হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3508)


3508 - عن جابر بن عبد الله قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم خطب يومًا فَذَكر رجلًا من أصحابه قُبض فكُفِّن في كفَنٍ غير طائلٍ، وقُبر ليلًا فزجر النبي صلى الله عليه وسلم أن يُقْبر الرجل بالليل حتى
يُصلي عليه، إلا أن يُضطر إنسان إلى ذلك.

وقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا كفَّن أحدكم أخاه فليُحَسِّنْ كفَنَه".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (943) من طرق، عن حجاج بن محمد، قال: قال ابن جريج: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يُحَدِّث أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب يومًا فذكر الحديث مثله. وقوله:"غير طائل" أي حقير، غير كامل الستر.

وقوله:"زجر النبي صلى الله عليه وسلم أن يُقبر الرجل بالليل" حمل أهل العلم على الرجل المذكور لأنه فاتته صلاةُ النبي صلى الله عليه وسلم، وإلا فالجمهور على أنه يجوز دفن الميت بالليل، وقد دُفن أبو بكر بالليل، فمن كره الدفن بالليل رأى أن المصلين عليه يقلون لملازمتهم البيوت.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একদিন ভাষণ দিচ্ছিলেন। তখন তিনি তাঁর সাহাবীদের মধ্য হতে এমন এক ব্যক্তির কথা উল্লেখ করলেন, যার ইন্তেকাল হয়েছিল এবং তাকে একটি নিম্নমানের কাফনে কাফন দেওয়া হয়েছিল এবং তাকে রাতের বেলা দাফন করা হয়েছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নিষেধ করলেন (বা ধমক দিলেন) যেন কোনো ব্যক্তিকে রাতের বেলা দাফন করা না হয়, যতক্ষণ না তার জানাযার সালাত আদায় করা হয়, তবে যদি কেউ (দাফন করার জন্য) বাধ্য হয় (তাহলে ভিন্ন কথা)। আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “তোমাদের মধ্যে যখন কেউ তার ভাইকে কাফন পরাবে, তখন সে যেন তার কাফনকে উত্তম করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3509)


3509 - عن أبي قتادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ولي أحدكم أخاه فليحسنْ كفَنَه".

حسن: رواه الترمذي (995)، وابن ماجه (1474) كلاهما عن محمد بن بشار، قال: حدثنا عمر بن يونس، قال: حدثنا عكرمة بن عمار، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن أبي قتادة فذكر الحديث.

قال الترمذي:"حديث حسن".

قلت: وهو كما قال، فإن عكرمة بن عمار وهو العجلي مختلف فيه. وثقه أبو داود والعجلي والدارقطني وغيرهم، وتكلم فيه الإمام أحمد وابن المديني والبخاري وغيرهم، إلا أنه حسن الحديث في غير روايته عن يحيى بن أبي كثير، أشار إليه الحافظ في التقريب بقوله:"صدوق يغلط، وفي روايته عن يحيى بن أبي كثير اضطراب، ولم يكن له كتاب".

وأما ما رُوي عن علي بن أبي طالب قال: لا تُغال لي في كفن، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تغالوا في الكفن، فإنه يُسْلَبُه سلبًا سريعًا" ففيه عمرو بن هاشم أبو مالك الجَنْبي، ومن طريقه رواه أبو داود (3154) عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عامر، عن علي بن أبي طالب فذكره.

قال المنذري: فيه عمرو بن هاشم أبو مالك الجنْبي، وفيه مقال.

قلت: وهو كما قال، تكلم فيه كبار النقاد منهم: البخاري ومسلم والنسائي وأبو أحمد الحاكم، وبالغ فيه ابن حبان، وخلص الحافظ إلى القول بأنه"ليِّن الحديث".

وفي سماع عامر وهو الشعبي عن علي خلاف، والصحيح أنه سمع منه كما جاء في صحيح البخاري، وهو لا يكتفي بمجرد إمكان اللقاء، انظر"جامع التحصيل" (ص




আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার (মৃত) ভাইয়ের দায়িত্ব গ্রহণ করে, তখন সে যেন তার কাফন সুন্দর করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3510)


3510 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير ثيابكم البياض، فكفِّنوا فيها موتاكم، وألبسوها".
حسن: رواه أبو داود (3878)، والترمذي (994)، والنسائي (5113)، وابن ماجه (1472) كلهم من طريق عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكر الحديث، واللفظ لابن ماجه، وصحَّحه ابن حبان (5423)، والحاكم (1/ 354) وقال: صحيح على شرط مسلم.

وقال الترمذي:"حسن صحيح".

قلت: في إسناده عبد الله بن عثمان بن خثيم من رجال مسلم، قال فيه أبو حاتم: لا بأس به، ووثَّقه النسائي، إلا أنه ليَّنه في السنن.

والخلاصة فيه أنه حسن الحديث.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের পোশাকের মধ্যে উত্তম হলো সাদা। সুতরাং তোমরা এতে তোমাদের মৃতদের কাফন দাও এবং তোমরা তা পরিধান করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3511)


3511 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ألبسوا من ثيابكم البياض، فإنها أطهر وأطيب، وكفِّنوا فيها موتاكم".

صحيح: رواه النسائي (18796) عن عمرو بن علي، قال: حدثنا يحيى بن سعيد، قال: سمعت سعيد بن أبي عروبة، يحدث عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي المهلِّب، عن سمرة بن جندب فذكره.

وإسناده صحيح، وسعيد بن أبي عروبة وإن كان ثقة حافظًا إلا أنه كثير التدليس، واختلط، وقد تابعه معمر، عن أيوب بإسناده ولفظه:"عليكم بهذا البياض فليلبسه أحياؤُكم، وكفِّنوا فيه موتاكم، فإنه من خيار ثيابكم" رواه عبد الرزاق في"المصنف" (6198) عن معمر، ورواه الإمام أحمد (20235)، والطبراني في"الكبير" (6975)، والحاكم (4/ 185) كلهم من طريق عبد الرزاق به مثله، وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه لأن سفيان بن عيينة وإسماعيل ابن علية أرسلاه عن أيوب"، انتهى.

