আল-জামি` আল-কামিল
3501 - عن جابر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا توفي أحدكم فوجد شيئًا فليكفَّن في ثوب حِبرةٍ".
حسن: رواه أبو داود (3150) عن الحسن بن الصباح البزار، حدثنا إسماعيل -يعني ابن عبد الكريم- حدثني إبراهيم بن عقيل بن معقل، عن أبيه، عن وهب بن منبه، عن جابر فذكره.
وإسناده حسن من أجل إبراهيم بن عقيل فإنه"صدوق"، وأمَّا أبوه عقيل بن معقل فإنَّ الحافظ وإنْ قال فيه"صدوق"، إلَّا أنَّ أحمد وابن معين وغيرهما وثَّقوه.
ورواه الإمام أحمد (14601) من وجه آخر عن جابر وفيه قال النبي صلى الله عليه وسلم:"من وجد مشقةً فليكفَّن في ثوب حِبرةٍ". وفي إسناده ابن لهيعة قال: حدثنا أبو الزبير، عن جابر فذكره. وابن لهيعة فيه كلام.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: যখন তোমাদের কারো মৃত্যু হয় এবং সে যদি কিছু সংস্থান পায়, তবে তাকে যেন 'হিবরা' কাপড়ের দ্বারা কাফন দেওয়া হয়।
3502 - عن أم عطية قالت: دخل علينا النبي صلى الله عليه وسلم ونحن نغسل ابنته، فلما فرغنا ألقي إلينا حِقْوه، فقال:"أشعرنها إياه".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1261)، ومسلم في الجنائز (929: 36) كلاهما من حديث أيوب، عن ابن سيرين، عن أم عطية فذكرته في كيفية غسل النبي صلى الله عليه وسلم.
وقال الحافظ في"الفتح" (3/ 133):"ورواه الجوزقي من طريق إبراهيم بن حبيب بن الشهيد، عن هشام، عن حفصة، عن أم عطية قالت: فكفنّاها في خمسة أثوابٍ، وخمّرناها كما يخمّر الحيُّ، وقال هذه الزيادة صحيحة الإسناد".
وأما ما رُوي عن ليلى بنت قائف الثقفيّة قالت: كنت فيمن غسَّل أم كلثوم بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم عند وفاتها، فكان أول ما أعطانا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الحِقا، ثم الدرع، ثم الخمار، ثم الملحفة ثم أُدرجتْ بعد في الثوب الآخر. قالت: ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالس عند الباب معه كفنها يُناولنا ثوبًا ثوبًا. فهو ضعيف.
رواه أبو داود (3157) عن أحمد بن حنبل، حدثنا يعقوب بن إبراهيم، حدثنا أبي، عن ابن
إسحاق، حدثني نوح بن حكيم الثقفي، وكان قارئًا للقرآن، عن رَجُل من بني عروة بن مسعود، يقال له داود، قد ولدتْه أم حبيبة بنت أبي سفيان، زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن ليلي بنت قائف قالت: فذكرته.
والصحيح أن هذه قصة في زينب بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم كما قال أهل العلم.
وفي إسناده: نوح بن حكيم الثقفي مجهول.
وفيه أيضا: رجل من بني عروة بن مسعود يقال له: داود، ووُصف بأنه ولدتْه أم حبيبة بنت أبي سفيان، وقد أطال الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 258) في الرد على هذا الزعم، والخلاصة أنه لا يُعرف من هو؟ .
ومن أجله وأجل الراوي عنه وهو نوح الثقفي ضُعِّفَ هذا الحديث.
ونظرا لضعف هذا الحديث ذهبَ بعضُ أهل العلم إلى أنه لا فرق بين كفن المرأة وكفن الرجل، فيُكفنُ كلٌّ منهما في ثلاثة أثواب.
وذهب الأئمة الأربعة وأصحابهم إلى أن الأفضل للمرأة أن تكفن في خمسة أثواب لحديث ليلى بنت قائف، وأعضدوه بقول بعض التابعين مثل الحسن البصري وغيره كما أن الزيادة التي ذكرها الجوزقي في حديث أم عطية تساندهم، بل وقد قال المالكية: الأفضل للمرأة أن تكفن في سبعة أثواب بزيادة لفافتين.
উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট এলেন, যখন আমরা তাঁর কন্যাকে গোসল দিচ্ছিলাম। যখন আমরা (গোসল দেওয়া) শেষ করলাম, তখন তিনি আমাদের দিকে তাঁর তহবন্দ (লুঙ্গি/ইযার) নিক্ষেপ করলেন এবং বললেন, "তাকে তা (শরীরের) পোশাক হিসাবে পরিয়ে দাও (অর্থাৎ ভেতরের দিকে রেখে দাও)।"
3503 - عن عبد الله بن عباس قال: كان رجل واقف مع النبي صلى الله عليه وسلم بعرفة، فوقع عن راحلته. قال أيوب: فوقصتْه، وقال عمرو: فأقصعتْه - فمات، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اغسِلوه بماء وسدر، وكفِّنُوه في ثوبين، ولا تُحنِّطوه، ولا تُخمِّروا رأسه، فإنه يُبعث يوم القيامة".
قال أيوب: يُلَبِّي، وقال عمرو: ملبيًا.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1268)، ومسلم في الجنائز (1206) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار وأيوب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم قريب منه إلا أن فيه عكس ما نقل عن أيوب وعمرو في الوقصة والتلبية.
وقوله:"ثوبين" أي -في ثوبيه كما في رواية سفيان بن عيينة عن عمرو عند مسلم، وفي رواية أبي بشر، عن سعيد بن جبير عند البخاري (1851).
