হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3521)


3521 - عن حارثة بن مُضَرِّب قال: دخلت على خبَّاب، وقد اكتوي سبعًا فقال: لولا أني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يتمنى أحدكم الموت" لتمنيتُ، ولقد رأيتُنِي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ما أملك، وإن في جانب بيتي الآن لأربعين ألف درهم. قال: ثمّ أتي بكفنه، فلمّا رأه بكى وقال: لكن حمزة لم يُوجد له كفن إِلَّا بردة ملحاءُ، إذا جعلت على رأسه قَلَصَت عن قدميه، وإذا جعلتْ على قدميه قَلَصَتْ عن رأسه، حتي مُدَّت على رأسه، وجعل على قدميه الإذْخِر.

صحيح: رواه الترمذيّ (970) عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مُضَرِّب فذكر الحديث غير أن الترمذيّ لم يذكر قصة كفن حمزة، وإنما ذكره الإمام أحمد (21072، 27219) واللّفظ له من وجه آخر، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق بإسناده.

قال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح". وأصله في الصحيحين.




খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হারিসা ইবনু মুদাররিব বলেন: আমি খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম, যখন তিনি সাতবার দাগা (গরম লোহা দিয়ে চিকিৎসা) নিয়েছিলেন। তখন তিনি বললেন: আমি যদি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই কথা বলতে না শুনতাম যে, "তোমাদের কেউ যেন মৃত্যুর আকাঙ্ক্ষা না করে," তবে আমি অবশ্যই মৃত্যুর আকাঙ্ক্ষা করতাম। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (জীবনের এমন দিন) দেখেছি যখন আমার কিছুই মালিকানা ছিল না, অথচ এখন আমার ঘরের এক কোণে চল্লিশ হাজার দিরহাম রয়েছে। (হারিসা) বলেন: এরপর তাঁর (খাব্বাবের) কাফন আনা হলো। যখন তিনি তা দেখলেন, তখন কেঁদে ফেললেন এবং বললেন: কিন্তু হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য মাত্র একটি ডোরাকাটা চাদর ছাড়া অন্য কোনো কাফন পাওয়া যায়নি। সেটি তাঁর মাথায় দিলে পা দুটো ঢেকে যেত না, আর পা দুটোয় দিলে মাথা ঢাকা যেত না। ফলে সেটি তাঁর মাথায় টেনে দেওয়া হলো এবং তাঁর পা দুটো ইযখির (সুগন্ধি ঘাস) দিয়ে ঢেকে দেওয়া হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (3522)


3522 - عن سهل بن سعد أن امرأة جاءت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ببردةٍ منسوجةٍ فيها حاشيتُها، أتدرون ما البردةُ؟ قالوا: الشملة، قال: نعم، قالت: نسجتُها بيدي فجئت لأكسوكها، فأخذها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم محتاجًا إليها، فخرج إلينا وإنها إزاره، فحَسَّنها فلان فقال: اكسُنِيها ما أحسنَها، قال القوم: ما أحسنتَ، لبسها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم محتاجًا إليها،
ثمّ سألته وعلمت أنه لا يردُّ، قال: إني والله! ما سألتُها لأَلْبسها، إنّما سألتُه لتكون كفني. قال سهل: فكانت كفَنه.

صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1277) عن عبد الله بن مسلمة، حَدَّثَنَا ابن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل فذكره.

وقوله:"حاشيتها" أي طرفها، أو أنها جديدة لم تقطع من ثوب.

وقوله:"فلان" قيل: عبد الرحمن بن عوف، وقيل: رجل من الأعراب لا يُعرف اسمه.




সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি বুরদাহ (চাদর) নিয়ে এলেন যা হাত দ্বারা বোনা হয়েছিল এবং যার কিনার/পাড় অক্ষত ছিল। (বর্ণনাকারী জিজ্ঞেস করলেন:) তোমরা কি জানো 'বুরদাহ' কী? তারা বলল: তা হলো চাদর (শামলা)। তিনি বললেন: হ্যাঁ। মহিলাটি বললেন: আমি এটি আমার নিজের হাতে বুনেছি, আর আমি আপনাকে এটি পরিধান করাতে (উপহার দিতে) এসেছি। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটির প্রতি মুখাপেক্ষী (প্রয়োজনীয়তা) হওয়ায় তা গ্রহণ করলেন। অতঃপর তিনি সেটি পরিধান করে আমাদের মাঝে এলেন, আর সেটি ছিল তাঁর লুঙ্গি (ইযার)। তখন অমুক ব্যক্তি সেটিকে সুন্দর আখ্যায়িত করে বলল: এটি আমাকে পরিধান করতে দিন! এটি কতই না সুন্দর! উপস্থিত লোকেরা বলল: আপনি ভালো করেননি। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটি প্রয়োজনবশতই পরিধান করেছিলেন, অথচ (আপনি) এমন অবস্থায় তাঁর কাছে চাইলেন যখন আপনি জানেন যে তিনি কাউকে কিছু ফিরিয়ে দেন না। সে (যিনি চাইলেন) বলল: আল্লাহর কসম! আমি এটি পরার জন্য চাইনি। বরং আমি চেয়েছি যেন এটি আমার কাফন হতে পারে। সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর সেটিই তার কাফন হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (3523)


3523 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من غَسَّل ميتًا فليغتسل".