قلت: وأما حديث سفيان فرواه الترمذي (2810)، وابن ماجه (3567) كلاهما من طريق سفيان، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ميمون بن أبي شبيب، عن سمرة بن جندب فذكر نحوه.

قال الترمذي: حسن صحيح، وجعله الحاكم (1/ 354) شاهدًا صحيحًا لحديث ابن عباس، فلعلهما يقصدان أصل الحديث، فإنه صحيح بدون شك، وأما حديث سفيان ففيه ميمون بن أبي شبيب لم يسمع من أحد من الصحابة، قال عمرو بن علي الفلاس:"كان يحدث عن أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وحدَّث عن عمر بن الخطاب، ومعاذ بن جبل، وأبي ذر، وسمرة بن جندب، وعبد الله بن مسعود، وليس عندنا في شيء منه يقول: سمعت، ولم أُخبر أن أحدًا يزعم أنه سمع من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم"تحفة التحصيل" (322).

وكذلك لا يصح ما رواه الإمام أحمد (20105) من طريق أبي قلابة، عن سمرة، فإن أبا قلابة هو عبد الله بن زيد الجرمي لم يسمع من سمرة، إلا أن ما صَحَّ لا يُعلُّه ما لم يصح.




সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের কাপড়সমূহের মধ্যে সাদা কাপড় পরিধান করো, কারণ তা অধিকতর পবিত্র ও উত্তম। আর তোমরা তাতে তোমাদের মৃতদের কাফন পরাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (3512)


3512 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر امرأة من بني إسرائيل، حشتْ خاتمها مسكًا، والمسك أطيب الطيب.

صحيح: رواه مسلم في كتاب الألفاظ في الأدب (2252) من طرق عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

وفي رواية عند أبي داود (3158)، والترمذي (991):"أطيبُ طيبكم المسك" أخرجاه في كتاب الجنائز في باب المسك للميت.

قال الترمذي:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، وهو قول أحمد وإسحاق، وقد كره بعض أهل العلم المسك للميت" انتهى.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনী ইসরাঈলের এক নারীর কথা আলোচনা করেন, যে তার আংটিকে মিশক (কস্তুরী) দ্বারা পূর্ণ করত (বা সুগন্ধিযুক্ত করত), আর মিশক হলো সুগন্ধিগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ (বা উত্তম)।









আল-জামি` আল-কামিল (3513)


3513 - عن أم عطية قالت: دخل علينا النبي صلى الله عليه وسلم ونحن نغسل ابنته فقال:"واجعلن في الآخرة كافورًا، أو شيئًا من كافور".

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (2) عن أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن محمد بن سيرين، عن أم عطية الأنصارية فذكرت الحديث.

ورواه البخاري في الجنائز (1253) عن إسماعيل بن عبد الله، ومسلم في الجنائز (939/ 38) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن مالك بن أنس.




উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের নিকট আসলেন যখন আমরা তাঁর কন্যাকে গোসল দিচ্ছিলাম। অতঃপর তিনি বললেন, "তোমরা শেষবারে কর্পূর ব্যবহার করো, অথবা কিছু কর্পূর ব্যবহার করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3514)


3514 - عن جابر بن عبد الله قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا أجمرتم الميت فأجمروا ثلاثًا".

حسن: رواه الإمام أحمد (14540)، وأبو يعلى (2300) كلاهما من حديث يحيي بن آدم، حدثنا قُطبة بن عبد العزيز، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.

وصحَّحه ابن حبان (3031).

وأخرجه الحاكم (1/ 355) من وجه آخر عن محمد بن عبد الله بن نمير، عن قطبة بن عبد العزيز بإسناده مثله.

وقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".

وهو كما قال، إلا أن قطبة بن عبد العزيز وإن كان أخرج له مسلم فإنه"صدوق".

وأما البيهقي (3/ 405) فرواه عن شيخه الحاكم من طريق يحيي بن آدم، عن قطبة كما مضى، ونقل عن ابن معين أنه قال:"لم يرفعه إلا يحيى بن آدم" وقال:"ولا أظن هذا الحديث إلا غلطًا".

قلت: هذا وهمٌ من يحيى بن معين مع إمامته في هذا الفن، فإن يحيى بن آدم لم ينفرد في رفعه،
بل تابعه أيضًا محمد بن عبد الله بن نمير، وهو ثقة فاضل، والبيهقي لم يقف على رواية محمد بن عبد الله بن نمير وإلا رد على ابن معين، وإنما أخرج هو عن شيخه الحاكم من طريق يحيى بن آدم كما مضي.

ثم أن الذي عليه جمهور أهل العلم من المحدثين، إذا اختُلِف في الرفع والوقف فالصحيح الحكم للرفع لأنه زيادة ثقة، ولا شك في توثيق يحيى بن آدم، كما قال النووي في"الخلاصة" (3407) فكيف قد توبع على رفعه.

وروى مالك (1/ 226) بإسناد صحيح عن أسماء بنت أبي بكر رضي الله عنهما أنها قالت لأهلها: أجمروا ثيابي إذا مِتُّ، ثم حنِّطوني، ولا تَذُرُّوا على كفني حنوطًا، ولا تتبعوني بنار.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমরা মৃতের শরীরকে ধূমায়িত (সুগন্ধিযুক্ত) করবে, তখন তিনবার তা করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3515)


3515 - عن ابن عباس قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لرجل مات بعرفة وهو محرم:"اغسلوه بماء وسدر، وكفنوه في ثوبين، ولا تُحنطوه ولا تخمروا رأسه، فإن الله يبعثه يُلَبِّي أو مُلَبِّيًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1268)، ومسلم في الجنائز (1206) كلاهما من حديث حماد ابن زيد، عن عمرو بن دينار وأيوب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره، واللفظ للبخاري.