والثوبان هما الإحرامان الذَين أحرم فيهما.
وقوله:"ولا تُحنطوه" أي تمسوه حنوطًا، والحَنوط يقال له: الحِناط أخلاط من طيب يجمع للميت خاصة، ولا تستعمل في غيره.
وقوله:"لا تخمروا رأسه" أي لا تُغطوه، وعلل كل ذلك لأنه يبعث يوم القيامة ملبيًا. فدل أن سبب النهي أنه كان محرمًا، فإذا انتفتِ العلةُ انتفى.
قال أبو داود (3238):"سمعت أحمد بن حنبل يقول:"في هذا الحديث خمس سنن:"كفِّنوه في ثوبيه" أي يكفن الميت في ثوبين."واغسلوه بماء وسدر" أي: إن في الغسلات كلها سدرًا."ولا تُخمروا رأسه"، ولا تقربوه طِيبًا، وكان الكفنُ من جميع المال".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আরাফাতে অবস্থান করছিল, তখন সে তার সওয়ারি থেকে পড়ে গেল। আইয়ুব বলেছেন: তখন সওয়ারি তাকে দলিত করে ফেলল, আর আমর বলেছেন: তখন সওয়ারি তাকে ফেলে দিলো—ফলে সে মারা গেল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তাকে পানি ও বরই পাতা (সিদর) দিয়ে গোসল দাও, তাকে দুটি কাপড়ে কাফন দাও। আর তাকে সুগন্ধি লাগিও না এবং তার মাথা ঢেকে দিও না। কেননা, সে কিয়ামতের দিন তালবিয়াহ্ পাঠকারী অবস্থায় পুনরুত্থিত হবে।"
3504 - عن جابر بن عبد الله قال: أتى النبي صلى الله عليه وسلم قبر عبد الله بن أبيّ بعد ما دُفن، فأخرجه فنفث فيه من ريقه، وأَلْبسه قميصَه.
وفي رواية: فوضعه على ركبتيه.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1270)، ومسلم في صفات المنافقين (2773) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو ابن دينار) سمع جابرًا يقول: فذكره.
قوله:"بعد ما دُفن" أي دُلّي في حفرته، وكان أهل عبد الله بن أبيّ خشوا على النبي صلى الله عليه وسلم المشقة في حضوره، فبادروا إلى تجهيزه قبل وصول النبي صلى الله عليه وسلم، فلما وصل وجدهم قد دلوه في حفرته، فأمر بإخراجه إنجازًا لوعده في تكفينه في القميص والصلاة عليه. كذا في"الفتح" (3/ 139).
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইকে দাফন করার পর তাঁর কবরের কাছে এলেন। অতঃপর তাকে (কবর থেকে) বের করলেন, তাঁর (নবীর) মুখের লালা (রিখ) তার ওপর দিলেন এবং তাকে তাঁর নিজের জামা পরিধান করালেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: অতঃপর তিনি তাকে নিজের হাঁটুর ওপর রাখলেন।
3505 - عن عبد الله بن عمر أن عبد الله بن أبيّ لما توفي جاء ابنه إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! أعطني قميصك أُكفِّنه فيه، وصلِّ عليه، واستغفر له، فأعطاه النبي صلى الله عليه وسلم قميصه فقال:"آذني أصلي عليه". فآذنه: فلما أراد أن يُصلي عليه جذبه عمر رضي الله عنه فقال: أليس الله قد نهاك أن تصلي على المنافقين؟ فقال: أنا بين خيرَتين قال: {اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ} [التوبة: 80] فصلى عليه، فنزلت: {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا} [التوبة: 84].
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1269)، ومسلم في صفات المنافقين (2774) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. قال مسلم: وزاد: فترك الصلاة عليهم.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই যখন মারা গেল, তখন তার ছেলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, 'হে আল্লাহর রাসূল! আপনার জামাটি আমাকে দিন, যেন আমি তাকে তাতে কাফন পরাতে পারি, আর আপনি তার জন্য সালাত আদায় করুন এবং তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন।' অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তাঁর জামাটি দিলেন এবং বললেন, "আমাকে জানাও, আমি তার উপর সালাত আদায় করব।" সে তাঁকে জানাল। যখন তিনি (নবী) তার উপর সালাত আদায় করতে চাইলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে আকর্ষণ করে ধরলেন এবং বললেন, 'আল্লাহ কি আপনাকে মুনাফিকদের উপর সালাত আদায় করতে নিষেধ করেননি?' তিনি (নবী) বললেন, 'আমি দুটি পছন্দের মাঝে আছি।' (অর্থাৎ, আল্লাহ বলেছেন:) {তুমি তাদের জন্য ক্ষমা চাও অথবা না চাও, তুমি সত্তর বার তাদের জন্য ক্ষমা চাইলেও আল্লাহ কখনই তাদের ক্ষমা করবেন না} [সূরা আত-তাওবা: ৮০]। অতঃপর তিনি তার উপর সালাত আদায় করলেন। তখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {আর তাদের (মুনাফিকদের) মধ্যে যে কেউ মারা গেলে আপনি কখনই তার উপর (জানাযার) সালাত আদায় করবেন না} [সূরা আত-তাওবা: ৮৪]।
3506 - عن أسامة بن زيد قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم يعود عبد الله بن أبيّ في مرضه الذي مات فيه، فلما دخل عليه عرف فيه الموت قال:"قد كنتُ أنهاك عن حب يهود" قال: فقد أبغضهم أسعدُ بن زُرارة فمه؟ . فلما مات أتاه ابنه فقال: يا رسول الله! إن عبد الله بن أبي قد مات، فأعطني قميصك أُكفّنه فيه. فنزع رسول الله صلى الله عليه وسلم قميصه
فأعطاه إياه.
