আল-জামি` আল-কামিল
3488 - عن عائشة قالت: رجع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من البقيع، فوجدني، وأنا أجد صُداعًا
في رأسي، وأنا أقول: وا رأساه، فقال:"بل أنا يا عائشة! وا رأساه" ثم قال:"ما ضَرَّكِ لو مِتِّ قبلي فقُمتُ عليكِ، فغسَلتكِ، وكفَّنْتُكِ، وصَليتُ عليك، ودفنتكِ".
حسن: رواه ابن ماجه (1465)، والنسائي في"الكبري" (7074)، وأحمد (25908)، وابن حبان (6585)، والبيهقي (3/ 396) كلّهم من حديث محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن يعقوب بن عُتْبة، عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله، عن عائشة فذكرته.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وهو مدلس، إلا أنه صرَّح بالتحديث فيما رواه البيهقي في"الدلائل" (7/ 168) فقال فيه: حدثنا يعقوب بن عُتبة، فانتفت عنه تهمة التدليس.
وقال البوصيري في"مصباح الزجاجة":"إسناد رجاله ثقات، ورواه البخاري من وجه آخر مختصرًا".
وهو يعني به ما أخرجه البخاري في المرضى (5666) عن يحيى بن يحيى أبي زكريا، أخبرنا سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، قال: سمعتُ القاسم بن محمد قال: قالت عائشة: وا رأساه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ذاكِ لو كان وأنا حيٌ فأستغفر لكِ وأدعو لكِ" فقالت عائشة: وا ثكلياه، والله إني لأظنك تحب موتي، ولو كان ذاك لظَلِلْتَ آخرَ يومك مُعَرِّسًا ببعض أزواجك، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"بل أنا وا رأساه لقد هممتُ أو أردت أن أُرسل إلى أبي بكر وابنه، وأعهدَ أن يقول القائلون، أو يتمنَّى المتمنون، ثم قلت: يأبى الله ويدفع المؤمنون أو يدفعُ الله ويأبى المؤمنون".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাকী' (কবরস্থান) থেকে ফিরে এলেন এবং আমাকে দেখতে পেলেন। আমি তখন মাথা ব্যথায় কাতর ছিলাম এবং বলছিলাম, 'হায়, আমার মাথা!' (ওয়া রা'সাহ)। তিনি বললেন, "বরং আমি, হে আয়িশা! হায়, আমার মাথা!" এরপর তিনি বললেন, "তোমার কী ক্ষতি হতো, যদি তুমি আমার আগে মারা যেতে? তাহলে আমি তোমার দাফন-কাফনের ব্যবস্থা করতাম, তোমাকে গোসল দিতাম, কাফন পরাতাম, তোমার জানাযার সালাত আদায় করতাম এবং তোমাকে দাফন করতাম।"
3489 - عن عائشة، قالت: دخل علي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في اليوم الذي بُدئ فيه. فقلت: وا رأساه! فقال:"وددتُ أن ذلك كان وأنا حي، فهيئتك ودفنتك". قالت: فقلت غيري: كأني بك في ذلك اليوم عروسًا ببعض نسائك. قال:"وأنا وا رأساه! ادعوا لي أباك وأخاك حتى أكتب لأبي بكر كتابًا، فإني أخاف أن يقول قائل، ويتمنى متمنٍ: أنا أولى، ويأبى الله عز وجل والمؤمنون إلا أبا بكر".
صحيح: رواه الإمام أحمد (25113)، والبيهقي (8/ 153) كلاهما من حديث يزيد بن هارون، أخبرنا إبراهيم بن سعد، عن صالح بن كيسان، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
وإسناده صحيح. وهو في مسلم (2387) بهذا الإسناد مختصرًا في ذكر استخلاف أبي بكر.
وفي سنن البيهقي (3/ 366) قالت فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أسماء! إذا أنا مت فاغسليني أنت وعلي بن أبي طالب، فغسلها علي وأسماء".
ورواه هبة الله الطبري عن أسماء: أن عليا غسَّل فاطمة، قالت أسماء: وأعنته عليها. قال ابن الجوزي في"التحقيق" (2/ 624):"ولم ينكر عليه أحد من الصحابة فصار كالإجماع".
قال ابن التركماني في"الجوهر النقي" معلقًا على حديث البيهقي:"في سنده من يحتاج إلى
كشف حاله، ثم الحديث مشكل، ففي الصحيح أن عليا دفنها ليلًا ولم يعلم أبا بكر، فكيف يمكن أن تغسلها زوجه أسماء وهو لا يعلم …".
وقال:"وعلى تقدير ثبوت هذا الحديث فهي كانت زوجته في الدنيا والآخرة، لقوله صلى الله عليه وسلم:"كل سبب ونسب منقطع يوم القيامة إلا سببي ونسبي" فالسبب الذي كان بينهما لم يقطعه الموت.
وقال: ومذهب أبي حنيفة والثوريّ والشّعبيّ أنّ الرجل لا يغسل امرأته" انتهي.
وقد سبق أن رد ابن الجوزي على هذا فقال:"قال بعض المتفقه: لو صح هذا الحديث، قلنا: إنما غسَّلها لأنها زوجته في الآخرة، فما انقطعت الزوجية. قال: قلنا: لو بقيت الزوجية لما تزوج بنت أختها أمامة بنت زينب بعد موتها، وقد مات عن أربع حرائر" انتهى.
وابن مسعود غسّل امرأته حين ماتت، إلا أن إسناده ضعيف.
وروي بإسناد ضعيف عن ابن عباس، قال:"الرجل أحقّ بغسل امرأته". رواه البيهقي، وفيه الحجاج ابن أرطاة ضعيف.
وفي أحاديث الباب دليل للجمهور بأن المرأة يغسلها زوجها إذا ماتت، منهم: الشافعي والأوزاعي وإسحاق وأهل الحديث.
قال أبو حنيفة وأصحابه والشعبي والثوري ورواية عن أحمد: لا يجوز أن يغسلها زوجها لبطلان نكاحها.
وأما أن تغسل الزوجة زوجها فهذا لا خلاف فيه؛ لأن نكاح المرأة لا يبطل بموت زوجها لأنّ عليها عدّة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যেদিন অসুস্থতা শুরু হলো, সেদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন। তখন আমি বললাম: হায়! আমার মাথা ব্যথা! তিনি বললেন: “আমি চাই যে, এটা আমার জীবদ্দশায় হোক, যাতে আমি তোমাকে প্রস্তুত করতে (গোসল, কাফন) এবং তোমাকে দাফন করতে পারি।” তিনি (আয়িশা) বলেন: আমি (ঈর্ষান্বিত হয়ে) বললাম: আমি যেন আপনাকে সেই দিন দেখতে পাচ্ছি যে আপনি আমার ছাড়া অন্য কোনো স্ত্রীর সাথে নববধূ সাজছেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আর আমিও হায়! আমার মাথা ব্যথা! তোমার পিতা ও তোমার ভাইকে আমার কাছে ডেকে আনো, যেন আমি আবু বাকরের জন্য একটি লিখিত অঙ্গীকার তৈরি করে দিতে পারি। কারণ আমি আশঙ্কা করি যে, কোনো বক্তা হয়তো বলবে এবং কোনো আকাঙ্ক্ষী হয়তো আশা করবে: ‘আমিই (খিলাফতের জন্য) অধিক হকদার।’ কিন্তু আল্লাহ আযযা ওয়া জাল এবং মুমিনগণ আবু বাকর ছাড়া অন্য কাউকে মেনে নেবেন না।”
3490 - عن أم عطية الأنصارية قالت: دخل علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم حين توفيت ابنتُه، فقال:"اغسِلْنها ثلاثًا أو خمسًا أو أكثر من ذلك. إن رأيتُن ذلك بماء وسِدْر، واجعلنَ في الآخرة كافورًا، أو شيئًا من كافور، فإذا فرغتُنَّ فآذِنَّني" قالت: فلما فرغنا آذنَّاه، فأعطانا حِقْوه، فقال:"أشعِرنَها إيَّاه" تعني بحِقْوه: إزارَه.
متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (2) عن أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن محمد بن سيرين، عن أم عطية الأنصارية فذكرت الحديث.
ورواه البخاري في الجنائز (1253) عن إسماعيل بن عبد الله، ومسلم في الجنائز (939/ 38) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن مالك بن أنس.
وأما ما رُوي عن ابن سيرين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من غسَّل ميتًا فليبدأ بعصره" فهو ضعيف.
رواه البيهقي (3/ 388) وقال:"هذا مرسل، وراويه ضعيف". ووافقه النووي في"الخلاصة" (3324).
উম্মে আতিয়্যাহ আনসারিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ইন্তিকাল করলেন, তখন তিনি আমাদের কাছে এলেন এবং বললেন: "তোমরা তাকে তিনবার অথবা পাঁচবার অথবা এর চাইতে অধিকবার গোসল দাও—যদি তোমরা প্রয়োজন মনে করো—পানি এবং কুল পাতা (সিদর) দিয়ে। আর শেষবারে কর্পূর (কাফুর) অথবা কর্পূরের কিছু অংশ ব্যবহার করো। যখন তোমরা সমাপ্ত করবে, তখন আমাকে জানাবে।" তিনি বলেন, যখন আমরা শেষ করলাম, তখন আমরা তাঁকে জানালাম। তিনি আমাদের তাঁর তহবন্দ দিলেন এবং বললেন: "তা দ্বারা তার দেহ আচ্ছাদিত করে দাও।" (তাঁর حِقْوِه দ্বারা উদ্দেশ্য ছিল: তাঁর ইযার বা তহবন্দ)।
3491 - عن أم عطية قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في غسل ابنته:"ابدأْنَ بميامنِها، ومواضع الوضوء منها".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1255)، ومسلم في الجنائز (939/ 43) كلاهما من حديث إسماعيل بن إبراهيم، حدثنا خالد الحذاء، عن حفصة بنت سيرين، عن أم عطية فذكرته.
উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কন্যাকে গোসল করানোর ব্যাপারে বললেন: “তোমরা তার ডান দিকগুলো এবং তার উযূর স্থানসমূহ দিয়ে শুরু করবে।”
3492 - عن أم عطية قالت: ضفرنا شعر بنت النبي صلى الله عليه وسلم، تعني ثلاثة قرون- وقال وكيع: قال سفيان: نَاصِيتَها وقرنَيْها.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1262) عن قبيصة، حدثنا سفيان، عن هشام، عن أم الهُذيل (حفصة بنت سيرين) عن أم عطية فذكرته. هشام هو: ابن حسان.
ورواه مسلم (939/ 41) من وجه آخر عن هشام بن حسان به وفيه: قالت: فضفرنا شعرها ثلاثة أثلاثٍ، قَرنَيْها وناصِيتَيْها.
ورُوي عن حماد بن سلمة، عن أيوب وهشام وحبيب، عن محمد بن سيرين، عن أم عطية وفيه الأمر"واجعلْنَ لها ثلاثة قرون" رواه ابن حبان في صحيحه (3033) والطبراني في"الكبير" (25/ 49 - 50).
ولعل عمل أم عطية كان بأمر النبي صلى الله عليه وسلم إلا أن الرواة اختصروا في البيان.
উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যার চুল বিনুনি করে দিলাম—এর দ্বারা তিনি তিনটি বেণীর (তিনটি ভাগের) কথা বোঝান। ওয়াকী' বলেন, সুফিয়ান বলেছেন: তাঁর কপালের দিকের চুল এবং তার দু’পাশের চুল (অর্থাৎ তিনটি ভাগ)।
3493 - عن أم عطية قالت: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"اغسلنها وترًا ثلاثًا أو خمسًا أو سبعًا" وقالت: مشطناها ثلاثة قرون.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1254)، ومسلم في الجنائز (939) كلاهما من حديث أيوب، عن حفصة، عن أم عطية فذكرته.
উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা তাকে বেজোড় সংখ্যায় গোসল দাও— তিনবার, অথবা পাঁচবার, অথবা সাতবার।" তিনি আরও বলেন, আমরা তার চুলগুলোকে তিনটি বেণীতে বিন্যস্ত করে দিলাম।
3494 - عن أم عطية قالت: توفيتْ إحدى بنات النبي صلى الله عليه وسلم فأتانا النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"اغسِلْنَها بالسِدر وترًا ثلاثًا أو خمسًا، أو أكثر من ذلك إن رأيتُن ذلك، واجعلْنَ في
الآخرة كافورًا، أو شيئًا من كافور، فإذا فرغتُنَّ فآذِنِّنِي، فلما فرغنا آذنَّاه، فألقى إلينا حِقْوه، فضفرنا شعرها ثلاثة قرون، وألْقيناها خلفها".
صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1263) عن مسدد، حدثنا يحيى بن سعيد، عن هشام بن حسان، قال: حدثنا حفصة، عن أم عطية فذكرته.
উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যাদের মধ্যে একজন ইন্তিকাল করলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট আসলেন এবং বললেন: "তোমরা তাকে বরই পাতা মেশানো পানি দ্বারা বেজোড় সংখ্যায়—তিনবার, অথবা পাঁচবার, অথবা এর চেয়েও বেশি যদি তোমরা প্রয়োজন মনে করো—গোসল দাও। আর শেষবারের পানিতে কর্পূর মিশিয়ে দাও, অথবা (বরং) কিছু কর্পূর ব্যবহার করো। যখন তোমরা গোসল শেষ করবে, তখন আমাকে জানাবে।" যখন আমরা গোসল শেষ করলাম, তখন তাঁকে জানালাম। তখন তিনি তাঁর কোমরবন্ধ (লুঙ্গী) আমাদের দিকে ছুঁড়ে দিলেন (বা দিলেন)। অতঃপর আমরা তাঁর চুলগুলো তিনটি বেণীতে বিভক্ত করলাম এবং তা পেছনের দিকে রেখে দিলাম।
3495 - عن ابن سيرين قال: جاءت أم عطية امرأةٌ من الأنصار من اللاتي بايعْنَ، قدمتِ البصرةَ تبادر ابنا لها فلم تُدْرِكه، فحدثتنا قالت: دخل علينا النبي صلى الله عليه وسلم ونحن نَغْسِلُ ابنتَه فقال:"اغْسِلنها ثلاثًا، أو خمسًا، أو أكثر من ذلك إن رأيتُنَّ ذلك بماءٍ وسِدْرٍ، واجعلْنَ في الآخرة كافورًا، فإذا فرغتُنَّ فآذِنَّني" قالت: فلما فرغْنَا ألْقى إلينا حِقْوه، فقال:"أشْعِرْنَها إياه" ولم يزد على ذلك، ولا أدري أي بناته، وزعم أن الإشعار الْفُفْنَها فيه.
