হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3568)


3568 - عن أم عطية قالت: نُهينا عن اتباع الجنائز، ولم يُعزم علينا.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1278)، ومسلم في الجنائز (938) كلاهما من طريق حفصة بنت سيرين أم الهُذيل، عن أم عطية ولفظهما سواء.

وفي غير الصحيحين:"نهانا رسول الله -صلي الله عليه وسلم-".

وقوله:"ولم يُعزم علينا" أي لم يؤكد علينا في المنع كما أكدَّ علينا في غيره من المنهيات، ففيه إشارة إلى كراهة اتباع الجنائز من غير تحريم.

وقد روي في أحاديث غير ثابتة:"ليس لهن في ذلك اجر".

رواه الطبراني في الدعاء (2161) وابن حبان في"الثقات" (6/ 493) من حديث عائشة. وفي معناه أحاديث أخرى، وكلها ضعيفة.




উম্মে আতিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের জানাজার অনুসরণ (জানাযার সাথে যাওয়া) থেকে নিষেধ করা হয়েছিল, কিন্তু তা আমাদের উপর কঠোরভাবে অপরিহার্য করা হয়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (3569)


3569 - عن أبي حازم قال: شهدتُ حسينًا رضي الله عنه حين مات الحسن رضي الله عنه وهو يرفع في قفا سعيد بن العاص، وهو يقول: تقدم، فلولا أنها السنة ما قدمتك، وسعيد أمير على المدينة يومئذ.

حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (2/ 148) من طريق عبد الرزاق وهو في"مصنفه" (6369)، والبزار (1345) من طريق وكيع، كلاهما عن سفيان الثوري، عن سالم بن أبي حفصة، عن أبي حازم قال: فذكره.

وصحَّحه الحاكم (3/ 171) ورواه من طريق عبيد الله بن موسى، عن سفيان بإسناده وزاد فيه قول أبي هريرة: أَتُنَفِّسُون على ابن نبيكم صلى الله عليه وسلم بتربة تدفنونه فيها، وقد سمعت رسول الله -صلي الله عليه وسلم- يقول:"من أحبهما فقد أحبني ومن أبغضهما فقد أبغضني"، وقال:"صحيح الإسناد".

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في سالم بن أبي حفصة العجلي الكوفي فقال فيه النسائي: ليس بثقة، وقال ابن سعد: كان يتشيع تشيعًا شديدًا، وبالغ فيه ابن حبان فقال:"كان يقلب الأخبار، ويهم في الروايات""المجروحين" (1/ 343).

لكن مشاه الآخرون منهم الإمام أحمد فقال: سالم بن أبي حفصة كان شيعيًا، ما أظن به بأسًا في الحديث، وهو قليل الحديث، وعن يحيي بن معين روايات، منها: أنه ثقة، ومنها: ليس به بأس كان مغليًا في الشيعة، ومنها: شيعي، وقال ابن عدي: له أحاديث وعامة ما يرويه في فضائل أهل البيت، وهو من الغالين في منشيعي أهل الكوفة، وإنما عيب عليه الغلو فيه، وأما أحاديثه فأرجو أنه لا بأس به، وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 31):"رواه الطبراني في الكبير والبزار، ورجاله موثقون".

والخلاصة أنه صدوق في نفسه، وكذا قال الحافظ أيضًا في"التقريب" وزاد: ."إلا أنه شيعي غال" فأقل أحواله أنه حسن الحديث إذا لم يأت في حديثه من فضائل أهل البيت ما لا يتابع عليه، ثم إني وجدت له متابعًا عند البيهقي (4/ 29) فإنه رواه من طريق سفيان عن أبي الجحَّاف، عن إسماعيل بن رجاء الزبيدي، قال: أخبرني من شهد الحسين بن علي حين مات الحسن .. فذكره، وإسماعيل بن رجاء"ثقة" كما قال الحافظ، إلا أنه لم يسم من أخبره، فلعله نسي اسمه فأيهمه، وسمَّاه سالم بن أبي حفصة.

وأبو الجحَّاف هو داود بن عوف التميمي"صدوق شيعي ربما أخطأ".
ويستفاد من الحديث أنه اجتمع الولي والوالي فيقدم الوالي أو من ينوب عنه لأداء صلاة الجنازة، وبه يقول جمهور أهل العلم منهم مالك وأبو حنيفة وأحمد وإسحاق، وهو قول الشافعي في القديم، يقول ابن المنذر:"وهو قول أكثر أهل العلم قال: وبه أقول" انظر:"المجموع" للنووي (5/




আবূ হাযিম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রত্যক্ষ করেছিলাম, যখন হাসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করেন। তখন তিনি (হুসাইন) সাঈদ ইবনু আস-এর ঘাড়ে হাত রাখছিলেন এবং বলছিলেন: আপনি সামনে অগ্রসর হোন। যদি এটি (আমীরের ইমামতি করার) সুন্নাহ না হতো, তবে আমি আপনাকে আমার সামনে রাখতাম না। আর সেদিন সাঈদ ছিলেন মদীনার আমীর (শাসক)।









আল-জামি` আল-কামিল (3570)


3570 - عن عطاء بن دينار الهذلي أن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- قال:"ثلاثة لا تقبل منهم صلاة، ولا تصعد إلى السماء، ولا تجاوز رؤوسهم: رجل أم قوما وهم له كارهون، ورجل صلى على جنازة ولم يؤمر، وامرأة دعاها زوجها من الليل، فأبت عليه". وهذا مرسل، وعن أنس يرفعه مثله.

حسن: من حديث أنس: رواه ابن خزيمة (1518) عن عيسي بن إبراهيم، حدثنا ابن وهب، عن ابن لهيعة وسعيد بن أبي أيوب، عن عطاء بن دينار الهذلي، فذكره.

ثم رواه (1519) عن عيسي بن إبراهيم، حدثنا ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عمرو بن الوليد، عن أنس بن مالك يرفعه مثل هذا، (أي: مثل رواية الهذلي).

ثم قال ابن خزيمة:"أمليت الجزء الأول، وهو مرسل؛ لأن حديث أنس الذي بعده حدثناه عيسى في عقبه يعني بمثله، لولا هذا لما كنت أخرجت الخبر المرسل في هذا الكتاب".

قلت: حديث أنس الموصول إسناده حسن؛ فإن عمرو بن الوليد ذكره ابن حبان في الثقات، والفسوي في ثقات أهل مصر، فمثله يحسن حديثه، ولذا قال الحافظ في التقريب:"صدوق".