حسن: رواه الترمذيّ (993)، وابن ماجة (1463) كلاهما عن محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب، قال: حَدَّثَنَا عبد العزيز بن المختار، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر الحديث واللّفظ لابن ماجه.

ولفظ الترمذيّ:"من غُسْلِه الغُسْلُ، ومن حَملهِ الوضوءُ".

ورواه أبو داود (3162) من وجه آخر عن سفيان، عن سهيل بإسناده إِلَّا أن أبا صالح أدخل بينه وبين أبي هريرة"إسحاق مولي زائدة" كما رواه أيضًا من وجه آخر عن أبي هريرة ولفظ الحديث:"من غسَّل الميت فليغسل، ومن حمله فليتوضأ".

وإسناده حسن من أجل سهيل بن أبي صالح فإنه"صدوق" وقد حسَّنَه أيضًا الترمذيّ وقال: وقد رُوي عن أبي هريرة موقوفًا.

قلت: اختلف أهل العلم في إسناد هذا الحديث اختلافًا كثيرًا كما قال المنذري. قال الإمام أحمد وعلي بن المديني:"لا يصح في هذا الباب شيءٌ" وقال محمد بن يحيى:"لا أعلم في"من غَسَّل ميتًا فليغتسل" حديثًا ثابتًا، ولو ثبت لزمنا استعماله" وقال الشافعي في البويطي:"إن صحَّ الحديث قلت بوجوبه" هذا آخر كلام المنذري.

وخلاصة القول في حديث أبي هريرة أنه لا ينزل عن درجة الحسن.

قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 137) معقبًا على قول الرّافعيّ:"لم يصحِّح علماء الحديث في هذا الباب شيئًا مرفوعًا" قلت: قد حسّنه الترمذيّ، وصحّحه ابن حبَّان، وله طريق أخرى. قال عبد الله بن صالح: ثنا يحيى بن أيوب، عن عقيل، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، رفعه:"من غسَّل ميِّتًا فليغتسل" ذكره الدَّارقطنيّ، وقال: فيه نظر. قلت: رواته موثقون، وقال ابن دقيق العيد في"الإمام": حاصل ما يعتل به وجهان: من جهة الرّجال، ولا يخلو إسناد منها من متكلّم فيه، ثمّ ذكر ما معناه أن أحسنها رواية سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، وهي
معلولة، وإن صحَّحها ابن حبَّان وابن حزم، فقد رواه سفيان، عن سهيل، عن أبيه، عن إسحاق مولي زائدة، عن أبي هريرة. قلت: إسحاق مولي زائدة أخرج له مسلم، فينبغي أن يصحّح الحديث، قال: وأمّا رواية محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فإسناد حسن، إِلَّا أنَّ الحفاظ من أصحاب محمد بن عمرو رووه عنه موقوفًا، وفي الجملة هو بكثرة طرقه أسوأ أحواله أن يكون حسنًا. فإنكار النّوويّ على الترمذيّ تحسينه معترض، وقد قال الذّهبيّ في"مختصر البيهقيّ":"طرق هذا الحديث أقوى من عدّة أحاديث احتجّ بها الفقهاء، ولم يعلوها بالوقف، بل قدّموا رواية الرّفع، والله أعلم". انتهى كلام الحافظ.

قلت: انظر كلام الذّهبيّ في"المهذّب في اختصار سنن البيهقيّ" (1/ 301)، وقد نقل الشوكاني في"النّيل" (1/ 356) بعض فقرات الحافظ وأقرّه.

وقال الحافظ ابن القيم:"وهذه الطّرق تدل على أنَّ الحديث محفوظ"."تهذيب السنن".

ولكن قال أبو داود عقب إخراج الحديث:"هذا منسوخ، سمعتُ أحمد بن حنبل وسئل عن الغسل من غسَّل الميت، فقال: يُجزئه الوضوء". ومثله قال ابن شاهين في"الناسخ والمنسوخ" (38، 39) وقال:"ناسخه حديث ابن عباس الآتي". انظر فقه هذا الباب في"المنة الكبرى" (3/ 24 - 25).

وفي الباب عن عائشة، وعليّ، وأبي سعيد الخدريّ، وحذيفة بن اليمان، والمغيرة بن شعبة، وفي الجميع مقال، وإن ثبت بمجموع الشواهد فهو منسوخ كما سيأتي. انظر تخاريج هذه الأحاديث في"البدر المنير"




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি মৃতকে গোসল দেবে, সে যেন নিজেও গোসল করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3524)


3524 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس عليكم في غُسل ميتكم غُسل إذا اغتسلتموه، فإن ميتكم ليس بنجس، فحسبكم أن تغسلوا أيديكم".