وكذلك كان ابن سيرين: يأمر بالمرأة أن تُشْعر ولا تُؤزر.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1261) عن أحمد، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرنا ابن جريج، أن أيوب أخبره، قال: سمعت ابن سيرين يقول فذكره. وأخرجه مسلم في الجنائز (939/ 36) من وجه آخر عن أيوب نحوه إلى قوله:"أشْعِرْنَها إياه".
والإشعار: ما يلي الجسد من الثياب.
وقوله: زعم: هو أيوب كما وقع التصريح في رواية عبد الرزاق، عن ابن جريج قال: قلت لأيوب قوله: أَشْعرنَها أتؤزر به، قال: ما أراه إلا قال: الفُفْنَها فيه.
وقوله: ولا أدري أي بناته؟ هو مقول أيوب، لأنه لم يسمع تسميتها من حفصة، وبينت في روايات أخرى أنها أم كلثوم، وقيل: إنها زينب بنت النبي صلى الله عليه وسلم وسيأتي بعض التحقيقات في ذلك.
উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইবনু সীরীন (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, বাই‘আত গ্রহণকারী আনসারী নারীদের একজন উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর এক ছেলের সন্ধানে বসরার উদ্দেশ্যে রওয়ানা হলেন, কিন্তু তাকে পেলেন না। তিনি আমাদের কাছে বর্ণনা করলেন: আমরা যখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যাকে গোসল দিচ্ছিলাম, তখন তিনি আমাদের কাছে এলেন এবং বললেন: "তোমরা তাকে তিনবার, অথবা পাঁচবার, অথবা এর চেয়েও অধিকবার গোসল দাও— যদি তোমরা প্রয়োজন মনে করো— পানি ও কুল পাতা দিয়ে। আর শেষের বারে কর্পূর ব্যবহার করো। যখন তোমরা গোসল শেষ করবে, তখন আমাকে জানাবে।" তিনি (উম্মে আতিয়্যাহ) বলেন, যখন আমরা গোসল শেষ করলাম, তখন তিনি তাঁর তহবন্দ (ইযার) আমাদের দিকে ছুঁড়ে দিলেন এবং বললেন: "তা দিয়ে তাকে তার দেহের সাথে জড়িয়ে দাও (বা, পরিয়ে দাও)।" তিনি এর অতিরিক্ত আর কিছু বললেন না।
আমি জানি না, সেটি তাঁর কোন কন্যা ছিলেন। আর (বর্ণনাকারী) ধারণা করেন যে, ‘আশই’আরা’ অর্থ হলো, তোমরা তা দিয়ে তাকে আবৃত করো।
ইবনু সীরীন (রাহিমাহুল্লাহ) অনুরূপভাবে নারীকে ‘আশই’আর’ (দেহের সাথে জড়িয়ে দেওয়ার) নির্দেশ দিতেন, তবে তহবন্দ পরানোর নির্দেশ দিতেন না।
3496 - عن عائشة قالت: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كفِّن في ثلاثة أثواب بيضٍ سُحولية، ليس فيها قميص ولا عِمامة.
متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (5) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
ورواه البخاري في الجنائز (1273) عن إسماعيل، عن مالك به.
ورويا -البخاري (1271)، ومسلم (941/ 46) كلاهما- من طريق سفيان بن عيينة، عن هشام به مثله.
وفي وجه عن هشام بإسناده عن عائشة قالت: أدرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حلة يمنية كانت لعبد الله بن
أبي بكر، ثم نُزِعتْ عنه، وكفِّن في ثلاثة أثواب سُحول يمانيةٍ، ليس فيها عمامة ولا قميص. فرفع عبد الله الحلة فقال: أُكَفَّن فيها. ثم قال: لم يُكفَّنْ فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأُكَفَّن فيها؟ فتصدق بها.
قوله:"سحولية" وفي رواية:"سحولية يمانية"، وفي رواية"سحولية من كرسف" كما عند مسلم، وسُحول جمع سحل. وهو الثوب الأبيض النقي، ولا يكون إلا من قطن، ويُروى بالفتح نسبة إلى سحول قرية باليمن.
قال الأزهري: بالفتح المدينة، وبالضم الثياب.
ورواه أصحاب السنن: أبو داود (3152)، والترمذي (996)، والنسائي (1899)، وابن ماجه (1469)، وفيها: فذكروا لعائشة قولهم:"في ثوبين وبُرْد حبَرةٍ" فقالت: قد جاءوا ببُردِ حبرة ولكنهم ردُّوه، ولم يكفِّنُوا فيه.
وبرد حبرة: أي مخطط.