وفي الحديث دليل على أن غير المحرم يُحنَّط كما يُخمر، وأن النهي وقع لأجل الإحرام.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে বললেন, যিনি আরাফার ময়দানে ইহরাম অবস্থায় মারা যান: "তোমরা তাকে পানি ও বরই পাতা (সিডর) দিয়ে গোসল দাও, এবং তাকে দু'টি কাপড়ে কাফন পরাও। তোমরা তাকে সুগন্ধি লাগাবে না এবং তার মাথাও ঢাকবে না। কারণ আল্লাহ তাকে তালবিয়া পাঠকারী অবস্থায় পুনরুত্থিত করবেন।"

এই হাদীস প্রমাণ করে যে, যে ব্যক্তি ইহরাম অবস্থায় নয়, তাকে সুগন্ধি লাগানো যেতে পারে এবং তার মাথাও ঢাকা যেতে পারে। আর এই নিষেধাজ্ঞা শুধুমাত্র ইহরামের কারণেই প্রযোজ্য হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (3516)


3516 - عن عُتَيٍّ قال: رأيتُ شيخًا بالمدينة يَتَكلَّمُ، فسأَلتُ عنه، فقالوا: هذا أُبَيُّ بن كعب، فقال: إن آدمَ عليه السلام لما حَضَره الموتُ قال لِبَنِيه: أيْ بَنِيَّ! إني أشتهي من ثمار الجنةِ، فذهبوا يُطلبون له، فاستقبلَتهم الملائكةُ ومعهم أَكفانُهُ وحَنُوطُه، ومعهم الفُؤوسُ والمساحي والمكاتِلُ، فقالوا لهم: يا بَني آدم، ما تُريدُون وما تَطلبون -أو ما تُريدون وأَين تَذهبون؟ - قالوا: أَبونا مريضٌ فاشتَهي من ثمار الجنةِ، قالوا لهم: ارجِعوا فقد قُضي قضاءُ أَبيكُم.

فجاؤوا، فلما رأَتهم حوَّاءُ عَرَفَتهم، فلاذَت بآدمَ، فقال: إليكِ عني فإني إنما أُوتيتُ مِن قِبَلِك، خَلِّي بيني وبين ملائكةِ ربِّي تبارك وتعالى، فَقَبَضوه، وغَسلُوه وكفَّنوه وحنَّطوه، وحَفَروا له وأَلْحَدوا له، وصَلَّوا عليه، ثم دَخَلوا قبرَه فوضَعوه في قبرِه ووَضَعوا عليه اللَّبِنَ، ثم خرجوا من القَبرِ، ثم حَثَوْا عليه التراب، ثم قالوا: يا بَني آدمَ! هذه سنَّتُكم.

حسن: رواه عبد الله بن أحمد (21240) عن هدبة بن خالد، حدثنا حماد بن سلمة، عن حُميد،
عن الحسن، عن عُتَيٍّ قال فذكره.

وإسناده حسن لما قيل في عُتَيٍّ وهو ابن ضمرة السعدي روى عنه ابنه عبد الله والحسن، وثَّقه ابن سعد والعجلي وابن حبان وغيرهم، واعتمده الحافظ في"التقريب" فقال:"ثقة" وقد أعل الحديث من أجل تفرده.

قلت: ولا يضر تفرده ما دام هو ثقة.

ورواه الحاكم (1/ 344 - 345) من وجهين آخرين:

أحدهما: عن أبي بكر بن نصر الداربردي بمرو، ثنا أبو الموجه، ثنا سعيد بن منصور، وعلي ابن حجر قالا: حدثنا هُشيم، أنبأنا يونس بن عبيد.

والثاني: عن أحمد بن جعفر القطيعي، ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا إسماعيل -كلاهما- أعني هشيما وإسماعيل ابن علية عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن عُتَيٍّ، عن أُبي بن كعب فذكر نحوه.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وهو من النوع الذي لا يوجد للتابعي إلا الراوي الواحد، فإن عُتَيّ بن ضمرة السعدي ليس له راوٍ غير الحسن، وعندي أن الشيخين عللاه بعلة أخرى، وهو أنه روي عن الحسن، عن أُبيّ دون ذكر عُتَيٍّ".

ثم رواه من وجه آخر عن يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد، عن الحسن، عن أبي بن كعب مرفوعًا نحوه مختصرًا.

وقال:"هذا لا يُعلل حديث يونس بن عبيد، فإنه أعرف بحديث الحسن من أهل المدينة، ومصر والله أعلم".

قلت: من العلل التي أعلت به هذا الحديث الاختلاف في الرفع والوقف، والصواب فيه الرفع لأن معه زيادة علم.

ومن العلل التي أعلت به هذا الحديث عنعنة الحسن وهو مدلس، قلت: لقد ثبت التصريح بالتحديث عند البيهقي (3/ 404) إلا أنه موقوف، وثبوت التصريح في هذا الموقوف يُقَوِّي جهة السماع، وبالتالي تنفي عنه تهمة التدليس.

وفي الإسناد كلام آخر غير أن ما ذكرته هو أحسنه وبالله التوفيق.




উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় আদম (আলাইহিস সালাম)-এর যখন মৃত্যু উপস্থিত হলো, তখন তিনি তাঁর পুত্রদেরকে বললেন: হে আমার পুত্রগণ! আমার জান্নাতের ফল খেতে ইচ্ছা করছে। তখন তারা তার জন্য ফল খুঁজতে গেল।

তখন ফেরেশতারা তাদের সাথে সাক্ষাৎ করলেন। ফেরেশতাদের সাথে ছিল তাঁর কাফন ও সুগন্ধি (হনূত), এবং তাদের সাথে ছিল কোদাল, বেলচা ও ঝুড়ি। তারা (ফেরেশতারা) তাদেরকে বললেন: হে আদম সন্তানগণ! তোমরা কী চাও এবং কী খুঁজছ?— অথবা: তোমরা কী চাও এবং কোথায় যাচ্ছ? তারা বলল: আমাদের পিতা অসুস্থ, তাই তিনি জান্নাতের ফল খেতে চেয়েছেন। তারা তাদেরকে বললেন: তোমরা ফিরে যাও, তোমাদের পিতার ফয়সালা হয়ে গেছে।