حسن: رواه الدَّارقطنيّ في سننه (2/ 76) وعنه الحاكم في"المستدرك" (1/ 386)، عن أحمد ابن محمد بن سعيد، عن أبي شيبة إبراهيم بن عبد الله بن أبي شيبة، عن خالد بن مخلد، عن سليمان ابن بلال، عن عمرو بن أبي عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ، ولم يخرجاه، وفيه رفض لحديث مختلف فيه على محمد بن عمرو بأسانيد:"من غسَّل ميتًا فليغتسل" انتهى.

وتعقبه الذّهبيّ على قوله"وفيه رد لحديث"من غسل ميتًا فليغتسل" بل نعمل بهما فيستحب الغسل. انتهى.

قلت: وإسناده حسن من أجل الكلام في عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وهو الذي ذهب إليه الذّهبيّ نفسه في"الميزان" بعد أن ساق أقوال أهل العلم فيه.
ولكن قال البيهقيّ (1/ 306) بعد أن أخرج الحديث عن الحاكم من الطريق نفسه:"هذا ضعيف، والحمل فيه على أبي شيبة، كما أظن".

ونبَّه ابن الملقن في"البدر المنير" (4/ 659) فقال:"أبو شيبة هذا هو إبراهيم بن عبد الله بن أبي شيبة، وهو ثقة كما سلف، والمطعون فيه الواهي هو أبو شية إبراهيم بن عثمان الكوفي قاضي واسط، فتنبّه لذلك". انتهى.

وقال الحافظ ابن حجر معقبًا على كلام البيهقيّ: اقلت: أبو شيبة، هو إبراهيم بن أبي بكر بن أبي شيبة، احتجّ به النسائيّ ووثَّقه الناس، ومن فوقه احتجّ بهم البخاريّ، وأبو العباس الهمداني هو ابن عقدة حافظ كبير، إنّما تكلّموا فيه بسبب المذهب، ولأمور أخرى، ولم يضعفه بسبب المتون أصلًا، فالإسناد حسن، فيجمع بينه وبين الأمر في حديث أبي هريرة، بأنَّ الأمر على النَّدب، أو المراد بالغسل غسل الأيديّ، كما صرَّح به في هذا. قلت: ويؤيّد أن الأمر فيه للندب، ما روي الخطيب في ترجمة محمد بن عبد الله المخرميّ من طريق عبد الله بن أحمد بن حنبل، قال: قال لي أبي كتبتَ حديث عبيد الله عن نافع عن ابن عمر:"كنا نغسل الميت، فمنا من يغتسل، ومنا من لا يغتسل"؟ قال: قلت: لا، قال: في ذلك الجانب شاب يقال له محمد بن عبد الله يحدِّث به عن أبي هشام المخزوميّ عن وهيب فاكتبه عنه، قلت: وهذا إسناد صحيح، وهو أحسن ما جمع به بين مختلف هذه الأحاديث، والله أعلم". انتهى كلام الحافظ من"التلخيص الحبير" (1/ 138).




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমাদের মৃতকে গোসল করানোর পর তোমাদের জন্য (নতুন করে) গোসল করা আবশ্যক নয়। কেননা তোমাদের মৃত ব্যক্তি অপবিত্র নয়। সুতরাং তোমাদের জন্য যথেষ্ট হলো শুধু তোমাদের হাত ধুয়ে নেওয়া।”









আল-জামি` আল-কামিল (3525)


3525 - عن * *




৩৫২৫ - ...এর সূত্রে বর্ণিত...









আল-জামি` আল-কামিল (3526)


3526 - عن أنس بن مالك قال: مرُّوا بجنازة فأثْنَوا عليها خيرًا، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"وجبْت" ثمّ مرُّوا بأخرى، فأثْنَوا عليها شرًّا فقال:"وجبتْ" فقال عمر بن الخطّاب: ما وجبتْ؟ قال:"هذا أَثنيتُم عليه خيرًا فوجبَتْ له الجنّة، وهذا أَثْنيتم عليه شرًّا فوجبَتْ له النّار، أنتم شهداء الله في الأرض".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1367) عن آدم، عن شعبة، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن صُهَيب قال: سمعت أنس بن مالك فذكر الحديث.

ورواه مسلم في الجنائز (949) من وجه آخر عن ابن علية، أخبرنا عبد العزيز بن صُهَيب بإسناده وفيه تكرار"وجبت وجبت وجبت" ثلاث مرات، فقال عمر بن الخطّاب: فدى لك أبي وأمي.

كما أن فيه قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أنتم شهداء الله في الأرض" ثلاث مرات.

وزاد الحاكم (1/ 377):"إن لله ملائكة تنطق على ألْسِنة بني آدم بما في المرأ من الخير والشر" رواه من وجه آخر عن النضر بن أنس، عن أنس، وصحَّحه على شرط مسلم.