حسن: رواه أبو داود (3094) عن عبد العزيز بن يحيي، حدثنا محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن الزهري، عن عروة، عن أسامة بن زيد فذكره.
ومحمد بن إسحاق مدلس، ولكنه صرَّح بالتحديث في السيرة، ومنه رواه البيهقي في"الدلائل" (5/ 285) وابن كثير في"التاريخ" (5/ 34) وبهذا صار الإسناد حسنًا.
قال الواقدي: مرض عبد الله بن أبيّ في ليال بقين من شوال، ومات في ذي القعدة، وكان مرضه عشرين ليلة، فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعوده فيها، فلما كان اليوم الذي مات فيه دخل عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يجود بنفسه فقال:"قد نهيتك عن حب يهود" فقال: قد أبغضهم أسعد بن زرارة فما نفعه؟ ثم قال: يا رسول الله! ليس هذا الحين عتاب هو الموت، فأحضر غسلي وأعطني قميصك الذي يلي جلدك، فكفِّني فيه، وصلِّ علّي، واستغفر لي، ففعل ذلك به رسول الله صلى الله عليه وسلم.
ذكره ابن كثير في تاريخه (5/ 34 - 35) وقال:"وروى البيهقي من حديث سالم بن عجلان، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، نحوا مما ذكره الواقدي".
قلت: وهو سيأتي.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইয়ের শেষ রোগ, যেটাতে সে মারা গিয়েছিল, তাতে তাকে দেখতে বের হলেন। যখন তিনি তার কাছে প্রবেশ করলেন, তখন তার মধ্যে মৃত্যুর আলামত দেখতে পেলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি তোমাকে ইয়াহুদিদের ভালোবাসতে বারণ করতাম।" সে (আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই) বলল, "আসআদ ইবনে যুরারা তো তাদের ঘৃণা করত, তাতে কী লাভ হলো?" এরপর যখন সে মারা গেল, তখন তার ছেলে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই মারা গিয়েছে। আপনার জামাটি আমাকে দিন, যাতে আমি তাকে কাফন দিতে পারি।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর জামা খুলে তাকে দিলেন।
3507 - عن ابن عباس، أن عبد الله بن عبد الله بن أبيّ قال له أبوه: أي بني! اطلب ثوبًا من ثياب النبي صلى الله عليه وسلم تُكَفِّني فيه، ومره فليصَلِّ عليَّ، قال: فأتاه فقال: يا رسول الله! قد عرفت شرف عبد الله، وهو يطلب إليك ثوبًا من ثيابك نُكَفِّنه فيه، وتُصلي عليه، فقال عمر: يا رسول الله! أتصلي عليه، وقد نهاك الله أن تصلي عليه؟ فقال:"أين؟" فقال: {اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ} [التوبة: 80] قال: فإني سأزيد على سبعين، فأنزل الله: {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا} [التوبة: 84] قال: فأرسل إلى عمر فأخبره بذلك.
حسن: رواه البيهقي في"الدلائل" (5/ 288) عن بشر بن السري، حدثنا رباح بن أبي معروف المكي، حدثنا سالم بن عجلان، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
ورجاله رجال الصحيح غير أن رباح بن أبي معروف وشيخه سالم بن عجلان فيهما كلام إلا أنهما حسنا الحديث، ولم يسق البيهقي بقية الإسناد إلى بشر بن السري، والله أعلم.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু উবাইকে তার পিতা (আবদুল্লাহ ইবনু উবাই) বলল: হে বৎস! তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পোশাকের মধ্য থেকে একটি পোশাক চেয়ে নাও, যেন তা দিয়ে আমাকে কাফন দেওয়া যায় এবং তাকে বলো যেন তিনি আমার জানাযার সালাত পড়েন। ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু উবাই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো আবদুল্লাহর মর্যাদা সম্পর্কে অবগত আছেন। সে আপনার কাছে আপনার পোশাকের মধ্য থেকে একটি পোশাক চেয়েছে যেন তাকে তা দিয়ে কাফন দেওয়া যায় এবং আপনি তার জানাযার সালাত পড়েন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি তার উপর সালাত পড়বেন? অথচ আল্লাহ আপনাকে তার উপর সালাত পড়তে নিষেধ করেছেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "কোথায় (নিষেধ করা হয়েছে)?" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (তিনি এই আয়াত পাঠ করলেন): {আপনি তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন বা না করুন—যদি আপনি সত্তর বারও তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেন, তবুও আল্লাহ তাদেরকে কখনো ক্ষমা করবেন না} [সূরা আত-তাওবাহ: ৮০]। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি অবশ্যই সত্তর বারের চেয়ে বেশি ক্ষমা চাইব। তখন আল্লাহ নাযিল করলেন: {তাদের মধ্যে যে কেউ মারা যায়, আপনি কখনো তার জানাযার সালাত পড়বেন না} [সূরা আত-তাওবাহ: ৮৪]। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন উমারের নিকট লোক পাঠিয়ে এই বিষয়ে তাকে জানিয়ে দিলেন।
3508 - عن جابر بن عبد الله قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم خطب يومًا فَذَكر رجلًا من أصحابه قُبض فكُفِّن في كفَنٍ غير طائلٍ، وقُبر ليلًا فزجر النبي صلى الله عليه وسلم أن يُقْبر الرجل بالليل حتى
يُصلي عليه، إلا أن يُضطر إنسان إلى ذلك.
وقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا كفَّن أحدكم أخاه فليُحَسِّنْ كفَنَه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (943) من طرق، عن حجاج بن محمد، قال: قال ابن جريج: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يُحَدِّث أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب يومًا فذكر الحديث مثله. وقوله:"غير طائل" أي حقير، غير كامل الستر.
وقوله:"زجر النبي صلى الله عليه وسلم أن يُقبر الرجل بالليل" حمل أهل العلم على الرجل المذكور لأنه فاتته صلاةُ النبي صلى الله عليه وسلم، وإلا فالجمهور على أنه يجوز دفن الميت بالليل، وقد دُفن أبو بكر بالليل، فمن كره الدفن بالليل رأى أن المصلين عليه يقلون لملازمتهم البيوت.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একদিন ভাষণ দিচ্ছিলেন। তখন তিনি তাঁর সাহাবীদের মধ্য হতে এমন এক ব্যক্তির কথা উল্লেখ করলেন, যার ইন্তেকাল হয়েছিল এবং তাকে একটি নিম্নমানের কাফনে কাফন দেওয়া হয়েছিল এবং তাকে রাতের বেলা দাফন করা হয়েছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নিষেধ করলেন (বা ধমক দিলেন) যেন কোনো ব্যক্তিকে রাতের বেলা দাফন করা না হয়, যতক্ষণ না তার জানাযার সালাত আদায় করা হয়, তবে যদি কেউ (দাফন করার জন্য) বাধ্য হয় (তাহলে ভিন্ন কথা)। আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “তোমাদের মধ্যে যখন কেউ তার ভাইকে কাফন পরাবে, তখন সে যেন তার কাফনকে উত্তম করে।”
3509 - عن أبي قتادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ولي أحدكم أخاه فليحسنْ كفَنَه".
حسن: رواه الترمذي (995)، وابن ماجه (1474) كلاهما عن محمد بن بشار، قال: حدثنا عمر بن يونس، قال: حدثنا عكرمة بن عمار، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن أبي قتادة فذكر الحديث.
قال الترمذي:"حديث حسن".
قلت: وهو كما قال، فإن عكرمة بن عمار وهو العجلي مختلف فيه. وثقه أبو داود والعجلي والدارقطني وغيرهم، وتكلم فيه الإمام أحمد وابن المديني والبخاري وغيرهم، إلا أنه حسن الحديث في غير روايته عن يحيى بن أبي كثير، أشار إليه الحافظ في التقريب بقوله:"صدوق يغلط، وفي روايته عن يحيى بن أبي كثير اضطراب، ولم يكن له كتاب".
وأما ما رُوي عن علي بن أبي طالب قال: لا تُغال لي في كفن، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تغالوا في الكفن، فإنه يُسْلَبُه سلبًا سريعًا" ففيه عمرو بن هاشم أبو مالك الجَنْبي، ومن طريقه رواه أبو داود (3154) عن إسماعيل بن أبي خالد، عن عامر، عن علي بن أبي طالب فذكره.
قال المنذري: فيه عمرو بن هاشم أبو مالك الجنْبي، وفيه مقال.
قلت: وهو كما قال، تكلم فيه كبار النقاد منهم: البخاري ومسلم والنسائي وأبو أحمد الحاكم، وبالغ فيه ابن حبان، وخلص الحافظ إلى القول بأنه"ليِّن الحديث".
وفي سماع عامر وهو الشعبي عن علي خلاف، والصحيح أنه سمع منه كما جاء في صحيح البخاري، وهو لا يكتفي بمجرد إمكان اللقاء، انظر"جامع التحصيل" (ص
আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার (মৃত) ভাইয়ের দায়িত্ব গ্রহণ করে, তখন সে যেন তার কাফন সুন্দর করে।"
3510 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير ثيابكم البياض، فكفِّنوا فيها موتاكم، وألبسوها".
حسن: رواه أبو داود (3878)، والترمذي (994)، والنسائي (5113)، وابن ماجه (1472) كلهم من طريق عبد الله بن عثمان بن خُثَيم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكر الحديث، واللفظ لابن ماجه، وصحَّحه ابن حبان (5423)، والحاكم (1/ 354) وقال: صحيح على شرط مسلم.
وقال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: في إسناده عبد الله بن عثمان بن خثيم من رجال مسلم، قال فيه أبو حاتم: لا بأس به، ووثَّقه النسائي، إلا أنه ليَّنه في السنن.
والخلاصة فيه أنه حسن الحديث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের পোশাকের মধ্যে উত্তম হলো সাদা। সুতরাং তোমরা এতে তোমাদের মৃতদের কাফন দাও এবং তোমরা তা পরিধান করো।"
3511 - عن سمرة بن جندب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ألبسوا من ثيابكم البياض، فإنها أطهر وأطيب، وكفِّنوا فيها موتاكم".
صحيح: رواه النسائي (18796) عن عمرو بن علي، قال: حدثنا يحيى بن سعيد، قال: سمعت سعيد بن أبي عروبة، يحدث عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي المهلِّب، عن سمرة بن جندب فذكره.
وإسناده صحيح، وسعيد بن أبي عروبة وإن كان ثقة حافظًا إلا أنه كثير التدليس، واختلط، وقد تابعه معمر، عن أيوب بإسناده ولفظه:"عليكم بهذا البياض فليلبسه أحياؤُكم، وكفِّنوا فيه موتاكم، فإنه من خيار ثيابكم" رواه عبد الرزاق في"المصنف" (6198) عن معمر، ورواه الإمام أحمد (20235)، والطبراني في"الكبير" (6975)، والحاكم (4/ 185) كلهم من طريق عبد الرزاق به مثله، وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه لأن سفيان بن عيينة وإسماعيل ابن علية أرسلاه عن أيوب"، انتهى.