قال الترمذي:"حديث عائشة حديث حسن صحيح. وقد رُوي عن كفن النبي صلى الله عليه وسلم روايات مختلفة، وحديث عائشة أصحُّ الأحاديث التي رُويت في كفَنِ النبي صلى الله عليه وسلم، والعمل على حديث عائشة عند أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، قال سفيان الثوري: يُكفَّنُ الرجل في ثلاث أثواب: إن شئت في قميصٍ ولفافتَين، وإن شئت في ثلاث لفائف، ويُجزي ثوب واحد إن لم يجدوا ثوبين، والثوبان يُجزيان، والثلاثة لمن وجدها أحب إليهم، وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق، قالوا: تُكَفَّنُ المرأةُ في خمسة أثواب"، انتهى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তিনটি সাদা সুহুলিয়াহ কাপড়ে কাফন পরানো হয়েছিল, যার মধ্যে কোনো জামা (কামীস) বা পাগড়ি (ইমামাহ) ছিল না।
মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মালিক (জানায়েয: ৫)-এ এটি বর্ণনা করেছেন হিশাম ইবনু উরওয়া থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি তা বর্ণনা করেছেন।
আর ইমাম বুখারী (জানায়েয: ১২৭৩)-এ এটি বর্ণনা করেছেন ইসমাঈল থেকে, তিনি মালিক থেকে, এই সূত্রে।
আর তাঁরা দু'জন—বুখারী (১২৭১) এবং মুসলিম (৯৪১/৪৬)—উভয়েই সুফইয়ান ইবনু উয়ায়নাহ-এর সূত্রে হিশাম থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
হিশাম থেকে অপর বর্ণনায় তার সূত্রে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে ইয়ামানী এক জোড়া কাপড়ের মধ্যে মোড়ানো হয়েছিল, যা ছিল আবদুল্লাহ ইবনু আবী বাকরের। অতঃপর তা তাঁর শরীর থেকে খুলে নেওয়া হলো এবং তাঁকে ইয়ামানী তিনটি সুহুল কাপড়ে কাফন পরানো হলো, যার মধ্যে পাগড়ি বা জামা ছিল না। অতঃপর আবদুল্লাহ সেই জোড়া কাপড়টি নিলেন এবং বললেন, আমি কি এতে কাফন পরিব? পরে তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তো এতে কাফন পরানো হলো না, আর আমি এতে কাফন পরিব? অতঃপর তিনি তা সাদাকা করে দিলেন।
তাঁর উক্তি ‘সুহুলিয়াহ’ (سحولية)। অন্য বর্ণনায় আছে ‘সুহুলিয়াহ ইয়ামানী’ (سحولية يمانية), এবং মুসলিমের বর্ণনায় আছে ‘সুহুলিয়াহ যা কার্সাফ (তুলা) দ্বারা নির্মিত’। ‘সুহুল’ হলো ‘সাহল’-এর বহুবচন। এর অর্থ সাদা ও পরিষ্কার কাপড়, যা শুধুমাত্র তুলা দিয়েই তৈরি হয়। এটিকে (স-এর উপর) ফাতহা দিয়েও পাঠ করা হয়, যা ইয়ামানের সুহুল নামক একটি গ্রামের দিকে সম্বন্ধযুক্ত।
আযহারী বলেন: ফাতহা দিয়ে (সহুল) দ্বারা শহর বোঝায় এবং দম্মা দিয়ে (সুহুল) দ্বারা কাপড় বোঝায়।
আর সুনান গ্রন্থসমূহের রচয়িতাগণ—আবূ দাউদ (৩১৫২), তিরমিযী (৯৯৬), নাসাঈ (১৮৯৯), ও ইবনু মাজাহ (১৪৬৯) এটি বর্ণনা করেছেন। তাতে আছে: অতঃপর তাঁরা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে তাঁদের এই উক্তি উল্লেখ করলেন যে, (তাকে) ‘দুটি কাপড়ে ও একটি হিবরাহ চাদরে কাফন পরানো হয়েছিল।’ তখন তিনি বললেন: তারা হিবরাহ চাদর এনেছিল বটে, কিন্তু তারা তা ফিরিয়ে দিয়েছিল এবং তাতে কাফন পরানো হয়নি।
‘বুরদু হিবরাহ’ অর্থ নকশা বা ডোরাকাটা চাদর।
ইমাম তিরমিযী বলেন: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি হাসান সহীহ। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাফন সম্পর্কে বিভিন্ন বর্ণনা এসেছে। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাফন সম্পর্কে যে হাদীসগুলো বর্ণিত হয়েছে, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি সেগুলোর মধ্যে সর্বাধিক সহীহ। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ এবং তাদের পরবর্তী অধিকাংশ জ্ঞানীর নিকট আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস অনুযায়ী আমল করার নীতি প্রচলিত। সুফইয়ান সাওরী বলেন: পুরুষকে তিনটি কাপড়ে কাফন পরানো হবে। তুমি চাইলে একটি কামীস (জামা) ও দুটি চাদরে, অথবা চাইলে তিনটি চাদরে কাফন পরাতে পার। যদি দুটি কাপড় না পায়, তবে একটি কাপড়ও যথেষ্ট হবে। আর দুটি কাপড়ও যথেষ্ট। আর যারা তিনটি কাপড় পায়, তাদের কাছে তা বেশি পছন্দনীয়। এটিই শাফিঈ, আহমাদ ও ইসহাক (রহ.)-এর অভিমত। তারা বলেন: নারীকে পাঁচটি কাপড়ে কাফন পরানো হবে। (সমাপ্ত)।
3497 - عن عائشة قالت: دخلت على أبي بكر فقال: في كم كفَّنتُم النبي صلى الله عليه وسلم؟ قالت: في ثلاثة أثواب بيض سَحولية ليس فيها قميص ولا عمامة، وقال لها: في أي يوم توفي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم؟ قالت: يومَ الاثنين، قال: فأيُّ يوم هذا؟ قالت: يوم الاثنين، قال: أرجو فيما بيني وبين الليلة، فنظر إلى ثوب عليه كان يمرض فيه، به رَدْعٌ من زعفران فقال: اغسلوا ثوبي هذا، وزيدوا عليه ثوبين فكفنوني فيهما، قلت: إن هذا خَلَقٌ، قال: إن الحيَّ أحق بالجديد من الميت، إنما هو للمهلة، فلم يتوف حتى أمسى من ليلة الثلثاء، ودُفن، قبل أن يُصبح.
صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1387) عن معلي بن أسد، حدثنا وُهيب، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
ورواه مالك في الجنائز (6) عن يحيى بن سعيد بلاغًا، أن أبا بكر قال لعائشة فذكر نحوه مختصرًا.
وقوله:"للمهلة" قال عياض: رُوي بضم الميم، وفتحها، وكسرها، وقال ابن حبيب: هو
بالكسر: الصديد، وبالفتح: التمهل، وبالضم: عكر الزيت. والمراد الصديد.
ورواه ابن حبان في صحيحه (3036) من وجه آخر عن مجاهد بن وردان، عن عروة، عن عائشة قالت: كنت عند أبي بكر حين حضرتْه الوفاة، فتمثلثُ بهذا البيت:
من لا يزال دمْعُه مُقَنَّعًا … يُوشِك أن يكون مَدْفُوقا
فقال: يا بُنَيَّةُ لا تقولي هكذا، ولكن قولي: {وَجَاءَتْ سَكْرَةُ الْمَوْتِ بِالْحَقِّ ذَلِكَ مَا كُنْتَ مِنْهُ تَحِيدُ} [ق: 19] ثم قال: في كم كُفِّن النبي صلى الله عليه وسلم؟ فقلت: في ثلاثة أثواب، فقال: كفِّنوني في ثوبيَّ هذين، واشتروا إليهما ثوبًا جديدًا، فإن الحي أحوج إلى الجديد من الميت، وإنما هي للمِهْنة، أو للمهلة، ورواه أيضًا الإمام أحمد (24122) باختلاف بعض الألفاظ.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তখন তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তোমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কয়টি কাপড়ে কাফন দিয়েছিলে? তিনি (আয়েশা) বললেন: তিনটি সাদা সাহূলী (ইয়ামানের তৈরি মোটা সাদা কাপড়) কাপড়ে। এর মধ্যে কোনো জামা (কামীস) বা পাগড়ি ছিল না। তিনি (আবূ বাকর) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোন দিন ইন্তিকাল করেছিলেন? তিনি বললেন: সোমবার। তিনি (আবূ বাকর) বললেন: আজ কোন দিন? তিনি বললেন: সোমবার। তিনি বললেন: আমি আশা করি, আজকের দিন ও রাতের মধ্যেই (আমারও ইন্তিকাল হবে)। অতঃপর তিনি তার পরিহিত একটি কাপড়ের দিকে তাকালেন, যা অসুস্থতার সময় তিনি পরেছিলেন এবং তাতে জাফরানের দাগ লেগেছিল। তিনি বললেন: আমার এই কাপড়টি ধুয়ে দাও এবং এর সাথে আরও দু'টি কাপড় যোগ করে আমাকে কাফন দাও। আমি (আয়েশা) বললাম: এটি তো পুরনো। তিনি বললেন: জীবিত ব্যক্তিই মৃত ব্যক্তির চেয়ে নতুন কাপড়ের বেশি হকদার। এটি (কাফন) তো শুধুমাত্র ক্ষয় হওয়ার জন্য। অতঃপর তিনি মঙ্গলবার রাতের সন্ধ্যা না হওয়া পর্যন্ত ইন্তিকাল করলেন না এবং সুবহে সাদিকের পূর্বেই তাঁকে দাফন করা হলো।
3498 - عن عبد الله بن عمر قال: كُفِّن رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في ثلاث رباطٍ بيضٍ سُحوليةٍ.