وقوله:"ولم يؤمر" أي: من ولي الأمر، أو من أولياء الميت إذا لم يكن للناس إمام راتب.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন শ্রেণির লোকের সালাত (নামাজ) কবুল করা হয় না, তা আসমানে আরোহণ করে না এবং তাদের মাথা অতিক্রম করে না: এক ব্যক্তি, যে কোনো সম্প্রদায়ের ইমামতি করে অথচ তারা তাকে অপছন্দ করে; আর এক ব্যক্তি, যে জানাযার সালাত আদায় করে অথচ তাকে (সেটির জন্য) আদেশ করা হয়নি; এবং যে স্ত্রীকে তার স্বামী রাতে ডাকে, কিন্তু সে তাকে প্রত্যাখ্যান করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3571)


3571 - عن سمرة بن جندب قال: صليت وراء النبي -صلي الله عليه وسلم- على امرأة ماتت في نِفاسِها، فقام عليها وَسَطَها.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1332) عن عمران بن ميسرة، حدّثنا عبد الوارث، حدثنا حسين، عن ابن بُريدة، حدثنا سمرة بن جندب فذكره، ورواه عن مسدد، عن يزيد بن زريع، عن حسين (وهو ابن ذكوان، بأن المرأة ماتت في نفاسها (1331)، ورواه مسلم في الجنائز (964) عن يحيى بن يحيى التميمي، أخبرنا عبد الوارث بن سعيد بإسناده، وسمَّي المرأة بأنها أم كعب، ماتت وهي نُفَسَاء.




সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে এক মহিলার জানাযার সালাত আদায় করলাম, যিনি তার নিফাস অবস্থায় মারা গিয়েছিলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার কোমরের বরাবর (মাঝখানে) দাঁড়িয়েছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3572)


3572 - عن أبي غالب قال: صلَّيتُ مع أنس بن مالك على جنازة رجل، فقام حيال رأسه، ثم جاءوا بجنازة امرأة من قريش فقالوا: يا أبا حمزة! صَلِّ عليها، فقام حيال وسط السرير، فقال له العلاءُ بن زياد: هكذا رأيت رسول الله -صلي الله عليه وسلم- قام على الجنازة مقامك منها، ومن الرجل مقامك منه؟ قال: نعم، فلما فرغ قال: احفظوا.

صحيح: رواه الترمذي (1034)، وابن ماجه (1494) كلاهما من طريق سعيد بن عامر، عن همام، عن أبي غالب فذكره.

ورواه أبو داود (3194) من وجه آخر عن عبد الوارث، عن نافع أبي غالب، قال: كنت في سكة المربد، فمرت جنازة معها ناس كثير، قالوا: جنازة عبد الله بن عمير، فتبعتها، فإذا أنا برجل عليه كساء رقيق علي بُريذينتِه، وعلى رأسه خرقةٌ تَقِيه من الشمس فقلت: من هذا الدِهقان؟ قالوا: هذا أنس بن مالك، فلما وُضعت الجنازة قام أنس، فصلَّى عليها، وأنا خلفه لا يحول بيني وبينه شيء، فقام عند رأسه، فكبَّر أربع تكبيرات، لم يُطل ولم يُسرع، ثم ذهب يقعد، فقالوا: يا أبا حمزة! المرأة الأنصارية فقربوها، وعليها نعش أخضر، فقام عند عجيزتها، فصلَّى عليها نحو صلاته على الرجل، ثم جلس، فقال العلاء بن زياد: فذكر كما مضى. وفيه زيادةُ غزوتِه مع رسول الله -صلي الله عليه وسلم- حنينًا، وقصة نذر رجل …

ورواه أحمد (12180) عن وكيع قال: حدثني همام، عن غالب -هكذا قال وكيع: غالب- وإنما هو أبو غالب عن أنس فذكر الحديث كما مضى.

قال الترمذي:"حديث أنس هذا حديث حسن، وقد روى غير واحد عن همام مثل هذا، وروي وكيع هذا الحديث عن همام فوهم فيه فقال: عن غالب، عن أنس، والصحيح: عن أبي غالب، وقد روى هذا الحديث عبد الوارث بن سعيد وغير واحد عن أبي غالب مثل رواية همام، واختلفوا في اسم أبي غالب هذا فقال بعضهم: يقال اسمه: نافع، ويقال: رافع.

وقد ذهب بعض أهل العلم إلى هذا، وهو قول أحمد وإسحاق. انتهى.

قلت: أبو غالب هو: الباهلي مولاهم الخياط البصري، قال فيه الحافظ في"التقريب":"ثقة". وقول الحافظ في"الفتح" (3/ 201):"وأشار البخاري إلى تضعيف ما رواه أبو داود والترمذي من طريق أبي غالب، عن أنس بن مالك … لا وجه لتضعيفه".

ولذا تعقبه شيخ الإسلام ابن باز فقال:"إسناده جيد، وهو حجة قائمة على التفرقة بين الرجل والمرأة في الموقف، ودليل على أن السنة الوقوف عند رأس الرجل، ووسط المرأة".




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ গালিব বলেন: আমি আনাস ইবনু মালিকের সাথে এক পুরুষের জানাযার সালাত আদায় করলাম। তিনি (আনাস) তখন তার (পুরুষের) মাথার বরাবর দাঁড়ালেন। অতঃপর তারা কুরাইশের এক মহিলার জানাযা নিয়ে আসলো এবং বলল: হে আবূ হামযাহ! আপনি তার ওপর সালাত আদায় করুন। তখন তিনি খাটের মাঝ বরাবর দাঁড়ালেন। তখন আলা ইবনু যিয়াদ তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জানাযার ওপর এভাবে দাঁড়াতে দেখেছেন—আপনি মহিলার জন্য যে স্থানে দাঁড়ালেন, এবং পুরুষের জন্য যে স্থানে দাঁড়ালেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। যখন তিনি (সালাত) শেষ করলেন, তখন বললেন: তোমরা এটি মুখস্থ করে রাখো।









আল-জামি` আল-কামিল (3573)


3573 - عن نافع، أن ابن عمر صلى على تسع جنائز جميعًا، فجعل الرجال يلُون
الإمام، والنساء يلين القبلة، فصفَّهن صفًا واحدًا، ووُضعتْ جنازةُ أم كلثوم بنت علي امرأة عمر بن الخطاب وابن لها يقال له: زيد وُضِعا جميعًا، والإمامُ يومئذ سعيد بن العاص، وفي الناس ابن عمر وأبو هريرة وأبو سعيد وأبو قتادة، فوضع الغلامُ مما يلي الإمام، فقال رجل: فأنكرتُ ذلك، فنظرتُ إلى ابن عباس وأبي هريرة وأبي سعيد وأبي قتادة، فقلت: ما هذا؟ قالوا: هي السنة.

صحيح: رواه النسائي (1978) عن محمد بن رافع، قال: أنبأنا عبد الرزاق، وهو في المصنف (6337) قال: أنبأنا ابن جريج، قال: سمعت نافعًا يزعم أن ابن عمر صلَّى على تسع جنائز فذكره.

وإسناده صحيح. وكذا قال الحافظ أيضًا في"التلخيص" (2/ 146).

وقوله:"والإمام يومئذ سعيد بن العاص" يعني: الأمير.

