآن لا يدل على أن هذه من الصّفات، فإنه قال: {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ} نكرة في الإثبات لم يضفها إلى اللَّه، ولم يقل: عن ساقه، فمع عدم التعريف بالإضافة لا يظهر أنه من الصّفات إِلَّا بدليل آخر، ومثل هذا ليس بتأويل، إنّما التأويل صرف الآية عن مدلولها ومفهومها ومعناها المعروف".

قلت: إذ لو وقف ابن عباس على حديث أبي سعيد الخدريّ الذي فيه التصريح بإضافة السّاق إلى اللَّه سبحانه وتعالى لقال به كما هو معروف عن السّلف الوقوف عند النّص.

وأمّا ما رُوي عن أبي موسى مرفوعًا: {يَوْمَ يُكْشَفُ عَنْ سَاقٍ} قال:"عن نور عظيم يخرّون له سجَّدًا". فهو ضعيف جدًّا.

رواه أبو يعلى (7246) عن القاسم بن يحيى، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا أبو سعيد روح بن جناح، عن مولى لعمر بن عبد العزيز، عن أبي بردة، عن أبيه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وأخرجه البيهقيّ في"الأسماء والصفات" (752) من طريق الوليد بن مسلم وقال:"روح بن جناح هو شاميّ يأتي بأحاديث منكرة لا يتابع عليها، وموالي عمر بن عبد العزيز فيهم كثرة".

قلت: مولى عمر بن عبد العزيز مبهم لم يسم، وقد عرفتَ أنهم كثيرون، وقد ضعَّفه أيضًا الحافظ في"الفتح" (8/ 664).




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একটি দীর্ঘ হাদীসে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

অতঃপর পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত রব তাদের সামনে প্রতিমূর্ত হবেন এবং তাদের বলবেন: তোমাদের কী হলো যে তোমরা অগ্রসর হচ্ছো না, যেভাবে অন্য লোকেরা অগ্রসর হলো? তারা বলবে: আমাদের এমন এক রব আছেন, যাঁকে আমরা এখনো দেখিনি। তিনি বলবেন: যদি তোমরা তোমাদের রবকে দেখো, তবে কীভাবে তাঁকে চিনবে? তারা বলল: আমাদের ও তাঁর মাঝে একটি নিদর্শন আছে। যদি আমরা তা দেখি, তবে তাঁকে চিনতে পারব। তিনি বললেন: সেটি কী? তারা বলল: তিনি তাঁর পায়ের গোছা উন্মোচন করবেন। তিনি বললেন: অতঃপর যখন তিনি গোছা উন্মোচন করবেন, তখন স্বেচ্ছায় সিজদাকারী প্রত্যেকেই সিজদায় লুটিয়ে পড়বে, আর যারা (মুনাফিক), তাদের পিঠ গরুর শিং-এর মতো শক্ত হয়ে থাকবে, তারা সিজদা করতে চাইবে, কিন্তু পারবে না।

অন্য বর্ণনায় এসেছে: "আল্লাহ তাঁর পায়ের গোছা উন্মোচন করবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (360)


360 - عن أبي هريرة قال: قال أناسٌ: يا رسول اللَّه، هل نرى ربَّنا يوم القيامة؟ فقال:"هل تضارون في الشمس ليس دونها سحاب؟". قالوا: لا يا رسول اللَّه. قال:"هل تضارون في القمر ليلة البدر ليس دونه سحاب؟". قالوا: لا يا رسول اللَّه. قال:"فإنكم ترونه يوم القيامة كذلك، يجمعُ اللَّه النَّاسَ فيقول: من كان يعبد شيئًا فليتبعه، فيتبع من كان يعبد الشّمس، ويتبع من كان يعبد القمر، ويتبع من كان يعبد الطّواغيت، وتبقى هذه الأمّة فيها منافقوها، فيأتيهم اللَّه في غير الصورة التي يعرفون، فيقول: أنا ربُّكم، فيقولون: نعوذ باللَّه منك هذا مكاننا حتى يأتينا ربُّنا، فإذا أتانا ربُّنا عرفناه، فيأتيهم اللَّه في الصُّورة التي يعرفون. فيقول أنا ربُّكم، فيقولون: أنت ربُّنا، فيتبعونه" في حديث طويل.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7437)، ومسلم في الإيمان (182) كلاهما من حديث إبراهيم بن سعد، عن ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد اللَّيثيّ، عن أبي هريرة، فذكر الحديث بطوله.

انظره كاملًا في جموع أبواب اليوم الآخر - باب الصّراط جسر جهنّم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিছু লোক বললো, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা কি কিয়ামতের দিন আমাদের রবকে দেখতে পাবো? তিনি বললেন, মেঘমুক্ত অবস্থায় সূর্য দেখতে কি তোমাদের কোনো অসুবিধা হয়? তারা বললো, না, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তিনি বললেন, মেঘমুক্ত পূর্ণিমার রাতে চাঁদ দেখতে কি তোমাদের কোনো অসুবিধা হয়? তারা বললো, না, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তিনি বললেন, তবে কিয়ামতের দিন তোমরাও আল্লাহকে ঠিক তেমনিভাবে দেখতে পাবে। আল্লাহ তা‘আলা লোকেদের একত্রিত করবেন এবং বলবেন, যে যার ইবাদত করত সে তার অনুসরণ করুক। তখন যারা সূর্যের ইবাদত করত তারা সূর্যকে অনুসরণ করবে, যারা চাঁদের ইবাদত করত তারা চাঁদকে অনুসরণ করবে, আর যারা মূর্তিদের ইবাদত করত তারা মূর্তিদের অনুসরণ করবে। এই উম্মত অবশিষ্ট থাকবে, তাদের মুনাফিকসহ। তখন আল্লাহ এমন এক রূপে তাদের কাছে আসবেন যা তারা চেনে না। তিনি বলবেন, আমি তোমাদের রব। তারা বলবে, আমরা আপনার থেকে আল্লাহর আশ্রয় চাই। আমাদের রব না আসা পর্যন্ত আমরা এ স্থান থেকে সরব না। যখন আমাদের রব আসবেন তখন আমরা তাঁকে চিনতে পারব। এরপর আল্লাহ তা‘আলা তাদের চেনা রূপে তাদের কাছে আসবেন। তিনি বলবেন, আমি তোমাদের রব। তারা বলবে, আপনিই আমাদের রব। অতঃপর তারা তাঁর অনুসরণ করবে। (এটি একটি দীর্ঘ হাদীসের অংশ।)