তারা ফিরে এলো। যখন হাওয়া (আঃ) তাদেরকে দেখলেন, তিনি তাদেরকে চিনতে পারলেন এবং আদমের সাথে লেপ্টে গেলেন। আদম (আঃ) বললেন: আমার কাছ থেকে দূরে থাকো। নিশ্চয় আমি তোমার কারণেই আক্রান্ত হয়েছি (বিপদে পড়েছি)। আমার ও আমার প্রতিপালক বরকতময় ও সুমহান আল্লাহর ফেরেশতাদের মাঝে প্রতিবন্ধক হয়ো না।

অতঃপর তারা (ফেরেশতারা) তাঁকে (জান) কবজ করলেন, তাঁকে গোসল দিলেন, কাফন পরালেন, সুগন্ধি মাখালেন, তাঁর জন্য কবর খনন করলেন এবং লাহদ (পার্শ্বমুখী) কবর বানালেন, আর তাঁর জানাযার সালাত আদায় করলেন। এরপর তারা তাঁর কবরে প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে তাঁর কবরে রাখলেন, আর তার উপর কাঁচা ইট (লাবিন) রাখলেন। এরপর তারা কবর থেকে বেরিয়ে আসলেন এবং তার উপর মাটি ঢেলে দিলেন। এরপর তাঁরা বললেন: হে আদম সন্তানগণ! এটাই তোমাদের সুন্নাত (পদ্ধতি)।









আল-জামি` আল-কামিল (3517)


3517 - عن أبي وائل قال: كان عند علي مسك، فأوصى أن يُحنط به، قال: قال علي: هو فضل حنوط رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه البيهقي (3/ 405 - 406) عن أبي عبد الله الحافظ، أنبأ أبو بكر بن إسحاق، أنبا محمد بن أيوب، أنبا إبراهيم بن موسي، ثنا حميد بن عبد الرحمن الرؤاسي، ثنا الحسن بن صالح، عن هارون بن سعد، عن أبي وائل فذكره.
وإسناده حسن من أجل هارون بن سعد وهو العجلي أو الجعفي الكوفي الأعور مختلف فيه غير أنه حسن الحديث وهو من رجال مسلم، وإنما انتقم عليه غلوه في الرفض.

قال ابن حبان:"كان غاليًا في الرفض، لا تحل عنه الرواية بحال".

قلت: وذلك إذا ثبت عنه الكذب، وإنه لم يثبت.

ولذلك حسَّنه النووي في"الخلاصة" (3398).

تنبيه: تحرف في سنن البيهقي هارون بن سعد إلى"هارون بن سعيد" فتنبه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর কাছে কিছু মিসক ছিল। তিনি অসিয়ত করলেন যেন তা দ্বারা তাঁকে সুগন্ধি মাখানো হয়। তিনি বললেন, এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুগন্ধি মাখানোর অবশিষ্ট অংশ।









আল-জামি` আল-কামিল (3518)


3518 - عن حميد قال: لما توفي أنس بن مالك جُعل في حنوطه مسك فيه من عرق رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه البيهقي (3/ 406) من طريق ابن أبي مريم، حدثني يحيى بن أيوب، حدثني حُميد فذكره.

وابن أبي مريم هو: سعيد بن الحكم المصري.

وإسناده حسن من أجل الكلام في يحيي بن أيوب وهو الغافقي غير أنه حسن الحديث وهو من رجال الجماعة.

وأما ما رُوي عن نافع قال: مات سعيد بن زيد بن عمرو بن نُفيل وكان بدريًّا، فقالت أم سعيد لعبد الله بن عمر: أتُحنطه بالمسك؟ فقال: وأي طبيب أطيب من مسك؟ هاتي مسككِ، فناولته إياه قال: ولم نكن نَصنع كما تصنعون -"كنا نتبع بحنوطه مراقه ومغابنه" فهو ضعيف.

رواه البيهقي (3/ 406) من طريق سعيد بن مسلمة، ثنا إسماعيل بن أمية، عن نافع فذكره.

وسعيد بن مسلمة هو ابن هشام بن عبد الملك بن مروان الأموي، نزيل الجزيرة، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، إلا ابن عدي أَلان القول فيه فقال:"أرجو أنه ممن لا يترك حديثه".




হুমাইদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, তখন তাঁর জানাজার সুগন্ধি (হানূত)-এর মধ্যে এমন কস্তুরী (মিসক) রাখা হয়েছিল, যাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘাম মিশ্রিত ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (3519)


3519 - عن خبَّاب بن الأَرَتِّ قال: هاجرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سبيل الله، نبتغي وجه الله فوجب أجرنا على الله، فمِنَّا من مضى لم يأكل من أجره شيئًا، منهم مصعب بن عمير قُتل يوم أُحد، فلم يُوجد له شيء يُكفن فيه إلا نمرة، فكنا إذا وضعنا على رأسه خرجتْ رجلاه، وإذا وضعنا على رجليه خرج رأسُه فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ضعوها مما يلي رأسه واجعلوا على رجليه الإذْخر" ومنا من أَيْنَعَتْ له ثمرتُه فهو يَهْدِبُها.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1276)، ومسلم في الجنائز (940) كلاهما عن طريق الأعمش، عن شقيق، عن خبَّاب بن الأرَثِّ فذكره ولفظهما سواء.
قوله:"أينَعَتْ" أي نضجت.

وقوله:"يهدُبها" أي يجتنيها.