وقولهم:"هي السنة" إشارة إلى حكم الرفع.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একই সাথে নয়টি জানাযার সালাত আদায় করলেন। তিনি পুরুষদের ইমামের নিকটবর্তী করে রাখলেন এবং মহিলাদের কিবলার নিকটবর্তী করে রাখলেন। অতঃপর তিনি সেগুলোকে (জানাযাগুলোকে) এক কাতারে সারিবদ্ধ করলেন। (একবার এমনও হয়েছিল যে,) উম্মু কুলসুম বিনত আলী—যিনি ছিলেন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী—এবং তাঁর পুত্র যায়িদ নামে পরিচিত, তাঁদের জানাযা একসাথে রাখা হলো। সেদিন ইমাম ছিলেন সাঈদ ইবনুল আস। উপস্থিতদের মধ্যে ছিলেন ইবনে উমর, আবূ হুরায়রা, আবূ সাঈদ এবং আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তখন বালকটিকে (যায়িদকে) ইমামের নিকটবর্তী করে রাখা হলো। এক ব্যক্তি বলেন: আমি এটা দেখে আপত্তি জানালাম (বা তা অপছন্দ করলাম)। তখন আমি ইবনে আব্বাস, আবূ হুরায়রা, আবূ সাঈদ ও আবূ কাতাদার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দিকে তাকালাম এবং বললাম: এটা কী? তাঁরা বললেন: এটাই হলো সুন্নাহ।









আল-জামি` আল-কামিল (3574)


3574 - عن عمار مولى الحارث بن نوفل، أنه شهد جنازة أم كلثوم وابنها، فجعل الغلام مما يلي الإمام، فأنكرت ذلك، وفي القوم ابن عباس وأبو سعيد الخدري وأبو قتادة وأبو هريرة فقالوا: هذه السنة.

صحيح: رواه أبو داود (3193) عن يزيد بن خالد بن موهب الرملي، حدثنا ابن وهب، عن ابن جريج، عن يحيى بن صبيح قال: حدثني عمار مولى الحارث بن نفيل فذكر الحديث، ورواه النسائي (1977) من وجه آخر عن عمار.

وفي لفظ النسائي:"فقُدِّم الصبي مما يلي القومَ، ووضعتِ المرأةُ وراءَه فصلَّى عليهما" وفيه أيضًا"فسألتهم عن ذلك، فقالوا: السنة".

وإسناده صحيح. وقال البيهقي (4/ 33) بعد أن رواه من طريق أبي داود:"ورواه حماد بن سلمة، عن عمار بن أبي عمار دون كيفية الوضع بنحوه".

وذكر أن الإمام كان ابن عمر، قال:"وكان في القوم الحسن والحسين وأبو هريرة وأبن عمر ونحو من ثمانين من أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم".

ورواه الشعبي فذكر كيفية الوضع بنحوه، وذكر أن الإمام كان ابن عمر، ولم يذكر السؤال قال:"وخلفه ابن الحنفية والحسين وابن عباس، وفي رواية: وعبد الله بن جعفر، وروينا في ذلك عن عثمان بن عفان وعلي بن أبي طالب وواثلة بن الأسقع". انتهى.




আম্মার (মাওলা আল-হারিছ ইবনু নাওফাল) থেকে বর্ণিত, তিনি উম্মু কুলসুম এবং তার পুত্রের জানাযায় উপস্থিত ছিলেন। তখন ছেলেটিকে ইমামের কাছাকাছি রাখা হলো। তিনি তা দেখে আপত্তি জানালেন। তখন উপস্থিত লোকজনের মধ্যে ইবনু আব্বাস, আবূ সাঈদ আল-খুদরী, আবূ ক্বাতাদাহ এবং আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। তারা বললেন: এটাই সুন্নাহ (নবীজীর নিয়ম)।

আর নাসাঈ-এর এক বর্ণনায় আছে: "ছেলেটিকে ক্বওমের (মুসল্লীদের) কাছাকাছি রাখা হলো এবং মহিলাকে তার (ছেলেটির) পেছনে রাখা হলো, অতঃপর তিনি উভয়ের উপর সালাত (জানাযা) আদায় করলেন।" এবং তাতে আরও আছে: "আমি তাদের এ ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলে তারা বললেন: এটাই সুন্নাহ।"









আল-জামি` আল-কামিল (3575)


3575 - عن أنس أن النبي -صلي الله عليه وسلم- نهى أن يُصلي على الجنازة بين القبور.
حسن: رواه الطبراني في الأوسط" -مجمع البحرين (1297) عن محمد بن عبد الله الحضرمي، عن حسين بن يزيد الطحان، عن حفص بن غياث، عن عاصم الأحوال، عن محمد بن سيرين، عن أنس بن مالك فذكره، وعنه رواه الضياء المقدسي في"المختارة" (2594) ورواه البزار"كشف الأستار" (443) من وجه آخر عن حفص بن غياث، عن الأشعث، عن الحسن، عن أنس أن النبي -صلي الله عليه وسلم- نهي عن الصلاة بين القبور.

ففي هذه الرواية النهي عام عن الصلاة بين القبور، وهذا العام يدخل فيه صلاة الجنازة وأيضًا قد جاء هذا القيد في رواية الطبراني"على الجنائز".

قال الطبراني:"لم يروه عن عاصم إلَّا حفص، تفرد به حسين".

قلت: حسين بن يزيد الطحان قال فيه أبو حاتم:"ليِّن الحديث" وتبعه الذهبي في"الكاشف" وابن حَجر في"التقريب".

وقد روى عنه جمع، منهم أبو داود، ومسلم في خارج"الصحيح" وأبو زرعة الرازي وغيرهم.

وأدخله ابن حبان في"الثقات" (8/ 188) فهو لا ينزل عن مرتبة"صدوق"، ولذا حسَّنه الهيثمي في"المجمع" (3/ 36)، وله متابعات عند البزار"كشف الأستار" (441، 442، 443).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবরের মাঝখানে জানাযার সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3576)


3576 - عن عباد بن عبد الله بن الزبير، يحدث عن عائشة: أنها لما تُوفي سعد بن أبي وقَّاص أَرسل أزواجُ النبي -صلي الله عليه وسلم- أن يمُروا بجنازته في المسجد، فيُصلين عليه. ففعلوا. فوُقِفَ به على حُجَرِهنَّ يُصَلِّين عليه. وأُخْرج به من باب الجنائز الذي كان إلى المقاعِد. فبلَغَهُنَّ أنَّ النَّاسَ عابوا ذلك.

وقالوا: ما كانت الجنائزُ يُدْخَلُ بها المسجدَ. فبلغ ذلك عائشةَ فقالتْ: ما أسرعَ الناسَ إلى أن يَعيُبوا ما لا علم لهم به! عابوا علينا أن يمر بجنازة في المسجد! وما صلي رسول الله -صلي الله عليه وسلم- على سُهيل ابن بيضاء إلا في جوف المسجد.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (973) من طرق، عن عبد الواحد بن حمزة، عن عباد بن عبد الله ابن الزبير به مثله. وهذه رواية موسى بن عقبة عن عبد الواحد، ورواه غيره عن عبد الواحد مختصرًا.