وأمّا ما رُوي عنه مرفوعًا:"ما من رجل يموت فيشهد له رجلان من خبرته الأقربين فيقولان: اللَّهُمَّ! لا نعلم إِلَّا خيرًا إِلَّا قال الله عز وجل لملائكته: أشهدكم أني قد غفرت لعبدي بشهادتهما، وتجاوزت له عما لا يعلمان" فهو ضعيف.

رواه إسحاق بن راهويه في مسنده (359) قال: أخبرنا بقية بن الوليد، حَدَّثَنِي الضَّحَّاك بن حمزة، عن صالح الأملوكيّ، عن أنس بن مالك فذكره.

والضحاك بن حمزة هو الواسطيّ، وأصله من الشام،"ضعيف"، قال فيه ابن معين:"ليس بذاك" وفي رواية:"ليس بشيء" وقال النسائيّ:"ليس بثقة" وتكلم فيه غيرهما من أهل العلم، وقال ابن عدي:"له أحاديث حسان غرائب" وفي"التقريب":"ضعيف".

وبقية بن الوليد مدلس تدليس التسوية لم يصرح بالتحديث في جميع الطَّبقات كما اشترط بعض أهل العلم في قبول حديثه خوفًا من تدليس التسوية والجمهور على قبول تحديثه في شيوخه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা একটি জানাযার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, আর তারা এর উত্তম প্রশংসা করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওয়াজিব হয়ে গেছে।" অতঃপর তাঁরা অন্য একটি জানাযার পাশ দিয়ে গেলেন, আর তারা এর মন্দ সমালোচনা করল। তখন তিনি বললেন: "ওয়াজিব হয়ে গেছে।" তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কী ওয়াজিব হয়ে গেছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার তোমরা উত্তম প্রশংসা করেছ, তার জন্য জান্নাত ওয়াজিব হয়ে গেছে, আর যার তোমরা মন্দ সমালোচনা করেছ, তার জন্য জাহান্নাম ওয়াজিব হয়ে গেছে। তোমরা পৃথিবীতে আল্লাহর সাক্ষী।"









আল-জামি` আল-কামিল (3527)


3527 - عن أبي الأسود قال: قدمتُ المدينة -وقد وقع بها مرض- فجلست إلى عمر بن الخطّاب فمرتْ بهم جنازة، فأُثْني على صاحبها خيرًا فقال عمر: وجبتْ، ثمّ مُرَّ بأُخرى
فأُثني على صاحبها خيرًا، فقال عمر: وجبتْ، ثمَّ مُرَّ بأخرى، فأثني على صاحبها خيرًا، فقال عمر: وجبتْ، ثمّ مُرَّ بالثالثة فأُثْنِي على صاحبها شرًّا، فقال: وجبتْ.

فقال أبو الأسود: فقلت: وما وجبتْ يا أمير المؤمنين؟ قال: قلت كما قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أيما مسلم شهد له أربعة بخير أدخله الله الجنّةَ" فقلنا: وثلاثة؟ قال: وثلاثة. فقلنا: واثنان؟ قال: واثنان. ثمّ لم نسأله عن الواحد.

صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1368) عن عفّان بن مسلم، حَدَّثَنَا داود بن أبي الفرات، عن عبد الله بن بريدة، عن أبي الأسود فذكره.




আবূ আল-আসওয়াদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মদীনায় এলাম—তখন সেখানে মহামারী দেখা দিয়েছিল। আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসলাম। এরপর তাঁদের পাশ দিয়ে একটি জানাযা অতিক্রম করল। মৃত ব্যক্তির উত্তম প্রশংসা করা হলো। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ওয়াজিব হয়ে গেল। এরপর আরেকটি জানাযা অতিক্রম করল, সেটিরও উত্তম প্রশংসা করা হলো। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ওয়াজিব হয়ে গেল। এরপর আরেকটি জানাযা অতিক্রম করল, সেটিরও উত্তম প্রশংসা করা হলো। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ওয়াজিব হয়ে গেল। এরপর অন্য একটি জানাযা অতিক্রম করল, সেটির মন্দ আলোচনা করা হলো। তখন তিনি বললেন: ওয়াজিব হয়ে গেল।

আবূ আল-আসওয়াদ বলেন, আমি বললাম: হে আমীরুল মু'মিনীন! কী ওয়াজিব হয়ে গেল? তিনি বললেন: আমি সেটাই বললাম যা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো মুসলিমের জন্য যদি চারজন ব্যক্তি কল্যাণের সাক্ষ্য দেয়, তবে আল্লাহ তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।" আমরা (উপস্থিত লোকেরা) বললাম: আর তিনজন (সাক্ষ্য দিলে)? তিনি বললেন: আর তিনজন (সাক্ষ্য দিলেও)। আমরা বললাম: আর দুইজন (সাক্ষ্য দিলে)? তিনি বললেন: আর দুইজন (সাক্ষ্য দিলেও)। এরপর আমরা তাঁকে একজন সম্পর্কে জিজ্ঞেস করিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (3528)


3528 - عن أبي هريرة قال: مُرَّ على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بجنازة فأُثني عليها خيرًا في مناقب الخير فقال:"وجبتْ" ثمّ مرُّوا عليه بأُخرى، فأُثني عليها شرًا في مناقب الشر فقال:"وجبتْ إنكم شهداءُ الله في الأرض".