حسن: رواه ابن ماجه (1470) عن محمد بن خلف العسقلاني قال: حدثنا عمرو بن أبي سلمة، قال: هذا ما سمعتُ من أبي مُعَيد حفص بن غيلان، عن سليمان بن موسى، عن نافع، عن عبد الله بن عمر فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل حفص بن غيلان، وشيخه سليمان بن موسى وهو الأشدق فهما صدوقان، وإلى هذا أشار البوصيري بقوله:"هذا إسناد حسن لقصور سليمان بن موسي وحفص بن غياث عن درجة أهل الحفظ والضبط، وأصله في الصحيحين من حديث عائشة وابن عباس".
قلت: أما حديث عائشة فهو صحيح كما سبق، وأما حديث ابن عباس فهو ضعيف كما سيأتي وأما ما رُوي عن علي بن أبي طالب بأن النبي صلى الله عليه وسلم كُفِّن في سبعة أثواب، فهو ضعيف. رواه الإمام أحمد (728)، والبزار -البحر الزخار- (646) كلاهما من طريق حماد بن سلمة، عن عبد الله ابن محمد بن عقيل، عن محمد بن علي (المعروف بابن الحنفية) عن أبيه، علي بن أبي طالب فذكره.
قال البزار: هذا الحديث لا نعلم أحدًا تابع ابن عقيل على روايته هذه، ولا نعلم أحدًا رواه عن ابن عقيل بهذا الإسناد إلا حماد بن سلمة" انتهى.
وأما الهيثمي فحسَّن إسناده في"المجمع" (3/ 23).
قلت: وهو كذلك فإن عبد الله بن محمد بن عقيل حسن الحديث.
ولكن فيه علة خفية وهى مخالفته للأحاديث الصحيحة.
وقد نبَّه عليه الحافظ في"التلخيص الحبير" (2/ 108) فقال في ابن عقيل:"سيء الحفظ، يصلح حديثه للمتابعات، فأما إذا انفرد فيُحسَّن، وأما إذا خالف فلا يُقبل، وقد خالف هو رواية نفسه، فروى عن جابر أنه صلى الله عليه وسلم كُفِّن فِي ثوب نمرة" انتهى.
وأورده ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (2/ 415) وضعَّفه لأجل ابن عقيل. ونقل عن ابن
حبان:"ردئُ الحفظ، يحدث على التوهم، فيجئ بالخبر على غير سُنَنِه، فوجب مجانبة أخباره" وبه أعله الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 261 - 262).
قلت: لأن الصحيح كما سبق أن النبي صلى الله عليه وسلم كُفِّن في ثلاثة أثواب.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن الفضل بن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم كُفِّن في ثوبين سحوليين أبيضين. رواه الطبراني في"الكبير" (18/ 275) من حديث علي بن المديني، عن إبراهيم بن سليمان أبي سليمان المؤدب، عن يعقوب بن عطاء، عن أبيه، عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس فذكره.
ويعقوب بن عطاء وهو ابن أبي رباح المكي الجمهور على تضعيفه منهم: أحمد وابن معين وأبو زرعة والنسائي وأبو حاتم، إلا أن ابن حبان فذكره في"الثقات" (7/ 639) وأخرج الحديث في صحيحه (3035).
ورواه أيضًا أبو يعلي من طريق سليمان الشاذكوني، عن يحيى بن أبي الهيثم، عن عثمان بن عطاء، عن أبيه، عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس فذكره. وسليمان هذا ضعيف، وقد اتُّهِم.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم كُفِّن في ثوبين أبيضين، وفي برد أحمر فإنه منكر. رواه الإمام أحمد (2284) عن عفان، حدثنا عبد الواحد، حدثنا الحجاج بن أرطاة، حدثنا أبو جعفر محمد بن علي.
قال: يعني حجاجًا، حدثني الحكم، عن مِقسم، عن ابن عباس فذكره.
والحجاج وصف بكثرة الخطأ والتدليس، فلعل هذا من خطئه، لأن الصحيح الثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم كُفِّن في ثلاثة أثواب بيض سحولية، وقد رُوي عنه ما يوافق ذلك إلا أن فيه يزيد بن أبي زياد وهو أضعف منه، فقد رواه عن مِقسم، عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم كُفِّن في ثلاثة أثواب: في قميصه الذي مات فيه، وحلةٍ نجرانيةٍ، الحلَّة ثوبان. رواه أبو داود (3153) عن الإمام أحمد وهو في مسنده (1942) قال: حدثنا ابن إدريس، قال: أخبرنا يزيد -يعني ابن أبي زياد، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره.
ورواه أيضًا ابن ماجه (1471) من طريق عبد الله بن إدريس بإسناده ويزيد بن أبي زياد لا يحتج به لضعفه، لا سيما وقد خالف رواية الثقات. قال الحافظ ابن حجر:"تفرد يزيد بن أبي زياد، وقد تغير، وهذا من ضعيف حديثه""التلخيص" (2/ 108).
وقال الترمذي:"حديث عائشة أصح الأحاديث التي رُويتْ في كفن النبي صلى الله عليه وسلم.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كُفِّن في ثلاثة أثواب، أحدها قميص، رواه الطبراني في"الأوسط" (2118) عن أحمد بن زهير، ثنا محمد بن عبد الله بن عبيد بن عقيل المقرئ، ثنا مسلم بن إبراهيم، ثنا حماد بن سلمة، عن حميد، عن أنس بن مالك فذكره.
قال الطبراني: لم يروه عن حميد إلا حماد، ولا عنه إلا مسلم، تفرد به المقرئ، وفي نسخة: عقيل.
قلت: في المتن نكارة، فإن النبي صلى الله عليه وسلم لم يُكَفَّن في القميص كما ثبت في الصحيحين، لعل هذا مما أخطأ فيه حماد بن سلمة؛ لأنه تغير حفظه بآخره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তিনটি সাদা সাহুলিয়া (ইয়ামানি) চাদরে কাফন দেওয়া হয়েছিল।
3499 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كفَّن حمزة بن عبد المطلب في نمرةٍ في ثوب واحد.
حسن: رواه الترمذي (997) عن ابن أبي عمر، حدثنا بشر بن السري، عن زائدة، عن عبد الله ابن محمد بن عقيل، عن جابر فذكره.
ورواه الإمام أحمد (14521) من طريق زائدة بإسناده.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
والنمرة: شملة فيها خطوط بيضٌ وسودٌ، أو بردة من صوف تلبسها الأعراب.