খাব্বাব ইবনুল আরাত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহ্‌র পথে আল্লাহ্‌র সন্তুষ্টি লাভের উদ্দেশ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হিজরত করেছিলাম, তাই আল্লাহ্‌র নিকট আমাদের পুরস্কার ওয়াজিব হয়ে গেল। আমাদের মধ্যে এমন ব্যক্তিও আছেন যিনি চলে গেছেন, কিন্তু তার প্রতিদানের কিছুই তিনি ভোগ করেননি। তাঁদের মধ্যে মুসআব ইবনু উমায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন, যিনি উহুদের দিনে শহীদ হন। তাঁর কাফন দেওয়ার জন্য একটি চাদর (নামিরা) ছাড়া আর কিছুই পাওয়া যায়নি। আমরা যখন তা তাঁর মাথার দিকে দিতাম, তখন তাঁর পা বেরিয়ে যেত, আর যখন আমরা তা তাঁর পায়ের দিকে দিতাম, তখন তাঁর মাথা বেরিয়ে যেত। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তা মাথার দিক দিয়ে দাও এবং তাঁর পায়ের উপর ইযখির ঘাস রেখে দাও।” আর আমাদের মধ্যে এমন ব্যক্তিও আছেন, যাঁর ফল পেকে গেছে এবং তিনি তা আহরণ করছেন (ভোগ করছেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (3520)


3520 - عن سعد بن إبراهيم، عن أبيه إبراهيم قال: أتي عبد الرحمن بن عوف يومًا بطعامه، فقال: قُتل مصعب بن عُمير -وكان خيرًا مني- فلم يوجد له ما يُكفَّن فيه إِلَّا بردة، لقد خشيتُ أن يكون قد عُجِّلت لنا طيباتُنا في حياتنا الدُّنيا، ثمّ جعل يبكي.

صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1274) عن أحمد بن محمد المكيّ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن سعد، عن سعد، عن أبيه فذكره.

وفي رواية شعبة عن سعد بن إبراهيم، عن أبيه إبراهيم وفيه: كفِّن في بُردة إن غُطِّي رأسْه بَدَتْ رجلاه، وإن غُطِّي رجلاه بدا رأسُه، وأراه قال: وقُتل حمزة -وهو خير مني- ثمّ بُسط لنا من الدُّنيا ما بُسط -أو قال: أُعطينا من الدُّنيا ما أعطينا- وقد خشينا أن تكون حسناتُنا عُجِّلتْ لنا، ثمّ جعل يبكي حتّى ترك الطعام. رواه البخاريّ (1375)، عن محمد بن مقاتل، أخبرنا عبد الله، أخبرنا شعبة بإسناده.




আবদুর রহমান ইবনু আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবরাহীম (তাঁর বাবা) বলেন: একদা তাঁর সামনে খাবার আনা হলো। তিনি বললেন, মুস‘আব ইবনু ‘উমাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হয়েছিলেন— আর তিনি আমার চেয়েও উত্তম ছিলেন— কিন্তু কাফনের জন্য তাঁর একটি চাদর ছাড়া আর কিছুই পাওয়া যায়নি। আমার ভয় হচ্ছে, দুনিয়ার জীবনেই আমাদের জন্য আমাদের উত্তম প্রতিদানগুলো তড়িঘড়ি দিয়ে দেওয়া হয়েছে। অতঃপর তিনি কাঁদতে লাগলেন।

শু‘বাহ বর্ণিত অন্য এক বর্ণনায় আছে, মুস‘আব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এমন একটি চাদরে কাফন দেওয়া হয়েছিল যে, যদি তাঁর মাথা ঢাকা হতো, তবে তাঁর পা বেরিয়ে যেত, আর যদি তাঁর পা ঢাকা হতো, তবে তাঁর মাথা বেরিয়ে যেত। বর্ণনাকারী (ইবরাহীম) বলেন: আমার মনে হয়, তিনি আরও বলেছিলেন, হামযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও শহীদ হয়েছিলেন— আর তিনি আমার চেয়েও উত্তম ছিলেন। অতঃপর আমাদের জন্য দুনিয়ার এত প্রাচুর্য দান করা হয়েছে— অথবা তিনি বলেছিলেন: আমাদের দুনিয়ার এতকিছু দেওয়া হয়েছে— আমরা আশঙ্কা করছি যে, আমাদের পুণ্যগুলোর (নেক কাজগুলোর প্রতিদান) আমাদের জন্য তড়িঘড়ি দেওয়া হয়ে গেছে। অতঃপর তিনি কাঁদতে শুরু করলেন, এমনকি তিনি খাবার ছেড়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3521)


3521 - عن حارثة بن مُضَرِّب قال: دخلت على خبَّاب، وقد اكتوي سبعًا فقال: لولا أني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يتمنى أحدكم الموت" لتمنيتُ، ولقد رأيتُنِي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ما أملك، وإن في جانب بيتي الآن لأربعين ألف درهم. قال: ثمّ أتي بكفنه، فلمّا رأه بكى وقال: لكن حمزة لم يُوجد له كفن إِلَّا بردة ملحاءُ، إذا جعلت على رأسه قَلَصَت عن قدميه، وإذا جعلتْ على قدميه قَلَصَتْ عن رأسه، حتي مُدَّت على رأسه، وجعل على قدميه الإذْخِر.

صحيح: رواه الترمذيّ (970) عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مُضَرِّب فذكر الحديث غير أن الترمذيّ لم يذكر قصة كفن حمزة، وإنما ذكره الإمام أحمد (21072، 27219) واللّفظ له من وجه آخر، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق بإسناده.

قال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح". وأصله في الصحيحين.




খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হারিসা ইবনু মুদাররিব বলেন: আমি খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম, যখন তিনি সাতবার দাগা (গরম লোহা দিয়ে চিকিৎসা) নিয়েছিলেন। তখন তিনি বললেন: আমি যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই কথা বলতে না শুনতাম যে, "তোমাদের কেউ যেন মৃত্যুর আকাঙ্ক্ষা না করে," তবে আমি অবশ্যই মৃত্যুর আকাঙ্ক্ষা করতাম। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (জীবনের এমন দিন) দেখেছি যখন আমার কিছুই মালিকানা ছিল না, অথচ এখন আমার ঘরের এক কোণে চল্লিশ হাজার দিরহাম রয়েছে। (হারিসা) বলেন: এরপর তাঁর (খাব্বাবের) কাফন আনা হলো। যখন তিনি তা দেখলেন, তখন কেঁদে ফেললেন এবং বললেন: কিন্তু হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য মাত্র একটি ডোরাকাটা চাদর ছাড়া অন্য কোনো কাফন পাওয়া যায়নি। সেটি তাঁর মাথায় দিলে পা দুটো ঢেকে যেত না, আর পা দুটোয় দিলে মাথা ঢাকা যেত না। ফলে সেটি তাঁর মাথায় টেনে দেওয়া হলো এবং তাঁর পা দুটো ইযখির (সুগন্ধি ঘাস) দিয়ে ঢেকে দেওয়া হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (3522)


3522 - عن سهل بن سعد أن امرأة جاءت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ببردةٍ منسوجةٍ فيها حاشيتُها، أتدرون ما البردةُ؟ قالوا: الشملة، قال: نعم، قالت: نسجتُها بيدي فجئت لأكسوكها، فأخذها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم محتاجًا إليها، فخرج إلينا وإنها إزاره، فحَسَّنها فلان فقال: اكسُنِيها ما أحسنَها، قال القوم: ما أحسنتَ، لبسها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم محتاجًا إليها،
ثمّ سألته وعلمت أنه لا يردُّ، قال: إني والله! ما سألتُها لأَلْبسها، إنّما سألتُه لتكون كفني. قال سهل: فكانت كفَنه.

صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1277) عن عبد الله بن مسلمة، حَدَّثَنَا ابن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل فذكره.

وقوله:"حاشيتها" أي طرفها، أو أنها جديدة لم تقطع من ثوب.

وقوله:"فلان" قيل: عبد الرحمن بن عوف، وقيل: رجل من الأعراب لا يُعرف اسمه.




সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি বুরদাহ (চাদর) নিয়ে এলেন যা হাত দ্বারা বোনা হয়েছিল এবং যার কিনার/পাড় অক্ষত ছিল। (বর্ণনাকারী জিজ্ঞেস করলেন:) তোমরা কি জানো 'বুরদাহ' কী? তারা বলল: তা হলো চাদর (শামলা)। তিনি বললেন: হ্যাঁ। মহিলাটি বললেন: আমি এটি আমার নিজের হাতে বুনেছি, আর আমি আপনাকে এটি পরিধান করাতে (উপহার দিতে) এসেছি। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটির প্রতি মুখাপেক্ষী (প্রয়োজনীয়তা) হওয়ায় তা গ্রহণ করলেন। অতঃপর তিনি সেটি পরিধান করে আমাদের মাঝে এলেন, আর সেটি ছিল তাঁর লুঙ্গি (ইযার)। তখন অমুক ব্যক্তি সেটিকে সুন্দর আখ্যায়িত করে বলল: এটি আমাকে পরিধান করতে দিন! এটি কতই না সুন্দর! উপস্থিত লোকেরা বলল: আপনি ভালো করেননি। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটি প্রয়োজনবশতই পরিধান করেছিলেন, অথচ (আপনি) এমন অবস্থায় তাঁর কাছে চাইলেন যখন আপনি জানেন যে তিনি কাউকে কিছু ফিরিয়ে দেন না। সে (যিনি চাইলেন) বলল: আল্লাহর কসম! আমি এটি পরার জন্য চাইনি। বরং আমি চেয়েছি যেন এটি আমার কাফন হতে পারে। সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর সেটিই তার কাফন হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (3523)


3523 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من غَسَّل ميتًا فليغتسل".

حسن: رواه الترمذيّ (993)، وابن ماجة (1463) كلاهما عن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب، قال: حَدَّثَنَا عبد العزيز بن المختار، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر الحديث واللّفظ لابن ماجه.

ولفظ الترمذيّ:"من غُسْلِه الغُسْلُ، ومن حَملهِ الوضوءُ".

ورواه أبو داود (3162) من وجه آخر عن سفيان، عن سهيل بإسناده إِلَّا أن أبا صالح أدخل بينه وبين أبي هريرة"إسحاق مولي زائدة" كما رواه أيضًا من وجه آخر عن أبي هريرة ولفظ الحديث:"من غسَّل الميت فليغسل، ومن حمله فليتوضأ".

وإسناده حسن من أجل سهيل بن أبي صالح فإنه"صدوق" وقد حسَّنَه أيضًا الترمذيّ وقال: وقد رُوي عن أبي هريرة موقوفًا.

قلت: اختلف أهل العلم في إسناد هذا الحديث اختلافًا كثيرًا كما قال المنذري. قال الإمام أحمد وعلي بن المديني:"لا يصح في هذا الباب شيءٌ" وقال محمد بن يحيى:"لا أعلم في"من غَسَّل ميتًا فليغتسل" حديثًا ثابتًا، ولو ثبت لزمنا استعماله" وقال الشافعي في البويطي:"إن صحَّ الحديث قلت بوجوبه" هذا آخر كلام المنذري.

وخلاصة القول في حديث أبي هريرة أنه لا ينزل عن درجة الحسن.

قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 137) معقبًا على قول الرّافعيّ:"لم يصحِّح علماء الحديث في هذا الباب شيئًا مرفوعًا" قلت: قد حسّنه الترمذيّ، وصحّحه ابن حبَّان، وله طريق أخرى. قال عبد الله بن صالح: ثنا يحيى بن أيوب، عن عقيل، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، رفعه:"من غسَّل ميِّتًا فليغتسل" ذكره الدَّارقطنيّ، وقال: فيه نظر. قلت: رواته موثقون، وقال ابن دقيق العيد في"الإمام": حاصل ما يعتل به وجهان: من جهة الرّجال، ولا يخلو إسناد منها من متكلّم فيه، ثمّ ذكر ما معناه أن أحسنها رواية سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، وهي
معلولة، وإن صحَّحها ابن حبَّان وابن حزم، فقد رواه سفيان، عن سهيل، عن أبيه، عن إسحاق مولي زائدة، عن أبي هريرة. قلت: إسحاق مولي زائدة أخرج له مسلم، فينبغي أن يصحّح الحديث، قال: وأمّا رواية محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فإسناد حسن، إِلَّا أنَّ الحفاظ من أصحاب محمد بن عمرو رووه عنه موقوفًا، وفي الجملة هو بكثرة طرقه أسوأ أحواله أن يكون حسنًا. فإنكار النّوويّ على الترمذيّ تحسينه معترض، وقد قال الذّهبيّ في"مختصر البيهقيّ":"طرق هذا الحديث أقوى من عدّة أحاديث احتجّ بها الفقهاء، ولم يعلوها بالوقف، بل قدّموا رواية الرّفع، والله أعلم". انتهى كلام الحافظ.