ورواه الضحاك بن عثمان، عن أبي النضْر، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أن عائشة: لما تُوفي سعد بن أبي وقاص قالت: ادخلوا به المسجد حتى أصلِّي عليه، فأنكر ذلك عليها. فقالت: والله! لقد صلى رسول الله -صلي الله عليه وسلم- على ابني بيضاء في المسجد: سُهيل وأخيه.

قال مسلم: سُهيل بن دَعْد وهو ابن البيضاء، أمه بيضاء.

قال النووي:"بنو بيضاء ثلاثة إخوة سهل وسُهيل وصفوان، وأمهم بيضاء، اسمها دَعْد،
والبيضاء وصف، وأبوهم وهب بن ربيعة القرشي الفهري، وكان سُهيل قديم الإسلام، هاجر إلى الحبشة، ثم عاد إلى مكة، وهاجر إلى المدينة، وشهد بدرًا وغيرها، توفِّي سنة تسع من الهجرة".

والحديث يدل على جواز الصلاة في المسجد، وبه قال الشافعي وأحمد وبعض أصحاب مالك، ومن الصحابة أبو بكر وعمر وعائشة وأزواج النبي -صلي الله عليه وسلم- وقد صُلِّي على أبي بكر وعمر في المسجد، ولم يُنْكر عليه، فصار كالإجماع.

وكذلك يدل على جواز حضور النساء لصلاة الجنازة إنْ كانتْ تصلي في المسجد، فإنه لم ينكر أحد من الصحابة على فعل أزواج النبي -صلي الله عليه وسلم- فصار كالإجماع.

وأما ما رُويَ عن أبي هريرة مرفوعًا:"من صلَّى على جنازة في المسجد فلا شيء له"، وفي رواية"فلا شيء عليه" فهو ضعيف لأنه من رواية صالح مولى التوأمة، عن أبي هريرة، رواه أبو داود (3191) وابن ماجه (1517) وغيرهما من طريق ابن أبي ذئب، قال: حدثني صالح مولي التوأمة فذكر الحديث.

وصالح مولى التوأمة نغير واختلط في آخره، ولعل اختلاف تفظ الحديث يعود إليه، وفيه دليل واضح على اختلاطه، وإن كان ابن أبي ذئب قد سمع منه قبل الاختلاط، على قول أكثر أهل العلم إلا أن البخاري قال:"سماعه منه أخيرًا، روى عنه مناكير"، ولذا ذهب جمهور أهل العلم إلى تضعيف هذا الحديث منهم الإمام أحمد وابن المنذر وابن عدي والخطابي حتى قال ابن حبان في"الضعفاء" (1/ 366):"وهذا خبر باطل، كيف يخبر المصطفى صلى الله عليه وسلم أن المصلي في الجنازة لا شيء له من الأجر، ثم يصلي هو صلى الله عليه وسلم على سهيل ابن البيضاء في المسجد".

وبعد ضعف حديث أبي هريرة هذا لا يحتاج إلى الجمع بينه وبين حديث عائشة الصحيح، كما فعل العلامة أبو الحسن السندي، لأنه يصار إلى الجمع إذا صحَّ الحديثان -وفي الظاهر- أنهما متعارضان كما هو معروف في علم مصطلح الحديث باسم"مختلف الحديث"، وأما إذا صحَّ أحدهما، وضَعُف الثاني فيصار إلى تقديم الصحيح على الضعيف كما قال به جمهور أهل العلم في هذا الحديث.

وسلك الطحاوي مسلكًا آخر فجعل حديث عائشة منسوخًا، وأجاب عنه البيهقي في"المعرفة" (5/ 320):"ولو كان عند أبي هريرة نسخ ما روته عائشة لذكره يوم صُلّي على أبي بكر في المسجد، أو يوم صُلّي على عمر بن الخطاب في المسجد، ولذكره من أنكر على عائشة أمرها بإدخاله المسجد، أو ذكره أبو هريرة حين روتُ فيه الخبر، وإنَّما أنكره من لم يكن له معرفة بالجواز، فلمَّا روتْ فيه الخبر سكتوا ولم ينكروه، ولا عارضوه بغيره".

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (3/ 72 - 74).




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন সা'দ ইবনে আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইন্তেকাল হলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ (উম্মাহাতুল মু'মিনীন) লোক পাঠালেন যেন তাঁর জানাযা মসজিদের মধ্যে দিয়ে নিয়ে যাওয়া হয়, যাতে তাঁরা তাঁর উপর জানাযার সালাত আদায় করতে পারেন। তারা তাই করলো। তখন (জানাযা) তাঁদের হুজরার সামনে দাঁড় করানো হলো এবং তাঁরা তাঁর জানাযার সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তাঁকে জানাযার দরজা দিয়ে বের করে আনা হলো, যা বসার স্থানগুলোর দিকে ছিল। তখন তাঁদের কাছে খবর পৌঁছল যে, লোকেরা এই কাজের নিন্দা করছে। তারা বলল: জানাযা তো মসজিদে প্রবেশ করানো হতো না। এই খবর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন: মানুষেরা না জেনে কোনো কিছুর নিন্দা করতে কতই না দ্রুত! তারা আমাদের নিন্দা করলো যে, মসজিদের মধ্যে দিয়ে জানাযা নেওয়া হলো! অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুহাইল ইবনুল বাইদার জানাযার সালাত মসজিদের অভ্যন্তরেই আদায় করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3577)


3577 - عن ابن عمر أنّ اليهود جاءوا إلى النبي -صلي الله عليه وسلم- برجل منهم وامرأة زنيا، فأمر بهما فَرُجِما قريبًا من موضع الجنائز عند المسجد.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1329) عن إبراهيم بن المنذر، قال: حدثنا أبو ضمرة، حدثنا موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وقوله:"موضع الجنائز عند المسجد" قال الحافظ في"الفتح" (3/ 199):"حكى ابن بطال عن ابن حبيب: أن مصلي الجنائز كان لاصقًا بمسجد النبي -صلي الله عليه وسلم- من ناحية جهة الشرق"، وقال في موضع آخر (12/ 129):"والمصلى المكان الذي كان يُصلي عنده العيد والجنائز، وهو من ناحية بقيع الغرقد".




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে ইহুদিরা তাদের মধ্যকার এক পুরুষ ও এক নারীকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসেছিল, যারা ব্যভিচার করেছিল। অতঃপর তিনি তাদের দুজনকে রজম (পাথর নিক্ষেপ) করার নির্দেশ দিলেন। মসজিদের পাশে জানাযার স্থানের নিকটে তাদের রজম করা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (3578)


3578 - عن أبي هريرة أن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- نعى النجاشي في اليوم الذي مات فيه، فخرج إلى المصلي، فصفَّ بهم وكبَّر أربعًا.