حسن: رواه ابن ماجة (1492) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حَدَّثَنَا عليّ بن مُسْهر، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وصحَّحه ابن حبَّان (3024)، وأخرجه الإمام أحمد (752) كلاهما من طريق محمد بن عمرو بإسناده.

وإسناده حسن لأجل محمد بن عمرو وهو الليثي فإنه حسن الحديث.

ورواه أبو داود (3233)، والنسائي (1933) كلاهما من طريق شعبة، عن إبراهيم بن عامر، عن عامر بن سعد، عن أبي هريرة قال: مروا على رسول الله صلى الله عليه وسلم بجنازة فأثنوا عليها خيرًا، فقال:"وجبتْ" ثمّ مروا بأخرى فأَثنوا عليه شرًّا فقال:"وجبتْ" ثمّ قال:"إن بعضكم على بعض شهداءُ" وفي لفظ النسائيّ:"الملائكة شهداء الله في السماء، وأنتم شهداء الله في الأرض".

وأخرجه الإمام أحمد (10013) من طريق سفيان ومسعر، عن إبراهيم بن عامر بن مسعود الجُمحيّ، بإسناده.

وفيه عامر بن سعد وهو البجلي روى له مسلم وأصحاب السنن غير ابن ماجة، إِلَّا أنه لم يوثقه غير ابن حبَّان، ولذا جعله الحافظ في مرتبة"مقبول".

قلت: وهو كذلك فإنه تابعه أبو سلمة في الإسناد السابق.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে একটি জানাযা অতিক্রম করানো হচ্ছিল। তখন (উপস্থিত লোকেরা) তাদের উত্তম গুণাবলী উল্লেখ করে তার প্রশংসা করল। তিনি বললেন: "অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল।" এরপর তাঁর পাশ দিয়ে অন্য একটি জানাযা অতিক্রম করানো হলো, তখন (উপস্থিত লোকেরা) তাদের খারাপ গুণাবলী উল্লেখ করে তার নিন্দা করল। তিনি বললেন: "অবশ্যম্ভাবী হয়ে গেল। নিশ্চয় তোমরা পৃথিবীতে আল্লাহর সাক্ষী।"









আল-জামি` আল-কামিল (3529)


3529 - عن أبي قتادة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا دعي لجنازة سأل عنها، فإن أُثْني عليها خير قام فصلى عليها، وإن أثني عليها غير ذلك قال لأهلها:"شأنكم بها" ولم يُصل عليها.

صحيح: رواه الإمام أحمد (22555) عن يعقوب، حَدَّثَنَا أبيّ، عن أبيه، حَدَّثَنِي عبد الله بن أبي
قتادة، عن أبيه فذكره، ويعقوب هو: ابن إبراهيم بن سعد.

وإسناده صحيح، وصحّحه ابن حبَّان (3057)، والحاكم (1/ 314) كلاهما من طريق إبراهيم ابن سعد به وقال:"صحيح على شرط الشّيخين".




আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যখন কোনো জানাযার জন্য ডাকা হতো, তখন তিনি তা (মৃত ব্যক্তি) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতেন। অতঃপর যদি তার উত্তম প্রশংসা করা হতো, তবে তিনি দাঁড়িয়ে তার উপর সালাত (জানাযা) আদায় করতেন। আর যদি তার অন্যরকম প্রশংসা করা হতো, তবে তিনি তার পরিবারবর্গকে বলতেন: “তোমরা এর ব্যবস্থা করো।” এবং তিনি তার উপর সালাত আদায় করতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (3530)


3530 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من مسلم يموت فيشهد له أربعة أهل أبيات من جيرانه الأدْنَين أنهم لا يعلمون إِلَّا خيرًا إِلَّا قال الله جل وعلا: قد قبلتُ علمكم فيه، وغفرت له ما لا تعلمون".

حسن: رواه الإمام أحمد (13451)، وأبو يعلى (34468 تحقيق الأثري) كلاهما من طريق مؤمّل بن إسماعيل، حَدَّثَنَا حمّاد، حَدَّثَنَا ثابت، عن أنس.