قلت: انظر كلام الذّهبيّ في"المهذّب في اختصار سنن البيهقيّ" (1/ 301)، وقد نقل الشوكاني في"النّيل" (1/ 356) بعض فقرات الحافظ وأقرّه.

وقال الحافظ ابن القيم:"وهذه الطّرق تدل على أنَّ الحديث محفوظ"."تهذيب السنن".

ولكن قال أبو داود عقب إخراج الحديث:"هذا منسوخ، سمعتُ أحمد بن حنبل وسئل عن الغسل من غسَّل الميت، فقال: يُجزئه الوضوء". ومثله قال ابن شاهين في"الناسخ والمنسوخ" (38، 39) وقال:"ناسخه حديث ابن عباس الآتي". انظر فقه هذا الباب في"المنة الكبرى" (3/ 24 - 25).

وفي الباب عن عائشة، وعليّ، وأبي سعيد الخدريّ، وحذيفة بن اليمان، والمغيرة بن شعبة، وفي الجميع مقال، وإن ثبت بمجموع الشواهد فهو منسوخ كما سيأتي. انظر تخاريج هذه الأحاديث في"البدر المنير"




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি মৃতকে গোসল দেবে, সে যেন নিজেও গোসল করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3524)


3524 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس عليكم في غُسل ميتكم غُسل إذا اغتسلتموه، فإن ميتكم ليس بنجس، فحسبكم أن تغسلوا أيديكم".

حسن: رواه الدَّارقطنيّ في سننه (2/ 76) وعنه الحاكم في"المستدرك" (1/ 386)، عن أحمد ابن محمد بن سعيد، عن أبي شيبة إبراهيم بن عبد الله بن أبي شيبة، عن خالد بن مخلد، عن سليمان ابن بلال، عن عمرو بن أبي عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ، ولم يخرجاه، وفيه رفض لحديث مختلف فيه على محمد بن عمرو بأسانيد:"من غسَّل ميتًا فليغتسل" انتهى.

وتعقبه الذّهبيّ على قوله"وفيه رد لحديث"من غسل ميتًا فليغتسل" بل نعمل بهما فيستحب الغسل. انتهى.

قلت: وإسناده حسن من أجل الكلام في عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وهو الذي ذهب إليه الذّهبيّ نفسه في"الميزان" بعد أن ساق أقوال أهل العلم فيه.
ولكن قال البيهقيّ (1/ 306) بعد أن أخرج الحديث عن الحاكم من الطريق نفسه:"هذا ضعيف، والحمل فيه على أبي شيبة، كما أظن".

ونبَّه ابن الملقن في"البدر المنير" (4/ 659) فقال:"أبو شيبة هذا هو إبراهيم بن عبد الله بن أبي شيبة، وهو ثقة كما سلف، والمطعون فيه الواهي هو أبو شية إبراهيم بن عثمان الكوفي قاضي واسط، فتنبّه لذلك". انتهى.

وقال الحافظ ابن حجر معقبًا على كلام البيهقيّ: اقلت: أبو شيبة، هو إبراهيم بن أبي بكر بن أبي شيبة، احتجّ به النسائيّ ووثَّقه الناس، ومن فوقه احتجّ بهم البخاريّ، وأبو العباس الهمداني هو ابن عقدة حافظ كبير، إنّما تكلّموا فيه بسبب المذهب، ولأمور أخرى، ولم يضعفه بسبب المتون أصلًا، فالإسناد حسن، فيجمع بينه وبين الأمر في حديث أبي هريرة، بأنَّ الأمر على النَّدب، أو المراد بالغسل غسل الأيديّ، كما صرَّح به في هذا. قلت: ويؤيّد أن الأمر فيه للندب، ما روي الخطيب في ترجمة محمد بن عبد الله المخرميّ من طريق عبد الله بن أحمد بن حنبل، قال: قال لي أبي كتبتَ حديث عبيد الله عن نافع عن ابن عمر:"كنا نغسل الميت، فمنا من يغتسل، ومنا من لا يغتسل"؟ قال: قلت: لا، قال: في ذلك الجانب شاب يقال له محمد بن عبد الله يحدِّث به عن أبي هشام المخزوميّ عن وهيب فاكتبه عنه، قلت: وهذا إسناد صحيح، وهو أحسن ما جمع به بين مختلف هذه الأحاديث، والله أعلم". انتهى كلام الحافظ من"التلخيص الحبير" (1/ 138).




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমাদের মৃতকে গোসল করানোর পর তোমাদের জন্য (নতুন করে) গোসল করা আবশ্যক নয়। কেননা তোমাদের মৃত ব্যক্তি অপবিত্র নয়। সুতরাং তোমাদের জন্য যথেষ্ট হলো শুধু তোমাদের হাত ধুয়ে নেওয়া।”









আল-জামি` আল-কামিল (3525)


3525 - عن * *




৩৫২৫ - ...এর সূত্রে বর্ণিত...