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (14) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البخاري في الجنائز (1245)، ومسلم في الجنائز (951) كلاهما من طريق به مثله.

وبوب البخاري بقوله:"الصلاة على الجنائز بالمصلى والمسجد" وذكر فيه حديث أبي هريرة -الجنائز (1327، 1328) - وحديث عبد الله بن عمر.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজাশীর মৃত্যুর দিনেই তাঁর মৃত্যুর খবর ঘোষণা করেছিলেন। অতঃপর তিনি (সাহাবীদেরকে নিয়ে) সালাতের স্থানের (ঈদগাহের) দিকে বের হলেন, সেখানে তাদের নিয়ে কাতারবদ্ধ হলেন এবং চার তাকবীর দিয়ে (জানাযার সালাত) আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3579)


3579 - عن جابر قال: مات رجل، فغَسَّلناه، وكفَّناه، وحَنَّطْناه، ووَضَعْناه لرسول الله -صلي الله عليه وسلم- حيث توضع الجنائز عند مقام جبريل، ثم آذنا رسول الله -صلي الله عليه وسلم- بالصلاة عليه … فذكر الحديث.

حسن: رواه الإمام أحمد (14536)، والحاكم (2/ 58) كلاهما من حديث عبد الله بن محمد ابن عقيل، عن جابر فذكر الحديث بطوله وسيأتي في باب"لا يصلي الإمام على من عليه دين حتي يقضي عنه" كاملًا.

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل.

وحسَّنه أيضًا الهيثمي في"المجمع" (3/ 39).




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি মারা গেল। তখন আমরা তাকে গোসল করালাম, কাফন দিলাম এবং সুগন্ধি মাখালাম। আর তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য রাখলাম, যেখানে জানাযা রাখা হয়—জিবরীল (আঃ)-এর মাকামের কাছে। অতঃপর আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার উপর সালাত (জানাযা) আদায় করার জন্য খবর দিলাম... এরপর তিনি পূর্ণ হাদীসটি বর্ণনা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3580)


3580 - عن جابر بن عبد الله قال: قال النبي -صلي الله عليه وسلم-:"قد توفي اليومَ رجل صالح من الحبش، فَهَلُمَّ فصلوا عليه" قال: فصففنا، فصلى النبي -صلي الله عليه وسلم- ونحن صفوف.
قال أبو الزبير، عن جابر: كنت في الصف الثاني.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1320)، ومسلم في الجنائز (951) كلاهما من حديث ابن جريج، قال: أخبرني عطاء، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكر الحديث، واللفظ للبخاري. ولفظ مسلم مختصر.

وقول أبي الزبير، عن جابر … وصله مسلم من وجه آخر عن أيوب، عن أبي الزبير.

وأخرجه البخاري (1317) من وجه آخر عن قتادة، عن عطاء، عن جابر قال: إن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- صلّى على النجاشي، فكنت في الصف الثاني أو الثالث.

وفي الباب حديثان معللان:

أحدهما: ما رواه مالك بن هبيرة قال: قال رسول الله -صلي الله عليه وسلم-:"ما من مسلم يموت فيصلي عليه ثلاثة صفوف من المسلمين إلا أوجب".

فكان مالك إذا استقل أهل الجنازة جزأهم ثلاثة صفوف.

أخرجه أبو داود (3166)، والترمذي (1028)، وابن ماجه (1490) كلهم من طرق عن محمد ابن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد اليزني، عن مالك بن هبيرة فذكر الحديث، ولفظهم قريب إلا أن الترمذي وابن ماجه لم يذكرا تجزئة، مالك بن هبيرة ثلاثة صفوف.

وأخرجه الحاكم (1/ 362، 363) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

وقال الترمذي: حسن، وأقرّه الحافظ ابن حجر في"الفتح" (3/ 145).

قلت: محمد بن إسحاق مدلس، وقد عنعن، فلا يرتقي الحديث إلى درجة الحسن حتي بصرح بالسماع، ولو ثبت سماعه في طريق آخر فلا يُقبل تفرده؛ لأنه في الأحكام وليس له أصل ثابت.

والأصل في الصلاة أن يتم الصف الأول فالأول إنْ كان في المسجد، وإذا كانت الصلاة خارج المسجد فلا بأس بتجزئة الصفوف لفعل مالك بن هبيرة، والمراد"بالثلاثة" الوتر في الصفوف.

وثانيهما: ما رواه الطبراني كما في"المجمع" (3/ 432) عن أبي أمامة قال: صلى رسول الله -صلي الله عليه وسلم- على جنازة، ومعه سبعة نفر فجعل ثلاثة صفًا، واثنين صفًا، واثنين صفًا، فيه ابن لهيعة وفيه كلام معروف.

وقد سُئل سماحة الشّيخ ابن باز رحمه الله عن حكم تكثير الصّفوف ولو لم تتم؟ فأجاب:"الأصل أن يصفُّوا في صلاة الجنازة كما يصفُّون في الصّلاة المكتوبة، فيكمِّلون الصَّف الأوّل فالأوّل، وأمّا عمل مالك بن هبيرة رضي الله عنه ففي سنده ضعف، وهو مخالف للأحاديث الصّحيحة الدّالة على وجوب إكمال الصّف الأول فالأوّل في الصّلاة"."مجموع فتاواه" (13/ 139).

وكلام الشيخ يُحمل إنْ كانت الصلاة في المسجد.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আজ হাবশার (আবিসিনিয়ার) একজন নেককার ব্যক্তি ইন্তেকাল করেছেন। সুতরাং এসো এবং তার জানাযার সালাত আদায় করো।" তিনি (জাবির) বলেন: এরপর আমরা কাতারবদ্ধ হলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাতারবদ্ধ থাকা অবস্থায় সালাত (জানাযা) আদায় করলেন।
আবুয যুবাইর জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন: আমি দ্বিতীয় কাতারে ছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3581)


3581 - عن ابن عباس أن رسول الله -صلي الله عليه وسلم- مرَّ بقبر قد دُفن ليلًا فقال:"متى دُفن هذا؟" قالوا: البارحة، قال:"أفلا آذنتموني؟" قالوا: دفنَّاه في ظلمة الليل، فكرهنا أن نُوقِضك، فقام فصففنا خلْفه.

قال ابن عباس: وأنا فيهم فصلى عليه.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1321) عن موسى بن إسماعيل، ثنا عبد الواحد، ثنا الشيباني، عن عامر، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যা রাতে দাফন করা হয়েছিল। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এটা কখন দাফন করা হলো?" তারা বলল: গত রাতে। তিনি বললেন: "তোমরা কি আমাকে খবর দাওনি?" তারা বলল: আমরা তাকে রাতের অন্ধকারে দাফন করেছিলাম এবং আপনাকে জাগানো অপছন্দ করেছিলাম। অতঃপর তিনি দাঁড়ালেন এবং আমরা তাঁর পেছনে কাতার বাঁধলাম। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাদের মধ্যে ছিলাম। অতঃপর তিনি তার জানাযার সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3582)


3582 - عن عبد الله بن أبي طلحة أن أبا طلحة دعا رسول الله -صلي الله عليه وسلم- إلى عمير بن أبي طلحة حين توفي، فأتاهم رسول الله -صلي الله عليه وسلم- فصلى عليه في منزله، فتقدم رسول الله -صلي الله عليه وسلم- وكان أبو طلحة وراءه، وأم سليم وراء أبي طلحة، ولم يكن معهم غيرهم.