وصحه ابن حبَّان (3026)، والحاكم (1/ 378) كلاهما من طريق مؤمّل بن إسماعيل بإسناده، واللّفظ لهما، لأنه سقط في المصدرين السابقين قوله:"أنهم لا يعلمون إِلَّا خيرًا إِلَّا قال الله جل وعلا وهو لابد منه، وكذلك ذكره الهيثميّ في"المجمع" وعزاه إلى أحمد وأبي يعلي.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام على مؤمّل بن إسماعيل فقال ابن معين: ثقة، وقال الدَّارميّ: ثقة، وقال أبو حاتم: صدوق شديد في السنة كثير الخطأ، وقال ابن سعد: ثقة كثير الغلط، فمثله يحسن حديثه.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 4) وقال:"رجال أحمد رجال الصحيح"، وأمّا قول البخاريّ في مؤمّل بن إسماعيل:"منكر الحديث" فلم يثبت منه، كما بينت ذلك في كتاب الصّلاة، ولا أعتقد أنه خالف أصحاب حمّاد في لفظ الحديث، بل أنه حديث آخر. والله تعالى أعلم.

وأمّا ما رُوي عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، عن ربه عز وجل قال:"ما من عبد مسلم يموتُ، يشهد له ثلاثة أيات من جيرانه الأدْنَين بخير إِلَّا قال الله عز وجل: قد قَبلت شهادة عِبادي على ما علموا، وغفرت له ما أعلم" ففي إسناده رجل مبهم لم يُسم. رواه الإمام أحمد (8989، 9295) عن عفّان، حَدَّثَنَا مهدي بن ميمون، حَدَّثَنَا عبد الحميد صاحب الزِياديّ، عن شيخ من أهل البصرة، عن أبي هريرة فذكره.

شيخ من أهل البصرة لا يعرف. وعبد الحميد صاحب الزيادي وإن كان ثقة من رجال الشّيخين، ولكن من شيوخه الحسن البصريّ، فإن كان هو فهو مدلِّس.




আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: এমন কোনো মুসলিম নেই যে মারা যায়, আর তার নিকটতম প্রতিবেশীর চারটি পরিবার তার পক্ষে এই মর্মে সাক্ষ্য দেয় যে, তারা তার সম্পর্কে ভালো ছাড়া আর কিছুই জানে না, তবে আল্লাহ তাআলা বলেন: "আমি তার ব্যাপারে তোমাদের জ্ঞান গ্রহণ করলাম, আর আমি তাকে ক্ষমা করে দিলাম যা তোমরা জানো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3531)


3531 - عن عائشة قالت: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"لا تسُبُّوا الأموات، فإنهم أفْضَوا إلى ما قَدَّموا".
صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1393) عن آدم، حَدَّثَنَا شُعبة، عن الأعمش، عن مجاهد، عن عائشة فذكرته.

قال البخاريّ: ورواه عبد الله بن عبد القدوس ومحمد بن أنس، عن الأعمش، تابعه عليّ بن الجعد وابن عرعرة وابن أبي عدي، عن شعبة.

قلت: حديث علي بن الجعد أخرجه البخاريّ في الرقاق (6516).




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মৃতদের গালমন্দ করো না, কারণ তারা যা আগে পাঠিয়েছে (যা আমল করেছে), তার কাছে পৌঁছে গেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3532)


3532 - عن عائشة قالت: ذكر عند النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم هالك بسوء فقال: لا تذكروا هلكاكم إِلَّا بخير".

صحيح: رواه النسائيّ (1935) عن إبراهيم بن يعقوب، قال: حَدَّثَنِي أحمد بن إسحاق، قال: حَدَّثَنَا وُهيب، قال: حَدَّثَنَا منصور بن عبد الرحمن، عن أمه، عن عائشة فذكرته.

وإسناده صحيح، وأم منصور هي: صفية كما جاء التصريح باسمها في مصنف ابن أبي شيبة (3/ 367) والزهد لهنَّاد (1165) كلاهما عن وكيع، عن سفيان، عن منصور ابن صفية، عن أمه، عن عائشة فذكرته.

وصفية هي: ابنة شية بن عثمان بن أبي طلحة العبدرية لها رؤية، وحدَّثت عن عائشة وغيرها.

وفي معناه ما رُوي عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"اذكروا محاسن موتاكم، وكُفُّوا عن مساويهم".

رواه أبو داود (4900)، والتِّرمذيّ (1019) كلاهما من حديث معاوية بن هشام، عن عمران ابن أنس المكيّ، عن عطاء، عن ابن عمر فذكره.

قال الترمذيّ:"حديث غريب، سمعت محمدًا يقول: عمران بن أنس المكي منكر الحديث".

قلت: وهو كما قال. فقد ذكره أيضًا العقيلي في"الضعفاء" وقال:"ولا يتابع على حديثه".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কোনো মৃত ব্যক্তির মন্দ দিক উল্লেখ করা হলে, তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের মৃতদেরকে ভালো ছাড়া অন্য কোনোভাবে স্মরণ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3533)


3533 - عن المغيرة بن شعبة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تسبوا الأموات، فتؤذوا الأحياء".

صحيح: رواه الترمذيّ (1982) عن محمود بن غيلان، حَدَّثَنَا أبو داود الحُفريّ، عن سفيان، عن زياد بن عِلاقة قال: سمعت المغيرة بن شعبة فذكره.