وجاء في حديث أنس قال: دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بنمرة فكفَّنه فيها، قال: وكانت إذا مُدَّتْ على رأسه بدتْ قدماه، وإذا مُدَّتْ على قدميه بدا رأسُه، رواه الإمام أحمد (12300) وفيه أسامة بن زيد الليثي، قال البخاري:"أخطأ فيه أسامة بن زيد، فإن الصواب أنه حديث جابر بن عبد الله". انظر باب دفن الجماعة في قبر واحد.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হামযা ইবনে আব্দুল মুত্তালিবকে একটি নামিরাহ (চাদর)-এর মধ্যে মাত্র একটি কাপড়ে কাফন পরিয়েছিলেন।
3500 - عن عروة قال: أخبرني أبي الزبيرُ أنه لما كان يوم أُحُدٍ أقبلت امرأةٌ تسعى، حتَّى إذا كادت أن تشرِف على القتلى، قال: فكرهَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم أن تراهم، فقال:"المرأة المرأة". قال الزبير: فتوسَّمتُ أنها أمِّي صفيَّة، قال: فخرجتُ أسعى إليها، فأدركتها قبل أن تنتهي إلى القتلى، قال: فلَدَمَتْ في صدري، وكانت امرةً جلدةً، قالت: إليك، لا أرضَ لك. قال: فقلتُ: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم عزم عليك. قال: فوقفتْ، وأخرجتْ ثوبين معها، فقالت هذان ثوبان جئتُ بهما لأخي حمزة، فقد بلغني مقتلُه، فكفِّنوه فيهما، قال: فجئنا بالثوبين لنكفِّن فيهما حمزةَ، فإذا إلى جنبه رجُلٌ من الأنصار قتيلٌ، قد فُعِلَ به كما فُعِلَ بحمزة، قال: فوجدْنا غضاضةً وحياءً أنْ نُكَفِّن حمزة في ثوبين، والأنصاريُّ لا كفن له، فقلنا: لحمزة ثوبٌ، وللأنصاريِّ ثوبٌ، فقدرناهما فكان أحدهما أكبر من الآخر، فأَقْرعْنا بينهما، فكفَّنَّا كلَّ واحدٍ منهما في الثوب الذي طارَ له.
حسن: رواه الإمام أحمد (1418)، والبزار (980)، وأبو يعلى (686)، كلهم من طريق سليمان بن داود الهاشمي، أخبرنا عبد الرحمن -يعني ابن أبي الزياد، عن هاشم، عن عروة، عن
أبيه الزبير، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي الزياد فإنه حسن الحديث.
ورواه البيهقي (3/ 401 - 402) من وجه آخر عن هشام بن عروة بإسناده قال النووي في"الخلاصة" (3392):"إسناده صحيح".
وقوله:"لدمتْ" أي ضربت ودفعت في صدري.
যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি জানান, যখন উহুদের যুদ্ধের দিন ছিল, তখন এক মহিলা দ্রুতবেগে এগিয়ে আসছিলেন। এমনকি তিনি যখন নিহতদের কাছাকাছি পৌঁছানোর উপক্রম হলেন, তিনি (যুবাইর) বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম চাইলেন না যে তিনি তাদের (নিহতদের) দেখেন। তাই তিনি বললেন: “ঐ মহিলাকে, ঐ মহিলাকে (ফিরিয়ে দাও)।” যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন আমি বুঝতে পারলাম যে তিনি আমার মা সাফিয়্যাহ। তিনি (যুবাইর) বলেন, তখন আমি দ্রুত তার দিকে ছুটে গেলাম এবং নিহতদের কাছে পৌঁছানোর আগেই তাকে ধরে ফেললাম। তিনি বলেন, তখন তিনি আমার বুকে ধাক্কা মারলেন। তিনি ছিলেন একজন শক্তিশালী মহিলা। তিনি বললেন: দূর হও! আল্লাহ তোমার মঙ্গল না করুন! তিনি (যুবাইর) বলেন, আমি বললাম: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আপনাকে কসম দিয়েছেন (বা দৃঢ়ভাবে নিষেধ করেছেন)। তিনি বলেন, তখন তিনি থেমে গেলেন এবং তার সাথে থাকা দুটি কাপড় বের করলেন। তিনি বললেন: এই দুটি কাপড় আমি আমার ভাই হামযা’র জন্য নিয়ে এসেছি। আমি তার শহীদ হওয়ার খবর পেয়েছি। তোমরা এই দুটিতে তাকে কাফন দাও। তিনি বলেন, আমরা হামযাকে কাফন দেওয়ার জন্য কাপড় দুটি নিয়ে এলাম। দেখলাম, তার পাশেই একজন আনসারী লোক নিহত হয়ে পড়ে আছেন, হামযা’র সাথে যা করা হয়েছে, তার সাথেও তাই করা হয়েছে। তিনি বলেন, হামযাকে দুটি কাপড়ে কাফন দিতে এবং আনসারী লোকটিকে কাফনহীন রাখতে আমরা লজ্জাবোধ করলাম। তাই আমরা বললাম: হামযা’র জন্য একটি কাপড় এবং আনসারী’র জন্য একটি কাপড়। আমরা কাপড় দুটি পরিমাপ করলাম। দেখা গেল একটি অপরটির চেয়ে বড়। অতঃপর আমরা তাদের (কাপড়) মধ্যে লটারি করলাম এবং যার ভাগ্যে যে কাপড়টি পড়ল, তাকে সেই কাপড়েই কাফন দিলাম।
3501 - عن جابر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا توفي أحدكم فوجد شيئًا فليكفَّن في ثوب حِبرةٍ".
حسن: رواه أبو داود (3150) عن الحسن بن الصباح البزار، حدثنا إسماعيل -يعني ابن عبد الكريم- حدثني إبراهيم بن عقيل بن معقل، عن أبيه، عن وهب بن منبه، عن جابر فذكره.
وإسناده حسن من أجل إبراهيم بن عقيل فإنه"صدوق"، وأمَّا أبوه عقيل بن معقل فإنَّ الحافظ وإنْ قال فيه"صدوق"، إلَّا أنَّ أحمد وابن معين وغيرهما وثَّقوه.
ورواه الإمام أحمد (14601) من وجه آخر عن جابر وفيه قال النبي صلى الله عليه وسلم:"من وجد مشقةً فليكفَّن في ثوب حِبرةٍ". وفي إسناده ابن لهيعة قال: حدثنا أبو الزبير، عن جابر فذكره. وابن لهيعة فيه كلام.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: যখন তোমাদের কারো মৃত্যু হয় এবং সে যদি কিছু সংস্থান পায়, তবে তাকে যেন 'হিবরা' কাপড়ের দ্বারা কাফন দেওয়া হয়।
3502 - عن أم عطية قالت: دخل علينا النبي صلى الله عليه وسلم ونحن نغسل ابنته، فلما فرغنا ألقي إلينا حِقْوه، فقال:"أشعرنها إياه".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1261)، ومسلم في الجنائز (929: 36) كلاهما من حديث أيوب، عن ابن سيرين، عن أم عطية فذكرته في كيفية غسل النبي صلى الله عليه وسلم.