حسن: رواه البيهقي (4/ 30) من طريق عمارة بن غزية، عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أبيه، أن أبا طلحة فذكره.

ورواه الطبراني في"الكبير"، وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 34):"رجاله رجال الصحيح".

قلت: وإسناده حسن من أجل الكلام في عمارة بن غزية غير أنه حسن الحديث.




আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তাঁর ছেলে উমায়ের ইবনু আবী তালহা ইন্তিকাল করলেন, তখন আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে (জানাযা পড়ানোর জন্য) ডাকলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে এলেন এবং তাঁর বাড়িতেই তাঁর জানাযার সালাত পড়ালেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সামনে দাঁড়ালেন, আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন তাঁর পিছনে এবং উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন আবূ তালহার পিছনে। তারা ছাড়া সেখানে অন্য কেউ ছিল না।









আল-জামি` আল-কামিল (3583)


3583 - عن أبي عَسيب، أو أبي عَسيم، قال بهز: أنه شهد الصلاة على رسول الله -صلي الله عليه وسلم-، قالوا: كيف نُصلي عليه؟ قال: ادخلوا أَرسالًا أَرسالًا، قال: فكانوا يدخلون من هذا الباب، فيُصلون عليه، ثم يخرجون من الباب الآخر، قال: فلما وُضع في لَحْدِه صلى الله عليه وسلم قال المغيرة: قد بقي من رجليه شيءٌ لم يصلحوه، قالوا: فادخُلْ فأَصْلِحْه، فدخل وأدخل يدَه، فمسَّ قدميه، فقال: أَهيلوا عليَّ التراب، فأهالوا عليه التراب حتى بلغ أنصاف ساقيه، ثم خرج، فكان يقول: أنا أَحدَثُكم عَهْدًا برسول الله -صلي الله عليه وسلم-.

صحيح: رواه أحمد (20766) عن بهز وأبي كامل، قالا: حدثنا حماد بن سلمة، عن أبي عمران -يعني الجَوْني، عن أبي عَسيب أو أبي عسيم فذكره.

وإسناده صحيح، ذكره الحافظ في"التلخيص" (2/ 124) وسكت عليه.

وأبو عسيب مولي رسول الله -صلي الله عليه وسلم- مشهور بكنيته، وقيل اسمه: أحمد، وقيل: هو سفينة مولي
أم سلمة، والراجح أنه غيره- كذا في"الإصابة" (4/ 133).

والحديث المذكور أخرجه الحافظ في"الإصابة" في ترجمة"أبي عَسيم" من البغوي والحاكم أبي أحمد من طريق حماد بن سلمة وقال: هكذا أخرجه أبو مسلم الكجي من طريق حماد، وأخرجه ابن مندة في ترجمة أبي عسيب موقع عنده بالموحدة. انتهى.

قلت: وفاته أن يعزو إلى الإمام أحمد، ثم أبدى البغوي الشك في صحبة أبي عسيب، ولم يذكر له وجهًا لشكهـ، والإمام أحمد جعل له مسندًا، وأخرج الحديث في مسنده، وقال في الحديث الذي بعده وهو حديث الطاعون، أبا عَسيب مولي رسول الله -صلي الله عليه وسلم-.




আবূ উসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জানাযার সালাতে উপস্থিত ছিলেন। লোকেরা জিজ্ঞেস করল: আমরা তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর কীভাবে সালাত আদায় করব? তিনি বললেন: তোমরা দল দলে প্রবেশ করো। তিনি বলেন: সুতরাং তারা এই দরজা দিয়ে প্রবেশ করত এবং তাঁর উপর সালাত আদায় করত, এরপর তারা অন্য দরজা দিয়ে বের হয়ে যেত। তিনি বলেন: যখন তাঁকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কবরে (লাহাদ) রাখা হলো, তখন মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাঁর দু'পায়ের কিছু অংশ বাকি রয়ে গেছে যা ঠিক করা হয়নি। উপস্থিত লোকেরা বলল: তবে তুমি প্রবেশ করো এবং তা ঠিক করে দাও। সুতরাং তিনি প্রবেশ করলেন এবং তাঁর হাত প্রবেশ করালেন এবং তাঁর দু'পা স্পর্শ করলেন। এরপর তিনি বললেন: তোমরা আমার উপর মাটি ঢেলে দাও। সুতরাং তারা তাঁর উপর মাটি ঢেলে দিল, যতক্ষণ না মাটি তাঁর হাঁটুর মাঝামাঝি পর্যন্ত পৌঁছাল। এরপর তিনি বের হয়ে আসলেন। তিনি (মুগীরাহ) বলতেন: আমিই তোমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সবচেয়ে শেষের সাক্ষাতকারী।









আল-জামি` আল-কামিল (3584)


3584 - عن سالم بن عبيد وكان من أصحاب الصفة، قال: دخل أبو بكر على رسول الله -صلي الله عليه وسلم- حين مات، ثم خرج، فقيل له: توفي رسول الله -صلي الله عليه وسلم-؟ فقال: نعم، فعلموا أنه كما قال، وقيل: ويصلي عليه، وكيف يصلى عليه؟ قال: يجيئون عصبًا عصبًا فيصلون، فعلموا أنه كما قال، فقالوا: هل يُدفن؟ وأين؟ فقال: حيث قبض الله روحه، فإنه لم يقبض الله روحه إلا في مكان طيب، فعلموا أنه كما قال.

صحيح: رواه البيهقي (4/ 30) من طريق يونس بن بكير، عن سلمة بن نُبيط، عن أبيه نُبيط بن شريط الأشجعي، عن سالم بن عبيد فذكره.

وأخرجه الترمذي في"الشمائل" (379)، وابن ماجه (1234)، والطبراني في"الكبير" (7/ 64) كلهم من طرق، عن سلمة بن كهيل، في قصة طويلة ستأتي في موضعها، ومضى بعضها في كتاب الصلاة.

وإسناده صحيح كما قال البوصيري في زوائد ابن ماجه.

قال ابن عباس: لما صُلِّي على رسول الله -صلي الله عليه وسلم- أُدخل الرجال فصلوا عليه بغير إمام أرسالًا حتى فرغوا، ثم أُدخل النساء فصلين عليه، ثم أدخل الصيان فصلوا عليه، ثم أُدخل العبيد فصلوا عليه أرسالًا، لم يؤمهم على رسول الله -صلي الله عليه وسلم- أحد.