وصحَّحه ابن حبَّان (3022) فرواه من طريق أبي داود الحفريّ، والحديث في مسند الإمام أحمد (18209) عن أبي نعيم، حَدَّثَنَا سفيان بإسناده مثله.

قال الترمذيّ:"وقد اختلف أصحاب سفيان في هذا الحديث، فروى بعضهم مثل رواية الحُفري، وروى بعضُهم عن سفيان، عن زياد بن عِلاقة قال: سمعتُ رجلًا يُحدث عن المغيرة بن شعبة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نحوه".

قلت: ومن هؤلاء عبد الرحمن، قال حَدَّثَنَا سفيان، عن زياد بن عِلاقة قال: سمعتُ رجلًا عند
المغيرة بن شُعبة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تسبوا الأموات، فتُؤذوا الأحياء" رواه أحمد (18210) عن عبد الرحمن وهو ابن مهدي بإسناده، وهذا الرّجل المبهم هو"زيد بن أرقم" كما في الحديث الآتي.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মৃতদের গালি দিও না, কারণ (তা করলে) জীবিতদের কষ্ট দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3534)


3534 - عن قطبة بن مالك قال: سَبَّ أمير من الأُمراء عليّا فقام زيد بن أرقم فقال: أما أن قد علمتَ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهي عن سَبِّ الموتى، فلم تشُبُّ عليًا وقد مات.

حسن: رواه الإمام أحمد (19315) عن وكيع، حَدَّثَنَا مِسْعر، عن أبي أيوب مولي لبني ثعلبة، عن قطبة بن مالك فذكره.

وأخرجه الطبرانيّ في"الكبير" (5/ 188) من طريق الإمام أحمد.

وأبو أيوب هو الحجاج مولى بني ثعلبة كما جاء التصريح به في رواية الإمام أحمد (19288) فإنه رواه عن محمد بن بشر، حَدَّثَنَا مِسْعر، عن الحجاج مولى بني ثعلبة، عن قُطبة بن مالك عم زياد بن عِلاقة قال: نال المغيرة بن شعبة من عليّ، فقال زيد بن أرقم فذكر الحديث.

والحجاج أبو أيوب من رجال"التعجيل" (1232) وهو مجهول كما قاله الحسيني.

ولكن رواه الطبرانيّ (5/ 188)، والحاكم (1/ 384 - 385) كلاهما من طريق عمرو بن محمد ابن أبي رَزين، ثنا شعبة، عن زياد بن عِلاقة، عن عمه (يعني قطبة بن مالك) أن المغيرة بن شعبة سَبَّ عليّ بن أبي طالب، فقام إليه زيد بن أرقم فذكر الحديث.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه".

قلت: هذا وهمٌ منه فإن عمرو بن محمد بن أبي رَزين ليس من رجال مسلم، وإنما هو من رجال الترمذيّ فقط كما أشار الحافظ في"التقريب". وذكره ابن حبَّان في"الثّقات" وقال:"ربما أخطأ".

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (8/ 76) وقال:"رواه الطبرانيّ بأسانيد، ورجال أحد أسانيد الطبرانيّ ثقات".




কুতবাহ ইবনে মালিক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমারাদের (শাসকদের) মধ্য থেকে একজন আমীর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গালি দিলেন। তখন যায়দ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন: আপনি কি জানেন না যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মৃতদের গালি দিতে নিষেধ করেছেন? তাহলে আপনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কেন গালি দিচ্ছেন, অথচ তিনি তো মারা গেছেন!









আল-জামি` আল-কামিল (3535)


3535 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا مات صاحبكم فدعوه، ولا تقعوا فيه".

صحيح: رواه أبو داود (4899) عن زهير بن حرب، حَدَّثَنَا وكيع، حَدَّثَنَا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের সঙ্গী মারা যায়, তখন তাকে ছেড়ে দাও এবং তার বিরুদ্ধে নিন্দা করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3536)


3536 - عن أبي قتادة بن رِبْعي أنه كان يُحدث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مُرَّ عليه بجنازة فقال:"مستريح ومستراح منه" قالوا: يا رسول الله! ما المُسْتريح والمُستراح منه؟ قال: العبد المؤمن يستريح من نَصَب الدُّنيا وأذاها إلى رحمة الله، والعبد الفاجر يستريح منه العباد والبلاد، والشجر والدوابّ".
متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (54) عن محمد بن عمرو بن حلحلة الدِيليّ، عن معبد بن كعب بن مالك، عن أبي قتادة بن رِبْعي فذكره.

ورواه البخاريّ في الرقاق (6512) عن إسماعيل، ومسلم في الجنائز (950) عن قُتَيبة بن سعيد، كلاهما عن مالك به مثله.