وقال الحافظ في"الفتح" (3/ 133):"ورواه الجوزقي من طريق إبراهيم بن حبيب بن الشهيد، عن هشام، عن حفصة، عن أم عطية قالت: فكفنّاها في خمسة أثوابٍ، وخمّرناها كما يخمّر الحيُّ، وقال هذه الزيادة صحيحة الإسناد".
وأما ما رُوي عن ليلى بنت قائف الثقفيّة قالت: كنت فيمن غسَّل أم كلثوم بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم عند وفاتها، فكان أول ما أعطانا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الحِقا، ثم الدرع، ثم الخمار، ثم الملحفة ثم أُدرجتْ بعد في الثوب الآخر. قالت: ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالس عند الباب معه كفنها يُناولنا ثوبًا ثوبًا. فهو ضعيف.
رواه أبو داود (3157) عن أحمد بن حنبل، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثنا أبي، عن ابن
إسحاق، حدثني نوح بن حكيم الثقفي، وكان قارئًا للقرآن، عن رَجُل من بني عروة بن مسعود، يقال له داود، قد ولدتْه أم حبيبة بنت أبي سفيان، زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن ليلي بنت قائف قالت: فذكرته.
والصحيح أن هذه قصة في زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم كما قال أهل العلم.
وفي إسناده: نوح بن حكيم الثقفي مجهول.
وفيه أيضا: رجل من بني عروة بن مسعود يقال له: داود، ووُصف بأنه ولدتْه أم حبيبة بنت أبي سفيان، وقد أطال الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 258) في الرد على هذا الزعم، والخلاصة أنه لا يُعرف من هو؟ .
ومن أجله وأجل الراوي عنه وهو نوح الثقفي ضُعِّفَ هذا الحديث.
ونظرا لضعف هذا الحديث ذهبَ بعضُ أهل العلم إلى أنه لا فرق بين كفن المرأة وكفن الرجل، فيُكفنُ كلٌّ منهما في ثلاثة أثواب.
وذهب الأئمة الأربعة وأصحابهم إلى أن الأفضل للمرأة أن تكفن في خمسة أثواب لحديث ليلى بنت قائف، وأعضدوه بقول بعض التابعين مثل الحسن البصري وغيره كما أن الزيادة التي ذكرها الجوزقي في حديث أم عطية تساندهم، بل وقد قال المالكية: الأفضل للمرأة أن تكفن في سبعة أثواب بزيادة لفافتين.
উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এলেন, যখন আমরা তাঁর কন্যাকে গোসল দিচ্ছিলাম। যখন আমরা (গোসল দেওয়া) শেষ করলাম, তখন তিনি আমাদের দিকে তাঁর তহবন্দ (লুঙ্গি/ইযার) নিক্ষেপ করলেন এবং বললেন, "তাকে তা (শরীরের) পোশাক হিসাবে পরিয়ে দাও (অর্থাৎ ভেতরের দিকে রেখে দাও)।"
3503 - عن عبد الله بن عباس قال: كان رجل واقف مع النبي صلى الله عليه وسلم بعرفة، فوقع عن راحلته. قال أيوب: فوقصتْه، وقال عمرو: فأقصعتْه - فمات، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اغسِلوه بماء وسدر، وكفِّنُوه في ثوبين، ولا تُحنِّطوه، ولا تُخمِّروا رأسه، فإنه يُبعث يوم القيامة".
قال أيوب: يُلَبِّي، وقال عمرو: ملبيًا.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1268)، ومسلم في الجنائز (1206) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار وأيوب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم قريب منه إلا أن فيه عكس ما نقل عن أيوب وعمرو في الوقصة والتلبية.
وقوله:"ثوبين" أي -في ثوبيه كما في رواية سفيان بن عيينة عن عمرو عند مسلم، وفي رواية أبي بشر، عن سعيد بن جبير عند البخاري (1851).
والثوبان هما الإحرامان الذَين أحرم فيهما.
وقوله:"ولا تُحنطوه" أي تمسوه حنوطًا، والحَنوط يقال له: الحِناط أخلاط من طيب يجمع للميت خاصة، ولا تستعمل في غيره.
وقوله:"لا تخمروا رأسه" أي لا تُغطوه، وعلل كل ذلك لأنه يبعث يوم القيامة ملبيًا. فدل أن سبب النهي أنه كان محرمًا، فإذا انتفتِ العلةُ انتفى.
قال أبو داود (3238):"سمعت أحمد بن حنبل يقول:"في هذا الحديث خمس سنن:"كفِّنوه في ثوبيه" أي يكفن الميت في ثوبين."واغسلوه بماء وسدر" أي: إن في الغسلات كلها سدرًا."ولا تُخمروا رأسه"، ولا تقربوه طِيبًا، وكان الكفنُ من جميع المال".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আরাফাতে অবস্থান করছিল, তখন সে তার সওয়ারি থেকে পড়ে গেল। আইয়ুব বলেছেন: তখন সওয়ারি তাকে দলিত করে ফেলল, আর আমর বলেছেন: তখন সওয়ারি তাকে ফেলে দিলো—ফলে সে মারা গেল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তাকে পানি ও বরই পাতা (সিদর) দিয়ে গোসল দাও, তাকে দুটি কাপড়ে কাফন দাও। আর তাকে সুগন্ধি লাগিও না এবং তার মাথা ঢেকে দিও না। কেননা, সে কিয়ামতের দিন তালবিয়াহ্ পাঠকারী অবস্থায় পুনরুত্থিত হবে।"
3504 - عن جابر بن عبد الله قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم قبر عبد الله بن أبيّ بعد ما دُفن، فأخرجه فنفث فيه من ريقه، وأَلْبسه قميصَه.
وفي رواية: فوضعه على ركبتيه.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1270)، ومسلم في صفات المنافقين (2773) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار) سمع جابرًا يقول: فذكره.
قوله:"بعد ما دُفن" أي دُلّي في حفرته، وكان أهل عبد الله بن أبيّ خشوا على النبي صلى الله عليه وسلم المشقة في حضوره، فبادروا إلى تجهيزه قبل وصول النبي صلى الله عليه وسلم، فلما وصل وجدهم قد دلوه في حفرته، فأمر بإخراجه إنجازًا لوعده في تكفينه في القميص والصلاة عليه. كذا في"الفتح" (3/ 139).
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইকে দাফন করার পর তাঁর কবরের কাছে এলেন। অতঃপর তাকে (কবর থেকে) বের করলেন, তাঁর (নবীর) মুখের লালা (রিখ) তার ওপর দিলেন এবং তাকে তাঁর নিজের জামা পরিধান করালেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: অতঃপর তিনি তাকে নিজের হাঁটুর ওপর রাখলেন।
3505 - عن عبد الله بن عمر أن عبد الله بن أبيّ لما توفي جاء ابنه إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! أعطني قميصك أُكفِّنه فيه، وصلِّ عليه، واستغفر له، فأعطاه النبي صلى الله عليه وسلم قميصه فقال:"آذني أصلي عليه". فآذنه: فلما أراد أن يُصلي عليه جذبه عمر رضي الله عنه فقال: أليس الله قد نهاك أن تصلي على المنافقين؟ فقال: أنا بين خيرَتين قال: {اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ} [التوبة: 80] فصلى عليه، فنزلت: {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا} [التوبة: 84].