قال الشافعي: وذلك لعظم أمر رسول الله -صلي الله عليه وسلم- بأبي هو وأمي، وتنافسهم في أن لا يتولى الإمامة في الصلاة عليه واحد، وصلوا عليه مرة بعد مرة، ذكره البيهقي.

قلت: حديث ابن عباس رواه ابن ماجه (1628) عن نصر بن علي الجهضمي، قال: أنبأنا وهب بن جرير، قال: حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني حسين بن عبد الله، عن عكرمة، عن ابن عباس في سياق طويل وهذا نصه: لما أرادوا أن يحفروا لرسول الله -صلي الله عليه وسلم- بعثوا إلى أبي عبيدة بن الجراح، وكان يضرح كضريح أهل مكة، وبعثوا إلى أبي طلحة، وكان هو الذي يحفر لأهل المدينة، وكان يُلحد، فبعثوا إليهما رسولَين، فقالوا: اللهم! خِرْ لرسولك، فوجدوا أبا طلحة فجيء به، ولم يوجد أبو عبيدة، فلحد لرسول الله -صلي الله عليه وسلم-.
قال: فلما فرغوا من جهازه يوم الثلاثاء، وُضِع على سريره في بيته، ثم دخل الناس على رسول الله -صلي الله عليه وسلم- أَرسالًا، يُصلون عليه، حتى إذا فرغوا أَدخلوا النساء، حتى إذا فرغوا أَدخلوا الصبيان، ولم يَؤُمَّ الناس على رسول الله -صلي الله عليه وسلم- أحدٌ.

لقد اختلف المسلمون في المكان الذي يُحفر له، فقال قائلون: يُدْفَنُ في مسجده، وقال قائلون: يُدفَنُ مع أصحابه، فقال أبو بكر: إني سمعتُ رسول الله -صلي الله عليه وسلم- يقول:"ما قُبضَ نبيٌّ إلا دُفِنَ حيث يُقْبَضُ" قال، فرفعوا فراش رسول الله -صلي الله عليه وسلم- الذي توفي عليه، فحفروا له، ثُمَّ دُفِنَ صلى الله عليه وسلم وسط الليل من ليلة الأربعاء، ونزل في حُفْرَتِه علي بن أبي طالب، والفضل بن العباس، وقُثَم أخُوه، وشُقْران مولى رسول الله -صلي الله عليه وسلم-، وقال أوس بن خَوْلي، وهو أبو ليلى لعلي بن أبي طالب: أنْشُدُكَ الله وحظَّنا من رسول الله -صلي الله عليه وسلم-، قال له علي: انْزِلْ، وكان شُقْرانُ مولاه، أخذ قطيفةً كان رسول الله -صلي الله عليه وسلم- يلبسُها، فدَفَنها في القبُر وقال: والله! لا يلبَسُها أحدٌ بعدَكَ أبدًا، فدُفِنَتْ مع رسول الله -صلي الله عليه وسلم-.

هذا الحديث رُوي من أوجه كثيرة كما سيأتي تخريجها كاملا في سيرة النبي -صلي الله عليه وسلم- العطرة.

وخلاصته أنه حسن، وعمل به الصحابةُ رضوان الله عليهم، ولم يخالفْه أحدٌ فصار كالإجماع.

وأما صلاة الناس على النبي -صلي الله عليه وسلم- أفرادًا فمجتمع عليه عند أهل السير، وأهل النقل فإنهم لا يختلفون فيه كما قال الحافظ ابن عبد البر. انظر"التمهيد" (24/ 394 - 402).

وقد قيل: بلغ المصلون على النبي -صلي الله عليه وسلم- ثلاثين ألفًا.

وأما ما رُوي عن ابن مسعود في وصية النبي -صلي الله عليه وسلم- أن يغسله رجال أهل بيته، وأنه قال: كفِّنوني في ثيابي هذا، أو في يمانية، أو بياض مصر، وأنه إذا كفَّنوه يضعونه على شفر قبره، ثم يخرجون عنه حتى تُصلي عليه الملائكة، ثم يدخل عليه رجال أهل بيته فيصلون عليه، ثم الناس بعدهم فرادي، الحديث بتمامه سيأتي في موضعه.

رواه البيهقي والبزار من حديث مرة، عن ابن مسعود، قال الحافظ ابن كثير في"تاريخه" (5/ 265):"في صحته نظر".

فقه هذا الباب:

استدل أهل العلم بصلاة الصحابة على النبي -صلي الله عليه وسلم- أرسالًا وفرادى بأنه يسقط الفرض لو صلوا على جنازة فرادي لإجماع الصحابة على ذلك، ولكن السنة أن تُصلى بالجماعة لمواظبة النبي -صلي الله عليه وسلم- طيلة حياته، والصحابة بعده والمسلمون.




সালেম ইবনু উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি আসহাবে সুফফার অন্তর্ভুক্ত ছিলেন, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইন্তিকাল করলেন, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন, তারপর বের হলেন। তখন তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি ইন্তিকাল করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। তখন লোকেরা জানতে পারল যে তিনি যা বলেছেন তাই সত্য।

জিজ্ঞেস করা হলো: আর তাঁর জানাযার সালাত কিভাবে হবে? তিনি বললেন: তারা দলবদ্ধভাবে আসবে এবং সালাত আদায় করবে। তখন লোকেরা জানতে পারল যে তিনি যা বলেছেন তাই সত্য।

অতঃপর তারা বলল: তাঁকে কি দাফন করা হবে? আর কোথায়? তিনি বললেন: যেখানে আল্লাহ তাঁর রূহ কবজ করেছেন। কারণ আল্লাহ তাআলা তাঁর রূহ কোনো পুণ্যময় স্থান ছাড়া কবজ করেননি। তখন লোকেরা জানতে পারল যে তিনি যা বলেছেন তাই সত্য।

[ইমাম বায়হাকী, তিরমিযী এবং ইবনু মাজাহ এই হাদীসটি বিভিন্ন সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ।]

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জানাযার সালাত আদায় করা হলো, তখন পুরুষদের প্রবেশ করানো হলো। তারা কোনো ইমাম ছাড়া একের পর এক দলে বিভক্ত হয়ে সালাত আদায় করলেন, যতক্ষণ না তারা সমাপ্ত করলেন। এরপর মহিলাদের প্রবেশ করানো হলো এবং তারা সালাত আদায় করলেন। এরপর শিশুদের প্রবেশ করানো হলো এবং তারা সালাত আদায় করলেন। এরপর দাসদের প্রবেশ করানো হলো এবং তারা একের পর এক সালাত আদায় করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জানাযায় কেউ ইমামতি করেননি।