আল-জামি` আল-কামিল (3526)


3526 - عن أنس بن مالك قال: مرُّوا بجنازة فأثْنَوا عليها خيرًا، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"وجبْت" ثمّ مرُّوا بأخرى، فأثْنَوا عليها شرًّا فقال:"وجبتْ" فقال عمر بن الخطّاب: ما وجبتْ؟ قال:"هذا أَثنيتُم عليه خيرًا فوجبَتْ له الجنّة، وهذا أَثْنيتم عليه شرًّا فوجبَتْ له النّار، أنتم شهداء الله في الأرض".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1367) عن آدم، عن شعبة، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن صُهَيب قال: سمعت أنس بن مالك فذكر الحديث.

ورواه مسلم في الجنائز (949) من وجه آخر عن ابن علية، أخبرنا عبد العزيز بن صُهَيب بإسناده وفيه تكرار"وجبت وجبت وجبت" ثلاث مرات، فقال عمر بن الخطّاب: فدى لك أبي وأمي.

كما أن فيه قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أنتم شهداء الله في الأرض" ثلاث مرات.

وزاد الحاكم (1/ 377):"إن لله ملائكة تنطق على ألْسِنة بني آدم بما في المرأ من الخير والشر" رواه من وجه آخر عن النضر بن أنس، عن أنس، وصحَّحه على شرط مسلم.

وأمّا ما رُوي عنه مرفوعًا:"ما من رجل يموت فيشهد له رجلان من خبرته الأقربين فيقولان: اللَّهُمَّ! لا نعلم إِلَّا خيرًا إِلَّا قال الله عز وجل لملائكته: أشهدكم أني قد غفرت لعبدي بشهادتهما، وتجاوزت له عما لا يعلمان" فهو ضعيف.

رواه إسحاق بن راهويه في مسنده (359) قال: أخبرنا بقية بن الوليد، حَدَّثَنِي الضَّحَّاك بن حمزة، عن صالح الأملوكيّ، عن أنس بن مالك فذكره.

والضحاك بن حمزة هو الواسطيّ، وأصله من الشام،"ضعيف"، قال فيه ابن معين:"ليس بذاك" وفي رواية:"ليس بشيء" وقال النسائيّ:"ليس بثقة" وتكلم فيه غيرهما من أهل العلم، وقال ابن عدي:"له أحاديث حسان غرائب" وفي"التقريب":"ضعيف".

وبقية بن الوليد مدلس تدليس التسوية لم يصرح بالتحديث في جميع الطَّبقات كما اشترط بعض أهل العلم في قبول حديثه خوفًا من تدليس التسوية والجمهور على قبول تحديثه في شيوخه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা একটি জানাযার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, আর তারা এর উত্তম প্রশংসা করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওয়াজিব হয়ে গেছে।" অতঃপর তাঁরা অন্য একটি জানাযার পাশ দিয়ে গেলেন, আর তারা এর মন্দ সমালোচনা করল। তখন তিনি বললেন: "ওয়াজিব হয়ে গেছে।" তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কী ওয়াজিব হয়ে গেছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার তোমরা উত্তম প্রশংসা করেছ, তার জন্য জান্নাত ওয়াজিব হয়ে গেছে, আর যার তোমরা মন্দ সমালোচনা করেছ, তার জন্য জাহান্নাম ওয়াজিব হয়ে গেছে। তোমরা পৃথিবীতে আল্লাহর সাক্ষী।"









আল-জামি` আল-কামিল (3527)


3527 - عن أبي الأسود قال: قدمتُ المدينة -وقد وقع بها مرض- فجلست إلى عمر بن الخطّاب فمرتْ بهم جنازة، فأُثْني على صاحبها خيرًا فقال عمر: وجبتْ، ثمّ مُرَّ بأُخرى
فأُثني على صاحبها خيرًا، فقال عمر: وجبتْ، ثمَّ مُرَّ بأخرى، فأثني على صاحبها خيرًا، فقال عمر: وجبتْ، ثمّ مُرَّ بالثالثة فأُثْنِي على صاحبها شرًّا، فقال: وجبتْ.

فقال أبو الأسود: فقلت: وما وجبتْ يا أمير المؤمنين؟ قال: قلت كما قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أيما مسلم شهد له أربعة بخير أدخله الله الجنّةَ" فقلنا: وثلاثة؟ قال: وثلاثة. فقلنا: واثنان؟ قال: واثنان. ثمّ لم نسأله عن الواحد.

صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1368) عن عفّان بن مسلم، حَدَّثَنَا داود بن أبي الفرات، عن عبد الله بن بريدة، عن أبي الأسود فذكره.




আবূ আল-আসওয়াদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মদীনায় এলাম—তখন সেখানে মহামারী দেখা দিয়েছিল। আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসলাম। এরপর তাঁদের পাশ দিয়ে একটি জানাযা অতিক্রম করল। মৃত ব্যক্তির উত্তম প্রশংসা করা হলো। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ওয়াজিব হয়ে গেল। এরপর আরেকটি জানাযা অতিক্রম করল, সেটিরও উত্তম প্রশংসা করা হলো। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ওয়াজিব হয়ে গেল। এরপর আরেকটি জানাযা অতিক্রম করল, সেটিরও উত্তম প্রশংসা করা হলো। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ওয়াজিব হয়ে গেল। এরপর অন্য একটি জানাযা অতিক্রম করল, সেটির মন্দ আলোচনা করা হলো। তখন তিনি বললেন: ওয়াজিব হয়ে গেল।

আবূ আল-আসওয়াদ বলেন, আমি বললাম: হে আমীরুল মু'মিনীন! কী ওয়াজিব হয়ে গেল? তিনি বললেন: আমি সেটাই বললাম যা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো মুসলিমের জন্য যদি চারজন ব্যক্তি কল্যাণের সাক্ষ্য দেয়, তবে আল্লাহ তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।" আমরা (উপস্থিত লোকেরা) বললাম: আর তিনজন (সাক্ষ্য দিলে)? তিনি বললেন: আর তিনজন (সাক্ষ্য দিলেও)। আমরা বললাম: আর দুইজন (সাক্ষ্য দিলে)? তিনি বললেন: আর দুইজন (সাক্ষ্য দিলেও)। এরপর আমরা তাঁকে একজন সম্পর্কে জিজ্ঞেস করিনি।