আবু কাতাদা ইবনে রি’বি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে একটি জানাযা নেওয়া হচ্ছিল। তখন তিনি বললেন: “একজন আরামপ্রাপ্ত (বিশ্রামকারী) এবং অন্যজন যার থেকে মুক্তি লাভ করা হয়েছে।” সাহাবীগণ বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আরামপ্রাপ্ত এবং যার থেকে মুক্তি লাভ করা হয়েছে তারা কারা? তিনি বললেন: মুমিন বান্দা দুনিয়ার কষ্ট ও যন্ত্রণা থেকে আল্লাহর রহমতের দিকে বিশ্রাম লাভ করে। আর পাপিষ্ঠ বান্দার থেকে মানুষ, জনপদ, গাছপালা এবং চতুষ্পদ জন্তুরা মুক্তি লাভ করে।









আল-জামি` আল-কামিল (3537)


3537 - عن عائشة قالت: تُوفيت امرأة كان أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يضحكون منها، ويمازحونها، فقلت: استراحتْ، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إنما يستريح من غفر له".

حسن: رواه البزّار"كشف الأستار" (789) عن أحمد بن إسحاق الأهوازيّ، ثنا عثمان بن عمر، ثنا يونس - يعني ابن يزيد، عن الزّهريّ، عن محمد بن عروة بن الزُّبير، عن أبيه، عن عائشة قالت: فذكرته.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عروة بن الزُّبير فإنه"صدوق".

ورواه الطبرانيّ في"الأوسط" (9375) عن هيثم بن خالد، قال: حَدَّثَنَا عبد الكبير بن المعافي بن عمران قال: حَدَّثَنَا ابن لهيعة، عن أبي الأسود، عن عروة بن الزُّبير، عن عائشة قالت: قام بلال إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال: ماتتْ فلانةٌ، واستراحتْ، فغضب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقال:"إنما استراح من غفر له".

قال الطبرانيّ:"لم يرو هذا الحديث عن أبي الأسود إِلَّا ابن لهيعة، ولا عن ابن لهيعة إِلَّا المعافيّ، تفرّد به عبد الكبير".

قلت: وفي الإسناد"ابن لهيعة" وهو مختلط وفيه كلام كثير.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক মহিলার মৃত্যু হলো, যাকে দেখে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ হাসতেন এবং তার সাথে ঠাট্টা-মজা করতেন। তখন আমি (আয়িশা) বললাম: সে তো আরাম পেল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আরাম কেবল সেই ব্যক্তিই পায়, যাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3538)


3538 - عن عامر بن ربيعة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا رأيتُم الجنازة فقوموا لها، حتّى تُخَلِّفكم، أو توضع".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1307)، ومسلم في الجنائز (958) كلاهما من طريق سفيان، عن الزّهريّ، عن سالم، عن أبيه، عن عامر بن ربيعة فذكر الحديث ولفظهما سواء.

ورواه البخاريّ (1308)، ومسلم كلاهما عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا اللّيث بن سعد، عن نافع، عن ابن عمر، عن عامر بن ربيعة ولفظه:"إذا رأى أحدكم جنازةٌ فإن لم يكن ماشيًا معها فليقُم حتّى يُخلِّفها، أو تُخلِّفه، أو توضع من قبل أن تُخلِّفَه".




আমের ইবনে রাবী'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমরা যখন কোনো জানাজা দেখবে, তখন তার জন্য দাঁড়িয়ে যাবে, যতক্ষণ না তা তোমাদের অতিক্রম করে যায় অথবা (মাটিতে) রাখা হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3539)


3539 - عن أبي سعيد الخدريّ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا رأيتم الجنازة فقوموا، فمن تَبِعها فلا يجلس حتّى توضع".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1310)، ومسلم في الجنائز (959/ 77) كلاهما من حديث هشام (هو ابن حسان) قال: حَدَّثَنَا يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن
أبي سعيد فذكره.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা জানাজা দেখবে, তখন তোমরা দাঁড়িয়ে যাবে। আর যে ব্যক্তি এর অনুসরণ করবে (জানাজার সাথে যাবে), সে যেন না বসে, যতক্ষণ না তা (মাটিতে) রাখা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3540)


3540 - عن أبي سعيد المقبري قال: كنا في جنازة فأخذ أبو هريرة بيد مروان فجلسا قبل أن تُوضع، فجاء أبو سعيد (الخدريّ) فأخذ بيدي مروان فقال: قُم، فوالله! لقد علم هذا أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نهانا عن ذلك فقال أبو هريرة: صدق.

صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1309) عن أحمد بن يونس، حَدَّثَنَا ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبريّ، عن أبيه أبي سعيد فذكره.




আবূ সাঈদ আল-মাকবুরী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা একটি জানাযায় ছিলাম। তখন আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারওয়ানের হাত ধরলেন এবং (জানাযার খাট) নীচে রাখার আগেই তারা দুজন বসে পড়লেন। তখন আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন এবং মারওয়ানের হাত ধরে বললেন: উঠো, আল্লাহর কসম! সে (আবূ হুরায়রা) অবশ্যই জানে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের এ কাজ (বসার) থেকে নিষেধ করেছেন। তখন আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে সত্য বলেছে।