قلت: وأما حديث سفيان فرواه الترمذي (2810)، وابن ماجه (3567) كلاهما من طريق سفيان، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ميمون بن أبي شبيب، عن سمرة بن جندب فذكر نحوه.
قال الترمذي: حسن صحيح، وجعله الحاكم (1/ 354) شاهدًا صحيحًا لحديث ابن عباس، فلعلهما يقصدان أصل الحديث، فإنه صحيح بدون شك، وأما حديث سفيان ففيه ميمون بن أبي شبيب لم يسمع من أحد من الصحابة، قال عمرو بن علي الفلاس:"كان يحدث عن أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وحدَّث عن عمر بن الخطاب، ومعاذ بن جبل، وأبي ذر، وسمرة بن جندب، وعبد الله بن مسعود، وليس عندنا في شيء منه يقول: سمعت، ولم أُخبر أن أحدًا يزعم أنه سمع من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم"تحفة التحصيل" (322).
وكذلك لا يصح ما رواه الإمام أحمد (20105) من طريق أبي قلابة، عن سمرة، فإن أبا قلابة هو عبد الله بن زيد الجرمي لم يسمع من سمرة، إلا أن ما صَحَّ لا يُعلُّه ما لم يصح.
সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের কাপড়সমূহের মধ্যে সাদা কাপড় পরিধান করো, কারণ তা অধিকতর পবিত্র ও উত্তম। আর তোমরা তাতে তোমাদের মৃতদের কাফন পরাও।"
3512 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر امرأة من بني إسرائيل، حشتْ خاتمها مسكًا، والمسك أطيب الطيب.
صحيح: رواه مسلم في كتاب الألفاظ في الأدب (2252) من طرق عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
وفي رواية عند أبي داود (3158)، والترمذي (991):"أطيبُ طيبكم المسك" أخرجاه في كتاب الجنائز في باب المسك للميت.
قال الترمذي:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، وهو قول أحمد وإسحاق، وقد كره بعض أهل العلم المسك للميت" انتهى.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনী ইসরাঈলের এক নারীর কথা আলোচনা করেন, যে তার আংটিকে মিশক (কস্তুরী) দ্বারা পূর্ণ করত (বা সুগন্ধিযুক্ত করত), আর মিশক হলো সুগন্ধিগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ (বা উত্তম)।
3513 - عن أم عطية قالت: دخل علينا النبي صلى الله عليه وسلم ونحن نغسل ابنته فقال:"واجعلن في الآخرة كافورًا، أو شيئًا من كافور".
متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (2) عن أيوب بن أبي تميمة السختياني، عن محمد بن سيرين، عن أم عطية الأنصارية فذكرت الحديث.
ورواه البخاري في الجنائز (1253) عن إسماعيل بن عبد الله، ومسلم في الجنائز (939/ 38) عن قتيبة بن سعيد، كلاهما عن مالك بن أنس.
উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের নিকট আসলেন যখন আমরা তাঁর কন্যাকে গোসল দিচ্ছিলাম। অতঃপর তিনি বললেন, "তোমরা শেষবারে কর্পূর ব্যবহার করো, অথবা কিছু কর্পূর ব্যবহার করো।"
3514 - عن جابر بن عبد الله قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا أجمرتم الميت فأجمروا ثلاثًا".
حسن: رواه الإمام أحمد (14540)، وأبو يعلى (2300) كلاهما من حديث يحيي بن آدم، حدثنا قُطبة بن عبد العزيز، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.
وصحَّحه ابن حبان (3031).
وأخرجه الحاكم (1/ 355) من وجه آخر عن محمد بن عبد الله بن نمير، عن قطبة بن عبد العزيز بإسناده مثله.
وقال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".
وهو كما قال، إلا أن قطبة بن عبد العزيز وإن كان أخرج له مسلم فإنه"صدوق".
وأما البيهقي (3/ 405) فرواه عن شيخه الحاكم من طريق يحيي بن آدم، عن قطبة كما مضى، ونقل عن ابن معين أنه قال:"لم يرفعه إلا يحيى بن آدم" وقال:"ولا أظن هذا الحديث إلا غلطًا".
قلت: هذا وهمٌ من يحيى بن معين مع إمامته في هذا الفن، فإن يحيى بن آدم لم ينفرد في رفعه،
بل تابعه أيضًا محمد بن عبد الله بن نمير، وهو ثقة فاضل، والبيهقي لم يقف على رواية محمد بن عبد الله بن نمير وإلا رد على ابن معين، وإنما أخرج هو عن شيخه الحاكم من طريق يحيى بن آدم كما مضي.
ثم أن الذي عليه جمهور أهل العلم من المحدثين، إذا اختُلِف في الرفع والوقف فالصحيح الحكم للرفع لأنه زيادة ثقة، ولا شك في توثيق يحيى بن آدم، كما قال النووي في"الخلاصة" (3407) فكيف قد توبع على رفعه.