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1269)، ومسلم في صفات المنافقين (2774) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. قال مسلم: وزاد: فترك الصلاة عليهم.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই যখন মারা গেল, তখন তার ছেলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনার জামাটি আমাকে দিন, যেন আমি তাকে তাতে কাফন পরাতে পারি, আর আপনি তার জন্য সালাত আদায় করুন এবং তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন।' অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তাঁর জামাটি দিলেন এবং বললেন, "আমাকে জানাও, আমি তার উপর সালাত আদায় করব।" সে তাঁকে জানাল। যখন তিনি (নবী) তার উপর সালাত আদায় করতে চাইলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে আকর্ষণ করে ধরলেন এবং বললেন, 'আল্লাহ কি আপনাকে মুনাফিকদের উপর সালাত আদায় করতে নিষেধ করেননি?' তিনি (নবী) বললেন, 'আমি দুটি পছন্দের মাঝে আছি।' (অর্থাৎ, আল্লাহ বলেছেন:) {তুমি তাদের জন্য ক্ষমা চাও অথবা না চাও, তুমি সত্তর বার তাদের জন্য ক্ষমা চাইলেও আল্লাহ কখনই তাদের ক্ষমা করবেন না} [সূরা আত-তাওবা: ৮০]। অতঃপর তিনি তার উপর সালাত আদায় করলেন। তখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {আর তাদের (মুনাফিকদের) মধ্যে যে কেউ মারা গেলে আপনি কখনই তার উপর (জানাযার) সালাত আদায় করবেন না} [সূরা আত-তাওবা: ৮৪]।
3506 - عن أسامة بن زيد قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم يعود عبد الله بن أبيّ في مرضه الذي مات فيه، فلما دخل عليه عرف فيه الموت قال:"قد كنتُ أنهاك عن حب يهود" قال: فقد أبغضهم أسعدُ بن زُرارة فمه؟ . فلما مات أتاه ابنه فقال: يا رسول الله! إن عبد الله بن أبي قد مات، فأعطني قميصك أُكفّنه فيه. فنزع رسول الله صلى الله عليه وسلم قميصه
فأعطاه إياه.
حسن: رواه أبو داود (3094) عن عبد العزيز بن يحيي، حدثنا محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن الزهري، عن عروة، عن أسامة بن زيد فذكره.
ومحمد بن إسحاق مدلس، ولكنه صرَّح بالتحديث في السيرة، ومنه رواه البيهقي في"الدلائل" (5/ 285) وابن كثير في"التاريخ" (5/ 34) وبهذا صار الإسناد حسنًا.
قال الواقدي: مرض عبد الله بن أبيّ في ليال بقين من شوال، ومات في ذي القعدة، وكان مرضه عشرين ليلة، فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعوده فيها، فلما كان اليوم الذي مات فيه دخل عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يجود بنفسه فقال:"قد نهيتك عن حب يهود" فقال: قد أبغضهم أسعد بن زرارة فما نفعه؟ ثم قال: يا رسول الله! ليس هذا الحين عتاب هو الموت، فأحضر غسلي وأعطني قميصك الذي يلي جلدك، فكفِّني فيه، وصلِّ علّي، واستغفر لي، ففعل ذلك به رسول الله صلى الله عليه وسلم.
ذكره ابن كثير في تاريخه (5/ 34 - 35) وقال:"وروى البيهقي من حديث سالم بن عجلان، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، نحوا مما ذكره الواقدي".
قلت: وهو سيأتي.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইয়ের শেষ রোগ, যেটাতে সে মারা গিয়েছিল, তাতে তাকে দেখতে বের হলেন। যখন তিনি তার কাছে প্রবেশ করলেন, তখন তার মধ্যে মৃত্যুর আলামত দেখতে পেলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি তোমাকে ইয়াহুদিদের ভালোবাসতে বারণ করতাম।" সে (আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই) বলল, "আসআদ ইবনে যুরারা তো তাদের ঘৃণা করত, তাতে কী লাভ হলো?" এরপর যখন সে মারা গেল, তখন তার ছেলে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই মারা গিয়েছে। আপনার জামাটি আমাকে দিন, যাতে আমি তাকে কাফন দিতে পারি।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর জামা খুলে তাকে দিলেন।
3507 - عن ابن عباس، أن عبد الله بن عبد الله بن أبيّ قال له أبوه: أي بني! اطلب ثوبًا من ثياب النبي صلى الله عليه وسلم تُكَفِّني فيه، ومره فليصَلِّ عليَّ، قال: فأتاه فقال: يا رسول الله! قد عرفت شرف عبد الله، وهو يطلب إليك ثوبًا من ثيابك نُكَفِّنه فيه، وتُصلي عليه، فقال عمر: يا رسول الله! أتصلي عليه، وقد نهاك الله أن تصلي عليه؟ فقال:"أين؟" فقال: {اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ} [التوبة: 80] قال: فإني سأزيد على سبعين، فأنزل الله: {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا} [التوبة: 84] قال: فأرسل إلى عمر فأخبره بذلك.
حسن: رواه البيهقي في"الدلائل" (5/ 288) عن بشر بن السري، حدثنا رباح بن أبي معروف المكي، حدثنا سالم بن عجلان، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
ورجاله رجال الصحيح غير أن رباح بن أبي معروف وشيخه سالم بن عجلان فيهما كلام إلا أنهما حسنا الحديث، ولم يسق البيهقي بقية الإسناد إلى بشر بن السري، والله أعلم.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু উবাইকে তার পিতা (আবদুল্লাহ ইবনু উবাই) বলল: হে বৎস! তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পোশাকের মধ্য থেকে একটি পোশাক চেয়ে নাও, যেন তা দিয়ে আমাকে কাফন দেওয়া যায় এবং তাকে বলো যেন তিনি আমার জানাযার সালাত পড়েন। ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু উবাই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো আবদুল্লাহর মর্যাদা সম্পর্কে অবগত আছেন। সে আপনার কাছে আপনার পোশাকের মধ্য থেকে একটি পোশাক চেয়েছে যেন তাকে তা দিয়ে কাফন দেওয়া যায় এবং আপনি তার জানাযার সালাত পড়েন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি তার উপর সালাত পড়বেন? অথচ আল্লাহ আপনাকে তার উপর সালাত পড়তে নিষেধ করেছেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "কোথায় (নিষেধ করা হয়েছে)?" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (তিনি এই আয়াত পাঠ করলেন): {আপনি তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন বা না করুন—যদি আপনি সত্তর বারও তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেন, তবুও আল্লাহ তাদেরকে কখনো ক্ষমা করবেন না} [সূরা আত-তাওবাহ: ৮০]। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি অবশ্যই সত্তর বারের চেয়ে বেশি ক্ষমা চাইব। তখন আল্লাহ নাযিল করলেন: {তাদের মধ্যে যে কেউ মারা যায়, আপনি কখনো তার জানাযার সালাত পড়বেন না} [সূরা আত-তাওবাহ: ৮৪]। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন উমারের নিকট লোক পাঠিয়ে এই বিষয়ে তাকে জানিয়ে দিলেন।