ইমাম শাফিঈ (রহ.) বলেছেন: এই ঘটনাটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মহত্বের কারণে (আমার পিতা-মাতা তাঁর জন্য কুরবান হোক) এবং তাদের মধ্যে এই বিষয়ে প্রতিযোগিতা ছিল যেন তাঁর জানাযার সালাতে কেউ ইমামতির দায়িত্ব না নেয়। আর তারা বারবার তাঁর ওপর সালাত আদায় করলেন। (বায়হাকী এটি উল্লেখ করেছেন)।

ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি দীর্ঘ বর্ণনায় রয়েছে: যখন তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য কবর খনন করতে চাইলেন, তখন তাঁরা আবূ উবায়দাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট লোক পাঠালেন, যিনি মক্কাবাসীর মতো সাধারণ নিয়মে কবর খনন করতেন (যার অর্থ ‘আর্দ্ধ কবর’ বা ধারালো গভীর কবর)। আর আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকটও লোক পাঠালেন, যিনি মদীনাবাসীর জন্য কবর খনন করতেন এবং তিনি ‘লাহদ’ (বোগলী কবর) করতেন। তাঁরা উভয়ের নিকট দু’জন দূত পাঠালেন এবং বললেন: হে আল্লাহ! আপনার রাসূলের জন্য আপনার পছন্দনীয় ব্যবস্থা করুন। তাঁরা আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পেলেন, ফলে তাঁকে আনা হলো। কিন্তু আবূ উবায়দাহকে পাওয়া গেল না। সুতরাং আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লাহদ (বোগলী কবর) খনন করলেন।

যখন তাঁরা মঙ্গলবার তাঁর কাফন-দাফনের প্রস্তুতি সম্পন্ন করলেন, তখন তাঁকে তাঁর ঘরে তাঁর খাটের উপর রাখা হলো। এরপর লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সালাত আদায়ের জন্য একের পর এক প্রবেশ করতে শুরু করল। তারা সালাত আদায় শেষ করলে, মহিলাদের প্রবেশ করানো হলো। তারা সালাত শেষ করলে শিশুদের প্রবেশ করানো হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জানাযার সালাতে কেউ জনগণের ইমামতি করেননি।

মুসলমানগণ তাঁর জন্য কবর খননের স্থান নিয়ে মতভেদ করলেন। কেউ কেউ বললেন: তাঁকে তাঁর মাসজিদে দাফন করা হোক। আবার কেউ বললেন: তাঁকে তাঁর সাহাবীদের সাথে দাফন করা হোক। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যেখানেই কোনো নবীর রূহ কবজ করা হয়েছে, সেখানেই তাঁকে দাফন করা হয়েছে।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তাঁরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিছানা, যার উপর তিনি ইন্তিকাল করেছিলেন, তা সরিয়ে দিলেন এবং সেখানেই তাঁর জন্য কবর খনন করলেন। অতঃপর বুধবার রাতের মধ্যভাগে তাঁকে দাফন করা হলো।

আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), ফাদল ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তাঁর ভাই কুছাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম শুকরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কবরে নেমেছিলেন। আওস ইবনু খাওলী (যিনি আবূ লায়লা নামে পরিচিত) আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আমি আপনাকে আল্লাহর কসম দিচ্ছি এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে আমাদের প্রাপ্য অংশটুকুও চাইছি। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: নেমে এসো।

আর তাঁর গোলাম শুকরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি মখমলের চাদর, যা তিনি পরিধান করতেন, তা নিয়ে কবরে রেখে দিলেন এবং বললেন: আল্লাহর কসম! আপনার পরে আর কেউ এটি পরিধান করবে না। সুতরাং এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে দাফন করা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (3585)


3585 - عن جابر بن عبد الله أن النبي -صلي الله عليه وسلم- صلَّى على أصحمة النجاشي فكبَّر أربعًا.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1334)، ومسلم في الجنائز (952) كلاهما من حديث
سَليم بن حَيَّان، حدثنا سعيد بن ميناء، عن جابر بن عبد الله فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসহামা আন-নাজাশীর জানাযার সালাত আদায় করেন এবং চার তাকবীর বলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3586)


3586 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نعى النجاشي للناس في اليوم الذي مات فيه، وخرج بهم إلى المصلى، فصفَّ بهم وكبَّر أربع تكبيرات.

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (14) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البخاري في الجنائز (1245) عن إسماعيل، ومسلم في الجنائز (951) عن يحيى بن يحيى -كلاهما عن مالك به مثله.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যেদিন নাজ্জাশী মারা যান, সেদিনই লোকজনের কাছে তাঁর মৃত্যুর খবর ঘোষণা করেন। অতঃপর তিনি তাদের নিয়ে সালাতের স্থানের (মুসাল্লা) দিকে বের হলেন, তাদের নিয়ে কাতারবদ্ধ হলেন এবং চার তাকবীর দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3587)


3587 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى على جنازة فكبَّر عليها أربعًا، ثم أتى قبر الميت فحثا عليه من قبل رأسه ثلاثًا.

حسن: رواه ابن ماجه (1565) عن العباس بن الوليد، قال: حدثني يحيى بن صالح، قال: حدثنا سلمة بن كلثوم، قال: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث غير أنه لم يذكر"فكبَّر عليها أربعًا" وإنما رواه المِزِّي في ترجمة سلمة بن كلثوم (2450) بإسناده عن أبي بكر عبد الله بن أبي داود، قال: حدثنا العباس بن الوليد بن صُبح الخلال بإسناده.

قال أبو بكر بن أبي داود:"ليس يُروي عن النبي صلى الله عليه وسلم حديث صحيح"أنّه كبَّر على جِنازة أربعًا" إلا هذا. ولم يروه إلا سلمة، إنما يُروي عن النبي صلى الله عليه وسلم"أنه كبَّر على النجاشي أربعًا، وأنه صلى على قبر فكبَّر أربعًا".

ونقل المنذري في مختصر أبي داود كلام أبي بكر بن أبي داود ولفظه هكذا:"ليس يُروى عن النبي صلى الله عليه وسلم حديث صحيح:"أنه كبَّر على جنازة أربعًا" إلا هذا. ولم يروه إلا سلمة بن كلثوم، وهو ثقة من كبار أصحاب الأوزاعي، قال: وإنما يُروي عن النبي صلى الله عليه وسلم من وجه ثابت أنه"كبّر على قبر أربعًا" و"أنه كبَّر على النجاشي أربعًا" وأما على جنازة هكذا فلا، إلا حديث سلمة بن كلثوم" قال المنذري: هذا آخر كلامه.

وفيه تصحيح هذا الحديث من ابن أبي داود.

قلت: وإسناده حسن من أجل سلمة بن كلثوم فإنه حسن الحديث لا يرتقي إلى درجة"ثقة".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি জানাজার সালাত আদায় করলেন এবং তাতে চার তাকবীর দিলেন। এরপর তিনি মৃত ব্যক্তির কবরের কাছে আসলেন এবং মাথার দিক থেকে তার উপর তিনবার মাটি ছুঁড়ে দিলেন।