وروى مالك (1/ 226) بإسناد صحيح عن أسماء بنت أبي بكر رضي الله عنهما أنها قالت لأهلها: أجمروا ثيابي إذا مِتُّ، ثم حنِّطوني، ولا تَذُرُّوا على كفني حنوطًا، ولا تتبعوني بنار.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমরা মৃতের শরীরকে ধূমায়িত (সুগন্ধিযুক্ত) করবে, তখন তিনবার তা করবে।"
3515 - عن ابن عباس قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لرجل مات بعرفة وهو محرم:"اغسلوه بماء وسدر، وكفنوه في ثوبين، ولا تُحنطوه ولا تخمروا رأسه، فإن الله يبعثه يُلَبِّي أو مُلَبِّيًا".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1268)، ومسلم في الجنائز (1206) كلاهما من حديث حماد ابن زيد، عن عمرو بن دينار وأيوب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره، واللفظ للبخاري.
وفي الحديث دليل على أن غير المحرم يُحنَّط كما يُخمر، وأن النهي وقع لأجل الإحرام.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে বললেন, যিনি আরাফার ময়দানে ইহরাম অবস্থায় মারা যান: "তোমরা তাকে পানি ও বরই পাতা (সিডর) দিয়ে গোসল দাও, এবং তাকে দু'টি কাপড়ে কাফন পরাও। তোমরা তাকে সুগন্ধি লাগাবে না এবং তার মাথাও ঢাকবে না। কারণ আল্লাহ তাকে তালবিয়া পাঠকারী অবস্থায় পুনরুত্থিত করবেন।"
এই হাদীস প্রমাণ করে যে, যে ব্যক্তি ইহরাম অবস্থায় নয়, তাকে সুগন্ধি লাগানো যেতে পারে এবং তার মাথাও ঢাকা যেতে পারে। আর এই নিষেধাজ্ঞা শুধুমাত্র ইহরামের কারণেই প্রযোজ্য হয়েছিল।
3516 - عن عُتَيٍّ قال: رأيتُ شيخًا بالمدينة يَتَكلَّمُ، فسأَلتُ عنه، فقالوا: هذا أُبَيُّ بن كعب، فقال: إن آدمَ عليه السلام لما حَضَره الموتُ قال لِبَنِيه: أيْ بَنِيَّ! إني أشتهي من ثمار الجنةِ، فذهبوا يُطلبون له، فاستقبلَتهم الملائكةُ ومعهم أَكفانُهُ وحَنُوطُه، ومعهم الفُؤوسُ والمساحي والمكاتِلُ، فقالوا لهم: يا بَني آدم، ما تُريدُون وما تَطلبون -أو ما تُريدون وأَين تَذهبون؟ - قالوا: أَبونا مريضٌ فاشتَهي من ثمار الجنةِ، قالوا لهم: ارجِعوا فقد قُضي قضاءُ أَبيكُم.
فجاؤوا، فلما رأَتهم حوَّاءُ عَرَفَتهم، فلاذَت بآدمَ، فقال: إليكِ عني فإني إنما أُوتيتُ مِن قِبَلِك، خَلِّي بيني وبين ملائكةِ ربِّي تبارك وتعالى، فَقَبَضوه، وغَسلُوه وكفَّنوه وحنَّطوه، وحَفَروا له وأَلْحَدوا له، وصَلَّوا عليه، ثم دَخَلوا قبرَه فوضَعوه في قبرِه ووَضَعوا عليه اللَّبِنَ، ثم خرجوا من القَبرِ، ثم حَثَوْا عليه التراب، ثم قالوا: يا بَني آدمَ! هذه سنَّتُكم.
حسن: رواه عبد الله بن أحمد (21240) عن هدبة بن خالد، حدثنا حماد بن سلمة، عن حُميد،
عن الحسن، عن عُتَيٍّ قال فذكره.
وإسناده حسن لما قيل في عُتَيٍّ وهو ابن ضمرة السعدي روى عنه ابنه عبد الله والحسن، وثَّقه ابن سعد والعجلي وابن حبان وغيرهم، واعتمده الحافظ في"التقريب" فقال:"ثقة" وقد أعل الحديث من أجل تفرده.
قلت: ولا يضر تفرده ما دام هو ثقة.
ورواه الحاكم (1/ 344 - 345) من وجهين آخرين:
أحدهما: عن أبي بكر بن نصر الداربردي بمرو، ثنا أبو الموجه، ثنا سعيد بن منصور، وعلي ابن حجر قالا: حدثنا هُشيم، أنبأنا يونس بن عبيد.
والثاني: عن أحمد بن جعفر القطيعي، ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا إسماعيل -كلاهما- أعني هشيما وإسماعيل ابن علية عن يونس بن عبيد، عن الحسن، عن عُتَيٍّ، عن أُبي بن كعب فذكر نحوه.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وهو من النوع الذي لا يوجد للتابعي إلا الراوي الواحد، فإن عُتَيّ بن ضمرة السعدي ليس له راوٍ غير الحسن، وعندي أن الشيخين عللاه بعلة أخرى، وهو أنه روي عن الحسن، عن أُبيّ دون ذكر عُتَيٍّ".
ثم رواه من وجه آخر عن يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد، عن الحسن، عن أبي بن كعب مرفوعًا نحوه مختصرًا.
وقال:"هذا لا يُعلل حديث يونس بن عبيد، فإنه أعرف بحديث الحسن من أهل المدينة، ومصر والله أعلم".
قلت: من العلل التي أعلت به هذا الحديث الاختلاف في الرفع والوقف، والصواب فيه الرفع لأن معه زيادة علم.
ومن العلل التي أعلت به هذا الحديث عنعنة الحسن وهو مدلس، قلت: لقد ثبت التصريح بالتحديث عند البيهقي (3/ 404) إلا أنه موقوف، وثبوت التصريح في هذا الموقوف يُقَوِّي جهة السماع، وبالتالي تنفي عنه تهمة التدليس.
وفي الإسناد كلام آخر غير أن ما ذكرته هو أحسنه وبالله التوفيق.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় আদম (আলাইহিস সালাম)-এর যখন মৃত্যু উপস্থিত হলো, তখন তিনি তাঁর পুত্রদেরকে বললেন: হে আমার পুত্রগণ! আমার জান্নাতের ফল খেতে ইচ্ছা করছে। তখন তারা তার জন্য ফল খুঁজতে গেল।
তখন ফেরেশতারা তাদের সাথে সাক্ষাৎ করলেন। ফেরেশতাদের সাথে ছিল তাঁর কাফন ও সুগন্ধি (হনূত), এবং তাদের সাথে ছিল কোদাল, বেলচা ও ঝুড়ি। তারা (ফেরেশতারা) তাদেরকে বললেন: হে আদম সন্তানগণ! তোমরা কী চাও এবং কী খুঁজছ?— অথবা: তোমরা কী চাও এবং কোথায় যাচ্ছ? তারা বলল: আমাদের পিতা অসুস্থ, তাই তিনি জান্নাতের ফল খেতে চেয়েছেন। তারা তাদেরকে বললেন: তোমরা ফিরে যাও, তোমাদের পিতার ফয়সালা হয়ে গেছে।
তারা ফিরে এলো। যখন হাওয়া (আঃ) তাদেরকে দেখলেন, তিনি তাদেরকে চিনতে পারলেন এবং আদমের সাথে লেপ্টে গেলেন। আদম (আঃ) বললেন: আমার কাছ থেকে দূরে থাকো। নিশ্চয় আমি তোমার কারণেই আক্রান্ত হয়েছি (বিপদে পড়েছি)। আমার ও আমার প্রতিপালক বরকতময় ও সুমহান আল্লাহর ফেরেশতাদের মাঝে প্রতিবন্ধক হয়ো না।
অতঃপর তারা (ফেরেশতারা) তাঁকে (জান) কবজ করলেন, তাঁকে গোসল দিলেন, কাফন পরালেন, সুগন্ধি মাখালেন, তাঁর জন্য কবর খনন করলেন এবং লাহদ (পার্শ্বমুখী) কবর বানালেন, আর তাঁর জানাযার সালাত আদায় করলেন। এরপর তারা তাঁর কবরে প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে তাঁর কবরে রাখলেন, আর তার উপর কাঁচা ইট (লাবিন) রাখলেন। এরপর তারা কবর থেকে বেরিয়ে আসলেন এবং তার উপর মাটি ঢেলে দিলেন। এরপর তাঁরা বললেন: হে আদম সন্তানগণ! এটাই তোমাদের সুন্নাত (পদ্ধতি)।
3517 - عن أبي وائل قال: كان عند علي مسك، فأوصى أن يُحنط به، قال: قال علي: هو فضل حنوط رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه البيهقي (3/ 405 - 406) عن أبي عبد الله الحافظ، أنبأ أبو بكر بن إسحاق، أنبا محمد بن أيوب، أنبا إبراهيم بن موسي، ثنا حميد بن عبد الرحمن الرؤاسي، ثنا الحسن بن صالح، عن هارون بن سعد، عن أبي وائل فذكره.
وإسناده حسن من أجل هارون بن سعد وهو العجلي أو الجعفي الكوفي الأعور مختلف فيه غير أنه حسن الحديث وهو من رجال مسلم، وإنما انتقم عليه غلوه في الرفض.
قال ابن حبان:"كان غاليًا في الرفض، لا تحل عنه الرواية بحال".
قلت: وذلك إذا ثبت عنه الكذب، وإنه لم يثبت.
ولذلك حسَّنه النووي في"الخلاصة" (3398).
تنبيه: تحرف في سنن البيهقي هارون بن سعد إلى"هارون بن سعيد" فتنبه.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর কাছে কিছু মিসক ছিল। তিনি অসিয়ত করলেন যেন তা দ্বারা তাঁকে সুগন্ধি মাখানো হয়। তিনি বললেন, এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুগন্ধি মাখানোর অবশিষ্ট অংশ।
3518 - عن حميد قال: لما توفي أنس بن مالك جُعل في حنوطه مسك فيه من عرق رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه البيهقي (3/ 406) من طريق ابن أبي مريم، حدثني يحيى بن أيوب، حدثني حُميد فذكره.
وابن أبي مريم هو: سعيد بن الحكم المصري.
وإسناده حسن من أجل الكلام في يحيي بن أيوب وهو الغافقي غير أنه حسن الحديث وهو من رجال الجماعة.
وأما ما رُوي عن نافع قال: مات سعيد بن زيد بن عمرو بن نُفيل وكان بدريًّا، فقالت أم سعيد لعبد الله بن عمر: أتُحنطه بالمسك؟ فقال: وأي طبيب أطيب من مسك؟ هاتي مسككِ، فناولته إياه قال: ولم نكن نَصنع كما تصنعون -"كنا نتبع بحنوطه مراقه ومغابنه" فهو ضعيف.
رواه البيهقي (3/ 406) من طريق سعيد بن مسلمة، ثنا إسماعيل بن أمية، عن نافع فذكره.
وسعيد بن مسلمة هو ابن هشام بن عبد الملك بن مروان الأموي، نزيل الجزيرة، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، إلا ابن عدي أَلان القول فيه فقال:"أرجو أنه ممن لا يترك حديثه".
হুমাইদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করলেন, তখন তাঁর জানাজার সুগন্ধি (হানূত)-এর মধ্যে এমন কস্তুরী (মিসক) রাখা হয়েছিল, যাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘাম মিশ্রিত ছিল।
3519 - عن خبَّاب بن الأَرَتِّ قال: هاجرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سبيل الله، نبتغي وجه الله فوجب أجرنا على الله، فمِنَّا من مضى لم يأكل من أجره شيئًا، منهم مصعب بن عمير قُتل يوم أُحد، فلم يُوجد له شيء يُكفن فيه إلا نمرة، فكنا إذا وضعنا على رأسه خرجتْ رجلاه، وإذا وضعنا على رجليه خرج رأسُه فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ضعوها مما يلي رأسه واجعلوا على رجليه الإذْخر" ومنا من أَيْنَعَتْ له ثمرتُه فهو يَهْدِبُها.
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1276)، ومسلم في الجنائز (940) كلاهما عن طريق الأعمش، عن شقيق، عن خبَّاب بن الأرَثِّ فذكره ولفظهما سواء.
قوله:"أينَعَتْ" أي نضجت.
وقوله:"يهدُبها" أي يجتنيها.
খাব্বাব ইবনুল আরাত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহ্র পথে আল্লাহ্র সন্তুষ্টি লাভের উদ্দেশ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হিজরত করেছিলাম, তাই আল্লাহ্র নিকট আমাদের পুরস্কার ওয়াজিব হয়ে গেল। আমাদের মধ্যে এমন ব্যক্তিও আছেন যিনি চলে গেছেন, কিন্তু তার প্রতিদানের কিছুই তিনি ভোগ করেননি। তাঁদের মধ্যে মুসআব ইবনু উমায়র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন, যিনি উহুদের দিনে শহীদ হন। তাঁর কাফন দেওয়ার জন্য একটি চাদর (নামিরা) ছাড়া আর কিছুই পাওয়া যায়নি। আমরা যখন তা তাঁর মাথার দিকে দিতাম, তখন তাঁর পা বেরিয়ে যেত, আর যখন আমরা তা তাঁর পায়ের দিকে দিতাম, তখন তাঁর মাথা বেরিয়ে যেত। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তা মাথার দিক দিয়ে দাও এবং তাঁর পায়ের উপর ইযখির ঘাস রেখে দাও।” আর আমাদের মধ্যে এমন ব্যক্তিও আছেন, যাঁর ফল পেকে গেছে এবং তিনি তা আহরণ করছেন (ভোগ করছেন)।
3520 - عن سعد بن إبراهيم، عن أبيه إبراهيم قال: أتي عبد الرحمن بن عوف يومًا بطعامه، فقال: قُتل مصعب بن عُمير -وكان خيرًا مني- فلم يوجد له ما يُكفَّن فيه إِلَّا بردة، لقد خشيتُ أن يكون قد عُجِّلت لنا طيباتُنا في حياتنا الدُّنيا، ثمّ جعل يبكي.
صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1274) عن أحمد بن محمد المكيّ، حَدَّثَنَا إبراهيم بن سعد، عن سعد، عن أبيه فذكره.
وفي رواية شعبة عن سعد بن إبراهيم، عن أبيه إبراهيم وفيه: كفِّن في بُردة إن غُطِّي رأسْه بَدَتْ رجلاه، وإن غُطِّي رجلاه بدا رأسُه، وأراه قال: وقُتل حمزة -وهو خير مني- ثمّ بُسط لنا من الدُّنيا ما بُسط -أو قال: أُعطينا من الدُّنيا ما أعطينا- وقد خشينا أن تكون حسناتُنا عُجِّلتْ لنا، ثمّ جعل يبكي حتّى ترك الطعام. رواه البخاريّ (1375)، عن محمد بن مقاتل، أخبرنا عبد الله، أخبرنا شعبة بإسناده.
আবদুর রহমান ইবনু আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবরাহীম (তাঁর বাবা) বলেন: একদা তাঁর সামনে খাবার আনা হলো। তিনি বললেন, মুস‘আব ইবনু ‘উমাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শহীদ হয়েছিলেন— আর তিনি আমার চেয়েও উত্তম ছিলেন— কিন্তু কাফনের জন্য তাঁর একটি চাদর ছাড়া আর কিছুই পাওয়া যায়নি। আমার ভয় হচ্ছে, দুনিয়ার জীবনেই আমাদের জন্য আমাদের উত্তম প্রতিদানগুলো তড়িঘড়ি দিয়ে দেওয়া হয়েছে। অতঃপর তিনি কাঁদতে লাগলেন।
শু‘বাহ বর্ণিত অন্য এক বর্ণনায় আছে, মুস‘আব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এমন একটি চাদরে কাফন দেওয়া হয়েছিল যে, যদি তাঁর মাথা ঢাকা হতো, তবে তাঁর পা বেরিয়ে যেত, আর যদি তাঁর পা ঢাকা হতো, তবে তাঁর মাথা বেরিয়ে যেত। বর্ণনাকারী (ইবরাহীম) বলেন: আমার মনে হয়, তিনি আরও বলেছিলেন, হামযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও শহীদ হয়েছিলেন— আর তিনি আমার চেয়েও উত্তম ছিলেন। অতঃপর আমাদের জন্য দুনিয়ার এত প্রাচুর্য দান করা হয়েছে— অথবা তিনি বলেছিলেন: আমাদের দুনিয়ার এতকিছু দেওয়া হয়েছে— আমরা আশঙ্কা করছি যে, আমাদের পুণ্যগুলোর (নেক কাজগুলোর প্রতিদান) আমাদের জন্য তড়িঘড়ি দেওয়া হয়ে গেছে। অতঃপর তিনি কাঁদতে শুরু করলেন, এমনকি তিনি খাবার ছেড়ে দিলেন।